जय जय मुनिवर तुम अपने अंदर जा बैठे हो, जा बैठे हो
तुम सम निज आतम ध्याकर मैं भी सुख पाऊं, सुख पाऊं ।।
नौ भव की पुरानी प्रीत तुम्हारी इस भव में भी मिलनी थी
पर किसको पता था पहले से होनी कुछ और ही होनी थी
तुम जूनागढ़ को चल निकले अपनी वधू को वरने के लिए
पर राग से तुम न बंध पाए मुक्ति वधू को पाने के लिए
सब कुछ तज कर तुम गिरनारी पर आ बैठे, आ बैठे
तुम सम निज आतम ध्याकर मैं भी सुख पाऊं, सुख पाऊं ।।
पाँचो पाण्डव ने वैभव तजकर नग्न दिगम्बर दीक्षा धरी
उपसर्ग हुआ जलते आभूषण द्वारा देह भी जलने लगी
दो मुनिवर सोचें अन्यों को कितना ना कष्ट हुआ होगा
पर तुमने अपनी देह से भिन्न आतम का स्वाद चखा होगा
अतएव क्षपक श्रेणी चढ़कर तुम सिद्ध शिला में जा बैठे
तुम सम निज आतम ध्याकर मैं भी सुख पाऊं, सुख पाऊं ।।
तन पुष्पों से भी कोमल था दीपक की लौ आँखों में चुभे
मुनि के वचनों को सुनकर तुम सब छोड़ दिगम्बर वेश धरे
पूरव की बैरिन भाभी स्यालिन बनकर देह को खाती थी
पर कायोत्सर्ग के धारी तुमको याद न देह की आती थी
बारह अनुप्रेक्षा का चिंतन कर अपने सुख को पा बैठे
तुम सम निज “ज्ञायक” ध्याकर मैं भी सुख पाऊं, सुख पाऊं ।।
पं. ज्ञायक जैन शास्त्री, अहमदाबाद