एक्कारसमो उद्देसो (भाग 1/2)
मल्लिजिणिंदं पणमिय महंतवरणाणदंसणपईवं । दीवोवहिअहलोगं सुरलोयं संपवक्खामि ॥ १
अर्थ: महान् व उत्तम ज्ञान-दर्शनरूपी प्रदीपसे युक्त मल्लि जिनेन्द्रको प्रणाम करके द्वीप, उदधि, अधोलोक और सुरलोककी प्ररूपणा करते हैं ॥ १ ॥
धादगिसंडो दीवो उदधिं लवणोदयं परिक्खिवदि । चत्तारिसयसहस्सा वित्थिण्णो चक्कवालम्हि ॥ २
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीप लवण समुद्रको वेष्टित करता है। यह द्वीप वलयाकारसे चार लाख योजन विस्तृत है ॥ २ ॥
दक्खिणउत्तरभागेसु तस्स दो दक्खिणुत्तरायामा । दीवस्स दु उसुगारा धादगिदीवं पविभजंति ॥ ३
अर्थ: उस धातकीखण्ड द्वीपके दक्षिण-उत्तर भागोंमें दक्षिण-उत्तर आयत ऐसे दो इष्वाकार पर्वत हैं, जो धातकीखण्ड द्वीपका विभाग करते हैं ॥ ३ ॥
णिसधस्सुच्छेहसमा पुट्ठा कालोदयं च लवणं च । बाहिरपरंतेसु य खुरप्परूवा गिरी होंति ॥ ४
अंते अंकमुहा खलु सहस्समेयं च होंति वित्थिण्णा । सयमेयं उव्वेहो आयामो दक्खिणुत्तरदो ॥ ५
अर्थ (गाथा 4 से 5): निषध पर्वतके समान उत्सेधवाले तथा लवण व कालोद समुद्रसे स्पृष्ट ऐसे वे इष्वाकार पर्वत बाह्य भागमें क्षुरप्रके आकार तथा अभ्यन्तर भागमें अंकमुख हैं। इनका विस्तार एक हजार योजन, उद्वेध एक सौ योजन और आयाम दक्षिण-उत्तरमें [ धातकीखण्डके विस्तार प्रमाण ] है ॥ ४-५ ॥
वंसधरा वंसधरो चउग्गुणो होइ धादगीसंडे । वंसादो वि य वंसो चउग्गुणो होइ बोद्धव्वो ॥ ६
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें कुलपर्वतसे कुलपर्वत और क्षेत्रसे क्षेत्र चौगुणे जानना चाहिये [ जैसे भरतक्षेत्रका अभ्यन्तर विस्तार ६६१४ १२/२२ यो. है, इससे चौगुणा ( २६४५८ २/११ यो. ) हैमवतक्षेत्रका अभ्यन्तर विस्तार है ] ॥ ६ ॥
जो जस्स पडिनिही खलु णदी दहो चावि अहव वंसधरो । उव्वेधुव्वेहसमा दुगुणा दुगुणा य वित्थारो ॥ ७
अर्थ: इस द्वीपमें स्थित नदी, द्रह और कुलपर्वत, इनमें जो जिसका प्रतिनिधि है उसका उद्वेध [ जम्बूद्वीपके समान; परन्तु विस्तार [ जम्बूद्वीपकी अपेक्षा ] दूना दूना है ॥ ७ ॥
अरविवरसंठियाणि य धादगिसंडम्हि होंति वंसाणि । अंतो संखित्ताइं बाहिरपासम्हि रुंदाई ॥ ८
अर्थ: धातकीखण्डमें स्थित क्षेत्र अरविवर ( पहियेके मध्यमें लगी हुई लकड़ियोंके बीचके छेद ) के आकार होते हुए अभ्यन्तर भागमें संक्षिप्त और बाह्य पार्श्वमें विस्तीर्ण हैं ॥ ८ ॥
धादगिसंडे दीवे सव्वत्थ समा हवंति वंसधरा । भरहेसु रेवदे खलु वित्थिण्णा दीहवेद्दड्ढा ॥ ९
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें वर्षधर पर्वत सर्वत्र समान हैं। यहां भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें विस्तीर्ण दीर्घ वैताढ्य पर्वत स्थित हैं ॥ ९ ॥
अंकमुहसंठिदाई अंतो वंसाणि धादगीसंढे । सत्तिमुहसंठिदाई बाहिरसगडुद्धियाबाहा ॥ १०
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्र अन्तमें अंकमुखाकार और बाह्यमें शक्तिमुखाकारसे स्थित हैं। इनकी भुजा गाड़ीकी ऊर्ध्विकाके समान है ॥ १० ॥
लक्खा य अट्ठवीसा छादालंसहस्समेव पण्णं च । धादगिसंडे मज्झे परिरयमेत्तं वियाणाहि ॥ ११
अर्थ: धातकीखण्डके मध्यमें परिधिका प्रमाण अट्ठाईस लाख छयालीस हजार पचास ( २८४६०५० ) योजन जानना चाहिये ॥ ११ ॥
इगिदालंसयसहस्सा दससहस्सा सदा य णव होंति । एगट्ठा किंचूणा बाहिरदो धादगीसंढे १२
अर्थ: धातकीखण्डकी बाह्य परिधि इकतालीस लाख दश हजार नौ सौ इकसठ ( ४११०९६१ ) योजनसे कुछ कम है ॥ १२ ॥
अट्ठसदा बादाला अट्ठत्तरिमेगसयसहस्सं च । वंसधरेसु य रुद्धं जं खेत्तं धादगीसंढे ॥ १३
अर्थ: धातकीखण्डमें एक लाख अठत्तर हजार आठ सौ ब्यालीस [ योजन और दो कला ( १७८८४२ २/२१२ ) ] प्रमाण क्षेत्र पर्वतोंसे रुद्ध है ॥ १३ ॥
वंसधरविरहिदं खलु जं खेत्तं हवदि धादगीसंढे । तस्स दु छेदा णियमा बे चेव सदाणि बाराणि ॥ १४
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें जो पर्वत रहित क्षेत्र है उसके नियमसे दो सौ बारह खण्ड हैं {(१+४+१६+६४+१६+४+१) × २=२१२} ॥ १४ ॥
छच्चेव सहस्साई छच्च सया चोद्दसुत्तरा होंति । अब्भंतरविक्खंभो ऊणत्तीसं च भागसदं ॥ १५
अर्थ: छह हजार छह सौ चौदह योजन और दो सौ बारह भागोंमेंसे एक सौ उनतीस भाग ( ६६१४ १२९/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] अभ्यन्तर विष्कम्भ है ॥ १५ ॥
बारस चेव सहस्सा पयासीदा सदा य पंच हवे । मज्झम्हि दु विक्खंभो भागा य हवंति छत्तीसा ॥ १६
अर्थ: बारह हजार पांच सौ इक्यासी योजन और छत्तीस भाग ( १२५८१ ३६/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] मध्यविस्तार है ॥ १६ ॥
अट्ठारस य सहस्सा सिगिदालीसा सया य पंच भवे । बाहिरदो विक्खंभो पंचावण्णं च भागसयं ॥ १७
अर्थ: अठारह हजार पांच सौ सैंतालीस योजन और पचवन भाग ( १८५४७ ५५/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] बाह्य विष्कम्भ है ॥ १७ ॥
धादगिपुक्खरमेरू चदुरासीदिं च जोयणसहस्सा । उच्छेधेण दु एदे सहस्समोगाढ धरणितले ॥ १८
अर्थ: धातकीखण्ड और पुष्कर द्वीप सम्बन्धी मेरु चौरासी हजार योजन ऊंचे और पृथिवीतलमें एक हजार योजन प्रमाण अवगाहसे सहित हैं ॥ १८ ॥
जत्थिच्छसि विक्खंभं चुल्लयमेरुम्हि उवदिट्ठाणं । दसभाजिदे जं लद्धं सहस्ससहिदं वियाणाहि ॥ १९
अर्थ: ऊपरसे नीचेकी ओर आते हुए जितने योजन नीचे जाकर इन क्षुद्र मेरुओंका विस्तार जानना अभीष्ट हो उनमें दशका भाग देनेपर जो प्राप्त हो, एक हजार योजनोंसे सहित उतना वहांपर विस्तार जानना चाहिये ॥ १९ ॥
मूलम्हि दु विक्खंभो पंचाणउद्दिं च जोयणसदाणिं ।
परिरयं तीससहस्सा वादालीसा य किंचूणा ॥ २०
अर्थ: इन मेरुओंका विस्तार मूलमें पंचानबै सौ ( ९५०० ) योजन प्रमाण है। इनकी परिधि तीस हजार ब्यालीस ( ३००४२ ) योजनसे कुछ कम है ॥ २० ॥
धरणितले विक्खंभो चदुणउद्दी होंति जोयणसदाणि ।
परिरय उणातीसं सत्त य पणुवीस साहीया ॥ २१
अर्थ: उक्त मेरुओंका विस्तार पृथिवीतलपर चौरानबै सौ ( ९४००) योजन प्रमाण और परिधि उनतीस [ हजार ] सात सौ पच्चीस ( २९७२५ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २१ ॥
पंचेव जोयणसया उड्ढं गंतूण णंदणं होइ ।
पंचसदा वित्थिण्णा पढमा सेढी दु चुल्लाणं ॥ २२
अर्थ: मेरुके ऊपर पांच सौ योजन जाकर पांच सौ योजन विस्तीर्ण नन्दन वन है । यह क्षुद्र मेरुओंकी प्रथम श्रेणी है ॥ २२ ॥
तेणउद्दिं पण्णासा बाहिरविक्खंभ परिरओ तस्स ।
उणातीससहस्सा पंच य सट्ठि साहीया ॥ २३
अर्थ: नन्दन वनके समीप क्षुद्र मेरुओंका बाह्य विष्कम्भ तेरानबै सौ पचास ( ९३५० ) योजन और इसकी परिधि उनतीस हजार पांच सौ सड़सठ ( २९५६७ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २३ ॥
तेसीदिं पण्णासा अंतोविक्खंभपरिरओ तस्स ।
छब्बीसं च सहस्सा चदुसद पंचेव साहीया ॥ २४
अर्थ: नन्दन वनके समीप क्षुद्र मेरुओंका अभ्यन्तर विष्कम्भ तेरासी सौ पचास ( ८३५० ) योजन और इसकी परिधि छब्बीस हजार चार सौ पांच ( २६४०५ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २४ ॥
पणवण्णं च सहस्सा पंचेव सदाणि उवरि गंतूणं ।
सोमणसं णाम वणं णंदणवणसरिसवित्थारं ॥ २५
अर्थ: नन्दन वनसे पचपन हजार पांच सौ योजन ऊपर जाकर उक्त वनके समान विस्तारवाला सौमनस नामक वन स्थित है ॥ २५ ॥
अट्ठत्तीससदाईं बाहिरविक्खंभपरिरओ तस्स ।
बारस चेव सहस्सा सत्तरसा होंति किंचूणा ॥ २६
अर्थ: सौमनस वनके समीपमें क्षुद्र मेरुओंका बाह्य विस्तार अड़तीस सौ ( ३८०० ) योजन और उसकी परिधि बारह हजार सत्तरह (१२०१७) योजनसे कुछ कम है ॥ २६ ॥
अट्ठावीससदाईं अंतोविक्खंभ० परिरओ तस्स ।
अट्ठासीदिसदाईं चदुवण्णा होंति साधीया ॥ २७
अर्थ: सौमनस वनके समीपमें उक्त मेरुओंका अभ्यन्तर विष्कम्भ अट्ठाईस सौ ( २८०० ) योजन और उसकी परिधि अठासी सौ चौवन (८८५४) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २७ ॥
अट्ठावीससहस्सा उवरि गंतूण पंडुगं होदि ।
सेसवियप्पा उवरिं तुल्ला सव्वेसिं मेरूणं ॥ २८
अर्थ: सौमनस वनसे अट्ठाईस हजार योजन ऊपर जाकर पाण्डुक वन स्थित है। शेष ऊपरके विकल्प सब मेरुओंके समान हैं ॥ २८ ॥
दोण्हं मेरूणं तह। दोण्हं इसुगारेपव्वदाणं तु ।
धादगिदुमाण दोण्हं दोण्हं वरसामलिदुमाणं ॥ २९
अट्ठण्हं जमगाणं गयदंताणं तहेव अट्ठण्हं ।
दिसगयवरागामाणं सोलसवरतुंगसेलाणं ॥ ३०
चउवीसविभंगाणं अट्ठावीसामहाणदीणं तु ।
वक्खारगणण तहा बत्तीसण्हं विचित्तवण्णाणं ॥ ३१
बत्तीसद्दहवराणं बारसकुलपव्वदाण तुंगाणं ।
अट्ठण्हं णामेव्वा णामिगिरीणामसेलाणं ॥ ३२
अडसट्ठिकुमुदसंणिभवेदड्ढणगण धादगीसंडे ।
छण्णं कम्मखिदीणं छप्पण्णसदाण तह य कुंडाणं ॥ ३३
भादगिसंडस्स तहा चउवीसविहंगकुंडाणं ।
अडसट्ठिकणयसंणिभरिसभगिरीणामसेलाणं ॥ ३४
सव्वाण पव्वदाणं चदुसदवरकणयणामधेयाणं ।
जह वण्णणा दु पुव्वं णिरवयवा तह य कायव्वा ॥ ३५
अर्थ (गाथा 29 से 35): दो धातकी वृक्ष, दो शाल्मलि वृक्ष, आठ यमक, उसी प्रकार आठ गजदन्त, सोलह उन्नत उत्तम दिग्गजेन्द्र नामक शैल, चौबीस विभंगानदियां, अट्ठाईस महानदियां, विचित्र वर्णवाले बत्तीस वक्षार-पर्वत, बत्तीस उत्तम द्रह, उन्नत बारह कुलपर्वत, आठ नाभिगिरि नामक शैल, कुमुद (सफेद कमल) के सदृश अडसठ वैताढ्य पर्वत, छह कर्मभूमियां (२ भरत, २ ऐरावत, २ विदेह); गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदाके एक सौ छप्पन कुण्ड; चौबीस विभंगाकुण्ड, सुवर्ण सदृश अड़सठ ऋषभगिरि नामक शैल तथा चार सौ उत्तम कांचन नामक पर्वत, इन सबका पूर्वमें जैसा वर्णन किया गया है वैसा ही पूर्ण रूपसे यहां भी करना चाहिये ॥ २९-३५ ॥
सव्वे वि वेदिसहिदा सव्वे वणसंडमंडिया दिव्वा ।
सव्वे तोरणणिवहा जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ ३६
अर्थ: सब ही [ उपर्युक्त मेरुपर्वतादि ] वेदियोंसे सहित, वनखण्डोंसे मण्डित, दिव्य, सब तोरणसमूहोंसे सहित और जिनभवनोंसे विभूषित हैं ॥ ३६ ॥
अट्ठावीससयणदीणं बारसवरभोगपउरभूमीणं ।
छक्खंडाण य णेया अडसट्ठा भेदभिण्णाणं ॥ ३७
जंबूदीवस्स पुणो जह पुव्वं वण्णणा समुद्दिठ्ठा ।
धादगिसंडस्स तहा णिरवयवा वण्णणा होइ ॥ ३८
अर्थ (गाथा 37 से 38): चौंसठ विजयोंकी एक सौ अट्ठाईस नदियों, बारह श्रेष्ठ भोगप्रचुर भूमियों (२ हैमवत, २ हरि, २ देवकुरु, २ उत्तरकुरु, २ रम्यक २ हैरण्यवत) और अड़सठ भेदोंसे भिन्न छह (६८ × ६) खण्डोंका जैसा वर्णन जम्बूद्वीपमें किया गया है वैसा ही वर्णन पूर्णतया धातकीखण्डमें भी है ॥ ३७-३८ ॥
जंबूदीवो भणिदो जावदियं चावि खेत्तगणिदेण ।
तावदियं च सयं खलु चोद्दालं धादगीसंडे ॥ ३९
अर्थ: जम्बूद्वीपके क्षेत्रफलका जितना प्रमाण कहा गया है उतने क्षेत्रफलकी अपेक्षा धातकीखण्डके एक सौ चवालीस खण्ड होते हैं ॥ ३९ ॥
एकारसट्ठत्तीसा इगिदाले तह य होदि णवणउदा ।
सगवण्णा छच्च सदा एगट्ठा खेत्तगणिदेण ॥ ४०
अर्थ: धातकीखण्डका क्षेत्रफल ग्यारह, अड़तीस, इकतालीस, निन्यानवै, सत्तावन और छह सौ इकसठ (११३८४१९९५७६६१) योजन प्रमाण है ॥ ४० ॥ एक, तीन,
एकं च तिण्णि तिण्णि य छह सुण्णं छक्कं दोण्णि तिण्णेयं । एक्कंचदुद्दोण्णिएक्कं धादगिसंडम्हि गणितपदं ॥ ४१
अर्थ: तीन, छह, शून्य, छह, दो, तीन, एक, एक, चार, दो और एक ( १२४११३२६०६३३१ ) इतने योजन प्रमाण [ जम्बूद्वीप व लवणसमुद्रसे संयुक्त ] धातकीखण्डका क्षेत्रफल है ॥ ४१ ॥
वरवज्जमया वेदी धादगिसंडस्स होइ णायव्वा । चउगोउरसंजुत्ता चउदसवरतोरणुत्तुंगा ॥ ४२
अर्थ: धातकीखण्डकी उत्तम वज्रमय वेदी चार गोपुरोंसे संयुक्त और उत्तम चौदह तोरणोंसे उन्नत जानना चाहिये ॥ ४२ ॥
धादगिसंडं दीवं उदधी कालोदओ परिक्खिवदि । सो अट्ठसयसहस्सा वित्थिण्णो चक्कवालम्हि ॥ ४३
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपको कालोद समुद्र वेष्टित करता है । वह मण्डलाकारमें आठ लाख योजन विस्तीर्ण है ॥ ४३ ॥
कालसमुद्दप्पहुदी बोद्धव्वा होंति टंकछिण्णाओ। उव्वेधेण सहस्सं पादाला णेव तत्थत्थि ॥ ४४
अर्थ: कालोद समुद्र आदि आगेके समुद्र टांकीसे उकेरे हुएके समान जानना चाहिये । ये एक हजार योजन गहरे हैं तथा उनमें पाताल नहीं हैं ॥ ४४ ॥
इगिणउदिसदसहस्सा सत्तरिसहस्साह छस्सदा णेया। जोयणपंचब्भहिया परिही कालोदए दिट्ठा ॥ ४५
अर्थ: कालोदक समुद्रकी परिधि इक्यानवै लाख सत्तर हजार छह सौ पांच ( ९१७०६०५ ) योजन प्रमाण निर्दिष्ट की गई है ॥ ४५ ॥
पंच तियं बारसयं बावट्टी छक्क तह य छादालं । णय सुण्णं वासी कालयणम्मि गणियपदं ॥ ४६
अर्थ: कालोद समुद्रका क्षेत्रफल पांच, तीन, बारह, बासठ, छह, छियालीस, नौ, शून्य और ब्यासी ( ५३१२६२६४६९०८२ ) इतने योजन प्रमाण है ॥ ४६ ॥
छावट्ठि अडदालं अडसट्ठि सत्तसीदिमसिदिं च । पण्णासं च चउक्कं हवदि य कालोदधीसंखा ॥ ४७
अर्थ: [ जम्बूद्वीपादिके क्षेत्रफलसे युक्त ] कालोद समुद्रका क्षेत्रफल छयासठ, अड़तालीस, अड़सठ, सतासी, अस्सी, पचास और चार ( ६६४८६८८७८०५०४ ) इतने योजन प्रमाण है ॥ ४७ ॥
जंबुद्दीवो भणिदो जावदियं चावि खेत्तगणिदेण । छहचेव सदा बावत्तरिं च कालोदधिं जाणे ॥ ४८
अर्थ: जम्बूद्वीपके क्षेत्रफलका जितना प्रमाण कहा गया है उसकी अपेक्षा कलोद समुद्रका क्षेत्रफल छह सौ बहत्तरगुणा जानना चाहिये ॥ ४८ ॥
गंगादीणदियाणं हिमवंतादी तहेव सेलाणं । ताणभिमुहेण होंति य कुमाणुसाणं महादीवा ॥ ४९
अर्थ: गंगादिक नदियों तथा हिमवान् आदि शैलोंके अभिमुख कुमानुषोंके महा द्वीप हैं ॥ ४९ ॥
वणवेदिहि जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा । कालोदयम्मि दीवा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ५०
अर्थ: कालोद समुद्रमें स्थित ये द्वीप सर्वदर्शियोंके द्वारा वन-वेदियोंसे संयुक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित और मनको अभिराम निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ५० ॥ कालोद समुद्रस्थ इन द्वीपोंमें स्थित कुमानुष
एगोरुगवेसाणिगलंगूलिग तह अभासया णेया । हयकरणा य कुमाणुस तहेव वरकण्णपावरणा ॥ ५१
लंबससकण्णमणुया तुरंगवरसीहसुणहमहिसमुहा । सूवरवग्घउल्लूमुह मिगवाणरमीणवरवयणा ॥ ५२
गोमेसमेघवयणा विज्जूभादरिसमत्तकरिवदणा । कालोदए समुद्दे कुमाणुसा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ५३
अर्थ (गाथा 51 से 53): एक ऊरुवाले, वैषाणिक, लांगूलिक, तथा अभाषक, अश्वकर्ण, कर्णप्रावरण, लम्बकर्ण, शशकर्ण, तुरंगमुख, उत्तम सिंहमुख, श्वानमुख, महिषमुख, शूकरमुख, व्याघ्रमुख, उलूकमुख, मृगवदन, वानरवदन, मीनवदन, गोवदन, मेषवदन, मेघवदन, विद्युद्वदन, आदर्शवदन और गजवदन होते हैं; ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ ५१-५३ ॥
कोसेक्कसमुत्तुंगा पलिदोवमआउगा समुद्दिट्ठा । अमलपमाणाहारा चउत्थभत्तेण पारिंति ॥ ५४
अर्थ: एक कोश ऊंचे, एक पल्योपम प्रमाण आयुवाले और आंवलेके प्रमाण आहार करनेवाले ये कुमानुष चतुर्थ भक्तसे पारणा करते हैं ॥५४॥
भोत्तूण मणुयभोयं मरिदूण य ते कुमाणुसा सव्वे । उप्पज्जंति महप्पा तिवगदेवाण भवणेसु ॥ ५५
अर्थ: वे सब कुमानुष मनुष्योंके योग्य भोगको भोग कर और फिर मरकर भवनत्रिक देवोंके भवनोंमें महात्मा उत्पन्न होते हैं ॥ ५५ ॥
कालसमुद्दस्स तहा वज्जमया वेदिया समुद्दिट्ठा । चउगोउरसंजुत्ता चउदसवरतोरणुत्तुंगा ॥ ५६
अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपके समान कालोदक समुद्रके भी चार गोपुरोंसे संयुक्त और उत्तम चौदह तोरणोंसे समुन्नत वज्रमय वेदिका निर्दिष्ट की गई है ॥५६ ॥
पोक्खरवरो दु दीवो उदधिं कालोदयं परिक्खिवदि । सोलस दु सयसहस्सा वित्थारो चक्कवालम्हि ॥ ५७
अर्थ: कालोद समुद्रको चारों ओरसे पुष्करवर द्वीप वेष्टित करता है। इसका मण्डलाकार विस्तार सोलह लाख योजन है ॥५७॥
तस्स य दीवस्सद्धं परिरयदि य माणुसोत्तरो सेलो । बाहिरभागणिविट्ठो तद्दीवड्ढं परिक्खिवदि ॥ ५८
अर्थ: उस द्वीपके अर्ध भागको मानुषोत्तर शैल वेष्टित करता है। पुष्करार्द्धके बाह्य भागमें स्थित यह पर्वत उक्त द्वीपके अर्ध भागको वेष्टित करता है ॥ ५८ ॥
सत्तरस एक्कवीसाणि उच्चिट्ठो माणुसुत्तरो सेलो । चत्तारि जोयणसया तीसं कोसं च उव्वेधो ॥ ५९
अर्थ: मानुषोत्तर शैल सत्तरह सौ इक्कीस योजन ऊंचा तथा चार सौ तीस योजन व एक कोश अवगाहसे संयुक्त है ॥ ५९ ॥
चत्तारि जोयणसदा चउवीसाइं च वित्थडा उवरिं । दस बावीसा मूले तेवीसा सत्त मज्झम्हि ॥ ६०
अर्थ: इसका विस्तार ऊपर चार सौ चौबीस योजन, मूलमें दश सौ बाईस योजन और मध्यमें सात सौ तेईस योजन है ॥ ६० ॥ मानुषोत्तर शैलपर चारों ही
मणुसुत्तरम्मि सेले चदुसु वि य दिसासु होंति चत्तारि । तुंगा विचित्तवण्णा मणिकंचणरयणपरिणामा ॥ ६१
धुव्वंतधयवडाया मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा । भिंगारकलसपउरा बहुकुसुम कयच्चणसणाहा ॥ ६२
कालागरुगंधद्धा संगीयमुदिंगसद्दगंभीरा । घंटाकिंकिणिणिवहा जिणिंदइंदीण वरभवणा ॥ ६३
मंदरसेलस्स वणे जिणिंदईंदाण पवरपासादा । जह वण्णिया असेसा तह एत्थ वि वण्णणा होइ ॥ ६४
अर्थ (गाथा 61 से 64): दिशाओंमें उन्नत, विचित्र वर्णवाले; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे निर्मित; फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे युक्त, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, भृंगार एवं कलशोंकी प्रचुरतासे संयुक्त, बहुत कुसुमोंसे की गई पूजासे सनाथ, कालागरुकी गन्धसे व्याप्त, संगीत एवं मृदंगके शब्दसे गंभीर, तथा घंटा व किंकिणियोंके समूहसे सहित ऐसे श्रेष्ठ चार जिनेन्द्रप्रासाद हैं । जैसे पहिले मन्दर पर्वतके वनमें स्थित सब उत्तम जिनेन्द्रप्रासादोंका वर्णन किया गया है, वैसा ही वर्णन यहां भी जानना चाहिये ॥ ६१-६४ ॥
सत्तरससइसहस्सा चदुसद कोडी य सत्तवीसाणि । पोक्खरवरद्धमज्झे परिरयभेदं वियाणाहि ॥ ६५
अर्थ: एक करोड़ सत्तरह लाख चार सौ सत्ताईस ( ११७००४२७ ) योजन, यह पुष्करार्धके मध्यमें परिधिका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ६५ ॥
बादालेसइसहस्सा तीससहस्सा सदा य बे कोडी । माणुसखेत्तपरिरओ सविसेसंचूणवण्णा य ॥ ६६
अर्थ: मनुष्यक्षेत्रकी परिधि एक करोड़ ब्यालीस लाख तीस हजार दो सौ उनचास ( १४२३०२४९ ) योजनसे कुछ कम है ॥ ६६ ॥
वंसधरा वंसधरो चदुगुणो होइ पुक्खरवरम्मि । वंसादो वि य वंसो चदुगुणो होइ बोद्धव्वो ॥ ६७
अर्थ: पुष्करवर द्वीपमें पूर्व पूर्व कुलपर्वतकी अपेक्षा आगे आगेका कुलपर्वत तथा पूर्व पूर्व क्षेत्रकी अपेक्षा आगे आगेका क्षेत्र भी चौगुणा जानना चाहिये ॥ ६७ ॥
तिण्णेव सयसहस्सा पणवण्णं होइ तह सहस्साईं । छहच्च सदा चुलसीदा रुद्धं तु णगेहि दीवद्धो ॥ ६८
अर्थ: पुष्करार्द्ध द्वीप तीन लाख पचवन हजार छह सौ चौरासी योजन प्रमाण पर्वतोंसे रुद्ध है ॥ ६८ ॥
वंसहरविरहियं खलु जं खेत्तं हवइ पोक्खरद्धम्हि । तस्स दु छेदा णियमा बे चेव सदाणि बारणि ॥ ६९
अर्थ: पुष्करार्द्ध द्वीपमें जो क्षेत्र कुलपर्वतोंसे रहित है उसके नियमसे दो सौ बारह ( १ + ४ + १६ + ६४ + १६ + ४ + १ ) x २ = २१२ ) खण्ड हैं ॥ ६९ ॥
इगिदलीससहस्सा ऊणासीदा सदा य पंच हवे । तेहत्तरिभागसदं अंतो भरहस्स विक्खंभो ॥ ७०
अर्थ: इकतालीस हजार पांच सौ उन्यासी योजन और एक सौ तिहत्तर भाग ( ४१५७९ १७३/२१२ ) प्रमाण भरतक्षेत्रका अभ्यन्तर विष्कम्भ है ॥ ७० ॥ भरतक्षेत्रका
तेवण्णं च सहस्सा पंचेव सयाणि बारणि । णवणउदिं भागसदं मज्झे भरहस्स विक्खंभो ॥ ७१
अर्थ: विस्तार मध्यमें तिरपन हजार पाँच सौ बारह योजन और एक सौ निन्यानबै भाग ( ५३५१२-१९९/२१२ ) प्रमाण है ॥ ७१ ॥
पणट्ठिं च सहस्सा चत्तारि सयाणि होंति छादाला । तेरस चेव य भागा बाहिरभरहस्स विक्खंभो ॥ ७२
अर्थ: बाह्य भरतक्षेत्रका विष्कम्भ पैंसठ हजार चार सौ छयालीस योजन और तेरह भाग ( ६५४४६ १३/२१२ ) प्रमाण है ॥ ७२ ॥
जंबुद्दीवो भणिदो जावदियो चावि खेत्तगणिदेण । तावदियाणि सहस्सा चुलसीदि सदं चे दीवद्धे ॥ ७३
अर्थ: क्षेत्रफलके प्रमाणसे जितना जम्बूद्वीप कहा गया है उतने प्रमाणसे पुष्करार्द्धके एक हजार एक सौ चौरासी ( ११८४ ) खण्ड जानना चाहिये ॥ ७३ ॥
बे दीवा बे उदधी जावदिया चावि खेत्तगणिदेण । तं तु दिवड्डं ऊणं (?) खेत्तपमाणेण दीवद्धे ॥ ७४
अर्थ: क्षेत्रफलकी अपेक्षा जितने मात्र दो द्वीप और दो समुद्र हैं उतने क्षेत्रप्रमाणसे पुष्करार्द्ध द्वीप डेढ़गुणेसे कुछ कम है (?) ॥ ७४ ॥
दोण्हं गिरिरायाणं दोण्हं इसुगारणामसेलाणं । सामलितरूण दोण्हं दोण्हं वरपउमरुक्खाणं ॥ ७५
अट्ठण्हं जमगाणं अट्ठण्हं वरकरिंददंताणं । बारसवेसहराणं बारसवरभोगभूमीणं ॥ ७६
दिसिगयवरणामाणं अट्ठण्हं दुगुणिदाण सेलाणं । चउसयकणयणगाणं णाभिगिरीणं तु अट्ठण्हं ॥ ७७
चउवीसवभंगाणं अट्ठावीसं महाणदीणं तु । बत्तीसदहवराणं वक्खाराणं तु तह य णायव्वा ॥ ७८
विज्जाधरसेलाणं अडसट्ठाणं तु तह य णायव्वा । अडसट्ठाणं च तहा वसभगिरीणामसेलाणं ॥ ७९
छण्हं कम्मखिडीणं छप्पण्णसदाण तह य कुंडाणं । अडवीससदणदीणं चउवीसवभंगकुंडाणं ॥ ८०
सट्ठी अट्ठहियाणं छहखंडविमंडियाण विजयाणं । पोक्खरवरअद्धस्स य अण्णे वि जगाणदीणं तु ॥ ८१
होंति महावेदीओ मणिकंचणरयणतोरणा दिव्वा । रयणमया पासादा वणसंडा तह य णायव्वा ॥ ८२
अर्थ (गाथा 75 से 82): पुष्करवर द्वीप सम्बन्धी दो मेरु, दो इष्वाकार नामक शैल, दो शाल्मली वृक्ष, दो श्रेष्ठ पद्म ( पुष्कर ) वृक्ष, आठ यमक, आठ उत्तम गजदन्त, बारह कुलपर्वत, बारह उत्तम भोगभूमियां, दुगुणित आठ अर्थात् सोलह दिग्गजेंद्र पर्वत, चार सौ कांचन पर्वत, आठ नाभिगिरि, चौबीस विभंगानदियां, अट्ठाईस महानदियां, बत्तीस उत्तम द्रह, तथा बत्तीस वक्षार पर्वत, अड़सठ विद्याधरशैल ( विजयार्ध ), तथा अड़सठ वृषभगिरि नामक पर्वत, छह कर्मभूमियां, एक सौ छप्पन कुण्ड, एक सौ अट्ठाईस नदियां, चौबीस विभंगाकुण्ड, छह खण्डोंसे मण्डित आठसे अधिक साठ अर्थात् अड़सठ विजय, तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी जो पर्वत व नदियां हैं उन सबके मणि, सुवर्ण एवं रत्नमय तोरणोंसे संयुक्त दिव्य महा वेदियां, रत्नमय प्रासाद तथा वनखण्ड जानना चाहिये ॥ ७५-८२ ॥
धुलवंतधयवडाइया जिणगेहा ताण होंति सव्वाणं ।
पोक्खरिणिवावियाओ णिद्दिष्ट्ठा तह य णायव्वा ॥ ८३
अर्थ: उन सबके फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त जिनगृह होते ह । तथा इन जिनगृहोंमें पुष्करिणियां एवं वापिकायें भी निर्दिष्ट की गई जानना चाहिये ॥ ८३ ॥
जंबूदीवो धादइसंडो पुक्खरवरो य तह दीवो ।
वारुणिवरं खीरवरो घयवर तह खोयवरदीवो ॥ ८४
णंदीसरो य अरुणो अरुणाभासो य कुंडलवरो य ।
संखवर रुचग भुजगो वर कुसवर कौंचवरदीवो ॥ ८५
एदे सोलस दीवा णामा एदे हि आणुपुव्वीए ।
तेण परं जे सेसा णामा संखा इमा तेसिं ॥ ८६
जावदियाणि य लोए सुभणामा ते इमेहि णामेहि ।
दीवा वि य णायव्वा बहुवों एक्केक्कणामेहि ॥ ८७
अर्थ (गाथा 84 से 87): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड, पुष्करवर द्वीप, वारुणिवर, क्षीरवर, घृतवर, क्षौद्रवर द्वीप, नन्दीश्वर, अरुण, अरुणाभास, कुण्डलवर, शंखवर, रुचगवर, भुजगवर, कुशवर और क्रौंचवर द्वीप, ये जो सोलह द्वीप है उनके ये अनुक्रमसे नाम हैं । इसके आगे जो शेष द्वीप हैं उनके नाम व संख्या यह है । वे द्वीप भी लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामोंसे सहित जानना चाहिये । बहुतसे द्वीप एक एक ( समान ) नामोंसे संयुक्त हैं ॥ ८४-८७ ॥
दीवं संखा णामं जंबूदीवादि जाव अरुणंते ।
वज्जिय सेसा दीवा सव्वे णामेहि सामण्णा ॥ ८८
अर्थ: जम्बूद्वीपको आदि लेकर स्वयम्भूरमण द्वीप तक अरुण पर्यन्त छोड़कर शेष सब द्वीप नामोंसे समान हैं ( ? ) ॥ ८८ ॥
जंबूदीवे लवणो धादगिसंडम्मि हवदि कालोदो ।
सेसाणं दीवाणं दीवसरिसणामया उदधी ॥ ८९
अर्थ: जम्बूद्वीपमें लवणसमुद्र और धातकीखण्ड द्वीपमें कालोद समुद्र है । शेष द्वीपोंके समुद्र द्वीपके समान नामवाले हैं ॥ ८९ ॥
जंबूदीवादीया दीवा लवणादिया तहा उदधी ।
जाव दु सयंभुरमणे विण्णेया दीव उदधी य ॥ ९०
अर्थ: जम्बूद्वीपको आदि लेकर द्वीप तथा लवण समुद्रको आदि लेकर समुद्र इस प्रकार स्वयम्भूरमण पर्यन्त द्वीप-समुद्र जानना चाहिये ॥ ९० ॥
लवणो कालयसलिले सयंभुरमणोवही य तिण्णेदे ।
मच्छाण कुम्मणिलया झसकुम्मविवज्जिया सेसा ॥ ९१
अर्थ: लवणोद, कालोद और स्वयम्भूरमण ये तीन समुद्र मछलियों और कछुओं ( जलचर जीवों ) के आवास रूप हैं; शेष समुद्र मछलियों और कछुओंसे रहित हैं ॥ ९१ ॥
अट्ठारसजोयणियो लवणे णवजोयणा णदिसुहेसु ।
छत्तीसगा य कालोदयम्मि अट्ठारसा णदिमुहेसु ॥ ९२
अर्थ: लवण समुद्रमें [ मध्यमें ] अठारह योजन व नदीमुखोंमें नौ योजन, कालोदक समुद्रमें [ मध्यमें ] छत्तीस योजन व नदीमुखोंमें अठारह योजन, तथा स्वयम्भूरमण
साहस्सिया दु मच्छा सयंभूरमणोदधिम्हि बोद्धव्वा । एमेव झसवराणं उक्कस्सं होइ उच्चत्ते ॥ ९३
अर्थ (गाथा 92 से 93): समुद्रमें एक हजार योजन [ दीर्घ ] मत्स्य जानना चाहिये । यही महामत्स्योंकी उत्कृष्ट ऊंचाई है ॥ ९२-९३ ॥
पत्तेयरसा चत्तारि सायरा तिण्णि होंति उदयरसा । अवसेसा य समुद्रा बोद्धव्वा होंति खोदरसो ॥ ९४
अर्थ: चार समुद्र प्रत्येक रस अर्थात् अपने अपने नामके अनुसार रसवाले, तीन समुद्र जलके समान रसवाले, और शेष समुद्र क्षोदरस ( ऊखके समान रसवाले ) जानना चाहिये ॥ ९४ ॥
लवणो वारुणितोओ खीरवरो घयवरो य पत्तेया । कालो पोक्खरउदधी सयंभूरमणो य उदयरसा ॥ ९५
अर्थ: लवण, वारुणीवर, क्षीरवर और घृतवर, ये चार समुद्र प्रत्येकरस तथा कालोद, पुष्करवर और स्वयम्भूरमण, ये तीन समुद्र उदकरस हैं ॥ ९५ ॥
जा दक्खिणदीवंते णीलादो दक्खिणे गदा रज्जू । तिस्से मज्झे गंठी किं वंसे अहव वंसधरे ॥ ९६
अर्थ: नील पर्वतसे दक्षिणकी ओर दक्षिण द्वीपान्तमें जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि [ अर्धच्छेद ] क्या वर्षमें है अथवा वर्षधर में है ? ॥ ९६ ॥
णिसधगिरिसुत्तरदो बेसदतेवट्ठि जोयणसदेसु । भागे च तिण्णि गंतूं सो गंठी होइ देवकुरु ॥ ९७
अर्थ: निषध पर्वतके उत्तरमें दो सौ तिरसठ योजन व तीन भाग जाकर वह ग्रन्थि देवकुरु [ में पड़ती ] है ॥ ९७ ॥
मंदरतलमज्झादो भरहंता जा गदा हवे रज्जू । तिस्से मज्झे गंठी किं वंसे अहव वंसधरे ॥ ९८
अर्थ: मन्दरतलके मध्य भागसे भरतक्षेत्र पर्यन्त जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि क्या वर्षमें है अथवा वर्षधरमें है ? ॥ ९८ ॥
सत्तावण्णं च सदा अट्ठसहस्सा कला य सत्तरसा । णिसहगिरिसुत्तरदो ओगाहिय सा हवे गंठी ॥ ९९
अर्थ: वह ग्रन्थि निषध पर्वतके उत्तरमें आठ हजार एक सौ सत्तावन योजन और सत्तरह कला अवगाहन करके स्थित है ॥ ९९ ॥
अब्भंतरम्मि भागे सयंभूरमणोदयस्स दीवस्स । पण्णत्तरि व सहस्सा ओगाहिय सा हवे गंठी ॥ १०१
अर्थ: मन्दरतलके मध्य भागसे स्वयम्भूरमण समुद्रमें जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि क्या द्वीपमें है अथवा समुद्रमें है ? ॥ १०० ॥ वह ग्रन्थि स्वयम्भूरमण समुद्रके अभ्यन्तर भागमें एक हजार पचत्तर योजन द्वीपका अवगाहन करके स्थित है ॥ १०१ ॥ मन्दरतलके मध्य भागसे लोकके अन्त तक
मंदरतलमज्झादो लोगंता जा गदा उदधिवंतं ।
तिस्से मज्झे गंठी इमं तु विज्जापदविसेस ॥ १०२
अर्थ: समुद्र पर्यन्त जो रज्जु गई है उसके मध्यमें जो ग्रन्थि स्थित है वह तो विद्यापदविशेष है ॥ १०२ ॥
पण्णत्तरि य सहस्सा ओगाहिथै सा दु होदि बोद्धव्वो ।
दीवम्हि समुद्दम्हि य मज्झे जो जत्थ पुच्छेज्जो ॥ १०३
अर्थ: वह ग्रन्थि एक हजार पचत्तर योजन अवगाहन करके द्वीप व समुद्रमें जानना चाहिये । मध्यमें जो जहां हो पूछना [ पूछकर जानना ] चाहिये (?) ॥ १०३ ॥
जे कम्मभूमिजादा मच्छा मणुया य पावसंजुत्ता ।
ते कालगदा संता उव्वेंति णिरएसु घोरेसु ॥ १०४
अर्थ: जो मनुष्य व मत्स्य ( तिर्यंच ) कर्मभूमिजात हैं वे पापसे संयुक्त होते हुए मृत्युको प्राप्त होकर भयानक नरकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १०४ ॥
पावेण अहोलोयं पुण्णेण पुणो वि उड्ढलोगं तु ।
गच्छंति णरा तिरिया विरिक्खलेत्तेसु संभूयो ॥ १०५
अर्थ: तिर्यग्लोक ( मध्यलोक ) में उत्पन्न हुए मनुष्य व तिर्यंच पापके वश होकर अधोलोकमें तथा पुण्यके वश होकर ऊर्ध्व लोकमें जाते हैं ॥ १०५ ॥
हेट्ठा मज्झे उवरिं वेत्तासणझल्लरीमुदिंगणिभो ।
मज्झिमवित्थारेण दु चोद्दसगुणमायदो लोगो ॥ १०६
अर्थ: यह लोक नीचे, मध्यमें और ऊपर क्रमसे वेत्रासन, झल्लरी व मृदंगके सदृश है । यह मध्यम लोकके विस्तार ( १ राजु ) की अपेक्षा चौदहगुणा आयत ( ऊंचा ) है ॥ १०६ ॥
लोयस्स दु विक्खंभो चदुप्ययारेण होदि बोद्धव्वो ।
सत्तेक्कगओ य पंचिक्कगओ य रज्जू मुणेयव्वो ॥ १०७
अर्थ: लोकका विस्तार [ अधोलोकके अन्तमें, मध्यलोकमें, ब्रह्म स्वर्गके अन्तमें तथा ऊर्ध्वलोकके अन्तमें क्रमसे ] सात, एक, पांच और एक राजु; इस तरह चार प्रकारका जानना चाहिये ॥ १०७ ॥
मुहतलसमासअद्धं उच्छेहगुणं गुणं च वेधेणं ।
घणगणिदं जाणेज्जो वेत्तासणसंठिदे खेत्ते ॥ १०८
अर्थ: मुख और तल ( भूमि ) को जोड़कर व उसे आधा करके फिर ऊंचाईसे तथा मुटाईसे गुणित करनेपर वेत्रासन सदृश क्षेत्र अर्थात् अधोलोकका घनफल प्राप्त होता है, ऐसा जानना चाहिये [ जैसे- मुख १ राजु, भूमि ७ राजु, ऊंचाई ७ राजु, मुटाई ७ राजु; ( १ + ७ / २ ) x ७ x ७ = १९६ राजु ] ॥ १०८ ॥
भणिदो य अधोलोगो छण्णउदि संदेण होदि रज्जूणि ।
णिप्पण्ण उड्ढलोगो संदेण खलु सत्तदालेणं ॥ १०९
अर्थ: अधोलोकका घनफल एक सौ छचानवै राजु तथा ऊर्ध्वलोकका एक सौ सैंतालीस [ ( १ + ५ / २ ) x ७ x ७ = १४७ ] राजु प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १०९ ॥
मूलं मज्झेण गुणं मुहसहिदद्धं तु तुंगकदिगुणिदं । घणगणिदं जाणिज्जो मुदिंगसंठाणखेत्तम्हि ॥ ११०
अर्थ: हो उसमें मुखप्रमाणको मिलाकर और फिर उसे आधा करके ऊंचाईके वर्गसे गुणित करनेपर प्राप्त राशि मृदंगाकार क्षेत्र (मध्यलोक) में घनफलका प्रमाण जानना चाहिये (?) ॥ ११० ॥
तिरियालोयायारप्पमाणं हेट्ठा दु सत्तपुढवी णं । आयासंतंरिदाओ वित्थिण्णयरा य हेद्विट्ठा ॥ १११
धम्मा वंसा मेघा अजणरिद्वा य होदि अणिउज्झा । छठी मघवी पुढवी सत्तमिया माघवी णाम ॥ ११२
अर्थ (गाथा 111 से 112): तिर्यग्लोकके नीचे घर्मा, वंशा, मेघा, अंजना और अरिष्टा ये यादृच्छिक नामवाली तथा छठी मघवी और सातवीं माधवी नामक, ये उत्तरोत्तर अधिक अधिक विस्तीर्ण सात पृथिवियां आकाशसे अन्तरित होती हुईं नीचे नीचे स्थित हैं ॥१११-११२॥
रयणसक्करवालुयपंकप्पभ धूम पंचमी पुढवी । छठी तमप्पभा वि य सत्तमिया तमतमा णाम ॥ ११३
अर्थ: रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, पांचवीं धूमप्रभा, छठी तमःप्रभा और सातवीं तमस्तमःप्रभा, ये उक्त पृथिवियोंके नामान्तर हैं ॥११३॥
एयं च सयसहस्सा होदि असीदिं च जोयणसहस्सा । रयणप्पभाबहुलयं भागेसु वि तीसु पविभत्तं ॥११४
अर्थ: तीनों ही भागोंमें विभक्त रत्नप्रभाका बाहल्य एक लाख अस्सी हजार योजन प्रमाण है ॥ ११४ ॥
खरभागपंकबहुला अप्पबहुलो य होइ णायव्वा । एदे तिण्णि विभागा रयणप्पभणामपुढवीए ॥ ११५
अर्थ: खरभाग, पंकबहुलभाग और अब्बहुलभाग, ये तीन रत्नप्रभा नामक पृथिवीके विभाग जानना चाहिये ॥ ११५ ॥
सोलस दु खरे भागे पंकबहुले तहा य चुलसीदिं । अप्पबहुले असीदी बोद्धव्वा जोयणसहस्सा ॥ ११६
अर्थ: इनमेंसे खरभागका सोलह हजार, पंकबहुलभागका चौरासी हजार और अब्बहुलभागका अस्सी हजार योजन प्रमाण बाहल्य जानना चाहिये ॥ ११६ ॥ चित्रा, वज्रा, वैडूर्या, लोहितांका,
चित्ते वइरे वेरुलि लोहियअंके मसारगल्ले य ।
गोमज्जए पवाले य तह जोइरसेत्ति य ॥ ११७
णवमे अंजणे वुत्ते दसमे अंजणमूलये ।
अंके एक्कारसे वुत्ते फलिहंके बारसेत्ति य ॥ ११८
चंदणे वच्चगे चावि बहुले पण्णारसेत्ति य ।
सिलामए वि अक्खाए सोलसे पुढवी तले ॥ ११९
सोलस चेव सहस्सा रयणाई होंति चेव बोद्धव्वा ।
तलउवरिमम्मि भागे जेण दु रयणप्पभा णाम ॥ १२०
अर्थ (गाथा 117 से 120): मसारगल्ला, गोमेदका, प्रवाला, ज्योतिरसा, नवमी अंजना, दशमी अंजनमूलका, ग्यारहवीं अंका, बारहवीं स्फटिका, चन्दना, वर्चका ( सर्वार्थका ), पन्द्रहवीं बहुला ( बकुला ) और शिलामय, इस प्रकार तलभागमें सोलह हजार योजनकी मुटाईमें ये सोलह पृथिवियां हैं। चूंकि इसके तल व उपरिम भागमें रत्नादि हैं, इसीलिये इसका नाम रत्नप्रभा जानना चाहिये ॥ ११७-१२०॥
अवसेसा पुढवीओ बोद्धव्वा होंति पंकबहुलाओ ।
बहुलियेहिं य तेसिं छण्हं पि इमं कमं जाणे ॥ १२१
अर्थ: शेष छह पृथिवियां पंकबहुल जानना चाहिये । उन छहों पृथिवियोंके बाहल्यका क्रम यह है ॥ १२१॥
बत्तीस च सहस्सा अट्टावीसा तहेव चउवीसा ।
वीसा सोलस अट्ठ य ओसरणकमेण बहुलियं ॥ १२२
अर्थ: बत्तीस हजार, अट्ठाईस हजार, चौबीस हजार, बीस हजार, सोलह हजार और आठ हजार, इस प्रकार यह नीचे नीचे क्रमसे उक्त पृथिवियोंका बाहल्य जानना चाहिये ॥ १२२ ॥
पंकबहुलम्मि भागे बोद्धव्वा रक्खसाणमावासा ।
असुराण य चेव तह अवसेसाणं खरे भागे ॥ १२३
अर्थ: पंकबहुलभागमें राक्षसों और असुरकुमारोंके आवास तथा खरभागमें शेष व्यन्तर व भवनवासी देवोंके आवास जानना चाहिये ॥ १२३ ॥
असुरा णागसुवण्णा दीवोदधिथिणिअविज्जुदिसणामो ।
अग्गीवादकुमारा दसधा भणिदा भवणवासी ॥ १२४
अर्थ: असुरकुमार नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार, उदधिकुमार, स्तनितकुमार विद्युत्कुमार, दिक्कुमार, अग्निकुमार और वातकुमार, ये दश प्रकारके भवनवासी कहे गये हैं ॥ १२४॥
चउसट्ठि चुलसीदी बावत्तरि चेव सदसहस्साणि ।
छावत्तरि च छण्हं वादिदाणं च छण्णउदिं ॥ १२५
अर्थ: चौंसठ लाख ( ३४०००००+३०००००० ) चौरासी लाख ( ४४०००००+४०००००० ), बहत्तर लाख ( ३८०००००+३४००००० ), छहके छहत्तर लाख ( ४००००००+३६००००० ), और वायुकुमारोंके छ्यानबै लाख ( ५००००००+४६००००० ), यह उन दश प्रकारके भवनवासियोंके भवनोंका प्रमाण है ॥१२५॥ चमर व वैरोचनादि सब इन्द्रोंके क्रमशः चौंतीस लाख
चोत्तीस तीस चोदाल ताले अडतीसमेव चोत्तीसा ।
तालं छत्तीसं पि य छण्णं पण्णासमेव छादाला ॥ १२६
सव्वेसिं एदाणं पत्तेयं जिणघरे णमंसामि ।
सत्तेवे य कोडीओ बावत्तरिलक्खअब्भधिया ॥ १२७
अर्थ (गाथा 126 से 127): व तीस लाख, चवालीस लाख व चालीस लाख, अड़तीस लाख व चौंतीस लाख, छहके चालीस लाख व छत्तीस लाख, तथा पचास लाख व छयालीस लाख भवन हैं । इन सब भवनोंमेंसे प्रत्येक भवनमें जिनगृह हैं । उन जिनगृहोंको मैं नमस्कार करता हूँ । उनका समस्त प्रमाण सात करोड़ बहत्तर लाख ( ७७२००००० ) है ॥ १२६-१२७॥
सव्वे वि वेदिसहिया सव्वे वरतोरणेहि कयसोहा ।
सव्वे अणाइणिहणे सव्वे मणिरयणसंछण्णा ॥ १२८
धुव्वंतधयवडोया मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा ।
कालागरुगंधुड्ढा बहुकुसुमकयच्चणसणाहा ॥ १२९
णाइगिगणसंछण्णा संगीयमुदिंगसद्दगंभीरा ।
बज्जिंदणीलमरगयणाणामणिरयणपरिणामा ॥ १३०
अर्थ (गाथा 128 से 130): सब ही जिनप्रासाद वेदियोंसे सहित, सब उत्तम तोरणोंसे शोभायमान, सब अनादि-निधन, सब मणियों एवं रत्नोंसे व्याप्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, कालागरुकी गन्धसे व्याप्त, बहुत कुसुमोंके द्वारा की गई पूजासे सनाथ, नर्तकियोंके समूहसे व्याप्त, संगीत एवं मृदंगके शब्दसे गंभीर; तथा वज्र, इन्द्रनील व मरकत रूप नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम स्वरूप हैं ॥ १२८-१३०॥
सत्ताणीयाणि तहा तिण्णि य परिखाहि सादरक्खाहि ।
सामाणियाहि जुत्ता णागकुमारा समुद्दिट्ठा ॥ १३१
अर्थ: नागकुमार देव सात अनीक, तीन प्रकारके परिषद, आत्मरक्ष और सामानिक देवोंसे युक्त कहे गये हैं ॥ १३१ ॥
बहुअच्छरेहिं जुत्ता सव्वाहरणेहि मंडियसरीरा ।
पुण्णेण समुप्पण्णा देवा भवणेसु णायव्वा ॥ १३२
अर्थ: बहुतसी अप्सराओंसे संयुक्त व समस्त आभरणोंसे अलंकृत शरीरवाले वे देव पुण्यके प्रभावसे उक्त भवनोंमें उत्पन्न होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३२ ॥
कडिसुत्तकडयकंठावरहारविभूसिया मणभिरामा ।
पजलंतमहामउडा मणिकुंडलमंडिया गंडा ॥ १३३
सुकुमारपाणिपादा णीलुप्पलसुरहिगंधणीसासा ।
लायण्णरूवकलिया संपुण्णमियंकवरवयणा ॥ १३४
सिंहासणमज्झगया सियचामरविज्जमाण बहुमाणा ।
सेदादवत्तचिण्हा भवणिंदा सुरवरा णेया ॥ १३५
अर्थ (गाथा 133 से 135): उपर्युक्त भवनवासी देवेन्द्र कटिसूत्र, कटक, कंठा व उत्तम हारसे विभूषित; मनको अभिराम, चमकते हुए महा मुकुटसे संयुक्त, मणिमय कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंवाले, सुकुमार हाथ-पैरोंसे युक्त, नीलोत्पलके समान सुगन्धित निश्वाससे सहित, लावण्यमय रूपसे संयुक्त, पूर्ण चन्द्रके सदृश मुखवाले, सिंहासनके मध्यमें स्थित, धवल चामरोंसे वीज्यमान, बहुत सम्मानित, तथा श्वेत छत्र रूप चिह्नसे संयुक्त हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ १३३-१३५ ॥ अधोलोकमें भूतोंके चौदह
चउदस चेव सहस्सा भूदाणं होंति अधियलोयम्हिं ।
सोलस चेव सहस्सा रक्खसदेवाण विण्णेया ॥ १३६
अर्थ: हजार और राक्षस देवोंके सोलह हजार [भवन] जानना चाहिये ॥ १३६ ॥
पढमादियउक्कस्सं बिदियादिय साधिकं हवे जहण्णं तु ।
धम्मायें भवणविंतर वाससहस्सा दस जहण्णा ॥ १३७
अर्थ: प्रथमादि पृथिवियोंमें जो उत्कृष्ट आयुका प्रमाण है वही साधिक (एक समय अधिक) द्वितीय आदि पृथिवियोंकी जघन्य आयुका प्रमाण होता है। धर्मा पृथिवीमें तथा भवनवासी और व्यन्तर देवोंकी जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण होती है ॥१३७॥
असुरेसु सागरेवम तिपल्लं पत्तं च णागभोमाणं ।
अड्ढादिज्जं सुवण्णा दु दीव सेसाँ दिवड्ढं च ॥ १३८
अर्थ: उत्कृष्ट आयु असुरकुमारोंकी एक सागरोपम, नागकुमारोंकी तीन पल्योपम, व्यन्तरोंकी एक पल्योपम, सुपर्णकुमारोंकी अढ़ाई पल्योपम, द्वीपकुमारोंकी दो पल्योपम और शेष भवनवासियोंकी उत्कृष्ट आयु डेढ़ पल्योपम प्रमाण है ॥१३८॥
पणुवीसं असुराणं सेसकुमाराण दसधणू चेव ।
विंतरजोइसियाणं दस सत्त धणू मुणेयव्वा ॥ १३९
अर्थ: असुरकुमारोंका शरीरोत्सेध पच्चीस धनुष और शेष कुमारोंका दश धनुष प्रमाण है। व्यन्तर व ज्योतिषी देवोंके शरीरकी उंचाई क्रमशः दश और सात धनुष प्रमाण जानना चाहिये ॥ १३९ ॥
पणुवीस जोयणाणं ओही विंतरकुमारवग्गाणं ।
संखेज्जजोयणाणि दु जोइसियाणं जहण्णोही ॥ १४०
अर्थ: व्यन्तर और कुमार देवोंके अवधिज्ञानका जघन्य क्षेत्र पच्चीस योजन तथा ज्योतिषियोंके जघन्य अवधिका क्षेत्र संख्यात योजन प्रमाण है ॥ १४० ॥
असुराणमसंखेज्जा कोडीओ सेसजोइसगणाणं ।
संखातीदसहस्सा उक्कस्सो ओधिविसओ दु ॥ १४१
अर्थ: असुरकुमारोंके उत्कृष्ट अवधिका क्षेत्र असंख्यात करोड़ योजन और शेष भवनवासी तथा ज्योतिषियोंके उत्कृष्ट अवधिका क्षेत्र असंख्यात हजार योजन प्रमाण है ॥ १४१ ॥
अप्पबहुलम्हि भागे पढमाए बिदीएँ होंति णिरया दु ।
वज्जित्ताण सहस्सं उवरिमतल्हेद्धिमंतल्यादो ॥ १४२
अर्थ: अब्बहुकभागमें प्रथम पृथिवीके उपरिम व अधस्तन तल भागमें एक एक हजार योजन छोड़कर नरक स्थित हैं ॥ १४२ ॥
तीसं च सयसहस्सा पणुवीसा तह य होइ पण्णरसा ।
दस तिण्णि सदसहस्सा एगं पंचूणयं पंच ॥ १४३
एसा दु णिरयसंखा रयणादीया कमेण पविभत्ता ।
संवग्गेणँ दु णिरया चदुरासीदिं च सदसहस्सा ॥ १४४
अर्थ (गाथा 143 से 144): तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दश लाख, तीन लाख, पांच कम एक लाख और केवल पांच, यह रत्नप्रभादिक पृथिवियोंमें क्रमसे नरकसंख्या कही गई है। इसको मिलानेपर समस्त बिलोंका प्रमाण चौरासी लाख होता है ॥ १४३-१४४॥
णेया तेरेक्कारस णव सत्त य पंच तिण्णि एक्कं च । रयणादितमतमंतो पुढवीणं पत्थडा भणिदा ॥ १४५
अर्थ: रत्नप्रभासे लेकर तमस्तमा पृथिवी तक क्रमशः तेरह, ग्यारह, नौ, सात, पांच, तीन और एक; इस प्रकार पाथड़े कहे गये हैं ॥ १४५ ॥
सीमंतगो दु पढमो णिरओ पुण रोरुगो त्ति बोद्धव्वो । भंतो भवदि चउत्थो उब्भंतो पंचमो णिरओ ॥ १४६
संभंतमसंभंतो विभ्भंतो चेव अट्ठमो णिरओ । तत्तो णवमो णिरओ दसमो तसिदो त्ति बोद्धव्वो ॥ १४७
चक्कंतमचक्कंतो विक्कंतो चेव तेरसो णिरओ । पढमाए पुढवीए तेरस णिरइंदया भणिया ॥ १४८
अर्थ (गाथा 146 से 148): प्रथम सीमन्तक, निरय ( नरक ), रोरुक, चतुर्थ भ्रान्त, पंचम उद्भ्रान्त, संभ्रान्त, असं भ्रान्त, आठवां विभ्रान्त, नौवां तप्त, दशवां त्रसित, चक्रान्त ( वक्रान्त ), अचक्रान्त ( अवक्रान्त ) और तेरहवां विक्रान्त, ये तेरह इन्द्रक बिल प्रथम पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १४६-१४८ ॥
थडगे थणगे चेव य मणगे वणगे तहेव बोद्धव्वा । घाडे तह संघाडे जिब्भे पुण जिब्भिंगे चेव ॥ १४९
लोले च लोलगे खलु तहेव थणलोलुवे य बोद्धव्वा । बिदियाए पुढवीए एयारस इंदया भणिया ॥ १५०
अर्थ (गाथा 149 से 150): थडग, स्तनक, मनक, वनक, घाट, संघात, जिह्व, जिह्विक, लोल, लोलक और स्तनलोलुक, ये ग्यारह इन्द्रक द्वितीय पृथिवीमें कहे गये जानना चाहिये ॥ १४९-१५० ॥
तत्तो तसिदो तवणो तावणो होइ पंचम णिदाहो । छट्ठो पुण पज्जलिदो उज्जलिदो सत्तमो णिरओ ॥ १५१
संजलिदो अट्ठमओ संपज्जलिदो य होदि णवमो दु । तदियाए पुढवीए णव खलु णिरइंदया भणिया ॥ १५२
अर्थ (गाथा 151 से 152): तप्त, त्रसित ( शीत ), तपन, तापन, पांचवां निदाघ, छठा प्रज्वलित, सातवां उज्ज्वलित, आठवां संज्वलित और नौवां संप्रज्वलित, ये नौ इन्द्रक बिल तृतीय पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५१-१५२ ॥
आरे मारे तारे तत्ते तमगे य होदि बोद्धव्वा । खाडे य खड्डखडे खलु इंदयणिरया चउत्थीए ॥ १५३
अर्थ: आर, मार, तार, तप्त, तमक, खाड और खडखड, ये सात इन्द्रक बिल चतुर्थ पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५३ ॥
तमे भमे झसे चेव अंधे तिमिसे य होदि बोद्धव्वा । पंचेंदयणिरया खलु पंचमखिदिए जहुद्दिष्टं ॥ १५४
अर्थ: तम, भ्रम, झष, अन्ध और तिमिस्र, ये पांच इन्द्रक बिल पांचवीं पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५४ ॥
हिमवहल्लल्लक्कं इंदयणिरया हवंति छट्ठाए । एक्को पुण सत्तमिए अवधिट्ठाणो त्ति बोद्धव्वा ॥ १५५
अर्थ: हिम, वर्द्दल और लल्लक, ये तीन इन्द्रक बिल छठी पृथिवीमें तथा केवल अवधिष्ठान नामक एक इन्द्रक बिल सातवीं पृथिवीमें जानना चाहिये ॥ १५५ ॥ जो दुराचारी जीव विषयोंमें आसक्त हैं,
विसयासत्ता जीवा कसावलेस्मुक्कडा य लोहिल्ला ।
दारुणमंसाहारा पडंति णरए दुरायारा ॥ १५६
अर्थ: तीव्र कषाय व दुर्लेश्यासे सहित हैं, लोभसे युक्त हैं, क्रोधी हैं, तथा मांसभोजी हैं वे नरकोंमें पड़ते हैं ॥१५६॥
पिसुणासया य चंडा मच्छरिया चोरकवडमायावी ।
णिंदणवधकरणरदा पडंति णिरए खडखडंतो ॥ १५७
अर्थ: जो जीव पिशुनाशय अर्थात् परनिन्दा रूप अभिप्रायसे सहित, क्रोधी, मात्सर्य भावसे संयुक्त, चोर, कपटी, मायाचारी तथा परनिन्दा व जीवहिंसा करनेमें तल्लीन हैं वे खडखड नरक ( चतुर्थ पृथिवीका अन्तिम इन्द्रक बिल ) पर्यन्त नरकमें पड़ते हैं ॥ १५७॥
जोयणसयप्पमाणा तत्तकवल्लिम्हि ते दु छुब्भंति ।
डज्झंति धगधगंता महिसोरडियं करेमाणा ॥ १५८
अर्थ: [ इन नरकोंमें परस्पर ] वे नारकी वहां सौ योजन प्रमाण संतप्त कड़ाहीमें डाले जाते हैं, जहां वे महिषके समान रुदन करते हुए धग्-धग् शब्दपूर्वक जलते हैं ॥१५८॥
हुम्मंति ओरसंता दढप्पहारेहि णरयपालेहिं ।
छिंदंति तडतडंता वज्जकुठारेहिं घेत्तूणं ॥ १५९
अर्थ: वे रुदन करते हुए नरकपालों अर्थात् अम्बावरीष जातिके असुरकुमारोंके द्वारा दृढ़ प्रहारोंसे मारे जाते हैं। वे उन्हें पकड़ कर वज्रके समान कठोर कुठारोंके द्वारा तड़-तड़ शब्दपूर्वक छेदते हैं ॥ १५९ ॥
भज्जंति कडकडेहि हड्डई चूरंति लउडपहारेहिं ।
बंधेविं अग्गिमज्झे छुहंति जमदूव रोसेहिं ॥ १६०
अर्थ: यमके दूतोंके समान वे क्रुद्ध होकर उन्हें कड़-कड़ शब्दोंके साथ भग्न करते हैं, डंडोंके प्रहारों द्वारा उनकी हड्डियोंको चूर-चूर करते हैं, तथा बांधकर अग्निके मध्यमें डालते हैं ॥ १६० ॥
रोवंति य विलवंति य पायपडंतम्मि णाहि मेल्लैंति ।
पीडंति चादुरोधो काऊण छुहंति चुल्लीसु ॥ १६१
अर्थ: इस अवस्थामें वे नरकी रोते व विलाप करते हैं। पैरोंमें गिरनेपर भी वे असुरसमूह उन्हें छोड़ते नहीं हैं, किन्तु पीड़ा देते हैं। चारों ओरसे अवरुद्ध करके वे उन्हें चूल्होंमें फेंकते हैं ॥ १६१ ॥
तत्तकवल्लिहिं छुड्ढा अण्णे खरफरुसवज्जसूलेहिं ।
अण्णे वइतरणीहि य खारणदीएहि छुब्भंति ॥ १६२
अर्थ: दूसरे कितने ही नारकी संतप्त कड़ाहीमें फेंके जाते हैं, तथा कितने ही अन्य नारकी तीक्ष्ण स्पर्शवाली वज्रशूलियोंपर व क्षारनदी वैतरणीमें फेंक दिये जाते हैं ॥ १६२ ॥ कितने ही पापी नारकी वसा, रुधिर एवं पीवके
वसरुहिरपूयमज्झे तडतडफुट्टंते सव्वसंधीसु । पीलिज्जंति अधण्णा जंतसहस्सेहि घेत्तूणं ॥ १६३
अर्थ: बीच समस्त सन्धियोंमें तड़-तड़ टूटते हुए ग्रहण करके हजारों यंत्रोंके द्वारा पेरे जाते हैं ॥ १६३ ॥
लंबंतचम्मपोट्टा अण्णे धावंति तुरियवेगेणं । पेच्छंते गिरिवरंदे तत्थ निलुक्कंति झाडेहिं ॥ १६४
अर्थ: जिनके पेटका चमड़ा लटक रहा है ऐसे अन्य नारकी बड़े वेगसे दौड़कर महान् पर्वतोंको देखते हैं और वहां झाड़ोंमें छिप जाते हैं ॥ १६४ ॥
दरिविवरेसु पइट्ठा तत्थ वि खज्जंति वग्घसिंघेहिं । सप्पेहि घोणसेहि य खज्जंति हु वज्जतुंडेहि ॥ १६५
अर्थ: कितने ही नारकी गुफाओंके भीतर प्रविष्ट होकर वहां भी बाघों और सिंहोंके द्वारा खाये हैं, तथा कितने ही वज्रके समान कठोर मुखवाले सर्पों व घोणसों ( विशेष जातिके सर्पों ) के द्वारा खाये जाते हैं ॥ १६५ ॥
कंदरविवरदरीसु वि सिलाण विच्चेसु तेसु पविसंति । तत्थ वि य धगधगंतो सहसा उट्ठाविओ अग्गी ॥ १६६
अर्थ: कितने ही नारकी उन कन्दराओं व गुफाओंके भीतर भी शिलाओंके मध्यमें प्रविष्ट होते हैं। वहांपर भी सहसा धग्-धग् करती हुई अग्नि प्रज्वलित हो उठती है ॥ १६६ ॥
सुमेरेदि पुव्वकम्मं गुलगुलु गज्जंति भीमसरहेण । कालसिला उप्पाडेंति उप्पयंता अधण्णाणं ॥ १६७
अर्थ: वे पूर्वकृत कर्मका स्मरण करते हैं और हाथीके समान भयंकर शब्दसे गुल-गुल गर्जना करते हुए कूदकर पापी नारकियोंके लिये कालशिलाओंको उखाड़ते हैं ॥ १६७ ॥
घादंता जीवाणं णिययं खायंति तह य मंसाणि । सासिज्जंति अधण्णाचाराणं णरयपालेहिं ॥ १६८
अर्थ: तथा जीवोंका घात करनेवाले उन दुराचारी नारकियोंको स्वकीय मांस खिलाकर अम्बावरीष जातिके असुरकुमारों द्वारा शिक्षित ( दण्डित ) किया जाता है ॥ १६८ ॥
संडासेहिं य जीहा उप्पाडिज्झंति तह रसंताणं । छिंदंति हत्थपादौ कण्णाहरणासियादीणि ॥ १६९
अर्थ: उक्त देवोंके द्वारा चिल्लाते हुए उन नारकियोंकी जीभें संसियोंसे उखाड़ी जाती हैं तथा हाथ, पैर, कान, अधरोष्ठ एवं नासिका आदि अंग-उपांग छेदे जाते हैं ॥ १६९ ॥
फाडेंति आरडंतो मोग्गरछुरियापहारघाएहिं । असिवत्तवणेहि तहा पावंति महंतदुक्खाणि ॥ १७०
अर्थ: रोते हुए वे नारकी जीव मुद्गर एवं छुरीके प्रहारों व अभिघातों द्वारा फाड़े जाते हैं तथा असिपत्रवनोंके द्वारा महान् दुःखोंको प्राप्त होते हैं । ॥ १७० ॥
हुववहजालापहदा डज्झंता वि पियं पलोयंता ।
पविसंति तत्थ सहसा असिपत्तवणं महाघोरं ॥ १७१
अर्थ: उक्त नारकी जीव आगकी ज्वालाओंसे आहत होकर जलते हुए भी प्रिय समझ कर सहसा वहां महा भयानक असिपत्रवनमें प्रविष्ट होते हैं ॥ १७१ ॥
छिंदंति य भिंदंति य ऊपरि पडंतेहिं पत्तखग्गेहिं ।
वरुंडिया व जंति वायवसा पडियपत्तेहिं ॥ १७२
अर्थ: वहांपर वे ऊपर गिरते हुए पत्तों रूपी खड्गोंके द्वारा छेदे-भेदे जाते हैं । वायुके वश ऊपर गिरे हुए पत्तोंसे वे रुंड (छिन्नसिर) के समान जाते हैं ॥ १७२ ॥
गलसंखलासु बद्धा संछुब्भंति य तत्तचुल्लीहिं ।
तत्तकवल्लीसु अण्णे पच्चंति य सिमिसिमंतेणं ॥ १७३
अर्थ: वे नारकी गलेकी सांकलोंमें बांधे जाकर गरम चूल्हेमें फेंके जाते हैं तथा दूसरे नारकी तपे हुए कड़ाहोंमें सिम-सिम शब्द पूर्वक पकाये जाते हैं ॥ १७३ ॥
अच्छोडेप्पिणु अण्णे संबलिरुक्खम्मि कंटयाइण्णे ।
कट्टिज्जंति रसंता मंसवसारुहिरविच्छड्ढो ॥ १७४
अर्थ: अन्य नारकी कण्टकोंसे व्याप्त सेमर वृक्षके ऊपर पटके जाकर रोते हुए मांस, वसा एवं रुधिरके विस्तारसे संयुक्त होकर काटे जाते हैं ॥ १७४ ॥
छिंदंति य करवत्ते बंधेप्पिणु संखलाहिं खंभेसु ।
कप्पिज्जंति रसंता करंगुलीयाओ चक्केहिं ॥ १७५
अर्थ: उक्त नारकी खम्भोंमें सांकलोंसे बांधे जाकर करपत्र ( आरी ) के द्वारा छेदे जाते हैं तथा रोते हुए उनके हाथोंकी अंगुलियां चक्रों द्वारा काटी जाती है ॥ १७५ ॥
एवं छिंदणभिंदणताडणदहद्दहणदंडभेओ य ।
पावंति वेयणाओ रयणाइतमतमं जोमं ॥ १७६
अर्थ: इस प्रकार रत्नप्रभासे लेकर तमस्तमा पृथिवी पर्यन्त वे नारकी जीव छेदना, भेदना, ताड़न करना, तपाना व आगमें जलाना आदि दण्डविशेषोंको प्राप्त होकर वेदनाओंको प्राप्त करते हैं ॥ १७६ ॥
सत्त वि फरुसाओ कक्कसघोराओ दुक्खबहुलाओ ।
णामं पि ताण घेत्तुं ण सक्कए केंहं पुणो वसिदुं ॥
अर्थ: उक्त सातों पृथिवियां कठोर स्पर्शसे संयुक्त, कर्कश, भयानक और प्रचुर दुःखोंसे व्याप्त हैं । उनका नाम लेना भी जब शक्य नहीं है तब भला उनमें रहना कैसे शक्य होगा ? ॥ १७७ ॥ उन रत्नप्रभादिक
एक्कं च तिण्णि सत्त य दस सत्तरसं तहेव बावीसा । तेतीसउदधिआऊ पुढवीणं होंति उक्कस्सं ॥ १७८
अर्थ: पृथिवियोंमें स्थित नारकियोंकी क्रमशः एक, तीन, सात, दश, सत्तरह, बाईस तथा तेतीस सागरोपम प्रमाण उत्कृष्ट आयु है ॥ १७८ ॥
जंबूदीवस्स तहा धादइखंडस्स पोक्खरद्धस्स । खेत्तेसु समुद्दिठ्ठा सत्तरिसदभेदभिण्णेसु ॥ १७९
जे उप्पण्णा तिरिया मणुया वा घोरपावसं जुत्ता । मरिऊण पुणो णेया णरयं गच्छंति ते जीवा ॥ १८०
अर्थ (गाथा 179 से 180): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड तथा पुष्करार्द्ध द्वीपके एक सौ सत्तर भेदोंसे भिन्न क्षेत्रों ( जम्बूद्वीपका १ भरत, १ ऐरावत व ३२ विदेह; धातकीखण्डके २ भरत, २ ऐरावत व ६४ विदेह; तथा पुष्करार्द्धके भी २ भरत, २ ऐरावत और ६४ विदेह ) में जो मनुष्य अथवा तिर्यंच उत्पन्न होते हैं वे जीव घोर पापसे संयुक्त होते हुए मरकर नरकमें जाते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १७९-१८० ॥
लवणे कालसमुद्दे सयंभुरमणोदहिम्मि जे मच्छा । पंचेदिया दु तिरिया सयंभुरमणस्स दीवस्स ॥ १८१
ते कालगदा संतो णरयं गच्छंति णिच्चिदघणकम्मा । सम्मत्तरयणरहिया मिच्छत्तकलंकिदो जीवा ॥ १८२
अर्थ (गाथा 181 से 182): लवणोद, कालोद और स्वयंभूरमण समुद्रमें जो मत्स्य हैं वे तथा स्वयंभूरमण द्वीपके जो पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव हैं वे दृढ़ कर्मोंसे व्याप्त होकर सम्यक्त्व-रत्नसे रहित और मिथ्यात्वसे कलंकित होते हुए मरकर नरकको जाते हैं ॥ १८१-१८२ ॥
पणवीसकोडिकोडीउद्धारपमाणविउलपल्लाणं । जावदिया खलु रोमा तावदिया होंति दीवउधी ॥ १८३
अर्थ: पच्चीस कोड़ाकोड़ि उद्धारपल्योंके जितने रोम होते हैं उतने द्वीप-समुद्र हैं ॥ १८३ ॥
बारसकोडाकोडी पण्णासं लक्खकोडि पल्लाणं । जेत्तियमेत्ता रोमा दीवा पुण तेत्तिया होंति ॥ १८४
उदधी वि होंति तेत्तिय णिद्दिठ्ठा सव्वभावदरिसीहि । बणवेदिएहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १८५
अर्थ (गाथा 184 से 185): बारह कोड़ाकोड़ि पचास लाख करोड़ ( साढ़े बारह कोड़ाकोड़ि ) उद्धारपल्योंके जितने रोम होते हैं उतने द्वीप होते हैं तथा उतने ही समुद्र होते हैं, ऐसा सर्वभावदर्शियों ( सर्वज्ञों ) द्वारा निर्दिष्ट किया गया है । ये दिव्य द्वीप-समुद्र वन-वेदियोंसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित हैं ॥ १८४-१८५ ॥
जंबूधादइपोक्खरसयंभुरमणाभिधाण जे दीवा । ते वज्जित्ता चदुगे अवसेसअसंखदीवेसु ॥ १८६
जे उप्पण्णा तिरिया पंचिंदिय सण्णिणो य पज्जत्ता । पल्लाउगा महप्पा बेदंडसहस्सउत्तंगा ॥ १८७
अर्थ (गाथा 186 से 187): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड, पुष्करार्द्ध और स्वयंभूरमण नामक जो चार द्वीप हैं उनको छोड़कर शेष असंख्यात द्वीपोंमें उत्पन्न हुए जो पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्त तिर्यंच जीव पल्य प्रमाण आयुसे युक्त, महात्मा, दो हजार धनुष ऊंचे, सुकुमार कोमल
सुकुमारकोमलंगो मंदकसाया फलासिणो जीवा । जुवलाजुवलुव्वण्णा चउत्थभत्तेण पारिंति ॥ १८८
ते सव्वे मरिऊणं णियमा गच्छंति तह य सुरलोयं । ण य अण्णत्थुप्पत्ती णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ १८९
अर्थ (गाथा 186 से 189): अंगोंवाले, मंदकषायी, फलभोजी एवं युगल-युगल रूपसे उत्पन्न होकर चतुर्थ भक्तसे भोजन करते हैं; वे सब मरकर नियमसे सुरलोकको जाते हैं । उनकी उत्पत्ति सर्वदर्शियों द्वारा अन्यत्र नहीं निर्दिष्ट की गई है ॥१८६-१८९॥
जंबूधादगिपोक्खरदीवाणं तीसु भोगभूमीसु । जे जादा णरतिरिया णियमा ते जंति सुरलोयं ॥ १९०
भवणवइवाणविंतरजोइसभवणेसु ताण उप्पत्ती । सम्मत्तेण य जुत्ता सोधम्मादीसु जायंति ॥ १९१
अर्थ (गाथा 190 से 191): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड और पुष्कर द्वीपोंकी तीन ( उत्तम, मध्यम व जघन्य ) या तीस भोगभूमियोंमें जो मनुष्य व तिर्यंच उत्पन्न होते हैं वे नियमसे सुरलोकको जाते हैं । [ इनमें जो सम्यक्त्वसे रहित होते हैं ] उनकी उत्पत्ति भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके भवनोंमें है । किन्तु जो सम्यक्त्वसे युक्त हैं वे सौधर्मादिकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १९०-१९१ ॥
जे सेसा णरतिरिया धम्मं काऊण सुद्धभावेण । ते कालगदा संता विमाणवासेसु जायंति ॥ १९२
अर्थ: शेष जो मनुष्य व तिर्यंच शुद्ध भावसे धर्मको करके मरणको प्राप्त होते हैं वे विमानवासी देवोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १९२ ॥
णवणउदिजोयणाईं उड्ढं गंतूण तह सहस्साईं । तो चूलियाए उवरिं होइ विमाणं उडुविमाणं ॥ १९३
अर्थ: निन्यानबे हजार योजन ऊपर जाकर मेरुकी चूलिकाके ऊपर ऋतु विमान स्थित है ॥ १९३ ॥
मणिरयणभित्तिचित्तं कंचणवरवइरसोहियपदेसं । माणुसखेत्तपमाणं होइ विमाणं उडुविमाणं ॥ १९४
अर्थ: मणिमय एवं रत्नमय भित्तियोंसे विचित्र और सुवर्ण व उत्तम वज्रसे शोभित प्रदेशवाला वह ऋतु-विमान मानुषक्षेत्रके प्रमाण अर्थात् पैंतालीस लाख योजन विस्तृत है ॥ १९४ ॥
एक्कं तु उडुविमाणं माणुसखेत्तेण होदि सममाणं । अवसेसा दु विमाणा लोगादो जाव लोगंतं ॥ १९५
अर्थ: एक ऋतु विमान तो मानुषक्षेत्रके बराबर है, शेष विमान लोकसे लोकके अन्त तक हैं ॥ १९५ ॥
तं सुविणिम्मलंकोमलतोरणवरमंगलुस्सविदसोहं । पासादवलभिविरहियें उब्भासंतं दसदिसाओ ॥ १९६
णिच्चं मणोभिरामं फुरंतमणिकिरणसोहसंभारं । कंचणरयणमहामणिल्लहसंतपासादसंधायं ॥ १९७
अर्थ (गाथा 196 से 197): वह विमान पवित्र, निर्मल, कोमल व श्रेष्ठ तोरणरूप मंगलोत्सवसे शोभायमान; प्रासाद व वलभियोंसे विरचित, दशों दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला, नित्य मनोहर, प्रकाशमान मणिकिरणोंकी शोभाके संभारसे संयुक्त; सुवर्ण, रत्नों व महामणियोंसे चमकते हुए प्रासादसमूहसे सहित;
जयविजयवेजयंतीपडायबहुकुसुमसोहकयमालं । बिलसंतणाभिदामं चोक्खं सुचियं पवित्तं च ॥ १९८
जगजगजगंतसोहं अब्भुब्भूदरूवसारसंठाणं । पुप्फोवयारपउरं बहुकोदुयमंगलसणाहं ॥ १९९
जंबूणयरयणमयं णिच्चुज्जलचोक्खरयणसोहंतं । किं जंपिएण बहुणा पुण्णफलं चेव पच्चक्खं ॥ २००
अर्थ (गाथा 196 से 200): जयन्ती, विजयन्ती व वैजयन्ती पताकाओं तथा बहुतसे फूलोंकी मालाओंसे शोभायमान; नाभिमें मालासे सुशोभित, चोखा, शुचि एवं पवित्र, अतिशय चमकते हुए सौधोंसे सहित, अत्यन्त अद्भुत श्रेष्ठ रूप व आकृतिसे संयुक्त, प्रचुर पुष्पोंके उपहारसे युक्त, बहुत कौतुक व मंगलोंसे सनाथ, सुवर्ण व रत्नोंसे निर्मित, और नित्य उज्ज्वल चोखे रत्नोंसे शोभायमान है । बहुत कहनेसे क्या ? यह प्रत्यक्ष पुण्यका ही फल है ॥ १९६-२०० ॥
जं तत्थ देवदेवीण वरसुहं जं च रूवलायण्णं । को वण्णेज्ज मणुस्सो अवि वाससहस्सकोडीहिं ॥ २०१
अर्थ: वहां देव-देवियोंको जो उत्तम सुख और रूप-लावण्य प्राप्त है उसका वर्णन कौनसा मनुष्य हजारों करोड़ वर्षोंमें भी कर सकता है ? ॥ २०१ ॥
तत्तो दु असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । विमलं णाम विमानं जत्थावासा सपुण्णाणं ॥ २०२
अर्थ: ऋतु विमानसे असंख्यात सौ करोड़ योजन अतिक्रमण करके विमल नामक विमान है जहां पुण्यात्मा जीवोंका निवास है ॥ २०२ ॥
तत्तो दु पुणो गंतूं जोयणकोडीसदा असंखेज्जा । चंदं णाम विमानं अत्थि सुरुवं मणभिरमं ॥ २०३
अर्थ: फिर उससे असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर सुन्दर आकृतिसे युक्त मनोहर चन्द्र नामक विमान स्थित है ॥ २०३ ॥
तत्तो दु असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । वग्गूणामविमाणं पमुदिदपक्कीलिदं रम्मं ॥ २०४
अर्थ: उससे असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर वल्गु नामक विमान है जो प्रमोदप्राप्त देवोंकी क्रीड़ाका रमणीय स्थल है ॥ २०४ ॥
तत्तो वि असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । वीरं णाम विमानं पंचमपडलो समुद्दिष्ट्ठो ॥ २०५
अर्थ: उससे भी असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर वीर नामक विमान है । यह पांचवां पटल कहा गया है ॥ २०५ ॥
पत्तेयं पत्तेयं जोयणकोडीसदा असंखेज्जा । सव्वाण विमाणाणं पडलं पडलं तदो होइ ॥ २०६
अर्थ: इसके आगे प्रत्येक प्रत्येक असंख्यात सौ करोड़ योजनके अन्तरसे सब विमानोंके पटल हैं ॥ २०६ ॥ फिर इससे आगे
तत्तो य पुणो अरुण णंदण णलिणं च कंचणं रुहिरं ।
चंदावणं च भणियं तहेव पुण रिद्धिसं होई ॥ २०७
अर्थ: अरुण, नन्दन, नलिन, कांचन, रोहित, चंचत्, अरुण ( मरुत् ), तथा ऋद्धीश विमान कहे गये हैं ॥ २०७ ॥
तत्तो य पुणो गंतूं जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं ।
वेरुलिय त्ति विमाणं पभंकरं चेव रमणीयं ॥ २०८
रुधिरं अंकं फलिहं तवणिज्जं चेव उत्तमसिरीयं ।
मेघं तह वीसदिमं मणिकंचणभूसियपदेसं ॥ २०९
अर्थ (गाथा 208 से 209): पुनः उससे सैकड़ों करोड़ योजन जाकर वैडूर्य विमान और रमणीय प्रभंकर ( रुचक ) विमान है। उससे आगे रुधिर ( रुचिर ), अंक, स्फटिक, तपनीय तथा बीसवां उत्तम श्रीसे युक्त और मणि एवं सुवर्णसे भूषित प्रदेशवाला मेघ विमान है ॥ २०८-२०९ ॥
अब्भं तह हारिद्दं पउमं तह लोहियंक वइरं च ।
णंदावत्तविमाणं पभंकरं चेव रमणिज्जं ॥ २१०
अवरं च पिट्ठणामं तह गयं होइ मत्तणामं च ।
एदे तीस विमाणा एगत्तीसं पभं णाम ॥ २११
एदे एक्कत्तीसं हवंति पडला सुहम्मकप्पस्स ।
सेढिविमाऐहि गदा लोगादो जावं लोगंतं ॥ २१२
अर्थ (गाथा 210 से 212): इसके आगे अभ्र, हारिद्र, पद्म, लोहित, अंक, वज्र, नंदावर्त, रमणीय प्रभंकर, पृष्ट नामक, गज और मत्त ( मित्र ) नामक, ये तीस विमान तथा इकतीसवां प्रभ नामक; इस प्रकार ये इकतीस पटल सौधर्म कल्पके हैं जो श्रेणिबद्ध विमानोंके साथ लोकसे लोक पर्यन्त स्थित हैं ॥ २१०-२१२ ॥
एकतीसदिमं पडलं जंबूणदरयणअंकवइरमयं ।
तमूले सोहम्मं जत्थ सुरिंदो सयं वसइ ॥ २१३
समचउरंसा दिव्वा जोयणमेगं च समधियं जत्थ ।
णामेण सा सुधम्मा सोधम्मं जीएं णामेण ॥ २१४
अर्थ (गाथा 213 से 214): इकतीसवां पटल सुवर्ण, रत्न, अंक व वज्रमय है। उसके मूलमें सौधर्म कल्प है जहां स्वयं सुरेन्द्र रहता है, तथा जहां समचतुष्कोण दिव्य एक योजनसे कुछ अधिक विस्तृत सुधर्मा नामकी सभा है, जिसके नामसे उस कल्पका भी सौधर्म नाम प्रसिद्ध है ॥ २१३-२१४ ॥
तत्थ दु विक्खंभेमज्झे हवंति णयराणिमाणिं चत्तारि ।
कंचणमसोगमंदिरमसारगल्लं च सोहम्मे ॥ २१५
अर्थ: वहां सौधर्म कल्पमें विष्कम्भके मध्यमें कांचन, अशोक, मंदिर और मसारगल्ल, ये चार नगर हैं ॥ २१५ ॥
तो तत्थ लोगपाला चदुसु वि य दिसासु होंति चत्तारि ।
जमवरुणसोममादी एदेसु हवंति णगरेसुं ॥ २१६
अर्थ: वहां चारों दिशाओंमें स्थित इन नगरोंमें यम, वरुण और सोमादि ( सोम और कुबेर ) ये चार लोकपाल रहते हैं ॥ २१६ ॥
वेमाणिया य एदे जमवरुणकुबेरसोममादीयो ।
पडिइंदा इंदस्स दु उत्तमभोगा महिइड्डीया ॥ २१७
अर्थ: उत्तम भोग एवं महर्द्धिसे संयुक्त ये यम, वरुण, कुबेर और सोमादि वैमानिक देव इन्द्रके प्रतीन्द्र होते हैं ॥ २१७ ॥
एक्कत्तीसं पडलाई बत्तीसं चेव सयसहस्साईं । ताईं तु विमाणाई हवंति सोहम्मकप्पस्स ॥ २१८
अर्थ: इकतीस पटल और वे बत्तीस लाख विमान सौधर्म कल्पके हैं ॥ २१८ ॥
मज्झिमयम्मि विमाणे मसारगल्लम्मि मणहरालोए । मज्झम्मिं रयणचित्ता सोहम्मसहा विमाणं च ॥ २१९
बत्तीससयसहस्साण सामिओ दिव्ववरविमाणाणं । तेलोककपायडमडो जत्थ सुरिंदो सयं वसइ ॥ २२०
अर्थ (गाथा 219 से 220): मनोहर आलोकवाले मध्यम मसारगल्ल विमानमें रत्नोंसे चित्रित सौधर्मसभा व विमान है, जिसमें बत्तीस लाख उत्तम दिव्य विमानोंका स्वामी व तीन लोकोंका प्रगट सुभट स्वयं सौधर्म सुरेन्द्र निवास करता है ॥ २१९-२२० ॥
सो भुंजइ सोहम्मं सयलं समंतेणं तिहुयणेण समं । बहुविहपावविहम्मो सद्धम्मो सोहणो जस्स ॥ २२१
अर्थ: वह सौधर्म इन्द्र, जिसके कि पासमें बहुत प्रकारके पापोंका विघातक शोभायमान उत्तम धर्म विद्यमान है, समस्त सौधर्म कल्पको त्रिभुवनके समान सब ओरसे पालता है ॥ २२१ ॥
णिरुवहदजठरकोमलअदिसयवररूवसत्तिसंपण्णो । तरुणाइच्चसमाणो समचउरंसेण ठाणेण ॥ २२२
अर्थ: उक्त इन्द्र अपघात रहित उदरसे संयुक्त, अत्यन्त सुन्दर रूप व शक्तिसे सम्पन्न, तरुण सूर्यके समान तेजस्वी और समचतुरस्रसंस्थानसे युक्त है ॥ २२२ ॥
वरमउडकुंडलहरो उत्तममणिरयणपवरपालंबो । केऊरकडयसुत्तयवरहारविहूसियसरीरो ॥ २२४
अर्थ: वह उत्तम मुकुट व कुण्डलोंको धारण करनेवाला, उत्तम मणियों व रत्नोंके श्रेष्ठ प्रालम्ब ( गलेका आभूषण ) से युक्त तथा केयूर, कटक, सूत्र व उत्तम हारसे विभूषित शरीरसे संयुक्त है ॥ २२४ ॥
तत्तो दु विमाणादो गंतूणं जोयणा असंखेज्जा । तो होदि पभविमाणं पभमंडलमंडियं दिव्वं ॥ २२५
अर्थ: उस विमानसे असंख्यात योजन जाकर प्रभामण्डलसे मण्डित दिव्य प्रभ विमान स्थित है ॥ २२५ ॥
तीए पुण मज्झद्देसे भासुररूवा सभा सुहम्मा चिट्ठइ तीए वि मज्झद्देसे खग्गं किर उत्तमसिरीयं ॥ २२७
अर्थ: उस सुरेन्द्रके अंगोंकी उपमा कैसे की जा सकती है जिसके अनन्त सौन्दर्यवाले रूपमें अनुपम कान्ति विद्यमान है ॥ २२३ ॥ उस प्रभ विमानमें प्रभंकरा नामकी राजधानी है । उसका नाम अमरावती, इन्द्रपुरी व सौधर्मपुरी भी है ॥ २२६ ॥ उसके मध्य देशमें भास्वर रूपवाली सुधर्मा नामकी सभा है । उसके भी मध्य देशमें उत्तम श्रीसे संयुक्त खग्ग (!) है ॥ २२७ ॥
खग्गसहस्सवगूढं मणिकंचणरयणभूसियसरीरं । किं बहुणा तं खग्गं अच्छेरयसारसंभूदं ॥ २२८
अर्थ: उक्त छत्र हजारों खड्गोंसे आलिंगित तथा मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे भूषित शरीरवाला है । बहुत कहनेसे क्या ! वह खग्ग आश्चर्यजनक श्रेष्ठ द्रव्योंसे उत्पन्न हुआ है ॥२२८॥
तस्स बहुमज्झदेसे रमणिज्जुज्जलंविचित्तमणिसोहं । सिंहासनं सुरम्मं सपायपीठं अणोवमियं ॥ २२९
अर्थ: उसके बहुमध्य भागमें रमणीय, उज्ज्वल व विचित्र मणियोंसे शोभायमान एवं पादपीठसे सहित सुन्दर अनुपम सिंहासन है ॥ २२९ ॥
सो तत्थ सुहम्मवदी वरचामरविज्जमाणबहुमाणो । संतुट्ठसुहणिसण्णो सेविज्जई सुरसहस्सेहिं ॥ २३०
अर्थ: उसके ऊपर संतुष्ट होकर सुखपूर्वक स्थित वह सौधर्म इन्द्र उत्तम चामरोंसे वीज्यमान व बहुत सन्मानको प्राप्त होकर हजारों देवोंसे सेवित है ॥ २३० ॥
तं च सुहम्मवरसभं सीहासणमुत्तमं सुरिंदं च । अच्छरसाण य सोहं को वण्णेदुं समुच्छहदि ॥ २३१
अर्थ: उस उत्तम सुधर्मा सभा, उत्तम सिंहासन, सुरेन्द्र और अप्सराओंकी शोभाका वर्णन करनेके लिये कौन उत्साहित होता है ? अर्थात् कोई भी उनका वर्णन करनेके लिये समर्थ नहीं है ॥ २३१ ॥
दिव्वविमाणसभाए तीए अच्छेररूवकलिदाए । को उवमाणं कीरइ तिहुयणसारक्कसारारूए ॥ २३२
अर्थ: आश्चर्यजनक रूपसे सहित और तीनो लोकोंकी सारभूत वस्तुओंमें अद्वितीय उस दिव्य विमानसभाके लिये कौनसी उपमा की जाय ? अर्थात् वह सर्वश्रेष्ठ होनेसे उपमातीत है ॥ २३२ ॥
को व अणोवमरूवं रूवं उवमेज्ज अण्णरूवेणं । अमराहिवस्स सयलं अच्छब्भुदरूवसारस्स ॥ २३३
अर्थ: अत्यन्त आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूपसे संयुक्त उस सुरेन्द्रके अनुपम सुन्दरतासे परिपूर्ण समस्त रूपकी अन्य किसके रूपसे तुलना की जा सकती है ! अर्थात् नहीं की जा सकती ॥ २३३ ॥
जोयणसयं समहियं सा तस्स सभा स्वभावणिम्मिदा । भरइ निरंतरणिच्चिदा देवेहि महाणुभावेहिं ॥ २३४
अर्थ: एक सौ योजनसे कुछ अधिक व स्वभावसे निर्मित वह सौधर्म इन्द्रकी सभा महान् प्रभाववाले देवोंसे निरन्तर भरी रहती है ॥ २३४ ॥
विलसंतधयवड्डाया मुत्तामणिहेमजाळकयसोहा । पुढवीवरपरिणामा णिच्चचिदं सुरहिमहल्लेहिं ॥ २३५
अर्थ: शोभायमान ध्वजा-पताकाओंसे सहित; मोतियों, मणियों व सुवर्णके समूहसे की गई शोभासे सम्पन्न, पृथिवीके उत्तम परिणाम
गोसीसमलयचंदनसुगंधगंधुद्धुरेण गंधेण ।
वासेदि व सुरलोयं सा सग्गसिरी विक्खंबंती ॥ २३६
अर्थ (गाथा 235 से 236): रूप तथा सुगन्धित मालाओंसे सदा व्याप्त रहनेवाली वह सभा स्वर्गश्रीको तिरस्कृत करती हुई सुगन्ध गन्धसे उत्कट गन्धके द्वारा स्वर्गलोकको सुवासित करती है ॥२३५-२३६॥
सक्को वि महद्धीओ महाणुभागो महाजुदी धीरो ।
भासुरवरबोधिधरो सम्मादिट्ठी तिणाणीओ ॥ २३७
सो कायपडिउचारो पुरिसो इव पुरिसकारणिक्फण्णो ।
भुंजदि उत्तमभोगं देवीहिं समं गुणसमिद्धं ॥ २३८
अर्थ (गाथा 237 से 238): महाविभूतिसे संयुक्त, महाप्रभावसे सहित, महाकान्तिका धारक, धीर, भास्वर उत्तम रूपको धारण करनेवाला, सम्यग्दृष्टि, तीन (मति, श्रुत व अवधि) ज्ञानोंसे युक्त, पुरुषके समान कायप्रवीचारसे सहित तथा पौरुषसे निष्पन्न वह सौधर्म इन्द्र भी देवियोंके साथ गुणोंसे समृद्ध उत्तम भोगको भोगता है ॥२३७-२३८॥
बत्तीसं देविंदा (?) तायत्तीसा य उत्तिमो पुरिसा ।
चुलसीईं च सहस्सा देवा सामाणिया तस्स ॥ २३९
अट्ठ य पणट्ठसोया ताओ अङ्गरुवसारसोहाओ ।
अग्गवरमहिसियाओ अच्छेरयपेच्छणिज्जाओ ॥ २४०
अर्थ (गाथा 239 से 240): उक्त इन्द्रके बत्तीस देवेन्द्र, त्रायस्त्रिंश, चौरासी हजार सामानिक देव ये उत्तम पुरुष हैं; तथा शोकसे रहित, अत्यन्त श्रेष्ठ रूपसे सुशोभित एवं आश्चर्यपूर्वक दर्शनीय ऐसी उत्तम आठ अग्रमहिशियां होती हैं ॥२३९-२४०॥
अणियाणं सत्तण्ह य परिसाणं सामिओ सुरवरिंदो ।
चुलसीदिं च सहस्सा (?) परिसाए आदरक्खाणं ॥ २४१
अर्थ: उक्त सुरेन्द्र सात अनीकों, अभ्यन्तरादि परिषदोंमें बैठने योग्य चौरासी [१२+१४+१६] हजार परिषद देवों तथा [३३६०००] आत्मरक्ष देवोंका स्वामी है ॥२४१॥
संणद्धबद्धकवयो उप्पीळियसारपट्टियामज्झो ।
बहुविहउज्जयहत्था सूरसमत्था य आयरक्खो य ॥ २४२
अर्थ: युद्धके लिये उद्यत होकर कवचको व मध्यमें सारपट्टिकाको कसकर बांधे हुए तथा बहुत प्रकार उद्यम युक्त हाथोंवाले ये आत्मरक्षक देव शूरोंमें समर्थ होते हैं ॥२४२॥
चत्तारिकोयवालाणं तत्थ जमवरुणसोममादीणं ।
सामित्तं भट्टित्तं करेदि कालं असंखेज्जं ॥ २४३
अर्थ: वह सौधर्म इन्द्र वहां यम वरुण और सोमादि (सोम व कुवेर) चार लोकपालोंके स्वामित्व व भर्तृत्वको असंख्यात काल तक करता है ॥ २४३ ॥
संखेज्जवित्थडाणि य असंखपारमाणवित्थडाणिं च ।
दिव्वविमाणाणि तहिं कोडिसहस्साणि बहुवाणिं ॥ २४४
अर्थ: उपर्युक्त दिव्य विमान संख्यात योजन विस्तारवाले व असंख्यात योजन विस्तारवाले हैं । उनमें हजारों करोड़ योजन (असंख्यात) विस्तारवाले विमान बहुत (अपनी संख्याके ५/८ भाग) हैं ॥ २४४ ॥ संख्यात विस्तारवाले विमान संख्यात करोड़
संखेज्जवित्थडा किर संखेज्जा जोयणाण कोडीओ । जे होंति असंखेज्जा ते दु असंखेज्जकोडीओ ॥ २४५
अर्थ: योजन तथा जो असंख्येय विस्तारवाले हैं वे असंख्यात करोड़ योजन विस्तृत हैं ॥ २४५ ॥