जानूँ जाननहार सहज ही, जाननहार ज्ञायक हूँ।
राग भाव दुःख कारण भासे, राग भाव को नहीं नमूँ ।। टेक ।।
राग भाव प्रति नहीं प्रशंसा, नहीं अनुमोदन राग भाव का कभी करूँ।
नहीं निमित्त भी मुक्तिमार्ग के कुदेवादि प्रति नहीं नमूँ ।। 1 ।।
नहीं प्रयोजन उनसे सधता, द्वेष नहीं माध्यस्थ धरूँ।
भय आशा स्नेह लोभ से, नहीं नमूँ, नहीं नमूँ ।। 2।।
वीतराग सर्वज्ञ आप को, राग भाव से नहीं नमूँ।
भेदज्ञान कर स्वानुभूतिमय, सहज नमन परमार्थ करूँ ।। 3 ।।
वीतरागता प्रगटाने को, अन्तर्मुख पुरुषार्थ करूँ ।
कारण विषय-कषायों के लख, उनसे क्षण-क्षण दूर रहूँ ।। 4 ।।
हो निवृत्त निर्ग्रन्थ सहज ही, ज्ञान सुधारस पान करूँ।
ख्याति लाभ की नहीं अभिलाषा, निज में ही संतुष्ट रहूँ ।। 5 ।।
चाहे जैसे जगत् परिणमे, उर में समता भाव धरूँ।
घोर परीषह उपसर्गों में भय न करूँ अडिग रहूँ।। 6।।
ध्येय रूप ध्याते-ध्याते ही, सहज साध्य शिव प्राप्त करूँ ।
निर्विकल्प परमानंद वर्ते, ब्रह्मचर्य निर्दोष धरूँ ।। 7।।
निर्वाछक कृतकृत्य सहज ही, स्वयं-स्वयं में तृप्त रहूँ।
रह स्वाधीन अनंत आनंद में, काल अनंत हि सहज रहूँ ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७२ से ३७३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’