जय जिन वासुपूज्य शिव-रमनी-रमन मदन-दनु-दारन हैं | Jay Jin Vasupujy Shiv Ramani Raman Madan Danu Daran Hain

जय जिन वासुपूज्य शिव-रमनी-रमन मदन-दनु-दारन हैं

जय जिन वासुपूज्य शिव-रमनी-रमन मदन-दनु-दारन हैं ।
बालकाल संयम सम्हाल रिपु, मोहव्याल बलमारन हैं ।।
जाके पंचकल्यान भये चंपापुर में सुखकारन हैं ।
वासववृंद अमंद मोद धर, किये भवोदधि तारन हैं ।।१।।

जाकै वैन सुधा त्रिभुवन जन, को भ्रमरोग निदारन हैं ।
जा गुनचिंतन अमलअनल मृत, जनम-जरा-वन-जारन हैं ।।२।।

जाकी अरुन शांतछवि-रविभा, दिवस प्रबोध प्रसारन हैं ।
जाके चरन शरन सुरतरु वांछित शिवफल विस्तारन हैं ।।३।।

जाको शासन सेवत मुनि जे, चारज्ञानके धारन हैं ।
इन्द्र-फणींद्र-मुकुटमणि-दुतिजल, जापद कलिल पखारन हैं ।।४।।

जाकी सेव अछेवरमाकर, चहुंगतिविपति उधारन हैं ।
जा अनुभवघनसार सु आकुल, - तापकलाप निवारन हैं ।।५।।

द्वादशमों जिनचन्द्र जास वर, जस उजासको पार न हैं ।
भक्तिभारतैं नमें ‘दौल’ के, चिर-विभाव-दुख टारन हैं ।।६।।

मदन दनु - कामदेवरूपी राक्षस; दारन = मारनेवाला, मोह काल - मोहरूपी सर्प;
सुरतरु = कल्पवृक्ष; अछेव - अक्षय ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ८२ से ८३

अर्थ

अर्थ-मुक्तिरमणी के साथ रमण करनेवाले और कामदेवरूपी राक्षस को नष्ट करनेवाले श्री वासुपूज्य भगवान की जय हो। उन्होंने बाल्यकाल में ही संयम धारण कर लिया था और सिंह के समान प्रवल मोहशत्रु का विनाश कर दिया था। श्री वासुपूज्य भगवान के वे पांचो कल्याणक जो सुखकारी है और संसार-सागर से तारनेवाले हैं, चम्पापुरी में देवां द्वारा अत्यन्त हर्ष के साथ मनाये गये थे। श्री वासुपूज्य भगवान के वचन तीन लोक के प्राणियों के भ्रमरूपी रोग को दूर करने के लिए अमृत के समान है और उनके निर्मल गुणों का चिन्तवन एक ऐसी आग के समान है जो जन्म-जग-मरण स्पी वन को जलाकर गख कर देती है। श्री वासुपूज्य भगवान के शरीर का वर्ण लान है और उनकी शान्त छवि उस सूर्य के प्रकाश के समान है जो ज्ञानरूपी दिन को प्रकट करता है। भगवान के चरणों की शरण उस कल्पवृक्ष के समान है जो इच्छित मोक्षफल को प्रदान करनाना है। श्री वासुयुञ्च भगवान के शासन का मवन चार ज्ञान के धारक मर्मान करते है और इन्द्र ओर नागेन्द्र भी अपने मुकूट की मर्माण के प्रभारी जल को उनके चरणों पर डालकर अपने पापा का धोते है। श्री वासुपूज्य भगवान की सेवा शाश्वत लक्ष्मी को प्रदान करनेवाली और चतुति के दुःखा में बचानेवाली है तथा उनका अनुभवरूपी चन्दन आकुलनारूपी ताप के समूह को दूर करनेवाला है। श्री वासुपूज्य भगवान वागावे नीर्थकर है। उनके श्रेष्ठ वशरूपी उजाले का कोर्ड अन्त कही है। कविवर दौलतगम कहते है कि मैं उनको अन्त्यन्त बक्रिनपूर्वक प्रणाम करता है। वे मा अनादिवाचीन विभाव-सा को दूर करनेवाले है।

स्रोत: दौलत विलास, पद 11।

:paperclip: मूल पृष्ठ (छवि):

प्रूफरीडिंग बाकी है