तर्ज : आतम स्वभाव से …
जानूँ मैं जाननहार रे,
तृप्त स्वयं में पूर्ण स्वयं में, समयसार अविकार रे।
जानूँ मैं जाननहार रे।। टेक।।
अक्षय प्रभुता अद्भुत वैभव, नित्य-निरंजन नहीं धरता भव।
सहज मुक्त निर्भार रे।। जानूँ मैं. ।। 1।।
पर भावों का नहीं अवलम्बन, सहज रूप अपना ही अनुभवन ।
आनन्द अपरम्पार रे।। जानूँ मैं. ।। 2।।
विनमूरति-चिन्मूरति आतम, स्वयं सिद्ध कारण परमातम ।
तीन भुवन में सार रे।। जानूँ मैं. ।। 3।।
और न जग में शरण दिखावे, एक सुहावे, एक ही भावे।
एक ही है आधार रे।। जानूँ मैं. ।। 4।।
हो एकाकी वन में रहाऊँ, एक रूप शुद्धातम ध्याऊँ।
निश्चय होऊँ भव पार रे ।। जानूँ मैं. ।। 5 ।।
नहीं जरूरत नहीं है शक्ति, निज में निज की वर्ते व्यक्ति ।
यही समय का सार रे।। जानूँ मैं. ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७७ से १७८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’