जय बोलो सम्यक् दर्शन की
जय बोलो सम्यक् दर्शन की । रत्नत्रय के पावनधन की ।।
यह मोह ममत्व भगाता है, शिव पथ में सहज लगाता है ।
जय निज स्वभाव आनंद धन की ।।जय बोलो ।।१।।
परिणाम सरल हो जाते हैं, सारे संकट टल जाते हैं ।
जय सम्यक् ज्ञान परम धन की ।। जय बोलो ।।२।।
जप तप संयम फल देते हैं, भव की बाधा हर लेते हैं ।
जय सम्यक् चारित पावन की ।। जय बोलो ।।३।।
निज परिणति रूचि जुड़ जाती है, कर्मों की रज उड़ जाती है ।
जय जय जय मोक्ष निकेतन की ।। जय बोलो ।।४।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), प्रारम्भिक भजन