तर्ज : गाड़ी खड़ी रे, खड़ी रे तैयार…
जानो-जानो रे रतन को मोल, फैंको ना हीरा कंकरन में ।। टेक ।।
जाति-जाति में जो उत्तम है, सो ही रतन कहाय।
नरभव दुर्लभ रतन पायके, विषयों में न गँवाय।। 1।।
देव-शास्त्र-गुरु तीन रत्न पाये, दीन बना मत डोल।
निज शुद्धात्म रत्न परख के, पाओ विभव अतोल ।। 2 ।।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र, रत्नों की तू है खान।
भरे अनन्तों अक्षय गुण हैं, तू खुद ही भगवान्।। 3।।
कायरता छोड़ो अब चेतन, तुम अनन्त बलधारी।
थर-थर काँपे कर्म भागते, आतम शक्ति संभारी।। 4।।
हीरा-पन्ना पर मोहित है, निज पहिचान न होई ।
शुद्धात्म ध्रुव रत्न पिछाने, सच्चा जौहरी सोई ।। 5।।
यह भव, भव के नाश हेतु, सब साधन तुमने पाया।
चेतो आत्मन् ! समय न चूको, पाओ निज की माया।।6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५८ से ३५९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’