जय जय जग-भरम-तिमिर, हरन जिन धुनि | Jay Jay Jag Bharam Timir Haran Jin Dhuni

जय जय जग-भरम-तिमिर, हरन जिन धुनि

जय जय जग-भरम-तिमिर, हरन जिन धुनि ।।टेक।।

या बिन समुझे, अजौं न, सौंज निज मुनी ।
यह लखि हम निजपर अविवेकता लुनी ।।१।।जय जय. ।।

जाको गनराज अंग, पूर्वमय चुनी ।
सोई कही है कुन्दकुन्द, प्रमुख बहु मुनी ।।२।।जय जय. ।।

जे चर जड भये पीय, मोह बारुनी ।
तत्त्व पाय चेते जिन, थिर सुचित सुनी ।।३।।जय जय. ।।

कर्ममल पखारनेहि, विमल सुरधुनी ।
तज विलंब अब करो, ‘दौल’ उर पुनी ।।४।।जय जय. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ४२

अर्थ

अर्थ-हे जगत के भ्रमरूपी अन्धकार को दूर करनेवाली जिनेन्द्र-ध्वनि ! तुम्हारी बारम्बार जय हो।

अनादि काल से आज तक इस जीव ने तुमको समझे बिना ही अपने सच्चे स्वरूप को नहीं पहचाना है और ज्ञानी जीवों ने तुमको समझकर ही स्व-पर सम्बन्धी अज्ञान को नष्ट कर दिया है।

इसी जिनवाणी को गणधर देवों ने अंग-पूर्वमय चुनकर प्रतिपादित किया है और कुन्दकुन्द’ आदि अनेक प्रमुख आचार्यों ने भी इसी जिनवाणी का कथन किया है। जो जीव मोहरूपी शराब पीकर अचेतन-से हो रहे हैं, उनमें से जिन जीवों ने इस जिनवाणी को स्थिर चित्त होकर सुना है, वे तत्त्व की प्राप्ति करके जागृत हो गये हैं। कर्मरूपी मैल को धोने के लिए यह जिनवाणी पवित्र गंगा नदी के समान है। कविवर दौलतराम कहते है कि हे माँ अब देर न करो, मेरा हृदय पवित्र करो ।

स्रोत: दौलत विलास।

:paperclip: मूल पृष्ठ (छवि):

प्रूफरीडिंग बाकी है