जन्म सफल कर लो भवि प्राणी, अपना जन्म सफल कर लो।
जन्म-मरण से रहित अहो ! शुद्धातम का अनुभव कर लो ॥ टेक ॥
छोड़ो रे ! पर्याय मूढ़ता, द्रव्यदृष्टि अब प्रगटाओ ।
आदि अंत से रहित परम प्रभु, निर्विकल्प होकर ध्याओ ॥ 1 ॥
जिस सुख को चाहें सब प्राणी, वह तो सहज स्वभाव है।
भेदज्ञान कर थिर हो देखो, नित्य व्यक्त निज भाव है ॥ २॥
देखो-देखो अहो ! जिनेश्वर, अपने में ही तृप्त हुए।
धन्य जितेन्द्रिय योगीश्वर भी, निज में ही संतुष्ट हुए ॥ ३॥
दुर्विकल्प सब ही मिथ्या हैं, इनसे कार्य नहीं होता।
आकुलता बढ़ती ही जाती, व्यर्थ व्यथित बोझा ढोता ॥ 4 ॥
समाधान हो सर्व ज्ञान से, मिथ्या कर्त्ता बुद्धि मिटे ।
सम्यक् वस्तु स्वरूप दिखाता, भय शंका सब सहज नशे ॥ 5 ॥
ज्ञान-ज्ञान में होय प्रतिष्ठित, ज्ञानानंद प्रगट होता।
निज स्वरूप को ध्याते-ध्याते, जिनवर जीव स्वयं होता ॥ ६॥
यही मार्ग है सच्चे सुख का, कर प्रमाण स्वीकार करो।
बढ़ो मुमुक्षु इसी मार्ग में, परम साध्य को प्राप्त करो॥ 7 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८९ से ३९०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’