जम्बूदीवपण्णत्तिसंगहो (आचार्य पद्मनन्दि), हिन्दी अनुवाद सहित | Jambudivapannattisangaho (Acharya Padmanandi)

जम्बूदीवपण्णत्तिसंगहो (आचार्य पद्मनन्दि), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य पद्मनन्दि
हिन्दी अनुवाद: पं॰ बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री
सम्पादन: प्रो॰ आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये, प्रो॰ हीरालाल जैन
प्रकाशक: जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर (जीवराज जैन ग्रन्थमाला)
संस्करण: १९५८

जम्बूद्वीप और मध्यलोक के क्षेत्र, पर्वत, नदी आदि का प्राकृत ग्रन्थ, मूल और हिन्दी अनुवाद सहित। साथ में “तिलोयपण्णत्ती का गणित” और विस्तृत प्रस्तावना।

Jambudivapannattisangaho of Acharya Padmanandi on Jambudvip and the middle world, Prakrit text with Hindi translation by Pt. Balchandra Siddhantashastri, with “Tiloyapannatti ka Ganit”.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):


:open_book: मूल गाथा और गाथा अर्थ, अधिकार अनुसार पढ़ें:

हर गाथा अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

पढमो उद्देसो

देवासुरिंदमहिदे दसद्धरूवूणकम्मपरिहीणे । केवलणाणालोए सदम्मुवदेसए अरहंते ॥ १

अट्ठविहकम्मरहिदे अट्ठगुणसमण्णिदे महावीरे । लोयग्गतितलयभूदे सासयसुहसंठिदे सिद्धे ॥ २

पंचाचारसमग्गे पंचिंदियणिज्जिदे विगयमोहे । पंचमहव्वयणिलए पंचमगइणायगायरिए ॥ ३

परसमयतिमिरदलणे परमागमदेसए उवज्झाए । परमगुणरयणणिवहे परमागमभाविदे वीरे ॥ ४

णाणागुणतवणिरए समयब्भासग्गहीयपरमत्थे । बहुविहिइजोगजुत्ते जे लोए सव्वसाहुगणे ॥ ५

ते वंदितूण सिरसा वोच्छामि जहाक्रमेण जिणदिट्ठं । आयरियपरंपराए पण्णत्तिं दीवजलधीणं ॥ ६

अर्थ (गाथा 1 से 6): देवेन्द्रों व असुरेन्द्रोंसे पूजित, दसके आधेमेंसे एक कम अर्थात् चार घातिया कर्मोंसे रहित, केवलज्ञान रूप प्रकाशसे सहित, और समीचीन धर्मके उपदेशक अरिहन्तोंको; आठ प्रकारके कर्मोंसे रहित, आठ गुणोंसे समन्वित, महावीर, लोकशिखरके तिलक स्वरूप, और शाश्वत सुखमें स्थित सिद्धोंको; पंचाचारसे युक्त, पांच इन्द्रियोंके विजेता, मोहसे रहित, पांच महाव्रतोंके स्थानभूत, और पंचम गतिके नायक आचार्योंको; परसमय रूप अंधकारको नष्ट करनेवाले, परमागमके उपदेशक, उत्कृष्ट गुण रूप रत्नोंके समूहसे युक्त और परमागमके संस्कारसे सहित वीर उपाध्यायोंको; तथा नाना गुण युक्त तपमें निरत, स्वसमयाभ्यास अर्थात् शास्त्रस्वाध्यायसे परमार्थको ग्रहण करनेवाले और बहुत प्रकारके योगोंसे युक्त जो लोकमें सर्वसाधुगण हैं; उनको शिरसे नमस्कार करके यथाक्रमसे जिनभगवान्के द्वारा उपदिष्ट एवं आचार्यपरंपरासे प्राप्त हुई द्वीप-समुद्रोंकी प्रज्ञप्तिको कहता हूँ ॥ १-६ ॥


सव्वण्हूं सव्वजिणं भवियसरोरुहदिवायरं भवरहियं । सव्वामरवइमहिदं सव्वण्हुगुणं समादिसदु ॥ ७

अर्थ: सर्वज्ञ, भव्य रूप कमलोंके लिए दिवाकर स्वरूप, भवसे रहित, और सर्व अमरपतियोंसे पूजित समस्त जिन सर्वज्ञगुणको प्रदान करें ॥ ७ ॥


णमिऊण वड्ढमाणं ससुरासुरवंदिदं विगयमोहं । वरसुदगुरुपरिवाडिं वोच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥ ८

अर्थ: सुर एवं असुरोंसे बंदित और मोहसे रहित वर्धमान जिनेन्द्रको नमस्कार करके उत्तम श्रुतके धारक गुरुओंकी परम्पराको अनुक्रमसे कहता हूँ ॥ ८ ॥


विउलगिरितुंगसिहरे जिणिंदइंदेण वड्ढमाणेण । गोदममुणिस्स कहिदं पमाणणयसंजुदं अत्थं ॥ ९

तेण वि लोहज्जस्स य लोहज्जेण य सुधम्मणाणेण । गणधरसुधम्मणा खलु जंबूणामस्स णिद्दिट्ठं ॥ १०

अर्थ (गाथा 9 से 10): विपुलाचल पर्वतके उन्नत शिखरपर जिनेन्द्र भगवान् वर्धमान स्वामीने प्रमाण और नयसे संयुक्त अर्थका गौतम मुनिको उपदेश दिया । उन्होंने (गौतम गणधरने) लोहार्यको, और लोहार्य अपर नाम सुधर्म गणधरने जम्बू स्वामीको उपदेश दिया ॥ ९-१० ॥


चउरमलवुद्धिसहिदे तिण्णेदे गणधरे गुणसमग्गे । केवलणाणपईवे सिद्धिं पत्ते णमंसामि ॥ ११

अर्थ: चार निर्मल बुद्धियों (कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, संभिन्नश्रोतृबुद्धि और पदानुसारिणी बुद्धि) से सहित, गुणोंसे परिपूर्ण, केवलज्ञान रूप उत्कृष्ट दीपकसे संयुक्त और सिद्धिको प्राप्त इन तीनों गणधरोंको नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥


णंदी य णंदिमित्तो अवराजिदमुणिवरो महातेओ । गोवड्ढणो महप्पा महागुणो भद्दबाहु य ॥ १२

पंचेदे पुरिसवरा चउदसपुव्वी हवंति णायव्वा । बारसअंगधरा खलु वीरजिणिंदस्स णायव्वा ॥ १३

अर्थ (गाथा 12 से 13): नन्दी, नन्दिमित्र, महा तेजस्वी अपराजित मुनीन्द्र, महात्मा गोवर्धन और महागुणोंसे युक्त भद्रबाहु, ये पांच श्रेष्ठ पुरुष चौदह पूर्वोके धारक अर्थात् श्रुतकेवली थे, ऐसा जानना चाहिये । वीर जिनेन्द्रके [ तीर्थमें ] इन्हें बारह अंगोंके धारक जानना चाहिये ॥ १२-१३ ॥


तह य विसाखायारिओ पोट्ठिलो खत्तिओ य जयणामो। णागो सिद्धत्थो वि य धिदिसेणो विजयणामो य ॥१४

बुद्धिल्ल गंगदेवो धम्मस्सेणो य होइ पच्छिमओ । पारंपरेण एदे दसपुव्वधरा समक्खादा ॥ १५

अर्थ (गाथा 14 से 15): तथा विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय नामक, नाग, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय नामक, बुद्धिल्ल, गंगदेव और अन्तिम धर्मसेन, ये परम्परासे दस पूर्वोंके धारक कहे गये हैं ॥ १४-१५ ॥


णक्खत्तो जसपालो पंडू धुवसेण कंसआयरिओ । एयारसंगधारी पंच जणा होंति णिद्दिट्ठा ॥ १६

अर्थ: नक्षत्र, यशपाल, पाण्डु, ध्रुवषेण और कंसाचार्य, ये पांच जन ग्यारह अंगोंके धारक निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १६ ॥


णामेण सुभद्दमुणी जसभद्दो तह य होइ जसबाहू । आयारधरा णेया अपच्छिमो लोइणामो य ॥ १७

अर्थ: नामसे सुभद्र मुनी, यशोभद्र, यशोबाहु और अन्तिम लोहाचार्य, ये चार आचार्य आचारांगके धारी जानना चाहिये ॥ १७ ॥


आइरियपरंपरया सायरदीवाण तह य पण्णत्ती । संखेवेण समत्थं वोच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥ १८

अर्थ: आनुपूर्वीके अनुसार आचार्यपरम्परासे प्राप्त सागर-द्वीपोंकी समस्त प्रज्ञप्तिको संक्षेपमें कहता हूँ ॥ १८ ॥


पणुवीसैकोडिकोडी उद्धारपमाणपल्लसंखाए ।
जेत्तियमेत्ता रोमा तावदिया होंति दीउदधी ॥ १९

अर्थ: जितने रोम समा सकते हैं उतने द्वीप-समुद्र हैं ॥ १९॥


रविमंडलं व वट्टो विक्खंभायामजोयनालक्खो ।
दीवोदधीण मज्झे जंबुद्दीवो समुद्दिष्ट्ठो ॥ २०

अर्थ: द्वीप-समुद्रोंके मध्यमें सूर्यमण्डलके सदृश गोल और एक लाख योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित जम्बूद्वीप कहा गया है ॥ २० ॥


परिधी तस्स दु णेया लक्खा तिण्णेव सोलसहस्सा ।
बे सयसत्तावीसा जोयणसंखा पमाणेणं ॥ २१

गाउव तिण्णि वि जाणसु अट्ठावीसा सयं च धणुसंखा ।
तेरस अंगुलपव्वा अद्धंगुलमेव सविसेसं ॥ २२

अर्थ (गाथा 21 से 22): उसकी परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस प्रमाण योजन, तीन गव्यूति, एक सौ अट्ठाईस धनुष, तेरह अंगुल और आध अंगुलसे कुछ अधिक जानना चाहिये ॥ २१-२२ ॥


विक्खंभेणब्भत्थं विक्खंभं दसगुणं पुणो काउं ।
जं तस्स वग्गमूलं परिरयमेदं बियाणाहि ॥ २३

अर्थ: विष्कम्भसे गुणित विष्कम्भको अर्थात् विष्कम्भके वर्गको दसगुणा करके पुनः उसका जो वर्गमूल हो वह परिधिका प्रमाण जानना चाहिये ॥ २३ ॥


विक्खंभचदुब्भागेण संगुणं होइ परिधिपरिमाणं ।
पदरगदं खेत्तफलं लद्धं रविमंडलाण तहा ॥ २४

अर्थ: परिधिप्रमाणको विष्कम्भके चतुर्थ भागसे गुणा करनेपर रविमण्डलके सदृश गोल क्षेत्रोंका प्रतरगत क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥


सत्तसयणउदिकोडीसत्तधियछप्पण्णसयसहस्साई ।
चदुणउदिं च सहस्सा द्विवद्धसयजोयणा णेया ॥ २५

अर्थ: जम्बूद्वीपका क्षेत्रफल सात सौ नब्बे करोड़ छप्पन लाख चौरानबै हजार एक सौ पचास योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ २५ ॥


जोयणअट्ठुच्छेधा विउलामलवज्जवेदिया दिव्या ।
परिवेडिदूण अच्छदि जंबुदीवस्स सव्वत्तो ॥ २६

अर्थ: आठ योजन ऊंची, विशाल दिव्य निर्मल वज्रमय वेदिका जम्बूद्वीपको चारों ओरसे वेष्टित करके स्थित है ॥ २६ ॥


मूले बारह जोयण मज्झे अट्ठेव जोयणा णेया ।
उवरिं चत्तारि हवे वित्थारो तीए जगदीए ॥ २७

अर्थ: उस जगतीका विस्तार मूलमें बारह योजन, मध्यमें आठ ही योजन और ऊपर चार योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ २७ ॥


सोलसदलम्मिढगुणं (?) इच्छियछत्ते सोलसद्धभागम्मि । सोलसदलदलसहिदं इच्छफलं होइ जगदीए ॥ २८

अर्थ: सोलहके अर्ध भाग अर्थात् आठ योजनकी ऊंचाईमें जहां कहीं भी जगतीके विस्तारके जाननेकी इच्छा हो [ वहां जगतीके शिखरसे जितना नीचे उतरे हों उतनेमें एकका भाग देनेपर जो प्राप्त हो उसमें ] सोलहके दलके दल अर्थात् चार (१६ ÷ २ ÷ २ = ४) को मिलानेपर जगतीके अभीष्ट विस्तारका प्रमाण होता है । [ जैसे उपरिम भागसे १ १/४ योजन नीचे उतर कर यदि वहांका विस्तार जानना है तो वह १ १/४ ÷ १ + ४ = ५ १/४ इस प्रकारसे पांच योजन एक कोश होगा ] ॥ २८ ॥


चत्तारिधणुसहस्सा उत्तुंगा कणयवेदिया दिव्वा । वरवज्जणीलमरगयणाणाविहरयणसंछण्णा ॥ २९

विविधेहि य जगतीए उवरिं वरवेदिया रयणचित्ता । पंचसयदंडमित्तो वित्थारो तीए पण्णत्तो ॥ ३०

अर्थ (गाथा 29 से 30): उसी जगतीके ऊपर चार हजार धनुष ऊंची उत्तम वज्र, नील और मरकत आदि नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त दिव्य सुवर्णमय वेदिका है। रत्नोंसे चित्रविचित्र उस उत्तम वेदिकाका विस्तार पांच सौ धनुष मात्र कहा गया है ॥ २९-३० ॥


चत्तारिधणुसहस्सा अद्धाइदिव्जासएहिं परिहीणा । बेजोयणवित्थिण्णो दोसु वि पासेसु जगदीए ॥ ३१

बेलंधरदेवाणं हवंति नगराणि तत्थ रम्माणि । अब्भंतरम्मि भागे महोरगाणं च विण्णेया ॥ ३२

अर्थ (गाथा 31 से 32): जगतीके दोनों पार्श्वभागोंमें अढ़ाई सौ धनुष कम जो चार हजार धनुष प्रमाण विस्तार है वहांपर बेलंधर देवोंके दो योजन विस्तीर्ण रमणीय नगर हैं । उसके अभ्यन्तर भागमें महोरग देवोंके नगर जानना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥


अहिसेयणट्टसालाउववादसभाघराणि रम्माणि । पागारगोउरालय अणाइणिहणाणि सोहंति ॥ ३३

अर्थ: उनमें अभिषेकशाला नाट्यशाला और उपपादसभा, ये प्राकार एवं गोपुरालयोंसे संयुक्त अनादि-निधन रमणीय घर शोभायमान हैं ॥ ३३ ॥


कंचणपवालमरगयकक्केयणपउमरायमणिणिवहा । तोरणवंदणमाला सुगंधगंधुद्धया रम्मा ॥ ३४

अर्थ: ये रमणीय भवन सुवर्ण, प्रवाल, मरकत, कर्केतन और पद्मराग मणियोंके समूहसे निर्मित; तोरण एवं वंदनमालाओंसे सुशोभित, तथा सुगन्धित गन्धके प्रसारसे युक्त हैं ॥ ३४ ॥


पुण्णागणागचंपयअसोयवरबउलतिलयवच्छादी । उभओ पासेसु तहा उववणसंडा विराजंति ॥ ३५

अर्थ: वेदिकाके उभय पार्श्वभागोंमें पुन्नाग, नाग, चम्पक, अशोक, उत्तम बकुल और तिलक आदि वृक्षोंसे सहित उपवनषण्ड विराजमान हैं ॥ ३५ ॥


कल्लहारकमलकंदलणीलुप्पलकुमुदकुसुम संछण्णा । पोक्खरिणिवाविविप्पिणिसुदीहिगाओ विराजंति ॥ ३६

अर्थ: वणषण्डोंमें कल्हार (सफेद कमल), कमल, कंदल, नीलोत्पल और कुमुद कुसुमोंसे व्याप्त पुष्करिणी, वापियां, वप्रिणी (?) एवं उत्तम दीर्घिकायें विराजमान हैं ॥ ३६ ॥ स्वाभाविक सौन्दर्यसे संयुक्त, और जिन–सिद्धभवन-


सयलं जंबुद्दीवं परिरयदि पुरं सभाववरलद्धपुण्णं । जिणसिद्धभवणणिवहं को सक्कइ वण्णिउं सयलं ॥ ३७

अर्थ: समूहसे युक्त वह पुर समस्त जम्बूद्वीपको परिवेष्टित करता है। उसका सम्पूर्ण वर्णन करनेके लिये कौन समर्थ है ? ॥ ३७ ॥


जंबुदीवस्स तहा गोउरदाराणि होंति चत्तारि । विजयं तु वेजयंतं जयंतमपराजियं चेव ॥ ३८

अर्थ: जम्बूद्वीपके [ चारों ओर ] विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित, ये चार गोपुरद्वार हैं ॥ ३८ ॥


पुव्वदिसेणं विजयं दक्खिणभागेण वहजयंतं तु । होइ य पच्छिमभागे जयंतमपराजियं च उत्तरदो ॥३९

अर्थ: इनमेंसे पूर्व दिशामें विजय, दक्षिण भागमें वैजयन्त, पश्चिम भागमें जयन्त और उत्तर दिशामें वैजयन्त गोपुरद्वार है ॥ ३९ ॥


वरकणयरयणमरगयणायरयणोवहारकयसोहा । जोयणअट्ठुस्सेहा तदद्धविक्खंभायामा ॥ ४०

अर्थ: उत्तम सुवर्ण, रत्न, मरकत और नाना रत्नोंके उपहारसे शोभायमान ये द्वार आठ योजन ऊंचे और इससे आधे विष्कम्भ व आयामसे सहित हैं ॥ ४० ॥


सिंहासणछत्तत्तयभामंडलचामरादिसंजुत्ता । अरुहाण ठिया पडिमा गोउरदारेसु सब्बेसुं ॥ ४१

अर्थ: सब गोपुरद्वारोंमें सिंहासन, तीन छत्र, भामण्डल और चामरादिसे संयुक्त अरिहन्त जिनोंकी प्रतिमायें स्थित हैं ॥ ४१ ॥


विजयंतवहजयंता जयंतअपराजिदा सुरा होंति । पल्लाउगा सुरुवा चदुसु वि दारेसु बोद्धव्वा ॥४२

अर्थ: चारों द्वारोंपर क्रमशः विजयन्त, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित, ये चार सुन्दर देव हैं। इनकी आयु एक पल्य प्रमाण जानना चाहिये ॥ ४२ ॥


वरपट्टणं विरायदि विजयंतकुमारसुरवरिंदस्स । बारहसहस्सजोयणविक्खंभायामणिद्दिठ्ठं ॥ ४३

अर्थ: विजयंतकुमार सुरेन्द्रका उत्तम पुर विराजमान है। इस नगरका विष्कम्भ व आयाम बारह हजार योजन प्रमाण कहा गया है ॥४३॥


रयणमया पासादा वेरुलियमया य कंचणमया य । ससिकंतसूरकंता कक्कयणपउमरागमया ॥ ४४

अर्थ: इन नगरोंमें रत्नमय, वैडूर्यमणिमय, सुवर्णमय तथा चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, कर्केतन और पद्मराग मणियोंसे निर्मित प्रासाद हैं ॥ ४४ ॥


एवं अवसेसाणं देवाणं पुरवराणि णेयाणि । वरगोउरदारादो उवरिं गंतूण चिट्ठंति ॥ ४५

अर्थ: इसी प्रकार शेष देवोंके श्रेष्ठ नगर जानना चाहिये । ये नगर उत्तम गोपुरद्वारोंसे ऊपर जाकर स्थित हैं ॥ ४५ ॥


दारंतरपरिमाणं बाण्णा जोयणा सुणेयव्वा । उणासीदिसहस्सा णिद्दिठ्ठा सव्वदरसीहिं ॥ ४६

पण्णत्तरिसय णेया बत्तीसा धणुप्पमाण णिद्दिठ्ठा । तिण्णेव अंगुलाइं तिज्जव संखा समादिरियो ॥४७

अर्थ (गाथा 46 से 47): विजयादिक द्वारोंके अन्तरालका प्रमाण सर्वदर्शियों द्वारा उन्यासी हजार बावन योजन, पचत्तर सौ बत्तीस धनुष, तीन अंगुल और तीन जौ ( ७९०५२ यो., ६ कोश, ७५३२ धनुष, ३ अंगुल, ३ यव ) से कुछ अधिक निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥४६-४७॥


सोलसजोयणऊणा जंबुद्दीवस्स परिहिमज्झिम्मि । दारंतरपरिमाणं चदुभजिदे होइ जं लद्धं ॥ ४८

अर्थ: जम्बूद्वीपकी परिधिमेंसे सोलह योजन कम कर शेषमें चारका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतना उक्त द्वारोंका अन्तरप्रमाण होता है ॥४८॥


जगदीदो गंतूणं वेगाउडेविक्खंभा परमरम्मा । अब्भंतरम्मि भागे वणखंडा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ४९

अर्थ: जगतीसे अभ्यन्तर भागमें जाकर दो कोश विस्तृत परम रमणीय वनषण्ड निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ४९॥


पणसंबताइदाडिमसज्जज्जउणणालिकेरकदलीहिं । वरबउलतिलयचंपयअसोयरुक्खेहिं संछण्णा ॥ ५०

अर्थ: ये वनषण्ड पनस, आम, ताड, दाडिम, सर्ज, अर्जुन, नारियल, कदली, उत्तम बकुल, तिलक, चंपक और अशोक, इन वृक्षोंसे व्याप्त हैं ॥ ५० ॥


णाणादुमगणगहणं उज्जाणं सुरहिसियलच्छाएं । चिंचामोयसुगंधं सुरखेयरकिण्णरेसणाहं ॥ ५१

अर्थ: वह उद्यान नाना वृक्षसमूहोंसे गहन, सुगन्धित शीतल छायासे सहित, चिंचा ( इमली) की आमोदसे सुगन्धित और देव, विद्याधर एवं किन्नरोंसे सनाथ हैं ॥ ५१ ॥


वेगाउडउव्विद्धा उज्जाणवणस्स वेदिया दिव्वा । पंचधणुस्सयविउला कंचणमणिरयणपरिणामा ॥ ५२

णाणातोरणणिवहा मणिकंचणमंडिया परमरम्मा । सासयअणाणिइण्णा णाणाविहरुवसंपण्णा ॥ ५३

अर्थ (गाथा 52 से 53): उस उद्यान-वनकी दो कोश ऊंची व पांच सौ धनुष विस्तृत सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे निर्मित दिव्य वेदिका है । यह वेदिका नाना तोरणसमूहोंसे सहित, मणियों एवं सुवर्णसे मंडित, अतिशय रमणीय शाश्वत, अनादि-निधन और नाना प्रकारके रूपों ( मूर्तियों) से सम्पन्न है ॥ ५२-५३॥


उज्जाणजगतितोरणगोउरद्दारेसु होंति सव्वेसुं । जिणिंदाणं पडिमा अकिट्टिमा सासयसहावा ॥ ५४

अर्थ: उद्यान-वनकी जगतीके तोरण युक्त सब गोपुरद्वारोंमें अकृत्रिम और शाश्वत स्वभाववाली जिनेन्द्रोंकी प्रतिमायें होती हैं ॥ ५४ ॥


जंबुद्दीवे णेया सत्तेव य तत्थ होंति खेत्ताणि । एक्को मंदरसिहरी छच्चेव य कुलंगिरी तुंगा ॥ ५५

अर्थ: वहां जम्बूद्वीपमें सात क्षेत्र, एक मंदर शिखरी (सुमेरु) और छह उन्नत कुलगिरि हैं ॥ ५५ ॥


विण्णि सया णायव्वा कणयगणा विविहरयणपरिणामा । चत्तारि होंति जमगा णाभिणगा तेत्तियो चेव ॥ ५६

अर्थ: भिन्न भिन्न रत्नोंके परिणाम स्वरूप दो सौ कनकनग (कंचनगिरि), चार यमक पर्वत और उतने ही नाभिपर्वत भी जानना चाहिये ॥ ५६ ॥


रिसभगणा चउतीसा वेयड्ढा तेत्तिया मुणेदव्वा । वक्खारगणी सोलसे णाणामणिरयणपरिणामा ॥५७

अर्थ: चौंतीस वृषभनग, उतने ही वैताढ्य और नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम स्वरूप सोलह वक्षारपर्वत हैं ॥ ५७ ॥


अट्ठेव दिसगइंदो णाणामणिविप्फुरंतकिरणोहा । तावदिया वेदीओ विद्देहमज्झम्मि णिद्दिट्ठा ॥ ५८

अर्थ: विदेहके मध्यमें नाना मणियोंके प्रकाशमान किरणसमूहसे युक्त आठ दिग्गजेन्द्र और उतनी ही वेदिकायें कही गयी हैं ॥ ५८ ॥


पुव्वावरआयदाणं वंसधराणं हवंति णादव्वा । सोलस वरवेदीओ णाणामणिरयणणिवहाओ ॥ ५९

अर्थ: पूर्व-पश्चिम लंबे वर्षधरों (पर्वतों) की नाना मणियों व रत्नोंके समूहसे युक्त सोलह उत्तम वेदिकायें जानना चाहिये ॥ ५९ ॥ जम्बूद्वीपमें क्षेत्रोंकी अठारह वेदियां हैं । मणियों व रत्नोंके स्फुरायमाण किरणोंसे


बंसाणं वेदीओ अट्ठारस होंति जंबुदीवम्हि । बेगाउदउव्विद्धा मणिरयणफुरंतकिरणोहा ॥ ६०

अर्थ: युक्त ये वेदियां दो कोश ऊंची हैं ॥ ६० ॥


पुव्वावरायदाओ बंसधराणं हवंति वेदीओ । उत्तरदक्खिणदीहा बंसाणं होंति णिद्दिट्ठा ॥ ६१

अर्थ: वर्षधरोंकी वेदियां पूर्व-पश्चिम लम्बी और क्षेत्रोंकी वेदियां उत्तर-दक्षिण लम्बी कही गयी हैं ॥ ६१ ॥


बावण्णसया णेया वेदीओ होंति रयणमइयाओ । कुंडजमहानदीणं णिद्दिट्ठा सव्वदरसीहिं ॥ ६२

अर्थ: सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट कुण्डोंसे निकली हुई महानदियोंकी रत्नमय वेदिकाएं बावन सौ जानना चाहिये ॥ ६२ ॥


चउद्दसमहाणदीणं अट्ठावीसा हवंति वेदीओ । चउवीसा विण्णेया पहमादीणं दहाणं तु ॥ ६३

अर्थ: चौदह महानदियोंकी वेदियां अट्ठाईस और पद्मादिक द्रहोंकी चौबीस जानना चाहिये ॥ ६३ ॥


कुंडाणं णिद्दिट्ठा दूसूणसयवेदिया समुत्तुंगा । कंचणरयणमयाओ पंचेव य धणुसया विउला ॥ ६४

अर्थ: कुण्डोंकी उन्नत वेदिकाएं दस कम सौ ( ९० ) कही गयी हैं । ये सुवर्ण व रत्नमय वेदिकाएं पांच सौ धनुष प्रमाण विस्तृत हैं ॥ ६४ ॥


सव्वाओ वेदीओ तोरणणिवहा हवंति णायव्वा । विक्खंभुस्सेहेहि य अवगाहेहिं हवे सरिसा ॥ ६५

अर्थ: तोरणसमूहसे संयुक्त सब वेदियोंको विष्कम्भ, उत्सेध और अवगाहमें सदृश समझना चाहिये ॥ ६५ ॥


तिण्णि सदा एक्कारा मणिकंचणमंडिया णगा णेया । तावदिया वेदीओ णगाण सव्वाण दीवस्स ॥ ६६

अर्थ: जम्बूद्वीपमें मणियों व सुवर्णसे मण्डित तीन सौ ग्यारह पर्वत और उन सब पर्वतोंकी उतनी ही वेदियां जानना चाहिये [ कुलपर्वत ६ + विजयार्ध ३४ + वक्षारगिरि १६ + गजदन्त ४ + दिग्गजेन्द्र ८ + नाभिगिरि ४ + वृषभाचल ३४ + यमक ४ + कंचनशैल २०० + मेरु १ = ३११.] ॥ ६६ ॥


बारस चदुँसहिय दहा दहाण वेदी हवंति तावदिया । चउदसमहाणदीओ छावत्तरि कुंडजणदीओ ॥ ६७

अर्थ: चार सहित बारह अर्थात् सोलह द्रह ( कुलपर्वतस्थ ६ और विदेह क्षेत्रस्थ १०) और उतनी ही द्रहोंकी वेदियां हैं । चौदह महानदियां और छहत्तर ( बत्तीस विदेह सम्बन्धी ६४, विभंग नदी १२ ) कुण्डज नदियां हैं ॥ ६७ ॥


णउदी चउद्दसलक्खा छप्पण्ण सहस्स होदि परिमाणं । दीवस्स णदी णेया तावदिया दुगुणवेदीओ ॥ ६८

अर्थ: द्वीपकी नदियोंका प्रमाण चौदह लाख, छप्पन हजार, नव्बे जानना चाहिये । इनसे दूनी उनकी वेदियां हैं [सीता-सीतोदा २ + बत्तीस विदेहस्य ६४ + विभंग १२ + सीता-सीतोदापरिवार १६८००० + वि. नदीपरिवार ८९६००० + छह भरतादि क्षेत्रोंकी ३९२०१२ = १४५६०९०.] ॥ ६८ ॥


चत्तारि धणुसहस्सा उत्तुंगा धणुसहस्सअवगाढा । पंचसयदंउडविउला सव्वाओ होंति वेदीओ ॥ ६९

अर्थ: सब वेदियां चार हजार धनुष प्रमाण ऊंची, एक हजार धनुष प्रमाण अवगाहवाली और पांच सौ धनुष विस्तृत होती हैं ॥ ६९ ॥


वरणइतडेसु गिरिसु य उज्जाणवणेसु दिव्यभवणेसुं ।
संवलिजंबूरुक्खेसु य पउमिणिसंडेसु सव्वेसुं ॥ ७०

दिसिगयवरेसु अट्ठसु वक्खारणगेसुं णाभियणगेसुं ।
कंचणणगेसु रम्मा वरमंदरपव्वदे तुंगे ॥ ७१

गंगाकूडेसु तहा वेदड्ढणगेसु रिसभसेलेसुं ।
जलवाहिणिकुंडेसुं य विदेहवंसाइखेत्तेसुं ॥ ७२

गोउरदारेसु तहा मणिमयवरतोरणेसु रम्मेसुं ।
णिम्मलवरदेहधरा जिणपडिमाओ णमेसामि ॥ ७३

अर्थ (गाथा 70 से 73): उद्यान-वनोंमें, दिव्य भवनोंमें, शाल्मलिवृक्ष, जम्बूवृक्ष, सब पद्मिनीषण्ड, श्रेष्ठ दिग्गज, आठ वक्षार नग, नाभिनग, कांचननग, उन्नत एवं श्रेष्ठ मन्दर पर्वत, गंगाकूट, वैताढ्यनग, ऋषभशैल, नदीकुण्ड, विदेहवर्षादि क्षेत्र, गोपुरद्वार और रम्य महा मणिमय उत्तम तोरण, इन स्थानोंमें स्थित निर्मल एवं उत्तम देहको धारण करनेवाली रमणीय जिनप्रतिमाओंको नमस्कार करता हूँ ॥ ७०-७३ ॥


अण्णाणतिमिरदलणो मुणिगणधरकुमुयसंडबोहयरो ।
वरपउमणंदिमहिओ जिणवरचंदो दिसउ बोहिं ॥७४

अर्थ: अज्ञानान्धकारको नष्ट करनेवाला, मुनि एवं गणधर रूपी कुमुदसमूहका विकासक और पद्मनन्दिसे पूजित जिनवररूपी चन्द्र बोधिको प्रदान करे ॥ ७४ ॥


॥ इय जंबूद्वीवपण्णत्तिसंगहे उवग्घायपत्थाओ णाम पढमेउद्देसो समत्तो ॥ १ ॥

बिदिओ उद्देसो

उसभजिणिंदं पणमिय दसद्धसयचावदीहरं णाहं । जंबूद्दीवस्स तहा खेत्तविभागं पवक्खामि ॥ १

अर्थ: दसके आधे अर्थात् पांच सौ धनुष लंबे स्वामी ऋषभ जिनेन्द्रको नमस्कार करके जम्बूद्वीपके क्षेत्रविभागको कहता हूँ ॥ १ ॥


इह होइ भरहखेत्तो तत्तो हेमव्वदो य हरिवंसो । तह य विदेहो रम्मग हेरण्णवदो य अइरवदो ॥ २

अर्थ: यहां जम्बूद्वीपमें भरतक्षेत्र, हैमवत, हरिवर्ष, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत, ये सात क्षेत्र हैं ॥ २ ॥


कप्पतरुधवलछत्ता उववणससिधवलचामराडोवा । बहुकुंडरयणकंठा वणकुंडलमंडियागंडा ॥ ३

बेइकडिसुत्तसोहा णाणापव्वयफुरंतवरमउडा । वरणइजलच्छहारा खेत्तनरिंदा विरायंति ॥ ४

अर्थ (गाथा 3 से 4): कल्पवृक्षरूपी धवल छत्रोंसे सहित, चन्द्रमाके समान धवल उपवनरूपी चामरोंके विस्तारसे संयुक्त, बहुत कुण्डरूपी रत्नमय कण्ठाभरणोंसे सुशोभित, वनरूपी कुण्डलोंसे अलंकृत कपोलोंवाले, वेदीरूपी कटिसूत्रोंसे शोभायमान, नाना पर्वतरूपी प्रकाशमान उत्तम मुकुटोंसे युक्त, और उत्तम नदीजलरूपी निर्मल हारोंसे विभूषित, ऐसे क्षेत्ररूपी राजा विराजमान हैं ॥ ३-४ ॥


पुव्वावरेण दीहा सत्त वि खेत्ता विणासपरिहीणा । कुलपव्वयकयसीमा वित्थिण्णा दक्खिणुत्तरदो ॥ ५

अर्थ: पूर्व-पश्चिम लंबे, विनाशसे रहित और कुलपर्वतोंसे की गयी सीमासे संयुक्त ये सातों क्षेत्र दक्षिण-उत्तरमें विस्तृत हैं ॥ ५ ॥


एकंखंडो भरहो दुगुणो हिमवंतवित्थिडो दिट्ठो । दुगुणदुगुणा दु सव्वे सत्त विभागा मुणेयव्वा ॥ ६

जाव दु विदेहवंसो पव्वदखेत्ताण होइ परिवड्ढी । तत्तो अहद्धखओ जाव दु एरावदो वंसो ॥ ७

अर्थ (गाथा 6 से 7): [ जम्बू द्वीपके एक सौ नब्बे भागोंमें ] एक खण्ड ( भाग ) भरत क्षेत्र है। उससे दुगुणा विस्तृत हिमवान् पर्वत बतलाया गया है। इस प्रकार विदेह क्षेत्र तक चार क्षेत्र व तीन कुलपर्वत, ये सात विभाग उत्तरोत्तर दूने जानना चाहिये। विदेह क्षेत्र तक पर्वत और क्षेत्रोंके विस्तारमें उत्तरोत्तर वृद्धि तथा उससे आगे ऐरावत क्षेत्र तक उनके विस्तारमें उत्तरोत्तर आधी आधी हानि होती गई है ॥ ६-७ ॥


कुलगिरिखेत्ताणि तहा तेरस भागा हवंति णायव्वा । एयट्ठकए सव्वे णउदिसयं होदि पिंडेण ॥ ८

अर्थ: छह कुलपर्वत तथा सात क्षेत्र, ये जम्बूद्वीपके तेरह भाग जानना चाहिये । इन सबको इकट्ठा करनेपर पिण्ड रूपसे एक सौ नब्बे भाग होते हैं ॥ ८ ॥


णउदिसएण विभत्तं जोयणलक्खं पुणी वि इच्छगुणं । विक्खभं णायव्वं खेत्तादीणं तु जं रुंदं ॥ ९

अर्थ: एक लाख योजनमें एक सौ नब्बेका भाग देकर पुनः इच्छासे गुणा करनेपर जो प्राप्त हो उतना क्षेत्रादिकोंका विष्कम्भ जानना चाहिये ॥ ९ ॥


पँचसया छब्बीसा विक्खंभा जोयणा समुद्दिट्ठा ।
उगवीसदिमे भागे छव्वेव कला दु भरहस्स ॥ १०

अर्थ: भरत क्षेत्रका विष्कम्भ पांच सौ छब्बीस योजन और एक योजनके उन्नीस भागोंमेंसे छह भाग कहा गया है [ १००००० ÷ १९० x १ = ५२६ ६/१९ योजन । ] ॥ १० ॥


धरणद्धरो दु दुगुणो धरणिधरादो दु वसुमई दुगुणा ।
एवं दुगुणा दुगुणा पव्वदखेत्ता मुणेयव्वा ॥ ११

अर्थ: [ क्षेत्रसे ] दूना पर्वत और पर्वतसे दूना क्षेत्र, इस प्रकार पर्वत और क्षेत्र उत्तरोत्तर दूने दूने जानना चाहिये ॥ ११ ॥


जाव दु विदेहवंसो सत्त विभागा हवंति दुगुणा दु ।
तत्तो अद्धद्धखओ जाव दु एरावदो वंसो ॥ १२

अर्थ: विदेह वर्ष तक सात विभाग दूने और उसके पश्चात् ऐरावत वर्ष तक आधी आधी हानि होती गयी है ॥ १२ ॥


चत्तारिसदेगत्तरि चउद्दहजोयणसहस्स पंचकला ।
हिमगिरितडे वियाणसु आयामो भरहवंसस्स ॥ १३

अर्थ: हिमवान् पर्वतके तटमें भरतक्षेत्रका आयाम चौदह हजार चार सौ इकत्तर योजन और पांच कला ( १४४७१ ५/१९ ) प्रमाण है ॥ १३ ॥


जोयणमट्ठावीसा पंचसया तह य चउद्दहसहस्सा ।
एयारकला गेया भरहस्स दु होइ धनुपुट्ठं ॥ १४

अर्थ: भरत क्षेत्रका धनुषपृष्ठ चौदह हजार पांच सौ अट्ठाईस योजन और ग्यारह कला ( १४५२८ ११/१९ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ १४ ॥


खेत्तादिकला दुगुणा खेत्तजुदा तेर्सु होइ इसुसंखा ।
धरणीधरणधराणं जाव दु वरमंदिरे मज्झे ॥ १५

अर्थ: क्षेत्रादिककी कलाओंको दुगुणा करके उनमें क्षेत्रके मिलानेपर [ भरतक्षेत्रके कम करनेपर ? ] मेरुपर्वतके मध्य भाग तक क्षेत्र व पर्वतोंका बाणप्रमाण आता है ॥ १५ ॥


एक्कादीरूवुत्तर अण्णोण्णगुणेहि हवइ जं लद्धं ।
रूवूणे आदिगुणं खेत्तादीणं कला गेया ॥ १६

अर्थ: एकको आदि लेकर एक-एक अधिक अंकोंको परस्पर गुणित करनेसे जो प्राप्त हो उसमेंसे एक कम करके आदिसे गुणित करनेपर प्राप्त राशि प्रमाण क्षेत्रादिकोंकी कलाओंका प्रमाण जानना चाहिये (?) ॥ १६ ॥


णउबिसदेहि विभत्तं दीवायामं बिहीण समसुण्णं । खेत्तादीणं णेया कलसंखा इच्छसंगुणिदा ॥ १७

अर्थ: नब्बेसे विभक्त करके दोनों राशियोंमें शून्यको अपवर्तित कर इच्छासे गुणित करनेपर क्षेत्रादिकी कलाओंका प्रमाण जानना चाहिये ॥ १७ ॥


इच्छगुणं विण्णेया भरहादिविदेहवंसपरियंता । एकादिदुगुणदुगुणा सत्तेव य होंति णिद्दिठ्ठा ॥ १८

अर्थ: भरत क्षेत्रको आदि लेकर विदेह क्षेत्र तक क्रमसे एकको आदि लेकर दूने दूने सात ही गुणकार बतलाये गये हैं, उन्हें इच्छागुणकार जानना चाहिये ॥ १८ ॥


उणवीसगुणं किच्चा पंचसया जोयणा य छव्वीसा । छच्चेव कलासहिदा कलसंखा होइ भरहस्स ॥ १९

अर्थ: पांच सौ छब्बीस योजनोंको उन्नीससे गुणा करके उसमें छह कला और मिलानेपर भरतक्षेत्रकी कलाओंकी संख्या प्राप्त होती है ॥ १९ ॥


चदुसुण्णएक्ककतियसत्तपण्णरएक्कतीस तेसट्ठी । भरहादिकला णेया उणवीसगदेहिं छेदेहिं ॥ २०

अर्थ: चार शून्योंके ऊपर एक, तीन, सात, पन्द्रह, इकतीस और तिरेसठके रखनेपर उन्नीस भागोंसे क्रमशः भरतादिककी कलाओंका प्रमाण जानना चाहिये, अर्थात् चार शून्य और एक अंक प्रमाण ( १०००००/१९ ) भरत, चार शून्य और तीन अंक प्रमाण ( ३०००००/१९ ) हिमवान्पर्वत, चार शून्य और सात अंक प्रमाण ( ७०००००/१९ ) हैमवत, चार शून्य और पन्द्रह अंक प्रमाण ( १५०००००/१९ ) महाहिमवान् पर्वत, चार शून्य और इकतीस अंक प्रमाण ३१०००००/१९ हरिवर्ष, तथा चार शून्य और तिरेसठ ( ६३०००००/१९ ) अंक प्रमाण निषध पर्वतकी कलाओंका प्रमाण जानना चाहिये ॥ २० ॥


धनुपठ्ठबाहुचूलीजीवाणं इसुगणाण दीवस्स । उणवीसभागभजिदे जे लद्धा ते कला णेया ॥ २१

अर्थ: द्वीपके धनुष्पृष्ठ, चाप, चूली, जीवा और बाण समूहोंको उन्नीस भागसे भाजित करनेपर जो लब्ध आवे उतनी कलायें जानना चाहिये ॥ २१ ॥


पण्णउठ्ठा तेसट्ठा इगितीसा तिपणसत्ततियएक्का । इसु होंति विदेहादो उणवीसदिभागेदससहस्सगुणा ॥ २२

अर्थ: उन्नीससे भाजित और दस हजारसे गुणित पंचानवै, तिरेसठ, इकतीस, तिगुने पाँच अर्थात् पन्द्रह, सात, तीन और एक अंक प्रमाण क्रमसे विदेहादिके बाण होते हैं ॥ २२ ॥


इसुरहिदं विक्खंभं इसुसंगुणिदं पुणो वि चदुगुणिदं । घेत्तूण वग्गमूलं लद्धा जीवा समुद्दिट्ठा ॥ २३

अर्थ: बाणसे रहित विष्कम्भको बाणसे गुणा करके पुनः चारसे गुणा करनेपर जो प्राप्त हो उसके वर्गमूल प्रमाण जीवा कही गई है ॥ २३ ॥


छहिं गुणिदं इसुवग्गं पक्खेवेदूण जीववग्गम्मि । धनुपठ्ठं णायव्वं लद्धं तव्वग्गमूलं तु ॥ २४

अर्थ: छहसे गुणित बाणके वर्गको जीवाके वर्गमें मिलाकर जो लब्ध हो उसका वर्गमूल निकालनेपर धनुष्पृष्ठका प्रमाण जानना चाहिये ॥ २४ ॥


विक्खंभपडंवचाणं वग्गविसेसस्स हवइ जं मूलं । अवणिय विक्खंभादो सेसस्स दलं इसुं जाणे ॥ २५

अर्थ: विष्कम्भ और प्रत्यंचा ( जीवा ) के वर्गको परस्पर घटाकर जो उसका वर्गमूल हो उसे विष्कम्भमेंसे घटाकर शेषको आधा करनेपर बाणका प्रमाण जानना चाहिये ॥ २५ ॥


चदुगुणइसुहि भजिदं जीवावग्गं पुणो वि इसुसहिदं ।
परिमंडलखेत्तस्स दु विक्खंभं होइ णायव्वं ॥ २६

अर्थ: चौगुणे बाणसे भाजित जीवाके वर्गमें पुनः बाणके मिलानेपर वृत्त क्षेत्रका विष्कम्भ जानना चाहिये ॥२६॥ उदाहरण - (१) भरत क्षेत्रका विष्कम्भ १००००/१९ ; उसकी जीवाका वर्ग ७५६००००००००/३६१ ; ७५६००००००००/३६१ ÷ ( १००००/१९ × ४ ) + १००००/१९ = १९०००००/१९ = १००००० यो. जम्बू द्वीपका विस्तार । (२) हैमवत क्षेत्रका विष्कम्भ ७००००/१९ , जीवाका वर्ग ५१२४००००००००/३६१ ; ५१२४००००००००/३६१ ÷ ( ७००००/१९ × ४ ) + ७००००/१९ = १९०००००/१९ = १००००० यो. वृत्त क्षेत्र जम्बू द्वीपका विस्तार ।


उग्गादेहि विहूणं उग्गाडचउक्कगुणिदं अवमत्थं ।
दीवस्स दु विक्खंभं जीवाकरणी वियाणाहि ॥ २७

अर्थ: अवगाह अर्थात् बाणसे रहित द्वीपके विष्कम्भको चौगुणे बाणसे गुणा करनेपर जीवाके वर्गका प्रमाण जानना चाहिये ॥ २७ ॥ उदाहरण - जम्बू द्वीपका विष्कम्भ १९०००००/१९ ; हैमवत क्षेत्रका बाण ७००००/१९ ; १९०००००/१९ - ७००००/१९ × ( ७००००/१९ × ४ ) = ५१२४००००००००/३६१ हैमवत क्षेत्रकी जीवाका वर्ग ।


छच्चेव य इसुवग्गं जीवाकरणीजुदं तु जं लद्धं ।
णेया तं धणुकरणी उद्दिट्ठं जिणवरिंदेहिं ॥ २८

अर्थ: छहगुणे बाणके वर्गको जीवाके वर्गमें मिलानेपर जो प्राप्त हो उतना जिनेन्द्र देवने धनुषके वर्गका प्रमाण कहा है ॥ २८ ॥ उदाहरण - हैमवत क्षेत्रकी जीवाका वर्ग ५१२४००००००००/३६१ ; उसका बाण ७००००/१९ ; ५१२४००००००००/३६१ + ( ७००००²/१९ × ६ ) = ५४१८००००००००/३६१ हैमवत क्षेत्रके धनुषका वर्ग ।


जीवावग्गविसोधियधणुवग्गादो हवेज्ज जं सेसं ।
बारसदलेहिं भजिदे इसुकरणी तं वियाणाहि ॥ २९

अर्थ: धनुषके वर्गमेंसे जीवाके वर्गको घटाकर जो शेष रहे उसमें बारहके दल अर्थात् छहका भाग देनेपर बाणके वर्गका प्रमाण जानना चाहिये ॥२९॥ उदाहरण - हैमवत क्षेत्रके धनुषका वर्ग ५४१८००००००००/३६१ ; उसकी जीवाका वर्ग ५१२४००००००००/३६१ ; ५४१८००००००००/३६१ - ५१२४००००००००/३६१ ÷ १२/२ = ४९००००००००/३६१ हैमवत क्षेत्रके बाणका वर्ग ।


अणुगुरुचावविसेसं सेसं दलिऊण हवइ जं लद्धं ।
बोद्धव्वा पस्सभुजा सव्वधणूाणं विणिद्दिट्ठा ॥ ३०

अर्थ: अणु अर्थात् छोटे चापको बड़े चापमेंसे घटाकर शेषको आधा करनेपर जो प्राप्त हो उसे सब धनुषोंकी पार्श्वभुजा निर्दिष्ट की गई समझना चाहिये ॥ ३० ॥ उदाहरण - दक्षिण भरतका चाप ९७६६ ६/१९ ; विजयार्धका चाप १०७४३ १६/१९ ; १०७४३ १६/१९ - ९७६६ ६/१९ = ९७७ १०/१९ ; ९७७ १०/१९ ÷ २ = ४८८ २९/३८ विजयार्धकी पार्श्वभुजा ।


जीवा गुरुअणुसुद्धा सेसदलं चूलिया समुद्दिट्ठा । जंबुद्दीवस्स तहा णायव्वा सव्वजीवाणं ॥ ३१

अर्थ: बड़ी जीवामेसे छोटी जीवाको घटानेपर जो शेष रहे उसके अर्ध भाग प्रमाण जम्बू द्वीपकी सब जीवाओंका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ३१ ॥ उदाहरण - दक्षिण भरतकी जीवा ९७४८ १२/१९, विजयार्धकी जीवा १०७२० ११/१९; १०७२० ११/१९ - ९७४८ १२/१९ ÷ २ = ४८५ १९/३८ विजयार्धकी चूलिका ।


भरहेरावयमज्झे वेअद्धा भूधरा समुत्तुंगा । रयदमया णायव्वा अणाइणिहणा समुद्दिट्ठा ॥ ३२

अर्थ: भरत क्षेत्रके मध्यमें और ऐरावत क्षेत्रके मध्यमें उन्नत, रजतमय, अनादिनिधन वैताढ्य पर्वत कहे गये जानना चाहिये ॥ ३२ ॥


पणुवीसा उब्बिद्धं पण्णासा जोयणा दु वित्थिण्णा । छहचेव य सक्कोसा अवगाढा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ३३

अर्थ: ये वैताढ्य पर्वत पच्चीस योजन ऊंचे, पचास योजन विस्तीर्ण और एक कोश सहित छह योजन अवगाहसे सहित हैं ॥ ३३ ॥


अडदाला सत्तसया णवसयसहस्साणि जोयणायामा । बारसकलाविसेसो वेअड्ढाणं तु दक्खिणदो ॥ ३४

अर्थ: दक्षिणकी ओर वैताढ्य पर्वतकी जीवाका प्रमाण नौ हजार सात सौ अड़तालीस योजन और बारह कला है ॥ ३४ ॥


बीसा सत्तसदाणि य दसयसहस्साणि उत्तरे पासे । बारह किंचूणकला पुव्वावरसलिलणिहिपुद्वा ॥ ३५

अर्थ: उत्तर पार्श्वभागमें आयाम अर्थात् जीवाका प्रमाण दस हजार सात सौ बीस योजन और कुछ कम बारह कला है । उक्त पर्वत पूर्व-पश्चिम समुद्रको छूते हैं ॥ ३५ ॥


चत्तारिसया गेया अडसीदा जोयणाणि पस्सभुजा । वेअड्ढाण णगाण य सुद्धा सोलस कला होंति ॥ ३६

अर्थ: वैताढ्य पर्वतोंकी पार्श्वभुजा चार सौ अठासी योजन और सार्ध सोलह कला प्रमाण जानना चाहिये ( देखिये गा. ३० का उदाहरण ) ॥ ३६ ॥


पंचेव जोयणसदा चउदसपरिहीणचूलिया गेया । भरहस्सेरवदस्से य वेअड्ढाणं समुद्दिट्ठा ॥ ३७

अर्थ: भरत और ऐरावत क्षेत्रके वैताढ्योंकी चूलिका चौदह कम पांच सौ ( ४८६ ) योजन प्रमाण जानना चाहिये ( देखिये गा. ३१ का उदाहरण ) ॥ ३७ ॥


दसदसजोयणभागा उवरिं गंतूण गिरिवराण तहा । दो दो सेढी पवरा वित्थिण्णा दसदसा गेया ॥ ३८

अर्थ: इन श्रेष्ठ पर्वतोंके ऊपर दस दस योजन जाकर दस दस योजन विस्तीर्ण दो दो उत्तम श्रेणियां हैं ॥ ३८ ॥


दक्खिणवरसेढीए पण्णास पुरवरा समुद्दिट्ठा । णाणाविहरयणमया सट्ठी पुणु उत्तरे पासे ॥ ३९

अर्थ: इनमेंसे दक्षिण श्रेणीमें पचास और उत्तर पार्श्वभागमें साठ श्रेष्ठ नगर कहे गये हैं । ये नगर नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित हैं ॥ ३९ ॥


विज्जाहराण णयरा अणाइणिहणा सहावनिप्पण्णा । रयणमया विउलणिलया संवेदिया तोरणाडोवा ॥ ४०

अर्थ: ये विद्याधरोंके दो सौ नगर अनादि-निधन, स्वभावनिष्पन्न अर्थात् अकृत्रिम, वेदिकाओंसे सहित, और तोरणोंके आटोपसे युक्त हैं ॥ ४० ॥ उक्त नगर बन-


उववणकाणणसहिया पोक्खरिणीवाविकूविणसणाहा। जिणसिद्धभवणणिवहा को सकइ वण्णिउं सयलं ॥४१

अर्थ: उपवनोंसे सहित; पुष्करिणी, वापी एवं वापिणियोंसे सनाथ, तथा जिनों व सिद्धोंके भवनसमूहसे संयुक्त हैं। इनका सम्पूर्ण वर्णन करनेके लिये कौन समर्थ है ? ॥ ४१ ॥


तत्तो दस उप्पइया दसजोयणवित्थडा मुणेयव्वा। अभियोगाणं णयरा णाणामणिकिरणपरिणामा ॥ ४२

अर्थ: विद्याधरश्रेणियोंसे दस योजन ऊपर जाकर वन-उपवनोंसे सहित, दस योजन विस्तृत और नाना मणियोंके किरणोंके परिणाम स्वरूप आभियोग्य देवोंके नगर हैं ॥ ४२ ॥


रयणमयवेदिसहिदा वरगोउरभासुरा रयणचित्ता। मणिमयवरपासादा सब्वे सोहंति ते विमला ॥ ४३

अर्थ: रत्नमय वेदिसमूहसे सहित, उत्तम गोपुरोंसे भास्वर, रत्नोंसे विचित्र और मणिमय उत्तम प्रासादोंसे संयुक्त वे सब निर्मल नगर शोभायमान हैं ॥ ४३ ॥


वरकप्परुक्खणिवहा णाणाविहतरुगणेहिं कयसोहा। वावीतडायपउरा वरचेइयभवणसंछण्णा ॥ ४४

अर्थ: उक्त नगर उत्तम कल्पवृक्षोंके समूहसे सहित, अनेक प्रकारके तरुगणोंसे शोभायमान, प्रचुर वापियों व तालाबोंसे संयुक्त, और उत्तम चैत्यालयोंसे व्याप्त हैं ॥ ४४ ॥


सोधम्मीसाणाणं देवाणं वाहणा सुरा होंति। दोसु वि सेढीसु तहा देवा वररूवसंपण्णा ॥ ४५

अर्थ: इन दोनों ही श्रेणियोंमें रहनेवाले वे देव उत्तम रूप युक्त सौधर्म एवं ईशान इन्द्रके वाहन जातिके देव हैं ॥ ४५ ॥


जोयणपंचुप्पइया तत्तो अभिजोगपुव्वरेहिंतो । दसजोयणवित्थिण्णा वेदड्ढणगाण वरसिहरा ॥ ४६

अर्थ: उन अभियोग्यपुरोंसे पांच योजन ऊपर जाकर दस योजन विस्तीर्ण वैताढ्य पर्वतोंके उत्तम शिखर हैं ॥ ४६ ॥


तियसेंदिचावसरिसा णिम्मलबाळिंदुभासुराडोवा। वरवेदीपरिक्खित्ता मणितोरणभासुरा रम्मा ॥ ४७

अर्थ: इन्द्रधनुषके सदृश रमणीय वे शिखर निर्मल बाल चन्द्रके समान भास्वर, उत्तम वेदियोसे वेष्टित, और मणितोरणोंसे शोभायमान हैं ॥ ४७ ॥


तम्मि समभूमिभागे णाणामणिविफ्फुरंतकिरणम्मि । होंति णव चेव कूडा कंचणमणिमंडिया दिव्वा ॥ ४८

अर्थ: नाना मणियोंकी प्रकाशमान किरणोंसे संयुक्त उस समभूमिभागमें सुवर्ण एवं मणियोंसे मण्डित दिव्य नौ कूट हैं ॥ ४८ ॥


पढमा य सिद्धकूडा पुव्वेण य होंति सव्वकूडाणं । बिदिया य भरहकूडा तदिया खंडप्पवादा य ॥ ४९

चउत्था य माणिभद्दा वेदङ्कुमार पंचमा कूडा । छट्ठा य पुण्णभद्दा तिमिसगुहा सत्तमा कूडा ॥ ५०

अट्ठम य भरहकूडा णवमं वेसमणं तुंगवरकूडा । छज्जोयण सक्कोसा उच्छेहा होंति ते सव्वे ॥ ५१

अर्थ (गाथा 49 से 51): उनमें सब कूटोंके पूर्वकी ओरसे प्रथम सिद्धकूट, द्वितीय भरतकूट, तृतीय खण्डप्रपात, चतुर्थ मणिभद्र, पंचम वैताढ्यकुमारकूट, छठा पूर्णभद्र, सातवां तिमिश्रगुहाकूट, आठवां भरतकूट और नौवां वैश्रवण नामक उन्नत उत्तम कूट है । ये सब कूट एक कोश सहित छह योजन ऊंचे हैं ॥ ४९-५१ ॥


विक्खंभायामेण य छहच्चेव य जोयणा सकोसा य । मूले हवंति कूडा वेदड्ढाणं समुद्दिद्धा ॥ ५२

मज्झे चत्तारि हवे अड्डाइज्जा य कोसपरिसंखा। उवरिं तिण्णेव भवे जोयणसंखा विणिद्दिट्ठा ॥ ५३

अर्थ (गाथा 52 से 53): वैताढ्य पर्वतोंके ये कूट विष्कम्भ व आयामसे भी मूलमें एक कोश सहित छह योजन, मध्यमें अढाई कोश सहित चार योजन तथा ऊपर तीन योजन प्रमाण निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ५२-५३ ॥ उक्त कूटोंकी परिधियां


मूलेसु होंति वीसा पण्णारस ऊणिया दु मज्झेसु ।
सिहरेसु णवे विसेसा जोयणसंख्या दु परिरिहो ॥ ५४

अर्थ: मूलमें कुछ कम बीस योजन, मध्यमें कुछ कम पन्द्रह योजन तथा ऊपर साधिक नौ योजन प्रमाण हैं ॥ ५४ ॥


पासादवलयगोउरधवलामलवेदियापरिक्खित्ता ।
देवाण होंति णगरा वेदड्ढणगाण सिहरेसुं ॥ ५५

अर्थ: वैताढ्य पर्वतोंके शिखरोंपर प्रासादवलय, गोपुर और धवल एवं निर्मल वेदिकासे वेष्टित देवोंके नगर हैं ॥ ५५ ॥


कूडेसु होंति दिव्वा जिणभवणा विप्फुरंतमणिकिरणा ।
अमराण चारुभवणा कीडनसाला विसाला य ॥ ५६

अर्थ: कूटोंपर चमकते हुए मणिकिरणोंसे सहित दिव्य जिनभवन व देवोंके सुन्दर भवन और विशाल क्रीडनशालायें हैं ॥ ५६ ॥


मरगयमुणालवण्णा गोरोयणकमलकुसुमसंकासा ।
गोखीरसंखवण्णा भिण्णंजणसच्छहा पवरा ॥ ५७

ससिकुमुदहेमवण्णा असोयपुण्णायबउलसमतेया ।
वरवज्जणीलविद्दुमणाणाविहरयणपरिणामा ॥ ५८

अर्थ (गाथा 57 से 58): ये जिनभवन मरकत व मृणालके सदृश वर्णवाले, गोरोचन व कमलपुष्पके सदृश; गोक्षीर व शंख जैसे वर्णवाले भिन्न अंजनके सदृश; चन्द्र, कुमुद व सुवर्णके समान वर्णवाले; अशोक, पुन्नाग व बकुलके सदृश तेजवाले [ वनोंसे वेष्टित ]; तथा उत्तम वज्र, नीलमणि, विद्रुम एवं नाना प्रकारके रत्नोंके परिणाम स्वरूप हैं ॥ ५७-५८ ॥


गाउअ आयामेण य गाउदद्धद्धा हवंति वित्थिण्णा ।
गाउदचउभागूणा उच्चेहा दिव्वजिणभवणा ॥ ५९

अर्थ: उक्त दिव्य जिनभवनोंका आयाम एक कोश, विस्तार आध कोश और ऊंचाई एक चतुर्थ भागसे कम एक कोश प्रमाण है ॥ ५९ ॥


कंचणमणिपायारा अट्टालय रयणतोरणा णेया ।
वलहीमंडवपउरा अणोवमा रूवसंठाणा ॥ ६०

अर्थ: उक्त जिनभवन सुवर्ण एवं मणिमय प्राकारोंसे सहित, अट्टालय व रत्नतोरणोंसे संयुक्त, प्रचुर छज्जों व मण्डपोंसे युक्त और अनुपम रूप व आकारवाले हैं ॥ ६० ॥


वरवज्जकवाडजुदा गोउरदारेहिं सोहिया रम्मो ।
जिणसिद्धबिंबणिवहा अकिट्टिमा रयणपरिणामा ॥ ६१

अर्थ: उक्त जिनभवन वज्रमय उत्तम कपाटोंसे युक्त, गोपुरद्वारोंसे शोभित, रमणीय, जिनबिम्ब व सिद्धबिम्बोंसे सहित, अकृत्रिम और रत्नोंके परिणाम रूप हैं ॥ ६१ ॥


भिंगारकलसदप्पणवरचामरमंडिया परमरम्मा ।
घंटापडायपउरा सुगंधगंधुद्धए रम्मा ॥ ६२

लंबंतकुसुमदामा णाणाकुसुमोवहारकयसोहा ।
चारणमुणिगणसहिया तियसंदणमंसिया रम्मा ॥ ६३

वजिंदणीलमरगयकक्केयणपउमरायकयसोहा ।
कंचणपवालवेरुलिए णाणामणिरयणसंछण्णा ॥ ६४

अर्थ (गाथा 62 से 64): ये नित्य जिनभवन भृंगार, कलश, दर्पण व उत्तम चामरोंसे मण्डित; अतिशय रमणीय, प्रचुर घंटा व पताकाओंसे सहित, सुगन्धसे व्याप्त, रमणीय, लटकती हुई पुष्पमालाओंसे संयुक्त, नाना कुसुमोंके उपहारसे शोभायमान, चारण मुनिगणोंसे सहित, इन्द्रोंसे नमस्कृत, रमणीय, वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन एवं पद्मराग मणियोंसे की गई शोभासे सम्पन्न सुवर्ण, प्रबाल व वैडूर्य आदि नाना प्रकारके मणियों व रत्नोंसे व्याप्त; भेरी, मृदंग, मर्दल,


भंभामुदिंगमद्दलजयघंटो कंसतालसंजुत्ता । पडुपडहसंखकाहलबरदुंदुहिसद्दगंभीरा ॥ ६५

संगीयणट्टसाला अहिसयसभाधरा परमरम्मा । कीडणसाला विउला णाणाविहरुवसंठाणा ॥ ६६

पुण्णागनायचंपयअसोयबउलादिदिव्वरुक्खेहिं । उज्जाणेहिं समंता सोहंता णियजिणभवणा ॥ ६७

अर्थ (गाथा 62 से 67): जयघंटा व कंसतालोंसे संयुक्त; पटु पटह, शंख, काहल एवं उत्तम दुंदभी बाजोंके शब्दसे गम्भीर; संगीतशाला, नृत्यशाला व अभिषेकसभा गृहोंसे अतिशय रमणीय; विस्तृत क्रीडनशालाओंसे सहित, नाना प्रकारके रूप व आकारोंवाले; तथा चारों ओर पुन्नाग, नाग, चम्पक, अशोक और बकुल आदि दिव्य वृक्षोंवाले, उद्यानोंसे शोभायमान हैं ॥ ६२-६७ ॥


कमलोयरवण्णाभा णिम्मलससिकिरणहारसंकासा । वियसियचंपयवण्णा णीलुप्पलसच्छहा केई ॥ ६८

अर्थ: इनमेंसे कितने ही कमलोदरवर्णकी आभावाले, कितने ही निर्मल चन्द्रकिरण एवं हारके सदृश, कितने ही विकसित चम्पकपुष्पके समान वर्णवाले, और कितने ही नील कमलके सदृश हैं ॥ ६८ ॥


कमलुप्पल संछण्णा पउमिणिसंडेहिं मंडिया दिव्वा । विज्जाहरसुरमहिया गरुडोरयजक्खकयपूया ॥ ६९

अमलियकोरंटणिभा पाराबय मोरकंठसंकासा । मरगयपवालवण्णा दिणयरकिरणप्पहा य वरा ॥ ७०

बोसट्ठरयणमाला मुत्तामणिहेमजालकयसोहा । गोसीसमलयचंदणकालायरुधूमगंधड्ढा ॥ ७१

सुरइयदेवच्छंदा चीणं सुयपट्टसुत्तणिवहेहिं । णाणाविहवण्णेहि य वत्थसुमालाहि सोहंता ॥ ७२

बलिगंधपुप्फपउरा मणिमयवरदीवियादिदित्ता । णाणाविहरूवेहि य विहाणणिवहेहि सोहंति ॥ ७३

अर्थ (गाथा 69 से 73): कमल व उत्पलोंसे व्याप्त, पद्मिनीसमूहोंसे मण्डित, दिव्य, विद्याधरों एवं देवोंसे पूजित; गरुड, उरग एवं यक्षों द्वारा रची गई पूजाको प्राप्त; निर्मल कोरंट वृक्षके सदृश, कबूतर व मयूरके कण्ठके सदृश, मरकत व प्रबाल जैसे वर्णवाले, सूर्यकिरणोंके सदृश प्रभावले, श्रेष्ठ, विकसित रत्नमालाओंसे सहित; मुक्ता, मणि व सुवर्णजालसे की गई शोभाको प्राप्त; गोशीर, मलय चन्दन और कालागरुके धुएंके गन्धसे व्याप्त; नाना प्रकारके वर्णवाले चीनांशुक ( रेशम ), पट्ट ( कोश ) व सूतसे रचे गये देवच्छन्दसे सहित, वस्त्र एवं मालाओंसे शोभायमान; प्रचुर बलि, गंध एवं पुष्पोंसे युक्त और मणिमय उत्तम दीपादिकोंसे देदीप्यमान वे जिनभवन नाना प्रकारके रूपोंवाले साधनसमूहोंसे शोभायमान हैं ॥ ६९-७३ ॥


एवं वेदड्डेसु य जिणभवणा वण्णिदा समासेण । अवसेसाण णगाणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ ७४

अर्थ: इस प्रकार वैताढ्य पर्वतोंपर स्थित जिनभवनोंका संक्षेपसे वर्णन किया गया है। यही क्रम शेष पर्वतोंपर स्थित जिनभवनोंका भी जानना चाहिये ॥ ७४ ॥


छत्तत्तयसिंहासनवरचामरकुसुमवरिससंपण्णा। भामंडलादिसहिदा जिणपडिमाओ णमंसामि ॥ ७५

अर्थ: तीन छत्र, सिंहासन उत्तम चामर और कुसुमवृष्टिसे सम्पन्न तथा भामण्डलादिसे सहित जिनप्रतिमाओंको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७५ ॥


बेगाउयवित्थिण्णा दोसु वि पासेसु पव्वदायामा । वेदड्ढाणं णगाणं वणसंडा होंति णिद्दिठ्ठा ॥ ७६

अर्थ: वैताढ्य पर्वतोंके दोनों ही पार्श्वभागोंमें पर्वतोंके बराबर लंबे और दो कोश विस्तीर्ण वनखण्ड निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ७६ ॥


बेगाउदउव्विद्धा पंचधणुस्सयपमाणवित्थिण्णा । णाणातोरणणिबहा वरवेदिविभूसिया रम्मा ॥ ७७

अर्थ: ये रम्य वनखण्ड दो कोश ऊंची, पांच सौ धनुष प्रमाण विस्तीर्ण, और नाना तोरणसमूहोंसे संयुक्त ऐसी उत्तम वेदिकासे विभूषित हैं ॥ ७७ ॥


पणसंबतालदाडिमअसोयपुण्णायणायरूक्खेहिं । वरबउलतिलयचंपयकुंकुमकप्पूरणिवहेहिं ॥ ७८

एलातमालचंदणलवंगकंकोलकुंदणिवहेहिं । णारंगतुंगलवलीसज्जज्जणकुडवजादीहिं ॥ ७९

पूगफलरत्तचंदणधवधम्मणालिकेरकदलीहिं । आसत्थतालतिंदुगणगोहेपलासपउरेहिं ॥ ८०

कंचणकयंबकेयइकण्णावरकसायकुज्जयादीहिं । णाणावणगुंछेहिं य उज्जाणवण्णा विरायंति ॥ ८१

अर्थ (गाथा 78 से 81): ये उद्यानवन पनस, आम्र, ताल दाडिम, अशोक, पुन्नाग और नाग वृक्षोंसे; उत्तम बकुल, तिलक, चम्पक, कुंकुम और कर्पूर वृक्षोंके समूहोंसे; एला, तमाल, चन्दन, लवंग, कंकोल ( शीतलचीनी ) व कुंद वृक्षोंके समूहोंसे; नारंगी, तुंग (पुन्नाग), लवली, सर्ज, अर्जुन, कुटज व जाति ( चमेली या जावित्र ) के वृक्षोंसे; पूगफल (सुपाड़ी), रक्त चंदन, धव, धम्मण, नारियल, कदली, अश्वत्थ, ताल, तेंदू, न्यग्रोध, पलाश, कांचन ( कचनार ? ), कदंब, केतकी, कणवीर ( कनेर ), कषाय और कुब्जक आदि नाना वनवृक्षोंसे विराजमान हैं ॥ ७८-८१ ॥


कल्हारकमलकंदलणीलुप्पलफुल्लियाहि विउलाहिं । सोहंति सरवरेहि य वप्पिणवावीहि पउराहिं ॥ ८२

अर्थ: ये वन कल्हार, कमल, कन्दल और नीलोत्पल फूलोंसे सहित; विपुल सरोवरों तथा प्रचुर वप्रिण ( नहर ) एवं वापियोंसे शोभायमान हैं ॥ ८२ ॥


सव्वेसु वणेसु तहा विंतरदेवाण होंति वरणयरा । पायारगोउरजुत्ता णाणामणिरयणपासाया ॥ ८३

अर्थ: सब वनोंमें प्राकार व गोपुरोंसे युक्त और नाना मणिमय एवं रत्नमय प्रासादोंसे सहित व्यन्तर देवोंके श्रेष्ठ नगर हैं ॥ ८३ ॥


सत्ततला विण्णेया कंचणमणिरयणमंडिया दिव्वा । मणिगणजलंतथंभा णीलुप्पलकमलगब्भाहो ॥ ८४

अर्थ: उक्त व्यन्तरनगर सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे मण्डित; दिव्य मणिसमूहसे चमकते हुए स्तम्भोंसे सहित, तथा नीलोत्पल व कमलगर्भके समान आभासे संयुक्त सात तलोंवाले जानना चाहिये ॥ ८४ ॥ इनमेंसे कितने ही प्रासाद कुंकुमवर्ण,


केई कुंकुमवण्णा कुंदेंदुतुसारहारसंकासा । केई सिंदूराहा वियसियणीलुप्पलच्छाया ॥ ८५

सयवत्तगब्भवण्णा गोरोयणकुसुमजादिसंकासा । णिद्धंतकणयवण्णा दिणयरकिरणप्पभा केई ॥ ८६

सव्वे अकिट्टिमा खलु जिणिंदभवणेहि सोहिया रम्मा । वितरणयरा दिव्वा को सक्कइ वण्णिउं सयलं ॥ ८७

अर्थ (गाथा 85 से 87): कितने ही कुंद पुष्प, चन्द्र, तुषार व हारके सदृश, कितने ही सिन्दूरके समान कान्तिवाले, कितने ही विकसित नीलोत्पलके समान शोभावाले, कितने ही शतपत्र (कमल) के गर्भके समान वर्णवाले, कितने ही गोरोचन, कुमुद व जाति (चमेली) के सदृश, कितने ही निर्द्धान्त अर्थात् निर्मल सुवर्णके समान वर्णवाले, तथा कितने ही सूर्यकिरणों जैसी प्रभासे सहित हैं। ये सब रमणीय दिव्य व्यन्तरनगर अकृत्रिम व जिनेन्द्रभवनोंसे शोभित हैं। इन नगरोंका समस्त वर्णन करनेके लिये कौन समर्थ है ? ॥ ८५-८७ ॥


अट्ठेव य उच्चिद्वा पंचासा जोयणा हवे दीहा । बारह वित्थारेण य महागुहा होंति दो दो दु ॥ ८८

अर्थ: वैताढ्य पर्वतोंमें आठ योजन ऊंची, पचास योजन दीर्घ और बारह योजन विस्तृत दो दो महागुफायें हैं ॥ ८८ ॥


पुव्वेण होंति तिमिसा खंडपवादा य होंति पच्छिमदो । वरवज्जकवाडजुदा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ ८९

अर्थ: इनमें वज्रमय उत्तम कपाटोंसे संयुक्त एवं नाना मणियों व रत्नोंके परिणामरूप तिमिस्र गुफा पूर्वमें और खंडप्रपात गुफा पश्चिममें है ॥ ८९ ॥


जमलकवाडा दिव्वा छच्चेव य जोयणा दु वित्थिण्णा । अट्ठेव य उच्चिद्वा बेदड्ढाणं विणिद्दिट्ठा ॥ ९०

अर्थ: वैताढ्योंकी उन उभय गुफाओंके दिव्य युगल कपाट आठ योजन ऊंचे और छह योजन विस्तीर्ण कहे गये हैं ॥ ९० ॥


गंगादी सरियाओ दूरेण य संकुडित्तु दाराणं । रंधेसु पइट्ठाओ णागिणियाओ जहा धरणिं ॥ ९१

अर्थ: जिस प्रकार नागिनियां पृथिवीमें प्रवेश करती हैं उसी प्रकार गंगादिक नदियां दूरसे ही संकुचित होकर उन द्वारोंके छेदोंमें प्रविष्ट हुई हैं ॥ ९१ ॥


पण्णास समधिरैया गंत्तूणं जोयणाणि तेसु पुणो । रंधमुहणिग्गदाओ णागीव जहा बिलमुहादो ॥ ९२

अर्थ: उक्त नदियां गुफाओंमें पचास योजनसे कुछ अधिक जाकर बिलमुखसे नागिनीके समान गुफामुखसे निकली हैं ॥ ९२ ॥


गंगासिंधू सरिया अट्ठेव य जोयणाणि वित्थिण्णा । पव्वदगुहासु दिव्वा गच्छंतीओ विरायंति ॥ ९३

अर्थ: आठ योजन विस्तीर्ण होकर पर्वतोंकी गुफाओंमें जाती हुई वे दिव्य गंगा-सिंधू नदियां शोभायमान होती हैं ॥ ९३ ॥


वणवेदीपरिखित्ता वरतोरणमंडिया परमरम्मा । पविसित्तु वुत्तरेहिं य दक्खिणदारेहि णिग्गंति ॥ ९४

अर्थ: वन व वेदियोंसे वेष्टित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित और अतिशय रमणीय ये गंगा-सिंधू नदियां उत्तर द्वारोंसे प्रवेश करके दक्षिण द्वारोंसे बाहर निकलती हैं ॥ ९४ ॥ उनमेंसे प्रत्येक गुफामें दो दो योजन दीर्घ दो दो नदियां हैं, जो गंगा-सिंधूमें


एक्केक्कम्मि गुहम्मि दु दो दो दु हवंति तत्थ सरिदाओ ।
दो दो जोयणदीहा गंगासिंधूसु पविसंति ॥ ९५

अर्थ: प्रवेश करती हैं ॥ ९५ ॥


वेदड्ढवरगुहेसु य पणुवीसं जोयणाणि गंतूण ।
पुव्वावरायदाओ सरियाओ होंति णिद्दिद्धा ॥ ९६

अर्थ: वैताढ्य पर्वतोंकी उन उत्तम गुफाओंमें पच्चीस योजन जाकर पूर्व-पश्चिम आयत उक्त नदियां हैं, ऐसा निर्देश किया गया है ॥ ९६ ॥


णगगुहकुंडविणिग्गयमणितोरणमंडिया परमरम्मा ।
वड्ढइरयणविणिम्मियसंकमपहुदीहिं वित्थिण्णा ॥ ९७

वणवेदीपरिरित्ता उम्मग्गणिमग्गसलिलणामाओ ।
सव्वेसिं णायव्वा वेदड्ढगुहाण सरिदाओ ॥ ९८

अर्थ (गाथा 97 से 98): पर्वतकी गुफाओंके कुण्डोंसे निकली हुई, मणितोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, बाढ़ई रत्नसे निर्मित संक्रम ( पुल ) आदिसे सहित, विस्तीर्ण और वनवेदियोंसे वेष्टित उन्मग्नसलिला व निमग्नसलिला नामक नदियां सब वैताढ्य पर्वतोंकी गुफाओंमें जानना चाहिये ॥ ९७-९८ ॥


भरहस्स दु विक्खंभो विक्खंभंविहूणरुप्पसेलस्स ।
सेसद्धं इसु जाणे बेसय अडतीसे तिण्णि कला ॥ ९९

दक्खिणभरहे णेया उत्तरभरहे य होंति तावदिया ।
जोयणगणे णेया पमाणगणगेहिं णिद्दिद्धा ॥ १००

अर्थ (गाथा 99 से 100): भरतक्षेत्रके विस्तारमेंसे विजयार्धके विस्तारको कम करके शेषको आधा करनेपर [ ( १००००/१९ - ९५०/१९ ) ÷ २ ] = ४५२५/१९ = २३८ ३/१९ यो.) दो सौ अड़तीस योजन और तीन कला प्रमाण दक्षिण भरतका बाण ( विस्तार ) जानना चाहिये । इतना ही विस्तार उत्तर भरतका भी है । यह योजनोंकी संख्या प्रमाणगणकों द्वारा निर्दिष्ट की गई है ॥ ९९-१०० ॥


अडदाला सत्तसया णवयसहस्साणि होंति णिद्दिद्धा ।
दक्खिणभरहे जीवा बारसभागा य सविसेसा ॥ १०१

अर्थ: दक्षिण भरतकी जीवा नौ हजार सात सौ अड़तालीस योजन और बारह भागोंसे कुछ अधिक कही गयी है [ √ १००००० - ४५२५/१९ × ४५२५/१९ × ४ = ९७४८ १२/१९ ] ॥ १०१ ॥


छावठ्ठा सत्तसया णवयसहस्साणि जोयणा णेया ।
समहियएकक्कला पुणु दक्खिणभरहस्स धणुपट्ठं ॥ १०२

अर्थ: दक्षिण भरतका धनुपृष्ठ नौ हजार सात सौ छ्यासठ योजन और एक कलासे कुछ अधिक जानना चाहिये [ √ १८५२२४/१९ + ( ४५२५²/१९ × ६ ) = ९७६६ १/१९ ] ॥ १०२ ॥


बावीसा सत्तसया दसरयसहस्साणि जोयगा णेया ।
बारस किंचूण कला उत्तरभरहस्स दीहत्तं ॥ १०३

अर्थ: उत्तर भरत ( विजयार्ध ) की दीर्घता ( जीवा ) दश हजार सात सौ बाईस [ बीस ] योजन और बारह कला ( १०७२० १२/१९ ) स कुछ कम जानना चाहिये ॥ १०३ ॥


तेदालो सत्तसया दसयसहस्साणि पण्णरस भागा। किंचिविसेसेणधिया उत्तरभरहस्स धणुपुट्ठं ॥ १०४

अर्थ: उत्तर भरत ( विजयार्ध ) का धनुषपृष्ठ दश हजार सात सौ तेतालीस योजन और पन्द्रह भागोंसे ( १०७४३ १५/१९ ) कुछ अधिक है ॥ १०४ ॥


जोयणसयउव्विद्धो पण्णासा वित्थडा समुद्दिठ्ठा। वसहगिरिणामधेया कंचणमणिरयणपरिणामा ॥ १०५

वणवेदियपरिखित्ता णाणाविहतोरणेहि कयसोहा। उज्जाणभवणणिवहा जिणचेइयमंडिया रम्मा ॥ १०६

चक्कहरमाणमहणा णाणाचक्कीण णामसंछण्णा। उत्तरभरहद्धेसु य मज्झिमखंडेसु ते होंति ॥ १०७

अर्थ (गाथा 105 से 107): उत्तर भरतार्धोंमें मध्यम खण्डोंके भीतर सौ योजन ऊंचे, पचास योजन विस्तृत; सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके परिणामरूप; वनवेदीसे वेष्टित, नाना प्रकारके तोरणोंसे शोभायमान, उद्यानों एवं भवनोंके समूहसे सहित, जिनचैत्योंसे मण्डित, चक्रवर्तियोंके अभिमानको नष्ट करनेवाले, और नाना चक्रवर्तियोंके नामोंसे व्याप्त वृषभगिरि नामक रमणीय पर्वत हैं ॥ १०५-१०७ ॥


भरहस्स जहा दिट्ठो तहेव एरावयस्स बोधव्वा। सव्वेसिं खेत्ताणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ १०८

अर्थ: जैसे भरत क्षेत्रकी प्ररूपणा की गई है वैसे ही ऐरावतकी भी जानना चाहिये । शेष सब क्षेत्रोंका यही क्रम समझना चाहिये । अर्थात् ऐरावतका वर्णन भरतके समान, हैरण्यवतका वर्णन हैमवतके समान, रम्यकका वर्णन हरिके समान, तथा उत्तरकुरुका वर्णन देवकुरुके समान है ॥ १०८ ॥


जह खेत्ताणं दिट्ठा दीवाणं तह य होइ विण्णेया। वेदीणदीजभाणं वसाणं वण्णणा तह य ॥ १०९

अर्थ: जिस प्रकारसे जम्बूद्वीपादिक द्वीपोंके क्षेत्रोंका वर्णन किया गया है उसी प्रकार वेदी, नदी, पर्वत और क्षेत्रोंका भी वर्णन जानना चाहिये ॥ १०९ ॥


सव्वभरहाण णेया मज्झिमखंडेसु कालसमयाणि। छच्चेव होंति दिव्वा तहेव एरावदाणं तु ॥ ११०

अर्थ: सब भरतक्षेत्रोंके मध्यम खण्डोंमें छह ही कालसमय जानना चाहिये। उसी प्रकार ऐरावत क्षेत्रोंके मध्यम खण्डोंमें भी दिव्य छह ही काल होते हैं ॥ ११० ॥


सुसमसुसमा य सुसमा सुसमदुसमा य होंति णिद्दिठ्ठा। दुस्समसुसमा दुसमा दुस्समदुसमा य विण्णेया ॥ १११

अर्थ: सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुषमा, दुषमसुषमा, दुषमा और दुषमदुषमा, ये उन छह कालोंके नाम जानना चाहिये ॥ १११ ॥


चत्तारि सागरोवमकोडाकोडी हवंति णिद्दिठ्ठा। सुसमसुसमा य कालो बोद्धव्वो आणुपुव्वीये ॥ ११२

सुसमा तिण्णेव हवे सुसमदुसमा य विण्णि णिद्दिठ्ठा। दुस्समसुसमा एका बायालसहस्सवरिसूणा ॥ ११३

दुस्समकालो णेओ इगिवीससहस्स हवइ परिसंखा। दुस्समदुसमस्स तहा इगिवीससहस्सवासाणं ॥ ११४

अर्थ (गाथा 112 से 114): अनुक्रमसे सुषमसुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागरोपम, सुषमा तीन कोड़ाकोड़ी सागरोपम, सुषमदुषमा दो कोड़ाकोड़ी सागरोपम, दुषमसुषमा ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम, दुषमा काल इक्कीस हजार वर्ष तथा दुषमदुषमा काल भी इक्कीस हजार वर्ष प्रमाण जानना चाहिये ॥ ११२-११४ ॥ उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी इन दोनोंमेंसे एक


सायरकोडाकोडी दससंगुण एक्ककालपरिसंखा ।
उवसप्पिणि अवसप्पिणि विण्णि वि वीसा हवे कप्पो ॥ ११५

अर्थ: कालका प्रमाण दशसे गुणित एक कोड़ाकोड़ी सागर अर्थात् दश कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। इन दोनोंको मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण एक कल्प होता है ॥ ११५ ॥


सव्वविदेहेसु तहा सबरपुलिंदाण पंचखंडेसु ।
एक्को चउत्थसमओ विज्जाहरसव्वणयरेसु ॥ ११६

अर्थ: सब विदेहोंमें, शबर व पुलिन्दों ( म्लेच्छों ) के पांच खण्डोंमें, तथा विद्याधरोंके सब नगरोंमें एक चतुर्थ काल रहता है ॥ ११६ ॥


उत्तरकुरुसु पढमो कालो सव्वेसु हवइ णिद्दिठ्ठो ।
हेमवदेसु य तदिओ तहेव हेरण्णवासेसु ॥ ११७

अर्थ: सब उत्तरकुरुओंमें प्रथम काल तथा हैमवत और हैरण्यवत क्षेत्रोंमें तृतीय काल निर्दिष्ट किया गया है ॥ ११७ ॥


हरिरम्मगवरिसेसु य बिदिओ कालो जिणेहि पण्णत्तो ।
सव्वाणं खेत्ताणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ ११८

अर्थ: हरिवर्ष और रम्यक वर्षोमें जिन भगवान्के द्वारा द्वितीय काल कहा गया है। [ अढ़ाई द्वीपोंके ] सब क्षेत्रोंका यही क्रम समझना चाहिये ॥ ११८ ॥


पढमम्मि कालसमए छव्वेव य धणुसहस्सउच्चुंगा ।
तिण्णिपलिदोवमाऊ णराण णारीण बोद्धव्वा ॥ ११९

अर्थ: पहिले कालके समयमें नर-नारियोंकी ऊंचाई छह हजार धनुष और आयु तीन पल्योपम प्रमाण जानना चाहिये ॥ ११९ ॥


जमलजमला पसूया वरलक्खणवंजणेहि संजुत्ता ।
बदरपमाणाहारा अट्ठमभत्तेहि पारेंति ॥ १२०

अर्थ: इस कालमें युगल युगल स्वरूपसे उत्पन्न, उत्तम लक्षण व व्यंजनोंसे सहित, और बेरके बराबर आहार करनेवाले नर-नारी अष्टमभक्तसे अर्थात् तीन दिनके अन्तरसे भोजन करते हैं ॥ १२० ॥


बिदियम्मि कालसमये चत्तारिसहस्स होंति चावाणि ।
बे पलिदोवम आऊ मणुयाणं दिव्वरूवाणं ॥ १२१

अर्थ: द्वितीय कालके समयमें दिव्य रूपवाले मनुष्योंकी ऊंचाई चार हजार धनुष और आयु दो पल्योपम प्रमाण होती है ॥ १२१ ॥


हरडाफलपरिमाणं आहारं दिव्वसाउसंपण्णं ।
छट्ठमभत्तेण णरा भुंजंति य साउकलिदाणि ॥ १२२

अर्थ: इस कालमें मनुष्य हरड फलके बराबर दिव्य स्वादसे संपन्न आहारको षष्ठभक्त अर्थात् दो दिनके अन्तरसे ग्रहण करते हैं ॥ १२२ ॥


तदियम्मि कालसमये बे चेव सहस्स होंति चावाणि ।
आमलयमाणाहारा चउत्थभत्तेण पारेंति ॥ १२३

अर्थ: तृतीय कालके समयमें शरीरकी ऊंचाई दो हजार धनुष होती है। आंवलेके बराबर आहार करनेवाले मनुष्य वहां चतुर्थभक्त अर्थात् एक दिनके अन्तरसे भोजन करते हैं ॥ १२३ ॥


णरणारिगणा तहया उत्तमरूवा कसायपरिहीणा ।
वरवइरसुसंघयणा पलिदोवमआउगा सव्वे ॥ १२४

अर्थ: उस समय नर-नारियोंके सब समूह उत्तम रूपसे सहित, कषायोंसे रहित, उत्तम वज्रमय शुभ संहनन अर्थात् वज्रवृषभनाराचसंहननसे युक्त और पल्योपम प्रमाण आयुके धारक होते हैं ॥ १२४ ॥ इन तीनों ही कालोंमें मनुष्योंके पूर्वकृत पुण्य कर्मोंके


तीसु वि कालेसु तहा णराण तरुसंभवा विउलसोक्खा ।
होंति वरविउलभोगा पुव्वकियसुकयकम्मेहिं ॥ १२५

अर्थ: उदयसे कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न व अतिशय सुखकारक प्रचुर उत्तम भोगसामग्री प्राप्त होती है ॥ १२५ ॥


मज्जंवरतुरियंगा भूसणतेयालया परमरम्मा ।
भायणभोयणरुक्खा पदीववरवत्थमल्लहंगा ॥ १२६

अर्थ: उक्त कालोंमें उत्तम मद्यांग, तूर्यांग, भूषणांग, तेजांग, आलयांग, भाजनांग भोजनांग, दीपांग, उत्तम वस्त्रांग और माल्यांग ये अतिशय रमणीय कल्पवृक्ष होते हैं ॥ १२६ ॥


मज्जंगदुमा णेया कादंबरिसीधुमज्जमादीणिं ।
खीरदधिसप्पिपाणा सुगंधसलिलाणि ते दिंति ॥ १२७

अर्थ: जो कादम्बरी व सीधु आदि मद्यविशेषोंको; दूध, दही व घी रूप पेय पदार्थोंको; तथा सुगन्धित जलको दिया करते हैं उन्हें मद्यांग जातिके वृक्ष जानना चाहिये ॥ १२७ ॥


तूरंगदुमा णेया पडुपडहेमुइंगझल्लरीसंखा ।
दुंदुभिभंभाभेरीकाहलघंटादि ते दिंति ॥ १२८

अर्थ: जो पटु पटह, मृदंग, झालर, शंख, दुंदुभी, भंभा, भेरी, काहल और घंटा आदिको देते हैं उन्हें तूर्यांग वृक्ष जानना चाहिये ॥ १२८ ॥


भूसणदुमा वि णेया कंठाकडिसुत्तणेउरादीया ।
वरहारकडयकुंडलतिरीडमउडाइया दिंति ॥ १२९

अर्थ: जो कंठा, कटिसूत्र नूपुर आदिक, उत्तम हार, कटक, कुण्डल, किरीट और मुकुट आदिको देते हैं उन्हें भूषणांग वृक्ष जानना चाहिये ॥ १२९ ॥


जोइसदुमा वि णेया दिणयरकोडीण किरणसंकासा ।
णक्खत्तचंदसूरा तारोगहकिरणपडिवक्खा ॥ १३०

अर्थ: करोड़ों सूर्योंकी किरणोंके सदृश तथा नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, तारा और ग्रहोंकी किरणोंके प्रतिपक्षी ज्योतिषवृक्ष जानना चाहिये ॥ १३० ॥


गिहअंगदुमा णेया पासाया सत्तभूमिया दिव्वा ।
पायारवलहिगोउररयणमया सव्वदा दिंति ॥ १३१

अर्थ: जो सर्वदा प्राकार, वलभी एवं गोपुरोंसे सहित रत्नमय सात भूमियोंवाले प्रासादोंको देते हैं उन्हें गृहांग द्रुम जानना चाहिये ॥ १३१ ॥


भायणदुमा वि णेया कंचणमणिगिम्मिंया थाला ।
भिंगारकलसगगरिचरुपिठरादी य ते दिंति ॥ १३२

अर्थ: जो सुवर्ण एवं मणियोंसे निर्मित थाल, भृंगार, कलश, गागर, चरु .(लोटा ) और पिठर आदिको देते हैं उन्हें भाजन द्रुम जानना चाहिये ॥ १३२ ॥


भोयणदुमा वि णेया तित्तंबलकसायमहुरसंजुत्ता ।
असणादिवेदुवियप्पा अमियाहारा सया दिंति ॥ १३३

अर्थ: जो सदा तिक्त, आम्ल, कषाय एवं मधुर रससे संयुक्त अशनादि ( अन्न, पान, खाद्य, लेह्य ) चार प्रकारके अमृतमय आहारको देते हैं उन्हें भोजन द्रुम जानना चाहिये ॥ १३३ ॥


दीवंगदुमा णेया पवालफलकुसुमणिच्चपज्जलिया ।
दीवा इव पज्जलिया णिच्चुज्जोया समुत्तुंगा ॥ १३४

अर्थ: जो पत्र फल एवं कुसुमोंसे नित्य प्रज्वलित होते हुए जलाये गये दीपकोंके समान नित्य उद्योत रूप होते हैं उन ऊंचे वृक्षोंको दीपांग द्रुम जानना चाहिये ॥ १३४ ॥ जो नेत्र, अंशुक, चीन (चीनपट्ट),


वत्थंगदुमा णेया णेत्सुंगचीनखोमैदगुलादिं । वरपट्टसुत्तपउरा णाणावत्थाणि ते दिंति ॥ १३५

अर्थ: क्षौम और दुकूल आदि उत्तम रेशम और सूतके बने वस्त्रोंको देते हैं उन्हें वस्त्रांग द्रुम जानना चाहिये ॥ १३५॥


मल्लंगदुमा णेया चंपयपुण्णायणायकुसुमेहिं । वरपंचवण्णपउरा सुगंधमाला सया दिंति ॥ १३६

अर्थ: जो सदा चम्पक पुन्नाग एवं नाग वृक्षके पुष्पोंसे [ निर्मित ], उत्तम पांच वर्णोंसे युक्त सुगंधित मालाओंको देते हैं उन्हें माल्यांगद्रुम जानना चाहिये ॥ १३६॥


एवं ते कप्पदुमा णराण फलं दिंति पुण्णवंताणं । देवोवणीय सव्वे दसंगभोगा समुद्दिद्वा ॥ १३७

अर्थ: इस प्रकार दशांग भोगोंको देनेवाले वे सब देवोपनीत कल्पवृक्ष पुण्यवान् मनुष्योंके लिये उनके पुण्यके फलको ( सुख-सामग्री ) देते हैं ॥ १३७॥


तीसु वि कालेसु तहा तिणाणि चउरंगुलाणि णिद्दिद्वा । सुरहीणि कोमलाणि य दसद्धवण्णाणि सोहंति ॥ १३८

अर्थ: तीनों ( सुपमसुपमा, सुषमा व सुषमदुषमा ) ही कालोंमें चार अंगुल ऊंचे सुगंधित और दशार्ध अर्थात् पांच वर्णवाले कोमल तृण शोभायमान होते हैं ॥ १३८॥


धरणिधरा विण्णेया विद्दुममणिरयणकणयपरिणामा । दिव्वामोयसुगंधा णाणाविहकप्पतरुणिवहा ॥ १३९

अर्थ: उन कालोंमें विद्रुम, मणि, रत्न, एवं सुवर्णके परिणाम रूप; दिव्य आमोदसे सुगंधित और नाना प्रकारके कल्पवृक्षोंके समूहसे युक्त पर्वत होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३९॥


धरणी वि पंचवण्णा मरगयगल्लिंदणीलमणिणिवहा । वरपउमरायविद्दुमणिम्मलमणिकणयपरिणामा ॥ १४०

अर्थ: इन कालोंमें पांच वर्णवाली पृथिवी मरकत, गल्ल एवं इन्द्रनील मणियोंके समूहसे युक्त और उत्तम पद्मराग, विद्रुम, निर्मल मणि एवं सुवर्णके परिणाम रूप होती है ॥ १४०॥


पोक्खरिणिवाविदीही वरणदियाओ य रयणसोवाणा । अमदमहुखीरपुण्णा मणिमयवालूहिं सोहंति ॥ १४१

अर्थ: उस समय रत्नमय सोपानोंसे युक्त तथा अमृत, मधु व दूधसे परिपूर्ण; पुष्करिणी, वापी, दीर्घिका और उत्तम नदियां मणिमय बालुओंसे शोभायमान होती हैं ॥ १४१॥


सूवरसियालसुणहा तरच्छसीहा य सप्पसहूला । काका गिद्धादीया जीवा मंसासिणो णत्थि ॥ १४२

अर्थ: इन कालोंमें शूकर, शृगाल, कुत्ता, तरक्ष, सिंह, सर्प, शार्दूल, काक और गृद्ध आदिक मांसभोजी जीव नहीं होते हैं ॥ १४२॥


संखपिपीलियमक्कुणदंसामसया य विच्छियादीया । विगलिंदिया य णत्थि दु सुसमादिएसुं तिसु काले ॥ १४३

अर्थ: दो बार सुषम अर्थात् सुषमसुषम आदि तीन कालोंमें शंख, पिपीलिका, मत्कुण, दंशमशक और विच्छु आदिक विकलेन्द्रिय जीव नहीं होते हैं ॥ १४३॥


तीहि वि कालेहि जुदा खेत्तेसु य बहुविहेसु रम्मेसु । जे उप्पज्जंति णरा ते संखेवेण वोच्छामि ॥ १४४

अर्थ: इन तीनों ही कालोंसे युक्त बहुत प्रकारके रमणीय क्षेत्रोंमें जो मनुष्य उत्पन्न होते हैं उनकी संक्षेपसे प्ररूपणा करते हैं ॥ १४४॥ उन कालोंमें मृदुता एवं आर्जवसे


मिदुमज्जवसंपण्णा मंदकसाया विणीयसीला य । कोधमदमायहीणा उप्पज्जंति य णरा तेसु ॥ १४५

अर्थ: मंदकषायी विनीत स्वभाववाले तथा क्रोध, मद व मायासे रहित मनुष्य उत्पन्न होते हैं ॥ १४५॥


आहारदाणणिरदा जदीसु वरविविहजोगजुत्तेसु । संजमतवोधणेसु य णिग्गंथेसु य गुणधरेसु ॥ १४६

अर्थ: जो मनुष्य उत्तम व विविध योग अर्थात् समाधिसे युक्त, संयम एवं तप रूप धनसे सहित और [ मूल व उत्तर ] गुणोंको धारण करनेवाले ऐसे निर्ग्रन्थ यतियोंके लिये आहारदान देनेमें निरंत रहते हैं वे उन भोगभूमियोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १४६ ॥


चउविहदाणं भणियं तिविहं पत्तं जिणेहि णिद्दिट्ठं । दाऊण पत्तदाणं अकम्मभूमीसु जायंति ॥ १४७

अर्थ: जिन भगवान्ने चार प्रकारका दान और तीन प्रकारके पात्र कहे हैं । मनुष्य पात्रदान देकर अकर्मभूमियों ( भोगभूमियों ) में उत्पन्न होते हैं ॥ १४७ ॥


आहारअभयदाणं आगमदाणं च ओसहपदाणं । संखेवेणुद्दिट्ठं चउविहदाणं मुणिवरेहिं ॥ १४८

अर्थ: मुनिवरोंने आहारदान, अभयदान, शास्त्रदान और औषधदान, इस प्रकार संक्षेपसे चार प्रकारका दान कहा है ॥ १४८ ॥


साहू उत्तमपत्तं मज्झिमपत्तं तु सावया णेया । अविरदसम्मादिट्ठी जहण्णपत्तं समुद्दिट्ठं ॥ १४९

अर्थ: साधुओंको उत्तम पात्र और श्रावकोंको मध्यम पात्र जानना चाहिये । अविरतसम्यग्दृष्टिको जघन्य पात्र कहा गया है ॥ १४९ ॥


उववाससोसियतणू णिरसंगो कामकोहपरिहीणो । मिच्छत्तसंसिदमणो णायव्वो सो अपत्तो त्ति ॥ १५०

अर्थ: उपवासोंसे शरीरको कृश करनेवाले, परिग्रहसे रहित, काम-क्रोधसे विहीन, परन्तु मनमें मिथ्यात्व भावको धारण करनेवाले जीवको अपात्र [ कुपात्र ] जानना चाहिये ॥ १५० ॥


उववाससोसियतणू णिरसंगो कामकोहपरिहीणो । सम्मत्तसंसिदमणो णायव्वो उत्तमो पत्तो ॥ १५१

अर्थ: उपवासोंसे शरीरको कृश करनेवाले, परिग्रहसे रहित, काम-क्रोधसे विहीन और मनमें सम्यक्त्व भावको धारण करनेवाले जीवको उत्तम पात्र जानना चाहिये ॥ १५१ ॥


पात्तविसेसं दाऊण हेतु जायंति । अणुमोयणेण केई मणुया तिरिया य विण्णेया ॥ १५२

अर्थ: इस प्रकार कितने ही मनुष्य व तिर्यंच पात्रविशेषको दान देकर और कितने ही उसकी अनुमोदनासे उन भोग-भूमियोंमें उत्पन्न होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १५२ ॥


जे कम्मभूमिजादा ते तेसु हवंति भोगभूमीसु । संपुण्णचंदवयणा समचउरसरीरसंठाणा ॥ १५३

अर्थ: जो जीव कर्मभूमियोंमें उत्पन्न हुए हैं वे उन भोगभूमियोंमें पूर्ण चन्द्रके समान मुखसे सहित और समचतुरस्रशरीरसंस्थानसे युक्त होते हैं ॥ १५३ ॥


उववज्जिदूण जुबला उणवण्णदिणेहि जोव्वणा होंति । सव्वकलापत्तट्ठा वरलक्खणभूसियसरीरा ॥ १५४

अर्थ: भोगभूमियोंमें युगल स्वरूपसे उत्पन्न होकर ये जीव उनंचास दिनोंमें यौवनसे युक्त, सब कलाओंके रहस्यको प्राप्त और उत्तम लक्षणोंसे भूषित शरीरके धारक हो जाते हैं ॥ १५४ ॥ भिन्न इन्द्रनील मणिके समान केशोंवाले, अभिनव लावण्य-


भिण्णिंदणीलकेसा अहिणवलायण्णरूवसंपण्णा । सुहसायरमज्झगया णीलुप्पलगंधणीसासा ॥ १५५

रोगजरापरिहीणा णवणागसहस्सविउलबलजुत्ता । आरत्तकुमुदचलणा णवचंपयकुसुमगंधङ्गा ॥ १५६

दिव्वामलमउडधरा हारंगयकडयतुडियकयसोहा । वरचंदणाणुलित्ता मणिकुंडलमंडियागंडा ॥ १५७

तिवलीतरंगमज्झा आहरणविहूसिया परमरूवा । भोत्तूणं दिव्वभोगे सव्वे देवत्तमणुविंति ॥ १५८

अर्थ (गाथा 155 से 158): रूपसे सम्पन्न, सुख-समुद्रके मध्यको प्राप्त, नील उत्पल जैसी सुगंधित निश्वाससे सहित, रोग व जरासे रहित, नौ हजार हाथियोंके बराबर महान् बलसे संयुक्त, किंचित् रक्त वर्ण कमलके समान चरणोंवाले, नवीन चम्पकके फूल जैसी गंधसे युक्त, दिव्य एवं निर्मल मुकुटके धारक; हार, अंगद, कटक और त्रुटिक (हाथका आभरणविशेष) से की गई शोभाको प्राप्त, उत्तम चन्दनसे अनुलिप्त, मणिमय कुण्डलोंसे मंडित कपोलोंवाले, मध्य भागमें त्रिवली रूप तरंगोंसे संयुक्त, आभरणोंसे विभूषित और उत्तम रूपके धारक वे सब जीव दिव्य भोगोंको भोगकर देव पर्यायको प्राप्त करते हैं ॥ १५५-१५८ ॥


छुद्धाभिंसेणेहिं मणुवा मरिऊणं तत्थ भोगभूमीसु । भवणवइवाणविंतरजोइसदेवेसु गच्छंति ॥ १५९

अर्थ: वहां भोगभूमियोंमें मनुष्य (नर-नारी क्रमशः) क्षुत अर्थात् छींक और जृम्भाके साथ मरकर भवनपति, वानव्यन्तर और ज्योतिष देवोंमें जाते हैं ॥ १५९ ॥


जे पुण सम्मादिट्ठी देवेहिं विबोहिया हवे तेसु । ते कप्पवासभवणे उप्पज्जंती ण अण्णत्थ ॥ १६०

अर्थ: परन्तु उनमें जो जीव देवों द्वारा प्रबोधको प्राप्त होकर सम्यग्दृष्टि होते हैं वे कल्पवासी देवोंके विमानमें उत्पन्न होते हैं, अन्यत्र (भवनवासी आदिकोंमें) नहीं उत्पन्न होते ॥ १६० ॥


तिरिक्खा वि तेसु णेया जुवळा जुवळा हवंति णिद्दिट्ठा । सरला मंदकसाया णाणाविहजादिसंजुत्ता ॥ १६१

गयवरसीहतुरंगा हरिणा रोज्झा य सूवरा महिसा । वाणरगवेडुजुवळा वयवग्घतरछयाईया ॥ १६२

सुककोकिलाण जुवळा पारावय हंसकुररकारंडा । किंजकचक्कवाया सिहिसारसकुंचयादीया ॥ १६३

अर्थ (गाथा 161 से 163): उन भोगभूमियोंमें सरल, मन्दकषायी और नाना प्रकारकी जातियोंसे संयुक्त उत्तम गज, सिंह, तुरंग, हरिण, रोझ, शूकर, महिष, वानर, और गवेळक (भेड़) इनके युगल; वृक, व्याघ्र व तरक्ष आदिके तथा शुक व कोयलके युगल; पारावत, हंस, कुरर, कारण्ड, किंजक्क, चक्रवाक, मयूर, सारस और क्रौंच आदिक तिर्यंच भी युगल-युगल स्वरूपसे होते हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ १६१-१६३ ॥


जह मणुयाणं भोगा तह तिरियाणं विमाण सव्वाणं । आउबलभोगरिद्धी समासदो होइ णिद्दिट्ठा ॥ १६४

अर्थ: वहां जैसे मनुष्योंके भोग होते हैं वैसे ही सब तिर्यंचोंके भी जानना चाहिये। इनकी आयु, बल, भोग व ऋद्धिकी संक्षेपसे प्ररूपणा की गई है ॥ १६४ ॥ सब ही


होति य मिच्छादिट्ठी सासणमिस्सा य अविरदा चेव । चत्तारि गुणट्ठाणा सव्वेसु वि भोगभूमीसु ॥ १६५

अर्थ: भोगभूमियोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादन, मिश्र और अविरत- [ सम्यग्दृष्टि ], ये चार गुणस्थान होते हैं ॥१६५॥


तदिओ दु काळसमओ असंखदीवे य होंति णियमेण । मणुसुत्तरादु परदो णगिंदवरपव्वदो जासं ॥ १६६

अर्थ: मानुषोत्तर पर्वतसे आगे नगेन्द्र (स्वयंप्रभ) पर्वत तक असंख्यात द्वीपोंमें नियमतः तृतीय कालका समय रहता है ॥ १६६ ॥


भूधरणगिंदणामो सयंभुरमणाम्मि दीवमज्झम्मि । इवइ मणुसोत्तरो विय पोक्खरवरदीवमज्झम्मि ॥ १६७

अर्थ: जिस प्रकार पुष्करवर द्वीपके मध्यमें मानुषोत्तर पर्वत है, उसी प्रकार स्वयंभूरमण द्वीपके मध्यमें नगेन्द्र नामक पर्वत है ॥ १६७ ॥


एदम्मि मज्झभागे जुवला जुवला तिरिक्खजादीया । कावण्णरूवकढिया हुंति हु कम्माणुभावेणं ॥ १६८

अर्थ: [ मानुषोत्तर और नगेन्द्र पर्वतके ] इस मध्यभागमें कर्मके प्रभावसे लावण्यमय रूपसे युक्त तिर्यंच जातिके अनेक युगल हैं ॥ १६८ ॥


पलिदोवमाउगा ते अमदाहारा कसायपरिहीणा । कप्पतरुजणियभोगा सव्वे देवत्तमणुविंति ॥ १६९

अर्थ: पल्योपम प्रमाण आयुवाले, अमृतभोजी, कषायोंसे रहित और कल्प वृक्षोंसे उत्पन्न भोगोंसे युक्त वे सब तिर्यंच जीव देव पर्यायको प्राप्त होते हैं ॥१६९॥


भूमिवत्तरुक्खपव्वदसरसरिपोक्खरिणिदीहियादीणि । जह वण्णियं तु पुव्वं तह एत्थ वि वण्णणा सव्वा ॥

अर्थ: भूमि, तृण, वृक्ष, पर्वत, तालाब, नदी, पुष्करिणी और दीर्घिका आदिकोंका जैसा पूर्वमें वर्णन किया गया है वैसा सब वर्णन यहांपर भी करना चाहिये ॥ १७० ॥


दीवाण समुद्दाण य पावारा अट्ठजोयणुव्विद्धा । चउगोउरसंजुत्ता णाणामणियरणपरिणामा ॥ १७१

अर्थ: द्वीप और समुद्रोंके प्राकार ( जगती ) आठ योजन ऊंचे, चार गोपुरोंसे संयुक्त और नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप होते हैं ॥ १७१ ॥


वणवेदियपरिक्खित्ता मणितोरणमंडिया परमरम्मा । उववणकाणणसहिया दीवसमुद्दा विरयंति ॥ १७२

अर्थ: वनवेदियोंसे वेष्टित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय और वन-उपवनोंसे सहित द्वीप-समुद्र विराजमान हैं ॥ १७२ ॥


एदेसु विणिद्दिट्ठो जिणभवणविहूसिएसु रम्मेसु । सुसमदुसमो कालो भवट्ठिदो सव्वदीवेसु ॥ १७३

अर्थ: जिनभवनोंसे विभूषित इन समस्त रमणीय द्वीपोंमें सुषमदुषमा काल अवस्थित कहा गया है ॥ १७३ ॥


जलणिहिसयंभुरवणे सयंभुरवणस्स दीवमज्झम्मि । भूधरणगिंदपरदो दुस्समकालो समुद्दिट्ठो ॥ १७४

अर्थ: नगेन्द्र पर्वतके परे स्वयंभूरमण द्वीप और स्वयंभूरमण समुद्रमें दुष्षमा काल कहा गया है ॥ १७४ ॥


देवेसु सुसमसुसमो णिरए अतिदुस्समो हवइ काले । छच्चेव कालसमया तिरिक्खमणुयाण णिद्दिठ्ठा ॥ १७५

अर्थ: देवोंमें सुषमसुषमा, नारकियोंमें अतिदुषमा और तिर्यंच-मनुष्योंके छहों कालसमय कहे गये हैं ॥ १७५ ॥


मणुसुत्तरादु अंतो माणुसखेत्तम्मि छव्विहो कालो। भरहेसु रेवदेसु य समासदो होइ णिद्दिट्ठो ॥ १७६ ॥

अर्थ: मानुषोत्तर पर्यन्त मानुषक्षेत्रके भीतर भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें संक्षेपसे छह प्रकारका काल कहा गया है ॥ १७६ ॥


चउत्थम्मि कालसमये णराणं उक्कस्सदेहपरिमाणं । पंचसयदंडमेत्ता जहण्ण सत्तेव रयणीओ ॥ १७७ ॥

अर्थ: चतुर्थ कालके समयमें मनुष्योंका उत्कृष्ट देहप्रमाण पांच सौ धनुष मात्र और जघन्य सात ही रत्नि होता है ॥ १७७ ॥


बाऊणि पुव्वकोडी उक्कस्सं होंति ताण मणुवाणं । वीसुत्तरसयवासा जहण्णभाऊ समुद्दिट्ठा ॥ १७८ ॥

अर्थ: चतुर्थ कालमें उन मनुष्योंकी उत्कृष्ट आयु पूर्वकोटि और जघन्य आयु एक सौ बीस वर्ष प्रमाण कही गयी है ॥ १७८ ॥


एदम्मि कालसमये तित्थयरा सयलचक्कवट्टीयां । बलदेववासुदेवा पडिसत्तू ताण जायंति ॥ १७९ ॥

अर्थ: इस कालके समयमें तीर्थंकर, सकल-चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव और उनके (वासुदेवोंके) प्रतिशत्रु उत्पन्न होते हैं ॥ १७९ ॥


अरहंतपरमदेवा चउव्वीसा पडिहेरसंजुत्ता । पंचमहाकल्लाणा अहसयचउतीससंपण्णा ॥ १८० ॥

अर्थ: इसी कालमें प्रातिहार्योंसे संयुक्त, पांच महाकल्याणोंसे सहित और चौंतीस अतिशयोंसे सम्पन्न चौबीस अरहन्त परमदेव (तीर्थंकर) होते हैं ॥ १८० ॥


बारहवरचक्कधरा चउदस्रयणाधिवा महासत्ता । छक्खंडभरहणाहा णवनिहिअक्खीणवरकोसा ॥ १८१ ॥

अर्थ: चौदह रत्नोंके अधिपति, महाबलवान्, छह खण्ड रूप भरतक्षेत्रके स्वामी, नौ निधियोंसे सहित और अविश्वर उत्तम कोष (खजाना) से संयुक्त श्रेष्ठ बारह चक्रधर होते हैं ॥ १८१ ॥


संखिंदुकुंदवण्णा णवबलदेवा अणंतबलजुत्ता । हलरयणभूसियकरा उत्तमभोगा महातेया ॥ १८२ ॥

अर्थ: शंख, चन्द्र व कुन्द पुष्पके समान वर्णवाले; अनन्त बलसे युक्त, हाथमें हल रत्नको धारण करनेवाले एवं उत्तम भोगोंसे संयुक्त महातेजस्वी नौ बलदेव होते हैं ॥१८२॥


भरहद्धखंडणाहा णव चेव य वासुदेवचक्कहरा । सत्तविहरयणणाहा णीलुप्पलसंणिभसरीरा ॥ १८३ ॥

अर्थ: भरत क्षेत्रके आधे (तीन) खण्डोंके अधिपति, सात प्रकारके रत्नोंके स्वामी, नील कमलके समान वर्णवाले शरीरसे सहित और चक्रको धारण करनेवाले (अर्धचक्री) नौ वासुदेव होते हैं ॥ १८३ ॥


णीलुप्पलसच्छाया तिखंडभरहाधिवा महासत्ता । णव चेव समुद्दिट्ठा पडिसत्तू वासुदेवाणं ॥ १८४ ॥

अर्थ: नील कमलके समान कान्तिवाले, तीन खण्ड रूप भरतक्षेत्रके अधिपति और महाबलवान् नौ वासुदेवोंके नौ ही प्रतिशत्रु कहे गये हैं ॥१८४॥


रुद्दा य कामदेवा गणहरदेवा य चरमदेहधरा । दुस्समसुसमे काले उत्पत्ती ताण बोद्धव्वा ॥ १८५ ॥

अर्थ: रुद्र, कामदेव, गणधरदेव और जो चरमशरीरी मनुष्य हैं उनकी उत्पत्ति दुषमसुषमा कालमें जानना चाहिये ॥ १८५ ॥ दुषमाकालके आदिमें मनुष्य सात हाथ ऊंचे


दुस्समकालादीए माणुसया सत्तहत्थउस्सेहा।
वीसुत्तरसयवासा परमाऊ ताण णिद्दिट्ठा ॥ १८६

अर्थ: होते हैं । उस समय उनकी उत्कृष्ट आयु एक सौ बीस वर्ष प्रमाण कही गयी है ॥ १८६॥


पंचमकालवसाणे आऊ सयवासं होति परिसंखा।
अड्डुद्वा रयणीओ सरीरपरिमाण णिद्दिट्ठा ॥ १८७

अर्थ: पंचम कालके अन्तमें आयु सौ [ बीस ? ] वर्ष और शरीरका प्रमाण साढ़े तीन रत्नि कहा गया है ॥ १८७ ॥


दुस्समदुस्समे मणुया अड्डुठ्ठा हत्थ देहउस्सेहो।
परमाऊ वासयया कालादीए समुद्दिद्वा ॥ १८८

अर्थ: दुषमदुषमा कालके आदिमें मनुष्य साढ़े तीन हाथ प्रमाण शरीरोत्सेधसे सहित और सौ [ बीस ? ] वर्ष प्रमाण उत्कृष्ट आयुवाले कहे गये हैं ॥ १८८ ॥


छट्ठमकालवसाणे सोलसवासाणि होइ परमाऊ ।
एया रयणी गेया उच्छेहो सव्वमणुयाणं ॥ १८९

अर्थ: छठे कालके अन्तमें सब मनुष्योंकी उत्कृष्ट आयु सोलह वर्ष और ऊंचाई एक रत्नि प्रमाण जानना चाहिये ॥ १८९ ॥


पढमे बिदिये तदिये काले जे होंति माणुसा पवरा।
ते अवमिच्चुविहूणा एयंतसुहेहि संजुत्ता ॥ १९०

अर्थ: प्रथम, द्वितीय और तृतीय कालमें जो श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं वे अपमृत्युसे रहित और एकान्त सुखोंसे संयुक्त होते हैं ॥ १९० ॥


चउत्थे पंचमकाले मणुया सुहदुक्खसंजुदा गेया।
छट्ठमकाले सव्वे णाणाविहदुक्खसंजुत्ता ॥ १९१

अर्थ: चतुर्थ और पंचम कालमें मनुष्य सुख-दुःखसे संयुक्त तथा छठे कालमें सभी मनुष्य नाना प्रकारके दुःखोंसे संयुक्त होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १९१ ॥


चउत्थे पंचमकाले केइ णरा दिव्वरूवसंपण्णा।
बत्तीसलक्खणधरा णीलुप्पलसुरहिणीसासा ॥ १९२

संपुण्णचंदवयणा मत्तमहागयवरिंदमारूढा।
धवलाइवत्तचिण्हा सियचामरधुव्वमाणसव्वंगा ॥ १९३

रंगतवरतुरंगा वियडघडा गुलगुलंतगज्जंता ।
रहवरफुरंतणिवडा बहुजोहणिरुद्धसंचारा ॥ १९४

हारविराइयवच्छा णाणामणिविफुरंतमणिमउडडा।
केऊरभूसियकरा वरकुंडलमंडियागंडा ॥ १९५

जररोगसोगहीणा वियसियसयवत्तगब्भसंकासा।
दीसंति दिव्वमणुया पुव्वं सुकएहिं कम्मेहिं ॥ १९६

अर्थ (गाथा 192 से 196): चतुर्थ व पंचम कालमें कुछ ही दिव्य मनुष्य पूर्वकृत पुण्य कर्मोंके उदयसे दिव्य रूपसे सम्पन्न, बत्तीस लक्षणोंके धारक, नील कमलके समान सुगन्धित निःश्वाससे युक्त, सम्पूर्ण चन्द्रके समान मुखवाले, मदोन्मत्त महागजेन्द्रपर आरूढ, धवल छत्र रूप चिह्नसे सहित, सफेद चामरोंसे ढोरा जा रहा है समस्त अंग जिनका, उत्तम तुरंगोंके संचारसे सहित, गुल-गुल गर्जना करनेवाले विशाल हाथियोंकी घटासे संयुक्त, उत्तम रथोंके समूहसे स्फुरायमान, बहुतसे योद्धाओंके निरोध युक्त, संचारसे सहित, हारसे शोभायमान वक्षस्थलसे युक्त, नाना मणियोंसे प्रकाशमान मणिमय मुकुटसे विभूषित, केयूरसे भूषित हाथोंवाले, उत्तम कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंसे संयुक्त; जरा, रोग एवं शोकसे रहित और विकसित कमलगर्भके सदृश प्रभावाले दिखते हैं ॥ १९२-१९६ ॥ [ उक्त कालोंमें ]


बधिरंधकाणेमूया कोढी दालिद्द रूवपरिहीणा ।
दीणा अणाहसरणा हीणंगविरूवसंठाणा ॥ १९७

खुज्जा वामणरूवा णाणाविहवाहिवेयणसरीरा ।
बहुकोहमाणपउरा लोहिद्धा मायंसंछण्णा ॥ १९८

संबंधसयणरहिंया घरपुत्तकलत्तदारपरिहीणा ।
खप्परकरंकहत्था देसंतरगमणपरिहत्था ॥ १९९

देहि त्ति दीणकलुणा भिक्खं हिंडंति लाहपरिहीणा ।
फुडिदंगकेसणिवहा जूयालिक्खाहि संछण्णा ॥ २००

खट्टिककडोंबसबरा पुलिंदचंडालणाहिलादीया ।
दीसंति णरा बहया पुव्वक्कयपावकम्मेहिं ॥ २०१

अर्थ (गाथा 197 से 201): बहुतसे मनुष्य पूर्वकृत पापकर्मोंसे बहरे, अंधे, काने, मूक, कोढ़ी, दरिद्र, सुन्दर रूपसे रहित, दीन, अनाथ, अशरण, हीनांग, विरूप आकृतिवाले, कुबड़े, वामन ( बौने ) रूपसे युक्त, नाना प्रकारकी व्याधियोंसे पीड़ित शरीरवाले, बहुत व प्रचुर क्रोध-मानसे सहित, लोभी, मायासे परिपूर्ण, सम्बन्धी व स्वजनों ( कुटुम्बी जनों ) से रहित; घर, पुत्र, कलत्र और बच्चोंसे विहीन; खप्पर व करंकसे युक्त हाथोंवाले; देशान्तर गमनसे संतप्त ‘देहि’ इस प्रकार दीन एवं करुणापूर्ण वचन बोल कर भिक्षाके निमित्त इधर-उधर घूमनेवाले, परन्तु भिक्षारहित, स्फोट-युक्त अत एव दुर्गन्धमय अंग व केशोंके समूहसे सहित, जूं व लीखोंसे व्याप्त, तथा खटीक, डोम, शबर, पुलिंद, चण्डाल व नाइल आदि जातियोंमें उत्पन्न दिखते हैं ॥ १९७-२०१ ॥


छट्ठमकालस्संते एरावदभरहवंसणामाणं ।
मज्झिमअज्जखंडा खयगामी होंति णिद्दिट्ठा ॥ २०२

अर्थ: छठे कालके अन्तमें ऐरावत व भरत नामक क्षेत्रोंके मध्यम आर्यखण्ड विनाशको प्राप्त होनेवाले निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ २०२ ॥


दुव्विट्ठियणावुड्ठीमारीपरचक्क तस्करगणेहिं ।
ईदीहिं समभिभूदा णासंति हु देसविसयाणि ॥ २०३

अर्थ: दुर्वृष्टि ( अतिवृष्टि ), अनावृष्टि, मारि, परचक्र और तस्करसमूह रूप ईतियोंसे अभिभूत होकर देश-विषय नष्ट होते हैं ॥ २०३ ॥


गणणातीदेहि पुणो अवसप्पिणीदुव्वकालसमयेहिं ।
बहुएहिं अइक्कंते पासंडिधरा समुद्दिद्वा ॥ २०४

अर्थ: पुनः बहुत असंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी रूप काल-समयोंके बीत जानेपर पाखण्डिधरा (पाखण्डमय पृथिवी ) कही गयी है ॥ २०४ ॥


कप्पेसु असंखेसु य एरावयभरहणामखेत्तेसु ।
जिणभवणा पण्णत्ता ण अण्णभवणा समुद्दिद्वा ॥ २०५

अर्थ: असंख्यात कल्पोंमें ऐरावत व भरत नामक क्षेत्रोंमें जिनभवन कहे गये हैं, अन्य देवताओंके भवन नहीं कहे गये हैं ॥ २०५ ॥


पंचसु भरहेसु तहा पंचसु एरावदेसु खेत्तेसु ।
अवसप्पिणी उस्सप्पिणी अवट्ठिदा होंति णिद्दिट्ठा ॥ २०६

अर्थ: पांच भरत तथा पांच ऐरावत क्षेत्रोंमें अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल स्थित रहते हैं ॥ २०६ ॥


जह किण्हपक्खसुक्का अवट्ठिदा जह य होंति दिणरयणी ।
तह ते कालसहावा अवट्ठिदा होंति णियमेण ॥ २०७

अर्थ: जिस प्रकार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष अवस्थित हैं, तथा जिस प्रकार दिन और रात्रि अवस्थित हैं, उसी प्रकार नियमसे वे कालस्वभाव अवस्थित हैं ॥ २०७ ॥


अवसप्पिणिम्मि काले तहेव उवसप्पिणिम्मि कालम्मि ।
उप्पज्जंति महप्पा तेसट्ठिसलागवरपुरिसा ॥ २०८

अर्थ: अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी कालमें तिरेसठ शलाकामहापुरुष उत्पन्न होते हैं ॥२०८॥


होऊण भोगभूमी अट्ठारसउडवडिकोडिकोडीया ।
भरहक्खंडविभागं अच्छदि कालाणुभावेण ॥ २०९

अर्थ: अठारह कोड़ाकोड़ि सागर प्रमाण काल तक भोगभूमि होकर [शेष दो कोड़ाकोड़ि सागरोपममें] भरतखण्ड-विभाग कर्मभूमिस्वरूपसे स्थित होता है ॥ २०९ ॥


अजियं अजियमहप्पं अपुणब्भवं अच्चुयं विमलणाणं ।
वरपउमणंदिणमियं वंदे अजरामरं अरुजं ॥ २१०

अर्थ: जिनका माहात्म्य अजित अर्थात् जीता नहीं गया है और जो पुनर्जन्मसे रहित, अद्भुत निर्मल ज्ञानके धारक, उत्तम पद्मनन्दि मुनिसे वन्दित, तथा अजर व अमर होकर रोगसे रहित हैं; उन अजितनाथ भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २१० ॥

तदिओ उद्देसो (भाग 1/2)

संभवजिणं णमंसिय सइंदसुरसंथुयं अचलेणाणं । संखेवेण समग्गं सेलसहावं पवक्खामि ॥ १

अर्थ: इन्द्रोंके साथ देवोंके द्वारा संस्तुत तथा अविनश्वर ज्ञानवाले सम्भव जिनको नमस्कार करके संक्षेपसे समस्त पर्वतोंके स्वरूपको कहते हैं ॥ १ ॥


हिमवंतमहाहिमवं णिसहो णीलो य रूप्पसेलो य । सिहरी वि य बोधव्वा वंसधरा होंति णिद्दिट्ठा ॥ २

अर्थ: हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रूप्य (रुक्मि) और शिखरी, ये छह कुलाचल कहे गये हैं ॥२॥


हिमवंतसिहरिसेला कणयमया विविधरयणसंछण्णा । जोयणसयउव्विद्धा अवगाहा होंति पणवीसा ॥ ३

अर्थ: इनमेंसे हिमवान् और शिखरी पर्वत सुवर्णमय, विविध रत्नोंसे व्याप्त, सौ योजन ऊंचे और पच्चीस योजन प्रमाण अवगाहसे सहित हैं ॥ ३ ॥


बावण्णसमधिरेयो सहस्स परिमाण होंति वित्थिण्णा । बारसकला वि णेया उणवीसगदेहिं छेदेहिं ॥ ४

अर्थ: ये दोनों पर्वत एक हजार बावन योजन और एक योजनके उन्नीस भागोंमेंसे बारह भाग प्रमाण ( १०५२ १२/१९ ) विस्तीर्ण हैं ॥ ४ ॥


पुव्वावरेण दीहा एयत्तरे चदुसदा य पंचकला । चउदस चेव सहस्सा कणिट्ठपासेसु णिद्दिट्ठा ॥ ५

अर्थ: उक्त दोनों कुलाचल कनिष्ठ पार्श्व भागोंमें अर्थात् भरत एवं ऐरावत क्षेत्रकी ओर चौदह हजार चार सौ इकहत्तर योजन और पांच कला ( १४४७१ ५/१९ ) प्रमाण पूर्व-पश्चिम दीर्घ कहे गये हैं ॥५॥


पच्छिमपुव्वायामो बत्तीस णवसया य पण्णत्ता । चउवीसं पि सहस्सा उक्कट्ठतमेसु पासेसु ॥ ६

अर्थ: ये दोनों कुलपर्वत उत्कृष्टतम पार्श्वभागोंमें अर्थात् हैमवत और हैरण्यवत क्षेत्रकी ओर चौबीस हजार नौ सौ बत्तीस योजन [ व एक कला ] ( २४९३२ १/१९ ) प्रमाण पूर्व-पश्चिम आयत कहे गये हैं ॥ ६ ॥


चउदस चेव सहस्सा पंचेव सया हवंति अडवीसा । एयार कला णेया कणिट्ठधणुपुट्ठ सेलाणं ॥ ७

अर्थ: इन शैलोंका कनिष्ठ धनुषपृष्ठ चौदह हजार पांच सौ अट्ठाईस योजन और ग्यारह कला ( १४५२८ ११/१९ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ ७ ॥


पणुवीसं च सहस्सा बेसयतीसा य चउकला अहिया । उक्कट्ठधणुयवट्ठा सेलाणं होंति णिद्दिट्ठा ॥ ८

अर्थ: इन शैलोंका उत्कृष्ट धनुषपृष्ठ पच्चीस हजार दो सौ तीस योजन चार कला अधिक ( २५२३० ४/१९ ) कहा गया है ॥८॥


पंचासा तिणिसया पंचसहस्सा य अद्धकलसहिया । पण्णरस कला णेया पस्सभुजा पव्वदाणं तु ॥ ९

अर्थ: दोनों पर्वतोंकी पार्श्वभुजा पांच हजार तीन सौ पचास योजन और अर्ध कला सहित पन्द्रह कला ( ५३५० ३१/३८ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ ९ ॥


बावण्णसया तीसा जोयणसंखापमाणसुगहिदा । सद्धट्ठमकलंसंखा णगाण चूली बियाणाहि ॥ १०

अर्थ: दोनों पर्वतोंकी चूलिका बावन सौ तीस योजन और साढ़े सात कला ( ५२३० १५/३८ ) प्रमाण कही गयी हैं ॥ १० ॥


वणवेइयपरिविरिया णाणाविहतोरणेहिं कयसोहा ।
बहुकप्परुक्खाणिवहा सुगंधगंधुद्धदो रम्मा ॥ ११

लवलीलवंगपउरा चंपयमंदारबउलगंधड्ढा ।
पुण्णागणागणिवहा अइमुत्तलयाडलसिरिया ॥ १२

कप्पूरणियररुक्खा असोयपणसंबजंबिरसणाहा ।
तालदुमणालिणिवहो कयलीहिंतालसंचण्णा ॥ १३

बहुकुसुमरयपिंजरअलिडलगिज्जंतमहुरसद्दाला ।
पवणवसंचलियपल्लवपायवणच्चंतअहिरामा ॥ १४

भूधरपमाणदीहा बेगाउदवित्थडा समुद्दिठ्ठा ।
वरभूहराण होंति हु वणसंडा उभयपासेसु ॥ १५

अर्थ (गाथा 11 से 15): इन उत्तम पर्वतोंके उभय पार्श्वभागोंमें वनवेदियोंसे वेष्टित, नाना प्रकारके तोरणोंसे शोभायमान, बहुतसे कल्पवृक्षोंके समूहोंसे सहित, सुगंध गंधसे व्याप्त, रमणीय, प्रचुर लवली एवं लवंग वृक्षोंसे सहित; चम्पक, मन्दार एवं बकुलकी गंधसे व्याप्त; पुन्नाग एवं नाग वृक्षोंके समूहसे सहित, अतिमुक्त लताओंसे व्याप्त शोभासे सम्पन्न, कर्पूर वृक्षोंके समूहसे संयुक्त; अशोक, पनस, आम्र एवं जंबीर वृक्षोंसे सनाथ; ताल द्रुम व नाली (एक लता) के समूहोंसे सहित, कदली व हिंताल वृक्षोंसे आच्छन्न, बहुतसे पुष्पोंकी धूलिसे पीतवर्ण हुए भ्रमरोंके समूहसे किये जानेवाले मधुर गान (गुंजार) से शब्दायमान, वायुसे प्रेरित होकर चंचलताको प्राप्त हुए पत्तोंवाले वृक्षोंके मधुर नाचसे अभिराम, तथा पर्वतके बराबर लम्बे और दो कोश विस्तृत ऐसे वनखण्ड कहे गये हैं ॥११-१५॥


तह य महाहिमवंतो अज्जणवण्णो फुरंतमणिनिवहो ।
रुप्पियमओ णेओ रुप्पमओ रयणसंचण्णो ॥ १६

अर्थ: महाहिमवान् पर्वत प्रकाशमान मणियोंके समूहसे युक्त, श्वेतवर्ण तथा रत्नोंसे व्याप्त रुक्मि पर्वत रजतमय जानना चाहिये ॥ १६ ॥


पण्णासा अवगाहा बे वि णगा बेसदा समुत्तुंगा ।
बादालसदा विउला दसउत्तरा दसकला अधिया ॥ १७

अर्थ: दोनों ही पर्वत पचास योजन अवगाहसे युक्त, दो सौ योजन ऊंचे और दश कला अधिक ब्यालीस सौ दश योजन ( ४२१० १०/१९ ) प्रमाण विस्तृत हैं ॥ १७ ॥


चउहत्तरि छव्व सया सोलसभागा हवंति णिद्दिठ्ठा ।
सत्तत्तीससहस्सा जहण्ण आयाम सेलाणं ॥ १८

अर्थ: इन शैलोंकी जघन्य लम्बाई सैंतीस हजार छह सौ चौहत्तर योजन और सोलह भाग ( ३७६७४ १६/१९ ) प्रमाण कही गई है ॥ १८ ॥


इगितीसा णव य सदा छव्वेव कला हवंति णिद्दिठ्ठा ।
तेवण्णं च सहस्सा उक्कस्सायाम सेलाणं ॥ १९

अर्थ: उक्त शैलोंकी उत्कृष्ट लम्बाई तिरेपन हजार नौ सौ इकतीस योजन और छह कला ( ५३९३१ ६/१९ ) प्रमाण कही गई है ॥ १९॥


दस चेव कला णेया चत्ताला सत्त जोयणसदाणि ।
अट्ठत्तीससहस्सा जहण्णधणुपुट्ठ सेलाणं ॥ २०

अर्थ: उक्त शैलोंका जघन्य धनुष्पृष्ठ अड़तीस हजार सात सौ चालीस योजन और दश कला ( ३८७४० १०/१९ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ २० ॥ उक्त शैलोंका उत्कृष्ट धनुष्पृष्ठ सत्ता-


बे चेव सदा णेया तेणउदा दसकला समुद्दिद्वा ।
सत्तावण्णसहस्सा धणुपट्ठुक्कस्स सेलाणं ॥ २१

अर्थ: वन हजार दो सौ तेरानवै योजन और दश कला ( ५७२९१ १०/१९ ) प्रमाण कहा गया है ॥ २१ ॥


छाहत्तरि विण्णिसदा णव य सहस्साणि जोयणा णेया ।
णव य कला अद्धकला पासभुजा होंति सेलाणं ॥ २२

अर्थ: उक्त शैलोंकी पार्श्वभुजा नौ हजार दो सौ छयत्तर योजन और साढ़े नौ कला ( ९२७६ ९ १/२/१९ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ २२ ॥


अट्ठावीसं च सदं अट्ठसहस्साणि जोयणुद्दिद्वा ।
अद्ध य पंचमभागा णगाण चूली वियाणाहि ॥ २३

अर्थ: उक्त पर्वतोंकी चूलिका साढ़े चार भागोंसे अधिक आठ हजार एक सौ अट्ठाईस योजन ( ८१२८ ४ १/२/१९ ) जानना चाहिये ॥ २३ ॥


तवणिज्जमओ णिसहो वेरुलियमओ दु णीलवण्णो दु ।
बे वि णगा विण्णेया णाणामणिरयणखचिदुच्छेदा ॥ २४

चत्तारिसया तुंगा सदुक्कवगाढा फुरंतमणिकिरणा ।
सोलसहस्स अडसय वादाला बे कला रुंदा ॥ २५

अर्थ (गाथा 24 से 25): निषध पर्वत सुवर्णमय और नील पर्वत वैडूर्यमणिमय नीलवर्ण है । नाना मणियों व रत्नोंसे मण्डित ये दोनों ही पर्वत चार सौ योजन ऊंचे, सौ योजन अवगाहसे युक्त, प्रकाशमान मणिकिरणोंसे सहित, और सोलह हजार आठ सौ ब्यालीस योजन व दो कला ( १६८४२ २/१९ ) प्रमाण विस्तारवाले हैं ॥ २४-२५ ॥


एगुत्तरणवयसया तेहत्तरि तह सहस्स सेलाणं ।
सत्तरस कला णेया जहण्णजीवा समुद्दिद्वा ॥ २६

अर्थ: इन शैलोंकी जघन्य जीवा तिहत्तर हजार नौ सौ एक योजन और सत्रह कला ( ७३९०१ १७/१९ ) प्रमाण कही गई जानना चाहिये ॥ २६ ॥


चउणउदि य सहस्सा सयं च छप्पण्णं बे कला अहिया ।
पुव्वावरेण णेया आयामा होंति उक्कस्सा ॥ २७

अर्थ: उक्त पर्वतोंकी उत्कृष्ट लम्बाई (जीवा) पूर्व-पश्चिममें चौरानबै हजार एक सौ छप्पन योजन और दो कला ( ९४१५६ २/१९ ) अधिक जानना चाहिये ॥ २७ ॥


चत्तारि कला अहिया सोलस चुलसीदियोयणसहस्सा ।
णीलणिसहाण णेया जहण्णधणुपुट्ठ णिद्दिद्वा ॥ २८

अर्थ: नील व निषध पर्वतोंकी जघन्य धनुष्पृष्ठ चौरासी हजार सोलह योजन और चार कला अधिक ( ८४०१६ ४/१९ ) जानना चाहिये ॥ २८ ॥


छादाला तिण्णिसदा चउवीससहस्स णीलणिसहाणं ।
एगं च सदसहस्सं णव भागा जेट्ठधणुपुट्ठे ॥ २९

अर्थ: नील और निषधका उत्कृष्ट धनुपृष्ठ एक लाख चौबीस हजार तीन सौ छयालीस योजन और नौ भाग ( १२४३४६ ९/१९ ) प्रमाण है ॥ २९ ॥


पणट्ठि सदा णेया वीससहस्सा य णीलणिसहाणं ।
पस्सभुजा णायव्वा अड्ढाइज्जा कला अहिया ॥ ३०

अर्थ: नील व निषध पर्वतोंकी पार्श्वभुजा बीस हजार एक सौ पैंसठ योजन और अढ़ाई कला अधिक ( २०१६५ २ १/२/१९ ) जानना चाहिये ॥ ३० ॥


सत्तावीसं च सदी दस य सहस्साणि बे कला अहिया ।
णीलणिसहाण णेया चूलियसंखा समुद्दिद्वा ॥ ३१

अर्थ: नील-निषध पर्वतोंकी चूलिकाका प्रमाण दश हजार एक सौ सत्ताईस योजन और दो कला अधिक ( १०१२७ २/१९ ) कहा गया है ॥ ३१ ॥ ये सब ही लम्बे पर्वत वेदियोसे सहित, मणिमय


सव्वे वि वेडिसहिदा मणिमयजिणचेहएहि संवण्णा ।
उववणकाणणसहिदा दीहगिरिंदा मुणेयव्वा ॥ ३२

अर्थ: जिनचैत्योंसे सम्पन्न और वन उपवनास सहित हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ३२ ॥


वरदहदसिदादवत्ता सरिचामरविज्जमाणं बहुमाणा ।
कप्पतरुचारुचिण्हा वसुमहसिंहसणारुढा ॥ ३३

वेदिकडिसुत्तणिवहा मणिकूडफुरंतदिव्ववरमउडा ।
णिज्झरपलंबहारा तरुकुंडलमंडियागंडा ॥ ३४

सुरघरकंठाभरणा वणसंडविचित्तवत्थकयसोहा ।
गोउरतिरीडमाला पायारसुगंधदामंडा ॥ ३५

तोरणकंकणहत्था वज्जपणाली फुरंतकेऊरा ।
जिणभवणतिलयभूदा भूधरराया विराजंति ॥ ३६

अर्थ (गाथा 33 से 36): उत्तम द्रहरूपी धवल आतपत्रसे सहित, नदीरूपी चामरोंसे वीज्यमान, बहुत प्रमाणसे सहित, कल्पवृक्षरूपी उत्तम चिह्नोंसे युक्त, पृथिवीरूपी सिंहासनपर आरूढ, वेदीरूप कटिसूत्रसमूहसे संयुक्त, मणिमय कूट रूप प्रकाशमान उत्तम दिव्य मुकुटसे सुशोभित, निर्झररूपी लम्बे हारसे अलंकृत, वृक्षरूपी कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंवाले, सुरगृहरूपी कण्ठाभरणसे विभूषित, वनखण्डरूपी विचित्र वस्त्रोंसे शोभायमान, गोपुररूपी किरीटमालासे रमणीय, प्राकाररूपी सुगन्धित मालासे वेष्टित, तोरणरूप कंकणसे विभूषित हाथोंवाले, वज्रमय नाली रूप प्रकाशमान केयूरसे सहित, और तिलक स्वरूप जिनभवनोंसे संयुक्त ऐसे कुलाचल रूपी राजा विराजमान हैं ॥ ३३-३६ ॥


अंजणदहिमुहरइयरमंदरवरकुंडलाण सेलाणं ।
होंति सहस्सवगाडा सोदयचउभाग सेसाणं ॥ ३७

अर्थ: अंजनगिरि, दधिमुख, रतिकर पर्वत, मन्दर ( मेरु ) और उत्तम कुण्डल नग, इन शैलोंका अवगाह हजार योजन प्रमाण तथा शेष पर्वतोंका वह अपनी ऊंचाईके चतुर्थ भाग प्रमाण होता है ॥ ३७ ॥


वज्जमया अवगाहा गिरीण सिहरा हवंति रयणमया ।
दहसरिकुंडाण तहा भूमितला वज्जपरिणामा ॥ ३८

अर्थ: पर्वतोंके अवगाह ( नींव ) वज्रमय और शिखर रत्नमय होते हैं। द्रह, नदी तथा कुण्डोंके भूमितल वज्र स्वरूप होते हैं ॥ ३८ ॥


एगारसट्ठणवणवमट्ठेयारस हवंति कूडाणि ।
हिमवंतादो णेया जाव दु वरसिहरिपदियंता ॥ ३९

अर्थ: हिमवान् से लेकर शिखरी पर्वत पर्यन्त उक्त पर्वतोंके क्रमसे ग्यारह, आठ, नौ, नौ, आठ और ग्यारह कूट हैं ॥ ३९ ॥


सिद्धहिमवंतभरहा इलो गंगा हवंति कूडाणं ।
सिरिरोहिदसिंधुसुरा हेमवदा वेसमणणामा ॥ ४०

अर्थ: सिद्धकूट, हिमवान्कूट, भरतकूट, इलाकूट, गंगाकूट, श्रीकूट, रोहित (रोहितास्या) कूट, सिन्धुकूट, सुराकूट, हैमवतकूट, और वैश्रवणकूट, ये ग्यारह कूट हिमवान् पर्वतपर स्थित हैं ॥४०॥ सिद्धकूट, [महा] हिमवान्कूट,


सिद्धहिमवंतणामा हेमव्वदरोहिदा य हिरिकूड़ा । हरिसोहणहरिवंसा वेरुलिय हवंति कूडाणं ॥ ४१

अर्थ: हैमवतकूट, रोहितकूट, हींकूट, हरिशोभन ( हरिकान्ता ) कूट, हरिवर्षकूट और वैडूर्य कूट, ये आठ कूट महाहिमवान् पर्वतपर स्थित ह ॥ ४१ ॥


तह सिद्धणिसहहरिदा धिदि विदेहहरिविजय तह य सीदोदा । अवरविदेहा रुजगो कूडाणं होंति णामाणि ॥४२

अर्थ: तथा सिद्धकूट, निषधकूट, हरित्कूट, धृतिकूट, [ सूर्य ] विदेहकूट, हरिविजयकूट, सीतोदाकूट, अपरविदेहकूट और रुचककूट, इस प्रकार ये निषध पर्वतपर स्थित नौ कूटोंके नाम हैं ॥ ४२ ॥


सिद्धवरणीलकूडा पुव्वविदेहा सीदा य कित्तीया । णारी अवरविदेहा रम्मग अवदंस णामाणि ॥ ४३

अर्थ: उत्तम सिद्धकूट, नीलकूट, पूर्वविदेहकूट, सीताकूट, कीर्तिकूट, नारीकूट, अपरविदेहकूट, रम्यककूट और अवतंस (अपदर्शन, उपदर्शन) कूट, ये नौ कूट नील पर्वतपर स्थित हैं ॥ ४३ ॥


वरसिद्धरुप्परम्मगणरकंता बुद्धिरुप्पकूला य । हेरण्णवदा कंचग णामाणि हवंति कूडाणं ॥ ४४

अर्थ: उत्तम सिद्धकूट, रूप्य ( रुक्मि ) कूट, रम्यककूट, नरकान्ताकूट, बुद्धिकूट, रूप्यकूलाकूट, हैरण्यवतकूट और कंचनकूट, ये रुक्मि पर्वतपर स्थित आठ कूटोंके नाम हैं ॥ ४४ ॥


तह सिद्धसिहरिणामा हिरण्णरसदेवि रत्तलच्छीया। कणय तह रत्तवदिया गंधारो रयद मणिहेमा ॥ ४५

अर्थ: तथा सिद्धकूट, शिखरीकूट, हैरण्यवतकूट, रसदेवीकूट, रक्ताकूट, लक्ष्मीकूट, सुवर्ण-[ कूला ] कूट, रक्तवतीकूट और गान्धार ( गन्धवती ) कूट, रजत ( ऐरावत ) कूट और मणिकांचनकूट, ये ग्यारह कूट शिखरी पर्वतपर स्थित हैं ॥ ४५ ॥


वंसहरमाणुसुत्तरकुंडलरुजगहिवाण सेलाणं । जावदिया अवगाहा तावदिया कूडउच्छेहा ॥ ४६

अर्थ: मानुषोत्तर, कुण्डलगिरि, और रुचकगिरि, इन वर्षधर शैलोंका जितना अवगाह है उतना उनके कूटोंका उत्सेध है ॥ ४६ ॥


पणुवीसा पण्णासा सय सय पण्णास तह य पणुवीसा । हिमवंतणगादीणं कूडाणं होंति उच्छेहा ॥ ४७

अर्थ: हिमवान् पर्वतादिकोंके कूटोंका उत्सेध क्रमसे पच्चीस, पचास, सौ, सौ, पचास तथा पच्चीस योजन प्रमाण है ॥४७॥


सोदयदलवित्थिण्णा आयामा होंति सव्वकूडाणं । मूलेसु समुद्दिट्ठा णाणामणियरयणपरिणामा ॥ ४८

अर्थ: नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप ये सब कूट मूल भागोंमें अपनी उंचाईके अर्ध भाग प्रमाण विस्तीर्ण व इतने ही आयत कहे गये हैं ॥ ४८ ॥


अद्धुत्तेरसजोयणं पणुवीसा तह य होंति पण्णासा । पण्णासा पणुवीसा बारस बे चेव कोसहिया ॥ ४९

अर्थ: उन कूटोंके उपर्युक्त विस्तार व आयामका प्रमाण क्रमसे साढ़े बारह योजन, पच्चीस योजन, पचास योजन, पचास योजन, पच्चीस योजन और दो कोश अधिक बारह योजन है ॥४९॥


वित्थिण्णायामेण य पण्णरसा जोयणा य वरभवणा । अद्वाइज्जा कोसा कूडाणं होंति सिहरेसु ॥ ५०

अर्थ: कूटोंके शिखरोंपर पन्द्रह योजन और अढ़ाई कोश विस्तार व आयामसे युक्त उत्तम भवन हैं ॥ ५० ॥


सक्कोसा इगितीसा उव्विद्धा विविधरयणपरिणामा । जोयणचउत्थभागा अवगाढा ताण णिद्दिष्ट्ठा ॥ ५१

अर्थ: विविध रत्नोंके परिणाम रूप उन भवनोंकी ऊंचाई एक कोश सहित इकतीस योजन और अवगाह योजनके चतुर्थ भाग प्रमाण कहा गया है ॥ ५१ ॥


अट्ठेव जोयणाई तोरणदारा हवंति उत्तुंगा । चउजोयणीवित्थिण्णा अणाइणिहणा वियाणाहि ॥ ५२

अर्थ: उन भवनोंमें आठ योजन ऊंचे और चार योजन विस्तीर्ण अनादिनिधन तोरणद्वार जानना चाहिये ॥ ५२ ॥


णाणामणिगणणिविडा कणयमया विप्फुरंतमणिकिरणा । सत्तत्तला पासाया सुगंधगंधुद्धुदा रम्मा ॥ ५३

कालागरुगंधधुडा संगीदमुरिंगसद्दगंभीरा । लंबंतरयणमाला बहुकुसुमयअच्चणसणाहा ॥ ५४

पजलंतरयणदीवा णाणाविहवत्थविउलकयसोहा । वरवज्जणीलमरगयकक्केयणपुक्खरागमया ॥ ५५

प’यारवलहिगोउरउववणसंडेहि मंडिया दिव्वा । दीहा समचउरंसा अणेगसंठाणपरिणामा ॥ ५६

अरविंदोदरवण्णा णीलुप्पलकुमुदगब्भसंकासा । चंपयमंदाराणिभा गोरोयणसच्छहा के वि ॥ ५७

वरचित्तकम्मपउरा सहस्सखंभेहि सोहिया रम्मा । पवरच्छराहि भरिया अच्छेरयरूवसाराहि ॥ ५८

कुंदेंदुसंखवण्णा गोखीरतुसारहारसंकासा । मरगयपवालवण्णा वियसियसयवत्तसंकासा ॥ ५९

सत्तट्ठमभूमीया णवदसभूमी अणेगभूमीया । जिणसिद्धभवणणिवहा मणिकंचणरयणपरिणामा ॥ ६०

अर्थ (गाथा 53 से 60): उक्त प्रासाद नाना मणिगणोंसे व्याप्त, सुवर्णसे निर्मित, प्रकाशमान मणिकिरणोंसे सहित, सात तलवाले, सुगन्ध गन्धसे व्याप्त, रमणीय, कालागरुके गन्धसे युक्त, संगीत व मृदंगके शब्दसे गम्भीर, लम्बायमान रत्नमालाओंसे संयुक्त, बहुत कुसुमों द्वारा की गई पूजासे सनाथ, प्रकाशमान रत्नदीपकोंसे सहित, नाना प्रकारके वस्त्रोंसे की गई महती शोभासे सहित; उत्तम वज्र, नील मणि, मरकत, कर्केतन और पुखराज मणियोंसे निर्मित; प्राकार, वलभी (छज्जा), गोपुर एवं उपवन समूहोंसे मण्डित; दिव्य, दीर्घ, समचतुष्कोण, अनेक आकारोंमें परिणत, कोई कमलके उदर जैसे वर्णवाले, कोई नीलोत्पल व कुमुदके गर्भ सदृश, कोई चम्पक व मन्दार पुष्पके सदृश, कोई गोरोचनके समान कान्तिवाले, उत्तम प्रचुर चित्रक्रियासे संयुक्त, हजार खंभोंसे शोभित, रम्य, आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूपवाली उत्तम अप्सराओंसे परिपूर्ण; कुन्दपुष्प, चन्द्रमा एवं शंखके समान वर्णवाले; गोक्षीर, तुषार एवं हारके सदृश, मरकत व प्रवाल जैसे वर्णवाले, विकसित कमलके सदृश, सात-आठ भूमियोंवाले, नौ-दश भूमियोंवाले व अनेक भूमियोंवाले, जिनभवनों व सिद्धभवनोंके समूहोंसे सहित; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप; पुन्नाग व तिलकके सदृश वर्णवाले,


पुण्णागतलयवण्णा पारावयमोरकंठसंकासा । 'कंदलकव्हारणिभा केदइकणवीरसंकासा ॥ ६१

मंदारतारकिरणा सत्तच्छदसालकुसुमसंकासा । किसुवमुणालवण्णा दुव्वंकुरसिरिसकुसुमसंकासा ॥ ६२

पाडलअंसोगवण्णा णववियसिंयरत्तकुसुमसंकासा । इंदीवरदलवण्णा विभिण्णसियकुसुमसंकासा ॥ ६३

पायारसंवरिवड्डा वरगोउरमण्डिया परमरम्मा । धूवंतधयवडाइया मणितोरणसंकुला वित्थला ॥ ६४

वरभूहरसंकासा णाणाविहचारुभवणसंछण्णा । दिव्वमणोवमरूवा असंखसुरसंकुला रम्मा ॥ ६५

पोक्खरिणवाविपउरा सरिसरवरदीहियाहि परिपरिया । उववणकाणणसहिया अलिउलकुलजणियझंकारा ॥ ६६

अर्थ (गाथा 53 से 66): कबूतर व मयूरके कण्ठके सदृश, कंदल व कह्लारके समान वर्णवाले, केतकी व कनैरेके सदृश, मन्दारके समान निर्मल किरणोंवाले, सप्तच्छद व शाल वृक्षोंके कुसुमोंके समान, किंशुक व मृणाल जैसे वर्णवाले, दूर्वाङ्कुर व शिरीष कुसुमके सदृश, पाटल व अशोकके समान वर्णवाले, नवीन विकसित रक्त कुसुमोंके सदृश, कमलपत्रके तुल्य वर्णवाले, विकसित सित कुसुमोंके सदृश, प्राकारसे वेष्टित, उत्तम गोपुरोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, मणितोरणोंसे व्याप्त, विस्तृत, उत्तम भूधरके सदृश, नाना प्रकारके सुन्दर भवनोंसे युक्त, दिव्य व अनुपम रूपवाले, असंख्य देवोंसे व्याप्त, रम्य, प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे सहित; नदी, सरोवर एवं दीर्घिकाओंसे परिपूर्ण; वन-उपवनोंसे सहित, और भ्रमरसमूहके झंकारसे युक्त हैं ॥ ५३-६६ ॥


गिरिवरकूडेसु तहा गिरिवरसिहरेसु गिरिवरणगेसु । होंति सुराणं पुरवर जिणभवणविहूसिया रम्मा ॥ ६७

अर्थ: पर्वतोंके कूटोंपर, पर्वतशिखरोंपर तथा पर्वतनगोंपर भी इसी प्रकार जिनभवनोंसे विभूषित एवं रमणीय देवोंके उत्तम भवन होते हैं ॥ ६७ ॥


विक्खंभायामेहि य उच्छेहेहि य हवंति जावदिया । वेअड्डणगम्मि तहा तावदिया अंबुजेसु गिहा ॥ ६८

अर्थ: जितना विष्कम्भ, आयाम और उत्सेध वैताढ्य पर्वतपर स्थित गृहोंका है उतना ही वह कमलोंपर स्थित गृहोंका भी है ॥ ६८ ॥


पउमो य महापउमो तिगिंछवरकेसरी य पुंडरिओ । तह य महापुंडरिओ महादहा होंति अचलेसु ॥ ६९

अर्थ: पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरी, पुण्डरीक और महापुण्डरीक, ये महा द्रह उक्त कुलाचलोंपर स्थित हैं ॥ ६९ ॥


दहकुंडणगणदीण य वणदीवपुराण कूडसेढीणं । तडवेदी णिद्दिट्ठा मणितोरणमंडिया दिव्वा ॥ ७०

अर्थ: द्रह, कुण्ड, पर्वत, नदी, वन, द्वीप, पुर, कूट और विद्याधरश्रेणियोंके मणितोरणोंसे मण्डित दिव्य तटवेदियां कही गई हैं ॥ ७० ॥


सेलाणं उच्छेहो दसगुणिद दहाण होइ आयामा । दसमजिदे अवगाहं पंचगुणं हवइ विक्खंभं ॥ ७१

अर्थ: पर्वतोंके उत्सेधको दशसे गुणित करनेपर द्रहोंका आयाम, उसमें दशका भाग देनेपर उनका अवगाह, और पांचसे गुणित करनेपर उनका विस्तार होता है ॥ ७१ ॥


उच्छेहं पंचगुणं विक्खंभं हवइ दुगुण आयामं ।
पण्णासेण विभत्तं विक्खंभं हवइ अवगाहं ॥ ७२

अर्थ: [ उदाहरण- हिमवान् पर्वतका उत्सेध यो. १००; १०० x १० = १००० यो. उसके ऊपर स्थित पद्मद्रहका आयाम । १०० ÷ १० = १० यो. उक्त द्रहका अवगाह । १०० x ५ = ५०० यो. उसका विस्तार । ] उत्सेधको पांचसे गुणित करनेपर द्रहोंका विस्तार और उससे दूना उनका आयाम होता है । विस्तारप्रमाणको पचाससे विभक्त करनेपर उनके अवगाहका प्रमाण होता है ॥ ७२ ॥


आयामो दु सहस्सं विक्खंभं पंचजोयणसदाणि ।
हिमगिरिसिहरिदाणं दुगुणा दुगुणा परं तत्तो ॥ ७३

अर्थ: [ उदाहरण- हिमवान्का उत्सेध यो. १००; १०० x ५ = ५०० यो. पद्मद्रहका विस्तार । ५०० x २ = १००० यो. उसका आयाम । विस्तार यो. ५००; ५०० ÷ ५० = १० यो. उसका अवगाह । ] हिमवान् और शिखरी पर्वतोंपर स्थित द्रहोंका आयाम एक हजार योजन और विष्कम्भ पांच सौ योजन प्रमाण है । इसके आगे महाहिमवान् और रुक्मि [ आदि ] पर्वतोंपर स्थित द्रहोंका आयाम व विष्कम्भ उत्तरोत्तर दूना दूना है ॥ ७३ ॥


मज्झे दहस्स पउमं बे कोसा उट्ठिदा जलंतादो ।
चत्तारि य वित्थिण्णा मज्झे अंते य दो कोसा ॥ ७४

अर्थ: द्रहके मध्यमें जलसे दो कोश ऊंचा तथा मध्यमें दो कोश व अन्तमें दो ( १ + १ ) कोश, इस प्रकारसे चार कोश विस्तीर्ण कमल है ॥ ७४ ॥


वेडूलियविमलणाळं एगारसहस्सपत्तवरणिचिदं ।
सिरिणिलयं णववियसिदं दहमज्झे होइ बोद्धव्वा ॥ ७५

अर्थ: उक्त कमल वैडूर्यमणिमय निर्मल नाल और ग्यारह हजार उत्तम पत्रोंसे युक्त है । द्रहके मध्यमें नवविकसित [ कमलके ऊपर ] श्री देवीका गृह है ॥७५॥


तस्स वरपउमकलिया वेडूलियकवाडतोरणदुवारं ।
कूडागारमहारिहवाघारियफुल्लुव्वरदामं ॥ ७६

अर्थ: उत्तम कमलकलिकाके ऊपर स्थित उक्त भवनका द्वार वैडूर्यमणिमय कपाटों व तोरणोंसे युक्त तथा कूडागार (शिखराकार गृह) व बहुमूल्य लम्बी उत्तम पुष्पमालाओंसे सहित है ॥ ७६ ॥


कोसं आयामेण य कोसद्धं होदि चेव विच्छिण्णं ।
देसूणएक्ककोसं उच्छेहो तस्स भवणस्स ॥ ७७

अर्थ: वह भवन एक कोश आयामवाला, अर्ध कोश विस्तीर्ण और देशोन (पादान) एक कोश (३/४) ऊंचा है ॥ ७७ ॥


सिरिहिरिधितिकित्ती तहा बुद्धी लच्छी य देवकण्णाओ ।
एदेसु दहेसु सदा वसंति फुल्लेसुं पउमेसु ॥ ७८

अर्थ: द्रहोंमें फूले हुए इन कमलोंपर सदा श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी, ये देवकन्यायें निवास करती हैं ॥ ७८ ॥


दक्खिणदहपउमाणं सोहम्मिंदस्स होंति देवीओ ।
उत्तरदहवासिणीओ ईसाणिंदस्स बोहव्वा ॥ ७९

अर्थ: दक्षिण द्रहोंके पद्मोंपर स्थित देवियां सौधर्म इन्द्रकी, और उत्तर द्रहोंमें निवास करनेवाली देवियां ईशान इन्द्रकी जानना चाहिये ॥ ७९ ॥ पद्मोंपर उत्पन्न ये देवियां नीलोत्पलके समान निश्वासवाली, अभिनव


णीलुप्पळणीसासा अहिएणवलावण्णरूवसंपण्णा । दंसणसुहव्वसुदारे णिम्मलवरकणयसंकासा ॥ ८०

सुकुमारपाणिपादा आहरणविभूसिया मणभिरामा । कोइलमहुरालाबा कलागुणविण्णाणसंपण्णा ॥ ८१

हंसबहुगमणदच्छा पीणोरुपओहरा धवलणेत्ता । संपुण्णचंदवयणा णववियसि य कमलगंधडूढा ॥ ८२

सुकुमारवरसरीरा भिण्णंजणणिद्धणीलवरकेसा । वियडणियंबमणोहरथणभरभज्जंतवरमज्झा ॥ ८३

पलिदोवमाउठिदिया विज्जाहरसुरणराण मणखोहा । एदेसु समुप्पण्णा महिलाधम्मेण उप्पण्णा ॥ ८४

अर्थ (गाथा 80 से 84): लावण्यमय रूपसे सम्पन्न, देखनेमें सुभग व सुखकर, निर्मल एवं उत्तम सुवर्णके सदृश प्रभावाली, सुकुमार हाथ-पैरोंवाली आभरणोंसे विभूषित, मनको अभिराम, कोयलके समान मधुरभाषिणी; कलाओं, गुणों एवं विज्ञानसे सम्पन्न, हंसवधू (हंसी) के समान गमनमें दक्ष, स्थूल जंघा व पयोधरोंसे सहित, धवल नेत्रोंवाली, सम्पूर्ण चन्द्रके समान मुखसे सहित, नव विकसित कमलके गन्धसे व्याप्त, सुकुमार उत्तम शरीरवाली, भिन्न अंजनके समान स्निग्ध उत्तम नीले केशोंवाली, विशाल नितम्ब एवं मनोहर स्तनोंके भारसे भंग होनेवाले मध्य भागसे संयुक्त, एक पल्योपम प्रमाण आयुस्थिति-से संयुक्त, विद्याधर, देव एवं मनुष्योंके मनको क्षोभित करनेवाली, और महिलाधर्मसे युक्त होती हैं ॥ ८०-८४ ॥


सिरियादीदेवीणं परिवारगणाणं पडमवरभवणा । लक्खं बत्तीससहस्सा सयं च पण्णरस परिसंखा ॥ ८५

अर्थ: श्री आदि देवियोंके परिवारगणोंके कमलोंपर स्थित उत्तम भवन एक लाख बत्तीस हजार एक सौ पन्द्रह ( १४०११५ ) हैं ॥ ८५ ॥


सव्वाणं देवीणं तिण्णेव हवंति ताण सुरपरिसा । सत्ताणीया य तहा देवा वररूवसंपण्णा ॥ ८६

अर्थ: सब देवियोंके तीन सुरपरिषत् तथा उत्तम रूपसे सम्पन्न सात अनीक देव होते हैं ॥ ८६ ॥


अब्भंतरपरिसाणं आदिश्चो सुरवरो हवे पमुहो । बहुविहदेवसमग्गो ओलग्गइ सद्दकालं सो ॥ ८७

अर्थ: अभ्यन्तर पार्षदोंका प्रमुख आदित्य नामक उत्तम देव होता है । वह बहुत प्रकारके देवोंसे युक्त होकर सतत काल [ श्री देवीकी ] सेवा करता है ॥ ८७ ॥


सणद्धबद्धकवचो उप्पीलियसारापट्टिया मज्झे । धनुफलहसत्तिहत्थो सूरसमत्थो मदिपगब्भो ॥ ८८

पजलंतमहामउडो वरहारविहूसिओ विउलबच्छो । कडिसुत्तकडयकुंडलवत्थादिअलं कियसरीरो ॥ ८९

अर्थ (गाथा 88 से 89): वह आदित्य देव युद्धके लिये तत्पर होकर कवचको बांधे हुए, मध्यमें कसकर श्रेष्ठ पट्टिकाको बांधनेवाला, हाथमें धनुष, पटा ( या धनुष्फलक ) एवं शक्तिको लिये हुए, शूरोंमें समर्थ, मतिप्रगल्भ ( बुद्धिमान् ) प्रकाशमान महा मुकुटसे सहित, उत्तम हारसे विभूषित, विशाल वक्षस्थल से संयुक्त; तथा कटिसूत्र, कटक, कुण्डल, एवं वस्त्रादिसे अलंकृत शरीरसे युक्त


करवालकोंतकप्परे णाणाविहपहरणेहिं हत्थेहिं । दिव्वेहि समाउत्तो आणं सिरसा पडिच्छेइ ॥ ९०

अर्थ (गाथा 88 से 90): होकर हाथोंमें तलवार कुन्त, खप्पर एवं अन्य नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त हाथोंवाले देवों ( अंगरक्षकों ) से युक्त होकर आज्ञाको सिरसे ग्रहण करता है ॥ ८८-९० ॥


बत्तीससहस्साणं देवाणं सामिओ महासत्तो । अच्छरबहुपरिवारो भिच्चो सो पडमदेवीए ॥ ९१

अर्थ: बत्तीस हजार देवोंका स्वामी, महाबलवान् और अप्सराओंके बहुत परिवारसे सहित वह पद्मवासिनी श्री देवीका भृत्य ( सेवक ) है ॥ ९१ ॥


दक्खिणपुव्वदिसाए तस्स दु भवणाणि होंति दहमज्झे । बत्तीससहस्साइं य पडमिणिमज्झम्मि णेयाणि ॥९२

अर्थ: द्रहके भीतर दक्षिण-पूर्व दिशा ( आग्नेय ) में पद्मिनीयोंके मध्यमें उसके बत्तीस हजार भवन जानना चाहिये ॥ ९२ ॥


मज्झिमपरिसाण पहू चंदो णामेण णिग्गयपवाओ । चालीससहस्साणं देवाणं होइ सो राया ॥ ९३

अर्थ: मध्यम परिषदोंका प्रभु प्रतापी चन्द्र नामक देव है जो चालीस हजार देवोंका स्वामी होता है ॥ ९३ ॥


वरमउडकंुडलधरो उत्तममणिरयणवरपआलंबो । कडिसुत्तकणयकंठावरहारविहूसियसरीरो ॥ ९४

असिपरसुकणयमुग्गरभुसुंडिमूसलादिसाउहकरेहि । देवेहि समाउत्तो ओलगइ साणुराएण ॥ ९५

अर्थ (गाथा 94 से 95): उत्तम मुकुट व कुण्डलोंका धारक, उत्कृष्ट मणि एवं रत्नोंके श्रेष्ठ प्रालंब ( गलेका भूषणविशेष ) से सहित; कटिसूत्र, कटक, कंठा और उत्तम हारसे विभूषित शरीरवाला वह चन्द्र देव असि, परशु, बाण, मुद्गर, भुशुण्डि एवं मूसल आदि आयुधोंसे युक्त हाथोंवाले देवोंसे युक्त होकर अनुरागपूर्वक श्री देवीकी सेवा करता है ॥ ९४-९५ ॥


दक्खिणदिसाविभागे भवणाणि हवंति तस्स जलमज्झे । चालीससहस्साणि य दरवियसिकमलगब्भेसु ॥९६

अर्थ: उसके दक्षिणदिशा भागमें जलके मध्यमें किंचित् विकसित कमलोंके मध्यमें चालीस हजार भवन हैं ॥ ९६ ॥


बाहिरपरिसाहिवई जंदू त्ति णामेण णिग्गयपवावो । अडदालीससुराणं सहस्सगुणिदाण सो सामी ॥ ९७

अर्थ: बाह्य परिषदोंका अधिपति जो प्रतापी जतु नामक देव है वह अड़तालीस हजार देवोंका स्वामी होता है ॥ ९७ ॥


पजलंतवरकिरीडो णाणामणिविफुरंतमणिमउडो । आलोडियधवलणिम्मलचलंतमणिकंुडलाभरणो ॥ ९८

कोदंडदंडसव्वलभिंडीवालादियाहि सत्थाहि । असुरेहिं समाउत्तो अच्छइ आणं पडिच्छंतो ॥ ९९

अर्थ (गाथा 98 से 99): प्रकाशमान उत्तम किरीटसे सहित, नाना मणियोंसे देदीप्यमान उत्तम मणिमय मुकुटसे अलंकृत, आलोड़ित धवल निर्मल एवं चंचल मणिमय कुण्डल रूप आभरणोंसे सुशोभित वह जतु नामक प्रधान देव कोदण्ड, दण्ड, शर्वल ( कुन्त, बर्छी या सब्बल ) और भिन्दिपाल आदि अस्त्रोंसे युक्त हाथोंवाले देवोंसे युक्त हो कर आज्ञाकी प्रतीक्षा करता हुआ स्थित रहता है ॥ ९८-९९ ॥ सरोवरके बीच दक्षिण-


दक्खिणपच्छिमकोणे भवणाणि हवंति तस्स सरमज्झे।
अडदालीसाणि तहा सहस्सगुणिदाणि कमलेसु ॥१००

अर्थ: पश्चिम कोणमें कमलोंपर उसके अड़तालीस हजार भवन हैं ॥ १०० ॥


गयवरतुरयमहारहगोवइगंधव्वणट्टदासा य।
सत्ताणीया णेया सत्ताहिं कच्छांहिं संजुत्ता ॥ १०१

अर्थ: उत्तम गजेन्द्र, तुरग, महा रथ, गोपति (वृषभ), गन्धर्व, नर्तक और दास, ये सात कक्षाओंसे संयुक्त सात सेनायें जानना चाहिये ॥ १०१ ॥


उत्तुंगदंतमुसला अंजणगिरिसंणिभा महाकाया।
महुपिंगणयणजुयला सुरिंदधणुसंणिभो पट्टा ॥ १०२

पगलंतदाणगंडा वियडघडों गुलुगुलंतगज्जंता।
हत्थियडाणं सेण्णं सत्तहिं भागेहि संजुत्तं ॥ १०३

अर्थ (गाथा 102 से 103): उपर्युक्त गजराज उन्नत दांत रूपी मूसलोंसे सहित, अंजनगिरिके सदृश, महाकाय, मधु जैसे पीतवर्ण नेत्रोंसे युक्त, इन्द्रधनुषके सदृश पृष्ठवाले, गण्डस्थलोंसे बहते हुए मदसे संयुक्त तथा विशाल हाथियोंके समूहमें गुल-गुल गर्जना करनेवाला हस्ति सैन्य सात भागोंसे युक्त होता है ॥ १०२-१०३ ॥


एवं दुगुणा दुगुणा सत्त विभागा समासदो णेया।
सत्तण्हं अणियाणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ १०५

अर्थ: इस प्रकार संक्षेपसे सात विभाग दूने-दूने जानना चाहिये। सातों अनीकोंका यही क्रम जानना चाहिये ॥ १०५ ॥


वग्गंततुरंगैहि य वरचामरमंडिएहिं दिव्वेहिं।
अस्साणं वरसेण्णं सत्तहि भागेहि णिद्दिष्ट्ठं ॥ १०६

अर्थ: उत्तम चामरोंसे मण्डित होकर गमन करते हुये दिव्य तुरंगोंसे अश्वोंकी उत्तम सेना सात भागोंसे युक्त निर्दिष्ट की गई है ॥ १०६ ॥


मणिरयणमंडिएहि य पडाथैणिवहेहिं धवलछत्तेहिं ।
सत्ताहं कच्छेहिं तहा रहवरसेण्णं वियाणाहि ॥ १०७

अर्थ: मणि एवं रत्नोंसे मण्डित पताकासमूहों और धवल छत्रोंसे युक्त सात कक्षावाली रथोंकी सेना जानना चाहिये ॥ १०७ ॥


ककुदखुरसिंगॅलंगुलभासुरकाएहि दिव्वरूवेहिं ।
सत्तविभागेहि तहा गोवइसेण्णं वि णिद्दिष्ट्ठं ॥ १०८

अर्थ: ककुद, खुर, सींग और पूंछसे शोभायमान शरीरवाले तथा दिव्य रूपसे युक्त बैलोंकी सेना भी सात विभागोंसे युक्त कही गई है ॥ १०८ ॥


महुरेहि मणहरेहि य सत्तस्सरसंजुदेहि गिज्जतं ।
गंधव्वाणं सेण्णं सत्तहि कच्छेहि संजुत्तं ॥ १०९

अर्थ: देवोंकी हस्तिसेनाके जितने हाथी पहिले भागमें कहे गये हैं, उनसे दूने वे द्वितीय भागमें जानना चाहिये। इस प्रकार देवोंकी गजसेना आगे आगेके भागोंमें दूनी दूनी होती जाती है ॥ १०४ ॥ मधुर व मनोहर सात स्वरोंसे संयुक्त गाती हुई गन्धर्वोंकी सेना सात कक्षाओंसे युक्त होती है ॥ १०९ ॥ अतिशय रूपवाले तथा आभरणोंसे विभूषित


अदिसयरूवाणं तहा आभरणविहूसिदाण देवाणं । णच्चणगायणेसेण्णं सत्तहि भागेहि णिद्दिट्ठं ॥ ११०

अर्थ: नर्तकों व गायकोंकी सेना सात भागोंसे युक्त कही गई है ॥ ११० ॥


दासीदासेहि तहा वंठादियविविहरूवभिच्चेहि । होइ तह दाससेण्णं सत्तहि कच्छाहि संजुत्तं ॥ १११

अर्थ: दासी-दासों तथा षंढ (वामन या अविवाहित) आदि विविध प्रकारके स्वरूपवाले भृत्योंसे संयुक्त दासोंकी सेना सात कक्षाओंसे युक्त होती है ॥ १११ ॥


पच्छिमदिसाभागे सरवरमज्झम्मि सरवद्देसु तह । सत्तेव व वरगेहा सत्ताणीयाण णिद्दिट्ठा ॥ ११२

अर्थ: सरोवरके बीच पश्चिम दिशा-भागमें कमलोंके ऊपर सात अनीकोंके सात ही उत्तम गृह निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ११२ ॥


सामागिओ सुरिंदो आभरणविहूसिओ परमरूवो । चत्तारिसहस्साणं देवाणं अहिवई धीरो ॥ ११३

अर्थ: आभरणोंसे विभूषित, धीर और उत्तम रूपवाला सामानिक सुरेन्द्र चार हजार देवोंका अधिपति होता है ॥ ११३ ॥


संपुण्णचंदवयणो पलंबबाहू य सव्वसमंगो । णीलुप्पलणीसासो अहिणवकणियारसंकासो ॥ ११४

अर्थ: उक्त सुरेन्द्र पूर्ण चन्द्रके समान मुखवाला, लम्बे बाहुओंसे सहित, स्वस्थ सब अवयवोंसे सुशोभित, नीलोत्पलके समान निःश्वाससे युक्त और नवीन कनेरपुष्पके सदृश होता है ॥ ११४ ॥


पच्छिमउत्तरभागे उत्तरभागे य पुव्वउत्तरदो । तह चत्तारिसहस्सा तस्स गिहा होंति पडमेसु ॥ ११५

अर्थ: पश्चिम-उत्तर भाग (वायव्य), उत्तरभाग तथा पूर्व-उत्तर भाग (ईशान) में पद्मोंके ऊपर उसके चार हजार गृह हैं ॥ ११५॥


दिव्वामलदेहधरा दिव्वाभरणेहि भूसियसरीरा । मणिगणजलंतमउडा वरकुंडलमंडियागंडा ॥ ११६

सिंहासणमज्झगया वरचामरविज्जमाण बहुमाणा । धवलादवत्तचिण्हा चदुरेवसहस्सपरिवारा ॥ ११७

सिरिदेविपाद रक्खा चउरो य हवंति तेजसंपण्णा । बहुविहजोहेहिंसमग्गा ओलग्गंता परिचरंति ॥ ११८

अर्थ (गाथा 116 से 118): दिव्य व निर्मल देहके धारक, दिव्य आभरणोंसे भूषित शरीरवाले, मणिसमूहसे चमकते हुए मुकुटसे शोभायमान, उत्तम कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंसे संयुक्त, सिंहासनके मध्यमें स्थित, उत्तम चामरोंसे वीज्यमान, बहुमानी, धवल आतपत्र रूप चिह्नसे सहित, चार हजार परिवार देवोंसे संयुक्त, श्री देवीके चरणोंकी रक्षा करनेवाले, तेजस्वी, तथा बहुत प्रकारके योद्धाओंसे सहित वे देव श्री देवीकी सेवा करते हुए परिचर्या करते हैं ॥ ११६-११८॥


भवणाणि ताण हुंति हु चउसु वि य दिसासु पडमकुल्लेसु । पत्तेयं पत्तेयं चउरो चउरो सहस्साणि ॥ ११९

अर्थ: उनमेंसे प्रत्येकके चारों दिशाओंमें कमलपुष्पोंके ऊपर चार चार हजार भवन हैं ॥ ११९॥


कुंदेंदुसंखहिमचयणिम्मलवरहारभूसियावच्छा ।
मणिगणकरओहामियदिणयरकरकुंडलाभरणा ॥ १२०

अट्ठोत्तरसयसंखा पडिहारा मंतिणो य दूदा य ।
बहुपरिवारा धीरा उत्तमरूवा विणीदा य ॥ १२१

अर्थ (गाथा 120 से 121): कुन्दपुष्प, चन्द्रमा एवं हिमसमूहके समान स्वच्छ उत्तम हारसे भूषित वक्षस्थलवाले, मणिसमूहकी किरणोंसे सूर्यकिरणोंको तिरस्कृत करनेवाले कुण्डलोंसे अलंकृत, बहुत परिवारवाले, धीर, उत्तम रूपसे युक्त और विनयको प्राप्त हुए ऐसे एक सौ आठ प्रतीहार, मंत्री व दूत होते हैं ॥ १२०-१२१ ॥


भवणाणि ताणें दिट्ठा दहमज्झे होंति पउमगब्भेसु ।
अट्ठोत्तराणि णेया सद्दाणि दिसविदिसभागेसु ॥ १२२

अर्थ: द्रहके मध्यमें दिशा-विदिशा भागोंमें पद्मोंके बीचमें उनके एक सौ आठ भवन निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये ॥ १२२ ॥


सव्वाणि वरघराणि य तोरणपायारसरवरादीणि ।
पउमिणिसंडाणि तहा अणाइणिहणाणि जाणाहि ॥ १२३

अर्थ: सब उत्तम घर, तोरण, प्राकार, सरोवरादिक तथा पद्मिनी-खण्ड अनादि निधन हैं, ऐसा जानिये ॥ १२३ ॥


भवणाणि वि णायव्वा कंचणमणिरयणवज्जमइयाणि ।
इंदणीलमरगयदिणयरससिकिरणणिवहाणि ॥ १२४

अर्थ: ये भवन सुवर्ण, मणि, रत्न एवं वज्रसे निर्मित और इन्द्रनील, मरकत, सूर्यकान्त व चन्द्रकान्त मणियोंके समूहसे संयुक्त हैं ॥ १२४ ॥


भवणेसु तेसु णेया पुव्वकयसुकयकम्मजोगेण ।
उप्पज्जंति हु देवा देवीओ दिव्वरूवाओ ॥ १२५

अर्थ: उन भवनोंमें पूर्वकृत पुण्य कर्मके योगसे दिव्य रूपवाले देव और देवियां उत्पन्न होती हैं ॥ १२५ ॥


एयं च सयसहस्सा चालीससहस्स होंति णिद्दिट्ठा ।
एवं च सयं णेया सोलस कमलाण परिसंखा ॥ १२६

अर्थ: उन कमलोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ सोलह (१ + ३२००० + ४०००० + ४८००० + ७ + ४००० + १६००० + १०८ = १४०११६) जानना चाहिये ॥ १२६ ॥


विक्खंभुच्छेहादी पउमाणं दुगुणदुगुणवड्डी हु ।
हिमवंतादो णेया जाव दु णिसहो गिरिंदो य ॥ १२७

अर्थ: हिमवान्से लेकर निषध पर्वत पर्यन्त कमलोंके विष्कम्भ व उत्सेधादिकमें दुगुणी दुगुणी वृद्धि जानना चाहिये ॥ १२७ ॥


जंबुदुमेसुं एवं परिसंखा होंति जंबुगेहाणं ।
णवरि विसेसो जाणे चत्तारिदुमाहिया जंबू ॥ १२८

अर्थ: इसी प्रकार जम्बू वृक्षोंके ऊपर जम्बूगृहोंकी भी संख्या है। यहां केवल इतना विशेष जानना चाहिये कि जम्बू वृक्ष चार वृक्षोंसे अधिक हैं ॥ १२८ ॥


जंबुदुमाहिवस्से दु चत्तारि हवंति तस्स महिसीओ ।
चत्तारि जंबुगेहा देवीणं होंति णिद्दिट्ठा ॥ १२९

अर्थ: जो देव जम्बू वृक्षका अधिपति है उसकी चार पट्टदेवियां हैं। उन देवियोंके चार जम्बू वृक्ष निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १२९ ॥


एदेण कारणेण य चदुसहिया होंति जंबुगेहाणि । जह वण्णणा सरस्स दु तह जंबुद्दुमस्स णिद्दिट्ठा ॥ १३०

अर्थ: कारण पद्मगृहोंकी अपेक्षा जम्बू वृक्ष चार अधिक हैं। जैसा वर्णन सरोवरका किया गया है वैसा ही जम्बू वृक्षका भी बतलाया गया है ॥ १३० ॥


उणवीसा एयसयं चालीससहस्स तह य जंबुघरा । एवं च सयसहस्सं जंबुस्स दु होंति परिवारा ॥ १३१

अर्थ: जम्बू वृक्षके उत्तम परिवारवृक्ष एक लाख चालीस हजार एक सौ उन्नीस हैं ॥ १३१ ॥


वीसहियसयं णेया चालीससहस्स एगरूऊणं च । जंबुद्दुमपरिसंखा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ १३२

अर्थ: जम्बू वृक्षोंकी संख्या सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस जानना चाहिये ॥ १३२ ॥


जावदिय जंबुभवणा जावादिया तह य पउमवरभवणा । तावदिया णिद्दिट्ठा जिणभवणा होंति रयणमया ॥ १३३

अर्थ: जितने जम्बूभवन और जितने पद्मभवन हैं उतने ही रत्नमय जिनभवन भी कहे गये हैं ॥ १३३ ॥


जावदिय जंबुगेहा णाणाविहकणयरयणपरिणामा । तावदिया णायव्वा सामलिरुक्खाण परिगेहा ॥ १३४

अर्थ: नाना प्रकारके सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप जितने जम्बूगृह हैं उतने ही शाल्मलिवृक्षोंके भी गृह जानना चाहिये ॥ १३४ ॥


णवण्णगूणा सुण्णं चत्तारि य एग होंति परिसंखा । थाणक्कमेण णेया सामलिरुक्खस्स परिवारा ॥ १३५

अर्थ: नौ, एक, एक, शून्य, चार और एक (१४०११९) इस प्रकार स्थान (अंक-) क्रमसे शाल्मलिवृक्षके परिवारवृक्षोंकी संख्या जानना चाहिये ॥ १३५ ॥


सुण्णदुगएक्कसुण्णं चत्तारि य एय होंति णिद्दिट्ठा । सामलितरुवर सव्वा थाणाणुकमेण जाणाहि ॥ १३६

अर्थ: शून्य, दो, एक, शून्य, चार और एक, (१४०१२०) इस प्रकार स्थान (अंक) क्रमसे सब शाल्मलिवृक्षोंकी संख्या निर्दिष्ट की गई जानना चाहिये ॥ १३६ ॥


एवं महाघराणं परिसंखा ताण होंति णिद्दिट्ठा । खुल्लयघर णिवहाणं को वण्णइ ताण परिसंखा ॥ १३७

अर्थ: इस प्रकार उन महागृहोंकी संख्या निर्दिष्ट की है। उनके क्षुद्र घरोंके समूहोंकी संख्याका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥ १३७ ॥


पुव्वाभिमुहा णेया उत्तमगेहा हवंति णिद्दिट्ठा । थाणाभिमुहा सेसा जहण्णगेहा वियाणाहि ॥ १३८

अर्थ: उत्तम गृह पूर्वाभिमुख निर्दिष्ट किये गये हैं। शेष जघन्य गृह उनके सम्मुख जानना चाहिये ॥ १३८ ॥


पउमेसु सामलीसु य जंबूरुक्खे य रयणपरिणामा । जिणभवणा णिद्दिट्ठा अक्किट्टिमा सासद्स्वभावा ॥ १३९

अर्थ: पद्मों, शाल्मलिवृक्षों और जम्बूवृक्षोंके ऊपर रत्नोंके परिणाम रूप अकृत्रिम और शाश्वत स्वभाववाले जिनभवन निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १३९ ॥


भिंगारकलसदप्पणवुव्वुदघंटादियधयवडाएहिं । सोहंति जिणाण घरा मणिकंचणमंडिया दिव्या ॥ १४०

अर्थ: मणयों और सुवर्णसे मण्डित ये दिव्य जिनभवन भृंगार, कलश, दर्पण, बुद्बुद, घंटादिक एवं ध्वजा-पताकाओंसे शोभायमान होते हैं ॥ १४० ॥ उन जिनभवनोंमें सब उपकरणोंसे सहित जिनप्रतिमायें


वरचामरभामंडलछत्तत्तयकुसुमवरिसणिवहेहिं । सव्वोवकरणसहिदा जिणपडिमाओ विरायंति ॥ १४१

अर्थ: उत्तम चामर, भामंडल, तीन छत्र और कुसुमवृष्टिके समूहोंसे विराजमान हैं ॥ १४१ ॥


उववादघरा गेया अहिसेयघरा य मंडणघरा य । अत्थाणघरा विउला गब्भघरा कीडणघरा य ॥ १४२

णाडयघरा विचित्ता वरतूरमुदिंगसद्दगंभीरा । मोहणघरा विसाला कालागरुसुरहिगंधड्ढा ॥ १४३

दोलाघरा य रम्मा णाणामणिदिप्फुरंतकिरणोहा । संगीयघरा तुंगा सभाघरा होंति रमणीया ॥ १४४

अर्थ (गाथा 142 से 144): उक्त जिनभवनोंमें विशाल उपपादगृह, अभिषेकगृह, मण्डनगृह, आस्थानगृह, गर्भगृह और विस्तृत क्रीड़ागृह जानना चाहिये । इनके अतिरिक्त उत्तम तूर्य एवं मृदंगके शब्दसे गंभीर विचित्र नाटक गृह, कालागरुकी सुगन्धसे व्याप्त विशाल मोहनगृह (मैथुनगृह), नाना मणियोंके प्रकाशमान किरणसमूहसे युक्त रमणीय दोलागृह, उन्नत संगीतगृह और रमणीय सभागृह भी होते हैं ॥ १४२-१४४ ॥


एवं अवसेसाणं दीवाणं सुरवराण पडमेसु । जंबूसु सामलीसु य संखापरिमाण णिद्दिठ्ठा ॥ १४५

अर्थ: इसी प्रकार अवशेष द्वीपोंके पद्मों, जम्बूवृक्षों और शाल्मलिवृक्षोंपर स्थित उत्तम देवोंकी संख्याका प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १४५ ॥


पडमस्स सिहरिरयस्स य तिण्णेव महानदी समुद्दिठ्ठा । अवसेसाण दहाणं सरियाओ होंति दो दो दु ॥ १४६

अर्थ: पद्म द्रह और शिखरी पर्वत पर स्थित महापुण्डरीक द्रहसे निकली हुई तीन तीन महानदियां तथा शेष द्रहोंसे निकली हुई दो दो नदियां कही गई हैं ॥ १४६ ॥


गंगाकूडमपत्ता जोयणमद्धेण दक्खिणे वलिया । पंचेव जोयणसया तेवीसा अद्धेकोसाधिया ॥ १४८

हिमवंतअंतमणिमयवरकूडमुहम्मि वसहुरूवाम्मि । पविसित्तु पडइ धारा सयजोयणतुंगससिधवळा ॥ १४९

अर्थ (गाथा 147 से 149): गंगानदी पद्म द्रहके पूर्व तोरणद्वारसे निकलकर पांच सौ योजन प्रमाण पूर्वकी ओर जाकर गंगाकूटको न पाकर अर्ध योजन पूर्वसे दक्षिणकी ओर मुड़ जाती है । पुनः पांच सौ तेईस योजन और अर्ध कोशसे अधिक आगे जाकर हिमवान्पर्वतके अन्तमें वृषभाकार मणिमय उत्तम कूट (नालि) के मुखमें प्रवेश करके सौ योजन ऊंचेसे चन्द्रके समान धवल गंगानदीकी धारा नीचे गिरती है ॥ १४७-१४९ ॥


छज्जोयण सक्कोसा पणालिया वित्थडा मुणेयव्वा । आयामेण य णेया बे कोसा तेत्तिया बहला ॥ १५०

अर्थ: नालीका विस्तार छह योजन एक कोश, आयाम दो कोश और इतना ही उसका बाहल्य भी जानना चाहिये ॥ १५० ॥


सिंगमुहकण्णजीहाणयणभूवादिएहि गोसरिसा । वसह त्ति तेण णामा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ १५१

अर्थ: नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप यह नाली चूंकि सींग, मुख, कान, जिह्वा, नयन और भ्रू आदिकोंसे गौके सदृश है, इस कारण उसका नाम ‘वृषभ’ है ॥ १५१ ॥


तत्तो अड्ढुद्धया वज्जपणालीण रयणणिवहाणं । विक्खंभा आयामा बहुलपमाणा समुद्दिठ्ठा ॥ १५३

अर्थ: निषध पर्वतसे आगे रत्नसमूहसे निर्मित उक्त नालियोंके विष्कम्भ, आयाम और बाहल्यका प्रमाण उत्तरोत्तर आधा आधा हीन कहा गया है ॥ १५३ ॥


गंगा जम्हि दु पडिदा वंसधरादो तहिं हवे कुंडं । दसजोयणावगाहं धरणीवले सव्वदो वहं ॥ १५४

अर्थ: गंगा नदी हिमवान् पर्वतसे जहां गिरी है वहां पृथ्वीतलपर सब ओरसे गोल दश योजन गहरा कुण्ड है ॥ १५४ ॥


सरिमुहदसगुणवित्थडा तस्स दु बहुदेसमज्झभागम्मि । दीवो रयणविचित्तो वित्थिण्णो जोयणा अट्ठ ॥ १५५

अर्थ: गंगा नदीकी धारासे दशगुणे ( ६ १/४ x १० = ६२ १/२ यो.) विस्तारवाले उक्त कुण्डके ठीक बीचमें रत्नोंसे विचित्र आठ योजन विस्तृत द्वीप है ॥ १५५ ॥


वज्जमयमहादीवे बेकोससमुट्ठिदे सिदं जलादो । तम्हि बहुमज्झभागे णगोत्तमो होइ णिद्दिट्ठो ॥ १५६

अर्थ: धवल जलसे ऊपर दो कोश ऊंचे उस महा द्वीपके बहुमध्य भागमें उत्तम वज्रमय पर्वत कहा गया है ॥ १५६ ॥


दसजोयणउव्विद्धो मूले चत्तारि जोयणायामो । बे जोयण मज्झम्मि य उवरिं एगो समुद्दिठ्ठो ॥ १५७

अर्थ: यह पर्वत दश योजन ऊंचा और मूलमें चार योजन, मध्यमें दो योजन तथा ऊपर एक योजन आयाम ( विस्तार ) वाला कहा गया है ॥ १५७ ॥


तस्स दु मज्झे दिव्वो पासादो कणयरयणपरिणामो । मणिगणजलंतखंभो गंगाकूडे त्ति णामेण ॥ १५८

अर्थ: उसके मध्य भागमें सुवर्ण व रत्नोंके परिणाम स्वरूप एवं मणिगणोंसे प्रकाशमान खम्भोंसे सहित गंगाकूट नामक दिव्य प्रासाद है ॥ १५८ ॥


बेधणुसहस्सतुंगो अड्ढाइज्जा धणूणि वित्थिण्णो । णवचंपयगंधड्ढो संपुण्णमियंककिरणोहो ॥ १५९

अर्थ: इसके आगे निषध पर्वत पर्यन्त उक्त वृषभाकार नालीका विस्तारादि उत्तरोत्तर दुगुणा दुगुणा जानना चाहिये ॥ १५२ ॥ नवीन चम्पककी गन्धसे व्याप्त और सम्पूर्ण चन्द्रमाके समान किरणसमूहसे सहित वह प्रासाद दो हजार धनुष ऊंचा व अढाई [हजार] धनुष विस्तीर्ण है [ ति. प. ४-२२५ और त्रि. सा. ५८८ में इसका विस्तार मूलमें १००० मध्यमें २००० और ऊपर १००० धनुष प्रमाण बतलाया गया है ] ॥ १५९ ॥


रयणमय वरदुवारो चालीसाधणुप्पमाणवित्थिण्णो ।
आइच्चमंडलणिभो असीदिधणुउण्णओ दिव्वो ॥ १६०

अर्थ: सदृश उसका रत्नमय उत्तम दिव्य द्वार चालीस धनुष प्रमाण विस्तीर्ण और अस्सी धनुष उन्नत है ॥ १६० ॥


वरवेदियपरिक्खित्ते चडगोउरमंडिए परमरम्मे ।
दिव्ववणसंडजुत्ते गंगादेवी तहिं वसई ॥ १६१

अर्थ: उत्तम वेदीसे वेष्टित, चार गोपुरोंसे मण्डित और दिव्य वनखण्डोंसे युक्त उस अतिशय रमणीय प्रासादमें गंगादेवी निवास करती है ॥ १६१ ॥


जिणपडिमासंछण्णो भवणोवरि तुंगकूडसिहरम्मि ।
पणुवीस वित्थडा सा गंगाधारा तहिं पडइ ॥ १६२

अर्थ: वहां भवनके ऊपर स्थित जिनप्रतिमासे युक्त उन्नत कूटशिखरपर वह गंगानदीकी धारा पच्चीस योजन विस्तृत होकर गिरती है ॥ १६२ ॥


वरकुंडकुंददीवा कुंडणगा कुंडविउलपासादा ।
दुगुणा दुगुणा णेया णिसधो त्ति घराचलो जामे ॥ १६३

अर्थ: निषधपर्वत पर्यन्त उत्तम कुण्ड, कुण्डद्वीप, कुण्डनग और विशाल कुण्डप्रासाद, ये सब दूने दूने जानने चाहिये ॥ १६३ ॥


बे कोसा बासट्ठा पणवीस सदं दुअट्ठपंचसदं ।
गंगादियकुंडाणं विण्णेया जोयणा होंति ॥ १६४

अर्थ: उक्त गंगादिक कुण्डोंका विस्तार क्रमसे बासठ योजन दो कोश, एक सौ पच्चीस योजन, दो सौ व अर्ध सौ ( अढ़ाई सौ ) तथा पांच सौ योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १६४ ॥


अट्ठ सोला बत्तीस चउसट्ठा जोयणा हवे दीवा ।
दस बीसा चालीसा असीदि तुंगा तहा सेला ॥ १६५

अर्थ: कुण्डस्थ द्वीपोंका विस्तार क्रमशः आठ, सोलह, बत्तीस और चौंसठ योजन; तथा उनमें स्थित शैलोंकी ऊंचाई क्रमशः दश, बीस, चालीस और अस्सी योजन प्रमाण है ॥ १६५ ॥


चत्तारि अट्ठ सोलस बत्तीसा वित्थडा य मूलेसु ।
दोण्णि चउरट्ठ सोलस मज्झेसु हवंति सेलाणं ॥ १६६

अर्थ: उक्त शैलोंका मूलविस्तार क्रमसे चार, आठ, सोलह और बत्तीस योजन; तथा मध्यविस्तार दो, चार, आठ और सोलह योजन है ॥ १६६ ॥


एय दुय चदुर अट्ठ य वित्थारा होंति तुंगसिहरेसु ।
सरिकुंडणगाण तहा णिद्दिट्ठा होंति णियमेण ॥ १६७

अर्थ: नदीकुण्डस्थ उक्त पर्वतोंका विस्तार उन्नत शिखरोंपर नियमसे एक, दो, चार और आठ योजन प्रमाण कहा गया है ॥ १६७ ॥


पणुवीसा पण्णासा जोयणसदं बेसदा समुद्दिट्ठा ।
गंगादीसरियाणं णेया धारा हवे रुंदा ॥ १६८

अर्थ: गंगादिक नदियोंकी धाराका विस्तार क्रमसे पच्चीस, पचास, सौ और दो सौ योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १६८ ॥


जोयणसदेक्क बे चउ हिमकुंदमुणालसंखसंकासा ।
दीहा धारावडणा गंगादीणं सरीणं तु ॥ १६९

अर्थ: हिम, कुन्दपुष्प, मृणाल और शंख जैसे वर्णवाले गंगादिक नदियोंके धारापतनोंकी दीर्घता उत्तरोत्तर एक सौ, दो सौ और चार सौ योजन प्रमाण है ॥ १६९ ॥


सव्वे वि वेदिणिवहा वरतोरणमंडिया परमरम्मा ।
पवरच्छरेहिं भरिया अच्छेरयरूवसाराहि ॥ १७०

अर्थ: नदीकुण्डस्थ पर्वतोंके ऊपर स्थित सब ही प्रासाद वेदीसमूहसे सहित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय,


णिच्चं मणोहिरामा अच्छेरयरूवसारसंठाणा ।
पुप्फोवयारपउरा वंदणमालुज्जलसिरीया ॥ १७१

णिवडंतसलिलपउरा सियचामरहारतारसंकासा ।
लंबंतरयणमाला मणिकमलकदम्बपूजणसणाहा ॥ १७२

घंटाकिंकिणिनिवहा जलधारापायजणियझंकारा ।
जिणसिद्धबिंबणिवहा सरिकुंडणगाणं पासाया ॥ १७३

अर्थ (गाथा 170 से 173): आश्चर्यजनक उत्तम रूपवाली अप्सराओंसे परिपूर्ण, सदा मनको रमानेवाले, आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूप व आकृतिसे सहित, प्रचुर पुष्पोंके उपचारसे सहित, वन्दनमालाओंसे उज्ज्वल शोभाको प्राप्त, गिरते हुए प्रचुर जलसे संयुक्त; धवल चामर, हार व मोती (या तारा) के सदृश; लम्बायमान रत्नमालाओंसे युक्त, मणिमय कमलोंसे की गई पूजासे सनाथ, घंटा व किंकणियोंके समूहसे सहित, जलधाराके पातसे उत्पन्न हुए झंकारसे परिपूर्ण, तथा जिन एवं सिद्धोंकी प्रतिमाओंके समूहसे युक्त हैं ॥ १७०-१७३ ॥


णीसरिदूण य गंगा कुंडदुवारेण दक्खिणाभिमुखी ।
वेदड्ढगुहामज्झे पुव्वसमुद्दं अणुप्पत्ता ॥ १७४

अर्थ: गंगानदी गंगाकुण्डद्वारसे निकलकर दक्षिणाभिमुख होती हुई वैताढ्य पर्वतकी गुफाके मध्यमेंसे पूर्व समुद्रको प्राप्त होती है ॥ १७४ ॥


मणिमंडियाण जेया वज्जिंदमसारगल्लमइयाणं ।
वरतोरणाणं हेट्ठा बिलेण पइसंति सरियाओ ॥ १७५

अर्थ: गंगादिक नदियां मणियोंसे मण्डित और वज्र, इन्द्र [-नील] एवं मसारगल्ल (एक रत्नजाति) से निर्मित उत्तम तोरणोंके नीचे बिलमेंसे समुद्रमें प्रवेश करती हैं ॥ १७५ ॥


तेणउदिजोयणाई उत्तुंगो विविहेरयणसंछण्णो ।
तिण्णेव हवे कोसा परिसंखा तस्स जाणीहि ॥ १७६

अर्थ: विविध रत्नोंसे व्याप्त उस तोरणकी ऊंचाईका प्रमाण तेरानवै योजन और तीन कोश जानना चाहिये ॥ १७६ ॥


बे कोसा बासट्ठा वित्थारो तोरणे समुद्दिट्ठो ।
बे कोसा अवगाढो बे कोसा होइ बहुलेण ॥ १७७

अर्थ: उक्त तोरणका विस्तार बासठ योजन दो कोश, अवगाह दो कोश और बाहल्य दो कोश प्रमाण है ॥ १७७ ॥


अवसेसतोरणाणं णिम्मलमणिकणयरयणणिवहाणं ।
दुगुणा दुगुणा णेया वित्थारो जाम सीदोदा ॥ १७८

अर्थ: सीतोदा पर्यन्त निर्मल मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह रूप सेस तोरणोंका विस्तार उत्तरोत्तर दूना दूना जानना चाहिये ॥ ७८ ॥


गंगासिंधूतोरण बासट्ठी जोयणा दु बे कोसा ।
भरहम्मि समुद्दिट्ठा लवणसमुद्दप्पवेसेसु ॥ १७९

अर्थ: भरतक्षेत्रमें गंगा और सिन्धुके तोरण लवणसमुद्रके प्रवेशमें बासठ योजन और दो कोश प्रमाण विस्तीर्ण कहे गये हैं ॥ १७९ ॥


रोहीरोहिदतोरण पणुवीस सदाणि जोयणपमाणा ।
हेमवदे वित्थिण्णा सायरसलिलप्पवेसेसु ॥ १८०

अर्थ: हैमवतक्षेत्रमें रोहित् व रोहितास्याके तोरण लवणसमुद्रके प्रवेशमें एक सौ पच्चीस योजन प्रमाण बिस्तीर्ण हैं ॥ १८० ॥ हरिवर्ष क्षेत्रमें हरित् व हरि-


हरिहरिकंता तोरण बासदवण्णासजोयणपमाणा । हरिवरिसे विच्छिण्णा लवणसमुद्दप्पवेसेसु ॥ १८१

अर्थ: कान्ताके तोरण लवणसमुद्रके प्रवेशमें दो सौ पचास योजन प्रमाण विस्तीर्ण हैं ॥ १८१ ॥


सीदासीदोदाणं तोरणदारा हवंति विच्छिण्णा । पंचेव जोयणसदा विदेहमज्झम्मि लवणंते ॥ १८२

अर्थ: विदेहके मध्यमें सीता-सीतोदाके तोरणद्वार लवणसमुद्रके समीप पांच सौ योजन प्रमाण विस्तीर्ण हैं ॥ १८२ ॥


लंबंतरयणपउरा मुत्तादामेहिं मंडिया दिव्वा । णाणापडायमाला पवणपणच्चंतसाहाहिं ॥ १८३

चामरघंटाकिंकिणिवंदणमालाहिं सोहिया पवरा । भिंगारकलसदप्पणचामीयरकमलकयसोहा ॥ १८४

मणिसालहंजिगपवरकणयमयसीहवालयसणाहा । वरचामरादिसोहिया जिणपडिविहूसिया रम्मा ॥ १८५

वज्जेंदणीलमरगयकक्केयणपुस्सरागपरिणामा । कंचणपवालणिवहा तोरणदारा समुद्दिद्वा ॥ १८६

अर्थ (गाथा 183 से 186): उक्त तोरणद्वार लम्बायमान प्रचुर रत्नोंसे सहित, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, पवनसे प्रेरित होकर आकाशमें नाचनेवाली नाना पताकाओंके समूहों और चामर, घंटा, किंकिणी व वन्दनवारोंसे शोभित; श्रेष्ठ; भृंगार, कलश, दर्पण व सुवर्णकमलोंसे शोभायमान; मणिमय शालभंजिका (पुतली) एवं श्रेष्ठ सुवर्णमय सिंहबालकोंसे सनाथ, उत्तम चामरादिकोंसे सहित जिनप्रतिमाओंसे विभूषित, रमणीय; वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन एवं पुखराज मणियोंके परिणाम रूप और सुवर्ण एवं मूंगोंके समूहसे युक्त कहे गये हैं ॥ १८३-१८६ ॥


मेहलकलावे मणिगणकरणियरविभिण्णअंधयाराओ । कडिसुत्तकडयकुंडलवरहारविहूसियंगीओ ॥ १८७

लायण्णरूवजोव्वणबहुगुणसंदोहसुव्वहंतीओ । कलरडिदमिहुप्पजंपियदसणुज्जलचंदधवलाओ ॥ १८८

दिणयरकरणियरहयविभिण्णतवत्तगब्भगउराओ । सरसमयमेघविरहियसंपुण्णमियंकवयणाओ ॥ १८९

उण्णयपीणपओहरउवरिविरायंतचारुहाराओ । ससिदलिदेकुमुदकुवलयवियसिदसयवत्तणेत्ताओ ॥ १९०

धम्मेण होंति ताओ देवीओ तोरणाण रम्माओ । मणिमयपासादेसु य णाणामणिविप्फुरंतकिरणेसु ॥ १९१

अर्थ (गाथा 187 से 191): इन तोरणोंपर स्थित नाना मणियोंकी प्रकाशमान किरणोंसे सहित मणिमय प्रासादोंमें मेखलाकलापमें जड़ी हुई मणियोंके किरणसमूहसे अन्धकारको नष्ट करनेवाली; कटिसूत्र, कटक, कुण्डल एवं उत्तम हारसे विभूषित शरीरवाली; लावण्यमय रूप, यौवन एवं बहुतसे गुणोंके समुदायको धारण करनेवाली; कलरटित व मृदु प्रजल्पनमें [ प्रगट होनेवाले ] दांतोंसे उज्ज्वल एवं चन्द्रके समान धवल, सूर्यके किरणसमूहसे आहत होकर विकासको प्राप्त हुए कमलके मध्य भागके समान गौर वर्णवाली, शरत्कालीन मेघोंसे रहित सम्पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, उन्नत एवं स्थूल पयोधरोंके ऊपर विराजमान सुन्दर हारसे अलंकृत, तथा चन्द्रसे विकासको प्राप्त हुए कुमुद, कुवलय व विकसित कमलके समान नेत्रोंवाली वे रमणीय देवियां धर्मके प्रभावसे उत्पन्न होती हैं ॥ १८७-१९१ ॥ गंगा, रोहित, हरित्, सीता, नारी, सुवर्णकूला और रक्ता, ये


गंगा य रोहिदा सा पुण हरि सीता य होंति णारी य ।
बंसे सुवण्णकूला रत्ता वि य पुव्वगा सरिदा ॥ १९२

अर्थ: नदियां [ अपने अपने ] वर्षमें पूर्व समुद्रको जानेवाली हैं ॥ १९२ ॥


सिंधू य रोहिदासा हरिकंता चेव होइ सीदोदा ।
अपरेण य णरकंता रुप्पकूला य रत्तवदिगा य ॥ १९३

अर्थ: सिन्धु, रोहितास्या, हरिकान्ता, सीतोदा, नरकान्ता, रूप्यकूला और रक्तवती ( रक्तोदा ), ये नदियां अपर समुद्रको जानेवाली हैं ॥ १९३ ॥


छज्जोयण सक्कोसा पवहो अंते य दसगुणो वालो ।
भरहेरवदणईणं वंसे वंसे हवे दुगुणा ॥ १९४

अर्थ: भरत और ऐरावत क्षेत्रोंकी नदियोंका प्रवाह प्रारम्भमें छह योजन और एक कोश प्रमाण होता है । वही अन्तमें इससे दशगुणे विस्तारवाला हो जाता है । यह नदीप्रवाह [ विदेह वर्ष तक ] एक वर्षसे दूसरे वर्षमें दुगुणा होता गया है ॥ १९४ ॥


कोसद्धं उच्छेहो पवहो अंते य दसगुणो होदि ।
भरहेरवदणईणं वंसे वंसे हवे दुगुणा ॥ १९५

अर्थ: भरत और ऐरावत क्षेत्रोंकी नदियोंका अर्ध कोश ऊंचा प्रवाह अन्तमें दशगुणा ( ५ को. ) हो जाता है । यह प्रवाह आगे प्रत्येक क्षेत्रमें दुगुणा समझना चाहिये ॥१९५॥


भरहेरवदएक्के अट्ठावीसा गइसहस्साणि ।
दुगुणा दुगुणा परदो वंसे वंसेसु णादव्वा ॥ १९६

अर्थ: भरत और ऐरावतमेंसे प्रत्येक क्षेत्रमें अट्ठाईस हजार नदियां हैं । इससे आगे क्षेत्र-क्षेत्रमें उनका प्रमाण दुगुणा जानना चाहिये ॥ १९६ ॥


वंसे महाविदेहे सरिदसहस्साणि होंति चउसट्ठी ।
दस चेव सदसहस्सा कुरुवंसेसु च चुलसीदी ॥ १९७

अर्थ: महाविदेह क्षेत्रमें दस लाख चौसठ हजार ( ३२ विदेहोंकी गंगा-सिन्धू आदि ६४ नदियोंकी सहायक नदी १४००० x ६४ = ८९६०००, दोनों कुरु क्षेत्रोंकी ८४००० x २ = १६८०००; १६८००० + ८९६००० = १०६४०००.) और प्रत्येक कुरु क्षेत्रमें चौरासी हजार नदियां हैं ॥ १९७ ॥


चोद्दसगसदसहस्सा छप्पण्णा तह सहस्स णउदी य ।
परिमाणं णादव्वं जंबुद्दीवस्स सरिदाणो ॥ १९८

अर्थ: जम्बूद्वीपकी समस्त नदियोंका प्रमाण चौदह लाख छप्पन हजार नब्बे जानना चाहिये ( गंगा-सिन्धूकी सहायक नदी १४००० x २ = २८०००, रोहित्-रोहितास्या ५६०००, हरित्-हरिकान्ता ११२०००, देव व उत्तर कुरुमें सीता-सीतोदाकी सहायक नदी ८४००० x २ = १६८०००, विदेहक्षेत्रस्थ गंगा व सिन्धू आदि ६४ नदियोंकी सहायक नदी ६४ x १४००० = ८९६०००; गंगादि १४ बत्तीस विदेहस्थ गंगा-सिन्धू आदि ६४, विभंगा १२; २८००० + ५६००० + ११२००० + १६८००० + ८९६००० + ११२००० + ५६००० + २८००० + १४ + ६४ १२ = १४५६०९०; यहां विभंगा नदियोंकी सहायक ३३६००० नदियोंकी विवक्षा नहीं की गई है) ॥ १९८ ॥ नदियोंके उभय तटोंपर मणिमय तोरणोंसे मण्डित, दो गव्यूति ऊंची


उभयतडेसु णदीणं मणितोरणमंडिया मणभिरामा । वरवेदी णिद्दिठ्ठा बेगाउदउण्णया दिव्वा ॥ १९९

अर्थ: मनोहर दिव्य उत्तम वेदियां निर्दिष्ट की गई हैं ॥१९९॥


ससिकंतरयणणिवहा मणिगणकिरणपणासियमोहा । वज्जिंदणीलमरगयकक्केयणपउमरायमया ॥ २००

वरइंदीवरवण्णा कुंदेंदुतुसारहारसंकासा । गयगवलकज्जलणिहा गोरोयणसच्छहा पवरा ॥ २०१

चंपयअसोगवण्णा पुण्णागपियंगुकुसुमसंकासा । किंसुयपवालवण्णा पप्फुल्लियकमलसंकासा ॥ २०२

सव्वण्हूणं णेया रमणीया विविहरयणसंछण्णा । सोवाणा णिद्दिठ्ठा णवचंपयसुरहिगंधड्ढा ॥ २०३

अर्थ (गाथा 200 से 203): सब नदियों [ की उक्त वेदियों ] के चन्द्रकान्त रत्नोंके समूहसे युक्त, मणिगणोंके किरणसमूहसे अन्धकारसमूहको नष्ट करनेवाले; वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन और पद्मराग मणियोंसे निर्मित; कोई उत्तम इन्दीवरके समान वर्णवाले; कोई कुन्दपुष्प, तुषार एवं हारके सदृश; कोई गज, गवल ( जंगली पशुविशेष ) अथवा कज्जलके सदृश, कोई गोरोचनके सदृश कान्तिवाले, कोई चम्पक व अशोकके समान वर्णवाले, कोई पुन्नाग व प्रियंगु कुसुमके सदृश, कोई किंशुक ( पलाश ) के कोमल पत्र जैसे वर्णवाले, तथा कोई विकसित कमलके सदृश, ऐसे नाना प्रकारके रत्नोंसे व नवीन चम्पक जैसी सुगन्धमय गन्धसे व्याप्त रमणीय उत्तम सोपान कहे गये हैं ॥ २००-२०३ ॥


पणसंबताडदाडिमपियंगुणारंगचीवरसणाहा । बहुणालिकेरकदलीसज्जज्जुनकुडयसंछण्णा ॥ २०४

गोसीसमलयचंदणकप्पूरकयंबसालतरुवडरा । पुण्णागणागचंपयवियसियकणवीरवणणिवहा ॥ २०५

पवणवसचलियपल्लवअसोगहिंतालपाडलसणाहा । गुंजंतमत्तमहुयरिअलिउलकलजणियझंकारा ॥ २०६

बहुजादिजूहिकुञ्जयतंबूलमिरिइवेल्लिसंछण्णा । मंदारकुंदकेदगिअइमुत्तलयाउलसिरीया ॥ २०७

दिव्वामोयसुगंधा णाणाफलफुल्लणिवहसंछण्णा । दोसु वि तडेसु होंति हु सव्वाण णदीण वणसंडा ॥ २०८

अर्थ (गाथा 204 से 208): सब नदियोंके दोनों ही किनारोंपर पनस, आम्र, ताड़, दाड़िम, प्रियंगु, नारंग और चीवर वृक्षोंसे सनाथ; बहुतसे नालिकेर, कदली, सर्ज, अर्जुन और कुटज वृक्षोंसे व्याप्त; गोशीर्ष, मलय चन्दन, कर्पूर, कदम्ब और शाल वृक्षोंकी प्रचुरतासे सहित; पुन्नाग, नाग, चम्पक, विकसित कनेर और वन ( वृक्षविशेष ) वृक्षोंके समूहसे सहित; वायुके वश होकर हिलते हुए पत्तोंवाले अशोक, हिंताल और पाटल तरुओंसे सनाथ; गुंजार करती हुई मधुकरी ( भ्रमरी ) और भ्रमरोंके समूहोंसे उत्पन्न हुए झंकारसे सहित; बहुतसी जाति ( मालती ), जूही, कुब्जक, ताम्बूल और मिरिचकी बेलोंसे व्याप्त; मंदार, कुन्द, केतकी और अतिमुक्त ( माधवी लता ) लताओंके समूहकी शोभासे सम्पन्न, दिव्य सुगन्धसे सुगन्धित, तथा नाना फल-फूलोंके समूहसे व्याप्त वनखण्ड हैं ॥ २०४-२०८ ॥ भरत, ऐरावत और विदेह क्षेत्रको छोड़कर शेष


सद्धावदि विगडावदि गंधावदि मालवंतपरियंता ।
वंसेसु चउसु एदे णादव्वा वट्टवेयड्ढा ॥ २०९ ॥

अर्थ: चार क्षेत्रोंमें श्रद्धावती, विकटावती, गन्धवती और अन्तिम माल्यवान् ये चार वृत्त वैताढ्य जानना चाहिये ॥ २०९ ॥


जोयणसहस्स एदे विच्छिण्णा तेत्तियं च उच्चिद्धा ।
सव्वत्थ समा णेया पल्लगसंठाण कंचणमया य ॥ २१० ॥

अर्थ: ये सुवर्णमय वृत्त वैताढ्य एक हजार योजन विस्तीर्ण, इतने ही ऊंचे, सर्वत्र समान विस्तारवाले व पल्यके (कुसूल) के आकार जानना चाहिये ॥ २१० ॥


तिण्णेव सहस्साणं वासट्ठिं चेव होंति सदमेगं ।
वेयड्ढाणं परिरहो वद्धाणं जंबुदीवम्हि ॥ २११ ॥

अर्थ: जम्बूद्वीपमें वृत्त वैताढ्योंकी परिधि तीन हजार एक सौ बासठ (३१६२) योजन प्रमाण है ॥ २११ ॥


ते गिरिवरे अपत्ता सरिदाओ अद्धजोयणपमाणे ।
पुव्वावरेण गंतू लवणसमुद्दे समुपयंति ॥ २१२ ॥

अर्थ: गंगादिक नदियां अर्ध योजन प्रमाणसे उन वृत्त वैताढ्योंको प्राप्त न होकर अर्थात् उनसे अर्ध योजन इधर रहकर ही पूर्व व पश्चिमकी ओरसे लवणसमुद्रको प्राप्त होती हैं ॥ २१२ ॥


मुहभूमिविसेसेणं प उच्छेहभाजिदं तु सा हवे वड्ढी ।
वड्ढी इच्छागुणिदं मुहप्पखित्ते य होइ वट्टफलं ॥ २१३ ॥

अर्थ: भूमिमेंसे मुखको घटाकर शेषमें उत्सेधका भाग देनेपर वृद्धिका प्रमाण आता है। इस वृद्धिको इच्छासे गुणित कर मुखमें मिला देनेपर अभीष्ट स्थानमें विवक्षित क्षेत्रका विस्तार जाना जाता है ॥ २१३ ॥


वयणखिदिरहिदउच्छेहभाजिदइच्छागुणिदे वयणपक्खित्ते ।
सायरणदीणगाणं पदेसवड्ढी समुद्दिट्ठा ॥ २१४ ॥

अर्थ: वदन (मुख) और क्षिति (भूमि) को परस्परमें घटाकर शेषमें ऊंचाईका भाग देकर जो लब्ध हो उसे इच्छासे गुणित कर मुखमें मिला देनेपर सागर, नदी व नगोंमें होनेवाली प्रदेशवृद्धिका प्रमाण होता है ॥ २१४ ॥


हेमवदस्स य मज्झे णाभिगिरिंदो विचित्तमणिणिग्रहो। वणवेदीपरिक्खित्तो मणितोरणमंडिओ रम्मो ॥ २१५

अर्थ: हैमवत क्षेत्रके मध्यमें विचित्र मणियोंके समूहोंसे सहित, वनवेदीसे वेष्टित और मणिमय तोरणोंसे मण्डित रम्य नाभि गिरिन्द्र स्थित है ॥ २१५ ॥


तस्स णगरस्स दु सिहरे वणवेदीपरिउडो परमरम्मो। वरतोरणछज्जंतो सुरणयरो उत्तमो होइ ॥ २१६

अर्थ: उस पर्वतके शिखरपर वनवेदीसे वेष्टित और उत्तम तोरणसे सुशोभित अतिशय रमणीय श्रेष्ठ सुरनगर है ॥ २१६ ॥


मणिकंचणपरिणामा पासादा सत्तभूमिया दिव्वा । ससिकंतसूरकंताकक्केयणपुक्खरायमया ॥ २१७

अर्थ: उपर्युक्त नगरके सात भूमियोंवाले, मणियों एवं सुवर्णके परिणाम रूप दिव्य प्रासाद चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, कर्केतन एवं पुखराज मणियोंसे निर्मित हैं ॥ २१७ ॥


बहुविविहभवणणिवहो वावीपुक्खरिणिउववणसंजुग्गो। सुरसुंदरिपरिपुण्णो जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥

अर्थ: उक्त नगरमें वापी, पुष्करिणी एवं उपवनोंसे सहित; सुरसुन्दरियोंसे व्याप्त व जिनभवनोंसे विभूषित विविध प्रकारके बहुतसे दिव्य भवन हैं ॥ २१८ ॥


वरमउडकुंडलधरो पलं बबाहू पसत्थसव्वंगो । सादी णामेण सुरो अणंतबलरूवसंपण्णो ॥ २१९

तस्स णगरस्स राया पलिदोवमभाउगो महासत्तो । सिंहासणमज्झगदो सेविज्जइ सुरसहस्सेहिं ॥ २२०

अर्थ (गाथा 219 से 220): उत्तम मुकुट एवं कुण्डलोंका धारक, लम्बे बाहुओंसे संयुक्त, प्रशस्त सब अवयवोंसे सहित और अनन्त बल व रूपसे सम्पन्न स्वाति नामक देव उस नगरका राजा है। पल्योपम प्रमाण आयुके धारक, महाबलवान् और सिंहासनके मध्यको प्राप्त इस देवकी हजारों देव सेवा करते हैं ॥ २१९-२२० ॥


एवं अवसेसाणं देवाणं हवंति णाभिसैलेसु । णगराणि विचित्ताणि दु जह पुव्वं वण्णिया सयळा ॥ २२१

अर्थ: इसी प्रकार शेष नाभि शैलोंपर भी देवोंके जो विचित्र नगर हैं उनका सब वर्णन पूर्व वर्णनके समान है ॥ २२१ ॥


हरिवंसस्स दु मज्झे णाभिगिरिंदस्स पुरवरे विउले । अरुणप्पभो त्ति णामो देवो सो तत्थ णिद्दिष्ट्ठो ॥ २२२

अर्थ: हरिवर्ष क्षेत्रके मध्यमें स्थित नाभि गिरिन्द्रके विशाल एवं श्रेष्ठ पुरमें अरुणप्रभ नामका वह अधिपति देव है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ २२२ ॥


पउमप्पभो त्ति णामो रम्मगवंसस्स वट्टवेरड्ढे । सुरणगरम्मि य राया णिद्दिट्ठो सव्वदरिसीहिं ॥ २२३

अर्थ: सर्वदर्शियों द्वारा रम्यक क्षेत्रके वृत्त वैताढ्यपर स्थित सुरनगरका राजा पद्मप्रभ नामक देव बतलाया गया है ॥ २२३ ॥


णामेणं पभासो त्ति य हेरण्णवदस्स णाभिगिरिसिहिरे । सुरपट्टणम्मि राया अच्छइ सुहसायरे धीरो ॥ २२४

अर्थ: हैरण्यवतक्षेत्रस्थ नाभि गिरिके शिखरपर स्थित सुखके सागर स्वरूप सुरपुरमें प्रभास नामक साहसी देव रहता है ॥ २२४॥


सव्वाणं च णगाणं णगणगराणं तु णगवणाणं च। एसेवं कमो णेयो समासदी होइ णिद्दिट्ठो ॥ २२५

अर्थ: समस्त पर्वतों, पर्वतस्थ नगरों एवं वनोंके वर्णनका संक्षेपसे यही क्रम जानना चाहिये ॥ २२५॥


सव्वाणं भूहराणं वणवेदी तोरणा मुणेयव्वा । देवणगराण वि तह वणसंडाणं तहा चेय ॥ २२६

अर्थ: समस्त पर्वतों, देवनगरों तथा वनखण्डोंके वनवेदी और तोरण उसी प्रकार जानना चाहिये ॥ २२६ ॥


सव्वेसु भूहरेसु य सुरवरनगरेसु उववणवणेसु । जिणभवणा णायव्वा णिद्दिठ्ठा जिणवरिंदेहिं । २२७

अर्थ: सब पर्वत, श्रेष्ठ सुरपुर और वन-उपवनोंमें जिनेन्द्रों द्वारा निर्दिष्ट जिनभवन जानना चाहिये ॥ २२७ ॥


हिमवंतस्स दु मूले जा जीवा उत्तरेण णिद्दिट्ठा । हेमवदस्स य सा खलु दक्खिणजीवा वियाणाहि ॥ २२८

अर्थ: हिमवान् पर्वतके मूलमें जो उत्तरजीवा कही गई है वह निश्चयसे हैमवत क्षेत्रकी दक्षिणजीवा जानना चाहिये ॥ २२८ ॥


हिमवंतमहंतस्स दु जा जीवा दक्खिणेण णिद्दिट्ठा । हेमवदस्स य सा खलु उत्तरजीवा वियाणाहि ॥ २२९

अर्थ: महाहिमवान् पर्वतकी जो दक्षिणजीवा कही गई है वह निश्चयसे हैमवत क्षेत्रकी उत्तरजीवा समझना चाहिये ॥ २२९ ॥


हिमवंतमहंतस्स दु जा जीवा उत्तरेण णिद्दिट्ठा । हरिवंसस्स दु सा खलु दक्खिणजीवा वियाणाहि ॥ २३०

अर्थ: महाहिमवान् पर्वतकी जो उत्तरजीवा निर्दिष्ट की गई है वह निश्चयतः हरिवर्ष क्षेत्रकी दक्षिणजीवा जानना चाहिये ॥ २३० । ,


णिसधगिरिस्स दु मूले जा जीवा दक्खिणेण णिद्दिट्ठा । हरिवंसस्स दु सा खलु उत्तरजीवा वियाणाहि ॥

अर्थ: निषधगिरिके मूलमें जो दक्षिणजीवा कही गई है वह निश्चयतः हरिवर्षकी उत्तरजीवा जानना चाहिये ॥ २३१ ॥


जह दक्खिणम्मि भागे तह चेव य उत्तरेसु णायव्वा । आयामा विक्खंभा समासदो होंति सव्वाणं ॥ २३२

अर्थ: जिस प्रकार दक्षिण भागमें क्षेत्रों व पर्वतोंका संक्षेपसे आयाम व विस्तार बतलाया गया है उसी प्रकार उत्तर भागोंमें भी सब क्षेत्रों व पर्वतोंका आयाम व विस्तार जानना चाहिये ॥२३२॥


सोहम्मिंदो सामी दक्खिणभागस्स होदि णिद्दिट्ठो । ईसाणिंदो सामी उत्तरभागस्स दीवस्स ॥ २३३

अर्थ: द्वीपके दक्षिण भागका स्वामी सौधर्म इन्द्र और उत्तर भागका स्वामी ईशान इन्द्र कहा गया है ॥ २३३ ॥


हेरण्णवदे खेत्ते तहेव हेमव्वदम्मि वंसम्मि । सुसमदुसमो कालो अवट्ठिदो सव्वदा होइ ॥ २३४

अर्थ: हैरण्यवत क्षेत्रमें तथा हैमवत क्षेत्रमें सर्वदा सुषमदुःषमा काल अवस्थित है ॥ २३४ ॥


हरिवरिसम्मि य खेत्ते रम्मगवंसम्मि होइ णायव्वा । सुसमो कालो एक्को अवट्ठिदो सव्वकालं तु ॥ २३५

अर्थ: हरिवर्ष क्षेत्रमें और रम्यक क्षेत्रमें सर्वदा एक सुषमकाल अवस्थित है [ देवकुरुमें सदा सुषमसुषमा काल अवस्थित है ] ॥ २३५ ॥


बे चउ चउ दुसहस्सा धणुप्पमाणा हवंति उच्छेहा । एगदुगबिण्णिएगापल्लाउ ते मुणेयव्वा ॥ २३६

अर्थ: [ हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक और हैरण्यवत क्षेत्रोंमें ] शरीरकी ऊंचाई क्रमश दो हजार, चार हजार, चार हजार और दो हजार धनुष प्रमाण तथा आयु एक, दो, दो और एक पल्य प्रमाण जानना चाहिये ॥ २३६ ॥


जे कम्मभूमिमणुया दाणं दाऊण उत्तमे पत्ते । अणुमोदणेण तिरिया ते होंति इमासु भूमीसु ॥ २३७

अर्थ: जो कर्मभूमिज मनुष्य हैं वे उत्तम पात्रको दान देकर तथा जो कर्मभूमिज तिर्यंच हैं वे दानदाताकी अनुमोदनासे इन क्षेत्रोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ २३७॥ वहां मरणको भी


कालगदा वि य संता विमाणवासेसु ताण उप्पत्ती ।
ण य अण्णत्थुप्पत्ती अकालमरणेहि ण मरंति ॥ २३८

अर्थ: प्राप्त होनेपर उनकी उत्पत्ति विमानवासी देवोंमें होती है; अन्यत्र उनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है । तथा वे अकालमरणोंसे नहीं मरते हैं ॥ २३८ ॥


मज्जवरतूरभूसणजोदिसगिहभायणाण कप्पदुमा ।
भोयणपदीववत्था दुमाण वि हवंति दस भेया ॥ २३९

अर्थ: वहां मद्यांग, उत्तम तूर्यांग, भूषणांग, ज्योतिरंग, गृहांग, भाजनांग, भोजनांग, दीपांग और वस्त्रांग, इस प्रकार दश प्रकारके कल्पवृक्ष होते हैं ॥ २३९ ॥

तदिओ उद्देसो (भाग 2/2)

बहुविहमणिकिरणा हयघणतिमिर जलंततुंगवरमउडा ।
सरसमयघणविणिग्गयरविभासुरकुंडलाभरणा ॥ २४०

घणसमयजणियभासुरविज्जुज्जुलतेय मेहलकलावा ।
बहलघणपंकवियलिय ससिधवलपुलंबवरहारा ॥ २४१

मरगयरयणविणिग्गय किरणवसुच्छलिय मेरुगिरिधीरा ।
परिपुण्णरयणबहुविहसायरगंभीरमज्जाया ॥ २४२

पगलंतदाणणिज्झरभूहरसमसरसमत्तगयगमणा ।
तरुणससिधवलखरणहं करिदारणसीहविक्कंता ॥ २४३

मियमयकप्पूराय रुहरिचंदणबहलपरिकलामोया ।
णाणागुणगणकलिया दाणफलाभोगसंपण्णा ॥ २४४

हलमुसलकलसचामररवि ससिभवणादिकलक्खणोवेदा ।
दीसंति पवरपुरिसा सव्वासु वि भोगभूमीसु ॥ २४५

अर्थ (गाथा 240 से 245): इन सभी भोगभूमियोंमें उत्पन्न हुए पुरुष बहुत प्रकारके मणियोंकी किरणोंसे सघन अन्धकारको नष्ट करनेवाले चमकते हुए उन्नत उत्तम मुकुटको धारण करनेवाले, शरत्कालीन मेघोंसे निकले हुए सूर्यके समान देदीप्यमान कुण्डलोंसे भूषित, वर्षाकालमें उत्पन्न हुई प्रकाशमान बिजलीके समान उज्ज्वल तेजवाले मेखलाकलापसे संयुक्त, सान्द्र घन ( बादल ) रूपी पंकसे रहित चन्द्रके समान धवल लम्बे उत्तम हारसे सुशोभित, मरकत रत्नोंसे निकली हुई किरणोंसे विस्तारको प्राप्त हुए मेरु पर्वतके समान धैर्यशाली, बहुत प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त सागरके समान गम्भीर मर्यादावाले, बहते हुए मदरूपी झरनेसे युक्त होकर पर्वतकी उपमाको धारण करनेवाले सरस मत्त गजके समान गमन करनेवाले, तरुण चन्द्रके समान धवल तीक्ष्ण नखोंसे हाथीको विदारण करनेवाले सिंहके समान पराक्रमके धारक, मृगमद ( कस्तूरी ), कपूर, अगरु और हरित् चन्दनके समान सघन परिमलसे सुगन्धित, नाना गुणगणोंसे सहित, दानफलके आभोगोंसे सम्पन्न; तथा हल, मूसल, कलश, चामर, सूर्य, चन्द्र और भवन आदि रूप चिह्नोंसे युक्त दिखते हैं ॥ २४०-२४५ ॥


अइसयअसेसजिवहं अट्ठमहापाडिहेरसंजुत्तं ।
वरपउमणंदिणमियं अभिणंदणजिणवरं वंदे ॥ २४६

अर्थ: समस्त अतिशयोंके समूहसे सहित, आठ महा प्रातिहार्योंसे संयुक्त, और पद्मन्दिसे नमस्कृत, ऐसे अभिनन्दन जिनेन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २४६ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे पव्वदनदीभोगभूमिवण्णणो णाम तदिओ उद्देसो समत्तो ॥ ३ ॥

चउत्थो उद्देसो (भाग 1/2)

सुमहइजिणिंदं पणमिय सुविसुद्धचरित्तणाणसंपण्णं ।
सुबहुत्तरयणसिहरं सुदंसणं संपवक्खामि ॥ १

अर्थ: अतिशय विशुद्ध चारित्र एवं ज्ञानसे सम्पन्न सुमति जिनेन्द्रको नमस्कार करके प्रभूत ( बहुतसे ) रत्नशिखरोंसे संयुक्त सुदर्शन मेरुका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥


सव्वागासस्स तहा तस्स दु बहुमज्झदेसभाएम्मि ।
लोगो अणाइणिहणो णिद्दिट्ठो सव्वदरिसीहिं ॥ २

अर्थ: सर्वदर्शियोंने सर्व आकाशके बहुमध्यदेश भागमें अर्थात् ठीक बीचमें अनादि-निधन लोक निर्दिष्ट किया है ॥ २ ॥


लोयस्स ठिदी णेया वलहीआयार होइ णिद्दिट्ठा ।
पुव्वावरेण दीहो उत्तर तह दक्खिणे रहसो ॥ ३

अर्थ: लोककी स्थिति वलभी अर्थात् ढालू छतके आकार कही गई जानना चाहिये । यह लोक पूर्व-पश्चिममें दीर्घ और उत्तर तथा दक्षिणमें ह्रस्व है ॥ ३ ॥


पुव्वावरेण लोगो मूले मज्झे तहेव उवरिम्मि ।
वरवेत्तासणझल्लरिसुद्दिगसंठाणपरिणामो ॥ ४

अर्थ: यह लोक पूर्व-पश्चिममें मूलमें उत्तम वेत्रासन, मध्यमें झालर, तथा उपरिर्म भागमें मृदंगके आकारसे परिणत है ॥ ४ ॥


उत्तरदक्खिणपासे संठाणो टंकाछिण्णगिरिसरिसं ।
अहवा कुलगिरिसरिसं आयदचउरंसरदरणामिदो ॥ ५

अर्थ: लोकका आकार उत्तर-दक्षिण पार्श्व भागमें टांकीसे उकेरे हुए पर्वतके सदृश है । अथवा आयतचतुरस्र व किंचित् नमित वह लोक कुलपर्वतके समान है ॥ ५ ॥


उवरीदो णीसरिदो पइट्ठो पुण चेव होइ णिस्सरिदो ।
उत्तरदक्खिणपासे णिद्दिट्ठो सव्वदरिसीहिं ॥ ६

अर्थ: सर्वदर्शियों द्वारा वह लोक उत्तर-दक्षिण पार्श्व भागमें ऊपरकी ओरसे निःसृत अर्थात् बाहर निकला हुआ, फिर संकुचित हुआ, तथा फिरसे भी निःसृत बतलाया गया है ॥ ६ ॥


देवच्छंदैंसमाणो छज्जासरिसो य तृणघरसमाणो ।
पक्खीपक्खसमाणो हेट्ठिमभागस्स संठाणे ॥ ७

अर्थ: उक्त लोकके अधस्तन भागका आकार देवच्छंद ( जिन भगवान्‌का आसन ) के सदृश, छज्जाके सदृश, तृणघरके सदृश, अथवा पक्षीके पंख समान है ॥ ७ ॥


छज्जाए जद अंते छज्जो घडिदो व्व मज्झसंठाणो ।
बोहित्थतलैंसमाणे कवड्डियापुट्टिसरिसं वा ॥ ८

अर्थ: जिस प्रकार छज्जाके अन्तमें अर्थात् छज्जाकी [ समतल ] घटना होती है वैसा मध्य लोकका आकार है । तथा ऊर्ध्व लोकका आकार वहित्र अर्थात् नावके तल सदृश, कपर्दिका ( कौड़ी ) के पृष्ठ भागके समान, अथवा शिखरपर उलटा किये


उव्वुंडेसरावसिहरो उवविट्ठसरावंसंपुडायारो । णिच्चो अणाइणिदणो तसथावरअसुगणावासो ॥ ९

अर्थ (गाथा 8 से 9): हुए सकोरेके शिखरके सदृश; एवं समस्त आकार शरावसंपुट अर्थात् दो सकोरोंको एकके ऊपर दूसरा उलटा कर रखे हुए सकोरोंके आकारका है। यह लोक अनादि-निधन तथा त्रस और स्थावर जीवोंका निवासस्थान है ॥ ८-९॥


पुव्वावरेण णेया सत्तेव य तस्स होंति रज्जूणि। दक्खिणउत्तरपासे एक्को रज्जू समुद्दिट्ठो ॥ १०

अर्थ: यह लोक पूर्व-पश्चिममें सात राजु और दक्षिण-उत्तर पार्श्वमें एक राजु (?) कहा गया है ॥ १०॥


मज्झे सिहरे य पुणो एया रज्जू य होइ वित्थिण्णा। मूले य बंभलोए सत्त दु तह पंच रज्जूणि ॥ ११

अर्थ: उक्त लोक मध्यमें व शिखरपर एक राजु, मूलमें सात राजु, और ब्रम्ह-लोकमें पांच राजु विस्तीर्ण है ॥ ११॥


उच्छेहेण य णेया चउद्दसरज्जू जिणेहि पण्णत्ता। सत्तेव य आयामो विक्खंभो होइ एक्को दु ॥ १२

अर्थ: जिनभगवान्ने उक्त लोकका उत्सेध चौदह राजु, आयाम सात राजु और विष्कम्भ एक राजु (?) प्रमाण कहा है ॥ १२॥


तस्स दु मज्झे णेयो लोगो पंचेदियाण णिद्दिट्ठो। झल्लरिआयारो खलु णिद्दिट्ठो जिणवरिंदेहि ॥ १३

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्ने उसके मध्यमें झालरके आकार पंचेन्द्रियोंका लोक कहा है ॥ १३॥


तसजीवाणं लोगो चउद्दहरज्जूणि होइ उच्छेहो। विक्खंभायामेण य एया रज्जू सुणेयव्वा ॥ १४

अर्थ: त्रस जीवोंका लोक (त्रसनाली) चौदह राजु ऊंचा और एक राजु प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे युक्त जानना चाहिये ॥ १४॥


पंचेदियाण लोगे बादरसुहुमा जिणेहिं पण्णत्ता। परदो बादररहिदो सुहुमा सव्वत्थ विण्णेया ॥ १५

अर्थ: जिन भगवान्ने पंचेन्द्रियोंके लोकमें बादर और सूक्ष्म दोनों प्रकारके जीव बतलाये हैं। इसके परे वह बादर जीवोंसे रहित है। सूक्ष्म जीव सर्वत्र जानने चाहिये ॥ १५॥


पच्छिमपुव्वदिसाए विक्खंभो तस्स होइ लोयस्स। सत्तेगपंचएया मूलादो होंति रज्जूणि ॥ १६

अर्थ: उस लोकका विष्कम्भ पूर्व-पश्चिम दिशामें नीचेसे क्रमशः सात, एक, पांच और एक राजु प्रमाण है ॥ १६॥


दक्खिणउत्तरदो पुण विक्खंभो होइ सत्त रज्जूणि। चदुसु वि दिसाविभागे चउदस रज्जूणि उसंगो ॥ १७

अर्थ: उक्त लोकका विष्कम्भ दक्षिण-उत्तर दिशामें सात राजु है। ऊंचाई उसकी चारों ही दिशाविभागमें चौदह राजु प्रमाण है ॥ १७॥


लोयस्स तस्स णेया अणेयसंठाणरूवजुत्तस्स। उवमादीदस्स तह बहुभेदपयत्थगब्भस्स ॥ १८

अर्थ: बहुत प्रकारके पदार्थोंको गर्भमें धारण करनेवाले और अनेक आकार व रूपसे संयुक्त उस उपमातीत (अनुपम) लोकके बहुमध्य देशमें दूने दूने


तस्स बहुमज्झदेसे दुगुणा दुगुणा हवंति वित्थिण्णा ।
बहुविहदीवसमुद्वा णाणामणिकणयसंछण्णा ॥ १९

अर्थ (गाथा 18 से 19): विस्तारवाले तथा नाना मणियों व सुवर्णसे व्याप्त बहुत प्रकारके द्वीप-समुद्र जानना चाहिये ॥ १८-१९॥


गणणादीदाण तह सायरदीवाण मज्झभागम्मि ।
होदि हु जंबूदीवो तस्स दु मज्झे विदेहो दु ॥ २०

अर्थ: उन असंख्यात द्वीप-समुद्रोंके मध्य भागमें जम्बू द्वीप और उसके भी मध्यमें विदेह क्षेत्र है ॥ २० ॥


मंदरमहाचलिंदो विद्देहमज्झम्मि होइ णिद्दिट्ठो ।
जम्माभिसेयपीढो जिणिंदचंदाण णायव्वो ॥ २१

अर्थ: विदेहके मध्यमें जिनेन्द्र-चन्द्रोंके जन्माभिषेकका पीठ ( आसन ) स्वरूप मन्दर महाचलेन्द्र ( मेरु ) कहा गया है ॥ २१ ॥


ओगाढो वज्जमओ सहस्स तह जोयणो समुद्दिट्ठो ।
णवणवदिं उच्छेहो णाणामणिरयणपरिणामो ॥ २२

अर्थ: नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप उक्त पर्वतका वज्रमय अवगाढ ( नींव ) एक हजार योजन और ऊंचाई निन्यानवे हजार योजन प्रमाण कही गई है ॥ २२ ॥


पायालतले णेया विक्खंभायाम तस्स मेरुस्स ।
दस य सहस्सा णउदि य दस चेव कला सुणेयव्वा ॥ २३

अर्थ: उस मेरुका विष्कम्भ व आयाम पातालतलमें दश हजार नब्बे योजन और दश कला ( १००९० १०/१९ ) प्रमाण जानना चाहिये ॥ २३ ॥


धरणीपट्टे णेया दस चेव सहस्स भद्दसालवणे ।
सिहरे एगसहस्सा वित्थिण्णो पंडुकवणम्मि ॥ २४

अर्थ: उक्त मेरु पृथिवीपृष्ठपर भद्रशाल वनमें दश हजार योजन प्रमाण तथा शिखरपर पाण्डुक वनमें एक हजार योजन प्रमाण विस्तीर्ण है ॥ २४ ॥


मूले मज्झे उवरिं वज्जमओ मणियमओ य कणयमओ ।
तह एगं च सहस्सा इगिसट्ठिसहस्स अडतीसा ॥२५

अर्थ: मेरु पर्वत मूलमें एक हजार योजन प्रमाण वज्रमय, मध्यमें इकसठ हजार योजन प्रमाण मणिमय, और ऊपर अड़तीस हजार योजन प्रमाण सुवर्णमय है ॥ २५ ॥


घणसमयघणविणिग्गयरविकिरणफुरंतभासुरो दिव्वो ।
बहुविविहरयणमंडियसमुग्गमट्ठमडवो व्व उत्तुंगो ॥ २६

वियसिंदसियसुरवरकये जम्मगमहिमंतूरणिब्बोसो ।
जिणमहिमजणिय विक्कम सुरवहुणच्चंतरमणीओ ॥ २७

ससिधवलहारसंणिभरुचिरोविहउच्छलंतसलिलोहो ।
सुरसयसहस्ससंकुल कोलाहलरावरमणीओ ॥ २८

अर्थ (गाथा 26 से 28): मणि, सुवर्ण, रत्न एवं मरकत रूप पृथिवीको धारण करनेवाला वह सुमेरु रूप नरपति वर्षाकालमें मेघोंसे निकले हुए सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशमान, दिव्य, विविध प्रकारके बहुतसे रत्नोंसे मण्डित पृथिवीके मुकुटके समान उन्नत, इन्द्र सहित उत्तम देवों द्वारा की गई जन्ममहिमा ( जन्मकल्याणक ) के समय वादित्रोंके शब्दसे संयुक्त, जिनमाहात्म्यसे उत्पन्न हुए पराक्रमसे युक्त इन्द्रके नृत्यसे रमणीक, चन्द्र अथवा धवल हारके सदृश क्षीरोदधिके उछलते हुए जलसमूहसे


कप्पतरुजणियबहुविहपवणवसुच्छलियकुसुमगंधड्डो । मयरंदरेणुवासियसणिसिलाविडकतडरम्मो ॥ २९

कम्मघणबहलकक्खडसिलचूरणजिणवरिंदभवणोघो । मणिकणयरयणमरगयधरणोहरणरवई मेरू ॥ ३०

अर्थ (गाथा 26 से 30): सहित, लाखों देवोंसे व्याप्त होनेपर उनके कोलाहल शब्दसे रमणीक, कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न हुई बहुत प्रकारकी वायुके प्रभावसे उछलते हुए कुसुमोंकी गन्धसे व्याप्त, परागकी धूलिसे सुगन्धित सानुशिला युक्त विशाल तटोंसे रमणीय, तथा कर्म रूपी अतिशय सघन कठोर शिलाओंको चूर्ण करनेवाले जिनेन्द्रभवनोंके समूहसे सहित है ॥ २६-३० ॥


जो बहुवो सो कडी जो लहुभागो सिरो त्ति णिद्दिट्ठो । जो उच्चो सो काओ सव्वणगाणं समुद्दिट्ठो ॥३१

अर्थ: सब पर्वतोंका जो बहुभाग है वह कटि, जो लघु भाग है वह शिर, और जो उच्च भाग है वह काय कहा गया है ॥ ३१ ॥


कडिसिरिविसुद्धसेसं सयकायविभाजिदं तु इच्छगुणं । सिरसहिदं णिद्दिट्ठो इच्छायामं हवे णेया ॥ ३२

अर्थ: कटि और शिरको परस्पर घटाकर शेषमें अपनी कायका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उसे इच्छासे गुणा करके शिरमें मिला देनेपर इच्छित आयामका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥


'दस विक्खंभेण गुणं विक्खंभं तस्स लद्ध जं मूलं । वट्टाण दीवसायरगिरीण परिधी हवे तं तु ॥ ३३

अर्थ: विष्कम्भसे गुणित विष्कम्भको दशसे गुणा करनेपर जो प्राप्त हो उसके वर्गमूल प्रमाण वृत्त द्वीप, सागर और पर्वतोंकी परिधि होती है ॥ ३३ ॥


विक्खंभवग्गदसगुणकरणी वट्टस्स परिरओ होई । विक्खंभवउत्थभागे परिरयगुणिदे हवे गणिदं ॥ ३४

अर्थ: विष्कम्भके वर्गको दशगुणा करके उसका वर्गमूल निकालनेपर वृत्त क्षेत्रकी परिधिका प्रमाण होता है । इस परिधिको विष्कम्भके चतुर्थ भागसे गुणा करनेपर उसका क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥


मेरुस्स इच्छपरिधी इच्छायामं च इच्छखेत्तफलं ।
एयग्गेण मणेण य आणिज्जो करणगाहाहिं ॥ ३५

अर्थ: इन करणगाथाओंके द्वारा मेरुकी इच्छित परिधि, इच्छित आयाम और इच्छित क्षेत्रफलको एकाग्रमन होकर लाना चाहिये ॥ ३५ ॥


इगतीसं च सहस्सा णव य सया जोयणा य दस चेव ।
बे य कला साहीया अधोतले परिरओ तस्स ॥ ३६

अर्थ: इसके नीचे परिधिका प्रमाण इकतीस हजार नौ सौ दश योजन और साधिक दो कला है ॥ ३६ ॥


इगतीसं च सहस्सा छच्च सया जोयणा य तेवीसा ।
किंचिविसेसेणूणा उबरितले परिरयं तस्स ॥ ३७

अर्थ: उपरिम भागमें उसकी परिधिका प्रमाण इकतीस हजार छह सौ तेईस योजनसे कुछ कम है- √१००००² × १० = ३१६२३ यो. से कुछ कम ॥ ३७ ॥


इगतीसं च सदाई बासट्ठि जोयणा य साधीया ।
मंदरसिहरे परिधी णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ३८

अर्थ: मेरुशिखरपर परिधिका प्रमाण सर्वदर्शियोंने इकतीस सौ बासठ योजनसे कुछ अधिक कहा है √१०००² × १० = ३१६२ यो. से कुछ अधिक ॥ ३८ ॥


कडिसिरविसेसअद्धांहि वग्गिदे कायवग्गपक्खित्ते ।
जं तस्स वग्गमूलं तं खलु बाहं वियाणाहि ॥ ३९

अर्थ: कटि और शिरको परस्परमें घटाकर जो शेष रहे उसके वर्गमें कायके वर्गको मिला देनेपर जो उसका वर्गमूल हो उतना बाहु (पार्श्वभुजा) का प्रमाण जानना चाहिये ॥ ३९ ॥


णवणउईदि च सहस्सा सयं च बे चेव जोयणाणं तु ।
सविसेसो बोद्धव्वा रज्जू मेरुस्स पस्सभुजा ॥ ४०

अर्थ: मेरुकी पार्श्वभुजाका प्रमाण निन्यानवै हजार एक सौ दो योजनसे कुछ अधिक है- √( (१०००० - १०००) / २ )² + ९९०००² = √२०२५०००० + ९८०१०००००० = ९९१०२ यो. (कुछ अधिक) ॥ ४० ॥


वज्जिंदणीलमरगयकक्केयणरयणकणयं परिणामो ।
अचलो अणाइणिहणो चदुकाणणमंडिओ मेरू ॥ ४१

अर्थ: वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन रत्न एवं सुवर्णके परिणाम रूप वह अनादि-निधन मेरु पर्वत चार वनोंसे मण्डित है ॥ ४१ ॥


णामेण भद्दसालो सुरखेयरगरुडकिण्णरावासो ।
मेरुस्स पढमकाणण णाणातरुगणरमणीओ ॥ ४२

अर्थ: देव, विद्याधर, गरुड (देवविशेष) और किन्नरोंके आवास रूप मेरुका भद्रशाल नामक प्रथम वन नाना वृक्षोंके वनोंसे रमणीय है ॥ ४२ ॥


बावीसं च सहस्सा पुव्वावरवित्थडो परमरम्मो ।
जायामेण वियाणह विदेहविक्खंभपरिमाणो ॥ ४३

अर्थ: अतिशय रमणीय वह भद्रशाल वन पूर्व-पश्चिममें बाईस हजार योजन प्रमाण विस्तृत है। उसका आयाम विदेह क्षेत्रके विस्तारके बराबर जानना चाहिये ॥ ४३ ॥


चंपयकयंबपउरो असोयपुण्णागणागसंछण्णो ।
मंदारसालणिवहो सत्तच्छयचूयवण्णिचिओ ॥ ४४

अर्थ: उक्त वन प्रचुर चम्पक एवं कदम्ब वृक्षोंसे सहित; अशोक, पुन्नाग व नाग वृक्षोंसे व्याप्त, मन्दार व शाल वृक्षोंके समूहसे संयुक्त, सप्तच्छद व


कप्पूरणियररुक्खो तमालहिंतालतालवाउलिदो ।
लवलीलवंगललिदो अइमुत्तलयालसिरिणो ॥ ४५

णारंगफणसपउरो कदलीवणमंडिओ परमरम्मो ।
बहुजादिमल्लिखचिओ कुंदज्जुणकुडयपरिक्खित्तो ॥ ४६

वरनालिएररइओ पूगप्फलतरुवरेहि रमणीओ ।
तंबूलवल्लिगहणो कुंकुमवच्छेहि चिंचइओ ॥ ४७

एलामिरीइनिवहो कक्कोलजादिफलसमिद्धो य ।
चंदणपायवनिचिओ अगरुलयाकत्थुरियससमग्गो ॥ ४८

अर्थ (गाथा 44 से 48): आम्र वृक्षोंके वनोंसे व्याप्त, कर्पूर वृक्षोंके समूहसे युक्त; तमाल, हिंताल एवं ताल वृक्षोंसे व्याकुलित; लवली व लवंग वृक्षोंसे कलित, अतिमुक्त लताओंके समूहसे सुशोभित, नारंग व पनस वृक्षोंसे प्रचुर, कदलीवनसे मण्डित, अतिशय रमणीय, बहुत जातिके मल्लिवृक्षोंसे खचित, कुंद, अर्जुन एवं कुटज वृक्षोंसे वेष्टित; उत्तम नालिकेर वृक्षोंसे निर्मित, सुपारीके उत्तम वृक्षोंसे रमणीय, ताम्बूल बेलोंसे गहन, कुंकुम वृक्षोंसे मण्डित, इलायची व मिरिचके वृक्षसमूहसे युक्त, कंकोल व जातिफलोंसे समृद्ध, चन्दन वृक्षोंसे निचित, तथा अगरुलता व कस्तूरीसे समग्र है ॥ ४४-४८ ॥


तस्स वणस्स दु मज्झे जिणिंदचंदाणं विगयमोहाणं ।
कंचणमणिरयणमया चत्तारि हवंति भवणाणि ॥ ४९

अर्थ: उस वनके मध्यमें मोहसे रहित हुए जिनेन्द्र रूप चन्द्रोंके सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे निर्मित चार भवन हैं ॥ ४९ ॥


जोयणसयमायामा पण्णासा विक्खदा समुद्दिट्ठा ।
पण्णत्तरि उच्चेहा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ ५०

अर्थ: नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप वे जिनभवन सौ योजन आयत, पचास योजन विस्तृत और पचत्तर योजन ऊंचे कहे गये हैं ॥ ५० ॥


अट्ठेव जोयणाई उच्चेहा होंति ताण दाराणि ।
चउजोयणविक्खिण्णा विक्खिण्णसमप्पवेसा दु ॥ ५१

अर्थ: उक्त जिनभवनोंके द्वार आठ योजन ऊंचे, चार योजन विस्तृत और विस्तारके समान प्रवेशवाले होते हैं ॥ ५१ ॥


सोळसजोयणदीहा पीढाओ होंति ताण णिद्दिट्ठा ।
अट्ठेव य उव्विट्ठा मणिकिरणदलंततिमिरनिवहो ॥ ५२

अर्थ: मणिकिरणोंसे अन्धकारको नष्ट करनेवाले उनके पीठ सोलह योजन दीर्घ और आठ योजन ऊंचे होते हैं ॥ ५२ ॥


तेसु जिणाणं पडिमा पंचधणुस्सयपमाणउच्छेहा ।
होंति सुरासुरमहिदा णाणामणिकणयपरिणामा ॥ ५३

अर्थ: उनके ऊपर सुर व असुरोंसे पूजित नाना मणियों एवं सुवर्णके परिणाम रूप पांच सौ धनुष ऊंची जिनप्रतिमायें होती हैं ॥ ५३ ॥


एवं चेव दु णेया णंदीसर चेय णाम दीवस्स ।
बावण्णजिणवराण विक्खंभायामउच्चेहा ॥ ५४

अर्थ: इसी प्रकार ही नन्दीश्वर नामक द्वीपके बावन जिनगृहोंके भी विष्कम्भ, आयाम और ऊंचाईका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ५४ ॥ सब ही भद्रशालोंमें स्थित जिनगृह तीन छत्र, सिंहा-


छत्तत्तयसीहासणभामंडलचामरादिसंजुत्ता । बहुकुसुमवरिसदुंदुहिअसोयरुक्खेहि अहिरामा ॥ ५५

भिंगारकलसदप्पणबुब्बुदबहुधवलचामरसणाहा । घंटापडायपउरा मंगलकलसेहिं संछण्णा ॥ ५६

बहुविहपुप्फमालजुत्तदामेहिं विविहा रक्खा । उव्वंतधूमणिवहा बहुकुसुम कयच्चणसणाहा ॥ ५७

सिदहरिकसणसामलरत्तंसुयपट्टसुत्तणिवेहेहिं । बहुविहधयमालाउलपवणपगञ्चंतसोहंता ॥ ५८

वरपडहभेरि मद्दलझंभावीणादिकंसतालेहिं । वज्जंततूरपउरा काहलकोलाहलरवेहिं ॥ ५९

संगीथसद्दबहिरियेअच्छराणणच्चंतमणहरालोया । पवरच्छराहि भरिया सुरवरणिच्चेहिं सोहंता ॥ ६०

रयणमयवेदिणिवहा मणितोरणबहुविहेहि छज्जंता । वरनट्टेसालपउरा अहिसेयघरेहिं रमणीया ॥ ६१

पोक्खरिणवाविवापिणबहुभवणविचित्तकप्पवरुक्खेहिं । सोहंति जिणाण घरा सव्वेसु वि भद्दसालेसु ॥ ६२

अर्थ (गाथा 55 से 62): सन, भामण्डल और चामरादिस संयुक्त; बहुत कुसुमवृष्टि, दुंदुभि और अशोक वृक्षोंसे रमणीय; भृंगार, कलश, दर्पण, बुद्बुद और बहुतसे धवल चामरोंसे सनाथ; घंटा एवं पताकाओंसे प्रचुर, मंगलकलशोंसे व्याप्त, बहुतसी पुष्पमालाओं एवं मुक्तामालाओंसे शोभित, रमणीय, ऊपर उठते हुए धुंएके समूहसे सहित, बहुतसे फूलों द्वारा की गई पूजासे सनाथ; धवल, हरित, कृष्ण, श्यामल और रक्त वस्त्रों व रेशमी वस्त्रोंके समूहोंसे शोभायमान; वायुसे प्रेरित होकर नाचनेवाली बहुत प्रकारकी ध्वजाओंके समूहसे रमणीय, उत्तम पटह, भेरी, मर्दल, झंझा, वीणादि एवं कांस्यतालों तथा काहलके कोलाहल शब्दोंके साथ बजते हुए प्रचुर बाजोंसे सहित; संगीतके शब्दसे बहिरी हुई अप्सराओंके नृत्यसे मनोहर दिखनेवाले, श्रेष्ठ अप्सराओंसे परिपूर्ण, उत्तम देवोंके समूहोंसे शोभायमान, रत्नमय वेदिकाओंके समूहसे युक्त, बहुत प्रकारके मणितोरणोंसे सुशोभित, उत्तम एवं प्रचुर नाट्यशालाओंसे सहित, अभिषेकगृहोंसे रमणीय; तथा पुष्करिणी, वापियों एवं प्रप्रिणियोंसे सहित, बहुत प्रकारके भवनों व विचित्र कल्पवृक्षोंसे शोभायमान हैं ॥ ५५-६२ ॥


एवं जे जिणभवणा णिद्दिट्ठा भद्दसालवणसंडे । चडसु वि अवसेसु वि वणेसु ते होंति अद्धद्धा ॥ ६३

अर्थ: इस प्रकार जो जिनभवन भद्रशाल वन-खंडमें कहे गये हैं उनसे आधे आधे वे शेष चारों ही वनोंमें हैं ॥ ६३ ॥ उनका उत्सेध,


उच्छेहा आयामा विक्खंभा जोयणा य जे दिट्ठा । णंदणसोमणपंडुगवणेसु ते होंति अद्धद्धा ॥ ६४

अर्थ: आयाम और विष्कम्भ जितने योजन प्रमाण भद्रशाल वनमें कहा गया है, उससे वह उत्तरोत्तर आधा आधा होता हुआ नन्दन, सौमनस और पाण्डुक वनमें है ॥ ६४ ॥


जम्बूदीवस्स जहा मेरुस्स हवंति दिब्वजिणभवणा । सेसाणं मेरूणं तह एव हवंति जिणभवणा ॥ ६५

अर्थ: जिस प्रकार जम्बूद्वीप सम्बन्धी मेरुके दिव्य जिनभवन हैं, उसी प्रकार शेष मेरुओंके भी जिनभवन होते हैं ॥ ६५ ॥


जह भद्दसालवणे जिणभवणा वण्णिदा समासेण । तह वण्णणा य सेसा सोमणसादीसु वि वणेसु ॥ ६६

अर्थ: जिस प्रकार भद्रशाल वनके जिनभवनोंका संक्षेपसे वर्णन किया है, उसी प्रकार शेष सौमनसादिक वनोंमें भी स्थित जिनभवनोंका वर्णन रना चाहिये ॥ ६६ ॥


एकेक्कवरगणाणं वणसंडा सोलसा समुद्दिठ्ठा । सव्वेसु वणेसु तहा जिणभवणा होंति णायव्वा ॥ ६७

अर्थ: एक एक उत्तम पर्वतके सोलह वन-खंड कहे गये हैं । तथा इन सब वनोंमें जिन-भवन भी होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ६७ ॥


मंदरवणेसु णेया जिणभवणाणं पमाणपरिसंखा । असिदी हवंति दिट्ठा उत्तमणाणप्पदीवेहि ॥ ६८

अर्थ: मन्दर पर्वत सम्बन्धी वनोंमें जिन-भवनोंके प्रमाणकी संख्या अस्सी है, ऐसा उत्तम ज्ञानरूपी दीपकसे संयुक्त जिन भगवान्ने कहा है ॥ ६८ ॥


एवं उत्तमभवणा सव्वे वि हवंति कंचणमयाणि । णाणारयणविचित्ता णिच्चुज्जोवा सुगंधड्ढा ॥ ६९

सव्वे अणाइणिहणा सव्वे वरदिव्वरूवसंपण्णा । सव्वे अचिंतुरूवा सव्वे बहुदेवदेविसंपण्णा ॥ ७०

सव्वे तोरणणिवहा सव्वे वरवेदिहि संजुत्ता । सव्वे सणट्टसाला सव्वे सोहंति जिणभवणा ॥ ७१

अर्थ (गाथा 69 से 71): इस प्रकार सब ही उत्तम भवन सुवर्णसे निर्मित, नाना रत्नोंसे विचित्र, नित्य प्रकाशमान, सुगन्ध गन्धसे व्याप्त, सब ही अनादि-निधन, सब ही उत्तम दिव्य रूपसे सम्पन्न, सब ही अचिन्त्य रूपसे सहित, सब ही बहुतसे देव-देवियोंसे व्याप्त, सब ही तोरणसमूहसे संयुक्त, सब ही उत्तम वेदियोंसे सहित, तथा सब ही जिनभवन नाट्यशालाओंसे सहित होते हुए शोभायमान हैं ॥ ६९-७१ ॥


मंदरमहागिरीणं जिणभवणावण्णणा जहा चेव । अवसेसाण गिरीणं जिणभवणावण्णणा तह य ॥ ७२

अर्थ: जिस प्रकार मन्दर महापर्वतों सम्बन्धी जिनभवनोंका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार शेष पर्वतोंके जिनभवनोंका वर्णन समझना चाहिये ॥ ७२ ॥


सव्वाण गिरिवराणं जिणवरभवणा जहा समुद्दिठ्ठा । सव्वाणं दीवाणं जिणवरभवणा तह चेव ॥ ७३

अर्थ: जिस प्रकार [ जम्बूद्वीप ] सम्बन्धी सब श्रेष्ठ पर्वतोंके जिनेन्द्रभवन कहे गये हैं, उसी प्रकार सब द्वीपोंके [ पर्वतोंपर ] जिनेन्द्रभवन समझना चाहिये ॥ ७३ ॥ भद्रशाल वनमें मेरुके प्रदक्षिण क्रमसे


तहिं चेव भद्दसाले मेरुस्स पदाहिणेण णिद्दिट्ठा ।
णामेण दिसगइंद्दा अट्ठेव य पव्वया होंति ॥ ७४

अर्थ: स्थित आठ दिग्गजेंद्र नामक पर्वत कहे गये हैं ॥ ७४ ॥


पउमोत्तरो य णीलो सोवत्थिय अंजणो य कुमुदो य ।
पव्वदपलासणामो अवदंसो रोयणगिरी य ॥ ७५

अर्थ: पद्मोत्तर, नील, स्वस्तिक, अंजन, कुमुद, पलाश पर्वत, अवतंस और रोचनगिरि, ये उन दिग्गज पर्वतोंके नाम हैं ॥ ७५ ॥


सयजोयणउव्विद्धा सयजोयणवित्थडा हु मूलेसु ।
सिहरेसु य पण्णासा पणुवीसा गाढ धरणीयले ॥ ७६

अर्थ: उक्त पर्वत सौ योजन ऊंचे, मूलमें सौ तथा शिखरोंपर पचास योजन विस्तृत, और पृथ्वीतलमें पच्चीस योजन अवगाहसे युक्त हैं ॥ ७६ ॥


सीदासीदोदाणं तडेसु ते होंति पव्वदा रम्मा ।
एकेकाण णदीणं चउरो चउरो य णायव्वा ॥ ७७

अर्थ: वे रमणीय पर्वत सीता-सीतोदा नदियोंमेंसे एक एकके तटोंपर चार चार जानने चाहिये ॥ ७७ ॥


वणवेदीपरिखित्ता मूलेसु तहा णगाण सिहरंसु ।
मणितोरणेहिं रम्मा णाणामणिरयणओघदिप्पंता ॥ ७८

अर्थ: उक्त पर्वत मूलमें और शिखरोंपर वनवेदीसे वेष्टित, मणिमय तोरणोंसे रमणीय और नाना मणियों एवं रत्नोंसे देदीप्यमान हैं ॥ ७८ ॥


सिहरेसु देवणयरा णाणापासादभूसिदा रम्मा ।
सुरसुंदरिसंछण्णा वरपोक्खरिणीहि कयसोहा ॥ ७९

धुव्वंतधयवडाइया जिणभवणविहूसिया मणभिरामा ।
सुरसयसहस्सपउरा अणाइणिहणा हु ते णयरा ॥ ८०

अर्थ (गाथा 79 से 80): पर्वतोंके शिखरोंपर जो देवनगर हैं वे नाना प्रासादोंसे भूषित, रमणीय, सुरसुन्दरियोंसे व्याप्त, उत्तम पुष्करिणियोंसे शोभायमान, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, जिनभवनोंसे विभूषित, मनको अभिराम, लाखों देवोंसे प्रचुर और अनादि-निधन हैं ॥ ७९-८० ॥


पंचसया उच्चत्तं मंदरतलपीढियाखिदितलादो ।
वित्थिण्णा पंचसया पढमा सेढी णगवरस्स ॥ ८२

अर्थ: मन्दरतलपीठिका रूप पृथिवीतलसे पांच सौ योजन ऊपर जाकर पांच सौ योजन विस्तीर्ण मेरु पर्वतकी प्रथम श्रेणी (प्रथम परिधि) है ॥ ८२ ॥


वणवेदीपरिखित्ते मणितोरणमंडिदे पढमपीढे ।
चउसु वि दिसासु रम्मा सुरभवणा होंति चत्तारि ॥ ८३

अर्थ: उन नगरोंमें जो दिग्गजेंद्र पर्वतोंके समान नामवाले अधिपति देव हैं वे पल्योपम प्रमाण आयुके धारक होते हुए वहां महा प्रभावके साथ रहते हैं ॥ ८१ ॥ वनवेदीसे वेष्टित एवं मणिमय तोरणोंसे मण्डित उक्त प्रथम पीठपर चारों ही दिशाओंमें रमणीय चार देवप्रासाद हैं ॥ ८३ ॥ वहां सोम, यम, वरुण और कुबेर


मणिभवणचारणालभगंधव्वणिवासचित्तणामाणि । सोमजमवरुणधणवहद्देबाणं कीडणागेहा ॥ ८४

अर्थ: देवोंके क्रमशः मणिभवन (मान, मानी), चारणालय, गन्धर्वनिवास और चित्र नामक क्रीड़ागृह हैं ॥ ८४ ॥


विक्खंभायामेण य जोयणतीसा हवंति णायव्वा । पण्णासा उत्तुंगा वरभवणा रयणपरिणामा ॥ ८५

अर्थ: रत्नोंके परिणाम रूप वे उत्तम भवन तीस योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित तथा पचास योजन ऊंचे जानना चाहिये ॥ ८५ ॥


णंदणवणम्मि जेया ते भवणा विविधरयणपरिणामा । पुव्वादिविसविभागे पदाहिणा होंति मेरुस्स ॥ ८६

अर्थ: विविध रत्नोंके परिणाम रूप वे भवन नन्दन वनमें मेरुके प्रदक्षिणक्रमसे पूर्वांदिक दिशाभागमें स्थित हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८६ ॥


अड्ढट्ठा कोडीओ गिरिकण्णाओ हवंति भवणेसु । एक्केकक्केसु वियाणह णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहि ॥ ८७

अर्थ: एक एक भवनमें साढ़े तीन करोड़ गिरिकन्यायें होती हैं, ऐसा जिनेन्द्र देवके द्वारा निर्दिष्ट किया गया जानो ॥ ८७ ॥


लायण्णरूवजोव्वणअब्भेरयपेच्छणिज्ज सव्वा हूँ । सोमादीदेवाणं णायव्वा होंति कण्णाओ ॥ ८८

अर्थ: आश्चर्यजनक लावण्य, रूप और यौवनसे दर्शनीय उक्त सब कन्यायें सोमादिक देवोंकी जाननी चाहिये ॥ ८८ ॥


सोमणसपंडुयाणं एसेव कमो हवइ णायव्वो । देवीणं परिसंखा भवणाणं चावि एमेवे ॥ ८९

अर्थ: यही क्रम सौमनस और पाण्डुक वनमें स्थित गृहोंका भी जानना चाहिये। वहां देवियों व भवनोंकी भी संख्या समान है ॥ ८९ ॥


णवरि बिसेसो जाणे उच्छेहायाम तह य विक्खंभा । णामाणि य भवणाणं अण्णण्णं होंति णिद्दिट्ठा : ९०

अर्थ: विशेष केवल इतना जानना चाहिये कि भवनोंका उत्सेध, आयाम तथा विष्कम्भ और नाम भिन्न भिन्न कहे गये हैं ॥ ९० ॥


वज्जभवणे य णामो वज्जप्पह तह सुवण्णनामा य । अवरे सुवण्णतेओ सोमणसवणस्स णायव्वा ॥ ९१

अर्थ: वज्र, वज्रप्रभ, सुवर्ण और सुवर्णतेज, ये सौमनस वनके भवनोंके नाम जानना चाहिये ॥ ९१ ॥


विक्खंभायामेण य पण्णरसा जोयणा समुद्दिट्ठा । पण्णवीसा उच्छेहा वरभवणा होंति रयणमया ॥ ९२

अर्थ: उक्त रत्नमय उत्तम भवन पन्द्रह योजन विष्कम्भ व आयामसे सहित तथा पच्चीस योजन ऊंचे कहे गये हैं ॥ ९२ ॥


लोहिय अंजणणामो हारिद्दो भवण सेदणामो य । पासादा पंडुवणे णाणामणिरयणसंच्छण्णा ॥ ९३

अर्थ: लोहित, अंजन, हारिद्र और श्वेत (पाण्डु), ये पाण्डुक वनमें स्थित उन प्रासादोंके नाम हैं। ये प्रासाद नाना मणियों एवं रत्नोंसे व्याप्त हैं ॥ ९३ ॥


विक्खंभायामेण य अद्धट्ठ जोयणा समुद्दिट्ठा । अद्धत्तेरसतुंगा रयणमया पंडुवणगेहा ॥ ९४

अर्थ: उक्त पाण्डुक वनके रत्नमय भवन साढ़े सात योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित तथा साढ़े बारह योजन ऊंचे हैं ॥ ९४ ॥ फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, उत्तम


धुव्वंतधयवडया वरतोरणमंडिया परमरम्मा ।
कालागुरुगंधड्ढा बहुकुसुमक्कयच्चणसणाहा ॥ ९५

सीहासणसंजुत्ता कोमलपल्लं कसयणतलपउरा ।
पवरच्छराहिं भरिया अच्छेरयरूवसाराहि ॥ ९६

सव्वे वि पंचवण्णा णाणामणिकणयरयणसंछण्णा ।
उदियक्कंमंडळणिभा संपुण्णमियंकडब्भजोवा ॥ ९७

सोमजमवरुणवासवणामाणं लोयवालदेवाणं ।
ते होंति हु पासादा पुव्वक्कयसुकयकम्मेहि ॥ ९८

अर्थ (गाथा 95 से 98): तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, कालागुरुके गन्धसे व्याप्त, बहुत कुसुमोंसे की गई पूजासे सनाथ, सिंहासनसे संयुक्त, प्रचुर कोमल पर्यंक (पलंग) एवं शय्यातलोंसे सहित, आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूपवाली उत्तम अप्सराओंसे परिपूर्ण, सब ही पांच वर्णवाले; नाना मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे व्याप्त, उदयको प्राप्त हुए सूर्यमण्डलके सदृश, और सम्पूर्ण चन्द्रमाके समान उद्योतवाले ये प्रासाद सोम, यम, वरुण और कुबेर नामक लोकपालोंके पूर्वकृत पुण्य कर्मसे होते हैं ॥ ९५-९८ ॥


जोयणसहस्स तुंगो वित्थिण्णायाम तेत्तियो दिट्ठो ।
बलभद्दणामकूडो णाणामणिरयणपरिणामो ॥ ९९

पुव्वुत्तरम्मि भागे ईसाणे होइ णंदणवणस्स ।
बलभद्दणामदेवो सिहरम्मि महाबलो वसइ ॥ १००

अर्थ (गाथा 99 से 100): नन्दन वनके पूर्वोत्तर भाग रूप ईशान दिशामें एक हजार योजन ऊंचा, इतना ही विस्तीर्ण व आयत, नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप बलभद्र नामक कूट कहा गया है। उसके शिखरपर महा बलवान् बलभद्र नामक देव निवास करता है ॥ ९९-१०० ॥


णंदणवण रंभित्ता पंचसया जोयणा दु णिस्सरिदो ।
भायासं पंचसया रुंधित्ता ठाइ सो सेलो ॥ १०१

अर्थ: वह पर्वत पांच सौ योजन प्रमाण नन्दन वनको रोककर फिर वहांसे निकल पांच सौ योजन प्रमाण आकाशको रोककर स्थित है ॥ १०१ ॥


सिहरम्मि तस्स णेया देवाण पुरा हवंति रमणीया ।
पायारगोउरजुदा वावीवणसंडसंजुत्ता ॥ १०२

अर्थ: उसके शिखरपर प्राकार व गोपुरोंसे युक्त तथा वापी और वनखण्डोंसे संयुक्त देवोंके रमणीय नगर हैं ॥ १०२ ॥


णंदणमंदरणिसधा हिमविजया रुजयसायरा वज्जो ।
अट्ठेव समुद्दिट्ठा मेरुस्स पदाहिणे कूडा ॥ १०३

अर्थ: [ जिनभवनोंके दोनों पार्श्वभागोंमें ] मेरुके प्रदक्षिण रूपसे नन्दन, मन्दर, निषध, हिम (हिमवान्), विजय (रजत), रुचक, सागर और वज्र, ये आठ कूट कहे गये हैं ॥ १०३ ॥


विक्खंभायामेण य पंचेव सयाणि होंति मूलेसु ।
उच्छेहा पंचसया तदड्ढ सिहरेसु वित्थिण्णा ॥ १०४

अर्थ: ये कूट मूलमें पांच सौ योजन विष्कम्भ व आयामसे सहित, पांच सौ योजन ऊंचे, और शिखरोंपर इससे आधे अर्थात् अढ़ाई सौ योजन प्रमाण विस्तीर्ण हैं ॥ १०४ ॥ नन्दन


णंदणवणस्स कूडा पुव्वादिक्कमेण होंति णादव्वा । जिणइंदवरघराणं उभयप्पासेसु दो दो दु ॥ १०५

अर्थ: वनके उपर्युक्त कूट पूर्वादि क्रमसे जिनभवनोंके दोनों पार्श्वभागोंमें दो दो होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १०५ ॥


गिरिकूडवरगिहेसु य दिव्वामलरुवदेहधारीओ । दिसकण्णकुमारिओ वसंति परिवारजुत्ताओ ॥ १०६

अर्थ: गिरिके कूटोंपर स्थित गृहोंमें दिव्य व निर्मल रूपसे युक्त देहको धारण करनेवाली दिक्कन्याकुमारियां अपने परिवारसे युक्त होकर निवास करती हैं ॥ १०६ ॥


कण्णकुमारीण घरा कोसायामा तदद्धविक्खंभा । पण्णरस धणुसदाई उत्तुंगा कूडसिहरेसु ॥ १०७

अर्थ: कूटशिखरोंपर स्थित उक्त दिक्कन्याकुमारियोंके गृह एक कोश आयत, इससे आधे विस्तृत, और पन्द्रह सौ धनुष प्रमाण ऊंचे हैं ॥ १०७ ॥


मेघकरा मेघवदी सुमेघा तह मेघमालिणी णाम । तोयंधरा विचित्ता मणिमालिणि णिंदिदा इदरा ॥ १०८

एदाओ देवीओ अट्ठेव य होंति तेसु कूडेसु । णंदणवणस्स जेया पदाहिणे मंदरगिरिस्स ॥ १०९

अर्थ (गाथा 108 से 109): मन्दरगिरि सम्बन्धी नन्दन वनके उन कूटोंपर प्रदक्षिणक्रमसे मेघकरा, मेघवती, सुमेघा, मेघमालिनी, तोयंधरा, विचित्रा, मणिमालिनी और अनिन्दिता, ये आठ देवियां रहती हैं ॥ १०८-१०९ ॥


उप्पलकुमुदा णलिणा तह उप्पलउज्जला दु णामाओ । दक्खिणपुव्वे जेया वावीओ होंति विमलाओ ॥११०

अर्थ: नन्दन वनके दक्षिण-पूर्वमें उत्पला, कुमुदा, नलिना व उत्पलोज्ज्वला नामक निर्मल वापिकायें जाननी चाहिये ॥ ११० ॥


भिंगा भिंगणिभा तह कज्जलयरा कज्जलाभा पवराओ । दक्खिणपच्छिमभागे णिम्मलजलपुण्णवावीओ ॥

अर्थ: उसके दक्षिण-पश्चिम भागमें भृंगा, भृंगानिभा, कज्जला तथा कज्जलाभा नामक निर्मल जलसे परिपूर्ण श्रेष्ठ वापियां हैं ॥ १११ ॥


सिरिमहा सिरिकंता सिरिमहिदा तह य होदि सिरिनिलया । अवरुत्तरम्मि भागे णीलुप्पलकुमुदछण्णाओ ॥

अर्थ: उसके पश्चिमोत्तर भागमें नीलोत्पल और कुमुदोंसे व्याप्त श्रीमद्रा, श्रीकान्ता, श्रीमहिता तथा श्रीनिलया नामक वापियां हैं ॥ ११२ ॥


णलिणा य णलिणगुम्मा कुमुदा कुमुदप्पभा य वावीओ। पुँव्वुत्तरम्मि भागे णादव्वा णंदणवणस्स ॥११३

अर्थ: नन्दन वनके पूर्वोत्तर भागमें कुमुदोंसे व्याप्त नलिना, नलिनगुल्मा, कुमुदा और कुमुदप्रभा नामक वापियां हैं ॥ ११३ ॥


पणुवीसा विक्खंभा पण्णासा जोयणा य आयामा । दस जोयणावगाढा वावीण पमाणपरिसंखा ॥ ११४

अर्थ: विष्कम्भ पच्चीस योजन, आयाम पचास योजन, और अवगाढ़ दश योजन, यह उन वापियोंके प्रमाणकी संख्या है ॥ ११४ ॥


दिणयरमऊहचुंबियवियसियसत्तवत्तसंडणिवहाओ । मयरंदरेणुपिंजरसलिधवलसुगंधसलिलाओ ॥ ११५

अर्थ: उक्त सब वापियां दिनकर ( सूर्य ) की किरणोंसे चुम्बित होकर विकासको प्राप्त हुए कमलखण्डोंके समूहसे सहित, परागकी धूलिसे पीत वर्णको प्राप्त हुए चन्द्रवत् धवल


सिसियरकरविणिग्गयविभिण्णवरकुमुदकुसुमपउराओ । पवणवसचलिएणिम्मलतरंगरंगंतरमणाओ ॥

गयणयरजुवइमज्जणवियडियधम्मिलेकुसुमणिवहाओ । खयरविलासिणिउरयहंकंकुमपंकेण लित्ताओ ॥

विज्जाहरवरसुंदरिजल कीडा सहरावमुहलाओ । उच्छलियदूरबहुजलपडायसंधायेरमणाओ ॥ ११८

वणवेदीजुत्ताओ वरतोरणमंडियाओ सव्वाओ । सोहंति हूँ वावीओ णिम्मलसलिलेहिं पुण्णाओ ॥ ११९

अर्थ (गाथा 115 से 119): सुगन्धित जलसे परिपूर्ण, चन्द्रकिरणोंके निकलनेसे विकासको प्राप्त हुए प्रचुर उत्तम कुमुदकुसुमोंसे युक्त, पवनके प्रभावसे उठती हुई निर्मल तरंगोंके चलनेसे रमणीय, विद्याधरयुवतियोंके स्नान करनेमें निकले हुए चोटीके फूलोंके समूहसे संयुक्त, विद्याधरविलासिनियोंके उरस्थलसे निकले हुए कुंकुमपंकसे लिप्त, विद्याधरोंकी श्रेष्ठ सुन्दरियोंकी जलक्रीड़ाके शब्दसे मुखरित, दूर तक उछलते हुए बहुतसे जलबिन्दुओंके संघातसे रमणीय, वन और वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, और निर्मल जलसे परिपूर्ण होती हुई शोभायमान हैं ॥ ११५-११९ ॥


दक्खिणदिसाविभागे सोहम्मिंदस्स होंति वावीओ । उत्तरदिसाविभाए ईसाणिंदस्स णेयव्वा ॥ १२०

अर्थ: दक्षिणदिशा विभागमें सौधर्म इन्द्रकी वापियां और उत्तरदिशा विभागमें ईशान इन्द्रकी वापियां जाननी चाहिये ॥ १२० ॥


वावीसु होंति गेहा तरंगसंघट्टसद्गंभीरा । दिव्यामोयसुगंधा रयणउज्जलकिरणपिंजरिया ॥ १२१

अर्थ: वापियोंमें तरंगोंके टकरानेके शब्दसे गम्भीर, दिव्य आमोदसे सुगन्धित और रत्नोंकी उज्ज्वल किरणोंसे पीत वर्ण हुए गृह होते हैं ॥ १२१ ॥


बासट्ठिजोयणाई बे कोसा वरघरा समुत्तुंगा । सक्कोसा इंगितीसा विक्खंभायाम णिद्दिट्ठा ॥ १२२

अर्थ: इन उत्तम गृहोंकी ऊंचाई बासठ योजन दो कोश ( ६२ २/४ यो. ) और विष्कम्भ तथा आयाम एक कोश सहित इकतीस ( ३१ १/४ ) योजन प्रमाण कहा गया है ॥ १२२ ॥


तेसु घरेसु वि णेया णाणामणिविफुरंतकिरणेसु । सीहासणा विचित्ता इंदाण सभा समुद्दिठ्ठा १२३

अर्थ: नाना मणियोंकी प्रकाशमान किरणोंसे सहित उन गृहोंमें भी विचित्र सिंहासनोंसे युक्त इन्द्रोंकी सभा कही गई है ॥ १२३ ॥


इंदा सलोयपाला अच्छरसहिदा य वाविभवणेसु । कीडंति पहिट्ठमणा पुव्वक्केणणिम्मलतवेण ॥ १२४

अर्थ: पूर्वकृत तपके प्रभावसे लोकपालों और अप्सराओंसे सहित इन्द्र मनमें हर्षित होते हुए इन वापीभवनोंमें क्रीड़ा करते हैं ॥ १२४ ॥


एवं सोमणसवणे वावीओ विमलसलिलपुण्णाओ । कंचनकूडा य तहा पासादा होंति णायव्वा ॥ १२५

अर्थ: इसी प्रकार सौमनस वनमें भी निर्मल जलसे परिपूर्ण वापियां, कंचनकूट तथा प्रासाद जानना चाहिये ॥ १२५ ॥ नन्दन वनसे बासठ हजार पांच सौ


बासट्ठिं च सहस्सा पंचसया जोयणा य उव्वइया। णंदणवणादु णेया सोमणसवणं समुद्दिष्ट्ठं ॥ १२६

अर्थ: योजन ऊपर सौमनस वन कहा गया जानना चाहिये ॥ १२६॥


पंचेव जोयणसया विक्खिण्णो रयणजालकिरणोहो। देवासुरिंदणिवहो जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ १२७

अर्थ: यह दिव्य वन पांच सौ योजन विस्तीर्ण, रत्नसमूहकी किरणमालासे संयुक्त, देवेन्द्र एवं असुरेन्द्रोंके समूहसे सहित, और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ १२७॥


बेगाउदुव्विद्धा पंचधणुस्सयपमाणविक्खिण्णा। वणवेदी णिद्दिट्ठा णंदणवणसोमणस्साणं ॥ १२८

अर्थ: नन्दन वन और सौमनस वनकी वनवेदी दो कोश ऊंची और पांच सौ धनुष प्रमाण विस्तीर्ण कही गई है ॥ १२८॥


अवसेसाण वणाणं सव्वाण गिरीण सव्वसरियाणं। उच्छेहो विक्खंभो एसेव कमो दु वेदीणं ॥ १२९

अर्थ: शेष सब वनों, पर्वतों और सब नदियोंकी वेदियोंकी उंचाई व विष्कम्भका यही क्रम जानना चाहिये ॥ १२९॥


तत्तो सोमणसादो उद्धं छत्तीसजोयणसहस्सा। गंतूण पंडुकवणं होइ महातेयसंपण्णं ॥ १३०

अर्थ: सौमनस वनसे छत्तीस हजार योजन ऊपर जाकर महा तेजसे सम्पन्न पाण्डुक वन है ॥ १३० ॥


छज्जोयणपरिहीणो पंचसया जोयणा य विक्खिण्णो। बहुविहरुक्खपउवरो वरमंदरसिहरवणखंडो ॥ १३१

अर्थ: उत्तम मन्दर पर्वतके शिखर सम्बन्धी यह वन-खण्ड छह योजन कम पांच सौ (४९४) योजन विस्तीर्ण व बहुत प्रकारके प्रचुर वृक्षोंके समूहसे सहित वनखण्डोंसे संयुक्त है ॥ १३१ ॥


पंडुकवणस्स मज्झे वेरुलियमया दु चूलिया दिट्ठा। मणगणजलंतणिवहा जोयण चालीसतूंगा ॥ १३२

अर्थ: पाण्डुक वनके मध्यमें चमकते हुए मणिसमूहोंसे सहित और चालीस योजन ऊंची दीर्घ वैडूर्यमय चूलिका है ॥ १३२ ॥


बारह जोयण मूले मज्झे अट्ठे व जोयणा णेया। सिहरे चत्तारि हवे विक्खंभायामपरिसंखा ॥ १३३

अर्थ: इसके विष्कम्भ और आयामका प्रमाण मूलमें बारह योजन, मध्यमें आठ योजन, और शिखरपर चार योजन जानना चाहिये ॥ १३३ ॥


मंदरमहाणगाणं वेदीणं चूलियाण कूडाणं। सव्वाण पव्वदाणं भवणाणं वरघराणं च ॥ १३४

अर्थ: कटि (मूलविस्तार) और शिर (शिखरविस्तार) को परस्परमें घटाकर [शेषको उत्सेधसे भाजित करनेपर जो लब्ध हो] उतना भूमिकी अपेक्षा इनके विष्कम्भमें हानिका तथा मुखकी अपेक्षा वृद्धिका प्रमाण होता है । इसको अभीष्ट स्थानकी उंचाईसे गुणा करनेपर जो प्राप्त हो उसे मूलविस्तारमेंसे कम करने अथवा मुखमें मिला देनेपर अभीष्ट स्थानमें इच्छित विस्तारका प्रमाण होता है । इन करणगाथाओंके द्वारा मन्दर महापर्वतों, वेदियों, चूलिकाओं, कूटों,


कडिसिरविसुद्धसेसं इच्छगुणं तह य चेव काऊणं।
विक्खंभहाणि-वड्ढी आणिज्जो करणगाहाहि ॥ १३५

अर्थ (गाथा 134 से 135): सब पर्वतों (!) भवनों और उत्तम गृहोंके इच्छित विस्तारको लाना चाहिये (देखिये पीछे गाथा ३२) ॥ १३४-३५ ॥


तुंगो चूलियासिहरो ण विलगग्गइ उड्ढविमाणणामस्स।
तलभागे णादव्वा बालपमाणेण णिद्दिठ्ठा ॥ १३६

अर्थ: उन्नत चूलिकाशिखर बालके प्रमाणसे ऋतु नामक विमानके तलभागसे नहीं लगा है, अर्थात् मेरूचूलिकाके ऊपर बाल मात्रके अन्तरसे ऋतु विमान निरालम्ब स्थित है, ऐसा निर्दिष्ट जानना चाहिये ॥ १३६ ॥


उत्तरकुरुमणुयाणं कोमलसुकुमालंणिद्धवण्णेण।
सिद्धायतनमज्झभागे केसेण दु अंतरं होइ ॥ १३७

अर्थ: मेरुके शिखर और ऋतु विमानतलके मध्य भागमें उत्तरकुरुमें उत्पन्न मनुष्योंके कोमल, सुकुमार एवं स्निग्ध वर्णवाले एक बाल मात्रका अन्तर है ॥ १३७ ॥


पंडुकसिला वि णेया कणयमया विविधरयणसंछण्णा।
पुव्वुत्तरम्मि भागे इंदाउहसंणिहा होई ॥ १३८

अर्थ: पूर्वोत्तर भाग (ईशान) में इन्द्रायुध (इन्द्रधनुष) के सदृश और विविध रत्नोंसे व्याप्त सुवर्णमय पाण्डुकशिला जानना चाहिये ॥ १३८ ॥


दक्खिणपुव्वदिसाए पंडुकवरकंबला सिला होइ।
कुंदिंदुसंखवण्णा अट्टमिससिसंणिभा रम्मा ॥ १३९

अर्थ: दक्षिण-पूर्वदिशा (आग्नेय) में कुंदपुष्प, चन्द्रमा एवं शंखके समान वर्णवाली अष्टमीके चन्द्रके सदृश रमणीय उत्तम पाण्डुकंबला नामक शिला है ॥ १३९ ॥


दक्खिणपच्छिमभागे [जासवणणिभा दु इंदधणुसरिसा।
णामेण रत्तकंबलमहासिला होइ णायव्वा ॥ १४०

अर्थ: दक्षिण-पश्चिम भाग (नैऋत्य) में जपाकुसुम व इन्द्रधनुषके सदृश रक्तकंबला नामक महा शिला जाननी चाहिये ॥ १४० ॥


उत्तरपच्छिमभागे] सुरिंदधणुसंणिभा परमरम्मा।
रतसिला णादव्वा तवणिज्जणिभा समुद्दिट्ठा ॥ १४१

अर्थ: उत्तर-पश्चिम (वायव्य) भागमें इन्द्रधनुषके सदृश, अतिशय रमणीय और तपनीयके समान प्रभावाली रक्तशिला कही गई है ॥ १४१ ॥


पंचसया आयामा वित्थार तदद्ध होंति णिद्दिठ्ठा।
चत्तारि जोयणाई उत्तुंगाओ वरसिलाओ ॥ १४२

अर्थ: इन उत्तम शिलाओंकी लम्बाई पांच सौ योजन, विस्तार इससे आधा अर्थात् अढाई सौ योजन और ऊंचाई चार योजन प्रमाण कही गई है ॥ १४२ ॥


बहुउज्जलरुवाओ वरतोरणमंडियाओ दिव्याओ।
वरवेदियजुत्ताओ मणिरयणफुरंतकिरणाओ ॥ १४३

अर्थ: उक्त शिलायें अतिशय उज्ज्वल रूपवाली, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, श्रेष्ठ वेदीसे संयुक्त और मणि एवं रत्नोंकी प्रकाशमान किरणोंसे सहित हैं ॥ १४३ ॥


एगेगसिलापट्टे सिंहासन तिण्णि तिण्णि णिद्दिठ्ठा।
मणिकंचणपरिणामा णिम्मलससिकंतकिरणोहा ॥ १४४

अर्थ: एक एक शिलापट्टपर मणि व सुवर्णके परिणाम रूप तथा निर्मल चन्द्रकान्त मणियोंके किरणसमूहसे संयुक्त तीन तीन सिंहासन कहे गये हैं ॥ १४४ ॥ ये सिंहासन पांच सौ धनुष ऊंचे, पांच सौ धनुष आयत,


पंचधणुस्सयतुंगा आयामा ते हवंति पंचसया । विक्खंभेण य णेया अड्ढाइज्जा धणुसदाणि ॥ १४५

अर्थ: और अढ़ाई सौ धनुष प्रमाण विष्कम्भसे सहित जानना चाहिये ॥ १४५ ॥


पुव्वाभिमुहा सव्वा सिदादवत्ता सचामराडोवा । मज्झेसु होंति दिव्वा सिंहासण जिणवरिंदाणं ॥ १४६

अर्थ: सब सिंहासन पूर्वाभिमुख, धवल आतपत्रसे संयुक्त और चामरोंके आटोपसे सहित हैं। इनमें मध्यके सिंहासन जिनेन्द्रोंके होते हैं ॥ १४६ ॥


सोहम्मीसाणाणं इंदाणं होंति दोसु पासेसु । दाहिणवामदिसाए जहाकमेणं समुद्दिट्ठा ॥ १४७

अर्थ: उनके दोनों पार्श्वभागोंमें यथाक्रमसे दक्षिण और बाम ( उत्तर ) दिशामें सौधर्म और ईशान इन्द्रके सिंहासन कहे गये हैं ॥ १४७ ॥


ईसाणंदिसाभागे भरहजिणिंदाण दिव्वदेहाणं । पंडुकसिलातले तह जन्मणमहिमा समुद्दिट्ठा ॥ १४८

अर्थ: ईशान दिशाभागमें स्थित पाण्डुकशिलातलपर दिव्य देहके धारक भरतक्षेत्र सम्बन्धी जिनेन्द्रोंके जन्मकी महिमा कही गई है ॥ १४८ ॥


अवरविदेहाण तहा वरपंडुयकंबळम्मि धूमदिसे । वररत्तकंबळम्मि दु णेरदि एरावदाणं तु ॥ १४९

अर्थ: अग्नि दिशामें स्थित उत्तम पाण्डुकम्बल शिलापर अपर विदेह सम्बन्धी जिनेन्द्रोंकी तथा नैऋत्य दिशामें स्थित उत्तम रक्तकम्बल शिलापर ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धी जिनेन्द्रोंके जन्मकी महिमा कही गई है ॥ १४९ ॥


वाउदिशे रत्तसिला पुव्वविदेहाण जिणवरिंदाणं । जन्मणमहिमा मेरुप्पदाहिणेणं तु गंतूणं ॥ १५०

ससुरासुरदेवगणा आगंतूणं महाविभूदीए । सिंहासणेसु दिव्वा जन्मणमहिमं पकुव्वंति ॥ १५१

अर्थ (गाथा 150 से 151): वायुदिशामें स्थित रक्तशिलापर पूर्व विदेह सम्बन्धी जिनेन्द्रोंके जन्मकी महिमा जानना चाहिये । सुर और असुरोंसे सहित देवगण मेरुकी प्रदक्षिणा करते हुए महा विभूतिके साथ आकर सिंहासनोंपर दिव्य जन्ममहिमाको करते हैं ॥ १५०-१५१ ॥


संखवरपडहमणहरसिंहणिणाएहि घंटसद्देहि । भवणवई वाणविंतरजोइसकप्पाढिवा देवा ॥ १५२

णाऊण जिणुप्पत्तिं हरिसेहिं महाविभूदिजुत्तेहिं । आगच्छंति सुरवरा छायंता णहयलं सयलं ॥ १५३

अर्थ (गाथा 152 से 153): भवनवासी, वानव्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पाधिपति देव क्रमशः शंख, उत्तम पटह, मनोहर सिंहनाद और घंटाके शब्दसे जिन भगवान्की उत्पत्तिको जानकर सहर्ष महा विभूतिसे युक्त होकर समस्त आकाशतलको आच्छादित करते हुये आते हैं ॥ १५२-१५३ ॥


इंदो वि महासत्तो तीहिं य परिसाहिं सत्तअणियाहि । गयवरखंधारूढो एइ महाइड्ढिसंपण्णो ॥ १५४

अर्थ: महा बलवान् इन्द्र भी तीन परिषद और सात अनीकोंसे युक्त हो उत्तम हाथीके कन्धेपर चढ़कर महा ऋद्धिके साथ आता है ॥ १५४ ॥


रबिससिजहु त्ति णामा परिसाणं महदरा समुद्दिट्ठा । अब्भंतरमज्झिमबाहिराण कमसो मुणेयव्वा ॥ १५५

अर्थ: अभ्यन्तर, मध्यम और बाह्य परिषदके क्रमसे रवि चन्द्र और जतु नामक महत्तर कहे गये जानना चाहिये ॥ १५५॥ अभ्यन्तर परिषद्


बारससयसयसहस्सा अभंतरपारिसा सुरा होंति ।
चउदससयसयसहस्सा मज्झिमपरिसा समुद्दिठ्ठा ॥ १५६

सोलससयसयसहस्सा बाहिरपरिसासुराण परिसंखा ।
सव्वे वि दिव्वरूवा णाणाविहपहरणाभरणा ॥ १५७

अर्थ (गाथा 156 से 157): देव बारह लाख, मध्यम परिषद चौदह लाख और बाह्य परिषद् सोलह लाख प्रमाण कहे गये हैं । ये सब ही देव दिव्य रूपसे संयुक्त और नाना प्रकारके आयुधों एवं आभरणोंसे विभूषित होते हैं ॥ १५६-१५७॥


तिण्णिं पि परिसा कहिया एक्केक्का सत्ताणीओ वक्खामि ।
सोहम्मकप्पवासीइंदस्स महाणुभावस्स ॥ १५८

अर्थ: तीनों ही परिषदोंका कथन किया जा चुका है। अब यहांसे आगे महा प्रभावसे युक्त सौधर्म इन्द्रकी सात अनीकोंका वर्णन करते हैं ॥ १५८॥


वसभरहतुरय मयगलणच्चणगंधव्व भिच्चव्वग्गाणं ।
सत्ताणीया दिट्ठा सत्तहि कच्छाहि संजुत्ता ॥ १५९

अर्थ: वृषभ, रथ, तुरग, मदगल ( हाथी ), नर्तक, गन्धर्व और भृत्यवर्ग, इनकी सात कक्षाओंसे संयुक्त सात सेनायें कही गई हैं ॥ १५९॥


चुलसीदिसयसहस्सा [वरवसभा संखकुंदसंकासा ।
पढमाए कच्छाए पुरदो गच्छंति लीलाहिं ॥ १६०

अर्थ: प्रथम कक्षामें शंख एवं कुंद पुष्पके सदृश धवल चौरासी लाख उत्तम वृषभ लीलापूर्वक आगे जाते हैं ॥ १६०॥


अडसट्ठिसयसहस्सा] एया कोडी हवंति वरवसभा ।
जासवणकुसुमवण्णा मणिरयणविहूसिया बिदिए ॥ १६१

अर्थ: द्वितीय कक्षामें जपा कुसुमके सदृश वर्णवाले और मणि एवं रत्नोंसे विभूषित वे उत्तम वृषभ एक करोड़ अड़सठ लाख होते हैं ॥ १६१॥


तिण्णेव य कोडीओ छत्तीसा सयसहस्स वरवसहा ।
णीलुप्पलसंकासा तदियाकच्छम्मि णिद्दिठ्ठा ॥ १६२

अर्थ: तृतीय कक्षामें नील कमलके सदृश वर्णवाले उत्तम वृषभ तीन करोड़ छत्तीस लाख कहे गये हैं ॥ १६२॥


छच्चेव य कोडीओ बाहत्तरिसयसहस्स वरवसहा ।
मरगयमणि किरणोहा चउत्थकच्छट्ठिया जंति ॥ १६३

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें स्थित मरकत मणिकी किरणोंके समूहके समान कान्तिवाले उत्तम वृषभ छह करोड़ बहत्तर लाख होते हैं ॥ १६३॥


तेरह तह कोडीओ चउद्दाला सयसहस्स वरवसहा ।
कणयणिभा विण्णेया पंचमकच्छम्हि णिद्दिठ्ठा ॥ १६४

अर्थ: पंचम कक्षामें सुवर्णके सदृश वर्णवाले उत्तम वृषभ तेरह करोड़ चवालीस लाख निर्दिष्ट किये गये हैं ॥१६४॥


छब्बीसा कोडीओ अठ्ठासीदा य सयसहस्साणि ।
छट्ठमकच्छे दिट्ठा भिण्णंजणसच्छहा वसभा ॥ १६५

अर्थ: छठी कक्षामें भिन्न अंजनके सदृश कान्तिवाले वृषभ छब्बीस करोड़ अठासी लाख कहे गये हैं ॥ १६५॥


तेवण्णा कोडीओ छायत्तरि सयसहस्स वरवसभा ।
सत्तसकच्छे दिट्ठा किसुयकुसुमप्पभा णेया ॥ १६६

अर्थ: सातवीं कक्षामें किंशुक कुसुमके समान प्रभाववाले उत्तम वृषभ तिरेपन करोड़ छहत्तर लाख कहे गये समझना चाहिये ॥ १६६॥ उनके मध्य मध्यमें बजते हुए महा वादित्रोंके


मज्झे मज्झे तेसिं बज्जंतमहंततूरणिग्घोसं । जिणजम्मणमहिमाए वसभाणीया समुच्छरिया ॥ १६७

अर्थ: शब्दसे सहित वे वृषभानीक उछलते हुए जिन भगवान्‌के जन्मकल्याणकमें जाते हैं ॥१६७॥


घंटार्किकिणिणिवद्धा वरचामरमंड़िया मणभिरामा । मणिकुसुममालपउरा अणोवमा रूवसंपण्णा ॥ १६८

वरकोमलपल्लाणा देवकुमारेहि वाहमाणा ते । सोहंति दु गच्छंता चलंतधरणीहरा चेव ॥ १६९

अर्थ (गाथा 168 से 169): घंटा व किंकिणियोंके समूहसे सहित, उत्तम चामरोंसे मण्डित, मनोहर, प्रचुर मणिमालाओं व पुष्पमालाओंको पहिने हुए, अनुपम रूपसे सम्पन्न, उत्तम कोमल पलानसे सहित, और देवकुमारोंसे चलाये जानेवाले वे वृषभ चलते हुए पर्वतों जैसे शोभायमान होते हैं ॥ १६८-१६९ ॥


कोडीसय छव्वहिया अडसट्ठा लक्ख होंति णिद्दिट्ठा । सत्तविभागाण तहा वसभाणीयाण परिसंखा ॥ १७०

अर्थ: सात विभागोंके वृषभानीकोंकी संख्या एक सौ छह करोड़ अड़सठ लाख कही गई है ॥१७०॥


रूवूनभट्ठ विरुलिय दो दो दाऊण तेसु रूवेसु । अण्णोण्णगुणेण तहा फलेण रूवूनजादेण ॥ १७१

आदिमकच्छं गुणिदे सत्त वि कच्छाण होदि वसभाणं । परिसंखा णिद्दिठ्ठा जिणिंदइंदेहि णाणीहि ॥ १७२

अर्थ (गाथा 171 से 172): एक कम आठ अंकोंका विरलन करके उन अंकोंके ऊपर दो दो अंक देकर परस्पर गुणा करनेसे जो फल प्राप्त हो उसमेंसे एक कम करके शेषसे प्रथम कक्षाको गुणा करनेपर सातों कक्षाओं सम्बन्धी वृषभानीकोंकी संख्या प्राप्त होती है, ऐसा ज्ञानवान् जिनेन्द्र भगवान्ने निर्दिष्ट किया है ॥ १७१-१७२ ॥


सव्वाण अणीयाणं कच्छाणं पिंडसंखपरिमाणं । एस कमो णायव्वो संखेवेण य समुद्दिठ्ठे ॥ १७३

अर्थ: सब अनीकों सम्बन्धी कक्षाओंकी संख्याके पिंडप्रमाणको लानेके लिये संक्षेपसे यही क्रम कहा गया जानना चाहिये ॥१७३॥


सिसिरयरहारहिमचयसंखिंदुमृणालकुंदकुसुमदाभा । धवलादवत्तभासुर धवलरहा पढमकच्छम्मि ॥ १७४

अर्थ: प्रथम कक्षामें शिशिरकर (चन्द्र), हार, हिमचय, शंख, इन्दु, मृणाल एवं कुंद पुष्प जैसी प्रभावाले; धवल छत्रसे सुशोभित धवल रथ होते हैं ॥ १७४ ॥


वेडूलियरयणणिम्मियचउचक्कविरायमाण गच्छंति । मंदारकुसुमसंणिह महारहा बिदियकच्छम्मि ॥ १७५

अर्थ: द्वितीय कक्षामें वैडूर्य मणिसे निर्मित चार चाकोंसे विराजमान और मन्दार कुसुमके सदृश कान्तिवाले महारथ गमन करते हैं ॥ १७५ ॥ तृतीय कक्षामें सुवर्णमय छत्र, चामर और हिलते हुए उत्तम


कणयादवत्तचामरधयवड्डुव्वंतभासुराडोवा । णिद्धंतकणयसुघडियरहपउरा तदियकच्छम्मि ॥ १७६

अर्थ: ध्वजपटोंके आटोप ( आडम्बर ) से प्रकाशमान तथा अग्निसंयोगसे संशोधित निर्मल सुवर्णसे निर्मित प्रचुर रथ गमन करते हैं ॥ १७६ ॥


मरगयरयणविणिम्मियवहुचक्कक्खपण्णसद्दगंभीरा । [दुव्वंकुरदलसंणिह महारहा तह चउत्थीए ॥ १७७

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें मरकत मणियोंसे निर्मित बहुत चाकोंसे उत्पन्न हुए शब्दसे गम्भीर और दूर्वाङ्कुरके पत्तोंके सदृश वर्णवाले महारथ होते हैं ॥ १७७ ॥


कक्केयणमणिणिम्मियबहुचक्कक्खुलंतसद्दगंभीरा । ] णीलुप्पलदलसंणिभ महारहा होंति पंचमिए ॥ १७८

अर्थ: पांचवीं कक्षामें कर्केतन रत्नोंसे निर्मित व बहुतसे चाकोंके घूमनेके शब्दसे गम्भीर महारथ नीलोत्पलपत्रके सदृश वर्णवाले होते हैं ॥ १७८ ॥


वरपडमरायमणिमयवरधुरदड्ढअक्खचक्कसंघडिया । पप्फुल्लकमलसंणिभ महारहा होंति छट्ठीए ॥ १७९

अर्थ: छठी कक्षामें उत्कृष्ट पद्मराग मणिमय उत्तम धुरा, दृढ़ अक्ष एवं चाकोंसे संघटित महारथ प्रफुल्ल कमलके सदृश वर्णवाले होते हैं ॥ १७९ ॥


सिहिकंठवण्णमणिमयणिम्मलकिरणोहजालपज्जलिया । वरइंदणीलसंणिभ महारहा होंति सत्तमिइ ॥ १८०

अर्थ: सातवीं कक्षामें मयूरकण्ठके समान वर्णवाले व मणियोंसे निर्मित निर्मल किरणसमूहसे देदीप्यमान महारथ उत्तम इन्द्रनील मणिके सदृश कान्तिवाले होते हैं ॥ १८० ॥


एवं महारहाणं सत्त वि कच्छा जलंतमणिकिरणा । आयासं छायंता चलिया जिणजम्मकल्लाणे ॥ १८१

अर्थ: इस प्रकार प्रकाशमान मणिकिरणोंसे सहित महारथोंकी सातों कक्षायें आकाशको आच्छादित करती हुई जिनजन्मकल्याणकमें जाती हैं ॥ १८१ ॥


वज्जंततूरणिबहा रहकच्छा अंतरेसु सव्वेसु । गच्छंता पवररहा सोहंति मणोहरा तुंगा ॥ १८२

अर्थ: सब रथ कक्षाओंके मध्यमें बजते हुए वादित्रोंके समूहसे सहित, उन्नत व मनोहर उत्तम रथ गमन करते हुए शोभायमान होते हैं ॥ १८२ ॥


बहुदेवदेविपुण्णा वरचामरछत्तधयवडा णिवहा । लंबंतकुसुममाला अच्छेरयरूवसंठाणा ॥ १८३

पुव्वकएण णेया मायारहिएण चरणसुद्धेण । धम्मेण तेण लद्धा इंदेण महाविहूईओ ॥ १८४

अर्थ (गाथा 183 से 184): बहुतसे देव देवियोंसे परिपूर्ण; उत्तम चमर, छत्र और ध्वजा-पताकाओंके समूहसे सहित; लटकती हुई कुसुमोंकी मालाओंसे सुशोभित, तथा आश्चर्यजनक रूप एवं आकृतिसे संयुक्त, उक्त रथ रूप महा विभूतियां सौधर्म इन्द्रको पूर्वकृत निष्कपट शुद्ध चारित्र रूप धर्मसे प्राप्त होती हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १८३-१८४ ॥


खरपवणवायवियलियं क्खीरोदहिवरतरंगणिहवण्णा । वरसियचलंतचामर धवलतुरंगा पढमकच्छाए ॥ १८५

अर्थ: प्रथम कक्षामें तीक्ष्ण पवनके घातसे विचलित हुए क्षीरोदधिकी उत्तम तरंगोंके सदृश वर्णवाले और चलते हुए उत्तम धवल चामरोंसे सहित धवल अश्व होते हैं ॥ १८५ ॥ द्वितीय


उदयंतभाणुसंणिभमंदारासोगकमलसच्छाया ।
पचलंतचारुचामर रत्ततुरंगा दु बिदियाए ॥ १८६

अर्थ: कक्षामें उदित होनेवाले सूर्यके सदृश अथवा मन्दार, अशोक एवं कमलके सदृश कान्तिवाले, तथा चलते हुए सुन्दर चामरोंसे सहित रक्त तुरंग होते हैं ॥ १८६ ॥


णिद्दंतकणयसंणिहखुरखुडभरजणियरेणुपिंजरिया ।
वरगोरोयणसंणिभ वरतुरया तदियकच्छाए ॥ १८७

अर्थ: तृतीय कक्षामें अग्निसंयोगसे शुद्ध किये गये निर्मल सुवर्णके सदृश व खुरपुटोंके भारसे जनित धूलिसे पिंजरित उत्तम अश्व श्रेष्ठ गोरोचनके सदृश ( पीत ) होते हैं ॥ १८७ ॥


मरगयवण्णसमुज्जलं तुंगमहाकाय गमणपरिहत्था ।
अभिणवतमालसामल तुरयवरा तह चउत्थीए ॥ १८८

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें मरकत जैसे वर्णवाले उज्ज्वल एवं उन्नत महान् शरीरसे संयुक्त तथा गमनमें दक्ष उत्तम अश्व नवीन तमाल वृक्षके समान श्याम वर्णवाले होते हैं ॥ १८८ ॥


रयणाभरणविहूसिय मणिकिरणसमूहणासियतमोहा ।
णीलुप्पलदलसंणिभ तुरगवरा पंचमाए दु ॥ १८९

अर्थ: पंचम कक्षामें रत्नोंके आभरणोंसे विभूषित व मणिकिरणोंके समूहसे अन्धकारसमूहको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ अश्व नीलोत्पलपत्रके सदृश वर्णवाले होते हैं ॥ १८९ ॥


ससहरकिरणसमागमविभिण्णवररत्तकुमुदवण्णाभा ।
जासवणकुसुमसंणिभ वरतुरया छट्ठमाए दु ॥ १९०

अर्थ: छठी कक्षामें शशधर ( चन्द्र ) के समागमसे विकासको प्राप्त उत्तम रक्त कमल जैसे वर्णवाले श्रेष्ठ अश्व जपा कुसुमके सदृश होते हैं ॥ १९० ॥


मणपवणगमणचंचलखरखुररवजणियसद्दगंभीरा ।
भिण्णिंदणीलसंणिभ वरतुरया सत्तमाए दु ॥ १९१

अर्थ: सातवीं कक्षामें मन अथवा पवनके समान गमन करनेमें चंचलताको प्राप्त तीक्ष्ण खुरोंके शब्दसे उत्पन्न शब्दसे गम्भीर उत्तम अश्व भिन्न इन्द्रनील मणिके सदृश होते हैं ॥ १९१ ॥


एवं तुरयाणीया सत्तविभागा हवंति णिद्दिठ्ठा ।
दिव्वामलवरूवा णाणाभरणेहि संछण्णा ॥ १९२

अर्थ: इस प्रकार दिव्य व निर्मल रूपको धारण करनेवाली और नाना आभरणोंसे व्याप्त अश्व सेनायें सात विभागोंसे युक्त निर्दिष्ट की गई हैं ॥ १९२ ॥


मज्झेसु तुराणिबहा पडहमुदिंगादिसद्दगंभीरा ।
वरकाहलमहुररवा पक्खुभियसमुद्दणिग्घोसो ॥ १९३

रयणमया पल्लाणा देवकुमारेहि बाहमाणा ते ।
सोहंति महाकाया देवाण विउव्वणा दिव्वा ॥ १९४

अर्थ (गाथा 193 से 194): मध्यमें वादित्रसमूहसे सहित, पटह व मृदंग आदिके शब्दसे गम्भीर, उत्तम काहलके मधुर शब्दसे युक्त, प्रक्षोभको प्राप्त हुए समुद्र जैसे निर्घोषसे संयुक्त, रत्नमय पलानोंसे सहित, और देवकुमारोंसे चलाये जानेवाले वे देवोंकी विक्रियासे निर्मित महाकाय दिव्य घोड़े शोभायमान होते हैं ॥ १९३-१९४ ॥ अनुपम रूप व तेजसे सम्पन्न ये महा बलवान्


सव्वदिसा पूरेता अणोवमा तेयरूवसंपण्णा ।
जिणजन्ममहिमाणं गच्छंति महाबला तुरया ॥ १९५

अर्थ: घोड़े सब दिशाओंको पूर्ण करते हुए जिनजन्ममहिमांमें जाते हैं ॥ १९५॥


चुलसीदिलक्खसंखा वियडघडा गुलगुलंतगज्जंता ।
गोखीरसंखधवळा हत्थिघडा पडमकच्छाए ॥ १९६

अर्थ: प्रथम कक्षामें हर्षसे गुल-गुल गरजनेवाले चौरासी लाख हाथियोंके समूह गोक्षीर अथवा शंखके समान धवल होते हैं ॥ १९६ ॥


अडसट्ठिसया णेया लक्खगुणा बालभाणुसमतेया ।
पगलंतदाणगंडा हत्थिहडा बिदियकच्छाए ॥ १९७

अर्थ: द्वितीय कक्षामें गण्डस्थलसे मदको बहानेवाले उन एक लाखसे गुणित एक सौ अड़सठ अर्थात् एक करोड़ अड़सठ लाख हाथियोंकी घटायें बाल सूर्यके सदृश कान्तिवाली जानना चाहिये ॥ १९७ ॥


छत्तीसा तिण्णिसया हत्थिहडा सयसहस्ससंगुणिदा ।
णिद्धंतकणयवण्णा तदियाए होंति कच्छाए ॥ १९८

अर्थ: तृतीय कक्षामें एक लाखसे गुणित तीन सौ छत्तीस ( ३३६००००० ) हाथियोंकी घटायें अग्निसंयोगसे शुद्ध किये गये सुवर्ण जैसे वर्णवाली होती हैं ॥ १९८ ॥


बाहत्तरि छव्वसया लक्खगुणा सिरिसकुसुमसंकासा ।
उत्तुंगदंतमुसला चउत्थीए होंति ते णागा ॥ १९९

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें उन्नत दांत रूपी मुसलोंसे सहित वे एक लाखसे गुणित छह सौ बहत्तर ( ६७२००००० ) हाथी शिरीष कुसुमके सदृश होते हैं ॥ १९९ ॥


तेरससयचउद्दाला हत्थिहडा सयसहस्ससंगुणिदा ।
णीलुप्पलसंकासा पंचमिए होंति कच्छाए ॥ २००

अर्थ: पंचम कक्षामें एक लाखसे गुणित तेरह सौ चवालीस ( १३४४००००० ) हाथियोंकी घटायें नीलोत्पलके सदृश होती हैं ॥ २०० ॥


छव्वीससया णेया अट्ठासीदा य होंति लक्खगुणा ।
जासवणकुसुमवण्णा हत्थिहडा तह य छट्टीए ॥ २०१

अर्थ: छठी कक्षामें एक लाखसे गुणित छब्बीस सौ अठासी ( २६८८००००० ) हाथियोंकी घटायें जपा कुसुम जैसे वर्णवाली होती हैं ॥ २०१ ॥


तेवण्णसया णेया छावत्तरि तह य होंति लक्खगुणा ।
अंजणगिरिसमतेया हत्थिहडा सत्तमाए दु ॥ २०२

अर्थ: सातवीं कक्षामें एक लाखसे गुणित तिरेपन सौ छहत्तर ( ५३७६००००० ) हाथियोंकी घटायें अंजनगिरिके समान कान्तिवाली होती हैं ॥ २०२ ॥


अडसट्ठा छव्वसया दसयसहस्सा हवंति लक्खगुणा ।
सत्त वि गयकच्छाणं परिसंखा होंति णायव्वा ॥ २०३

अर्थ: सातों कक्षाओंके हाथियोंकी संख्या एक लाखसे गुणित दश हजार छह सौ अड़सठ ( १०६६८००००० ) जानना चाहिये ॥ २०३ ॥


कच्छपमाणं विरलिय इच्छिगुणं तेसु उवरि दाऊणं ।
अण्णोण्णब्भत्थूण य लद्धेण य रूवरहिदेण ॥ २०४

अर्थ (गाथा 204 से 205): कक्षाके प्रमाणका विरलन कर उनके ऊपर इच्छित गुणकार ( २ ) को देकर परस्पर गुणा करनेसे प्राप्त हुई राशिमेंसे एक कम करनेपर जो शेष इच्छित गुणकार राशि रहे उससे फिर आदिधनको गुणित कर जो प्राप्त हो उतना सब कक्षाओंका इच्छित धन होता है ( देखिये पीछे गा. १७१-७२ ) ॥ २०४-२०५ ॥ प्रत्येक कक्षाके आगे पटु पटह, शंख, मर्दल और


इच्छगुणरासियाणं आदिधणं संगुणं पुणो किच्चा ।
जं लद्धं णादव्वं इच्छधणं होइ सव्वाणं ॥ २०५


कच्छाए कच्छाए पुरदो वज्जंति तुररमणीया ।
पडुपडहसंखमद्दलकाहलकोलाहलरवेहिं ॥ २०६

अर्थ: काहलके कोलाहल शब्दोंके साथ रमणीय बाजे बजते हैं ॥ २०६ ॥


उब्भुंगदंतमुसला पभिण्णकरडा मुहा गुलगुलंता ।
पगलंतदाणगंडानिझरधरणीधरसंणोभा चेव ॥ २०७

अर्थ: उन्नत दांत रूपी मूसलोंसे सहित, गण्डस्थलसे मदको बहानेवाले तथा मुखसे सहर्ष गरजनेवाले वे हाथी बहते हुए मद जैसे झरनासे युक्त पर्वतके समान ही प्रतीत होते हैं ॥ २०७ ॥


लंबंतरयणघंटा णिम्मलमणिकुसुमदामकयसोहा ।
णाणापडावचित्ता सिदादवत्तेहि छज्जंता ॥ २०८

लंबंतकण्हचामर मणिकिंकिणिरणरणंतरमणीया ।
मणिकणयरज्जुकच्छा कयलीहरुच्छज्जिया रम्मा ॥ २०९

वरदेविदेवपउरा अच्चब्भुदसोहसारसंपण्णा ।
हत्थिवहाणं सेण्णं वित्थरइ समंतदो गयणं ॥ २१०

अर्थ (गाथा 208 से 210): लटकते हुए रत्नमय घंटोंसे संयुक्त, निर्मल मणियों व कुसुमोंकी मालासे की गई शोभाको प्राप्त, नाना पताकाओंसे विचित्र, धवल छत्रसे सुशोभित, कानोंमें लटकते हुए चामरों और मणिमय क्षुद्र घंटिकाओंके रण-रण शब्दसे रमणीय, मणि एवं सुवर्णमय कक्षा (हाथीके पेटपर बांधनेकी रस्सी) से अलंकृत, कदलीभारसे सुशोभित, रमणीय, उत्तम देव-देवियोंसे प्रचुर तथा आश्चर्यजनक श्रेष्ठ शोभासे सम्पन्न उन हस्तिघटाओंकी सेना आकाशमें चारों ओर फैल जाती है ॥ २०८-२१० ॥


एवं णागाणीया गच्छंता सुरवरा महासत्ता ।
दाविंता पुण्णफलं पच्चक्खं जीवलोयस्स ॥ २११

अर्थ: इस प्रकार महा बलवान् उत्तम नागानीक देव जीवलोकको प्रत्यक्षमें पुण्यफलको प्रगट करते हुए गमन करते हैं ॥ २११ ॥


णट्टाणीया वि सुरा णच्चंता बहुविहेहिं रुवेहिं ।
गच्छंति मेहसिहरं जिणजम्मणमहिमअणुराया ॥ २१२

अर्थ: नर्तकानीक देव भी बहुत प्रकारके वेषोंसे नाचते हुए जिनजन्ममहिमाके अनुरागसे मेरुशिखरपर जाते हैं ॥ २१२ ॥


विज्जाधरकुसुमाउहरायरायाहिवाण चरियणं ।
णच्चंति णच्चणसुरा पढमे कच्छम्मि णिद्दिठ्ठा ॥ २१३

अर्थ: नर्तकानीक देव प्रथम कक्षामें विद्याधर, कुसुमायुध (कामदेव) राजा और राजाधिपके चरित्रोंका अभिनय करते हैं ॥ २१३ ॥


पुहइवईणं चरियं सयलट्ठमहंतमंडलीयाणं ।
बिदियाए कच्छाए णच्चंता सुरवरा जंति ॥ २१४

अर्थ: द्वितीय कक्षाके नर्तक देव समस्त अर्ध मंडलीक और महा मंडलीक राजाओंके चरित्रका अभिनय करते हुए जाते हैं ॥ २१४ ॥ तृतीय कक्षाके नर्तक देवगण बलदेव, वासुदेव और


बलदेवहरिगणाणं य तप्पडिववक्खाणं तह य वरचरियं ।
णच्चंति अमरविंदा णिद्दिट्ठा तदियकच्छाए ॥२१५

अर्थ: प्रतिशत्रुओंके ( प्रतिनारायणोंके ) उत्तम चरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २१५ ॥


चोद्दसरयणपहूणं णवणिहिअक्खीणकोसणाहाणं ।
चक्कहराण य चरियं चउत्थकच्छम्मि णच्चंति ॥ २१६

अर्थ: चतुर्थ कक्षाके नर्तक देव चौदह रत्नोंके अधिपति और नौ निधियों तथा अक्षीण कोषके स्वामी चक्रवर्तियोंके चरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २१६ ॥


सव्वाणं चरिमाणं सलोयपालाण सुरवरिंदाणं ।
चरियं णच्चंति सुरा कच्छाए पंचमाए दु ॥ २१७

अर्थ: पंचम कक्षाके नर्तक देव चरमशरीरियों और लोकपालों सहित समस्त इन्द्रोंके चरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २१७ ॥


णिम्मलवरबुद्धीणं अणिमादिविसुद्धरिद्धिपत्ताणं ।
गणहरदेवाण सुरा चरियं णच्चंति छट्ठीए ॥ २१८

अर्थ: छठी कक्षाके नर्तक देव निर्मल उत्तम बुद्धिके धारक तथा अणिमादि विशुद्ध ऋद्धियोंको प्राप्त हुए गणधर देवोंके चरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २१८ ॥


वरपाडिहेरअइसयकल्लाणगुणसोक्खजुत्ताणं ।
जिणेंदाणं चरियं सत्तमकच्छम्मि णच्चंति ॥ २१९

अर्थ: सातवीं कक्षाके नर्तक देव उत्तम प्रातिहार्य अतिशय, कल्याणक एवं अनन्त सुखसे संयुक्त जिनेन्द्रोंके चरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २१९ ॥


तेवण्णकोडिदेवा छाहत्तरिलक्ख दिव्वदेहधरा ।
णच्चंति य जिणचरियं सुरसुंदरिसंजुदा धीरा ॥ २२०

अर्थ: दिव्य देहके धारक उपर्युक्त तिरेपन करोड़ छत्तर लाख ( ७ - १ = ६ ; २ x २ x २ x २ x २ x २ = ६४ ; ८४००००० x ६४ = ५३७६००००० ) धीर नर्तकानीक देव देवांगनाओंसे संयुक्त होकर जिनचरित्रका अभिनय करते हैं ॥ २२० ॥


इच्छट्ठाणं विरलय काऊणं पुव्वरूवपरिहाणी ।
इच्छगुणं दाऊण य विरलियरूवेसु सव्वेसु ॥ २२१

अण्णोण्णब्भत्थेण य जाएण य तेण रासिणा गुणिदे ।
इच्छाण मूलरासिं इच्छधणं होइ सव्वाणं ॥२२२

अर्थ (गाथा 221 से 222): इच्छित स्थानको एक अंकसे हीन कर विरलन करके विरलित सब अंकोंके प्रति इच्छित गुणकारको देकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उससे इच्छित मूल राशिको गुणा करनेपर इच्छित सर्वधन प्राप्त होता है ( देखिये पीछे गाथा २०४-५) ॥ २२१-२२२ ॥


रूऊणे अद्धाणे विरलय रासिम्मि इच्छगुण दिण्णे ।
अण्णोण्णगुणेण हदे आदिधणं हवइ इच्छफलं ॥ २२३

अर्थ: एक कम अध्वानका ( स्थानोंका ) विरलन करके विरलित राशिके ऊपर इच्छित गुणकारको देकर परस्पर गुणित करनेसे जो प्राप्त हो उससे आदि धनको गुणा करनेपर इच्छफल ( इच्छित धन ) प्राप्त होता है ( देखिये पीछे गाथा २०४-५) ॥ २२३ ॥


दिव्वामलदेहधरा दिव्वालंकारभूसियसरीरा ।
णच्चंता गायंता मेरुं तत्तो समुपहुया ॥ २२४

अर्थ: दिव्य एवं निर्मल देहके धारक और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित शरीरवाले उक्त देव नाचते गाते हुए वहांसे मेरुके ऊपर जाते हैं ॥ २२४ ॥ गन्धर्वोंकी सेनाके श्रेष्ठ देव जिन भगवान्के जन्मसे


गंधव्वाण अणीया सत्तरसरसंजुदा दु गायंता ।
गच्छंति सुरा पवरा जिणजम्मणजणियसंतोसा ॥ २२५

अर्थ: उत्पन्न हुए सन्तोषसे सात स्वर युक्त गान करते हुए जाते हैं ॥ २२५ ॥


मधुरमणोहरवक्का दिव्वाहरणेहिं भूसिया देवा ।
सज्जसरेहिं य जुत्ता कच्चाए होंति पढमाए ॥ २२६

अर्थ: मधुर एवं मनोहर मुखवाले तथा दिव्य आभरणोंसे भूषित उक्त देव प्रथम कक्षामें षड्ज स्वरोंसे युक्त होते हैं ॥ २२६ ॥


रिसभसरेण य जुत्ता वत्थाभरणेहि मंडिया दिव्वा ।
बिदियाए कच्चाए महुरं गायंति णच्चंति ॥ २२७

अर्थ: वस्त्राभरणोंसे मण्डित उक्त दिव्य देव द्वितीय कक्षामें ऋषभ स्वरसे युक्त मधुर गान करते व नाचते हैं ॥ २२७ ॥


णीलुप्पलणीसासा अभिनवलावण्णरूवसंपण्णा ।
तदियाए कच्चाए गंधारसरेण गायंति ॥ २२८

अर्थ: तृतीय कक्षामें नीलोत्पलके समान निःश्वासवाले और अभिनव लावण्यमय स्वरूपसे सम्पन्न वे देव गान्धार स्वरसे गाते हैं ॥ २२८ ॥


मज्झिमसरेण जुत्ता जलंतवरमउडकुंडलूसरणा ।
गायंति पवरदेवा कच्चाए तह चउत्थीए ॥ २२९

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें चमकते हुए मुकुट एवं कुण्डल रूप आभरणोंसे सहित वे उत्तम देव मध्यम स्वरसे युक्त होकर गाते हैं ॥ २२९ ॥


पंचमसरेण जुत्ता सुकुमारेसिंगारसद्दगंभीरा ।
कच्चाए पंचमिए णिद्दिठ्ठा सुरवरा णिवहा ॥ २३०

अर्थ: पांचवीं कक्षामें सुकुमार ( सुन्दर ) आभूषणोंके शब्दसे गम्भीर उक्त श्रेष्ठ देवोंके समूह पंचम स्वरसे युक्त कहे गये हैं ॥ २३० ॥


धइवदसरेण जुत्ता सायरणिग्घोससण्हराला वा ।
छट्ठीए कच्चाए अमरकुमारा समुद्दिठ्ठा ॥ २३१

अर्थ: छठी कक्षामें समुद्रके निर्घोषके समान मनोहर आलापवाले देवकुमार धैवत स्वरसे युक्त कहे गये हैं । २३१ ॥


गायंति मधुरमणहरणिसायघोसेण भासुरा अमरा ।
सुरसुंदरिसंजुत्ता सत्तमि ए तह य कच्चाए ॥ २३२

अर्थ: सातवीं कक्षामें सुन्दर कान्तिवाले उक्त देव देवांगनाओंसे संयुक्त होकर मधुर एवं मनोहर निषाद स्वरसे गाते हैं ॥ २३२ ॥


बंसीवीणाबच्चिसमधुयरिकंसालता लियादीहि ।
संजुत्ता देवीओ गायंति जिणाण भत्तीए ॥ २३३

अर्थ: वंशी, वीणा, बच्ची (स्त्री) सक, मधुकरी, कांस्याल और ताल (कंसिका) आदि वाद्यविशेषोंसे संयुक्त देवियां जिन भगवान्की भक्तिसे गान करती हैं ॥ २३३ ॥


डक्कामुदिंगझल्लरि महसारमउंदकिण्णरादीहिं ।
वज्जंतमधुरमणहर गंधव्वा सुरगणा चलिया ॥ २३४

अर्थ: ढक्का, मृदंग, झालर, महासार, मुकुंद (वाद्यविशेष) और किन्नर आदि वादित्रोंको बजाते हुए मधुर एवं मनोहर गन्धर्व देवोंके समूह प्रस्थित हुए ॥ २३४ ॥


सायरतरंगसंणिभ भमरेअणसच्छहा जगजगंता ।
पढमाए कच्चाए किण्हद्धये संकुला णेया ॥ २३५

अर्थ: प्रथम कक्षामें समुद्रतरंगके सदृश अथवा भ्रमर व अंजनके समान प्रभाववाले जगमगाते हुए [ भृत्य ] कृष्ण ध्वजाओंसे युक्त जानना चाहिये ॥ २३५ ॥ [ उक्त भृत्य ] द्वितीय कक्षामें उन्नत


कंचणदंडुत्तुंगा मणिरयणफुरंतभासुराडोवा । चामरचलंतसिहरा णीलद्धयसंकुला विदिए ॥ २३६

अर्थ: सुवर्णदण्डसे संयुक्त, मणि एवं रत्नोंके प्रकाशमान आटोपसे सहित तथा शिखरपर चलते हुए चामरोंसे शोभायमान नीली ध्वजाओंसे संयुक्त होते हैं ॥ २३६ ॥


वेरुलियदंडणिवहा कपोदवण्णेहि वत्थणिवहेहि । देवकुमारकरत्था पंडुद्दयसंकुला तदिएँ ॥ २३७

अर्थ: तृतीय कक्षामें वैडूर्य मणिमय दण्डसमूहसे संयुक्त और कपोतवर्ण वस्त्रसमूहोंसे सहित वे कुमार देवोंके हाथोंमें स्थित ध्वजासमूह शुक्लवर्ण होते हैं ॥ २३७ ॥


करिसीहवसहदप्पणसिहिसारसंगरुडचक्कईविलिहरा । मरगयदंडुत्तुंगा कणयमया तह य चउत्थीए ॥ २३८

अर्थ: चतुर्थ कक्षामें हाथी, सिंह, वृषभ, दर्पण, मयूर, सारस, गरुड़, चक्र, सूर्य और चन्द्र, ये उन्नत मरकतमय दण्डसे संयुक्त ध्वजायें सुवर्णमय (पीत) होती हैं ॥ २३८ ॥


उब्भिण्णकमलपाडलमंदरसोयकिंसुकुसुमभा । विद्दुमदंडुत्तुंगा पडमघया पंचमाए हु ॥ २३९

अर्थ: पांचवीं कक्षामें विकसित कमल, पाटल, मंदार, अशोक और किंशुक कुसुमके समान कान्तिवाली पद्मध्वजायें मूंगेके उन्नत दण्डसे संयुक्त होती हैं ॥ २३९ ॥


गोखीरकुंदहिमघणसरयमत्तुसारहारसंकासा । णिम्मलकंचणदंडा धवलघया छट्ठकच्छाए ॥ २४०

अर्थ: छठी कक्षामें गोक्षीर, कुंद पुष्प, हिमसमूह, शरत्कालीन मेघ, तुषार और हारके सदृश धवल ध्वजायें निर्मल सुवर्णदण्डसे संयुक्त होती हैं ॥ २४० ॥


मणिगणफुरंतदंडा मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा । धवलादवत्तणिवहा सत्तमियाए तु कच्छाए ॥ २४१

अर्थ: सातवीं कक्षामें मणिगणोंसे प्रकाशमान दण्डसे सहित और मुक्तामालाओंसे मण्डित दिव्य धवल आतपत्रोंके समूह होते हैं ॥ २४१ ॥


एवं सत्त वि कच्छा णिच्चाणीयाण होंति णायव्वा । जिणभत्तिरायरत्ता गच्छंति महाणुभावेण ॥ २४२

अर्थ: इस प्रकार भृत्यनीकोंकी सात कक्षायें होती हैं जो जिनभक्तिरागमें अनुरक्त होकर महा प्रभावसे जाती हैं ॥ २४२ ॥


बावण्णा कोडीओ बाणउन्ना लक्ख होंति णिद्दिठ्ठा । धयविवहाणं संखा पवणपणच्चंतलोलंता ॥ २४३

अर्थ: पवनसे प्रेरित होकर नाचनेवाली उन शोभायमान ध्वजाओंके समूहोंकी संख्या बावन करोड़ बानबै लाख निर्दिष्ट की गई है ॥ २४३ ॥


तेवण्णा कोडीओ छावत्तरिलक्ख कुंदधवलाणं । छत्ताणं परिसंखा णायव्वा रयणचित्ताणं ॥ २४४

अर्थ: कुन्द पुष्पके समान धवल और रत्नोंसे विचित्र छत्रोंकी संख्या तिरेपन करोड़ छहत्तर लाख जानना चाहिये ॥ २४४ ॥ सात अनीकों


छाहत्तरिलक्खजुदा सत्तकोडिसय संखा ।
सत्ताणीयाणं तहा उणवण्णाणं तु कच्छाणं ॥ २४५

अर्थ: सम्बन्धी उनंचास कक्षाओंकी संख्या सात सौ छियालीस करोड़ छहत्तर लाख है ॥ २४५ ॥

चउत्थो उद्देसो (भाग 2/2)

चउसीदिलक्खगुणिदे सत्तावीसुत्तरेण य सएण ।
सत्तगुणेणुव्वज्जइ सत्ताणीयाण परिसंख्या ॥ २४६

अर्थ: सातसे गुणित एक सौ सत्ताईससे चौरासी लाखको गुणा करनेपर उपर्युक्त सात अनीकोंकी संख्या उत्पन्न होती है [ ८४००००० × (१२७ × ७) = ७४६७६००००० ] ॥ २४६ ॥


चउसीदिलक्खदेवा पढमाए तह य होंति कच्छाए ।
सव्वानं अणियाणं आदिवणं एस णिद्दिट्ठं ॥ २४७

अर्थ: प्रथम कक्षामें चौरासी लाख देव होते हैं यह सब अनीकोंका आदिधन कहा गया है ॥ २४७ ॥


बिदियादीकच्छाणं दुगुणा दुगुणा हवंति णादव्वा ।
एवं सत्त वि कच्छा णिद्दिट्ठा सव्वदरसीहिं ॥ २४८

अर्थ: द्वितीयादिक कक्षाओंका प्रमाण उत्तरोत्तर इससे दूना दूना जानना चाहिये। इस प्रकार सर्वदर्शियोंने सातों कक्षाओंका स्वरूप कहा है ॥ २४८ ॥


सोहम्मेसुरवरस्स दु सत्ताणीया समासदो वुत्ता ।
अवसेससुरिंदाणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ २४९

अर्थ: यहां संक्षेपसे सौधर्म इन्द्रकी सात कक्षाओंका कथन किया गया है। शेष सुरेन्द्रोंकी सात अनीकोंका भी यही क्रम समझना चाहिये ॥ २४९ ॥


एसेव लोयपालाण चारुहवाणं देवरायाणं ।
णवरि विसेसो णेओ परिवारा होंति अद्धद्धा ॥ २५०

अर्थ: सुन्दर स्वरूपवाले इन्द्रोंके लोकपालोंका भी यही क्रम जानना चाहिये। विशेषता केवल यह है कि उनके परिवार आधे आधे होते हैं ॥ २५० ॥


धणुफलहसत्तितोमरगयाविवहपहरेणेहिं बहुवेहिं ।
इंदस्स पादरक्खा असंखदेवा मुणेयव्वा ॥ २५१

अर्थ: धनुषफलक, शक्ति और तोमर इत्यादि नाना प्रकारके बहुतसे शस्त्रोंसे सुसज्जित असंख्यात देव इन्द्रके पादरक्षक जानना चाहिये ॥ २५१ ॥


इंदेवि देवराया आरूढिकणं गयंदपुट्ठम्मि ।
सम्मादरेण जुत्तो गच्छइ परमाए भत्तीए ॥ २५२

अर्थ: देवोंका राजा इन्द्र भी गजराजकी पीठपर चढ़कर पूर्ण आदरसे युक्त होता हुआ अतिशय भक्तिसे वहां जाता है ॥ २५२ ॥


तह सो सुरिंदहत्थी एरावणणामधेओ सि विक्खादो ।
जोयणलक्खपमाणं विउव्वई णिम्मलं देहं ॥ २५३

अर्थ: ऐरावण नामसे विख्यात वह इन्द्रका हाथी एक लाख योजन प्रमाण निर्मल देहकी विक्रिया करता है ॥ २५३ ॥ शंख, चन्द्र और कुंद पुष्पके समान


संखिंदुकुंदधवलं णाणाभरणेहिं मंडियं दिव्वं । घंटारवंतकच्छं तारागणभूसियं कुंभं ॥ २५४

अर्थ: धवल, नाना आभरणोंसे मण्डित, दिव्य तथा घंटाके शब्द युक्त कक्षा (हाथीके पेटपर बांधनेकी रस्सी) वाला उसका कुम्भस्थल तारागणों (धवल बिन्दुओं) से भूषित होता है ॥ २५४ ॥


बत्तीसवरमुहाणि य कंचनमणिरयणदामणिबद्धाणि । एगेगदिसाभागे णायव्वा तस्स णागस्स ॥ २५५

अर्थ: उस हाथीके एक एक दिशाभागमें सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंकी मालाओंके समूहसे संयुक्त बत्तीस उत्तम मुख होते हैं ॥ २५५ ॥


एक्केक्कम्मि मुहेम्मि दु मणिकंचनमंडिदम्मि दिव्वम्मि । अट्ठट्ठ धवलदंता णाणामणिरयणपरिणामा ॥

अर्थ: मणि और सुवर्णसे मण्डित एक एक दिव्य मुखमें नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप आठ आठ धवल दांत होते हैं ॥ २५६ ॥


एक्केक्कम्मि य दंते एक्केक्का सरवरा विमलतोया । एक्केक्कसरवरम्मि दु एक्केक्का कमलसण्डाणि ॥

अर्थ: एक एक दांतपर निर्मल जलसे परिपूर्ण एक सरोवर और एक एक सरोवरमें एक एक कमलसमूह होता है ॥ २५७ ॥


एगेगकमलसंडे एगेगविचित्तवेदिसंजुत्ता । एगेगदिसाभागा एगेगा तोरणा रम्मा ॥ २५८

अर्थ: एक एक कमलसमूहमें एक एक विचित्र वेदीसे संयुक्त एक एक दिशाभागमें स्थित एक एक रमणीय तोरण होता है ॥ २५८ ॥


एगेगम्मि य संडे बत्तीसा विससिया महापउमा । पउमेसु तेसु णेया णाडयसंगीतरमणीया ॥ २५९

एगेगकमलकुसुमा एगेगा जोयणा सुरभिगंधा । मणिकंचणपरिणामा अमराणं विउव्वणा दिव्या ॥ २६०

अर्थ (गाथा 259 से 260): एक एक गच्छमें विकसित बत्तीस महापद्म होते हैं। उन पद्मोंपर नाट्य व संगीतसे रमणीय तथा एक एक योजन प्रमाण फैलनेवाली सुरभि गन्धसे संयुक्त एक एक कमल पुष्प होता है। मणियों एवं सुवर्णके परिणाम रूप ये दिव्य पुष्प देवोंकी विक्रिया रूप होते हैं ॥ २५९-२६० ॥


एगेगकमलकुसुमे एगेगा णाडया सुणेयव्वा । एगेगणाडयम्मि य अच्छरसा होंति बत्तीसा ॥ २६१

अर्थ: एक एक कमलकुसुमपर एक एक नाट्यशाला और एक एक नाट्यशालामें बत्तीस अप्सरायें होती हैं ॥ २६१ ॥


इट्ठाणि पियाणि तहा कंताणि य कोमलाणि रूवाणि । विउरुव्विऊण बहुसो णच्चंति अणोवमगुणेहिं ॥

अर्थ: ये अप्सरायें इष्ट, प्रिय, कान्त तथा कोमल रूपोंकी विक्रिया कर अनुपम गुणोंसे युक्त बहुत प्रकारसे अभिनय करती हैं ॥ २६२ ॥


समतालकंसतालं वरवीणाविविहवंसभामिस्सं । वरमुरवसद्दगहिरं णट्टं णच्चंति देवीओ ॥ २६३

अर्थ: उक्त देवियां समतालसे युक्त कांस्यताल, उत्तम वीणा और विविध प्रकारकी बांसुरियोंसे मिश्रित तथा उत्तम मृदंगके शब्दसे गम्भीर नाट्यका अभिनय करती हैं ॥ २६३ ॥ जहां दक्षिण इन्द्र (सौधर्म) की बहुतसी


णत्थ लयापल्लवेहि य मुहभंगावियारपायचलणेहि ।
णच्चंति अच्छराओ दक्खिणइंदस्स बहुगीओ ॥ २६४

अर्थ: अप्सरायें लतापल्लवोंसे, मुखभंगविकारसे और पादसंचारसे युक्त नृत्य करती हैं ॥ २६४ ॥


मम्महदप्पुप्पाड्य ताओ रइरागरहसजणणाई ।
रुवाई अच्छराओ रमयंति अच्छेरयलमाई ॥ २६५

अर्थ: वे अप्सरायें मन्मथ (काम) के दर्पको उत्पन्न करनेवाले व रतिरागरहस्यके जनक आश्चर्य-कारक वेषोंको रचती हैं ॥ २६५ ॥


क॑तेहिं कोमलेहि य अंगेहिं अणंगरागजणणेहि ।
णच्चंति अच्छराओ गइंदसरकमलसंडेसु ॥ २६६

अर्थ: उक्त अप्सरायें गजेन्द्रके दांतोंपर स्थित तालाबोंके कमलसमूहोंपर कामविषयक रागको उत्पन्न करनेवाले कान्त (रमणीय) व कोमल अंगोंसे नाचती हैं ॥ २६६ ॥


एवं रूववईओ देवीओ णच्चमाण सव्वाओ ।
गच्छंति पहिट्ठमणा जिणजम्मणमहिम कल्लाणे ॥ २६७

अर्थ: इस प्रकार नृत्य करनेवाली उक्त सब रूपवती देवियां मनमें हर्षित होकर जिन भगवान्के जन्मकल्याणकमें जाती हैं ॥ २६७ ॥


कोडी सत्तावीसा अच्छरसाओ हवंति इंदस्स ।
अट्ठेव महादेवी लक्खं पुण वल्लहीयाओ ॥ २६८

अर्थ: इन्द्रके सत्ताईस करोड़ अप्सरायें, आठ महादेवियां और एक लाख वल्लभायें होती हैं ॥ २६८ ॥


एयाओ देवीओ भारुहिऊणं गइंदपट्टम्मि ।
अइआयरजुत्ताओ जम्मणमहिमाए गच्छंति ॥ २६९

अर्थ: ये देवियां गजराजकी पीठपर आरूढ़ होकर अति आदर युक्त होती हुई जन्ममहिमामें जाती हैं ॥ २६९ ॥


दक्खिणइंदस्स जहा सत्ताणीयादियाण परिसंखा ।
उत्तरइंदस्स तहा परिसंखा होंति णायव्वा ॥ २७०

अर्थ: जिस प्रकार दक्षिण इन्द्रकी सात अनीकादिकोंकी संख्या है उसी प्रकार उत्तर इन्द्रकी सात अनीकादिकोंकी संख्या जानना चाहिये ॥ २७० ॥


ईसाणेंदो वि तहा आरुहिऊणं महंत [ वैलहम्मि ।
महदाइड्डिवसजुदओ आगच्छइ भत्तिराएण ॥ २७१

अर्थ: उसी प्रकार ईशान इन्द्र भी महान् वृषभपर आरूढ़ हो बड़ी ऋद्धिसे युक्त होकर भक्तिसे यहां आता है ॥ २७१ ॥


सव्वाणं इंदाणं सत्ताणीया ह-] वंति णिद्दिद्वा ।
तिण्णि य परिसा णेया असंख तह आइरक्खा य ॥ २७२

अर्थ: सब इन्द्रोंके सात अनीक होती हैं । इनके अतिरिक्त उनके तीन परिषद और असंख्यात आत्म-रक्षक देव होते हैं, ऐसा निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥ २७२ ॥


सव्वे वि सुरवरिंदा जम्मणमहिमेण चोइया संता ।
सगसगविहूइसहिया छायंता णहयलं पंति ॥ २७३

अर्थ: सभी इन्द्र जन्म-महिमासे प्रेरित होकर अपनी अपनी विभूतिके साथ आकाशतलको व्याप्त करते हुए आते हैं ॥ २७३ ॥


अवसेसा वि य णेया जाणाजंपणवाहणारूढा । [ सोहम्मादी जाव दु अच्चुदकप्पं सुरा चलिया ॥ २७४

अर्थ: सौधर्म कल्पसे लेकर अच्युत कल्प तकके शेष देव भी नाना जम्पान (वाहनविशेष) वाहनोंपर चढ़कर चल देते हैं ॥ २७४ ॥


भवणवइवाणविंतरजोइसिया विविहवाहणारूढा । ] जिणसासणभत्तिरया महाविहूईहिं ते चलिया ॥ २७५

अर्थ: भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देव भी विविध वाहनोंपर चढ़कर जिनशासनकी भक्तिमें रत होते हुए महा विभूतियोंके साथ प्रस्थान करते हैं ॥ २७५ ॥


अहमिंदा वि य देवा आसणकंपेण बोहिया संता । गंतूण य सत्तपयं तत्थेव ठिया णमंसंति ॥ २७६

अर्थ: अहमिन्द्र देव भी आसनके कम्पित होनेसे प्रबोधित होते हुए सात पैर जाकर वहीं स्थित होकर नमस्कार करते हैं ॥ २७६ ॥


सेदादवत्तणिवहा वरचामरधुव्वमाण बहुमाणा । णाणापडायचिण्हा बहुविहवरवाहणारूढा ॥ २७७

कंकणपिणड्ढहत्था कंठाकडिसुत्तभूसियसरीरा । पजलंतमहामउडा मणिकुंडलमंडियागंडा ॥ २७८

हारविराइयवच्छा केऊरविहूसिया महाबाहू । तुडियंगदणेवत्था वरवत्थविहूसिया देहा ॥ २७९

गंधुद्धुसुसमालमलचंदणसुरहिगंधणिस्सासा । सुकुमारंपाणिपादा बहुविहवण्णुज्जले सरीरा ॥ २८०

एवं ते देवगणा आगंतूणं महाविभूदीए । मंदरगिरिस्स सिहरे वरपंडुवणे विसालम्मि ॥ २८१

सिंहासणेसु णेया णाणामणिविफुरंतकिरणेसु । जिणइंदवरकुमारे खीरोदजलेण पहावंति ॥ २८२

अर्थ (गाथा 277 से 282): धवल छत्रोंके समूहसे सहित, ढुरते हुए उत्तम चामरोंसे संयुक्त, अतिशय आदर सहित, नाना प्रकार पताकाओंके चिह्नोंसे संयुक्त, बहुत प्रकारके उत्तम वाहनोंपर आरूढ़, हाथमें कंकण पहिने हुए, कंठा और कटिसूत्रसे विभूषित शरीरवाले, देदीप्यमान महा मुकुटसे सहित, मणिमय कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंसे संयुक्त, हारसे सुशोभित वक्षस्थलवाले, केयूरसे विभूषित महा बाहुओंसे सहित, त्रुटित (हाथका एक आभूषण) और अंगद युक्त वेषसे सहित, उत्तम वस्त्रोंसे विभूषित देहके धारक, गन्धसे व्याप्त कुसुममाला और निर्मल चन्दनकी सुगन्धित गन्धके समान निश्वासवाले, सुकुमार हाथ व पैरोंसे सहित, और बहुत प्रकारके वर्ण युक्त उज्ज्वल शरीरवाले, इस प्रकारके वे देवगण महा विभूतिके साथ मन्दर गिरिके शिखरपर विशाल व उत्तम पाण्डुक वनमें स्थित नाना मणियोंकी चमकती हुई किरणोंसे सहित सिंहासनोंपर श्रेष्ठ जिनेन्द्रकुमारोंको क्षीरसमुद्रके जलसे नहलाते हैं ॥ २७७-२८२ ॥


जोयणमुहवित्थारा अट्टेव य जोयणा सुगंभीरा । अट्ठ सहस्सा कलसा मणिकंचणरयणकयसोहा ॥ २८३

अर्थ: एक योजन प्रमाण मुखविस्तारसे सहित, आठ योजन गहरे ऐसे मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे शोभायमान जो एक हजार आठ कलश होते हैं,


रयणकलसेहिं तेहि य खीरोदसुगंधसलिलपुण्णेहिं ।
मुंचंति जिणाणुवरिं एगीभूया सुरा सव्वे ॥ २८४

अर्थ (गाथा 283 से 284): क्षीरसमुद्रके जलसे परिपूर्ण उन रत्नमय कलशों द्वारा सब देव एकत्रित होकर जिनभगवानोंके ऊपर [ जलधारा ] छोड़ते हैं ॥ २८३-२८४ ॥


जइ ते धारावडणा पव्वदसिहरे पडंति वेगेण ।
सो सो पव्वदसिहरो सयलखंडो तक्खणे होइ ॥ २८५

अर्थ: यदि वे धारापतन वेगसे पर्वतशिखरपर गिरें तो वह पर्वतशिखर तत्क्षण सौ खण्ड हो जाय ॥ २८५ ॥


सव्वे वि जिणवरिंदा अणंतविरिया अणंतमाहप्पा ।
ते पुण धारावडणा मण्णंति कुसग्गविंदु व्व ॥ २८६

अर्थ: अनन्त बल और अनन्त माहात्म्यसे संयुक्त सब जिनेन्द्र उन धारापतनोंको कुशके अग्र भागपर स्थित बूंदके समान मानते हैं ॥ २८६ ॥


पयडकसंखकाहलमुद्दिंगणिग्घोसेहिं कंसतालेहिं ।
झालरिभेरीहिं सहा दुंदुहिसद्देहि विविहेहिं ॥ २८७

मद्दलतिवलीहिं तहा भेरीसद्देहि उदहिघोसेहि ।
जयघंटरवेहिं पुणो संभारवमेघरावेहिं ॥ २८८

पडुरडहरवेहिं तहा सायरगंभीरसद्दणिवहेहिं ।
वज्झंततूरणिवहं कुद्धियं व सपव्वदा धरणी ॥ २८९

अर्थ (गाथा 287 से 289): ढक्का, शंख, काहल, मृदंग, इनके समूहसे; कांस्यताल, झालर, भेरी व दुंदुभि, इनके विविध शब्दोंसे; मर्दल, तिवली तथा समुद्रघोषके समान भेरीशब्दोंसे; पुनः जयघंटाशब्दोंसे, मेघके शब्दके समान मंभाशब्दोंसे, समुद्रके गम्भीर शब्दसमूहके समान पटुहद्दहके शब्दोंसे, तथा अन्य वाद्यसमूहके बजनेपर मानों पर्वत सहित पृथिवी विदीर्ण हो गई थी ॥ २८७-२८९ ॥


ण्हावित्ता भत्तीए वत्थालंकारभूसियं किच्चा ।
अणुलिविरूण पच्छा कुंकुमपंकहि दिव्वेहि ॥ २९०

थोऊण जिणवरिंदं थुईहि संभूदगुणविसालाहिं ।
जेणागदो पडिगदा धम्माणुराया सुरा सव्वे ॥ २९१

अर्थ (गाथा 290 से 291): इस प्रकार भक्तिपूर्वक नहला कर व वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके पश्चात् दिव्य कुंकुमपंकका लेपन कर विशाल गुणोंको प्रकट करनेवाली स्तुतियों द्वारा स्तवन करके धर्मानुराग युक्त वे सब देव जिस प्रकारसे आये थे उसी प्रकारसे वापिस चले जाते हैं ॥ २९०-२९१ ॥


पंचमणाणसमग्गं पंचमगइद्देसयं पउमणाई ।
वरपउमणंदिनमियं वंदे पउमप्पहं सिरसा ॥ २९२

अर्थ: पंचम केवलज्ञानसे सम्पन्न, पंचम गति (मोक्ष) के उपदेष्टा और श्रेष्ठ पद्मनन्दि द्वारा नमस्कृत पद्मनाभ जिनेन्द्रको मैं शिरसे नमस्कार करता हूँ ॥२९२॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे महाविदेहहियारे चउत्थो उद्देसो समत्तो ॥ ४ ॥

पंचमो उद्देसो

णमिऊण सुपासजिणं सुरिंदवहसंथुवं विगयमोहं ।
मंदरजिणवरभवणं जहाकमं तं परूवेमि ॥ १

अर्थ: सुरेन्द्रपतियोंसे संस्तुत और मोहसे रहित सुपार्श्व जिनेन्द्रको नमस्कार करके क्रमानुसार उस मन्दर पर्वतस्थ जिनभवनका निरूपण करते हैं ॥ १ ॥


संखिंदुकुंदधवलो मणिगणकरजालखवियतिमिरोहो ।
जिणइंदपवरभवणो तिहुवणतिलओ त्ति णामेण ॥ २

अर्थ: त्रिभुवनतिलक नामक वह जिनेन्द्रभवन शंख, चन्द्र और कुंद पुष्पके समान धवल तथा मणिगणोंके किरणसमूहसे अन्धकारसमूहको नष्ट करनेवाला है ॥ २ ॥


पण्णत्तरिउच्छेहो पण्णासायाम तह य विक्खंभो ।
पुण्णिंदुमण्डलणिभो गंधकुडी दिव्वपासादे ॥ ३

अर्थ: उस दिव्य प्रासादमें पचत्तर [ योजन ] ऊंची एवं पचास [ योजन ] आयाम व विष्कम्भसे सहित पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान गन्धकुटी है ॥ ३ ॥


सोलसजोयणतुंगा अट्ठेव य वित्थडा समुद्दिट्ठा ।
वित्थारसमपवेसा तह य दु दाराण परिसंखा ॥ ४

अर्थ: इसके द्वार सोलह योजन ऊंचे, आठ योजन विस्तृत और विस्तारके समान प्रवेशसे सहित हैं, यह उसके द्वारोंका प्रमाण है ॥ ४ ॥


मंदरगिरिपढमवणे चत्तारि हवंति चदुसु वि दिसासु ।
जिणइंदाणं भवणा अणाइणिहणा समुद्दिट्ठा ॥ ५

अर्थ: मन्दर पर्वतके प्रथम वनमें चारों ही दिशाओंमें अनादिनिधन चार जिनेन्द्रभवन कहे गये हैं ॥ ५ ॥


जोयणसयणायामा तदद्धवित्थार उभयदलंतुंगा ।
उग्गाढ अड्ढजोयण रयदमयाभित्तिजिणगेहा ॥ ६

अर्थ: रजतमय भित्तियोंसे संयुक्त ये जिनगृह सौ योजन आयत, उससे आधे अर्थात् पचास योजन विस्तृत, आयाम व विस्तारके सम्मिलित प्रमाणसे आधे ( १००+५०/२ = ७५ यो. ) ऊंचे, तथा अर्ध योजन प्रमाण अवगाहसे सहित हैं ॥ ६ ॥


जिणभवणस्सअवगाढं दिवड्ढसयसंगुणेण जं लद्धं ।
तं उच्छेहं दिट्ठं पढमवणे जिणघराणं तु ॥ ७

अर्थ: जिनभवनके अवगाहको डेढ़ सौसे गुणा करनेपर जो प्राप्त हो उतना ( १/२ x १५० = ७५ ) प्रथम वनमें स्थित जिनगृहोंका उत्सेध कहा गया है ॥ ७ ॥


गुणगारेण विभत्तं उच्छेहं जिणघराणं जं लद्धं ।
तं अवगाहं णेयं समासदो होइ णिद्दिट्ठं ॥ ८

अर्थ: उक्त गुणकारका उत्सेधमें भाग देनेपर जो लब्ध हो उतना जिनगृहोंका अवगाह जानना चाहिये, ऐसा संक्षेपसे निर्दिष्ट किया गया है ॥ ८ ॥


अहवा आयामे पुण विक्खंभं पक्खिवित्तु अद्धकडे ।
जो लद्धो सो णेओ उच्छेहो सव्वभवणाणं ॥ ९

अर्थ: अथवा, आयाममें विष्कम्भको मिलाकर आधा करनेपर जो प्राप्त हो वह सब भवनोंका उत्सेध जानना चाहिये ( देखिये ऊपर गा. ६ ) ॥ ९ ॥


उच्छेहं विगुणिंतो पंचासेणूण होइ आयामं ।
आयामद्धेण पुणो विक्खंभो होइ भवणाणं ॥ १०

अर्थ: उस्सेधको दूना करके पचास कम कर देनेसे भवनोंका आयाम और आयामसे आधा विष्कम्भ होता है ॥ १० ॥


विक्खंभे पक्खित्ते आयामे जादरासिणा तेण ।
उच्छेहे भागिदिदे जं लद्धं होइ अवगाहं ॥ ११

अर्थ: आयाममें विष्कम्भके मिलानेपर उत्पन्न हुई उस राशिसे उत्सेधके भाजित करनेपर जो लब्ध हो उतना अवगाहका प्रमाण होता है ॥ ११ ॥


तेसिं जिणभवणाणं पुव्वुत्तरदक्खिणेसु दाराणि ।
तिण्णेव समुद्दिट्ठा कंचणमणियरयणणिवहाणि ॥ १२

अर्थ: उन जिनभवनोंके पूर्व, उत्तर और दक्षिणमें सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके समूहसे संयुक्त तीन ही द्वार कहे गये हैं ॥ १२ ॥


दाराणि मुणेयव्वा अट्ठेव य जोयणाणि तुंगाणि ।
वित्थराणि तदद्धं मुत्तामणिदामणिवहाणि ॥ १३

अर्थ: मुक्ता एवं मणियोंकी मालाओंके समूहसे संयुक्त ये द्वार आठ योजन ऊंचे और इससे आधे विस्तारवाले हैं ॥ १३ ॥


भवणेसु अवरपुव्वे मणिमालाविप्फुरंतकिरणाओ ।
अट्ठेव सहस्साओ लंबंतीओ विचित्तवण्णाओ ॥ १४

अर्थ: भवनोंमें [द्वारके] पश्चिम-पूर्वमें प्रकाशमान किरणोंसे सहित और विचित्र वर्णवाली आठ हजार मणिमालायें लटकती रहती हैं ॥ १४ ॥


चउवीससहस्साओ णिम्मलवरकणयदिन्वमालाओ ।
ताणंतरेसु णेया लंबंतीओ विराजंति ॥ १५

अर्थ: उनके अन्तरालमें निर्मल उत्तम सुवर्णकी चौबीस हजार दिव्य मालायें लटकती हुई विराजमान होती हैं ॥ १५ ॥


कप्पूरागरुचंदनतुरुक्कवरसुरभिधूमगंधड्ढा ।
धूवघडा णेयव्वा चउवीससहस्स परिसंखा ॥ १६

अर्थ: कर्पूर, अगरु, चन्दन और तुरुष्कके सुगन्धित उत्तम धूमके गन्धसे व्याप्त चौबीस हजार संख्या प्रमाण धूपघट जानना चाहिये ॥ १६ ॥


तरुणरवितीयणिवहा सुगंधदामाण अभिमुहा दिव्या ।
बत्तीस रयणकलसा सहस्सगुणिदा समुद्दिट्ठा ॥ १७

अर्थ: सुगन्धित मालाओंके अभिमुख तरुण सूर्यके समान तेजपुंजसे संयुक्त दिव्य बत्तीस हजार रत्नमय कलश कहे गये हैं ॥ १७ ।


चत्तारि सहस्साणि दु बाहिरभागम्मि होंति मणिमाला ।
बारस चेव सहस्सा कंचणमाला समुद्दिट्ठा ॥ १८

अर्थ: बाह्य भागमें चार हजार मणिमालायें और बारह हजार सुवर्णमालायें कही गई हैं ॥ १८ ॥


धूवघडा विण्णेया बाहिरभागम्मि बारससहस्सा ।
सोलस चेव सहस्सा कंचणकलसा समुद्दिट्ठा ॥ १९

अर्थ: बाह्य भागमें बारह हजार धूपघट और सोलह हजार सुवर्णकलश कहे गये हैं ॥ १९ ॥


समहियसोलसजोयणआयामा वित्थडा दु अट्ठहिया ।
बेजोयणउव्विद्धा पीठाण हवंति परिसंखा ॥ २०

अर्थ: सोलह योजनसे अधिक आयत, आठ योजन विस्तीर्ण और दो योजन ऊंची, यह पीठोंके आयामादिका प्रमाण है ॥ २० ॥ भवनोंके ये पीठ वज्र, इन्द्रनील, मरकत,


वज्जिंदणीलमरगयकक्केयणपउमरायणिबद्धाणि । वरवेदिपरिक्खित्ताणि य भवणाणं होंति पीढाणि ॥ २१

अर्थ: कर्केंतन और पद्मराग मणियोंके समूहसे निर्मित तथा उत्तम वेदीसे वेष्टित होते हैं ॥ २१ ॥


सोलसजोयणदोहा वित्थिण्णा तद्ध अद्ध छच्च उत्तुंगा । बेगाउयअवगाढा मणियमसोवाणपंतीओ ॥ २२

अर्थ: सोलह योजन दीर्घ, इससे आधी विस्तीर्ण, छह योजन ऊंची, और दो गव्यूति प्रमाण अवगाहसे सहित मणिमय सोपानपंक्तियां होती हैं ॥ २२ ॥


अट्ठुत्तरसयसंखा सोवाणा होंति तेसु भवणेसु । पंचधणुस्सयतुंगा साहियपणवण्णऊण एक्केक्को ॥ २३

अर्थ: उन भवनोंमें एक सौ आठ सोपान होते हैं। इनमेंसे एक एक सोपान साधिक पचवन कम पांच सौ धनुष अर्थात् चार सौ चवालीस धनुषसे कुछ अधिक ऊंचा होता है ॥ २३ ॥


बेगाउयउब्विद्धा पंचधणुस्सयपमाणवित्थिण्णा । पीढाणं वेदीओ णिट्ठिट्ठा होंति णायव्वा ॥ २४

अर्थ: पीठोंकी वेदियां दो गव्यूति ऊंची और पांच सौ धनुष प्रमाण विस्तीर्ण होती हैं, ऐसा निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥ २४ ॥


फलिहमणिभित्तिणिबद्धा णाणामणिरयणजालपरियरिया । वेसुलियखंभपउरा सोवाणतिगेहिं संजुत्ता ॥ २५

दिव्वामोदसुगंधा देवच्छंदेत्ति णामदो णेया । वरगंधधघरा दिट्ठा पइण्णकुसुमप्पचलसणाहा ॥ २६

अर्थ (गाथा 25 से 26): स्फटिक मणिमय भित्तिसमूहसे सहित, नाना मणि एवं रत्नोंके समूहसे व्याप्त, वैडूर्य मणिमय खम्भोंसे प्रचुर, तीन सोपानोंसे संयुक्त, दिव्य आमोदसे सुगन्धित, और बिखरे हुए पूजाकुसुमोंसे सनाथ देवच्छन्द नामक श्रेष्ठ गर्भगृह कहे गये हैं ॥ २५-२६ ॥


जिणइंदार्ण पडिमा अणाइणिहणा सहावनिप्पण्णा । पंचधणुस्सयतुंगा वरवंजणलक्खणोवेदा ॥ २७

अट्ठोप्तरसयसंखा णाणामणिकणयरयणपरिणामा । पीठेसु होंति णेया सयमेव जिणिंदपडिमाओ ॥ २८

अर्थ (गाथा 27 से 28): उन पीठोंपर अनादि-निधन, स्वभावसे निष्पन्न, पांच सौ धनुष ऊंची, उत्तम व्यञ्जन एवं लक्षणोंसे संयुक्त ऐसी नाना मणियों, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप स्वयमेव एक सौ आठ जिनेन्द्रप्रतिमायें होती हैं ॥ २७-२८ ॥


धवलाढवत्तचामरहरिपीठमहं ततेयसंजुत्ता । दुंदुहिसुओयतरुवरसुरकुसुमपढंतसंछण्णा ॥ २९

अर्थ: उक्त प्रतिमायें धवल छत्र, चामर, हरिपीठ (सिंहासन) और महान् तेज (भामण्डल) से संयुक्त तथा दुंदुभि, उत्तम अशोक वृक्ष और सुरों द्वारा की गई कुसुमवृष्टिसे व्याप्त होती हैं ॥ २९ ॥


णाणाविहउवयरणा अट्टोत्तरसयपमाण णिद्दिठ्ठा । पत्तेयं पत्तेयं एगेगाणं वियाणाहि ॥ ३०

अर्थ: एक एक (प्रतिमाके) समीप नाना प्रकारसे उपकरणों (मंगलद्रव्यों) मेंसे प्रत्येक प्रत्येक एक सौ आठ संख्या प्रमाण निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ३० ॥


रयणमए जगदीए रयदमयापीठतुंगसिहरेसु ।
मणियमखंभेसु तहा धयणिवहा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ३१

अर्थ: रत्नमय पृथिवीपर स्थित रजतमय पीठके ऊपर ऊंचे शिखरोंवाले मणिमय खम्भोंके ऊपर ध्वजासमूह निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ३१ ॥


सीहगयहंसगोवहसुयवत्तमउरमयरधयणिवहा ।
चक्कायवत्तगरुडा दसविहसंखा सुणेयव्वा ॥ ३२

अर्थ: सिंह, गज, हंस, गोपति (वृषभ), कमल, मयूर, मकर, चक्र, आतपत्र और गरुड़, इन दश प्रकारकी ध्वजाओंके समूह जानना चाहिये ॥ ३२ ॥


अट्ठसयं अट्ठसयं एगेगधयाण होंति परिवारा ।
वरपंचवण्णदिव्वा मुत्तामणिदामकयसोहा ॥ ३३

अर्थ: इनमेंसे एक एक ध्वजाके मोतियों व मणियोंकी मालाओंसे शोभायमान उत्तम पांच वर्णवाली एक सौ आठ एक सौ आठ दिव्य परिवारध्वजायें होती हैं ॥ ३३ ॥


मुहमंडवाण तिण्हं रयदसुवण्णाण बाहिरदिसाए ।
गोउरसमधियतुंगा समंतदो संठियपडाया ॥ ३४

कंचणमणिरयणमया पायारा तत्थ जोयणव्विद्धा ।
सोलसयजोयणाई तोरणदाराणि रम्माणि ॥ ३५

अर्थ (गाथा 34 से 35): वहां रजत व सुवर्णमय मुखमण्डपोंके बाह्य भागमें गोपुरोंसे कुछ अधिक ऊंचे व चारों ओर स्थित पताकाओंसे सहित सुवर्ण, मणि एवं रत्नमय तीन प्राकार व उनमें एक योजन ऊंचे सोलह योजनके रमणीय तोरणद्वार होते हैं ॥ ३४-३५ ॥


जोयणसयआयामा विक्खंभ तदद्ध सोलसुत्तुंगा ।
मुहमंडवा वि णेया बेकोसवगाह णिद्दिट्ठा ॥ ३६

अर्थ: मुखमण्डप भी सौ योजन आयत, इससे आधे विस्तृत, सोलह योजन ऊंचे और दो कोश अवगाहसे युक्त कहे गये हैं ॥ ३६ ॥


पेक्खागिहा य पुरदो विक्खंभायाम जोयणसयाणि ।
समहियसोलसतुंगा जोयणअद्धा दु अवगाहा ॥ ३७

अर्थ: उनके आगे सौ योजन विष्कम्भ व आयामसे सहित, सोलह योजनसे कुछ अधिक ऊंचे, और अर्ध योजन अवगाहसे संयुक्त प्रेक्षागृह होते हैं ॥ ३७ ॥


सोलसजोयणतुंगा चउसट्ठायामवित्थडा णेया ।
ताणं पुरदो दिट्ठा सभागरा रयणसंछण्णा ॥ ३८

अर्थ: उनके आगे सोलह योजन ऊंचे और चौंसठ योजन प्रमाण आयाम व विस्तारसे सहित रत्नोंसे व्याप्त सभागृह होते हैं ॥ ३८ ॥


ताणं सभागराणं पीठाणि हवंति कंचणमयाणि ।
विक्खंभायामेण य असीदि तह जोयणाणि हवे ॥ ३९

अर्थ: उन सभागृहोंके सुवर्णमय पीठ अस्सी योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित होते हैं ॥ ३९ ॥


बेजोयणउच्चाणि य पडमप्पहवेदिहि जुत्ताणि ।
रयणमयतोरणेहि य रम्माणि हवंति पीठाणि ॥ ४०

अर्थ: उक्त पीठ दो योजन ऊंचे, पद्म जैसी प्रभावली वेदिकाओंसे युक्त और रत्नमय तोरणोंसे रम्य होते हैं ॥ ४० ॥ उन सभागृहोंके आगे जिनेन्द्रप्रतिमाओंसे


ताणं सभागराणं पुरदो थूहाणि होंति रम्माणि । जिणवरपडिमच्छण्णा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ ४१

अर्थ: युक्त नाना मणि एवं रत्नोंके परिणाम रूप रमणीय स्तूप होते हैं ॥ ४१ ॥


रयणमयविउलपीठं उत्तुंगं जोयणाणि चालीसं । थूहस्स दु चउवीसाकंचणवेदीसमाजुत्तं ॥ ४२

अर्थ: स्तूपका रत्नमय विशाल पीठ चौबीस सुवर्णमय वेदिकाओंसे संयुक्त तथा चालीस योजन ऊंचा होता है ॥ ४२ ॥


पीठस्सुवरि विचित्तं तिमेहलापरिवउडं महाथूहं । आयामं विक्खंभं उच्छेहं होइ चउसट्ठी ॥ ४३

अर्थ: पीठके ऊपर तीन मेखलाओंसे वेष्टित महा स्तूप होता है। इसका आयाम, विष्कम्भ और उत्सेध चौसठ योजन प्रमाण होता है ॥ ४३ ॥


थूवादो पुव्वदिसं गंतूणं होइ कणयमयपीठं । विक्खंभायामेण य सहस्स तह जोयणा णेया ॥ ४४

अर्थ: स्तूपसे आगे पूर्व दिशामें जाकर एक हजार योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित सुवर्णमय पीठ जानना चाहिये ॥ ४४ ॥


बारसवेदिसमग्गं वरतोरणमंडियं परमरम्मं । मणिगणजलंतणिवहं बहुतहगणसंकुलं दिव्वं ॥ ४५

अर्थ: यह दिव्य पीठ बारह वेदिकाओंसे परिपूर्ण, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, देदीप्यमान मणिगणोंके समूहोंसे युक्त और बहुतसे तरुणोंसे व्याप्त होता है ॥ ४५ ॥


तस्स दु पीठस्सुवरिं सोलस तह जोयणा समुत्तुंगा । वेदियरुक्खा णेया णाणामणिरयणपरिणामा ॥ ४६

अर्थ: उस पीठके ऊपर स्थित सोलह योजन ऊंचे नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप चैत्य वृक्ष जानना चाहिये ॥ ४६ ॥


एगं च सयसहस्सं चालीसा तह सहस्स परिसंखा । एगसयं बीसहिया सिद्धत्थतरूण परिसंखा ॥ ४७

अर्थ: सिद्धार्थ वृक्षोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस है ॥ ४७ ॥


उद्धं गंतूण पुणो धरणीदो जोयणाणि चत्तारि । चदुसु वि दिसाविभागे साहाओ होंति णिद्दिट्ठा ॥ ४८

अर्थ: पृथिवीसे चार योजन ऊपर जाकर चारों ही दिशाविभागोंमें उनकी शाखायें निर्दिष्ट की गई हैं ॥ ४८ ॥


बारहजोयणदीहा सिद्धत्थयणामधेयरुक्खाणं । विक्खंभेण य जोयण णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ४९

अर्थ: सर्वदर्शियों द्वारा सिद्धार्थ नामक वृक्षोंकी [ शाखायें ] बारह योजन दीर्घ और एक योजन विष्कम्भसे युक्त निर्दिष्ट की गई हैं ॥ ४९ ॥


अट्ठेव जोयणेसु य रुंदेसु महादुमेसु णिद्दिट्ठा । जिणइंदाणं पडिमा अकिट्टिमा सासयसभावा ॥ ५०

अर्थ: आठ योजन रुंदवाले उन महा द्रुमोंपर अकृत्रिम और शाश्वतिक स्वभाववाली जिनेन्द्रोंकी प्रतिमायें निर्दिष्ट की गई हैं ॥ ५० ॥


पल्लियंकासणबद्धा रयणमया पडिहेरसंजुत्ता । सव्वाणं रुक्खाणं चदुसु वि भागेसु ते होंति ॥ ५१

अर्थ: पर्यंकासनसे विराजमान और प्रातिहार्योंसे संयुक्त वे रत्नमय जिनप्रतिमायें सब वृक्षोंके चारों ही भागोंमें होती हैं ॥ ५१ ॥ उस वृक्षसमूहसे पुनः पूर्व दिशा भागमें जाकर


तत्तो दुमसंघादो गंतूण पुणो वि पुव्वदिसभागे । धयनिवहाणं पीठं बारसवेदीहिं संजुत्तं ॥ ५२

अर्थ: बारह वेदियोंसे संयुक्त ध्वजासमूहोंका पीठ होता है ॥ ५२ ॥


तम्मि वरपीठसिहरे सोलस तह जोयणा समुत्तुंगा । कोसेणं होंति रुंदा वेडुलियमया महाखंभा ॥ ५३

अर्थ: उस उत्तम पीठके शिखरपर सोलह योजन ऊंचे और एक कोश विस्तारवाले वैडूर्यमणिमय विशाल खम्भ होते हैं ॥ ५३ ॥


खंभेसु होंति दिव्वा महाधया विविहवण्णसंजुत्ता । छत्तत्तमवरसिहरा अणोवमा रूवसंपण्णा ॥ ५४

अर्थ: खम्भोंपर विविध वर्णोंसे संयुक्त, शिखरपर उत्तम तीन छत्रोंसे सुशोभित और अनुपम रूपसे सम्पन्न दिव्य महाध्वजायें होती हैं ॥ ५४ ॥


धयनिवहाणं पुरदो वाधीओ होंति सलिलपुण्णाओ । सयजोयणदीहाओ पण्णासाओ य रुंदाओ ॥ ५५

दसजोयणउंढाओ कंचणमणिवेदिएहि जुत्ताओ । मणितोरणणिवहाओ कमलुप्पलकुसुमछण्णाओ ॥ ५६

अर्थ (गाथा 55 से 56): ध्वजासमूहोंके आगे सौ योजन दीर्घ, पचास योजन विस्तृत, दश योजन गहरी, सुवर्ण एवं मणिमय वेदिकाओंसे युक्त, मणिमय तोरणसमूहसे संयुक्त, कमल व उत्पल कुसुमोंसे व्याप्त और जलसे परिपूर्ण वापियां होती हैं ॥ ५५-५६ ॥


एवं पुव्वदिसाए जिणभवणं मंदरस्स णिद्दिट्ठं । अवसेसाण दिसाणं एमेव कमो सुणेयव्वो ॥ ५७

अर्थ: इस प्रकार मन्दर पर्वतकी पूर्व दिशामें स्थित जिनभवनका स्वरूप निर्दिष्ट किया है। शेष दिशाओंके जिनभवनोंका भी यही क्रम जानना चाहिये ॥ ५७ ॥


तस्स दहस्स पुरदो पुव्वुत्तरदक्खिणेसु भागेसु । पासादा णायव्वा देवाणं कीडणा होंति ॥ ५८

अर्थ: उस द्रहके आगे पूर्व, उत्तर और दक्षिण भागोंमें देवोंके क्रीड़ाप्रासाद हैं ॥५८॥


कणयमया पासादा पण्णासा जोयणा समुत्तुंगा । विक्खंभायामेण य पणवीसा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ५९

अर्थ: ये सुवर्णमय प्रासाद पचास योजन ऊंचे और पच्चीस योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ५९ ॥


कणयमया पासादा वेडुलियमया य मरगयमया य । ससिकंतसूरकंताकक्केयणपुस्सरागमया ॥ ६०

वरवेदिएहिं जुत्ता कंचणमणिरयणजालपरिरइयं । अक्खइअणाइणिहणा को सक्कइ वण्णिउं सयलं ॥ ६१

अर्थ (गाथा 60 से 61): उक्त प्रासाद सुवर्ण, वैडूर्यमणि, मरकतमणि चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, कर्केतन एवं पुखराज मणियोंसे निर्मित, उत्तम वेदिकाओंसे युक्त, सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके समूहसे व्याप्त, अक्षयी व अनादि-निधन हैं। उनका सम्पूर्ण वर्णन करनेके लिये कौन समर्थ है ? ॥ ६०-६१ ॥ उनसे आगे फिर भी पूर्व दिशामें जाकर


तेहिंतो गंतूणं पुव्वदिसाए पुणो वि णायव्वो । वरतोरणं विचित्तं मणिकंचणरयणसंछण्णं ॥ ६२

अर्थ: मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे व्याप्त विचित्र उत्तम तोरण जानना चाहिये ॥ ६२ ॥


जोयणपण्णासतुंगं तदद्धवित्थार भासुरं दिव्वं । मुत्तादामेणद्धं वरघंटाजालरमणीयं ॥ ६३

अर्थ: यह तोरण पचास योजन ऊंचा, इससे आधे (२५ योज.) विस्तारसे सहित, भासुर, दिव्य, मुक्तामालासे संयुक्त और उत्तम घंटा समूहसे रमणीय है ॥ ६३ ॥


तत्तो परं विचित्ता पासादा गोउराण पासेसु । जोयणसयउव्विद्धा दो दो दु हवंति णायव्वा ॥ ६४

अर्थ: इसके आगे गोपुरोंके पार्श्वभागोंमें सौ योजन ऊंचे दो दो विचित्र प्रासाद जानना चाहिये ॥ ६४ ॥


तत्तो परं विचित्ता धयवित्थडा विविहवण्णजादीया । असिदी सहस्स संखा णिद्दिठ्ठा होंति णायव्वा ॥ ६५

अर्थ: इसके आगे विविध वर्ण व जातिके अस्सी हजार ( ८० x १००० ) संख्या प्रमाण विचित्र ध्वजाओंके समूह निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ६५॥


तोरणसयसंजुत्ता वरवेदीपरिवुडा समुत्तुंगा । सायरतरंगभंगा सोहंति महाधया रम्मा ॥ ६६

अर्थ: सौ तोरणोंसे संयुक्त व उत्तम वेदीसे वेष्टित वे ऊंची रमणीय महा ध्वजायें समुद्रकी तरंगोंके भंगके समान शोभायमान होती हैं ॥ ६६ ॥


तत्तो परं वियाणह वणखंडं विविहपायवाइण्णं । वणवेदिएहि जुत्तं णाणामणिरयणपरिणामं ॥ ६७

रयणमयपीडसोहं मणितोरणमंडियं मणभिरामं । कणयमयकुसुमसोहं मरगयवरपत्तसंछण्णं ॥ ६८

चंपयअसोयगहणं सत्तच्छयअंबकप्पतरुगहणं । वेडुलियफलसमिद्धं विहुमसाहाउलेसिरीयं ॥ ६९

अर्थ (गाथा 67 से 69): इसके आगे विविध पादपोंसे व्याप्त, वनवेदिकाओंसे युक्त, नाना मणियों व रत्नोंके परिणाम रूप, रत्नमय पीठसे शोभित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनोहर, सुवर्णमय कुसुमोंसे शोभित, मरकत मणिमय उत्तम पत्तोंसे व्याप्त, चंपक व अशोक वृक्षोंसे गहन; सप्तच्छद व आम्र कल्पवृक्षोंके समूहसे परिपूर्ण, वैडूर्यमय फलोंसे समृद्ध, और मूंगामय शाखाओंकी शोभासे संयुक्त वनखण्ड जानना चाहिये. ॥ ६७-६९ ॥


ताणं कप्पदुमाणं मूलेसु हवंति चदुसु वि दिसासु । जिणइंदाणं पडिमा सपाडिहेरा विराजंति ॥ ७०

अर्थ: उन कल्पवृक्षोंके मूल भागोंमें चारों ही दिशाओंमें प्रतिहार्य सहित जिनेन्द्रोंकी प्रतिमायें विराजमान हैं ॥ ७० ॥


सीहासणछत्तत्तयभामंडलचामरादिसंजुत्ता । पल्लियंकासणसंगद अणोवमा रूवसंठाणा ॥ ७१

अर्थ: ये प्रतिमायें सिंहासन, तीन छत्र, भामण्डल और चामरादिसे संयुक्त, पर्यंकासनसे स्थित और अनुपम रूप व संस्थानसे युक्त हैं ॥ ७१ ॥ इस प्रकार संक्षेपसे जम्बूद्वीप सम्बन्धी मंदर पर्वतके भद्रशाल वनमें स्थित


एवं तु भद्दसाले जंबूदीवस्स मंदरगिरिस्स । जिणभवणाण पमाणं समासदो होदि णायव्वा ॥ ७२

अर्थ: जिनभवनोंका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ७२ ॥


वेहलियफलिहमरगयगहिंदमसाररयणचित्ताणि । अंजणपवालमरगयजंबूणयभूसियतलाई ॥ ७३

ससिकंतसूरकंता ताइं वरवइरलोहियंकाइ । वरमणिविडुलसुणिम्मल सोहंति अणोवमगुणाई ॥ ७४

अर्थ (गाथा 73 से 74): ये जिनभवन वैडूर्य, स्फटिक, मरकत, मसारगल्ल और इन्द्र (इन्द्रनील) रत्नोंसे विचित्र; अंजन, प्रवाल, मरकत और सुवर्णसे भूषित तलवाले; चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, उत्तम वज्र एवं लोहितांकसे सहित; उत्तम व विपुल मणियोंसे अतिशय निर्मल तथा अनुपम गुणोंसे युक्त होते हुए शोभायमान हैं ॥ ७३-७४ ॥


सुविणिम्मलवरविडला चोक्खा य पसाहिया दरिसणिज्जा । अच्छंतमणहरा ते णाणाविहरुवसंपण्णा ॥ ७५

वरकमलकुमुदकुवलयणीलुप्पल बउलतिलयकयसोहा । कप्पूरागरुचंदणकालागरुधूमसंथद्धा ॥ ७६

धयविजयवइजयंतीपडायबहुकुसुमलोहकयमाला । विलसंतमणिभिरामा बहुकोदुगमंगलसनाहा ॥ ७७

जग जगंतसोहा अच्छेरयरुवसारसंठाणा । ते विविहरइयमंगलवंदणमालुज्जलेसिरिया ॥ ७८

णिच्चं मणीभिरामा फुरंतमाणिकिरणसहस्ससंभारं । कंचणरयण महामणीदिसंतपासादाणसमिद्धाणं ॥ ७९

अगुरुय तुरुक्कचंदणणाणाविहगंधरिद्धिसंवण्णा । दूरालोयमणोहर दीसंति महंतपासादा ॥ ८०

अर्थ (गाथा 75 से 80): अतिशय निर्मल, विस्तृत, शुद्ध, प्रसाधित (सजे हुए), दर्शनीय, अत्यन्त मनोहर, नाना प्रकारके आकार अथवा मूर्तियोंसे सम्पन्न उत्तम कमल, कुमुद, कुवलय, नीलोत्पल, बकुल और तिलक वृक्षोंसे शोभायमान; कर्पूर, अगरु, चन्दन और कालागरुके धुएंके गन्धसे व्याप्त; विजया व वैजयन्ती ध्वजा-पताकाओंसे सहित; बहुतसे कुसुमोंकी मालाओंसे शोभायमान, विलास युक्त, मनको अभिराम, बहुतसे कौतुक एवं मंगलसे सनाथ, जग-मगाती हुई कान्तिसे सहित, आश्चर्यजनक रूप व श्रेष्ठ आकृतिसे युक्त, विविध प्रकारकी रची गई मंगल स्वरूप वन्दनमालाओंसे उज्ज्वल शोभावाले, नित्य मनोहर; प्रकाशमान मणिकिरणसमूहसे संयुक्त; सुवर्ण, रत्न एवं महामणियोंसे प्रकाशमान प्रासादसमूहसे युक्त, तथा अगरु, तुरुष्क व चन्दनकी नाना प्रकारकी गन्धऋद्धिसे सम्पन्न, ऐसे वे महाप्रासाद दूरसे देखनेमें मनोहर दिखते हैं ॥ ७५-८० ॥


घंटाकिंकिणिबुव्वुदचामरणिबहेहिं सोहिया रम्मा । मेरुस्स य जिणभवणा समासदो होति णिद्दिट्ठा ॥ ८१

अर्थ: घंटा, किंकिणी, बुद्बुद और चामरसमूहोंसे शोभायमान उन रमणीय मेरुके जिनभवनोंका संक्षेपसे स्वरूप निर्दिष्ट किया गया है ॥८१॥


बलिपुप्फगंधअक्खयपदीववरधूवसुरहिदोएहिं । अच्चंति य वंदंति य सुरपवरा सददाकाले ॥ ८२

अर्थ: श्रेष्ठ देव सर्वदा बलि (नैवेद्य) पुष्प, गन्ध, अक्षत, प्रदीप, उत्तम धूप व सुगन्धित जलसे पूजा करते हैं और वन्दना करते हैं ॥ ८२ ॥


सव्वंगसुंदरीओ सव्वालंकारभूसिदंगीओ । कलमहुस्सुस्सराओ इंदियपल्हायणकरीओ ॥ ८३

सुकुमोरकोमलाओ जोव्वणगुणलालिणीओ सव्वाओ । पीईं जणंति ताओ अप्पडिरूवेहिं रूवेहिं ॥ ८४

जिणइंदाणं चरियं गणहरदेवाण हलधराणं च । जिणभवणेसु वि णिच्चं अच्छरसाओ पणच्चंति ॥ ८५

अर्थ (गाथा 83 से 85): इन जिनभवनोंमें समस्त अंगोंसे सुन्दर, सब अलंकारोंसे भूषित शरीरवालीं, कल एवं मनोहर सुन्दर स्वरसे संयुक्त, इन्द्रियोंको आह्लादित करनेवाली, सुकुमार, कोमल, यौवनगुणोंसे शोभायमान, तथा अप्रतिम (अनुपम) रूपोंसे प्रीतिको उत्पन्न करनेवाली वे अप्सरायें नित्य जिनेन्द्र, गणधर देव और बलदेवोंके चरित्रका अभिनय करती हैं ॥ ८३-८५ ॥


वरपडहभेरि मद्दलसुदिंग कंसालकाहलादीहिं । वायंति सुरा तुरं झल्हरिबहुलसंखसद्देहिं ॥ ८६

अर्थ: देवगण झालर एवं बहुतसे शंखोंके शब्दोंके साथ उत्तम पटह, भेरी, मर्दल, मृदंग, कांस्याल और काहलादिक बाजोंको बजाते हैं ॥ ८६ ॥


महुरेहिं मणहरेहिं य तुंदुहिघोसेहिं दिव्ववयणेहिं । गायंति किण्णरगणा संभूदगुणे जिणिंदाणं ॥ ८७

अर्थ: किन्नरगण मधुर एवं मनोहर दुंदुभिघोषोंके साथ दिव्य वचनों द्वारा जिनेन्द्रोंके प्रचुर गुणोंको गाते हैं ॥ ८७ ॥


गंधव्वगीयवाइयणाडयसंगीयरवगंभीरं । वरभद्दसालभवणं समासदो होइ णिद्दिट्ठे ॥ ८८

अर्थ: गन्धर्वोंके गीत, वादित्र, नाटक एवं संगीतके शब्दसे गम्भीर उस उत्तम भद्रशाल वनके जिनभवनका स्वरूप संक्षेपसे निर्दिष्ट किया गया है ॥ ८८ ॥


जंबूदीवस्स जहा मेरुस्स जिणिंदिंदवरभवणा । अवसेसमंदराणं जिणिंदभवणा तहा चेव ॥ ८९

अर्थ: जिस प्रकार जम्बूद्वीप सम्बन्धी मेरुके उत्तम जिनेन्द्रभवनोंका स्वरूप कहा है उसी प्रकार शेष मेरु पर्वतोंके जिनेन्द्रभवनोंका स्वरूप समझना चाहिये ॥ ८९ ॥


कुलेपव्वदेसु एवं वक्खारापव्वदेसु एमेव । णंदणवणेसु एवं जिणभवणा होंति णायव्वा ॥ ९०

अर्थ: इसी प्रकार कुलपर्वतोंपर, इसी प्रकार ही वक्षार पर्वतोंपर और इसी प्रकार नन्दन वनोंमें भी जिनभवन होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ९० ॥


णवरि विसेसो णेओ वक्खारगणादिएसु भवणाणं । विक्खंभा आयामा उच्छेहा होंति अणण्णा ॥ ९१

अर्थ: परन्तु विशेष इतना जानना चाहिये कि वक्षार पर्वतादिकोंके ऊपर स्थित जिनभवनोंका विष्कम्भ, आयाम और उत्सेध भिन्न भिन्न होता है ॥ ९१ ॥ चार निकायके देव महा विभूतिके साथ यहां आकर


देवा चउणिकाया आगंतूणं महाविभूदीए ।
पूजं करिंति महदा णंदीसरभट्ठदिवसेसु ॥ ९२

अर्थ: नन्दीश्वर (अष्टान्हिक पर्व) के आठ दिनोंमें महती पूजन करते हैं ॥ ९२ ॥


गयवरखंधारूढो बहुविहमणिविप्फुरंतमणिमउडो ।
उज्ज्वलवरवज्जकरो सोहम्मिंदो समोइण्णो ॥ ९३

अर्थ: बहुत प्रकारकी मणियों द्वारा प्रकाशमान मणिमुकुटसे संयुक्त व हाथमें उज्ज्वल एवं श्रेष्ठ वज्रको लिये हुए सौधर्म इन्द्र उत्तम गजराजके कन्धेपर चढ़कर आता है ॥ ९३ ॥


वरवसमसमारूढो कंठाकट्टिसुत्तभूसियसरीरो ।
णिम्मलतिसूलपाणी ईसाणिंदो समोइण्णो ॥ ९४

अर्थ: कण्ठा व कटिसूत्रसे भूषित शरीरवाला ईशान इन्द्र उत्तम वृषभपर चढ़कर हाथमें निर्मल त्रिशूलको लिये हुए यहां आता है ॥ ९४ ॥


वरसीहसमारूढो उदयक्करसमाणकुंडलाहरणो ।
वरअसिपहरणहत्थो सणक्कुमारो समोइण्णो ॥ ९५

अर्थ: उदयकालीन सूर्यके समान कुण्डल रूप आभरणोंसे भूषित सनत्कुमार इन्द्र हाथमें तलवार आयुधको लिये हुए श्रेष्ठ सिंहपर चढ़कर यहां आता है ॥ ९५ ॥


वरतुरयसमारूढो णाणामणिरयणभूसियसरीरो ।
परसुवरमंडियकरो माहिंदसुरो समोइण्णो ॥ ९६

अर्थ: नाना मणियों एवं रत्नोंसे भूषित शरीरवाला माहेन्द्र इन्द्र हाथमें श्रेष्ठ परशुको लिये हुए उत्तम अश्वपर चढ़कर आता है ॥ ९६ ॥


ससियधवलहंसचडिओ णिम्मलमणिदंडपहरणकरत्थो ।
धवलाइवत्तचिण्हो बंभसुरिंदो समोइण्णो ॥ ९७

अर्थ: चन्द्रमाके समान धवल हंसपर आरूढ़ और धवल आतपत्रसे चिह्नित ब्रह्मेन्द्र हाथमें निर्मल मणिदण्ड आयुधको लिये हुए आता है ॥ ९७ ॥


बंभुत्तरो वि इंदो सियचामरविज्जमाण बहुमाणो ।
वाणरपिट्ठम्मि ठिओ पासकरत्थो समोइण्णो ॥ ९८

अर्थ: धवल चामरोंसे बीज्यमान, बहुत आदरसे संयुक्त और वानरकी पीठपर स्थित ब्रह्मोत्तर इन्द्र भी हाथमें पाशको लिये हुए आता है ॥ ९८ ॥


सारसविमाणरूढो तुडियंगदकणयकुंडलाभरणो ।
कोदंडदंडहत्थो लंतवइंदो समोइण्णो ॥ ९९

अर्थ: त्रुटित (हाथका आभरणविशेष), अंगद एवं सुवर्णमय कुण्डल रूप आभरणोंसे भूषित लान्तव इन्द्र हाथमें धनुर्दण्डको लिये हुए सारस विमानपर चढ़कर आता है ॥ ९९ ॥


काविट्ठो वि य इंदो मयरविमाणम्मि संठिओ धीरो ।
वरकमलकुसुमहत्थो महाबलो सो समोइण्णो ॥ १००

अर्थ: मकर विमानपर स्थित, धीर और महा बलवान् वह कापिष्ठ इन्द्र भी हाथमें उत्तम कमल कुसुमको लिये हुए आता है ॥ १०० ॥


वरचक्कवायआरूढो फलिहामलरयणकुंडलाहरणो ।
पयफलगुच्छहत्थो सक्कसुरो सो समोइण्णो ॥ १०१

अर्थ: उत्तम चक्रवाकपर आरूढ़ और स्फटिकमणिमय निर्मल रत्नकुण्डल रूप आभरणोंसे विभूषित वह शुक्रेन्द्र हाथमें सुपाड़ीके गुच्छेको लिये हुए आता है ॥ १०१ ॥ श्रेष्ठ देवोंसे वेष्टित,


महस्सुकसुराहिबई सुरवरपरिवारिओ महासत्तो ।
पुप्फकविमाणरूढो गयहत्थो सो समोइण्णो ॥ १०२

अर्थ: महा बलवान् वह महाशुक्र इन्द्र हाथमें गदाको लिये हुए पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर आता है ॥ १०२ ॥


सदारविमाणाहिवई मंगलणिवहेहि तूरसद्देहि ।
परहुअविमाणरूढो तोमरहत्थो समोइण्णो ॥ १०३

अर्थ: परभृत ( कोयल ) विमानपर आरूढ़ शतार विमानका अधिपति मंगलमय वादित्रशब्दोंके साथ हाथमें तोमर ( बाणविशेष ) लेकर आता है ॥ १०३ ॥


गरुडविमाणारूढो णाणाभरणेहिं भूवियसरीरो ।
हलमुसलभूसियकरो सहसारिंदो समोइण्णो ॥ १०४

अर्थ: गरुड़ विमानपर आरूढ़ और नाना भूषणोंसे भूषित शरीरवाला सहस्रार इन्द्र हाथमें हल और मूसलको लेकर आता है ॥ १०४ ॥


संखेंदुकुंदवण्णो सियचामरविज्जमाण बहुमाणो ।
सियकुसुममालहत्थो आणदइंदो समोइण्णो ॥ १०५

अर्थ: शंख, चन्द्र एवं कुंद पुष्पके समान वर्णवाला, धवल चामरोंसे वीज्यमान और अतिशय आदरसे युक्त आनत इन्द्र हाथमें धवल कुसुमोंकी मालाको लेकर आता है ॥ १०५ ॥


पाणदइंदो वि तहा कमलविमाणम्मि संठिओ धवलकमलहत्थो सो हरिसाउण्णो समोइण्णो ॥ १०६

अर्थ: हर्षसे परिपूर्ण प्राणत इन्द्र भी हाथमें उत्तम कमलोंकी मालाको लिए हुए कमल विमानपर आरूढ़ होकर आता है ॥ १०६ ॥


णलिणविमाणारूढो णवचंपयविमलमालकयहत्थो ।
पजलंतमहामउडओ आरणइंदो अणुप्पत्तो ॥ १०७

अर्थ: नलिन विमानपर आरूढ़ और देदीप्यमान महामुकुटसे संयुक्त आरण इन्द्र हाथमें नवचम्पककी निर्मल मालाको लेकर आता है ॥ १०७ ॥


कुमुदविमाणारूढो कडयंगदमउडकुंडलाभरणो ।
मुत्तादामकरग्गो अच्चुदइंदो अणुप्पत्तो ॥ १०८

अर्थ: कुमुद विमानपर आरूढ़ और कटक, अंगद, मुकुट एवं कुण्डल रूप आभरणोंसे भूषित अच्युत इन्द्र हाथमें मुक्ताओंकी मालाको लेकर आता है ॥१०८॥


अवसेसा वि य देवा सगसगजंपाणवाहणारूढा ।
णाणापहरणहत्था सगसगसोभाहिं संपत्ता ॥ १०९

अर्थ: अपने अपने जम्पान वाहनोंपर आरूढ़ शेष देव भी नाना आयुधोंको हाथमें लेकर अपनी अपनी शोभाओंके साथ आते हैं ॥१०९॥


भवणवइवाणविंतरजोइसिया कुंडलंकियागंडा ।
णाणावाहणरूढा असुरिंदाई अणुप्पत्ता ॥ ११०

अर्थ: कुण्डलोंसे अलंकृत कपोलोंवाले भवनपति, वानव्यन्तर और ज्योतिषी असुरेन्द्र आदि नाना वाहनोंपर आरूढ़ होकर आते हैं ॥ ११० ॥


धुव्वंतचारुचामरखणंतमहंततूरणिग्घोसा ।
सेदादवत्तचिण्हा असुरिंदा आगदा बहवा ॥ १११

अर्थ: ढुरते हुए सुन्दर चामरोंसे और बजते हुए महा वादित्रोंके निर्घोषसे सहित तथा धवल आतपत्र रूप चिह्नसे संयुक्त बहुतसे असुरेन्द्र आते हैं । ॥ १११ ॥


एवं आगंतूणं अट्ठमिदिवसेसु मंदरगिरिस्स । जिणभवणेसु य पडिमा जिणिंदइंदाण पूयंति ॥ ११२

अर्थ: इस प्रकार आकर वे अष्टाह्निक दिनोंमें मन्दर पर्वतके जिनभवनोंमें जिनेन्द्रप्रतिमाओंकी पूजा करते हैं ॥ ११२ ॥


अट्ठसहस्सेहिं तहा खीरोदहिसलिलपुण्णकलसेहिं । ण्हावंति पहिट्ठमणा परमाए भत्तिएण ॥ ११३

अर्थ: तथा वे मनमें हर्षित होकर क्षीरसमुद्रके जलसे परिपूर्ण एक हजार आठ कलशों द्वारा उत्कृष्ट भक्तिरागसे अभिषेक करते है ॥ ११३ ॥


पडुरडहसंखकाहलमहल्लकंसालतालणिवहेहिं । वज्जंतपवरतूरं महिमं कुव्वंति देविंदा ॥ ११४

अर्थ: वे देवेन्द्र पटु पटह, शंख, काहल, मर्दल, कांस्याल और ताल समूहोंके साथ उत्तम वादित्रोंको बजाते हुए उत्सवको करते हैं ॥ ११४ ॥


गोसीसमलयचंदणकुंकुमपंकेहि चच्चियं काउं । वरपंचवण्णणिम्मलसुगंधदामेहिं अच्चंति ॥ ११५

अर्थ: उक्त देव उन्हें गोशीर्ष, मलयचन्दन और कुंकुम-पंकसे लिप्त करके उत्तम पांच वर्णकी निर्मल व सुगन्धित मालाओंसे पूजा करते हैं ॥ ११५ ॥


ससिधवलसुरहिकोमलगुणाविहभक्खभोज्जमादीहिं । पूयंति जिणवरिंदे ससुरासुरसुरगणा सव्वे ॥ ११६

अर्थ: सुरों और असुरोंके साथ सब देवगण चन्द्रवत् धवल, सुगन्धित एवं कोमल नाना प्रकारके भक्ष्य नैवेद्योंके द्वारा जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं ॥ ११६ ॥


दीवेहिं य धूवेहि य चरुअक्खयफलविचित्तकुसुमेहिं । अच्चंति य पूयंति य पहिट्ठमणसा सुरा सव्वे ॥ ११७

अर्थ: सब देव मनमें हर्षित होकर दीप, धूप, चरु, अक्षत, फल एवं विचित्र कुसुमोंसे जिन भगवान्की अर्चा व पूजा करते हैं ॥ ११७ ॥


एवं पूएऊणं वंदंति विसुद्धभावहियएण । चदुमंगलचदुसरणा विसुद्धसम्मत्तसंजुत्ता ॥ ११८

अर्थ: इस प्रकारसे पूजा करके वे हृदयमें निर्मल भावोंको धारण कर चार मंगलों ( चत्तारि मंगलं-अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं ), चतुःशरणों ( चत्तारि सरणं पव्वज्जामि- अरिहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि ) और विशुद्ध सम्यक्त्वसे संयुक्त होते हुए वन्दना करते हैं ॥ ११८ ॥


एवं थोऊण जिणं अमरंदा अमलपुण्णसंजुत्ता । जेणागदा पडिगदा घेत्तूणं धम्मवररयणं ॥ ११९

अर्थ: इस प्रकार जिन भगवान्की स्तुति करके निर्मल पुण्यसे संयुक्त वे देवेन्द्र जिस रूपसे आये थे उसी रूपसे धर्मरूपी उत्तम रत्नको ग्रहण करके वापिस चले जाते हैं ॥ ११९ ॥


णंदीसरम्मि दीवे जिणवरभवणा हवंति एमेवं । कुंडलदीवेसु तहा मणुसुत्तररुजगसेलेसु ॥ १२०

अर्थ: इसी प्रकार ही नन्दीश्वर द्वीपमें, कुण्डलवर द्वीपमें, और मानुषोत्तर पर्वत व रुचक पर्वतपर भी जिनभवन हैं ॥ १२० ॥ जिस प्रकार भद्रशाल वनमें


जहे भद्दसालसुवणे जिणभवणावण्णणा हवे सय्ला । तह णंदीसरदीवे जिणभवणावण्णणा होइ ॥ १२१

अर्थ: जिनभवनोंका सम्पूर्ण वर्णन किया गया है उसी प्रकार नन्दीश्वर द्वीपमें स्थित जिनभवनोंका भी वर्णन समझना चाहिये ॥ १२१ ॥


जिणभवणथूह मंडवपेक्खाघरकप्परुक्खधयणिवहा । वणखंडवाविगोउरपायारा वेइया दिव्वा ॥ १२२

उच्छेहा आयामा विक्खंभवगाह ताण सव्वाणं । णंदीसरवरदीवे सरिसा ते होंति पढमवणे ॥ १२३

अर्थ (गाथा 122 से 123): जिनभवन सम्बन्धी स्तूप, मण्डप, प्रेक्षागृह, कल्पवृक्ष व ध्वजासमूह, वनखण्ड, वापी, गोपुर, प्राकार और दिव्य वेदिका इन सबका उत्सेध, आयाम, विष्कम्भ व अवगाह नन्दीश्वर द्वीपमें प्रथम ( भद्रशाल ) वनके सदृश हैं ॥ १२२-२३ ॥


णंदणसोमणपंडुबवणार्ण भवणा हवंति एमेव । णवरि विसेसो जाणे अद्धद्धा होंति णिद्दिद्वा ॥ १२४

अर्थ: नन्दन, सौमनस और पाण्डुक वनोंके जिनभवन भी इसी प्रकारके हैं । विशेष केवल इतना जानना चाहिये कि वे प्रमाणमें क्रमशः आधे आधे निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १२४ ॥


चउविहसुरगणमियं अइसयचउतीससंजुयं परमं । वरपउमणंदिणमियं चंदप्पहजिणवरं वंदे ॥ १२५

अर्थ: मैं चार प्रकारके देवगणों द्वारा नमस्कृत, चौंतीस अतिशयोंसे संयुक्त और उत्तम पद्मनन्दिसे नमस्कृत श्रेष्ठ चन्द्रप्रभ जिनेन्द्रकी वन्दना करता हूँ ॥ १२५ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे महाविदेहाहियारे मंदरगिरिजिनभवणवण्णणो णाम पंचमो उद्देसो समत्तो ॥ ५ ॥

छट्ठो उद्देसो

णमिऊण पुप्फदंतं सुरिंदवइसंथुवं विगतमोहं ।
देउत्तरकुरुखेत्तं वोच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥ १

अर्थ: सुरेन्द्रपतिसे संस्तुत और मोहसे रहित पुष्पदन्त भगवान्‌को नमस्कार करके आनुपूर्वीके अनुसार देवकुरु और उत्तरकुरु क्षेत्रको कहते हैं ॥ १ ॥


पुव्वेण मालवंतो अवरेण गंधमादणो सेलो ।
मेरुस्स य उत्तरदो दक्खिणदो णीलवंतस्से ॥ २

एदम्हि अंतरम्हि दु उत्तरकुरु वित्थडो सहस्साणि ।
एयारस बादाला अट्ठसदा बेकलो अधिया ॥ ३

अर्थ (गाथा 2 से 3): जिसके पूर्वमें माल्यवन्त और पश्चिममें गन्धमादन पर्वत हैं वह उत्तरकुरु क्षेत्र मेरु पर्वतके उत्तर और नील पर्वतके दक्षिण इस अन्तरालमें स्थित है। इसका विस्तार ग्यारह हजार आठ सौ ब्यालीस (११८४२) योजन व दो कला अधिक है ॥ २-३ ॥


तेवण्णं च सहस्सा जीवा तस्सुत्तरम्हि भागम्हि ।
बंसधरो हिं दु मूले णीलवंतो समल्लीणो ॥ ४

अर्थ: उत्तर भागमें उसकी जीवा तिरेपन हजार योजन प्रमाण है। इसके मूलमें नीलवान् वर्षधर (कुलपर्वत) लगा हुआ है ॥ ४ ॥


सट्ठि चेव सहस्सा चत्तारि सया हवंति अट्ठरसा ।
बारसकला समधिया धणुपुट्ठं तस्स णायव्वा ॥ ५

अर्थ: उसका धनुषपृष्ठ साठ हजार चार सौ अठारह योजन और बारह कलाओंसे अधिक जानना चाहिये ॥ ५ ॥


तीसं चेव सहस्सा बे चेव सदा णउत्तरो होंति ।
भागा छच्चेव हवे आयामो मालवंतस्स ॥ ६

अर्थ: माल्यवान् पर्वतका आयाम तीस हजार दो सौ नौ योजन और छह कला ( ३०२०९ ६/१९ ) प्रमाण है ॥ ६ ॥


इसुवग्गं चउगुणिदं जीवावग्गम्हि पक्खिवित्ताणं ।
चदुगुणिदिसुणा भजिदं णियमा वट्टस्स विक्खंभो ॥ ७

अर्थ: बाणके वर्गको चौगुणा करके जीवाके वर्गमें मिलाकर जो प्राप्त हो उसमें चौगुणे बाणका भाग देनेपर वृत्त क्षेत्रका विष्कम्भ होता है ॥ ७ ॥


एगत्तरि य सहस्सा तेदालसदं कला य चदुरो दु ।
उत्तरकुरुविक्खंभो कलणवभागेणं संजुत्तो ॥ ८

अर्थ: उत्तरकुरुका विष्कम्भ इकत्तर हजार एक सौ तेतालीस योजन और नवम भाग ( १/९ ) से सहित चार कला प्रमाण है [ ( ३२५०००/१९ )२ x ४ + ५३०००२ ÷ ( ३२५०००/१९ x ४ ) = ७११४३ ३७/१७१ ] ॥ ८ ॥


ओगाढूणविक्खंभे ओगाढसंगुणं कुज्जा ।
चदुगुणिदस्स दु मूलं सा जीवा तत्थ णायव्वा ॥ ९

अर्थ: बाणसे रहित विष्कम्भको बाणसे गुणित करे, फिर उसे चारसे गुणित करके वर्गमूल निकालनेपर जो प्राप्त हो वह जीवाका प्रमाण जानना चाहिये [ उत्तरकुरुका वृत्तविष्कम्भ ७११४३ ३७/१७१ = १२१६५४५०/१७१ ; √ १२१६५४५०/१७१ - २०२५०००/१७१ x २०२५०००/१७१ x ४ = ५३००० यो. ] ॥ ९ ॥ छहसे गुणित बाणके वर्गको जीवाके


इसुवग्गं छहि गुणिदं जीवावग्गम्हि पक्खिवित्ताणं । जं तस्स वग्गमूलं तं धणुपुट्ठं वियाणाहि ॥ १०

अर्थ: वर्गमें मिलाकर जो उसका वर्गमूल हो वह उत्तरकुरुका धनुषपृष्ठ जानना चाहिये √( २२५०००/१९ )२ × ६ + ५३०००२ = ११४७९६४/१९ = ६०४१८ ३४/६९ यो. ॥ १० ॥


जीवाविक्खंभाणं वग्गाविसेसस्स हवइ जं मूलं । विक्खंभादो सोधय सेसस्सद्धं इसुं वियाणाहि ॥ ११

अर्थ: जीवा और विष्कम्भके वर्गको परस्परमें घटाकर जो उसका वर्गमूल हो उसे विष्कम्भमेंसे कम करके शेषके अर्ध भाग प्रमाण बाण जानना चाहिये १२१६५४९०/१७१ - √( १२१६५४९०/१७१ )२ - ५३०००२ ÷ २ = २२५०००/१९ ॥ ११ ॥


जीवावग्गं इसुणा चतुरब्भत्थेण विभज जं लद्धं । तं इसुसहिदं जाणुसु णियमा वट्टस्स विक्खंभं ॥ १२

अर्थ: जीवाके वर्गको चौगुणे बाणसे भाजित करनेपर जो लब्ध हो उसमें बाणके मिलानेपर नियमसे वृत्त क्षेत्रका विष्कम्भ होता है ५३००० २ ÷ ( २२५००० × ४ / १९ ) + २२५०००/१९ = ७११४३ ३७/६९ यो. ॥ १२ ॥


मंदरविक्खंभूणं विदेहविक्खंभअद्धपरिमाणं । उत्तरकुरुविक्खंभे णिद्दिहं होइ णायव्वं ॥ १३

अर्थ: मन्दर पर्वतके विष्कम्भसे रहित विदेहके विष्कम्भको आधा करनेपर उत्तरकुरुके विष्कम्भका प्रमाण होता है ६४००००/१९ - १६००००/१९ ÷ २ = २२५०००/१९ ॥ १३ ॥


दो जमगा णाम गिरी कंचणणगाण सदा गिरीणं तु । सीदाए पंचेव दु तत्थ दहा होंति णायव्वा ॥ १४

अर्थ: सीताके [ किनारेपर ] दो यमक गिरि, सौ कंचन नग और पांच द्रह हैं ॥ १४ ॥


णीलस्स दु दक्खिणदो एवं जोयणसहस्समाबाधा । सीदाए उभयकूले जमका ते होंति णायव्वा ॥ १५

अर्थ: वे यमक पर्वत नील पर्वतके दक्षिणमें एक हजार योजन आगे जाकर सीताके उभय तटोंपर स्थित हैं ॥ १५ ॥


उच्चत्तेणं सहस्सा अड्डाइदिज्जा सदाण उव्विद्धो । जंबूद्वीवे जमगा बोधव्वा उत्तरकुरुस्स ॥ १६

अर्थ: जम्बूद्वीपमें उत्तरकुरु सम्बन्धी यमक गिरि एक हजार योजन ऊंचे और अढ़ाई सौ योजन प्रमाण अवगाहसे सहित हैं ॥ १६ ॥


मूले सहस्समेयं मज्झे अड्डट्ठणाणि य सदाणि । पंचेव जोयणसदा सिहरितले वित्थडा सेला ॥ १७

अर्थ: ये शैल मूलमें एक हजार योजन, मध्यमें साढ़े सात सौ योजन और शिखरतलपर पांच सौ योजन प्रमाण विस्तृत हैं ॥ १७ ॥


दोजमगाणं अंतर पंचेव सयाणि जोयगाणि हवे । मूले सिहरे वि तहा वणवेदीपरिउडा रम्मा ॥ १८

अर्थ: दो यमकोंका अन्तर पांच सौ योजन प्रमाण है। ये रमणीय पर्वत मूलमें तथा शिखरपर भी वनवेदीसे वेष्टित हैं ॥ १८ ॥


सिहरेसु तेसु णेया मणिमयपासादपंति रमणीया । पोक्खरिणिवाविपउरा मणितोरणमंडिया रम्मा ॥ १९

अर्थ: उनके शिखरोंपर प्रचुर पुष्करिणी एवं वापियोंसे सहित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, रमणीय,


धुव्वंतधयपडाया जिणभवणविहूसिया परमरम्मा ।
णाणातरुवरगहणा सुरसुंदरिसंकुला दिव्वा ॥ २०

अर्थ (गाथा 19 से 20): फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, नाना उत्तम वृक्षोंसे गहन और देवांगनाओंसे व्याप्त दिव्य मणिमय प्रासादोंकी पंक्तियां हैं ॥ १९-२० ॥


जमगा णामेण सुरा पलिदोवमआउगा परिवसंति ।
सेलेसु तेसु णेया मणिकंचणरयणगणिबहेसु ॥ २१

अर्थ: मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके समूहसे परिपूर्ण उन शैलोंपर पल्योपम प्रमाण आयुवाले यमक पर्वतोंके समान नामोंके धारक देव निवास करते हैं ॥ २१ ॥


जमकूडकंचणाचल तह चित्तविचित्तकूडसेलेसु ।
जमदेवकणयणामा चित्तसुरो तह विचित्तो य ॥ २२

वरमउडकुंडलधरा सियचामरविज्जमाण बहुमाणा ।
सीहासणमज्झगया बहुपरियणपरिव्वुडा णेया ॥ २३

णवचंपयगंधुद्धा अहिणवलावण्णरूवसंपण्णा ।
पुण्णेण जणियभोगा अच्छंति सुराहिवा तेसु ॥ २४

बे कोसा बासट्ठा जोयणउत्तुंग दिव्वभवणेसु ।
इंगितीसा सक्कोसा विक्खंभायामजुत्तेसु ॥ २५

अर्थ (गाथा 22 से 25): यमकूट व कंचन पर्वत [ मेघकूट ], तथा चित्र-विचित्र शैलोंपर स्थित साढ़े बासठ योजन ऊंचे और सवा इकतीस योजन प्रमाण विष्कम्भ एवं आयामसे युक्त उन दिव्य भवनोंमें उत्तम मुकुट एवं कुण्डलोंके धारक, धवल चामरोंसे वीज्यमान, बहुत आदरसे संयुक्त, सिंहासनके मध्यमें स्थित, बहुत परिवारसे वेष्टित, नव चम्पक जैसी गन्धसे युक्त, अभिनव लावण्यमय रूपसे सम्पन्न, और पुण्यसे उत्पन्न हुए भोगोंसे संयुक्त क्रमसे यम देव, कनक (कंचन) देव, चित्र सुर तथा विचित्र देव, ये चार देवोंके अधिपति देव स्थित हैं ॥ २२-२५ ॥


गंतूण णीलगिरिदो अड्ढादिज्जा सहस्स दक्खिणदिसाए ।
सीदाए सरि मज्झे पंचद्दहा होंति णायव्वा ॥ २६

अर्थ: नीलगिरिसे दक्षिण दिशामें अढ़ाई हजार [ १००० + १००० + ५०० ] योजन जाकर सीता सरित्के मध्यमें पांच द्रह जानना चाहिये ॥ २६ ॥


दसजोयणावगाढा आयामा जोयणा सहस्साणि ।
पंचसदा वित्थारा पंचसदा अंतरेक्केक्का ॥ २७

अर्थ: एक एक द्रह दश योजन गहरे, एक हजार योजन लम्बे, पांच सौ योजन विस्तृत और पांच सौ योजनके अन्तरालमें स्थित हैं ॥ २७ ॥


तह णीलवंतपवरो उत्तरकुरुदहवरो दु चंदसरो ।
एरावयविउलदहो पंचम दह मालवंतो य ॥ २८

अर्थ: नीलवान् द्रह, उत्तरकुरु द्रह, चन्द्र द्रह, ऐरावत द्रह और पांचवां माल्यवान् नामक, इस प्रकार ये उन विशाल द्रहोंके नाम हैं ॥ २८ ॥


वरसुरहिगंधसलिला णीलुप्पलकमलकुवलयसणाहा ।
रंगंतवरतरंगा संखिंदुमृणालसंकासा ॥ २९

अर्थ: ये महा द्रह उत्तम सुगन्धित जलसे परिपूर्ण, नीलोत्पल, कमल और कुवलय पुष्पोंसे सनाथ, चलती हुई उत्तम तरंगोंसे संयुक्त; शंख, चन्द्रमा एवं मृणालके सदृश, रत्नमय वेदिकासमूहसे


रयणमयवेदिगिवहा मणितोरणमंडिया परमरम्मा । उववणकाणणसहिया महादहा होंति णायव्वा ॥ ३०

अर्थ (गाथा 29 से 30): युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय और वन-उपवनोंसे सहित हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ २९-३० ॥


तेसु मणिरयणकमला बे कोसा उट्ठिया जलंतादो । चत्तारि य वित्थिण्णा मज्झे अंतेसु दो कोसा ॥ ३१

वेरुलियविमळणाळो सुगधगंधुद्दुदा परमरम्मा । एयारसेहि गुणिदा सहस्सदलसंजुदा दिव्वा ॥ ३२

अर्थ (गाथा 31 से 32): उन द्रहोंमें जलसे दो कोश ऊंचे, मध्यमें चार और अन्तमें दो कोश विस्तीर्ण, वैडूर्यमय निर्मल नालसे सहित, सुगन्ध गन्धसे युक्त, अतिशय रमणीय, और ग्यारह हजार पत्रोंसे संयुक्त दिव्य मणिमय एवं रत्नमय कमल हैं ॥ ३१-३२ ॥


कमलेसु तेसु भवणा कोसायामा तदद्धवित्थारा । उभयद्ध होंति तुंगा कंचणमणिरयणपरिणामा ॥ ३३

अर्थ: उन कमलोंपर एक कोश आयत, इससे आधे विस्तृत और उभय अर्थात् आयाम व विस्तारके सम्मिलित प्रमाणसे आधे ( पौन कोश ) ऊंचे, ऐसे सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके परिणाम रूप भवन हैं ॥ ३३ ॥


चउचउसहस्स कमला चउसु वि दिसासुं होंति णायव्वा । बत्तीससहस्साई अग्गिदिसाए हवे कमला ॥ ३४

अर्थ: उक्त द्रहोंमें चारों दिशाओंमें चार चार हजार और अग्नि दिशामें बत्तीस हजार कमल जानना चाहिये ॥ ३४ ॥


दक्खिणदिसाविभागे चालीससहस्स होंति कमळाणि । णेरिदियं दिसाभागे अडदालसहस्स णिद्दिठ्ठा ॥ ३५

अर्थ: दक्षिण दिशाभागमें चालीस हजार और नैऋत्य दिशाभागमें अड़तालीस हजार कमल निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ३५ ॥


पच्छिमदिसाविभागे सत्तेव हवंति पडमपुष्फाणि । अट्ठुत्तरसयकमला परिवेढे सव्वदो होंति ॥ ३६

अर्थ: पश्चिम दिशाभागमें सात ही कमल पुष्प हैं तथा परिवेष ( मण्डल ) में अर्थात् प्रत्येक दिशामें चौदह चौदह और प्रत्येक विदिशामें तेरह तेरह, इस प्रकार एक सौ आठ कमल हैं ॥ ३६ ॥


चत्तारि सहस्साई उत्तरईसाणवाउदेसेसु । रोमित्ता होंति तहा दलीवियसिअकमलकुसुमाणि ॥ ३७

अर्थ: तथा उत्तर, ईशान और वायु दिशाभागोंको रोककर किंचित् विकसित चार हजार कमल कुसुम हैं ॥ ३७ ॥


णीलकुमारीनामा उत्तरचंदोकुमारि तह णामा । एरावयाकुमारी तह पच्छा मालवंती दु ॥ ३८

णागकुमारीआओ एदाओ हवंति कमलभवणेसु । पलिदोवमाउगाओ दसधणुउत्तंगदेहाओ ॥ ३९

अर्थ (गाथा 38 से 39): 'कमलभवनोंमें पल्योपम प्रमाण आयुकी धारक और दश धनुष उन्नत देहवाली नीलकुमारी, उत्तरकुमारी, चन्द्रकुमारी, ऐरावतकुमारी तथा माल्यवन्ती नामकी ये देवियां स्थित हैं ॥ ३८-३९ ॥


जह हिमगिरिदहकमले सिरिदेविसुराण होंति परिसंखा । तह सीदादहवासिणिदेवीणं होंति परिसंखा ॥ ४० ॥

अर्थ: जिस प्रकार हिमगिरि सम्बन्धी द्रहके कमलपर स्थित श्री देवीके परिवार देवोंकी संख्यायें हैं उसी प्रकार सीताद्रहवासिनी देवियोंके भी परिवारदेवोंकी संख्यायें हैं ॥ ४० ॥ एक एक द्रहमें एक


एक्केकम्मि दहम्मि दु कमलाणि हवंति सयसहस्सं च । एगं चत्तसहस्सो सयं च तह सोलसा अहिया ॥ ४१

अर्थ: लाख चालीस हजार एक सौ सोलह कमल होते हैं [ १६००० + ३२००० + ४०००० + ४८००० + ७ + १०८ + ४००० + १ = १४०११६ ] ॥ ४१ ॥


सत्तेव होंति लक्खा छच्चेव सया य तह य वीसूणा । भवणाणि वि तावदिया णाएव्वा होंति णियमेण ॥ ४२

अर्थ: [ उक्त पांचों द्रहोंमें ] सात लाख और बीस कम छह सौ अर्थात् पांच सौ अस्सी कमल [ १४०११६ x ५ = ७००५८० ] और उतने ही भवन भी जानना चाहिये ॥ ४२ ॥


सव्वेसु य कमलेसु य जिणवरपडिमा हवंति णाएव्वा । वरपडिहेरसहिदा णाणामणिरयणसंपण्णा ॥ ४३

अर्थ: सब ही कमलोंपर उत्तम प्रतिहार्योंसे सहित और नाना मणियों एवं रत्नोंसे सम्पन्न जिनेन्द्रप्रतिमायें होती हैं ॥ ४३ ॥


ताण दहाणं होंति हु पुव्वेण य पच्छिमेण पासेसु । दसदसकंचणसेला बहुविहमणिरयणपज्जलिआ ॥ ४४

अर्थ: उन द्रहोंके पूर्व और पश्चिम पार्श्वभागोंमें बहुत प्रकारके मणियों एवं रत्नोंसे प्रज्वलित दश दश कंचन शैल स्थित हैं ॥ ४४ ॥


जोयणसयमुव्विद्धा पणुवीसं जोयणाणि उव्वेधो । जंबुद्दीवे णेया कंचणगणपव्वदा रम्मा ॥ ४५

अर्थ: जम्बूद्वीपमें स्थित रमणीय कंचन पर्वत सौ योजन ऊंचे और पच्चीस योजन प्रमाण अवगाहसे युक्त हैं ॥ ४५ ॥


मूले सयमेयं खलु पण्णत्तरि जोयणा य मज्झम्हि । पण्णासजोयणाई सिहरितडे वित्थडा सेला ॥ ४६

अर्थ: उक्त शैल निश्चयसे मूलमें एक सौ योजन, मध्यमें पचत्तर योजन और शिखरतलपर पचास योजन प्रमाण विस्तृत हैं ॥ ४६ ॥


जत्थिच्छसि विक्खंभं कंचणसीहरादु ओवदित्ताणं । तं सगकायविभत्तं सिरसहिदं जाण विक्खंभं ॥ ४७

अर्थ: कंचन पर्वतके शिखरसे नीचे उतर जितने योजन जाकर विस्तारके जाननेकी इच्छा हो उतने योजनोंको अपनी काय (उंचाई) से विभक्त करके [ फिर इच्छासे गुणित करनेपर ] जो लब्ध हो उसमें शिर (शिखरविस्तार) को मिला देनेपर प्राप्त राशि प्रमाण अभीष्ट विस्तार जानना चाहिये ॥ ४७ ॥


कंचणगणाण णेया बेदीओ होंति मूलसिहरेसु । वरतोरण णिद्दिठ्ठा णाणामणिरयणणिवहाणि ॥ ४८

अर्थ: कंचन पर्वतोंके मूलमें और शिखरपर वेदियां तथा नाना मणियों एवं रत्नोंके समूहसे संयुक्त उत्तम तोरण निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये ॥ ४८ ॥ कंचन शैलोंके शिखरोंपर


कप्पतरुसंकुलाणि य पासादा वलहितोरणादीणि ।
कंचणगणाण णेया सिहरेसु हवंति णगराणि ॥ ४९

अर्थ: कल्पवृक्षोंसे व्याप्त और प्रासाद, वलभी एवं तोरणादिकोंसे सहित नगर हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ ४९ ॥


तेसु णगेसु राया कंचणदेवा हवंति णामेण ।
पलिदोवमाउगा ते दसधणुउत्तंगवरदेहा ॥ ५०

अर्थ: उन नगरोंमें अधिपति स्वरूप जो कंचन देव हैं वे पल्योपम प्रमाण आयुके धारक और दश धनुष उन्नत उत्तम देहसे संयुक्त होते हैं ॥ ५० ॥


पजलंतरयणमाला णाणामणिविकुरंतवरमउडा ।
केऊरभूसियकरा मणिकुंडलमंडियागंडा ॥ ५१

सेदादवत्तचिण्हा सिंहासणसंठिया महासत्ता ।
बहुदेवदेविगहिया कंचणसिहरेसु णिद्दिट्ठा ॥ ५२

अर्थ (गाथा 51 से 52): कंचनशिखरोंपर स्थित उक्त देव चमकती हुई रत्नमालाओंसे सहित, नाना मणियोंसे प्रकाशमान उत्तम मुकुटसे विभूषित, केयूरोंसे भूषित हाथोंवाले, मणिमय कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंके धारक, अधिपतित्वके चिह्न स्वरूप धवल आतपत्रसे संयुक्त, सिंहासनोंपर स्थित, महाबलवान्, और बहुत देव-देवियोंसे सहित कहे गये हैं ॥ ५१-५२ ॥


सव्वेसु णगेसु तहा कंचणणामेसु रयणणिवहेसु ।
जिणभवणा णिद्दिट्ठा मणितोरणमंडिया रम्मा ॥ ५३

अर्थ: रत्नसमूहसे संयुक्त उन कंचन नामक सब पर्वतोंपर मणिमय तोरणोंसे मण्डित रमणीय जिनभवन निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ५३ ॥


धुव्वंतधयवडाया णाणाकुसुमोवहारकवसोहा ।
जिणसिद्धबिंबणिवहा बहुकोडुगमंगलसणाहा ॥ ५४

अर्थ: ये जिनभवन फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, नाना कुसुमोंके उपहारसे की गई शोभासे संयुक्त, जिनों व सिद्धोंके बिम्बसमूहसे युक्त, और बहुत कौतुक एवं मंगलोंसे सनाथ हैं ॥ ५४ ॥


सीदा वि दक्खिणेण य दहाण मज्झेण तेण गंतूणं ।
पुणरवि पुव्वाभिमुहा गुहामुहे मालवंतस्स ॥ ५५

पविसित्ता णीसरिदा विदेह मज्झेण तइ जुगो जाइ ।
पुव्वसमुद्दे पविसइ तोरणदारेण रम्मेण ॥ ५६

अर्थ (गाथा 55 से 56): सीता नदी भी द्रहोंके मध्यमैसे दक्षिणकी ओर जाकर फिर पूर्वाभिमुख होती हुई माल्यवंत पर्वतकी गुफाके मुखमें प्रविष्ट होकर बाहर निकलती हुई विदेहके मध्यसे जाती है व रमणीय तोरणद्वारसे पूर्व समुद्रमें प्रवेश करती है ॥ ५५-५६ ॥


उत्तरकुरुम्मि मज्झे होइ महारयणजालपिंजरिओ ।
उत्तरपुव्वदिवाए मेरुस्स सुदंसणो जंबू ॥ ५७

अर्थ: उत्तरकुरुके मध्यमें मेरुके उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशामें महा रत्नोंके समूहसे पिंजरित सुदर्शन नामक जम्बू वृक्ष है ॥ ५७ ॥


पंचेव जोयणसया विक्खंभायाम कणयमयवेदी ।
बारसजोयणबहलं मज्झे अंते य दो कोसा ॥ ५८

अर्थ: पाँच सौ योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित, मध्यमें बारह योजन व अन्तमें दो कोश बाहल्यसे संयुक्त, उत्तम वेदिकाओंसे युक्त, मणिमय उत्तम


वरवेदीएहि जुत्तं मणिमयवरतोरणेहि रमणीयं ।
णाणातरुगणणिवहं जिणभवणविहूसियं रम्मं ॥ ५९

अर्थ (गाथा 58 से 59): तोरणोंसे रमणीय, नाना तरुगणोंके समूहसे परिपूर्ण, और जिनभवनोंसे भूषित रमणीय सुवर्णमय पीठ है ॥ ५८-५९ ॥


तस्स बहुमज्झदेसे जंबूणदं अट्ठजोयणायामं ।
चदुजोयणउच्छुंगं विक्खंभ हवंति चत्तारि ॥ ६०

णिम्मलमणिमयपीडं बारसवेदीहि परिवडं दिव्वं ।
णाणातोरणणिवहं कंचणमणिरयणसंछण्णं ॥ ६१

अर्थ (गाथा 60 से 61): उसके बहुमध्य देशमें आठ योजन आयात, चार योजन ऊंचा व चार योजन विस्तृत, बारह वेदियोंसे वेष्टित, नाना तोरणोंसे सहित तथा सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे व्याप्त निर्मल मणिमय सुवर्ण पीठ है ॥ ६०-६१ ॥


तस्स दु मज्झे अवरं णायव्वं अट्ठजोयणुट्ठुंगं ।
चउजोयणवित्थिण्णं मणिमयवरभासुरं पीडं ॥ ६२

अर्थ: उसके मध्यमें आठ योजन ऊंचा और चार योजन विस्तीर्ण दीप्तिमान् उत्तम मणिमय दूसरा पीठ जानना चाहिये ॥ ६२ ॥


तस्स दु पीडहसुवरिं सुदंसणो णामदो हवे जंबू ।
बेगाउवबाहल्लं अट्ठेव य जोयणुट्ठुंगं ॥ ६३

अर्थ: उस पीठके ऊपर दो कोश बाहल्यवाला व आठ योजन ऊंचा सुदर्शन नामक जम्बू वृक्ष है ॥ ६३ ॥


छज्जोयणा य विडवी णाणामणिकणयकुसुमफलपउरं ।
वेहूलियरयणमूलं मरगयवरपत्तरमणीयं ॥ ६४

अर्थ: छह योजन प्रमाण [मध्य शाखा (विडिमा) से संयुक्त] उक्त वृक्ष नाना मणि एवं सुवर्णमय कुसुमों व फलोंकी प्रचुरतासे सहित, वैडूर्य रत्नमय मूलसे संयुक्त, और मरकतमय उत्तम पत्रोंसे रमणीय है ॥ ६४ ॥


चदुसु वि दिसांसु भागे चत्तारि हवंति तस्स वरसाहा ।
छज्जोयणआयामा वित्थारो होंति बे कोसा ॥ ६५

अर्थ: उसकी चारों ही दिशाओंमें छह योजन लम्बी और दो कोश विस्तारवाली चार उत्तम शाखायें हैं ॥ ६५ ॥


सव्वेसु होंति गेहा कोसायामा तदद्धविक्खंभा ।
पादूणकोसतुंगा चदुसु वि साहेसु बोद्धव्वा ॥ ६६

अर्थ: इन चारों ही शाखाओंपर एक कोश आयत, इससे आधे विस्तृत और पौन कोश ऊंचे प्रासाद जानना चाहिये ॥ ६६ ॥


उत्तरदिसाविभागे जिणिंदईंदाण होइ वरभवणं ।
अवसेसतिणिभवणा जक्खरस यणादियस्स हवे ॥ ६७

अर्थ: इनमेंसे उत्तर दिशाभागमें स्थित श्रेष्ठ भवन जिनेन्द्र-इन्द्रोंका तथा शेष तीन भवन अनाहत यक्षके हैं ॥ ६७ ॥


जंबुदुमा वि णेया बत्तीससहस्स होंति धूमदिसे ।
दक्खिणदिसे वि णेया चालीससहस्स दुमणिवहा ॥ ६८

णेरिदिदिसाविभागे अडदालसहस्स होंति जंबुदुमा ।
एदे तिण्णि वि संडा तिण्णि वि परिसाण णायव्वा ॥

अर्थ (गाथा 68 से 69): जम्बू वृक्षके परिवार वृक्ष भी बत्तीस हजार धूम (आग्नेय) दिशामें, चालीस हजार दक्षिण दिशामें और अड़तालीस हजार नैऋत्य दिशा विभागमें जानना चाहिये । ये तीनों समूह तीनों परिषद देवोंके समझना चाहिये ॥ ६८-६९ ॥


सत्ताणीयाणि तहा सत्तदुमा होंति पच्छिमदिसाए ।
चदुसु वि दिसाविभागे चत्तारि हवंति महिसीणं ॥ ७०

अर्थ: चारों ही दिशाओंमें स्थित चार वृक्ष चार अग्र देवियोंके हैं ॥ ७० ॥


उत्तरपच्छिमभागे उत्तरभागे य पुव्वउत्तरदो ।
चत्तारिसहस्सदुमा सामानियाणे बोधव्वा ॥ ७१

अर्थ: उत्तर-पश्चिम ( वायव्य ) भागमें, उत्तर भागमें और पूर्वोत्तर ( ईशान ) भागमें सामानिक देवोंके चार हजार वृक्ष जानना चाहिये ॥ ७१ ॥


चउरो चउरो य तहा सहस्सगुणि या दुमाण जंबूणं ।
पुव्वुत्तरदक्खिणपच्छिमेसु कमसो मुणेयव्वा ॥ ७२

अर्थ: [ आत्मरक्षक देवोंके ] चार-चार हजार जम्बू वृक्ष क्रमसे पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम दिशामें जानना चाहिये ॥ ७२ ॥


अट्ठोत्तरसयसंखा अट्ठसु वि दिसासु होंति रमणीया।
अणादियजक्खस्स य णाएव्वा आदरक्खाणं ॥ ७३

अर्थ: आठों ही दिशाओंमें रमणीय एक सौ आठ वृक्ष अनादृत यक्षके आत्मरक्षक [ प्रतीहार, मंत्री व दूत ] देवोंके हैं ॥ ७३ ॥


चालीसं च सहस्सा सदं च वीसदिय तह य णाएव्वा ।
एवं च सयसहस्सं जंबूणं होइ परिसंखा ॥ ७४

अर्थ: जम्बू वृक्षोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस जानना चाहिये ( १ + ३२००० + ४०००० + ४८००० + ७ + ४ + ४००० + १६००० + १०८ = १४०१२० ) ॥ ७४ ॥


जिणभवणाण वि संखा तेत्तियमत्ता हवंति जंबू सु ।
णाणारयणमयाणं अकिट्टिमाणं समुद्दिद्वा ॥ ७५

अर्थ: जम्बू वृक्षोंपर स्थित नाना रत्नमय अकृत्रिम जिनभवनोंकी भी संख्या उतनी मात्र अर्थात् एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस कही गई है ॥ ७५ ॥


जंबूपायवसिहरे छत्तत्तयचामरादिसंजुत्ता ।
बहुविहकेदुपडागा पलंबमाणा विरायंति ॥ ७६

अर्थ: जम्बू वृक्षके शिखरपर तीन छत्र व चामरादिसे संयुक्त लटकती हुई बहुत प्रकारकी ध्वजा-पताकायें विराजमान हैं ॥ ७६ ॥


जक्खिंदो वि महप्पा सिंहासणसंठिओ महस्सत्तो।
वरचामरधुव्वंतो बहुविहसुरसंमिदिपणदंगो ॥ ७७

हारविराइयवच्छो वरकुंडलमंडिओ विउलबाहू ।
णीलुप्पलसंकासो सिदादवत्तेण रमणीओ ॥ ७८

सम्मदंसणसुद्धो सम्मादिट्ठीण वच्छलो धीरो।
सयलं जंबूदीवं सो भुंजइ एयछत्तेण ॥ ७९

अर्थ (गाथा 77 से 79): सिंहासनपर स्थित, महाबलवान्, उत्तम चामरोंसे वीज्यमान, बहुत प्रकारके देवोंके समूहोंसे नमस्कृत, हारसे शोभायमान वक्षस्थलवाला, उत्तम कुण्डलोंसे मण्डित, विशाल भुजाओंसे संयुक्त, नीलोत्पलके सदृश प्रभावाला, धवल आतपत्रसे रमणीय, सम्यग्दर्शनसे शुद्ध व सम्यग्दृष्टियोंका प्रेमी, ऐसा वह धीर महात्मा यक्षेन्द्र भी समस्त जम्बू द्वीपको एकाधिपत्यसे भोगता है ॥ ७७-७९ ॥


पुव्वं कदेण धम्मे सो भुंजइ उत्तमं विसयसोक्खं ।
एवं णाऊण णरा धम्मम्मि सुआदिया होहं ॥ ८०

अर्थ: वह यक्षेन्द्र पूर्वकृत धर्मसे उत्तम विषयसुखको भोगता है, इस प्रकार जानकर मनुष्योंको धर्ममें अतिशय आदर युक्त होना चाहिये ॥ ८० ॥ सौमनस गजदन्तके पश्चिम,


सोमणसस्स य अवरे विज्जुप्पहणामयस्स पुव्वेण । मंदरदक्खिणपासे देवकुरु होइ णायव्वा ॥ ८१

अर्थ: विद्युत्प्रभ नामक गजदन्तके पूर्व और मन्दर गिरिके दक्षिण-पार्श्व भागमें देवकुरु स्थित है ॥८१॥


एक्को य चित्तकूडो विचित्तकूडो य पव्वदो पवरो । एक्कं च कंचणसयं णियमा तत्थ दु मुणेयव्वा ॥ ८२

अर्थ: वहां नियमसे एक चित्रकूट व दूसरा विचित्रकूट ये दो श्रेष्ठ यमक पर्वत तथा एक सौ कंचन पर्वत जानना चाहिये ॥ ८२ ॥


णिसधद्दहो य पढमो देवकुरुद्दहो तहेव बिदिओ य । सूरद्दहो य णेऊ सुरसदहो विज्जुतेओ य ॥ ८३

पंचेव जोयणसदा वित्थिण्णा दस य होंति उव्वेधा। जोयणसहस्सयामा सव्वदहा होंति णायव्वा ॥ ८४

अर्थ (गाथा 83 से 84): प्रथम निषध द्रह, द्वितीय देवकुरु द्रह, सूर द्रह, सुरस (सुलस) द्रह और विद्युत्तेज, ये पांच द्रह जानना चाहिये । सब द्रह पांच सौ योजन विस्तीर्ण, दश योजन उद्‌वेधसे सहित और एक हजार योजन आयत जानना चाहिये ॥ ८३-८४ ॥


सीदोदापणदीए तत्थ दहा पंच होंति णायव्वा । मेरुस्स सामलीओ दक्खिणपच्छिमे होइ ॥ ८५

अर्थ: ये पांच द्रह वहां सीतोदाके प्रणिधि भागमें जानना चाहिये । मेरुके दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) में शाल्मलि वृक्ष है ॥ ८५ ॥


तस्सेव य उच्चत्तं णायव्वा अट्ठ जोयणाणं तुं । णामेण वेणुदेवो तत्थ य गरुडाहिवो बसइ ॥ ८६

अर्थ: उसकी ऊंचाई आठ योजन प्रमाण जानना चाहिये । वहांपर वेणुदेव नामक गरुड़कुमारोंका अधिपति निवास करता है ॥ ८६ ॥


णिसधादो गंतूणं सहस्स तह जोयणा दु उत्तरदो । सीदोदाउभयतडे चित्तविचित्ता णगा होंति ॥ ८७

अर्थ: निषध पर्वतके उत्तरमें एक हजार योजन जाकर सीतोदा नदीके उभय तटोंपर चित्र और विचित्र नामके यमक पर्वत हैं ॥ ८७ ॥


एकेक्काणं अंतर पंचेव सयाणि जोयणा णेया । जोयणसहस्सुत्तुंगा सहस्सवित्थार मूलेसु ॥ ८८

सत्तसदा पण्णासा मज्झेसु हवंति वित्थडा सेला । पंचेव जोयणसदा सिहरेसु हवंति णायव्वा ॥ ८९

अर्थ (गाथा 88 से 89): एक एक पर्वतका अन्तर पांच सौ योजन प्रमाण जानना चाहिये । ये शैल एक हजार योजन ऊंचे तथा मूलमें एक हजार योजन, मध्यमें सात सौ पचास योजन और शिखरोंपर पांच सौ योजन प्रमाण विस्तृत हैं ॥ ८८-८९ ॥


अवगाहा सेलाणं बे चेव सया हवंति पण्णासा । णाणामणिपरिणमा अणोवमा रूवसंठाणा ॥ ९०

वरवेदिगेहिं जुत्ता मणितोरणमंडिया मणभिरामा । वज्जिंदणीलमरगयणाणाविहरयणसंछण्णा ॥ ९१

अर्थ (गाथा 90 से 91): इन शैलोंका अवगाह दो सौ पचास योजन प्रमाण है । ये पर्वत नाना मणियोंके परिणाम रूप, अनुपम रूप व आकारसे सहित, उत्तम वेदियोंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम; तथा वज्र, इन्द्रनील व मरकत रूप नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त हैं ॥ ९०-९१ ॥ नाना मणियोंसे


तेसु सेलेसु णेया णाणामणिमंडिएसु दिव्वेसु ।
देवाण दु पासादा मणिकंचणमंडिया पवरा ॥ ९२

कणयमया पासादा वेरुलियमया य मरगयमया य।
ससिकंतसूरकंताकक्केयणपउमरायमया ॥ ९३

णवचंपयवरवण्णा णीलुप्पलसंणिहा समुत्तुंगा ।
वरकमलकुसुमवण्णा पासादा होंति रमणीया ॥ ९४

अर्थ (गाथा 92 से 94): मण्डित उन दिव्य शैलोंपर मणि एवं सुवर्णसे मण्डित, सुवर्णमय, वैडूर्यमय, मरकतमय तथा चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, कर्केतन और पद्मरागसे निर्मित, नव चम्पकके समान उत्तम वर्णवाले नीलोत्पलके सदृश और उत्तम कमल कुसुमके समान वर्णसे संयुक्त देवोंके उन्नत रमणीय श्रेष्ठ प्रासाद हैं ॥ ९२-९४ ॥


सत्ताणीयाण तहा पासादा होंति कंचणमयाणि ।
तिण्णि य परिसाण तहा मणिपासादा समुद्दिद्वा ९५

अर्थ: सात अनीकोंके सुवर्णमय प्रासाद और तीन परिषदोंके मणिमय प्रासाद कहे गये हैं ॥ ९५ ॥


चउरो य महीसीणं पासादा विविहरयणसंछण्णा ।
सामाणियाण वि तहा पासादा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ९६

अर्थ: चार अग्र देवियोंके चार प्रासाद तथा सामानिक देवोंके प्रासाद विविध रत्नोंसे व्याप्त कहे गये हैं ॥ ९६ ॥


मणिकंचणपासादा सुराण तह यादरक्खणामाणं ।
अवसेसाण सुराण पासादा होंति णायव्वा ॥ ९७

अर्थ: आत्मरक्ष नामक सुरोंके तथा शेष देवोंके प्रासाद मणि एवं सुवर्णमय जानना चाहिये ॥ ९७ ॥


मंदरमहाचलाणं वक्खारगमाण कंचणगणाणं ।
गयदंतणगाण तहा कुलगिरिवेदद्धसेलाणं ॥ ९८

दिसकरिवरसेलाणं णामिगिरीणं च सव्ववेदीणं ।
वरतोरणदाराणं गोउरदाराण य तहेव ॥ ९९

अण्णेसिं पव्वदाणं वणसंडाणं तहेव सव्वाणं ।
संखादीदाण तहा सायरदीवाण सव्वाणं ॥ १००

जमगाण जहा दिट्ठा तह तेसिं विविह होंति पासादा ।
णिम्मलमणिरयदमया वरकंचणमंडिया पवरा ॥ १०१

अर्थ (गाथा 98 से 101): मन्दर महा पर्वत, वक्षार नग, कंचन नग, गजदन्त नग, कुलगिरि, वैताढ्य शैल, दिग्गज शैल, नाभिगिरि, सब वेदियां, उत्तम तोरणद्वार तथा गोपुरद्वार, अन्य पर्वत, सब वनखण्ड, तथा असंख्यात सब द्वीप-समुद्र, इन सबके ऊपर भी यमकोंके समान निर्मल मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित और सुवर्णसे मण्डित उत्तम विविध प्रकारके प्रासाद होते हैं ॥ ९८-१०१ ॥


जमगाण जहा दिट्ठा सत्ताणीयादियाण पासादा ।
तह तेसिं सव्वाणं पासादा होंति णायव्वा ॥ १०२

अर्थ: यमकोंके ऊपर जैसे सात अनीक आदिके प्रासाद कहे गये हैं वैसे ही प्रासाद उन सबके भी जानना चाहिये ॥ १०२ ॥


ते विविहरइद मंगलविलसंतमहंतकंतकयसोहा ।
अवरच्छराहि भरिया अच्छेरयरूवरूवाहि ॥ १०३

अर्थ: वे प्रासाद विविध प्रकारके रचे गये मंगलोंकी प्रकाशमान महाकान्ति द्वारा की गई शोभासे संयुक्त, आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूपवाली उत्तम अप्सराओंसे परिपूर्ण, रत्नमय होते हुए भी बहुत प्रकारकी सुवर्ण, मणि एवं


लक्खणवंजणकलिया संपुण्णमियंकसोम्ममुहकमला । उदयक्कमंडलणिभा विसुद्धसयपत्तरुकरकमला ॥ ११४

आरत्तकमलचरणा भिण्णंजणसंणिहा हवे केसा । आरत्तकमलणेत्ता विद्दुमसमेतयवरअहरा ॥ ११५

सीहासणछत्तत्तयभामंडलधवलचामरोजुत्ता । मणिकंचणरयणमया पासादवरेसु ते होंति ॥ ११६

अर्थ (गाथा 113 से 116): सहित, सम्पूर्ण चन्द्रके समान सौम्य मुख-कमलवाली, उदयकालीन सूर्यमण्डलके सदृश, विकसित कमलके समान कर-कमलोंसे संयुक्त, किंचित् लाल कमलके समान चरणोंवाली, भिन्न अंजनके सदृश केशोंसे संयुक्त, किंचित् लाल कमलके समान नेत्रोंसे सहित, विद्रुमके समान कान्तिवाले उत्तम अधरोष्ठोंसे विभूषित, तथा सिंहासन, तीन छत्र, भामण्डल एवं धवल चामरोंसे युक्त; ऐसी मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप अरहन्तोंकी प्रतिमायें हैं ॥ ११३-११६ ॥


चित्तविचित्तकुमारा ते देवा होंति तेसु सेलेसु । भोगोवभोगजुत्ता बहुअच्छरपरिवुडा धीरा ॥ ११७

अर्थ: उन शैलोंपर भोगोपभोगसे युक्त और बहुत अप्सराओंसे वेष्टित वे धैर्यशाली चित्रकुमार और विचित्रकुमार देव रहते हैं ॥ ११७ ॥


उत्तरदिसाविभागं गंतूणं जोयणाणि पंचसदा । जमगेहिंतो परदो महादहा होंति सरिमज्झे ॥ ११८

अर्थ: यमक पर्वतोंसे आगे उत्तर दिशा-विभागमें पांच सौ योजन जाकर नदीके मध्यमें महा द्रह हैं ॥ ११८ ॥


वरवेदिएहिं जुत्ता तोरणदारेहि मंडिया दिव्वा । अक्खयअवगाहंतोया पंचेव य होंति णायव्वा ॥ ११९

अर्थ: उत्तम वेदियोंसे युक्त, तोरणद्वारोंसे मण्डित, दिव्य और अक्षय अगाध जलसे परिपूर्ण वे द्रह पांच ही होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ११९ ॥


एक्केक्काणं अंतरं पंचेव हवंति जोयणसयाणि । तेवीसा वादाळा बे चेव कला य मेहरुस ॥ १२०

अर्थ: एक एक द्रहका अन्तर पांच सौ योजन है । तेईस ब्यालीस व दो कला मेरुका है (?) ॥ १२० ॥


तेसीदा वादाला बे चेव कला य होइ परिमाणं । दहमेरूणं अंतर णादव्वं होइ जिणदिट्ठं ॥ १२१

अर्थ: तेरासी ब्यालीस व दो कला प्रमाण, यह जिन भगवान्‌के द्वारा देखा गया द्रह और मेरुका अन्तर जानना चाहिये (?) ॥ १२१ ॥


पुव्वावरवित्थिण्णा पंचेव हवंति जोयणसयाणि । उत्तरदक्खिणभागे सहस्समेयं वियाणाहि ॥ १२२

अर्थ: उक्त द्रह पूर्व-पश्चिममें पांच सौ योजन प्रमाण विस्तीर्ण हैं। उत्तर-दक्षिण भागमें इनका विस्तार एक हजार योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १२२ ॥


पायालम्मि पइट्ठे दसजोयण वण्णिया समासेण । पण्फुल्ल कमलकुवलयणीलुप्पलकुमुदसंछण्णा ॥ १२३

अर्थ: प्रफुल्लित कमल, कुवलय, नीलोत्पल और कुमुदोंसे व्याप्त वे द्रह पातालमें प्रविष्ट होनेपर दश योजन अवगाहसे युक्त हैं। इस प्रकार संक्षेपसे उनका वर्णन किया गया है ॥ १२३ ॥ उनमें एक योजन प्रमाण विष्कम्भ


तेसु वरपउमपुप्फा विक्खंभायाम जोयणपमाणा । बाहल्लेण य कोसा जलादु बे उच्चया कोसा ॥ १२४

अर्थ: व आयाम तथा एक कोश बाहुल्यसे सहित और जलसे दो कोश ऊंचे उत्तम कमल पुष्प हैं ॥ १२४॥


वरकण्णिया दुकोसा कोसपमाणा हवंति तह पत्ता । णालाण रुंद कोसा दसजोयण साहिया दीहा ॥ १२५

अर्थ: इनकी उत्तम कर्णिका दो कोश और पत्र एक कोश प्रमाण हैं। नालोंका विस्तार एक कोश और दीर्घता दश योजनसे अधिक है ॥ १२५ ॥


वेरुलियरयणणाला कंचणवरकण्णिया य णायव्वा । विद्दुमपत्ता एक्कारसहस्सगुणिदा समुद्दिद्वा ॥ १२६

अर्थ: इनके नाल वैडूर्यमणिमय और कर्णिकायें सुवर्णमय जानना चाहिये। उनके विद्रुममय पत्ते ग्यारह हजार कहे गये हैं ॥ १२६ ॥


दिव्वामोदसुगंधा णववियत्तियपउमकुसुमसंकासा । पउम त्ति तेण णामा जिणिंदइंदेहिं णिद्दिठ्ठा ॥ १२७

अर्थ: चूंकि उक्त [ पार्थिव ] कमल दिव्य आमोदसे सुगंधित और नवीन विकसित पद्म कुसुमके सदृश हैं, इसीलिये जिनेन्द्र भगवान्‌के द्वारा इनके नाम पद्म निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १२७ ॥


एयं च सयसहस्सं चालीसा तह सहस्ससंगुणिदा । एवं च सयं सोलस पउमाणं होंति परिसंखा ॥ १२८

अर्थ: पद्मोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ सोलह (१४०११६) है ॥ १२८ ॥


सत्तेव सयसहस्सा पंचसया तह असीदा य । पंचण्हं तु दहाणं परिमाणं हुंति पउमाणं ॥ १२९

अर्थ: पांचों द्रहोंके कमलोंका प्रमाण सात लाख पांच सौ अस्सी (१४०११६ x ५ = ७००५८०) है ॥ १२९ ॥


जिणइंदवरगुरूणं सुरिंदरघिट्ठमउडचलणाणं । रयणमया वरपडिमा पडमिणिपुप्फेसु णिद्दिद्वा ॥ १३०

अर्थ: पद्मिनीपुष्पोंपर, जिनके चरणोंमें श्रेष्ठ सुरेन्द्रोंने अपने मुकुटको घिसा है अर्थात् नमस्कार किया है, ऐसी श्रेष्ठ जिनेन्द्र गुरुओंकी रत्नमय उत्तम प्रतिमायें निर्दिष्ट की गई हैं ॥१३०॥


तेसु पउमेसु णेयं कंचणमणिरयण संबेंसंछण्णा । लंबंतकुसुममाला कालागरुकुसुमगंधवड्ढा ॥ १३१

धुव्वंतधयवडाया मुत्तादामेहिं सोहिया रम्मा । गोउरकवाडजुत्ता मणिवेदिविहूसिया दिव्वा ॥ १३२

गाउअदलविक्खंभा गाउअदीहा दहाण पउमेसु । गाउयचउभागूणा उत्तुंगा होंति पासादा ॥ १३३

अर्थ (गाथा 131 से 133): द्रहोंके उन कमलोंपर सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके समूहसे व्याप्त, लटकती हुई कुसुममालाओंसे सहित, कालागरु व कुसुमोंकी गन्धसे युक्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त, मुक्तामालाओंसे शोभित, रमणीय, गोपुरकपाटों (गोपुरद्वारों) से युक्त, मणिमय वेदियोसे विभूषित, दिव्य, अर्ध कोश विस्तृत, एक कोश दीर्घ और चतुर्थ भागसे हीन एक (३/४) कोश ऊंचे प्रासाद हैं ॥ १३१-१३३ ॥


णिसधकुमारी णेया तह चेव य देवकुरुकुमारी य । सूरकुमारी सुलसा विज्जुप्पह तह कुमारी य ॥ १३४

अर्थ: निषधकुमारी, देवकुरुमारी, सूरकुमारी, सुलसाकुमारी तथा विद्युत्प्रभकुमारी नामक ये नागकुमारोंकी उत्तम कुमारियां


एदाओ णामाणो णागकुमाराण वरकुमारीओ ।
एगपल्लाउगाओ दसधणुउतुंगदेहाओ ॥ १३५

अर्थ (गाथा 134 से 135): एक पल्य प्रमाण आयुवाली और दश धनुष उन्नत देहकी धारक हैं ॥ १३४-१३५ ॥


णिच्चं कुमारियाओ अहिणवलावण्णरूवजुत्ताओ ।
आभरणभूसियाओ मिदुकोमळमहुरवयणाओ ॥ १३६

तेसु भवणेसु णेया देवीओ होंति चारुरूवाओ ।
धम्मेणुप्पण्णाओ विसुद्धसीलस्सभावाओ ॥ १३७

अर्थ (गाथा 136 से 137): उन भवनोंमें सदा कुमारी रहनेवाली ये देवियां अभिनव लावण्यमय रूपसे संयुक्त, आभरणोंसे भूषित; मृदु, कोमल एवं मधुर वचनोंको बोलनेवाली, सुन्दर रूपसे सहित और विशुद्ध शील व स्वभावसे सम्पन्न होती हैं ॥ १३६-१३७ ॥


देवीण तिण्णि परिसा सत्ताणीया हवंति णायव्वा ।
तह आएरक्खसुरा सामाणीया य सुरसंघा ॥ १३८

अर्थ: इन देवियोंके तीन परिषद, सात अनीक तथा आत्मरक्षक देवों एवं सामानिक देवोंके समूह होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३८ ॥


तिण्णेव य परिसाणं धूमदिसे सीहखाणभागेसु ।
होंति भवणाणि णेया पफुल्लपउमेसु सब्बेसु ॥१३९

अर्थ: तीनों परिषद देवोंके भवन आग्नेय, दक्षिण और ईशान भागोंमें स्थित सब विकसित पद्मोंके ऊपर होते हैं ॥ १३९ ॥


बत्तीसा चालीसा अडदाला तह सहस्ससंगुणिदा ।
परिसंखा णिद्दिट्ठा समासदो ताण सब्बाणं ॥ १४०

अर्थ: उन सबकी संख्या संक्षेपसे क्रमशः बत्तीस हजार, चालीस हजार और अड़तालीस हजार निर्दिष्ट की गई है ॥ १४० ॥


धयसीहवसहगयवरदिसासु पउमाणि होंति रक्खाणं ।
पत्तेयं पत्तेयं चतुरो चतुरो सहस्साणि ॥ १४१

अर्थ: ध्वजा, सिंह, वृषभ और गज दिशाओं (पूर्वादिक चारों) मेंसे प्रत्येक दिशामें आत्मरक्षक देवोंके चार चार हजार कमल हैं ॥ १४१ ॥


सामाणियाण वि तहा खरगजढंखेसु चउसहस्साणि ।
सत्त पउमाणि णेया सत्ताणीयाण वसहम्मि ॥ १४२

अर्थ: तथा सामानिक जातिके देवोंके भी चार हजार कमल खर, गज और ढंख अर्थात् काक (ईशान, उत्तर व वायव्य) दिशाओंमें हैं । सात अनीकोंके सात कमल वृषभ (पश्चिम) दिशामें जानना चाहिये ॥ १४२ ॥


धयंधूमसिंहमंडलगोवईखरणागढंखआसासु ।
होंति पउमाणि णेया सयं च अट्ठाणि देवाणं ॥ १४३

अर्थ: ध्वजा, धूम, सिंह, मण्डल, गोपति (वृषभ), खर, नाग (गज) और ढंख (ध्वाङ्क्ष) इन आठ दिशाओंमें [ प्रतीहार, मंत्री व दूत ] देवोंके एक सौ आठ पद्म जानना चाहिये ॥ १४३ ॥


एक्केक्काण दहाणं दोदोपासेसु पुव्वपच्छिमदो ।
कंचणसेला दस दस णायव्वा होंति रमणीया ॥ १४४

अर्थ: प्रत्येक द्रहके पूर्व व पश्चिम दो दो पार्श्वभागोंमें रमणीय दश दश कंचन शैल जानना चाहिये ॥ १४४ ॥ वन


वणवेदिविप्फुरंता मणिकंचणतोरणेहि संजुत्ता ।
जोयणसयमुब्बिद्धा तद्धद्धवित्थारवरसिहरा ॥ १४५

बहुभवणसंपरिउडा णाणाविहकप्परुक्खसंछण्णा ।
पोक्खरिणिवाविपउरा जिणभवणविहूसिया रम्मा ॥ १४६

बहुदेवदेविणिवहा तण्णामादेवरायसाहीणा ।
देवकुरुम्मि वि खेत्ते सुवण्णसेला समुद्दिट्ठा ॥ १४७

अर्थ (गाथा 145 से 147): व वेदियोसे स्फुरायमान, मणिमय एवं सुवर्णमय तोरणोंसे संयुक्त, सौ योजन ऊंचे, इससे आधे ( ५० यो.) शिखरविस्तारसे युक्त, बहुत भवनोंसे वेष्टित, नाना प्रकारके कल्प वृक्षोंसे व्याप्त, प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे सहित, जिनभवनोंसे विभूषित, रमणीय, बहुत देव-देवियोंके समूहसे सहित, तथा उन्हीं पर्वतों जैसे नामोंके धारक देवराजोंके स्वाधीन ऐसे सुवर्ण ( कंचन ) शैल देवकुरु क्षेत्रमें भी कहे गये हैं ॥ १४५-१४७ ॥


देवकुरुम्मि दु वंसे सीदोदापच्छिमे तडे रुक्खो ।
मंदरगिरिस्स णेया ईसाणोदिसाए हवे सादी ॥ १४८

अर्थ: देवकुरु क्षेत्रमें मन्दर गिरिकी ईशान ( नैऋत्य ? ) दिशामें सीतोदाके पश्चिम तटपर स्वाति ( शाल्मलि ) वृक्ष जानना चाहिये ॥ १४८ ॥


पंचेव जोयणसदा विक्खंभायामदिव्वमणिपीठं ।
मज्झे बारहबहलं जोयणअद्धं तु अंतम्मि ॥ १४९

अर्थ: पांच सौ योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयामसे सहित तथा मध्यमें बारह व अन्तमें अर्ध योजन बाहल्यवाला दिव्य मणिमय पीठ है ॥ १४९ ॥


वरवेदिपुढि जुत्तं मणितोरणमंडियं मणाभिरामं ।
बहुविहपायवनिबहं सरवरवावीहिं रमणीयं ॥ १५०

अर्थ: यह मणिपीठ उत्तम वेदियोंसे सहित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, बहुत प्रकारके वृक्षोंके समूहसे सहित, और सरोवर एवं वापियोंसे रमणीय है ॥ १५० ॥


तस्स बहुमज्झदेसे होइ तहा दक्खिणुत्तरायामं ।
अट्ठेव जोयणाई तदद्धउत्तुंग मणिपीठं ॥ १५१

चउजोयणविक्खंभं बारहवेदीहिं परिवुडं दिव्वं ।
मणिगणजलंतभासुर तोरणअडदालसंछण्णं ॥ १५२

अर्थ (गाथा 151 से 152): उसके बहुमध्य भागमें आठ योजन दक्षिण-उत्तर लंबा, इससे आधा ऊंचा, चार योजन विस्तृत, बारह वेदियोंसे वेष्टित, मणिसमूहकी दीप्तिसे भासुर तथा अड़तालीस तोरणोंसे व्याप्त दूसरा मणिमय दिव्य पीठ है ॥ १५१-१५२॥


तं मज्झगयं पीठं मणिमय अट्ठद्धजोयणमुत्तुंगं ।
जोयणसमचउरस्सं णाणामणिरयणसंछण्णं ॥ १५३

अर्थ: वह मध्यगत मणिमय पीठ आठके आधे अर्थात् चार योजन ऊंचा, एक योजन समचतुष्कोण और नाना मणियों व रत्नोंसे व्याप्त है ॥ १५३ ॥


तस्स दु उवरिं होदि य सामालिरुक्खो महब्भसंकासो ।
साहोवेसाहगहणो मणिकंचणरयणपरिणामो ॥ १५४

अर्थ: उसके ऊपर महामेघके सदृश, शाखा-उपशाखाओंसे गहन; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप, दो कोश अवगाहसे युक्त,


बेगाउयअवगाढो अट्ठेव जोयणसमुत्तुंगो ।
बे चेव कोसरुंदो रयणमओ णिम्मलो दिव्वो ॥ १५५

अर्थ (गाथा 154 से 155): आठ योजन ऊंचा, दो कोश विस्तारसे सहित, रत्नमय, निर्मल और दिव्य शाल्मलि वृक्ष स्थित है ॥ १५४-१५५ ॥


बेजोयणउप्पइया धरणीदो तस्स होंति साहाओ ।
छज्जोयणतुंगाओ मरगयपत्तेहिं छण्णाओ ॥ १५६

अर्थ: पृथिवीसे दो योजन ऊपर जाकर उसकी छह योजन ऊंची और मरकतमय पत्तोंसे व्याप्त शाखायें हैं ॥ १५६ ॥


साहोवसाहसहिओ मज्झे छज्जोयणा हवे बहलो ।
सिहरे चत्तारि हवे बहुविहमणिकुसुमफलणिवहो ॥ १५७

अर्थ: शाखा-उपशाखाओंसे सहित वह वृक्ष मध्यमें छह योजन व शिखरपर चार योजन बाहल्यसे सहित और बहुत प्रकारके मणिमय कुसुमों एवं फलोंके समूहसे संयुक्त है ॥ १५७ ॥


साहासु होंति दिव्वा पासादा कणयरयणपरिणामा ।
दक्खिणदिसाविभागे जिणिंदाणं समुद्दिट्ठा ॥ १५८

अर्थ: इन शाखाओंपर सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप दिव्य प्रासाद हैं। इनमेंसे दक्षिण दिशा विभागमें स्थित प्रासाद जिनेन्द्रोंके कहे गये हैं ॥ १५८ ॥


कोसं आयामेण य कोसद्धं तह य होंति विक्खंभा ।
देसूणं च कोसं उच्चेद्धा होंति पासादा ॥ १५९

अर्थ: ये प्रासाद एक कोश आयत, अर्ध कोश विस्तृत और कुछ कम एक कोश ऊंचे हैं ॥ १५९ ॥


णामेण वेणुदेवो गरुडाणं अहिवई महासत्तो ।
सामलिरुक्खम्मि णेया अच्छइ दिव्वाणुभावेण ॥ १६०

अर्थ: शाल्मलि वृक्षपर गरुड़कुमारोंका स्वामी वेणु नामक महाबलवान् देव दिव्य प्रभावसे रहता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १६० ॥


साहासिहरेसु तहा णाणाविहधयवडा समुत्तुंगा ।
वरचामरछत्तत्तयसंजुत्ता होंति णायव्वा ॥ १६१

अर्थ: शाखाशिखरोंपर उत्तम चामरों व तीन छत्रोंसे संयुक्त उन्नत नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकायें जानना चाहिये ॥ १६१ ॥


चउसु वि दिसाविभागे सामलिरुक्खा हवंति णायव्वा ।
चदु चदु चेव सहस्सा तह चेव य आदरक्खाणं ॥ १६२

अर्थ: चारों ही दिशाविभागोंमें स्थित चार चार हजार शाल्मलि वृक्ष आत्मरक्ष देवोंके जानना चाहिये ॥ १६२ ॥


दक्खिणपुव्वदिसाए अब्भंतरपारिसाण अमराणं ।
सामलिपादवसंखा बत्तीससहस्स णिद्दिट्ठा ॥ १६३

अर्थ: दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशामें अभ्यन्तर परिषद देवोंके बत्तीस हजार शाल्मलि वृक्ष निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ १६३ ॥


तह दक्खिणे वि णेया चालीससहस्स संबलीरुक्खा ।
मज्झिमपरिसाण तहा णायव्वा होंति णियमेण ॥ १६४

अर्थ: तथा दक्षिण दिशामें नियमसे मध्यम परिषद देवोंके चालीस हजार शाल्मलि वृक्ष हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १६४ ॥


अट्ठेदालीससहस्सा बाहिरपरिसाण होंति णायव्वा ।
दक्खिणपच्छिमभागे णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ १६५

अर्थ: दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) भागमें सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किये गये बाह्य परिषद देवोंके अड़तालीस हजार शाल्मलि वृक्ष जानना चाहिये ॥ १६५ ॥ पश्चिम दिशामें भी सात अनीक देवोंके सात वृक्ष


पच्छिमदिसे वि णेया सत्ताणीयाण सत्त रुक्खा य ।
अट्ठोत्तरसयरुक्खा अट्ठसु वि दिसासु ते होंति ॥ १६६

पच्छिमउत्तरकोणे उत्तरभागे य पुव्वउत्तरदो ।
सामाणियाण होंति हु चत्तारिसहस्स मणिरुक्खा ॥ १६७

चत्तारि तुंग पायव देवीणं होंति चदुसु वि दिसासु ।
सव्वेसु पायवेसु य पासादा होंति णायव्वा ॥ १६८

सव्वेसु य पासादे जिणपडिमा होंति रूवसंपण्णा ।
सीहासणछत्तत्तयभामंडलसंजुदा सव्वे ॥ १६९

उत्तरकुरुदेवकुरुखेत्तेसु हवंति तेसु जे जादा ।
मणुया तिकोसोउच्चा वरलक्खणवंजणोकलिया ॥ १७०

तिण्णिपलिदोवमाऊ तिहिं विहिं दिवसेहि ते दु भुंजंति ।
वरअमिदुहारआहारा बद्रपमाणेण णिद्दिठ्ठा ॥ १७१

जुवला जुवला जादा इत्थी पुरिसा हवंति ते सव्वे ।
णत्थि षण्डंसयवेदा तिरिया वि य होंति एमेव ॥ १७२

जे कम्मभूमिजादा दाणं दाऊण उत्तमे पत्ते ।
मरिऊण ते मणुस्सा जायंति य भोगभूमीसु ॥ १७३

बद्धाउगा मणुस्सा तिरिक्खमउज्झम्मि मिच्छभावेण ।
दाणाणुमोदणेण य कुरुसु ते होंति तिरिया दु ॥ १७४

ते सुस्वरा सुरूवा मंदकसाया अपावबुद्धीया ।
णरणारिगणा सव्वे तिरिया वि हवंति णायव्वा ॥ १७५

अर्थ (गाथा 166 से 175): जानना चाहिये । [ मंत्री व प्रतीहारादि रूप देवोंके जो ] एक सौ आठ वृक्ष हैं वे आठों ही दिशाओंमें स्थित हैं ॥ १६६ ॥ पश्चिम-उत्तर ( वायव्य ) कोणमें, उत्तर भागमें और पूर्व-उत्तर ( ईशान ) दिशामें सामानिक देवोंके चार हजार मणिमय वृक्ष हैं ॥ १६७ ॥ चार अग्र देवियोंके उन्नत चार वृक्ष चारों ही दिशाओंमें स्थित हैं। इन सब वृक्षोंपर प्रासाद होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १६८ ॥ सभी प्रासादोंमें सुन्दर रूपसे सम्पन्न जिनप्रतिमायें हैं। ये सब प्रतिमायें, सिंहासन, तीन छत्र एवं भामण्डलसे संयुक्त होती हैं ॥ १६९ ॥ उन उत्तरकुरु और देवकुरु क्षेत्रोंमें जो मनुष्य उत्पन्न होते हैं वे तीन कोश ऊंचे और उत्तम लक्षण व व्यंजनोंसे युक्त होते हैं ॥ १७० ॥ वे मनुष्य तीन पल्योपम प्रमाण आयुसे युक्त होते हुए तीन दिवसमें भोजन करते हैं। इनका अमृतमय उत्तम आहार बेरके बराबर कहा गया है ॥ १७१ ॥ युगल युगल रूपसे उत्पन्न हुए वे सब स्त्री व पुरुष लिंगसे युक्त होते हैं। वहां नपुंसक वेद नहीं होता । इसी प्रकार तिर्यंच भी वहां उक्त दो लिंगोंसे ही संयुक्त हैं ॥ १७२ ॥ जो कर्मभूमिमें उत्पन्न होकर उत्तम पात्रको दान देते हैं वे मरकर भोगभूमिमें मनुष्य उत्पन्न होते हैं ॥ १७३ ॥ मिथ्यात्व भावके साथ तिर्यंच आयुको बांधनेवाले मनुष्य दानकी अनुमोदनासे कुरु क्षेत्रोंमें तिर्यंच होते हैं ॥ १७४ ॥ ये सब स्त्री-पुरुषोंके समूह तथा तिर्यंच भी सुन्दर स्वरवाले, उत्तम रूपसे युक्त, मन्दकषायी और पापबुद्धिसे रहित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १७५ ॥


भोत्तूण दिव्वसोक्खं दसविहतरुसंभवं मणभिरामं । कालं कादूण तदो सव्वे देवत्तणमुवियंति ॥ १७६

अर्थ: वे सब दश प्रकारके वृक्षोंसे उत्पन्न मनोहर दिव्य सुखको भोग कर मृत्युके पश्चात् देव पर्यायको प्राप्त करते हैं ॥ १७६ ॥


देउत्तरकुरुखेत्तं एवं कहियं समासदो भेदा । तत्तो उड्ढं णेया सेसाणं वण्णणा होइ ॥ १७७

अर्थ: इस प्रकार संक्षेपसे देवकुरु और उत्तरकुरु क्षेत्रका कथन किया है। इसके आगे शेष क्षेत्रोंका वर्णन जानना चाहिये ॥ १७७ ॥


सीलगुणरयणणिवहं सीलफलदेसयं विगदमोहं । वरपउमणंदिणमियं सीयलणाहं सदा वंदे ॥ १७८

अर्थ: शीलगुणरूपी रत्नसमूहसे सहित, शीलके फलके उपदेशक, मोहसे रहित, और उत्तम पद्मनन्दिसे नमस्कृत ऐसे शीतलनाथको मैं सदा प्रणाम करता हूँ ॥ १७८ ॥

सत्तमो उद्देसो

सेयंसजिणं पणमिय ससुरासुरवंदियं धुदकिलेसं । वोच्छं विदेहवंसं जहादिट्ठं सव्वदरिसीहिं ॥ १

अर्थ: सुरों व असुरोंसे वन्दित और क्लेशसे रहित श्रेयांस जिनेन्द्रको प्रणाम करके विदेह वर्षका वर्णन करते हैं जैसा कि सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ १ ॥


णिसहस्स य उत्तरदो दक्खिणदो णीलवंतसेलस्स । वंसो महाविदेहो चउदिसिं मंदरविहत्तो ॥ २

अर्थ: निषधके उत्तरमें और नील पर्वतके दक्षिणमें स्थित वह विदेह क्षेत्र चारों ओर मन्दरसे विभक्त अर्थात् उसके मध्यमें मन्दर पर्वत स्थित है ॥ २ ॥


विक्खंभो य सहस्सा तेत्तीस छहसदा य चुलसीदा । चत्तारि चेव भागा मज्झे जीवा सयसहस्सा ॥ ३

अर्थ: विदेह क्षेत्रका विष्कम्भ तेतीस हजार छह सौ चौरासी योजन और चार भाग (३३६८४ ४/१९), तथा मध्यमें जीवा एक लाख (१०००००) योजन प्रमाण है ॥ ३ ॥


एक्कं च सयसहस्सा अट्ठावण्णं तहा सहस्साणि । तेरस सदं कलाओ सोळस अड्डं च धणुपुट्ठे ॥ ४

अर्थ: उसका धनुषपृष्ठ एक लाख अट्ठावन हजार एक सौ तेरह योजन और साढ़े सोलह कला (१५८११३ ३३/२) प्रमाण है ॥ ४ ॥


तेत्तीसं च सहस्सा सत्तद्वाणि य सदाणि सत्त भवे । पुव्वावरपस्सभुजा विदेहवंसम्मि सत्त कला ॥ ५

अर्थ: विदेह वर्षमें पूर्वापर पार्श्वभुजाका प्रमाण तेतीस हजार सात सौ सड़सठ योजन और सात कला (३३७६७ ७/१९) है ॥ ५ ॥


एगं बाणउदी च य दोण्णिसहस्सा तहेव बोद्धव्वा । अट्ठारस य कलाओ विदेहअद्धम्मि चूलिया होइ ॥ ६

अर्थ: एक, बानवै और दो हजार अर्थात् दो हजार नौ सौ इक्कीस योजन व अठारह कला (२९२१ १८/१९) प्रमाण अर्ध विदेहमें चूलिका है ॥ ६ ॥


विक्खंभं आयामं मेरुस्स हवंति दो वि सरिसाणि । दस य सहस्सा णेया जोयणसंखा समुद्दिट्ठा ॥ ७

अर्थ: मेरुका विष्कम्भ व आयाम दोनों समान रूपसे दश हजार योजन प्रमाण कहे गये जानना चाहिये ॥ ७ ॥


आयामं विक्खंतं वोच्छामि समासदो दु सेसाणं । दोण्हं वणखंडाणं पाघवसंघायणिचियाणं ॥ ८

देवारण्णचउण्हं अट्ठण्हं वेदियाण दिव्वाणं । बाहसणदीण णेया विभंगणामाण सव्वाणं ॥ ९

सोळसवक्खाराणं बत्तीसण्हं तु विउलविजयाणं । चउसट्ठिवरणदीणं गंगासिंधूण आयामं ॥ १०

अर्थ (गाथा 8 से 10): अब वृक्षसमूहसे परिपूर्ण शेष दो वनखण्डों (भद्रशाल), चार देवारण्यों, आठ दिव्य वेदिकाओं, बारह विभंगा नदियों, सोलह वक्षार पर्वतों, विशाल बत्तीस विजयों, तथा गंगा-सिन्धु आदिक चौंसठ उत्तम


सोलस चेव सहस्सा पंचेव सदा हवंति बाणउदा ।
जोयणसंखा दिट्ठा बे चेव कला हवे अहिया ॥ ११

अर्थ (गाथा 8 से 11): नदियोंके विष्कम्भ व आयामका संक्षेपसे कथन करते हैं । इन सबका आयाम सोलह हजार पांच सौ बानबै योजन और दो कला अधिक कहा गया है ॥ ८-११ ॥


सीदासीदोदाणं विक्खंभं पंच जोयणसयाणि ।
तं सोहिकण सव्वं विदेहविक्खंभमज्झम्मि ॥ १२

सेसं अद्धं किच्चा जं लद्धं होइ ताण आयामं ।
पव्वदखेत्तादीणं णदीण सव्वाण णादव्वा ॥ १३

अर्थ (गाथा 12 से 13): सीता-सीतोदाका विस्तार पांच सौ योजन प्रमाण है । उस सबको विदेहके विस्तारमेंसे कम करके शेषको आधा करनेपर जो लब्ध हो उतना उन पर्वत, क्षेत्रादिक तथा सब नदियोंका आयाम जानना चाहिये ( ३३६८४ ४/१२ - ५०० ÷ २ = १६५९२ २/१२ ) ॥ १२-१३ ॥


बावीसं च सहस्सा जोयणसंखापमाण णिद्दिट्ठा ।
दोण्हं वणाण णेया विक्खंभं होइ णियमेण ॥ १४

अर्थ: दोनों [भद्रशाल] वनोंका विष्कम्भ नियमसे बाईस हजार योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १४ ॥


उणतीसजोयणसया बावीसा तह य होइ विक्खंभो ।
देवारणचउण्हं णायव्वा उदहियंतम्मि ॥ १५

अर्थ: समुद्र तक स्थित चार देवारण्योंका विष्कम्भ उनतीस सौ बाईस (२९२२) योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १५ ॥


बेगाउयउच्चित्ता पंचेव य धणुसया हवे विउला ।
अट्ठण्हं वेदीणं णायव्वं होइ विक्खंभं ॥ १६

अर्थ: आठों वेदियोंकी ऊंचाई दो कोश और विष्कम्भ पांच सौ धनुष प्रमाण जानना चाहिये ॥ १६ ॥


पणुवीस जोयणसयं विदेहमज्झम्मि तह य णिद्दिट्ठा ।
बारसणदीण णेया विभंगणामाण विक्खंभे ॥ १७

अर्थ: विदेहके मध्यमें विभंगा नामक बारह नदियोंका विस्तार एक सौ पच्चीस योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १७ ॥


पंचेव जोयणसया विक्खंभं होइ तह य णायव्वं ।
सोलसवक्खाराणं णिद्दिट्ठं सव्वदरिसीहिं ॥ १८

अर्थ: सोलह वक्षार पर्वतोंका विष्कम्भ सर्वदर्शियोंने पांच सौ योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया है ॥ १८ ॥


णीलणिसहाण भागे सेला चदुसय जोयणा समुत्तुंगा ।
सीदासीदोदाण य तडेसु ते होंति पंचसया ॥ १९

अर्थ: ये शैल नील और निषधके पासमें चार सौ योजन तथा सीता-सीतोदाके तटोंपर पांच सौ योजन प्रमाण ऊंचे हैं ॥ १९ ॥


बावीसजोयणसया बारस सत्तट्ठभागअब्भहियं ।
बत्तीसहं णेया विजयाणं होइ विक्खंभं ॥ २०

अर्थ: बत्तीस विजयोंका विष्कम्भ बाईस सौ बारह योजन और एक योजनके आठ भागोंमेंसे सात भाग अधिक जानना चाहिये ॥ २० ॥


कुंडाण तह समीवे सक्कोसा जोयणा य छच्चेव ।
चउसट्टिवरणदीणं विक्खंभं होइ णाणव्वं ॥ २१

अर्थ: चौंसठ उत्तम नदियोंका विष्कम्भ कुण्डोंके समीपमें एक कोश सहित छह ( ६ १/४ ) योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ २१ ॥ उक्त नदियोंका विस्तार सीता-सीतोदाके जलमें प्रवेश करते


बेकोवसमधिरेया बासट्ठा जोयणा समुद्दिद्वा।
सीदासीदोदजलं पवेसमाणेण विक्खंभं ॥ २२

अर्थ: समय दो कोशोंसे अधिक बासठ ( ६२ १/२ ) योजन प्रमाण कहा गया है ॥ २२ ॥


विक्खंभ इच्छरहियं विक्खंभासेस मेलवेदूणं ।
जंबूदीवस तहा विक्खंभे सोहिऊण पुणो ॥ २३

अवसेसं जं दिट्ठं विक्खंभिच्छेण भाजिदं लद्धं ।
तं होदि इच्छिदाणं सव्वाणं इच्छविक्खंभं ॥ २४

अर्थ (गाथा 23 से 24): इच्छित ( विजय आदि ) के विष्कम्भसे रहित शेष सबके विष्कम्भको मिलाकर तथा उसे जम्बू द्वीपके विष्कम्भमेंसे घटा कर जो शेष दृष्टिगत हो उसे विष्कम्भकी इच्छा अर्थात् विजयादिकोंकी संख्या ( १६, ८, ६, २, २ ) से भाजित करनेपर जो लब्ध हो उतना इच्छित सब विजयादिकोंका इच्छित विष्कम्भ होता है ॥ २३-२४ ॥


तह होइ सोज्झरासी जोयणलक्खं अवद्विदं सददं ।
अणवद्विदा य णेया सोहणरासी समुद्दिद्वा ॥ २५

अर्थ: यहां शोध्य राशि ( जिसमेंसे घटाना अभीष्ट है ) जो एक लाख योजन है वह सदा अवस्थित है । शोधन ( घटाई जानेवाली ) राशि अनवस्थित कही गई जानना चाहिये ॥ २५ ॥


चउसट्ठि च सहस्सा पंचेव सया हवंति चउणउदा ।
सोहणरासी णेया विदेहवंसस्स विजयाणं ॥ २६

अर्थ: विदेह वर्षके विजयोंकी शोधन राशि चौंसठ हजार पांच सौ चौरानबै जानना चाहिये ॥ २६ ॥


सोज्झम्मि दु परिसुद्धं सेसं तह सोलसेहि पविभत्तं ।
जं लद्धं णायव्वं विजयाणं होइ विक्खंभं ॥ २७

अर्थ: इस राशिको शोध्य राशिमेंसे शुद्ध करके शेषको सोलहसे विभक्त करनेपर जो लब्ध हो उतना विजयोंका विष्कम्भ जानना चाहिये ॥ २७ ॥


छण्णउदिं च सहस्सा सोज्झम्मि य सोहिदूण अवसेसं ।
अट्ठविभत्ते लद्धं वक्खाराणं तु विक्खंभं ॥ २८

अर्थ: छ्यानबै हजार ( ३५४०६ + ७५० + ५८४४ + ४४००० + १०००० = ९६००० ) को शोध्य राशिमेंसे घटाकर शेषको आठसे विभक्त करनेपर जो लब्ध हो उतना वक्षारोंका विष्कम्भ होता है ॥ २८ ॥ निन्यानबै हजार दो सौ पचास ( ३५४०६


णवणउदिं च सहस्सा बेसयपण्णास सोहणवक्खादा । सोज्झम्मि सुद्धसेसं विभंगविक्खंभ छव्वभागो ॥ २९

अर्थ: + ४००० + ५८४४ + ४४००० + १०००० = ९९२५० ) इस शोधन नामक राशिको शोध्य राशिमेंसे शुद्ध करके शेषमें छहका भाग देनेपर विभंगा नदियोंका विष्कम्भ होता है ॥ २९ ॥


चउणउदिं च सहस्सा छप्पण्ण सयं च सुद्धअवसेसं । दोभागेण य लद्धं देवारण्णाण विक्खंभं ॥ ३०

अर्थ: चौरानवै हजार एक सौ छप्पन ( ३५४०६ + ४००० + ७५० + ४४००० + १०००० = ९४१५६ ) को शोध्य राशिमेंसे कम करके शेषमें दोका भाग देनेसे जो लब्ध हो उतना देवारण्योंका विष्कम्भ होता है ॥ ३० ॥


छप्पण्णं च सहस्सा सोहणरासी विहीण सोज्झम्मि। सेसं दलेण होदि य विक्खंभं भद्दसालस्स ॥ ३१

अर्थ: छप्पन हजार ( ३५४०६ + ४००० + ७५० + ५८४४ + १०००० = ५६००० ) इस शोधन राशिको शोध्यमेंसे कम करके शेषको आधा करनेसे भद्रशाल वनका विष्कम्भ होता है ॥ ३१ ॥


णउदिं चेव सहस्सा सोहणरासी समासदो णेया। सोज्झम्मि सुद्धसेसं होदि य मेरुस्स विक्खंभं ॥ ३२

अर्थ: नब्बे हजार ( ३५४०६ + ४००० + ७५० + ५८४४ + ४४००० = ९०००० ) इस शोधन राशिको शोध्य राशिमेंसे शुद्ध करनेपर जो शेष रहे उतना मेरुका विष्कम्भ होता है ॥ ३२ ॥


सीदाए उत्तरदो णीलस्स दु दक्खिणेण भागेण । उत्तरकुरुस्स पुव्वे पच्छिमदो चित्तकूडस्स ॥ ३३

एदम्हि अंतरम्हि हु कच्छविजओ त्ति णामदो णेओ। देसो अणाइणिहणो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ ३४

परचक्कईदिरहिदो णाणापाखंड समयपरिहीणो। धणधण्णरयणणिवहो गोमहिसिकुलाउलसिरीओ ॥ ३५

सवसालिइच्छुपउरो तिलमासमसूरगोधुमाइण्णो । दुब्भिक्खममारिरहिदो णिच्चुच्छवत्तूररमणीओ ॥ ३६

णाणाजणपदणिवहो णरनारिवियक्खणेहि परिपुण्णो । पोक्खरिणिवाविपउरो बहुविहदुमसंकुलो रम्मो ॥ ३७

अर्थ (गाथा 33 से 37): सीता नदीके उत्तर, नील पर्वतके दक्षिण, उत्तर कुरुके पूर्व तथा चित्रकूट पर्वतके पश्चिम भाग; इस अन्तरमें कच्छ नामक विजय स्थित जानना चाहिये। यह देश अनादिनिधन, बहुत ग्रामोंसे व्याप्त, रमणीय, परचक्र व ईतिसे रहित, नाना पाखण्डी समयोंसे विहीन; धन-धान्य और रत्नोंके समूहसे परिपूर्ण; गाय और भैंसोंके कुलोंसे व्याप्त शोभावाला; जवँ, शालि धान्य एवं ईखकी प्रचुरतासे सहित; तिल, उड़द, मसूर और गोधूम ( गेहूं ) से परिपूर्ण; दुर्भिक्ष व मारि ( प्लेग आदि ) से रहित, सदा होनेवाले उत्सवोंके वादित्रोंसे रमणीय, नाना जनपदोंके समूहसे संयुक्त, बुद्धिमान् नर-नारियोंसे परिपूर्ण, प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे सहित तथा बहुत प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त होता हुआ रमणीय है ॥ ३३-३७ ॥ उस


देसस्स तस्स मज्झे खेमा णामेण पुरवरो रम्मो । रयणमयभवणाणिवहो कणयमणिरयणसंछण्णो ॥ ३८

पायारपरिक्खेवो मणितोरणमंडिओ मणभिरामो । वरखाइएहि जुत्तो जिणभवणविहूसिओ परमरम्मो ॥ ३९

अर्थ (गाथा 38 से 39): देशके मध्यमें क्षेमा नामक रमणीय उत्तम पुर है । यह पुर रत्नमय भवनोंके समूहसे सहित, सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे व्याप्त, प्राकारसे वेष्टित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, उत्तम खाईसे युक्त और जिनभवनोंसे विभूषित होता हुआ अतिशय रमणीय है ॥ ३८-३९ ॥


बारहजोयण णेओ आयामो पुरवरस्स णिद्दिट्ठो । णवजोयणविक्खंभो कंचणमणिरयणघराणिवहो ॥ ४०

अर्थ: सुवर्ण, मणि एवं रत्नमय गृहोंके समूहसे सहित इस श्रेष्ठ पुरका आयाम बारह योजन और विष्कम्भ नौ योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ ४० ॥


गोउरसहस्सपउरो खडकीदाराणि होंति पंचसया । बारहसहस्स रच्छा सहस चउक्का समुद्दिठ्ठा ॥ ४१

अर्थ: इसमें एक हजार गोपुर, पांच सौ खिड़की द्वार, बारह हजार वीथियां और एक हजार चतुष्पथ कहे गये हैं ॥ ४१ ॥


एक्केक्कदिसाभागे वणसंडा विविहकुसुमफलपउरा । तिण्णेव सया सट्ठी णायव्वा होंति णियमेण ॥ ४२

अर्थ: इसके एक एक दिशाभागमें विविध कुसुमों एवं फलोंकी प्रचुरतासे युक्त तीन सौ साठ वनखण्ड जानना चाहिये ॥ ४२ ॥


तस्स णगरस्स राया अणंतबलरूवतेयसंपण्णो । पंचधणुस्सयतुंगो देवासुरजक्खपडिवक्खो ॥ ४३

परमाउ पुव्वकोडी सम्मादिट्ठी विसालवरबुद्धी । भोगोवभोगसहिओ छक्खंडणराहिओ धीरो ॥ ४४

बत्तीससहस्साणं रायाणं सामिओ महासत्तो । तावदियपमाणाणं देसाणं अहिवई दिट्ठो ॥ ४५

अर्थ (गाथा 43 से 45): उस नगरका राजा अनन्त बल, रूप व तेजसे सम्पन्न; पांच सौ धनुष ऊंचा; देव, असुर एवं यक्षोंका शत्रु; एक पूर्वकोटि प्रमाण उत्कृष्ट आयुका धारक, सम्यग्दृष्टि, विशाल उत्तम बुद्धिसे संयुक्त, भोग-उपभोगोंसे सहित, छह खण्डोंका अधिपति, धीर, महाबलवान् बत्तीस हजार राजाओंका स्वामी, और इतने मात्र (३२०००) देशोंका अधिपति कहा गया है ॥ ४३-४५ ॥


णवणउदिं च सहस्सा दोणमुहाइं हवंति णायव्वा । सीदासरिजलसंभवखुल्लोदहितडसमीवेसु ॥ ४६

अर्थ: उक्त चक्रवर्तीके सीता नदीके जलसे उत्पन्न होनेवाले क्षुद्र समुद्रोंके समीपमें निन्यानबै हजार (९९०००) द्रोणमुख जानना चाहिये ॥ ४६ ॥


अट्ठेदाळ सहस्सा णाणामणिरयणसंभवा दिव्या । तह पट्टणा वि णेया विसालउत्तुंगवरभवणा ॥ ४७

अर्थ: तथा विशाल व उन्नत उत्तम भवनोंसे संयुक्त और नाना मणियों एवं रत्नोंको उत्पन्न करनेवाले अड़तालीस हजार (४८०००) दिव्य पट्टन भी जानना चाहिये ॥ ४७ ॥ बहुत धन-सम्पत्ति व


छव्वीसं च सहस्सा वरगयरा विविहरयणसंछण्णा । बहुसारभंडेणिवहा कप्पुरमरीचिपरिपुण्णा ॥ ४८

अर्थ: बर्तन-भांडोंके समूहसे युक्त, कर्पूर व मरीचसे परिपूर्ण और विविध रत्नोंसे व्याप्त ऐसे छब्बीस हजार उत्तम नगर होते हैं ॥ ४८ ॥


पंचसयगामजुत्ता मडंबणामा हवंति णायव्वा । चत्तारि सहस्साई बहुविहघरसंकुला रम्मा ॥ ४९

अर्थ: पांच सौ ग्रामोंसे युक्त और बहुत प्रकारके घरोंसे व्याप्त रमणीय चार हजार मटंब जानना चाहिये ॥ ४९ ॥


कव्वडणामाणि तहा धरणीधरपरिउडा घणसमिद्धा । चउतीसं च सहस्सा बहुभवणविहूसिया दिव्या ॥ ५०

अर्थ: पर्वतसे वेष्टित, धनसे समृद्ध और बहुतसे भवनोंसे विभूषित चौंतीस हजार दिव्य कर्वट होते हैं ॥ ५० ॥


सरिपव्वदाण मज्झे खेडा णामेण होंति णायव्वा । सोलस चेव सहस्सा णाणाविहभवणसंछण्णा ॥ ५१

अर्थ: नदी और पर्वतके मध्यमें स्थित व नाना प्रकारके भवनोंसे सहित सोलह हजार दिव्य खेट जानना चाहिये ॥ ५१ ॥


गिरिवरसिहरेसु तहा संवाहा णामदो समुद्दिद्वा । चउदस चेव सहस्सा कंचणमणिरयणघर णिवहा ॥ ५२

अर्थ: पर्वतशिखरोंपर स्थित व सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके गृहसमूहसे संयुक्त चौदह हजार संवाह कहे गये हैं ॥ ५२ ॥


छप्पण्ण रयणदीवा रयणाणं जणणि एव संजाया । सीदाउत्तरकूले हवंति ते उवसमुद्दम्मि ॥ ५३

अर्थ: रत्नोंके उत्पादक जो छप्पन रत्नद्वीप ( अन्तद्वीप ) हैं वे सीताके उत्तर तटपर उपसमुद्रमें उत्पन्न होते हैं ॥ ५३ ॥


छण्णवइगामकोडी उत्तुंगमदंतभवणकयसोहा । संकिट्ठलद्धसीमा कुक्कुडसंडेवया दिव्या ॥ ५४

अर्थ: उन्नत एवं विशाल भवनोंसे शोभायमान संक्लिष्ट होकर प्राप्त सीमासे संयुक्त तथा मुर्गीके उड़ने योग्य अर्थात् पास पासमें स्थित ऐसे छयानबै करोड़ दिव्य ग्राम होते हैं ॥ ५४ ॥


धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविहूसिया हवे दिट्ठा । मिच्छत्तभवणरहिदा गामादीणं समुद्दिद्वा ॥ ५५

अर्थ: ये ग्रामादिक फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित और मिथ्यादृष्टियोंके भवनोंसे रहित कहे गये हैं ॥ ५५ ॥


णाणामणिरयणमया जिणभवणविभूसिया परमरम्मा । मिच्छत्तभवणरहिदा गामादीया समुद्दिद्वा ॥ ५६

अर्थ: उक्त ग्रामादिक नाना मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय और मिथ्यादृष्टियोंके भवनोंसे रहित कहे गये हैं ॥ ५६ ॥


सत्तेव महामेघा भवरंजणसंणिभा सलिलपुण्णा । तह सत्त सत्त दिवसा वासारत्तम्मि वरिसंति ॥ ५७

अर्थ: भ्रमर व अंजनके सदृश वर्णवाले तथा जलसे परिपूर्ण सातों ही महामेघ सात सात दिन तक रात-दिन बरसते हैं ॥ ५७ ॥ कुंद पुष्प


बारस य दोणमेहा कुंदेंदुसमप्पहा सलिलपउरा ।
वीसुत्तरतिण्णसया सरिवहणो होंति एक्केक्को ॥ ५८

अर्थ: और चन्द्रके समान प्रभाववाले तथा प्रचुर जलसे परिपूर्ण बारह द्रोणमेघ भी बरसते हैं । एक एकके तीन सौ बीस सन्निपात होते हैं ॥ ५८ ॥


तत्थ दु खत्तियवंसो रायाणं बहुविहो हवे भेदो ।
वइसाण होइ बंसो सुद्दाणं तह य णायव्वा ॥ ५९

तिण्णेव होंति वंसा अवसेसा तत्थ णत्थि वंसा दु ।
दुव्वुट्ठिअणावुड्ढी ण वि होंति दु सव्वकालम्मि ॥ ६०

अर्थ (गाथा 59 से 60): वहां बहुत प्रकारके भेदोंसे युक्त राजाओंका क्षत्रिय वंश, वैश्योंका वंश और शूद्रोंका वंश, ये तीन ही वंश हैं; शेष वंश वहां नहीं हैं, ऐसा जानना चाहिये । तथा वहां सर्व काल दुर्बृष्टि ( अतिवृष्टि ) और अनावृष्टि भी नहीं होती ॥ ५९-६० ॥


तित्थयरपरमदेवा अट्ठमहापाडिहेरसंजुत्ता ।
पंचमहाकल्लाणा चउतीसविसेससंपण्णा ॥ ६१

देवासुरिंदमहिया णाणाविहलक्खणेहि संजुत्ता ।
चक्कहरणिमियचलणा तिलोगणाहा हवे तत्थ ॥ ६२

अर्थ (गाथा 61 से 62): वहां आठ महा प्रातिहार्योंसे संयुक्त, पांच महा कल्याणकोंसे युक्त, चौंतीस अतिशयोंसे सम्पन्न, देवेन्द्रों व असुरेन्द्रोंसे पूजित, नाना प्रकारके लक्षणोंसे संयुक्त, चक्रवर्तियोंसे नमस्कृत चरणोंवाले और तीनों लोकोंके स्वामी ऐसे तीर्थंकर परम देव विद्यमान हैं ॥ ६१-६२ ॥


सत्तविहिरिद्धिपत्ता गणहरदेवा हवंति णायव्वा ।
अमरिंदणमियचलणा सद्धम्मपयासया तत्थ ॥ ६३

अर्थ: वहांपर सात प्रकारकी ऋद्धियोंको प्राप्त और देवेन्द्रोंसे नमस्कृत चरणोंवाले, गणधर देव समीचीन धर्मके प्रकाशक हैं ॥ ६३ ॥


पवरवरपुरिससीहा केवलणाणी हवंति संबद्धा ।
णाणाविहतवणिरदा साहुगणा होंति तत्थेव ॥ ६४

अर्थ: वहांपर पुरुषोंमें श्रेष्ठ संबद्ध ( अनुबद्ध ) केवली और नाना प्रकारके तपोंमें निरत साधुसमूह भी हैं ॥ ६४ ॥


अंजणगिरिसरिसाणं चुलसीदससहस्स णागाणं ।
तावदियरहवराणं णवनिहिअक्खीणकोसाणं ॥ ६५

अट्ठारहकोडीणं अस्साणं वाउवेगगमणाणं ।
जे सामिय माहुप्पा अक्खलियपरक्कमा धीरा ॥ ६६

ते होंति चक्कवट्टी चउदसरयणाधिवा महासत्ता ।
छण्णउइसहस्साणं महिलाणं सामिया तत्थ ॥ ६७

अर्थ (गाथा 65 से 67): जो महापुरुष अंजन गिरिके सदृश चौरासी लाख हाथियों, इतने ही उत्तम रथों, नौ निधियों, अक्षीण कोष, और वायुके वेगके समान गमन करनेवाले अठारह करोड़ अश्वोंके स्वामी और निर्बाध पराक्रमके धारक होते हैं । वे चौदह रत्नोंके अधिपति, महाबलवान् और छ्यानवै हजार महिलाओंके स्वामी चक्रवर्ती वहां विद्यमान रहते हैं ॥ ६५-६७ ॥


बलदेववासुदेवा तप्पडिवक्खा हवंति तत्थेव ।
धम्माणुभावजणिया अणुबद्धसंताणणरवती ॥ ६८

अर्थ: अविच्छिन्न परम्परासे संयुक्त बलदेव, वासुदेव, और उनके प्रतिपक्षी ( प्रतिवासुदेव ) नृपति भी वहां धर्मके प्रभावसे उत्पन्न होते हैं ॥ ६८ ॥


रायाहिरायवसहा होंति महाराय अद्धमंड लिया ।
तह सयलमंडलीया तम्मि महामंडलीया य ॥ ६९

अर्थ: श्रेष्ठ राजाधिराज, महाराज, अर्धमण्डलीक, सकलमण्डलीक और महामण्डलीक भी वहांपर विद्यमान रहते हैं ॥ ६९ ॥


सव्वाण विदेहाणं एवं सव्वेसु चेव विजयेसु ।
पुरिसाणं उप्पत्ती णायव्वा होइ णियमेणं ॥ ७०

अर्थ: इसी प्रकार सब विदेहोंके सभी विजयोंमें नियमसे पुरुषोंकी उत्पत्ति जानना चाहिये ॥ ७० ॥


कच्छाविजयस्स जहा समासदी वण्णणा समुद्दिद्वा ।
सेसाणं विजयाणं एसव कमो वियाणाहि ॥ ७१

अर्थ: जिस प्रकार कच्छा विजयका संक्षेपसे वर्णन किया गया है उसी प्रकारका यही क्रम शेष विजयोंका भी जानना चाहिये ॥ ७१ ॥


रत्तारत्तोदेहि य वेयड्डुगणेण भाजिदो संतो ।
छक्खंडकच्छाविजयो समासदी होइ णायव्वो ॥ ७२

अर्थ: रक्ता-रक्तोदा और विजयार्ध गिरिसे विभागको प्राप्त होकर कच्छा विजय संक्षेपसे छह खण्डोंसे युक्त जानना चाहिये ॥ ७२ ॥


कच्छाखंडाण तहा विक्खंभो णीलवंतपासम्मि ।
सत्तसया तेत्तीसा छब्भागाविहीणबेकोसा ॥ ७३

अर्थ: नील पर्वतके पासमें कच्छाखण्डोंका विष्कम्भ सात सौ तेतीस योजन और छह भागोंसे हीन दो कोश है ॥ ७३ ॥


एगुत्तरि विणिसदा अट्ठसहस्सा य जोयणा णेया ।
पूणं च कला विट्ठा खंडाणं होइ आयामं ॥ ७४

अर्थ: उक्त खण्डोंका आयाम आठ हजार दो सौ इकहत्तर योजन और एक कला प्रमाण कहा गया है ॥ ७४ ॥


विजयाणं विक्खंभे सरीण विक्खंभ सोधइत्ताणं ।
सेसं त्रिभागलद्धं खंडाणं होइ विक्खंभं ॥ ७५

अर्थ: विजयोंके विष्कम्भमेंसे नदियोंके विष्कम्भको घटाकर शेषके तीन भाग करनेपर जो लब्ध आवे उतना [ २२१२ ८/१९ - ( ६ ३/४ + ६ ३/४ ) ÷ ३ = ७३३ १३/१९ यो. ] खण्डोंका विष्कम्भ होता है ॥ ७५ ॥


विजयाणं आयामे वेयद्धस्स य तहेव विक्खंभं ।
सुद्धावसेसदलद्धं खंडाणं होइ आयामं ॥ ७६

अर्थ: विजयोंके आयाममेंसे विजयार्धके विष्कम्भको कम करके शेषको आधा करनेपर खण्डोंका आयाम ( १६५९२ २/१९ - ५० ÷ २ = ८२७१ १/१९ यो. ) होता है ॥ ७६ ॥


अडुट्ठकोसंसहिया बारस बावीसजोयणसयाणि ।
कच्छाविजए दिट्ठो वेयदगिरिस्स आयामो ॥ ७७

अर्थ: कच्छा विजयमें वैताढ्य पर्वतका आयाम बाईस सौ बारह योजन और साढ़े तीन कोश प्रमाण कहा गया है ॥ ७७ ॥


पण्णासा विक्खंभो पणुवीस तुंग रयदपरिणामो ।
सक्कोसछावगाढो तिसेडिपेरिमंडिओ दिव्वो ॥ ७८

अर्थ: चांदीके परिणाम रूप और तीन श्रेणियोंसे मण्डित इस दिव्य पर्वतका विष्कम्भ पचास योजन, ऊंचाई पच्चीस योजन और अवगाढ़ एक कोश सहित छह ( ६ १/४ ) योजन है ॥ ७८ ॥


वेदड्ढपव्वतो पवरो विज्जाहरसुरगणाण आवासो ।
कच्छविजयम्मि मज्झे परिट्ठिओ होइ रमणीओ ॥ ७९

अर्थ: विद्याधरों व देवगणोंके आवास स्वरूप यह रमणीक श्रेष्ठ वैताढ्य पर्वत कच्छा विजयके मध्यमें स्थित है ॥ ७९ ॥


कुंदेंदुसंखवण्णो जिणभवणविहूसिओ परमरम्मो ।
वणवेदिहिं जुत्तो तोरणणिवहेहि कयसोहो ॥ ८०

अर्थ: उक्त पर्वत कुंद पुष्प, चन्द्र और शंखके समान वर्णवाला; जिनभवनसे विभूषित, अतिशय रमणीय, वनवेदियोंसे युक्त और तोरणसमूहोंसे शोभायमान है ॥ ८० ॥


पणवण्णा उत्तरदो दक्खिणदो तह य होंति पणवण्णा ।
णगराणि तत्थ णेया विज्जाहरपवररायाणं ॥ ८१

अर्थ: उसके ऊपर उत्तरकी ओर पचवन तथा दक्षिणकी ओर पचवन श्रेष्ठ विद्याधर राजाओंके नगर जानना चाहिये ॥ ८१ ॥


णव चेव होंति कूडा कंचणमणिरयणमंडिया दिव्वा ।
अभियोगसुराण तहा पासादा तत्थ णायव्वा ॥ ८२

अर्थ: उक्त पर्वतपर सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे मण्डित दिव्य नौ कूट तथा आभियोग्य सुरोंके प्रासाद जानना चाहिये ॥ ८२ ॥


पोक्खरिणिवाविपउरो णाणातरुलंकुलो मणभिरामो ।
वज्जंततूरणिवहो धयवडझुव्वंतरमणीओ ॥ ८३

अर्थ: ये प्रासाद प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे सहित, नाना वृक्षोंसे व्याप्त, मनोहर, बजते हुए वादित्रसमूहसे सहित, और फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे रमणीय हैं ॥ ८३ ॥


वेदड्ढसेलमूले चउदस तह जोयणा य सत्तसया ।
विक्खंभे णायव्वं कच्छविजयस्स खंडाणं ॥ ८४

छावठ्ठा छह्ठीसद पंच सहस्सा घणू वित्ती ।
दो चेव होंति हत्था सोलस तह अंगुला दिट्ठा ॥ ८५

अर्थ (गाथा 84 से 85): विजयार्ध पर्वतके मूलमें कच्छा विजयके खण्डोंका विष्कम्भ सात सौ चौदह योजन, पांच हजार छह सौ छयासठ धनुष, दो हाथ तथा सोलह अंगुल प्रमाण कहा गया है ॥ ८४-८५ ॥


समहियदियड्ढकोसा चउत्तीसा जोयणा णदी रत्ता ।
रत्तोदा वि य होंति य विक्खंभा रयदगिरिमूले ॥ ८६

अर्थ: विजयार्ध पर्वतके मूलमें रक्ता व रक्तोदा नदियोंमेंसे प्रत्येकका विष्कम्भ चौंतीस योजन और डेढ़ कोशसे कुछ अधिक है ॥ ८६ ॥ उक्त दोनों नदियां अपने अपने कुण्डके मुख


छउजोयणा सकोसा कुंडमुहे वित्थडाओ सरियाओ ।
वासट्ठा बेकोसा सीदाए पविसमाणीओ ॥ ८७

अर्थ: (उद्गमस्थान) में एक कोश सहित छह योजन ( ६ १/४ ) तथा सीता नदीमें प्रवेश करते समय बासठ योजन व दो कोश प्रमाण विस्तृत हैं ॥ ८७ ॥


छण्णउदा छहू सया जोयणसंखा सवंसपरिहीणा ।
सीदावरसरितीरे कच्छविजयस्स विक्खंभो ॥ ८८

अर्थ: उत्तम सीता नदीके तीरपर कच्छ विजयके [ खण्डोंका ] विष्कम्भ छठे भागसे हीन छह सौ छयानवे योजन प्रमाण है [ २२१२ १/६ - ( ६२ १/२ × २ ) ÷ ३ = ६९५ ५/६ यो. ] ॥ ८८ ॥


णीलँगिरिस्स दु हेट्ठा कुंडाणि हवंति सलिलपुण्णाणि ।
वणवेदियँजुत्ताणि य तोरणद्वारेहि रम्माणि ॥ ८९

अर्थ: नील पर्वतके नीचे वनवेदियोंसे युक्त और तोरणद्वारोंसे रमणीय जलसे परिपूर्ण कुण्ड हैं ॥ ८९ ॥


कुंडाणं णायव्वा विक्खंभायाम जोयणपमाणा ।
बासट्ठा बे कोसा दसावगाहा समुद्दिद्वा ॥ ९०

अर्थ: कुण्डोंका विष्कम्भ व आयाम बासठ योजन दो कोश और अवगाह दश योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ ९० ॥


रत्ता रत्तोदा वि य णीसरिदूण महंतकुंडादो ।
संकुडिदत्तं पत्ता वेअड्डगुहासु पविसंति ॥ ९१

अर्थ: रक्ता और रक्तोदा नामक वे नदियां विशाल कुण्डोंसे निकल कर संकुचित होती हुई विजयार्धकी गुफाओंमें प्रवेश करती हैं ॥ ९१ ॥


वेदड्डगुहाण तहा दाराण वियाण वित्थडायामा ।
उच्छेहा तह जोयण बारस पण्णास अट्ठेव ॥ ९२

अर्थ: विजयार्धकी उन गुफाओंके द्वारोंका विस्तार, आयाम तथा उत्सेध क्रमसे बारह, पचास और आठ योजन प्रमाण है ॥ ९२॥


परिहाणिवड्डिरहियगुहाणं मज्झेसु होंति सरियाओ ।
अट्ठेव दु वित्थिण्णा सव्वत्थ समा समुद्दिद्वा ॥ ९३

अर्थ: हानि-वृद्धिसे रहित उन गुफाओंके मध्यमें उक्त नदियां सर्वत्र समान रूपसे आठ योजन विस्तीर्ण कही गई हैं ॥ ९३ ॥


वेअड्डमज्झभागे दो दो सरियाओ तेसु पविसंति ।
रत्तारत्तोदेसु य उम्मग्गणिमग्गणामाओ ॥ ९४

अर्थ: विजयार्धके भीतर उन्मग्ना और निमग्ना नामक दो दो नदियां उन रक्ता-रक्तोदा नदियोंमें प्रवेश करती हैं ॥ ९४ ॥


कुंडेहि णिग्गदाओ दो दो जोयण हवंति दीहाओ ।
वरचक्कवट्टिणिम्मियसंकमसोहंतकूलाओ ॥ ९५

वरतोरणजुत्ताओ कंचणवेदीहि परिविडाओ दु ।
वणसंडभूसियाओ मणिमयसोवाणणिवहाओ ॥ ९६

अर्थ (गाथा 95 से 96): अपने अपने कुण्डसे निकलती हुई वे नदियां दो दो योजन दीर्घ, श्रेष्ठ चक्रवर्तियोंसे निर्मित उत्तम पुलोंसे शोभायमान तीरोंवाली, उत्तम तोरणोंसे युक्त, सुवर्णमय वेदियोंसे वेष्टित, वनखण्डोंसे भूषित और मणिमय सोपानसमूहसे संयुक्त हैं ॥ ९५-९६ ॥ रक्ता और


रत्तारत्तोदाओ णीसरितूणं गिरस्स गब्भादो । तोरणद्वारेहिं तहा गंतूणं दक्खिणमुहेण ॥ ९७

चोद्दसणदीहि सहिया सहस्सगुणिदाहि विमलसलिलाहिं । तोरणद्वारेहिं तहा सीदासलिलं अणुविसंति ॥ ९८

अर्थ (गाथा 97 से 98): रक्तोदा नदियां नील पर्वतके मध्यसे निकल कर तोरणद्वारोंसे दक्षिणकी ओर जाकर निर्मल जलवाली चौदह हजार नदियोंसे संयुक्त होती हुई तोरणद्वारोंसे सीता नदीके जलमें प्रवेश करती हैं ॥ ९७-९८ ॥


चउणउदिजोयणाणि य पादविहूणाणि तुंगसिहराणि । तोरणदाराणि तहा कंचणमणिरयणणिविट्ठाणि ॥ ९९

अर्थ: सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके समूह रूप वे तोरणद्वार उन्नत शिखरसे युक्त होकर एक पादसे कम चौरानबै ( ९३ ३/४ ) योजन ऊंचे हैं ॥ ९९ ॥


बासट्ठिजोयणाणि य बेकोसा होंति णायव्वा । तोरणदाराण तहा आयामं जिणवरुद्दिट्ठं ॥ १००

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्से उपदिष्ट उक्त तोरणद्वारोंका आयाम दो कोश अधिक बासठ योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १०० ॥


विक्खंभा वि य णेया जोयण अट्ठा हवंति णायव्वा । देहलितलेहिं ताओ सरियाओ ताणं पविसंति ॥ १०१

अर्थ: उक्त तोरणोंका विष्कम्भ आठ योजन प्रमाण जानना चाहिये । वे नदियां उनके देहलितलोंसे सीता नदीमें प्रवेश करती हैं ॥ १०१ ॥


तोरणदारेसु तहा देवाणं तेसु होंति नगराणि । बहुभवणसंकुलाणि दु मणिकंचणरयणणिविट्ठाणि ॥ १०२

उज्जाणभवणकाणणपोक्खरिणीवाविएहि रम्माणि । जिणभवणमंडियाणि य गोउरदाराणि णायव्वा ॥ १०३

अर्थ (गाथा 102 से 103): उन तोरणद्वारोंके ऊपर बहुतसे भवनोंसे युक्त; मणि, सुवर्ण एवं रत्नसमूहसे सहित; उद्यान, भवन, वन, पुष्करिणी एवं वापियोंसे रमणीय; जिनभवनोंसे मण्डित, और गोपुरद्वारोंसे संयुक्त देवोंके नगर जानना चाहिये ॥ १०२-१०३ ॥


मागधनामो दीवो वरतणुदीवो पभासदीवो य । तिण्णेदे वरदीवा कच्छाविजयस्स णायव्वा ॥ १०४

अर्थ: कच्छा विजयके मागध नामक द्वीप, वरतनु द्वीप और प्रभास द्वीप, ये तीन उत्तम द्वीप जानना चाहिये ॥ १०४ ॥


रत्तारत्तोदेहि य अंतरिदाओ हवंति ते दीवा । मणिकंचणरयणमया वरवेदीपरिउडा रम्मा ॥ १०५

वरतोरणेहिं जुत्ता णाणापासादसंकुला रम्मा । सीदाए णायव्वा तडेसु ते होंति वरदीवा ॥ १०६

अर्थ (गाथा 105 से 106): वे द्वीप रक्ता-रक्तोदासे अन्तरित; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम रूप; उत्तम वेदियोसे वेष्टित, रमणीय, उत्तम तोरणोंसे युक्त और नाना प्रासादोंसे व्याप्त होते हुए सीताके तटोंपर स्थित जानना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥


णाणातरुवरणिवहा जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । पोक्खरिणिवाविपउरा सुरगणिसुरसंकुला रम्मा ॥ १०७

अर्थ: उक्त द्वीप श्रेष्ठ नाना वृक्षसमूहोंसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, अतिशय रमणीय, प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे संयुक्त तथा देवांगनाओंके स्वरोंसे व्याप्त होते हुए रमणीय हैं ॥१०७॥


बहुअच्छरपरियरिया हवंति सव्वेसु तेसु सुरराया । मागधवरतणुणामो पभासणामेण बोद्धव्वा ॥ १०८

अर्थ: उन द्वीपोंमें बहुतसी अप्सराओंसे वेष्टित मागध, वरतनु और प्रभास नामक अधिपति देव जानना चाहिये ॥ १०८ ॥


दो मेच्छाणं खंडा आरियखंडो य होंति बोद्धव्वा । सीदासमीवदेसो णिद्दिष्ट्ठो कच्छविजयस्स ॥ १०९

अर्थ: कक्षा विजयका जो प्रदेश सीता नदीके समीपमें है उसमें दो म्लेच्छखण्ड और एक आर्यखण्ड जानना चाहिये ॥ १०९ ॥


णाहलपुक्किंदबब्बरसबरकिरायाण सिंहलादीणं । मेच्छाण सेसखंडा णिलीणा णीलवंतस्स ॥ ११०

अर्थ: उक्त विजयका जो प्रदेश नील पर्वतकी ओर स्थित है उसमें शेष तीन खण्ड नाहल, पुक्किन्द, बर्बर, शबर, किरात और सिंहल आदिक म्लेच्छोंके हैं ॥ ११० ॥


खेमापुराहिवइया चक्कहरा सुरसहस्सपरिवारा। चउसट्ठिलक्खणधरा समचउररसरीरसंठाणा ॥ १११

वरवज्जरिसहवइरयणारायणअत्थिबंधणसरीरा। संपुण्णचंदवयणा णीलुप्पलसुरहिणीसासा ॥ ११२

मत्तगयगमणलीला करिवरकरथोरदीहभुयदंडा। भाणू व्व तेयवंता सुरवइ इव भोगसंपण्णा ॥ ११३

कुसुमाउह व्व सुभगा धणवइ इव दाणविविहवैसारेण। सायर इव अक्खोहा धीरत्ते तह य मेरु व्व ॥ ११४

अर्थ (गाथा 111 से 114): क्षेमापुरके अधिपति चक्रवर्ती हजारों देवोंके परिवारसे सहित, चौंसठ लक्षणोंके धारक, समचतुरस्रशरीरसंस्थानसे युक्त, वज्रवृषभनाराच रूप अस्थिबन्धन (संहनन) से युक्त शरीरवाले, सम्पूर्ण चन्द्रके समान मुखसे सहित, नीलोत्पलके सदृश सुगन्धित निश्वाससे संयुक्त, मत्त गजके समान लीलासे गमन करनेवाले, उत्तम हाथीके शुण्डादण्डके समान दीर्घ भुज-दण्डोंसे सहित, सूर्यके समान तेजस्वी, इन्द्रके समान भोगोंसे सम्पन्न, कामदेवके समान सुन्दर, दान-विभवकी श्रेष्ठतासे कुबेरके सदृश, समुद्रके समान गम्भीर तथा धीरतामें मेरुके समान होते हैं ॥ १११-११४ ॥


ते ते महानुभावा विजयं कुव्वंत वसुमहं सयलं। दक्षिणमुहेण चलिया अमराणं उवरि सरिद्दीवे ॥ ११५

अर्थ: उक्त वे चक्रवर्ती महानुभाव समस्त पृथिवीको वशमें करनेके लिये दक्षिणकी ओर स्थित देवोंके नदी सम्बन्धी द्वीपोंमें जाते हैं ॥ ११५ ॥


गंतूण दीवणियडं करणं काऊण ठाणवइसाहं । तह अप्फालइ धणुहं जह अमरा संकिया जाया ॥ ११६

अर्थ: द्वीपोंके निकट जाकर वे महानुभाव वैशाखस्थान आसनको करके धनुषको कान तक ऐसा खींचते हैं कि जिससे देव शंकित हो जाते हैं ॥ ११६ ॥


धीरेण तेण मुक्का धणुबाणागमणेहि हत्थेहिं । पवरसरा संपत्ता सुराण असुरान वरगेहं ॥ ११७

अर्थ: उस साहसी चक्रवर्ती द्वारा धनुष-बाण युक्त हाथोंसे छोड़े गये उत्तम बाण सुर-असुरोंके उत्कृष्ट गृहको प्राप्त होते हैं ॥ ११७ ॥ चक्रवर्तियोंके नामसे


बारह जोयण गंतूं सरा हु णिवडंति चक्कवट्टीणं ।
णामेण अमोघसरा चक्कीणं णामसाहीणा ॥ ११८

अर्थ: अंकित वे चक्रवर्तियोंके अमोघ नामक बाण बारह योजन जाकर नीचे गिरते हैं ॥ ११८ ॥


अट्ठाणम्मि य पडियं बाणं दट्टूण सुरवरा खुहिया ।
मागधव रतणुणामा पभासदीवाहिवा सव्वे ॥ ११९

अर्थ: आस्थान (आंगन) में गिरे हुए बाणको देख कर मागध, वरतनु और प्रभास द्वीपोंके अधिपति सब देवगण क्षोभको प्राप्त होते हैं ॥ ११९ ॥


णाऊण चक्कवहिं देवगणा विविधरयणवत्थेहिं ।
पूजंति पहिट्टमणा पभासवरमागधादीया ॥ १२०

अर्थ: प्रभास, वरतनु और मागध आदिक देवगण चक्रवर्तीको जानकर हर्षितमन होते हुए विविध रत्नों और वस्त्रोंसे पूजते हैं ॥१२०॥


एवं काऊण वसं दक्खिणसुरखेयराण संव्वारं ।
उत्तरसुराण उबरिं संचळिया उत्तरमुहेण ॥ १२१

अर्थ: इस प्रकार दक्षिणके सब देवों व विद्याधरोंको वशमें करके उत्तरकी ओरसे उत्तरके देवोंके ऊपर आक्रमण करनेके लिये जाते हैं ॥१२१॥


वेदड्ढगिरीमूलं नावासेऊण सव्ववरसेण्णं ।
चक्काउहो महप्पा अच्छइ दिब्वाणुभावेण ॥ १२२

अर्थ: चक्र रत्न रूप आयुधके धारक चक्रवर्ती महात्मा विजयार्ध पर्वतके मूलमें सब उत्तम सैन्यको ठहराकर दिव्य प्रभावसे स्थित रहते हैं ॥ १२२ ॥


सेनाबई वि धीरो गहिऊणं रयणदंडं पजसंतं ।
चडिऊण अस्सरयणं वेदड्ढसमीवमल्लिहइ ॥ १२३

अर्थ: धीर सेनापति भी जाज्वल्यमान दण्ड-रत्नको ग्रहण करके अश्व-रत्नपर आरूढ़ हो विजयार्ध पर्वतके समीप जाता है ॥ १२३ ॥


दुक्खित्तु तिमिसदारं पहुणइ दंडेण रयणणिवहेण ।
सुग्घडइ तं दुवारं रयणपहावेण हयमत्तो । १२४

अर्थ: वह तिमिस्र गुफाके द्वारपर पहुंच कर रत्नोंके समूह रूप दण्ड-रत्नसे उसे ठोकर मारता है। ठोकर मात्रसे वह द्वार रत्नके प्रभावसे सहज ही खुल जाता है ॥१२४॥


वेगेण पुणो गच्छइ सेनाबइ चक्कवट्टिवरसेण्णं ।
सेणो वि ताम अच्छइ जाम गुहा सीयला होइ ॥ १२५

अर्थ: तब सेनापति शीघ्र ही फिरसे चक्रवर्तीकी उत्तम सेनाके पास पहुंच जाता है। सेना भी जब तक गुफा शीतल होती है तब तक वहीं स्थित रहती है ॥ १२५ ॥


छम्मासेण वरगुहा सीयलभावं हवेदि णादव्वा ।
अवसेससव्वकालं अग्गीओ अहियउण्हयरा ॥ १२६

अर्थ: वह उत्तम गुफा छह मासमें शीतलताको प्राप्त होती है, शेष सब कालमें अग्निसे अधिक उष्ण रहती है ॥ १२६॥


सेण्णं अणोरपारं पविसित्ता जाइ वरगुहामज्झे ।
पणुवीस जोयणाई गंतूणं तत्थ बीसमइ ॥ १२७

अर्थ: पश्चात् वह ओर छोर रहित अति विस्तीर्ण सेना उस उत्तम गुफाके मध्यमें प्रविष्ट होकर जाती है और पच्चीस योजन जाकर वहां रुक जाती है ॥ १२७ ॥ जहां उन्मग्नजला


डम्मग्गणिम्मग्गजला सरियाओ जत्थ होंति निद्दिठ्ठा । तहि आवासइ सेण्णं परदो ण तरिज्जदे गंतुं ॥ १२८

अर्थ: और निमग्नजला नदियां निर्दिष्ट की गई हैं वहां सेनाको ठहरा देते हैं, क्योंकि, इससे आगे जानेके लिये वह सैन्य समर्थ नहीं होता ॥ १२८ ॥


वेगेण वहइ सरिया उभयतडे पूरिऊण सलिलेण । सेण्णो वि तह विसण्णो अच्छइ चिंताउरो लोओ ॥

अर्थ: जलसे उभय तटोंको पूर्ण करके नदी वेगसे बहती है । ऐसी अवस्थामें सेना व सब जनसमुदाय खिन्न एवं चिन्तातुर होकर स्थित रह जाता है ॥ १२९ ॥


ण बि को वि जाणइ णरो गमणोवायं णदिस्स परतीरं । मोत्तूण चक्कवट्टी तक्खगरयणो य ते दोण्णि ॥

अर्थ: चक्रवर्ती और तक्षक रत्न, इन दोको छोड़कर कोई भी मनुष्य नदीके उस पार जानेके उपायको नहीं जानता ॥ १३० ॥


वड्ढइरयणेण पुणो महंतं जंतं तु संकमं बद्धं । तेण वरसंकमेण य खंदावारो समुत्तरिओ ॥ १३१

अर्थ: फिर बढ़ई रत्नके द्वारा जो वह विशाल पुल बांधा जाता है उस उत्कृष्ट पुलपरसे सब सेना पार हो जाती है ॥ १३१ ॥


तत्तो दु संकमादो पणुवीसं जोयणाणि गंतूणं । सेण्णं णीसरदि पुणो उत्तरद्वारेण दिव्वेण ॥ १३२

अर्थ: उस पुलसे पच्चीस योजन जाकर वह सैन्य दिव्य उत्तर द्वारसे निकलता है ॥ १३२ ॥


सेण्णं णीसरिदूणं आवासइ म्लेच्छखंडमज्झम्मि । मिच्छणारिंदा य पुणो सेणं दट्ठूण संभंता ॥ १३३

अर्थ: सेना गुफासे निकल कर म्लेच्छखण्डके मध्यमें ठहरा दी जाती है । उस सेनाको देख कर म्लेच्छ राजा घबड़ा जाते हैं ॥ १३३ ॥


कुलदेवदाण पासं गंतूणं विण्णवेंति ते मिच्छा । सेण्णस्स दु आगमणं सोऊण य ते बि परिकुविवा ॥

अर्थ: वे म्लेच्छ राजा कुलदेवताओंके पास जाकर विनती करते हैं । वे भी सैन्यके आगमनको सुनकर कोपको प्राप्त होते हैं ॥ १३४ ॥


मेघमुहणामदेवो आगंतूणं करेदि उवस्सग्गं । णाणाविहेहिं बहुलो वरसादी घोररूवेहिं ॥ १३५

अर्थ: मेघमुख नामक देव आकर नाना प्रकारके भयानक रूपोंसे वर्षा आदि रूप उपद्रव करता है ॥ १३५ ॥


णवि खुब्भइ सो सेण्णो बहुविहउवस्सग्गेहिं जाएहिं । चक्करयणवरस्स हु सद्धम्ममहप्पभावेण ॥ १३६

अर्थ: परन्तु वह सेना पुरुषपुंगव चक्रवर्तीके धर्म-पुण्यके महान् प्रभावसे उन बहुत प्रकारके उत्पन्न हुए उपसर्गों द्वारा क्षोभको प्राप्त नहीं होती ॥ १३६ ॥ फिर भी वह मेघमुख


पुणरवि विडम्बिऊणं अंजणगिरिसंणिभं महामेघं ।
वरिसइ सेणस्सुवरिं मुसलपमाणेहि धारेहिं ॥ १३७

अर्थ: देव अंजनागिरि जैसे महामेघकी विक्रिया करके सेनाके ऊपर मूसलके बराबर मोटी धाराओंसे वर्षा करता है ॥ १३७ ॥


मेघावरुद्धमयणं विज्जुल्लयाविप्फुरंतरमणीयं ।
गज्जंतघोरसद्दं फुडियं इव अंबरं सयलं ॥ १३८

अर्थ: उस समय मेघोंसे आच्छादित, विद्युत् रूप लताके प्रकाशसे रमणीय और मेघगर्जनके भयानक शब्दसे संयुक्त समस्त आकाश मानो फूट पड़ता है ॥ १३८ ॥


णंतररहियं वरिसइ दिणरयणी सत्त सत्त परिमाणं ।
जायं सायरसरिसं गिरिवरवुड्डंतबहुसलिलं ॥ १३९ ॥

अर्थ: उक्त देव सात सात दिन-रात्रि प्रमाण निरन्तर वर्षा करता है, जिससे समुद्रके समान बड़े बड़े पर्वतोंको डुबानेवाला जल उत्पन्न हो जाता है ॥ १३९ ॥


सलिलम्मि तम्मि उवरिं तरंतवरचम्मरयणट्ठियसेण्णं ।
उत्थियसिदादवत्तं विसायंपरिवज्जियं सव्वं ॥ १४०

अर्थ: उस जलके ऊपर तैरते हुए उत्तम चर्म-रत्नपर स्थित और धवल आतपत्र (छत्र-रत्न) को ऊपर किये हुए समस्त सेना विषादसे रहित होती है ॥ १४० ॥


विक्खंभायामेण य बारहजोयणपमाण णिद्दिट्ठं ।
चम्मरयणस्स संखा सिदादवत्तस्स तह चेव ॥ १४१

अर्थ: चर्म-रत्नका विष्कम्भ व आयाम बारह योजन प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है। यही प्रमाण धवल आतपत्रके विष्कम्भ व आयामका भी है ॥ १४१ ॥


चम्मरयणो ण बुड्डइ जलम्मि सेदादवत्तवररयणो ।
ण वि छिज्जइ ण वि भिज्जइ सहस्सदेवेहिं कयरक्खो ॥ १४२ ॥

अर्थ: हजार देवोंसे रक्षित चर्म-रत्न और धवल आतपत्र-रत्न न जलमें डूबते हैं और न छेदे-भेदे मी जाते हैं ॥ १४२ ॥


णाऊण य चक्कहरो देवेहि कओ सि घोरउवसग्गं ।
तह मुच्चइ वरवाणं जह देवा णिप्पभा जाता ॥ १४३ ॥

अर्थ: देवोंसे किये गये घोर उपसर्गको जानकर चक्रवर्ती ऐसा उत्तम बाण छोड़ते हैं जिससे वे देव निष्प्रभ हो जाते हैं ॥ १४३ ॥


बलविक्कममाहप्पं दट्ठूणं ते सुरा य मिच्छा य ।
आंगंतूणं सव्वे णरिंदइंदस्स पणमंति ॥ १४४

अर्थ: चक्रवर्तीके बल-विक्रमके माहात्म्यको देखकर वे सब देव और म्लेच्छ राजा आकर उसको प्रणाम करते हैं ॥ १४४॥


कण्णारयणेहि तहा हत्थीअस्साविपुहिं बहुएहिं ।
कंचणमणिरयणेहि य णरिंदइंदं पपुज्जंति ॥ १४५

अर्थ: इसके अतिरिक्त वे बहुतसे कन्या-रत्नोंसे, हाथी व अश्वादिकोंसे तथा सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे चक्रवर्तीकी पूजा करते हैं ॥ १४५ ॥


णाऊण सयमहुप्पं चक्कहरो माणगब्बिओ होइ ।
णवि को वि मज्झसरिसो पयावजुत्तो त्ति मण्णंतो ॥ १४६

अर्थ: मुझ जैसा प्रतापी दूसरा कोई भी नहीं है, ऐसा मानता हुआ अपने माहात्म्यको जानकर वह चक्रवर्ती मानसे गर्वको प्राप्त होता है


माणेण तेण राया महंतगव्वेण गव्विदो संतो । चिंतेदि सयमदप्पक्कित्तिं ठावेमि गिरिसिहरे ॥ १४७

अर्थ: चक्रवर्ती उस मानसे महान् गर्वको प्राप्त होकर अपने माहात्म्यकी कीर्तिको ऋषभाचलके शिखरपर स्थापित करनेका विचार करता है ॥ १४७ ॥


दट्ठूण रिसभसेलं णाणाचक्कीण णामसंछण्णं । चक्कहरो णरपवरो णिम्माणी तक्खणे जादो ॥ १४८

अर्थ: पुरुषोंमें श्रेष्ठ चक्रवर्ती ऋषभ शैलको नाना चक्रवर्तियोंके नामोंसे व्याप्त देखकर तत्क्षण मानसे रहित हो जाता है ॥ १४८ ॥


लुहिऊण एक्कणामं अप्पणणामं पि तत्थ लिहिऊण । साहित्ता तेखंडे तेणेव कमेण णीसरइ ॥ १४९

अर्थ: उन अनेक नामोंमेंसे एक नामको मिटाकर और वहां अपना भी नाम लिखकर तीन म्लेच्छखण्डोंको वशमें करनेके पश्चात् चक्रवर्ती उसी क्रमसे बाहर आता है ॥ १४९ ॥


गिरिगह अवरेण णिवो पुव्वदुवारेण तह य णीसरइ । वेडड्डस्स य णेया संखेवेण य समुद्दिद्वा ॥ १५०

अर्थ: चक्रवर्ती पश्चिम द्वारसे विजयार्ध पर्वतके भीतर प्रवेश करता है और पूर्व द्वारसे वापिस आता है, ऐसा संक्षेपसे निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥ १५० ॥


छहखंडकच्छविजयं साहित्ता सुरणरिंदसंजुत्तो । राया सेसेणसहिओ खेमाणयरिं अणुप्पत्तो ॥ १५१

अर्थ: छह खण्ड युक्त कच्छा विजयको जीत कर देवों व राजाओंसे संयुक्त चक्रवर्ती अपने सैन्य सहित क्षेमा नगरीको प्राप्त होता है ॥ १५१ ॥


विजओ हु समुद्दिद्वो खेमाणयरस्स चक्कवट्टीणं । सव्वाण ताण णेया एसेव कमो समासेण ॥ १५२

अर्थ: यह क्षेमा नगरीके चक्रवर्तियोंकी विजयका वर्णन किया गया है। यही क्रम संक्षेपसे सब चक्रवर्तियोंके विजयका जानना चाहिये ॥ १५२ ॥


बासवतिरीडचुंबियपयकमलजुगं महंतगुणजुत्तं । वरपउमणंदिणमियं सुवासुपूज्जं जिणं वंदे ॥ १५३

अर्थ: जिनका चरण-कमलयुगल इन्द्रके मुकुटसे चुम्बित है अर्थात् जिनके चरणोंमें इन्द्र मुकुटको रखकर नमस्कार करते हैं, जो महागुणोंसे युक्त हैं, और श्रेष्ठ पद्मनन्दिसे नमस्कृत हैं, उन वासुपूज्य जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ १५३ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे महाविदेहाहियारे कच्छाविजयवण्णणो णाम सत्तमो उद्देसो समत्तो ॥ ७ ॥

अट्ठमो उद्देसो

विमलजिणिंदं पणमिय विसुद्धवरणाणदंसणपईवं ।
पुव्वविदेहविभागं समासदो संपवक्खामि ॥ १

अर्थ: विशुद्ध व उत्तम ज्ञान-दर्शन रूप प्रदीपसे युक्त ऐसे विमल जिनेन्द्रको प्रणाम करके संक्षेपसे पूर्व विदेहके विभागका वर्णन करते हैं ॥ १ ॥


कच्छाणं पुव्वेणं गंतूणं तत्थ होइ वरसेलो ।
वणवेदिएहिं जुत्तो वरतोरणमंडिओ पवरो ॥ २

णामेण चित्तकूडो णाणापासादेसंकुलो दिव्वो ।
चडकूडतुंगसिहरो जिणभवणविहूसिओ रम्मो ॥ ३

बहुदेवदेविपुण्णो अस्समुहाकार तस्स संठाणो ।
वरकंचणपरिणामो मणिरयणविहूसिओ परमरम्मो ॥ ४

दक्खिणदिसेण तुंगो तण्णामादेवरायसाहीणो ।
णाणावरुवरगहणो पोक्खरणितडायसंजुत्तो ॥ ५

अर्थ (गाथा 2 से 5): कच्छाके पूर्वमें जाकर वहां वनवेदियोंसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित श्रेष्ठ पर्वत है। यह चित्रकूट नामका पर्वत नाना प्रासादोंसे व्याप्त, दिव्य, चार कूटोंसे युक्त उन्नत शिखरवाला, जिनभवनसे विभूषित, रमणीय, बहुत देव-देवियोंसे परिपूर्ण, घोड़ेके मुख जैसे आकारवाला, उत्तम सुवर्णके परिणाम रूप, मणि व रत्नोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, दक्षिण दिशाकी ओर उन्नत, अपने समान नामवाले देवराजके स्वाधीन, नाना तरुवरोंसे गहन और पुष्करिणी व तालाबोंसे संयुक्त है ॥ २-५ ॥


तत्तो णगादु पुव्वे देसो बहुगामसंकुलो होइ ।
णामेण तह सुकच्छा कच्छासमसरिस णिद्दिष्ट्ठो ॥ ६

अर्थ: उस पर्वतके पूर्वमें बहुत ग्रामोंसे व्याप्त सुकच्छा नामक देश है, जो कच्छाके सम-सदृश कहा गया है ॥ ६ ॥


छहखंडमंडिओ सो णगरायरखेडपट्टणसमग्गो ।
दोणामुहेहि रम्मो रयणद्दीवेहि संपुण्णो ॥ ७

रत्तारत्तोदेहि य वेदड्ढणगेण मंडिओ पवरो ।
पोक्खरणिवाविपउरो उवसायरसद्दगंभीरो ॥ ८

वरसालिव्वप्पउरो जवगोहुमउच्छुखेत्तसंपुण्णो ।
णाणादुमगणणिवहो वरपव्वदमंडिओ दिव्वो ॥ ९

अर्थ (गाथा 7 से 9): यह दिव्य देश छह खण्डोंसे मण्डित; नगर, आकर, खेटों एवं पट्टनोंसे परिपूर्ण; द्रोणमुखोंसे रमणीय, रत्नद्वीपोंसे सम्पूर्ण, रक्ता-रक्तोदा नदियों व विजयार्ध पर्वतसे मण्डित, श्रेष्ठ, प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे सहित, उपसमुद्रके शब्दसे गम्भीर, उत्तम शालि धान्यके खेतोंकी प्रचुरतासे युक्त; जौ, गेहूं एवं ईखके खेतोंसे सम्पूर्ण, नाना वृक्षजातियोंके समूहसे संयुक्त और उत्तम पर्वतोंसे मण्डित है ॥ ७-९ ॥


तस्स विजयस्स मज्झे खेमपुरी णाम पट्टणो पवरो ।
खेमापुरवित्थारो बहुभवणविहूसिओ रम्मो ॥ १०

अर्थ: सुकच्छा विजयके मध्यमें क्षेमपुरी नामकी श्रेष्ठ नगरी है। क्षेमापुरके समान विस्तारवाली यह रमणीय नगरी बहुत भवनोंसे विभूषित है ॥ १० ॥


खेमपुररायधाणी बारहणवयोजणा समुद्दिट्ठा। आयामा विक्खंभा मणियमयपासादसंछण्णा ॥ ॥ ११

अर्थ: मणिमय प्रासादोंसे युक्त क्षेमपुरी राजधानीका आयाम व विष्कम्भ क्रमसे बारह और नौ योजन प्रमाण कहा गया है ॥ ११ ॥


बारहसहस्स रथ्या सहस्सवरगोउरा रमणचित्ता। तावद्धेचउक्कणिवहा तदद्धखडकी समुद्दिट्ठा ॥ १२

अर्थ: इस राजधानीमें बारह हजार रथमार्ग, रत्नोंसे विचित्र एक हजार गोपुर, इतने ही चतुष्पथ और इससे आधी अर्थात् पांच सौ खिड़कियां कही गई हैं ॥ १२ ॥


णंदणवणसंछण्णा जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । वप्पिणतलायवावीपोक्खर णिविराइया दिव्वा ॥ १३

णरणारिएहिं पुण्णां विण्णाणवियक्खणेहिं सुभगेहि । मुणिगणणिवहेहि तहा दंसणणाणोवजुत्तेहि ॥ १४

अर्थ (गाथा 13 से 14): उक्त नगरी नन्दनवन जैसे वनोंसे व्याप्त, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय; वप्पिण, तालाब, वापी एवं पुष्करिणियोंसे विराजित; दिव्य, विशेष ज्ञानवान् चतुर व सुन्दर नर-नारियोंसे परिपूर्ण, तथा दर्शन एवं ज्ञान रूप उपयोगोंसे युक्त ऐसे मुनिगणोंके समूहोंसे परिपूर्ण है ॥ १३-१४ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं होइ णदी गहवई त्ति णामेण । अट्ठावीससहस्साणदीहि परिवेडिया रम्मा ॥ १५

अर्थ: उसके पूर्वमें जाकर अट्ठाईस हजार नदियोंसे वेष्टित रमणीय ग्रहवती नामकी नदी है ॥ १५ ॥


कंचणसोवाणजुदा सुयंधसलिलेण पूरिया दिव्वा । णिज्झरझरंतसद्दा पवणा हयडम्मिररमणीया ॥ १६

वणवे दिएहि जुत्ता मणितोरणमंडिया मणभिरामा । दक्खिणमुहेण गंतुं सीयासलिलं पविसई सरिया ॥ १७

अर्थ (गाथा 16 से 17): सुवर्णमय सोपानोंसे युक्त, सुगन्धित जलसे पूरित, दिव्य, निर्झरोंके झर-झर शब्दसे संयुक्त, पवनसे ताड़ित तरंगोंसे रमणीय, वनवेदियोंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित और मनको अभिराम ऐसी वह नदी दक्षिणमुखसे जाकर सीता नदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ १६-१७ ॥


तत्तो पुव्वेण पुणो होइ महाकच्छ जाणवओ रम्मो । धण्णइड्ढगामणिवहो णयरायरमंडिओ विउलो ॥ १८

रत्तारत्तोदेहि य वेदड्ढेण य कओ महासीमो । छहखंडमंडिओ सो मडंबखेडायरसिरीओ ॥ १९

बहुरयणदीवणिवहो [ पट्टणदोणामुहेहि संछण्णो। उवजलणिहिसंजुत्तो कव्वडसंवाहसंपुण्णो ॥ २०

अर्थ (गाथा 18 से 20): सुकच्छाके पूर्वमें महाकच्छा नामका रमणीय देश है। वह धनाढ्य ग्रामसमूहोंसे सहित, नगरों व आकरोंसे मण्डित, विपुल, रक्ता व रक्तोदा नदियों एवं विजयार्ध पर्वतसे की गई महा सीमासे संयुक्त, छह खण्डोंसे मण्डित; मटंब, खेट एवं आकरोंसे शोभायमान, बहुतसे रत्नद्वीपोंके समूहसे सहित, पट्टन व द्रोणमुखोंसे व्याप्त, उपजलधिसे संयुक्त और कर्वट एवं संवाहोंसे सम्पूर्ण है ॥ १८-२० ॥ उस देशमें


तत्थ य अरिट्ठनगरी णव बारस वित्थडा हवे दीहा । ] जोयणसंखुद्दिट्ठा मणिभवणसमाउला रम्मा ॥ २१

पंचसयखुल्लदारा तद्दुगुणा होंति गोउरदुवारा। तत्तियमेत्तचउक्का तब्यारससंगुणा रच्छा ॥ २२

अर्थ (गाथा 21 से 22): अरिष्ट नगरी है जो नौ योजन विस्तृत, बारह योजन दीर्घ, मणिमय भवनोंसे व्याप्त, रमणीय, पांच सौ क्षुद्र द्वारोंसे सहित, इससे दूने गोपुरद्वारोंसे संयुक्त, इतने ही अर्थात् एक हजार चतुष्पथोंसे युक्त, और उनसे बारहगुणे रथमार्गोंसे परिपूर्ण है ॥ २१-२२ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं णिज्जंतसुवण्णसंणिभो सेलो। णामेण पडमकूडो जिणभवणविहूसिओ होइ ॥ २३

वणवेदिहिं जुत्तो वरतोरणमंडिओ मणभिरामो। चत्तारिकूडसहिओ तण्णामादेवसाहीणो ॥ २४

पोक्खरणिवाविपउरो बहुविहपासादसंकुलो रम्मो। णाणातरुवरनिवहो तुरंगकंठो व्व रमणीओ ॥ २५

अर्थ (गाथा 23 से 25): उसके पूर्वमें जाकर खूब तपाये हुए सुवर्णके समान पद्मकूट नामक पर्वत है। यह पर्वत जिन-भवनसे विभूषित, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, चार कूटोंसे सहित उसके (अपने) नामवाले देवके स्वाधीन, पुष्करिणी व वापियोंकी प्रचुरतासे संयुक्त, बहुत प्रकारके प्रासादोंसे व्याप्त, रमणीय, नाना वृक्षोंके समूहसे युक्त और घोड़ेके कंठके समान होता हुआ रमणीय है ॥ २३-२५ ॥


गंतूण तदो पुव्वे होइ तहीं कच्छकावदी देसो। संकिट्ठुद्धवसीमो बहुगामसमाउलो मुदिदो ॥ २६

णाणाजणवदणिबिडो अट्ठारसदेसभाससंजुत्तो। गयरहतुरंगणिवहो णरेणारिसमाउलो रम्मो ॥ २७

वेयद्धपव्वदेण य रत्तारत्तोदएहिं कयसीमो। णयरायरसंछण्णो छक्खंडणिविट्ठरमणीओ ॥ २८

अर्थ (गाथा 26 से 28): उसके पूर्वमें जाकर कच्छकावती देश है। यह देश संक्लेशसे सीमाको प्राप्त हुए बहुत ग्रामोंसे व्याप्त, मुदित, नाना जनपदोंसे निबिड (सान्द्र) अठारह देशभाषाओंसे संयुक्त; गज, हाथी, रथ, एवं अश्वोंके समूहसे युक्त, नर-नारियोंसे परिपूर्ण, रम्य, वैताढ्य पर्वत और रक्ता-रक्तोदासे की गई सीमासे संयुक्त, नगरों व आकरोंसे व्याप्त और छह खण्डोंके निवेशसे रमणीय है ॥ २६-२८ ॥


तहिं होइ रायधाणी अरिट्ठपुरी णामदो समुद्दिट्ठा। पावारसंपरिवुडा णाणापासादसंछण्णा ॥ २९

बारहजोयणदीहा णवजोयणवित्थडा सुणेयव्वा। बारहसहस्सरच्छा सहस्सवरगोउरा तुंगा ॥ ३०

झुबंतधयवडया जिणभवणविहूसिया परमरम्मा। पंचसयखुल्लदारा चउक्क तद्गुण णिविट्ठा ॥ ३१

अर्थ (गाथा 29 से 31): उस देशमें अरिष्टपुरी नामकी राजधानी है। यह नगरी प्राकारसे वेष्टित, नाना प्रासादोंसे व्याप्त, बारह योजन दीर्घ, नौ योजन विस्तृत, बारह हजार रथमार्गोंसे सहित, उन्नत एक हजार उत्तम गोपुरोंसे संयुक्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे युक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, पांच सौ क्षुद्र द्वारोंसे सहित और इससे दूने अर्थात् एक हजार चतुष्पथोंसे संयुक्त कही गई है ॥ २९-३१ ॥


तस्सो पुव्वेण तहा दहवइणामा णदी समुद्दिठ्ठा ।
रुप्पिमयसोवाणजुदा वणवेदीभूसिदा दिव्वा ॥ ३२

मणितोरणेहि जुत्ता अट्ठावीसासहस्ससलिलसहिदा ।
सीयासलिलं पविसइ तोरणदारेण दिव्वेण ॥ ३३

अर्थ (गाथा 32 से 33): इसके पूर्वमें द्रहवती नामकी नदी कही गई है। यह नदी मणिमय सोपानोंसे युक्त, वन-वेदियोंसे विभूषित, दिव्य, मणिमय तोरणोंसे युक्त और अट्ठाईस हजार नदियोंसे सहित होती हुई दिव्य तोरणद्वारसे सीता नदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ ३२-३३ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं आवत्ता णाम जणवदो होइ ।
घणधण्णरयणकलिदो णयरायरमंडिओ पवरो ॥ ३४

छण्णवइगामकोडीहिं भूसिओ गोउलेहि संछण्णो ।
रत्तारत्तोदेहि य वेदद्दवणगेण कयसीमो ॥ ३५

वरसालिबप्पपउरो फणसंबमऊहकयलिसंछण्णो ।
पोक्खरिणिवाविपउरो सग्गविमाणच्छविं हरइ ॥ ३६

अर्थ (गाथा 34 से 36): उसके पूर्वमें जाकर आवर्ता नामका देश है। यह देश धन-धान्य व रत्नोंसे युक्त, नगरों व आकरोंसे मण्डित, श्रेष्ठ, छ्यानवै करोड़ ग्रामोंसे भूषित, गोकुलोंसे व्याप्त, रक्ता-रक्तोदा व वैताढ्य पर्वतसे की गई सीमासे संयुक्त, उत्तम शालि धान्यके प्रचुर खेतोंसे सहित; पनस, आम्र, महुआ एवं कदली वृक्षोंसे व्याप्त और पुष्करिणियों व वापियोंकी प्रचुरतासे युक्त होता हुआ स्वर्गविमानकी छविको फीकी करता है ॥ ३४-३६ ॥


देसम्मि होइ णयरी खग्गा णामेण दसदिसाविक्खादा ।
बहुभवणसंपरिउडा सुरिंदणगरी व पच्चक्खा ॥ ३७

अर्थ: उस देशमें बहुतसे भवनोंसे वेष्टित और दशों दिशाओंमें प्रसिद्ध जो खड्गा नामकी नगरी है वह साक्षात् सुरेन्द्रनगरी (अमरावती) के समान है ॥ ३७ ॥


तित्थयरपरमदेवा गणहरदेवा तहेव चक्कधरा ।
बलदेववासुदेवा मंडलिया संत्थ साहीणा ॥ ३८

अर्थ: उस नगरीमें देवाधिदेव तीर्थंकर, गणधरदेव, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव तथा मण्डलीक राजा स्वतंत्रतापूर्वक रहते हैं ॥ ३८ ॥


गंतूण तदो पुव्वे होइ तहा णलिणकूडगिरिपवरो ।
कंचणमओ विचित्तो चदुसिहरविहूसिओ रम्मो ॥ ३९

वणसंडेहि य रम्मो बेगाउयवित्थरेहि रम्मेहि ।
वरतोरणेहिं जुत्तो मणिमयवेदीहि परियरिओ ॥ ४०

चउकूडतुंगसिहरो वावीपोक्खरणिसंजुदो दिव्वो ।
तण्णामदेवसहिओ जिणभवणविहूसिओ परमो ॥ ४१

अर्थ (गाथा 39 से 41): उसके पूर्वमें जाकर नलिन-कूट नामक उत्तम पर्वत है। यह सुवर्णमय श्रेष्ठ पर्वत विचित्र, चार शिखरों (कूटों) से विभूषित, रम्य, दो कोश विस्तारवाले रम्य वनसमूहोंसे रमणीय, उत्तम तोरणोंसे युक्त, मणिमय वेदीसे वेष्टित, चार कूटोंसे युक्त उन्नत शिखरवाला, वापियों व पुष्करिणियोंसे संयुक्त, दिव्य, अपने नामवाले देवसे सहित और जिनभवनसे विभूषित है ॥ ३९-४१ ॥ उसकी पूर्व दिशामें


तत्तो इंददिसाए देसो णामेण मंगलावत्तो। विविधवरगामजुत्तो होइ महाजणवयाइण्णो ॥ ४२

धणधण्णसंपरिउड्डो णयरायरमंडिओ मणभिरामो । पट्टणमंडंबेपउरो रयणद्दीवेहिं कयसोहो ॥ ४३

रत्ताणदिसंजुत्तो रत्तोदावाहिणीसमाजुत्तो । वेदड्ढसिहरिमज्झो सोहइ सो जनवदो रम्मो ॥ ४४

अर्थ (गाथा 42 से 44): मंगलावर्त नामक देश है। यह रम्य देश विविध प्रकारके उत्तम ग्रामोंसे युक्त, महा जनपदोंसे व्याप्त, धन-धान्यसे सहित, नगरों व आकरोंसे मण्डित, मनको अभिराम, पट्टन व मटंबोंकी प्रचुरतासे युक्त, रत्नद्वीपोंसे शोभायमान, रक्ता और रक्तोदा नदियोंसे संयुक्त तथा मध्यमें स्थित वैताढ्य पर्वतसे सहित होता हुआ शोभायमान है ॥ ४२-४४॥


सहसेहिं चउदसेहि य णदीहि दुगुणाहि सुद्धकयसीमो । काणणवणेहि दिव्वो वविणवावीहि रमणीओ ॥४५

अर्थ: उस देशमें दुगुणित चौदह अर्थात् अट्ठाईस हजार नदियोंसे शोभायमान, कानन व वनोंसे दिव्य और बप्रिण एवं वापियोंसे रमणीय है ॥ ४५ ॥


देसम्मि तम्मि णयरी णामेण य तह य होइ मंजूसा । मणिकंचणघरनिवहा जिणभवणविहूसिया रम्मा ॥४६

तियतियुणा विक्खंभा छहगुणा जोयणा हु आयामा । कंचणपायारजुदा मणितोरणमंडिया दिव्वा ॥ ४७

अर्थ (गाथा 46 से 47): उस देशमें मंजूषा नामक नगरी है। यह नगरी मणि एवं सुवर्णमय गृहसमूहसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, रम्य, त्रिगुणित तीन अर्थात् नौ योजन विष्कम्भवाली, दुगुणित छह अर्थात् बारह योजन आयत, सुवर्णमय प्राकारसे युक्त, दिव्य और मणिमय तोरणोंसे मण्डित है ॥ ४६-४७॥


पुव्वेण तदो गंतूं पंकवदी णामदो णदी होइ । वणवेदियाहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ ४८

अट्ठावीसाहिं तहा सहस्सगुणिदाहि वेदिणिवहाहि । वरतोरणजुत्ताहि य खुल्लगसरियाहि संजुत्ता ॥ ४९

अर्थ (गाथा 48 से 49): उसके पूर्वमें जाकर पंकवती नामकी नदी है। यह नदी वनों व वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य और वेदियोंके समूहोंसे तथा उत्तम तोरणोंसे युक्त ऐसी अन्य अट्ठाईस हजार क्षुद्र नदियोंसे संयुक्त है ॥ ४८-४९ ॥


एसा विभंगसरिया णिस्सरिदूणं तहेव कुंडादो । सीदासलिलं पविसइ तोरणदारेण दिव्वेण ॥ ५०

अर्थ: यह विभंगा नदी उसी प्रकार कुण्डसे निकलकर दिव्य तोरणद्वारसे सीतानदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ ५० ॥


सत्तासीदा जोयण सयं च बेकोससमदिरेगं य । जाण विभंगणदीणं तोरणदाराण उच्चेहं ॥ ५१

अर्थ: विभंगा नदियोंके तोरणोंका उत्सेध एक सौ सतासी योजन और दो कोश जानना चाहिये ॥ ५१ ॥ उक्त तोरणद्वारोंका आयाम


पणुवीससमहिरेया जोयणसय होइ तह य आयामं । जोयणविक्खंभेण य तोरणदाराण परिसेक्खा ॥ ५२

अर्थ: एक सौ पच्चीस योजन और विष्कम्भ एक योजन है ॥ ५२ ॥


वरतोरणेसु णेया देवाणं तेसु होंति णगराणि । पासादसंकुलाणि य जिणभवणमयाणि सव्वाणि ॥ ५३

काणणवणजुत्ताणि य दीहियपोक्खरिणिवाविपउराणि । सुरसुंदरिणिवहाणि य वणवेदीतोरणमयाणि ॥ ५४

अर्थ (गाथा 53 से 54): उन उत्तम तोरणोंपर प्रासादोंसे व्याप्त देवोंके नगर हैं । सब नगर जिनभवनोंसे संयुक्त, कानन व वनोंसे युक्त; दीर्घिका, पुष्करिणी व वापियोंकी प्रचुरतासे सहित, सुरसुन्दरीयोंके समूहोंसे परिपूर्ण और बन, वेदी एवं तोरणोंसे युक्त हैं ॥ ५३-५४ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं णामेण य पुक्कला समुद्दिट्ठा । [देसो अणाइणिहणो छक्खंडविहूसिओ दिव्वो ॥ ५५

छण्णवदिकोडिएहिं गामेहिं समाउलो परमरम्मो । ] छव्वीससहस्सेहि य णगरेहि विहूसिओ पवरो ॥ ५६

खेड्डेहि मंडिओ सो सहस्स तह सोलसेहि दिव्वेहि । चउवीससहस्सेहि य कब्बडपवरेहि संछण्णो ॥ ५७

चत्तारिसहस्सेहि य मडंबनिवहेहि मंडिओ दिव्वो । वरपट्टणेहि जुत्तो अडदाळसहस्सगुणिदेहिं ॥ ५८

णवणवदिसहस्सेहि य बहुविहदोणामुहेहिं संजुत्तो । संवाहेहि य रम्मो चउदससहस्सगुणिदेहि ॥ ५९

मागधवरतणुवेहि य पभासदीवेण भूसिओ देसो । छप्पण्णासेहि तहा रयणादीवेहि कयसोहो ॥ ६०

अर्थ (गाथा 55 से 60): उसके पूर्वमें जाकर पुष्कला नामका देश कहा गया है । यह दिव्य देश अनादि-निधन, छह खण्डोंसे विभूषित, छान्नवै करोड़ ग्रामोंसे व्याप्त, अतिशय रमणीय, छन्बीस हजार नगरोंसे विभूषित, श्रेष्ठ, सोलह हजार दिव्य खेटोंसे मण्डित, चौबीस हजार श्रेष्ठ कर्वटोंसे व्याप्त, चार हजार मटंबोंके समूहसे मण्डित, दिव्य, अड़तालीस हजार उत्तम पट्टनोंसे युक्त, निन्यानबै हजार बहुत प्रकारके द्रोणमुखोंसे संयुक्त, चौदह हजार संवाहोंसे रमणीय; मागध, वरतनु एवं प्रभास द्वीपोंसे भूषित, तथा छप्पन रत्नद्वीपोंसे शोभायमान है ॥ ५५-६० ॥


देसम्मि होइ णगरी णामेण य ओसधि त्ति विक्खाया । कंचणपासायजुदा जिणभवणविहूसिया रम्मा ॥ ६१

पायारसंवरिड्डा वरतोरणमंडिया परमरम्मा । वित्थिण्णखादिजुत्ता वणखंडविहूसिया दिव्वा ॥ ६२

अर्थ (गाथा 61 से 62): इस देशमें औषधि नामसे विख्यात नगरी है । यह सुवर्णमय प्रासादोंसे युक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, रम्य, प्राकारसे वेष्टित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, विस्तीर्ण खातिकासे युक्त, वनखण्डोंसे विभूषित, दिव्य, बहुतसे भव्य


बहुभव्वजणसमिद्धा केवलणाणेप्पदीवमुणिवसहा । णाणामुणिगणपउरा धणधण्णसमिद्धकुलउण्णा ॥ ६३

अर्थ (गाथा 61 से 63): जनोंसे समृद्ध, केवलज्ञान रूप दीपकसे युक्त ऐसे श्रेष्ठ मुनियोंसे परिपूर्ण, नाना मुनिगणोंकी प्रचुरतासे सहित, और धन-धान्यसमृद्ध कुलोंसे पूर्ण है ॥ ६१-६३ ॥


गंतूण तदो पुव्वे होइ महापव्वदो मणभिरामो । णामेण एक्कसेलो कणयसिलाजालपरिणद्धो ॥ ६४

वरकमलगब्भगउरो अस्समुहागारसंठिओ रम्मो । सीदाणइम्मि तुंगो णीलसमीवे हवे हीणो ॥ ६५

वणखंडसंपरिउडो मणियमवरवेदिएहिं संजुत्तो । चदुकूडतुंगसिहरो जिणभवणविहूसिओ रम्मो ॥ ६६

वरतोरणसंछण्णो णाणापासादसंकुलो दिव्वो । तण्णामदेवसहिओ सुगंधगंधुद्धुरो पवरो ॥ ६७

अर्थ (गाथा 64 से 67): उसके पूर्वमें जाकर मनोहर एकशैल नामका महा पर्वत है । यह पर्वत सुवर्णशिलाओंके समूहसे वेष्टित, उत्तम कमलगर्भके समान गौर, घोड़ेके मुखके आकारसे स्थित, रमणीय, सीता नदीके तटपर उन्नत, नील पर्वतके समीपमें हीन, वनखण्डोंसे वेष्टित, मणिमय उत्तम वेदियोंसे संयुक्त, चार कूटोंसे युक्त उन्नत शिखरवाला, जिनभवनसे विभूषित, रम्य, उत्तम तोरणोंसे व्याप्त, नाना प्रासादोंसे वेष्टित, दिव्य, अपने जैसे नामवाले देवसे सहित, श्रेष्ठ और सुगन्धित गन्धसे व्याप्त है ॥ ६४-६७ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ महापुक्कलावदी विजओ । छहभागेहि विभत्तो पव्वदसरियाहि संजुत्तो ॥ ६८

गामाणुगामणिचिओ पट्टणदोणामुहेहि संछण्णो । कव्वडमंडवसहिओ रयणाकरमंडिओ दिव्वो ॥ ६९

रत्तारत्तोदेहि य वेयड्ढणगेण मंडिओ दिव्वो । वप्पिणतलायणिवहो णाणाविहधम्मधणणिचिओ ॥ ७०

पुंडुच्छुसालिपउरो गोहुंमजवमुग्गमाससंछण्णो । अयसितिलमसुरणिवहो जीरयं जूडेहि रमणीओ ॥ ७१

अर्थ (गाथा 68 से 71): उसके पूर्वमें जाकर महा पुक्कलावती देश है । यह देश छह भागोंसे विभक्त, पर्वत व नदियोंसे संयुक्त, ग्रामों व अनुग्रामोंसे परिपूर्ण, पट्टनों व द्रोणमुखोंसे व्याप्त, कर्वटों व मटंबोंसे सहित, रत्नाकरोंसे मण्डित, दिव्य, रक्ता-रक्तोदा नदियों एवं वैताढ्य पर्वतसे मण्डित, दिव्य, वप्रिण व तालाबोंके समूहसे परिपूर्ण, नाना प्रकार गुण संयुक्त धनसे सहित; पुंड्र (पौड़ा) ईख व शालि धानकी प्रचुरतासे सहित; गेहूँ, जौ, मूंग व उड़दसे व्याप्त; अलसी, तिल व मसूरके समूहसे संयुक्त और जीराके जूटोंसे रमणीय है ॥ ६८-७१ ॥


देसस्स तिलयभूदा णामेण य पुंडरीगिणी णयरी । बहुभव्वपुंडरीया जत्थ मणुस्सा परिवसंति ॥ ७२

अर्थ: इस देशकी तिलकभूत पुण्डरीकिणी नामकी नगरी है, जहां बहुतसे श्रेष्ठ भव्य जन निवास करते हैं ॥ ७२ ॥


कंचणपायारजुदा मणियमवरतोरणेहि रमणीया।
जलपुण्णखादिजुत्ता वणसंडविराइया दिव्वा ॥ ७३

वज्जिंदणीलमरगयकक्केयणपउमरायघरनिवहा।
कालागरुगंधुद्धा जिणभवणविहूसिया रम्मा ॥ ७४

अर्थ (गाथा 73 से 74): यह रमणीय नगरी सुवर्णमय प्राकारसे युक्त, मणिमय उत्तम तोरणोंसे रमणीय, जलपूर्ण खातिकासे युक्त, वनखण्डोंसे विराजित, दिव्य; वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन एवं पद्मराग मणिमय गृहमूहसे युक्त; कालागुरुकी गन्धसे व्याप्त और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ ७३-७४ ॥


तत्तो पुव्वदिसाए कणयमया वेदिया हवे णेया।
बेगाउयउब्विद्धा पंचेव धनुस्सया विउला ॥ ७५

वरपउमरायमरगयणाणाविहरयणजालकिरणोहा।
वज्जमयरयणमूला कोदंडसहस्सअवगाहा ॥ ७६

अर्थ (गाथा 75 से 76): उससे पूर्वकी ओर स्थित सुवर्णमय वेदिका जानना चाहिये । यह वेदिका दो कोश ऊंची, पांच सौ धनुष विस्तृत; उत्तम पद्मराग एवं मरकत आदि नाना प्रकारके रत्नजालके किरणसमूहसे संयुक्त, वज्र रत्नमय मूलभागसे सहित, तथा एक हजार धनुष प्रमाण अवगाहसे युक्त है ॥ ७५-७६ ॥


पुव्वेण होइ तत्तो देवारण्णं समुद्दतीरम्मि।
णाणातरुवरगहणं बहुभवणसमाउलं परमं । ७७

पुण्णायणायपउरं सुरतरुसत्तच्छदेहि संछण्णं।
चंपयअसोयकप्पूरबउलमंदारतहणिवद्धं ॥ ७८

अर्थ (गाथा 77 से 78): उसके पूर्वमें समुद्रके तीरपर देवारण्य नामका वन है। यह वन उत्तम नाना वृक्षोंसे गहन, बहुत भवनोंसे व्याप्त, श्रेष्ठ, पुन्नाग व नाग वृक्षोंकी प्रचुरतासे युक्त, कल्पवृक्ष व सप्तच्छद वृक्षोंसे व्याप्त; तथा चम्पक, अशोक, कर्पूर, बकुल, एवं मन्दार वृक्षोंके समूहसे संयुक्त है ॥ ७७-७८ ॥


तत्थ दु देवारण्णे पासादा होंति रयणपरिणामा।
वरवेदिएहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ ७९

पोक्खरिणवाविपउरा कीडासाला सभाघरा पवरा ।
उववादभवणरम्मा सोहणसाला विसाला य ॥ ८०

लंबंतकुसुममाला जिणभवणविहूसिया रम्मा।
कालागरुगंधड्ढा बहुकुसुमकयच्चण्णसणाहा ॥ ८१

अर्थ (गाथा 79 से 81): उस देवारण्यमें रत्नोंके परिणाम रूप जो प्रासाद हैं वे उत्तम वेदियोंसे युक्त, श्रेष्ठ तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, पुष्करिणियों व वापियोंकी प्रचुरतासे संयुक्त, श्रेष्ठ, क्रीड़ाशालाओं और सभागृहोंसे सहित, उपपादभवनोंसे रमणीय, विशाल, शोभनशालाओं (मैथुनशालाओं ?) से परिपूर्ण, लटकती हुई कुसुममालाओंसे युक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, रम्य, कालागुरुकी गन्धसे व्याप्त और बहुत कुसुमोंसे की गई सजावट सहित हैं ॥ ७९-८१ ॥


चदुसु वि दिसाविभागे रयणमया विप्फुरंतमणिकिरणा।
पासादा णायव्वा देवाणं आदरक्खाणं ॥ ८२

अर्थ: इनमें प्रकाशमान मणिकिरणोंसे सहित आत्मरक्ष देवोंके रत्नमय प्रासाद चारों ही दिशाओंमें स्थित जानना चाहिये ॥ ८२ ॥ दक्षिण दिशामें तीन


दक्खिणदिसेण णेया तिण्हं परिसाण तह य पासादा ।
पच्छिमदिसाविभागे सत्ताणीयाण पुण होंति ॥ ८३

अर्थ: परिषद देवोंके तथा पश्चिम दिशाविभागमें सात अनीक देवोंके प्रासाद जानना चाहिये ॥ ८३ ॥


किब्बिसदेवाण तहा होंति पुणो विविहरयणपासादा ।
अभिजोगसुराण तहा पासादा तत्थ णादव्वा ॥ ८४

अर्थ: यहाँ किल्विष तथा आभियोग्य जातिके देवोंके विविध रत्नमय प्रासाद हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८४ ॥


सम्मोहसुराण तहा देवारण्णम्मि होंति पासादा ।
कंदप्पाण सुराण पासादा होंति तत्थेव ॥ ८५

अर्थ: वहां देवारण्यमें सम्मोह सुरोंके भी प्रासाद हैं । कन्दर्प सुरोंके प्रासाद वहां ही हैं ॥ ८५ ॥


तत्तो दु दक्खिणदिसे गंतूणं होदि विविहतरुगहणं ।
अवरं देवारण्णं सीदाए दक्खिणतडम्मि ॥ ८६

अर्थ: उससे दक्षिणकी ओर जाकर सीता नदीके दक्षिण तटपर विविध वृक्षोंसे गहन दूसरा देवारण्य है ॥ ८६ ॥


तं बउलतिलयणिवहं पुण्णागणागपादवसणाहं ।
लवलीलवंगपउरं तमालदलसंकुलं रम्मं ॥ ८७

णारंगपणसणिवहं कयलीदुमणालिएरसंछण्णं ।
तंबूलवल्लिगहणं अइमुत्तलयाडल्लसिरियं ॥ ८८

अर्थ (गाथा 87 से 88): यह वन बकुल व तिलक वृक्षोंके समूहसे युक्त, पुन्नाग व नाग वृक्षोंसे सनाथ, लवली व लवंग वृक्षोंकी प्रचुरतासे सहित, तमालपत्रोंसे व्याप्त, रम्य, नारंग व पनस वृक्षोंके समूहसे संयुक्त, केला व नारियलके वृक्षोंसे व्याप्त, ताम्बूलकी बेलोंसे गहन और अतिमुक्त लताओंकी अतुल शोभासे युक्त है ॥ ८७-८८ ॥


तम्मि वणे णादव्वा णयराणि हवंति सयसहस्साणि ।
देवाणं णिद्दिट्ठा कंचणमणिरयणणिवहाणि ॥ ८९

अर्थ: उस वनमें देवोंके सुवर्ण एवं रत्नसमूहसे निर्मित लाखों नगर निर्दिष्ट किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८९ ॥


पायारपरिडडाणि य गोडरनिवहाणि होंति सव्वाणं ।
कंचणरयणमयाणि य णाणापासादपंतीणं ॥ ९०

अर्थ: बहुविध प्रासादोंकी सभी पंक्तियोंके गोपुर-समूह प्राकारोंसे वेष्टित तथा सुवर्ण और रत्नोंसे निर्मित हैं ॥ ९० ॥


णगरेसु तेसु णेया रायराणं होंति सव्वाणं ।
वर सत्त सत्त कच्छा सत्ताणीयाहि संजुत्ता ॥ ९१

अर्थ: उन नगरोंमें सब देवराजोंके सात अनीकोंसे संयुक्त सात सात कक्षायें हैं ॥ ९१ ॥


भाणूसेसिजदुवलसिद्धा तिण्णि य परिसा हवंति णादव्वा ।
अब्भंतरमज्झिमबाहिरा दु कमसो सुणेयव्वा ॥ ९२

अर्थ: भानु, शशि एवं जतु नामसे प्रसिद्ध क्रमशः अभ्यन्तर, मध्यम और बाह्य, ये तीन परिषद् जानना चाहिये ॥ ९२ ॥


तिण्णिंपरिसेहि सहिया तह य महादेविचउहि संजुत्ता ।
अच्छरकोडीहि तहा पदादिसणिवहेहि थुव्वंता ॥ ९३

अर्थ: तीन परिषदोंसे सहित, चार महा देवियोंसे संयुक्त, करोड़ों अप्सराओंसे सहित, पदातिसमूहोंसे स्तुत, सामानिकों


सामाणिएहि सहिया देवा तह आयरक्खाणिवहेहि ।
गणणातीदेहिं तहा अवसेससुरेहिं संजुत्ता ॥ ९४

सिंहासणमज्झगया सियचामरधुव्वमाणवरदेहा ।
सेदातवत्तणिवहा णाणाविहकेदुकायचिण्हा ॥ ९५

पजलंतमहामउडा णिम्मलमणिरयणकुंडलाभरणा ।
हारविराइयवच्छा केयूरविहूसियाबाहू ॥ ९६

कडिसुत्तकडयकंठा तुडियंगदवत्थभूसियसरीरा ।
वरपंचवण्णदेहा णीलुप्पलसुरहिणीसासा ॥ ९७

सम्मदंसणसुद्धा जिणवरमुणिवंदणुज्जया धीरा ।
पुण्णेण समुप्पण्णा देवारण्णम्मि वरदेवा ॥ ९८

अर्थ (गाथा 93 से 98): तथा आत्मरक्ष देवोंके समूहोंसे सहित, इनके अतिरिक्त शेष असंख्यात देवोंसे संयुक्त, सिंहासनके मध्यमें स्थित, धवल चामरोंसे वीज्यमान उत्तम देहसे संयुक्त, धवल आतपत्रसमूहसे युक्त, नाना प्रकारके केतुओं द्वारा किये गये चिह्नोंसे संयुक्त, चमकते हुए महा मुकुटसे शोभायमान, निर्मल मणिमय रत्नकुण्डलोंसे अलंकृत, हारसे विराजमान वक्षस्थलवाले, केयूरोंसे विभूषित बाहुओंसे सहित, कटिसूत्र, कटक, कंठा, त्रुटित (हाथका एक आभूषणविशेष), अंगद रूप आभरणों एवं वस्त्रोंसे भूषित शरीरवाले, उत्तम पांच वर्णोंसे युक्त देहके धारक, नीलोत्पलके समान सुगन्धित निश्वाससे युक्त, सम्यग्दर्शनसे शुद्ध, जिनेन्द्र व मुनियोंकी वन्दनामें उद्यत, तथा धीर ऐसे उत्तम देव पुण्यके प्रभावसे उस देवारण्यमें उत्पन्न होते हैं ॥९३-९८॥


देवारण्णम्मि तहा जिणिंदइंदाण होंति भवणाणि ।
कंचणरयणमयाणि य अणाइणिहणाणि बहुयाणि ॥ ९९

अर्थ: देवारण्यमें सुवर्ण एवं रत्नमय अनादि-निधन बहुतसे जिनेन्द्रभवन हैं ॥ ९९ ॥


तत्तो वरम्मि भागे होइ समुत्तुंगवेदिया दिव्वा ।
पंचधणुस्सयवित्थडा चत्तारिसहस्सउच्छेहा ॥ १०१

अर्थ: उससे आगेके भागमें पांच सौ धनुष विस्तृत और चार हजार धनुष ऊंची उन्नत दिव्य वेदिका है ॥ १०१ ॥


णाणामणिगणणिवहा विबुद्धवरकमलगब्भसंकासा ।
वज्जमया णिद्दिठ्ठा सहस्सधणुधरणिव्वगाहा ॥ १०२

अर्थ: नाना मणिगणोंके समूहसे सहित, विकसित उत्तम कमलके गर्भके सदृश और वज्रमय उस वेदिका अवगाह पृथिवीमें एक हजार धनुष प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १०२॥


गंतूण तदो अवरे वच्छा णामेण जणवदो होइ ।
सज्जणजणेहि भरिओ बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ १०३

अर्थ: इस देववनसे आगे विजय और वक्षार पर्वत आदिक तब तक जानना चाहिये जब तक अपर समुद्रका अन्त नहीं आता है ॥ १०० ॥ उसके पश्चिममें जाकर वत्सा नामक देश है । यह देश सज्जन जनोंसे परिपूर्ण, बहुत ग्रामोंसे युक्त, रम्य, धन-धान्य एवं रत्नोंके समूहसे सहित, संगीत व मृदंगके शब्द-निर्घोष-


धणधण्णरयणनिवहो संगीयमुयंगसद्दणिग्धोसो । णिच्चुच्छवेहिं जुत्तो सुरिंदलोगोवमो दिव्वो ॥ १०४

गंगासिंधूहि तहा वेअद्धपव्वएहि मंडिओ पवरो । पोक्खरणिवाविउद्दरो णाणादुमसंकुलो दिव्वो ॥ १०५

छब्भेयभागभिण्णो अज्जपुलिंदाण खंडसंजुत्तो । बहुणयरखेडणिवहो पट्टणदोणामुहसुसमग्गो ॥ १०६

अर्थ (गाथा 103 से 106): से संयुक्त, नित्य होनेवाले उत्सवोंसे परिपूर्ण, सुरेन्द्रलोककी उपमाको धारण करनेवाला, दिव्य, गंगा-सिन्धु नदियों तथा वैताढ्य पर्वतोंसे मण्डित, श्रेष्ठ, प्रचुर पुष्करिणी व वापियोंसे सहित, नाना वृक्षोंसे व्याप्त, दिव्य, छह भेद रूप भागोंमें विभक्त, आर्य और म्लेच्छोंके खण्डोंसे संयुक्त, बहुत नगरों एवं खेडोंके समूहसे सहित, तथा पट्टनों व द्रोणमुखोंसे परिपूर्ण है ॥१०३-१०६॥


विजयाम्मि तम्मि मज्झे होदि सुसीमा त्ति णामदो णयरी । वरवेदिपूहिं जुत्ता मणितोरणमंडिया दिव्या ॥

पप्फुल्लकमलकुवलयणीलुप्पल सुरहिकुसुमरिद्धीहि । पयरंतमच्छकच्छवविसालखादीहि संजुत्ता ॥ १०८

कंचणपासादजुदा जिणभवणविहूसिया मणभिरामा । बहुआवणसंछण्णा णाणाविहहट्टकयभूसा ॥ १०९

अर्थ (गाथा 107 से 109): उस देशके मध्यमें सुसीमा नामक नगरी है । यह नगरी उत्तम वेदिकाओंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, दिव्य; विकसित कमल, कुवलय व नीलोत्पल जैसे सुगन्धित कुसुमों रूप ऋद्धियोंसे तथा तैरते हुए मत्स्य एवं कछवाओंसे सहित ऐसी विशाल खातिकाओंसे संयुक्त, सुवर्णमय प्रासादोंसे युक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, मनको अभिराम, बहुतसी दूकानोंसे व्याप्त, तथा नाना प्रकारके हाटोंसे की गई सजावटसे सम्पन्न है ॥१०७-१०९॥


अवरेण तदो गंतूं होदि तिकूडो त्ति पब्वदो पवरो । कंचणमओ विचित्तो चउकूडविहूसिओ तुंगो ॥ ११०

वरवज्जरयणमूलो जिणभवणविहूसिओ महासिहरो । वरवेदिपूहिं जुत्तो मणितोरणमंडिओ दिव्वो ॥ १११

अर्थ (गाथा 110 से 111): उससे पश्चिममें जाकर त्रिकूट नामक श्रेष्ठ पर्वत है । यह दिव्य पर्वत सुवर्णमय, विचित्र, चार कूटोंसे विभूषित, उन्नत, उत्तम वज्ररत्नमय मूलभागसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, महा शिखरसे संयुक्त, उत्तम वेदियोंसे युक्त और मणिमय तोरणोंसे मण्डित है ॥११०-१११॥


णगराणि बहुविहाणि य देवाण हवंति सेलसिहरम्मि । कंचणरयणमएहि य पासादवरेहिं छण्णाणि ॥ ११२

अर्थ: इस शैलके शिखरपर सुवर्ण एवं रत्नोंसे निर्मित और श्रेष्ठ प्रासादोंसे व्याप्त देवोंके बहुत प्रकारके नगर हैं ॥११२॥


वरवेदिपूहिं जुत्ताणि ताणि वरतोरणेहि सहियाणि । णगराणि होंति तस्स दु तिकूडणामस्स अमरस्स ॥ ११३

अर्थ: उत्तम वेदियोंसे युक्त और तोरणोंसे सहित वे नगर उस त्रिकूट नामक देवके हैं ॥११३॥ उससे पश्चिम दिशामें जाकर रम्य सुवत्सा नामक देश है ।


गंतूण पच्छिमदिसे होइ सुवच्छो त्ति जणवदो रम्मो ।
धणधण्णरयणणिवहो बहुगामसमाउलो परमो ॥ ११४

गंगासिंधूहिं तहा वेढड्ढवणेण सुट्ठु कयसीमो ।
छक्खंडमणाभिरामो पसुदियपक्कीलिदो देसो ॥ ११५

पुंडुच्छुवाडउव्वरो सुगंधसालीहि पूरियपदेसो ।
पूगफलरुक्खणिवहो तंबूललयाउरुसिरीओ ॥ ११६

अर्थ (गाथा 114 से 116): यह देश धन-धान्य व रत्नसमूहसे सहित, बहुत ग्रामोंसे युक्त, श्रेष्ठ, गंगा-सिन्धु नदियों तथा वैताढ्य पर्वतसे की गई सुन्दर सीमासे सहित, छह खण्डोंसे मनोहर, प्रमोदप्राप्त जनोंकी क्रीड़ासे सहित, पुण्ड्र (पौंडा) एवं ईखके खेतोंकी प्रचुरतासे युक्त, सुगन्धित शालि धान्योंसे पूरित प्रदेशवाला, सुपारीके वृक्षसमूहसे सहित, और ताम्बूल लताओंकी अनुपम शोभासे सम्पन्न है ॥ ११४-११६ ॥


तस्स विजयस्स णेया णामेण य कुंडला हवे णगरी ।
बारहजोयणदीहा णवजोयणवित्थडा दिव्वा ॥ ११७

बारहसहस्सरच्छा सहस्स वद्धं होति वरचउक्का व ।
गोउरसहस्सणिवहा तद्धद्धवरतोरणा रम्मा ॥ ११८

वज्जिंदणीलमरगयकक्केयणपउमरायपासादा ।
छुब्भंतधयवडया। जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ ११९

अर्थ (गाथा 117 से 119): कुण्डला नामक नगरी उस देशकी राजधानी जानना चाहिये । यह नगरी बारह योजन दीर्घ, नौ योजन विस्तृत, दिव्य, बारह हजार रथमागोंसे सहित, एक हजार उत्तम चतुष्पथोंसे संयुक्त, एक हजार गोपुरोंके समूहसे युक्त, इससे आधे (५००) उत्तम तोरणद्वारोंसे सहित, रमणीय; वज्र, इन्द्रनील, मरकत, कर्केतन एवं पद्मरागसे निर्मित प्रासादोंसे परिपूर्ण; फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे शोभित, दिव्य और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ ११७-११९ ॥


अवरेण तदो गंतुं तत्तजला णामदो णदी होइ ।
वरतोरणसंजुत्ता वणवेदीपरीउडा दिव्वा ॥ १२०

वरणदिगणोहेहिं जुत्ता अट्ठावीससहस्सकुणिहेहिं ।
णिग्गतूण विजया कुंडाणं तोरणमुहादो ॥ १२१

उत्तरमुहेण गंतुं विजयाणं मज्झदेसभागेण ।
सीयासलिले पविसइ तोरणदारेण विउलेण ॥ १२२

अर्थ (गाथा 120 से 122): उसके पश्चिममें जाकर तप्तजला नामक विभंगा नदी है । यह नदी उत्तम तोरणोंसे संयुक्त, वन-वेदियोंसे वेष्टित, दिव्य और उत्तम अट्ठाईस हजार नदियोंके समूहोंसे युक्त होती हुई कुण्डोंके तोरणमुखसे निकलकर विजयोंके मध्य भागमेंसे उत्तरकी ओर जाकर विशाल तोरणद्वारसे सीता नदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ १२०-१२२ ॥


अवरेण तदो गंतुं होइ महावच्छजणवदो अवरी ।
गामाणुगामणिचित्तो णगरागरमंडिओ विउलो ॥ १२३

अर्थ: उसके पश्चिमकी ओर जाकर महावत्सा नामक दूसरा देश है । यह विशाल देश ग्राम अनुग्रामोंसे व्याप्त एवं नगरों व आकरोंसे मण्डित है ॥ १२३ ॥ जहां सिन्धु नदीके साथ वनों, वेदियों व तोरणोंसे


जत्थ विमला गंगा पवहइ वणवेदीतोरणेहिं कयसोहा । सिंधुणदीए सहिया सो देसो मणहरो होइ ॥ १२४ ॥

अर्थ: शोभायमान गंगा नदी बहती है वह देश मनोहर है ॥ १२४ ॥


जत्थ दु वेदड्ढवण्णो णवकूडविहूसिओ समुत्तुंगो । पुव्वावरेण दीहो अच्छइ सो मणहरो देसो ॥ १२५ ॥

अर्थ: जहां पर नौ कूटोंसे विभूषित, उन्नत और पूर्व-पश्चिम दीर्घ वैताढ्य पर्वत स्थित है वह देश मनोहर है ॥ १२५ ॥


तस्स देसस्स णेया अवराजिदणामदो दु वरणयरी । कंचणपायरसुंदरा वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १२६ ॥

उत्तुंगभवणणिवहा जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । उववणकाणणसहिया वावीपोक्खरणी रमणीया ॥ १२७ ॥

अर्थ (गाथा 126 से 127): उस देशकी राजधानी अपराजिता नामकी उत्तम नगरी जानना चाहिये । यह नगरी सुवर्णमय प्राकारसे सहित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, उन्नत भवनोंके समूहसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, उपवन-काननोंसे सहित तथा वापियों व पुष्करिणियोंसे रमणीय है ॥ १२६-१२७ ॥


अवराजिदणगरादो गंतूणं होइ पच्छिमदिसाए । वेसमणणामकूडो वक्खारपव्वदो तुंगो ॥ १२८ ॥

वणवेदीहिं जुत्तो वरतोरणमंडिओ मणभिरामो । कणयमओ रमणीओ जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ १२९ ॥

देवाण भवणणिवहो बहुविहवरदेवदेविहि संछण्णो । णाणादुमगणगहणो सरवरवावीहिं कयसोहो ॥ १३० ॥

अर्थ (गाथा 128 से 130): अपराजित नगरसे पश्चिमकी ओर जाकर वैश्रवणकूट नामक उन्नत वक्षार पर्वत है । यह पर्वत वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, सुवर्णमय, रमणीय, जिनभवनसे विभूषित, दिव्य, देवोंके भवनसमूहसे संयुक्त, बहुत प्रकारके उत्तम देव-देवियोंसे व्याप्त, नाना वृक्षसमूहोंसे गहन और सरोवरों एवं वापियोंसे शोभायमान है ॥ १२८-१३० ॥


वेसमणणामदेवो सुरगणराया तहिं समुद्दिठ्ठो । वरअच्छरमज्झगदो अच्छइ दिव्वाणुभावेण ॥ १३१ ॥

अर्थ: उस पर्वतपर सुरोंका राजा वैश्रवण नामक देव कहा गया है । वह उत्तम अप्सराओंके मध्यमें स्थित होकर दिव्य प्रभावसे रहता है ॥ १३१ ॥


अवरेण तदो गंतूं होइ तहा वच्छकावदीविजओ । सग्ग इव सोक्खसारो सागर इव सो रयणसंछण्णो ॥ १३२ ॥

गंगासिंधूहि जुदो वेदड्ढवण्णेण तह य रमणीओ । बहुपट्टणसंपण्णो बहुगामसमाउलो दिव्वो ॥ १३३ ॥

कव्वडमडंबणिवहो दोणामुहरयणदीवसंछण्णो । संवाहसंपउत्तो णयरायरपरिवुडो रम्मो ॥ १३४ ॥

अर्थ (गाथा 132 से 134): उसके पश्चिममें जाकर वत्सकावती देश है । वह रमणीय देश स्वर्गके समान सुखकी प्रकर्षतासे युक्त, समुद्रके समान रत्नोंसे व्याप्त, गंगा-सिन्धु नदियोंसे युक्त, वैताढ्य पर्वतसे रमणीय, बहुतसे पट्टनोंसे सम्पन्न, बहुत ग्रामोंसे व्याप्त, दिव्य, खर्बटों व मटंबोंके समूहसे युक्त, द्रोणमुखों व रत्नद्वीपोंसे व्याप्त, संवाहोंसे संयुक्त, रम्य तथा नगरों व आकरोंसे वेष्टित है ॥ १३२-१३४ ॥


देसस्स तस्स णेया णामेण पभंकरा हवे णयरी। पागारगोउरजुदा मणितोरणमंडिया दिव्वा ॥ १३५

मरगयपासादजुदा विद्दुमवरपउमरायवर णिवहा। फलिहमणिभवणपउडा कंचणपासादसंजुत्ता ॥ १३६

धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविहूसिया परमरम्मा। उववणकाणणसहिया वरपोक्खरणीहिं रमणीया ॥ १३७

अर्थ (गाथा 135 से 137): उस देशकी राजधानी प्रभंकरा नामक नगरी है। यह नगरी प्राकार व गोपुरोंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मरकतमणिमय प्रासादोंसे युक्त, मूंगा व उत्तम पद्मरागस निर्मित गृहसमूहसे सहित, स्फटिकमणिमय भवनोंकी प्रचुरतासे युक्त, सुवर्णमय प्रासादोंसे संयुक्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, उपवन-काननोंसे सहित, तथा उत्तम पुष्करिणियोंसे रमणीय है ॥ १३५-१३७॥


तत्तो अवरदिसाए मत्तजला णामदो णदी होइ। वरवेदिएहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १३८

सत्तसहस्सणदीहि य चउरब्भत्थेहिं तह य संजुत्ता। कुंडादो णिसरित्तु सीयासलिले पविसई सरिया ॥ १३९

अर्थ (गाथा 138 से 139): उससे पश्चिमकी ओर मत्तजला नामकी नदी है। यह नदी उत्तम वेदियोसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य और चारसे गुणित सात अर्थात् अट्ठाईस हजार नदियोंसे संयुक्त होती हुई कुण्डसे निकलकर सीता नदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ १३८-१३९ ॥


तत्तो अवरदिसाए रम्मा णामेण जणवदो होइ। बहुविहजणसंपण्णो रम्मो सो सव्वलोयाणं ॥ १४०

रमणीयकव्वडजुदो रमणीयमडंबखेडसंपुण्णो। रमणीयखेत्तणिवहो रमणीयणदीहिं संपण्णो ॥ १४१

रमणीयगामवडरो रमणीयमहंतपट्टणाईण्णो । रमणीय णगर णिवहो रम्मा सो तेण गुणणामो ॥ १४२

अर्थ (गाथा 140 से 142): उससे पश्चिमकी ओर रम्या नामक देश है। वह देश बहुत प्रकारके जनोंसे सम्पन्न, सब लोगोंके मनको हरनेवाला, रमणीय कर्वटोंसे युक्त, रमणीय मटंबों व खेडोंसे परिपूर्ण, रमणीय खेतोंके समूहसे सहित, रमणीय नदियोंसे सम्पन्न, रमणीय प्रचुर ग्रामोंसे संयुक्त, रमणीय महा पत्तनोंसे व्याप्त और रमणीय नगरसमूहसे युक्त है। इसी कारण वह ‘रम्या’ इस सार्थक नामसे संयुक्त है ॥ १४०-१४२ ॥


देसस्स मज्झभागे गंगा तह सिंधु णाम संखाओ। चउद्दसणदीहि सहिया सहस्सगुणिदाहि दीसंति ॥ १४३

अर्थ: उस देशके मध्य भागमें गंगा तथा सिन्धु नामक नदियाँ चौदह हजार नदियोंसे सहित दिखती हैं ॥ १४३ ॥


वेदड्डगिरी वि तहा दीसइ देसस्स मज्झभागम्मि। दस अहियसएहिं तहा णगरेहि विहूसिओ तुंगो ॥ १४४

अर्थ: तथा उक्त देशके मध्य भागमें एक सौ दश नगरोंसे विभूषित उन्नत वैताढ्य पर्वत भी दिखता है ॥ १४४ ॥ उस देशकी


देसस्स तस्स णेया अंकावदिणामदो दु वरणयरी । मणियमपायारजुदा मणितोरणमंडिया दिव्वा ॥ १४५

मणिकंचणघर णिवहा जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । वरखादिएहिं जुत्ता वणखंडविराहिया विउला ॥ १४६

अर्थ (गाथा 145 से 146): अंकावती नामक उत्तम नगरी राजधानी जानना चाहिये। यह विशाल नगरी मणिमय प्राकारसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मणिमय एवं सुवर्णमय गृहसमूहसे सहित, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, उत्तम खातिकाओंसे युक्त और वनखण्डोंसे विराजित है ॥ १४५-१४६ ॥


अवरेण तदो गंतुं अंजणगिरि णामदो तहिं होइ । वणवेदिएहिं जुत्तो वरतोरणमंडिओ दिव्वो ॥ १४७

कंचणमओ सुतुंगो णाणापासादसंकुलो पवरो । जिणिंदभवणणिवहो चउकूडविहूसिओ रम्मो ॥ १४८

अर्थ (गाथा 147 से 148): उसके पश्चिममें जाकर वहां अंजन नामक पर्वत है। यह रमणीय पर्वत बन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, सुवर्णमय, अतिशय उन्नत, नाना प्रासादोंसे व्याप्त, श्रेष्ठ, जिनेन्द्रभवनोंके समूहसे सहित और चार कूटोंसे विभूषित है ॥ १४७-१४८ ॥


सीहासणमज्झगओ वरचामरविज्जमाण बहुमाणो । अंजणगिरिम्मि अच्छइ अंजणणामो सुरो पवरो ॥ १४९

अर्थ: अंजनगिरिपर सिंहासनके मध्यको प्राप्त, उत्तम चामरोंसे वीज्यमान और बहुत मानी अंजन नामक श्रेष्ठ देव स्थित है ॥ १४९ ॥


अवरेण तदो गंतुं होइ सुरम्म त्ति णामदो विजओ । सुविसुद्धरयणणिवहो सुविउलदीवेहि मंडिओ दिव्वो ॥

सुविसालनयर णिवहो सुविउलदीवेहि मंडिओ दिव्वो । सुवित्थालखेडपउरो सुविउल रयणायरच्छण्णो ॥ १५१

सुविसालपट्टणजुदो सुविउलदोणामुहेहिं संछण्णो। सुविसालखेत्तणिवहो तेण सुरम्म त्ति विख्खाओ ॥ १५२

अर्थ (गाथा 150 से 152): उसके पश्चिममें जाकर सुरम्य नामक देश है। यह देश अत्यन्त विशुद्ध रत्नसमूहसे सहित, अत्यन्त विशाल द्वीपोंसे मण्डित, दिव्य, अतिशय विशाल नगरोंके समूहसे सहित, अत्यन्त विपुल द्वीपोंसे मण्डित, दिव्य, अतिशय विशाल प्रचुर खेडोंसे सहित, अत्यन्त विपुल रत्नाकरोंसे व्याप्त, अतिशय विशाल पट्टनोंसे युक्त, अत्यन्त विपुल द्रोणमुखोंसे व्याप्त और अतिशय विशाल खेतोंके समूहसे सहित है, इसीलिये यह ‘सुरम्य’ इस सार्थक नामसे विख्यात है ॥ १५०-१५२ ॥


पउमावइ त्ति णामा णगरी तहिं होइ देसमज्झम्मि । धणवेदिएहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १५३

कंचणमरगयविद्दुमकक्केयणपउमरायवर णिवहा । जिणिंदभवणपउरा धयवडधुव्वंतरमणीया ॥ १५४

अर्थ (गाथा 153 से 154): उस देशके मध्यमें पद्मावती नामक नगरी है। यह नगरी वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, सुवर्ण, मरकत, मूंगा, कर्केतन, एवं पद्मराग मणियोंसे निर्मित गृहसमूहसे सहित; प्रचुर जिनेन्द्रभवनोंसे संयुक्त और फहराती हुई ध्वजाओंके वस्त्रोंसे रमणीय है ॥ १५३-१५४ ॥ उसके पश्चिम दिशाभागमें विभंगा


तत्तो विभंगणामा होइ णदी पच्छिमे दिसाभागे ।
उम्मत्तजला णेया बिदिया णामा दु तस्सेव ॥ १५५

अर्थ: नामकी नदी है । ‘उम्मत्तजला’ यह उसका ही दूसरा नाम जानना चाहिये ॥ १५५ ॥


पणुवीससमधिरेया जोयणसयवित्थडा परमरम्मा ।
बेजोयणअवगाढा बेकोसाहिया विभंगा दु ॥ १५६

अर्थ: अतिशय रमणीय वह विभंगा नदी एक सौ पच्चीस योजन विस्तृत और दो कोश अधिक दो योजन अवगाहसे संयुक्त है ॥ १५६ ॥


सोलस चेव सहस्सा चत्तारि सया हवंति सत्तट्ठा ।
बे चेव कला अहिया विभंगआयाम णिद्दिट्ठा ॥ १५७

अर्थ: विभंगा नदीका आयाम सोलह हजार चार सौ सड़सठ योजन और दो कला अधिक (१६५९२ २/१२ - १२५ = १६४६७ २/१२) यो. कहा गया है ॥ १५७ ॥


विक्खंभायामेण य समहियपणुवीसजोयणसयं तु ।
जोयणवीसवगाहं विहंगकुंडं समुद्दिष्टं ॥ १५८

अर्थ: एक सौ पच्चीस योजन विष्कम्भ और आयाम तथा बीस योजन अवगाहसे सहित विभंगाकुंड कहा गया है ॥१५८॥


अवणीय कुंडयामं विजयायामे हवेज्ज जं सेसं ।
सव्वाणं सरियाणं आयामो होइ णायव्वो ॥ १५९

अर्थ: विजयके आयाममेंसे कुण्डके आयामको कम करनेपर जो शेष रहे उतना सब नदियोंका आयाम जानना चाहिये ॥ १५९ ॥


बेकोससमहिरेया सत्तासीदी सयं च णिद्दिट्ठा ।
तोरणदारुच्छेहा विभंगसरियाण णायव्वा ॥ १६०

अर्थ: विभंगा नदियोंके तोरणद्वारोंका उत्सेध एक सौ सत्तासी योजन और दो कोश प्रमाण निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥ १६० ॥


तोरणदारायामं पणुवीससहिया सयंच णायव्वा ।
विक्खंभ पुण जोयण होइ विभंगाण सव्वाणं ॥ १६१

अर्थ: सब विभंगा नदियोंके तोरणद्वारोंका आयाम एक सौ पच्चीस योजन और विष्कम्भ एक योजन प्रमाण जानना चाहिये ॥ १६१ ॥


वइरवण्णीलमरगयसोवाणगणेहि सोहिया दिव्वा ।
कंचणवेदीहि जुदा वणसंडविहूसिया रम्मा ॥ १६२

अट्ठावीसेहि तहा सहस्सगुणिदाइहिं संजुदा रम्मा ।
उभयतडं पूरंती बच्चइ विजयाण मज्झेण ॥ १६३

अर्थ (गाथा 162 से 163): उक्त विभंगा नदी उत्तम वज्र, नील एवं मरकत मणिमय सोपानसमूहोंसे शोभित, दिव्य, सुवर्णमय वेदियोंसे युक्त, वनखण्डोंसे विभूषित, रम्य और अट्ठाईस हजार [नदियोंसे] संयुक्त होकर उभय तटोंको जलसे पूर्ण करती हुई विजयोंके मध्यसे जाती है ॥ १६२-१६३ ॥


कुंदेंदुसंखसण्णिभसुगंधसलिलेहिं पूरिया दिव्वा ।
गंतूण उत्तरदिसे पविसइ सीयाणदीमज्झे ॥ १६४

अर्थ: कुन्द पुष्प, चन्द्र एवं शंखके समान धवल व सुगन्धित जलसे परिपूर्ण वह दिव्य नदी उत्तर दिशामें जाकर सीता नदीके मध्यमें प्रवेश करती है ॥ १६४ ॥


अवरेण तदो गंतूं रमणिज्जो णामदो त्ति विक्खादो । विजओ होदि समिद्धो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ १६५

छक्कंडेहिं विभत्तो अज्जणअणज्जेहि भेदसंजुत्तो । गंगासिंधूहिं तहा वेअड्ढणगेण कयदसीमो ॥ १६६

अर्थ (गाथा 165 से 166): उसके उत्तरमें जाकर ’ रमणीय ’ नामसे विख्यात समृद्ध विजय है । यह विजय बहुत ग्रामोंसे वेष्टित, रम्य, छह खण्डोंसे विभक्त, आर्य-अनार्योंके द्वारा भेदसे संयुक्त और गंगा-सिन्धु नदियाँ तथा वैताढ्य पर्वतसे की गई सीमासे सहित है ॥ १६५-१६६ ॥


तेसम्मि देसे गेया होइ सुहा णामदो त्ति वरनयरी । वणवेदिएहिं जुत्ता मणितोरणमंडिया दिव्या ॥ १६७

कंचणपासादजुदा जिणभवणैर्विहूसिया मणभिरामा । उववणकाणणसहिदा वावीपोक्खरणिकयसोहा ॥ १६८

अर्थ (गाथा 167 से 168): उस देशमें शुभा नामक उत्तम नगरी जानना चाहिये । यह नगरी वन-वेदियोंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, सुवर्णमय प्रासादोंसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, मनको अभिराम, उपवन-काननोंसे सहित और वावियों एवं पुष्करिणियोंसे शोभायमान है ॥ १६७-१६८ ॥


अवरेण तदो गंतूं आदंस [ण] णामदो वक्खो होइ । णितत्तकणयवण्णो मणिरयणविहूसिओ रम्मो ॥ १६९

चत्तारिजोयणसदा उव्विद्धो णिसधपव्वदसमीवे । सीदाणदिस्स तीरे पंचसया जोयणतुंगा ॥ १७०

सीदासमीवदेसे सयं च पच्चवीसजोयणवगाढो । जोयणसयअवगाढो णिसधसमीवे समुद्दिट्ठो ॥ १७१

अर्थ (गाथा 169 से 171): उसके पश्चिममें जाकर आदर्शन [आत्मांजन] नामक वक्षार पर्वत है । यह पर्वत खूब तपाये गये सुवर्णके समान वर्णवाला, मणियों व रत्नोंसे विभूषित, रम्य, निषधपर्वतके समीपमें चार सौ और सीता नदीके तीरपर पांच सौ योजन ऊंचा, तथा सीताके समीप देशमें एक सौ पच्चीस योजन और निषधके समीपमें सौ योजन अवगाहसे युक्त कहा गया है ॥ १६९-१७१ ॥


वणवेदिएहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ मणभिरामो । पंचेव जोयणसया विक्खंभो होइ वरसेलो ॥ १७२

अर्थ: वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित और मनको अभिराम ऐसा वह उत्तम पर्वत पांच सौ योजन प्रमाण विस्तृत है ॥ १७२ ॥


बाणउदा पंचसया बे चेव कला हवे समहिरेया । छद्दससहस्सजोयण आयामं तस्स सेलस्स ॥ १७३

अर्थ: उस पर्वतका आयाम छह और दश अर्थात् सोलह हजार पांच सौ बानवे योजन और दो कला अधिक है ॥ १७३ ॥


पोक्खरणिवाविपउरो णाणापासादसंकुलो रम्मो । तण्णामदेवसदिसो जिणभवणविहूसिओ रम्मो ॥ १७४

अर्थ: उक्त रमणीय पर्वत प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे सहित, नाना प्रासादोंसे घिरा हुआ, रम्य, अपने जैसे नामवाले देवसे सहित और जिनभवनसे विभूषित है ॥ १७४ ॥ उसके पश्चिममें जाकर घन-


अथरेण तदो गंत्तुं होइ पुणो मंगलावदी विजओ ।
धण्णधणरयणपुण्णो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ १७५

अर्थ: धान्य एवं रत्नोंसे परिपूर्ण और बहुत ग्रामोंसे घिरा हुआ रमणीय मंगलावती नामक विजय है ॥ १७५ ॥


सोलस चेव सहस्सा पंचेव सया हवंति बाणउदा ।
बे चेव कला अहिया आयामो तस्स विजयस्स ॥ १७६

अर्थ: उस विजयका आयाम सोलह हजार पाँच सौ बानबे योजन और दो कला अधिक है ॥ १७६ ॥


बावीसे जोयणसया बारह य तह जोयणा समुद्दिद्वा ।
सत्तट्ठभागसहिदा विक्खंभो तस्स देसस्स ॥ १७७

अर्थ: उस देशका विष्कम्भ बाईस सौ बारह योजन और एक योजनके आठ भागोंमेंसे सात भाग अधिक कहा गया है ॥ १७७ ॥


वरणगरखेडकव्वडमडंबदोणामुहेहिं संछण्णो ।
बहुदीवविउलपट्टणरयणागरमंडिओ दिव्वो ॥ १७८

अर्थ: उक्त दिव्य विजय उत्तम नगरों, खेटों, कर्वटों, मटंबों और द्रोणमुखोंसे व्याप्त तथा बहुतसे द्वीपों, विशाल पट्टनों एवं रत्नाकरोंसे मण्डित है ॥ १७८ ॥


गंगासिंधू वि तहा दो वि णदी उत्तरामुही जंति ।
वणवेदिएहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्या ॥ १७९

अर्थ: वन-वेदियोंसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित दिव्य गंगा व सिन्धु नामकी दोनों ही नदियाँ उत्तराभिमुख होकर जाती हैं ॥ १७९ ॥


दुकला बेकोसहिया उणतीसा सह य सोलससहस्सा ।
पंचेव जोयणसया गंगासिंधूण आयामं ॥ १८०

अर्थ: गंगा और सिन्धु नदियोंका आयाम सोलह हजार पाँच सौ उनतीस योजन, दो कोश और दो कला अधिक ( १६५९२ २/४ - ६२ ३/४ = १६५२९ ३/४ ) है ॥ १८० ॥


छज्जोयण सक्कोसा णिसहसमीवे णदीण विक्खंभा ।
गाउवमद्धवगाहं दसगुण सीयासमीवम्मि ॥ १८१

अर्थ: निषध पर्वतके समीपमें उक्त दोनों नदियोंका विष्कम्भ छह योजन एक कोश और अवगाह आधा कोश मात्र है। सीता नदीके समीपमें उक्त नदियोंका विष्कम्भ व अवगाह इससे दशगुणा है ॥ १८१ ॥


बेकोसा बासट्ठा गंगाकुंडेप्पमाणविक्खंभं ।
आयामं णिद्दिट्ठं दसजोयण होइ अवगाहं ॥ १८२

अर्थ: गंगाकुण्डके विष्कम्भ व आयामका प्रमाण दो कोश व बासठ योजन तथा अवगाह दश योजन मात्र है ॥ १८२ ॥


छज्जोयण सक्कोसा आयामा तोरणा समुद्दिद्वा ।
जोयणचउत्थभागा विक्खंभा होंति णायव्वा ॥ १८३

अर्थ: तोरणोंका आयाम छह योजन एक कोश और विष्कम्भ योजनके चतुर्थ भाग प्रमाण जानना चाहिये ॥ १८३ ॥


समहियदियड्ढकोसा णवजोयण तोरणा समुत्तुंगा ।
गंगासिंधूण तहा णिसधेसमीवे वियाणाहि ॥ १८४

अर्थ: गंगा-सिन्धु नदियोंके तोरण निषधके समीपमें नौ योजन और डेढ़ कोश प्रमाण ऊंचे जानना चाहिये ॥ १८४ ॥ जिनेन्द्रोंके द्वारा निर्दिष्ट गंगा-सिन्धु


तिण्णेव हवे कोसा तेणउडा जोयणा समुत्तुंगा ।
बेकोसा बासट्ठा आयामा तोरणा णेया ॥ १८५

बे कोसा विक्खंभा गंगासिंधूण तोरणदुवारा ।
सीदाणदीसमीवे णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहि ॥ १८६

अर्थ (गाथा 185 से 186): नदियोंके तोरणद्वार सीता नदीके समीपमें तेरानवै योजन और तीन कोश ऊंचे, बासठ योजन व दो कोश आयत, तथा दो कोश विस्तृत जानना चाहिये ॥ १८५-१८६ ॥


वरणदिया णादव्वा चउदस-चउदससहस्सपरिवारा ।
एक्केक्काण नदीणं गंगासिंधूण परिवारा ॥ १८७

अर्थ: गंगा-सिन्धु नदियोंमेंसे प्रत्येक नदीकी परिवार नदियां चौदह-चौदह हजार प्रमाण जानना चाहिये ॥ १८७ ॥


सव्वा वि वेदिसहिया सव्वा वणसंडमंडिया दिव्वा ।
सव्वा तोरणणिवहा सव्वा कुंडेसु उप्पण्णा ॥ १८८

अर्थ: ये सभी दिव्य नदियां वेदियोंसे सहित, सभी वनखण्डोंसे मण्डित, सभी तोरणसमूहसे सहित, और सभी कुण्डोंसे उत्पन्न हुई हैं ॥ १८८ ॥


देसस्स मज्झभागे वेदड्ढो पव्वदो समुत्तुंगो ।
वणवेदियाहिं जुत्तो वरतोरणमंडिओ होइ ॥ १८९

अर्थ: इस देशके मध्य भागमें वन-वेदियोंसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित बैताढ्य नामक ऊंचा पर्वत है ॥ १८९ ॥


उत्तरसेढीए पुणो पणवण्णाणि हवंति णगराणि ।
जिणभवणभूसियाणि य दक्खिणरो चावि एमेव ॥ १९०

अर्थ: इस पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें जिनभवनोंसे भूषित पचवन नगर हैं। इसी प्रकार दक्षिण श्रेणीमें भी पचवन नगर जानना चाहिये ॥ १९० ॥


देसम्मि तम्मि होई य णामेण य रयणसंचया णगरी ।
रयणमयभवणणिवहा वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १९१

मरगयपायारजुदा अगाहखाईहिं परिक्खेडा दिव्वा ।
धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविभूसिया दिव्वा ॥ १९२

अर्थ (गाथा 191 से 192): उस देशमें रत्नसंचया नामकी नगरी है। यह दिव्य नगरी रत्नमय भवन-समूहसे सहित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मरकतमणिमय प्राकारसे युक्त, अगाध खातिकाओंसे वेष्टित, दिव्य, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ १९१-१९२ ॥


पुव्वविदेहे णेया तित्थयरा सव्वकाल साहीणा ।
गणहरदेवा य तहा चक्कहरा तह य णायव्वा ॥ १९३

अर्थ: पूर्व विदेहमें स्वाधीन तीर्थंकर, गणधर देव तथा चक्रवर्ती सर्व काल स्थित जानना चाहिये ॥ १९३ ॥


छम्मासे छम्मासे णियमा सिज्झंति तेसु खेत्तेसु ।
उक्कस्सेण य णेया जहण्णदो एक्कसमएण ॥ १९४

अर्थ: उन क्षेत्रोंमें उत्कर्षसे छह छह मासमें तथा जघन्यसे एक समयमें जीव नियमसे सिद्ध होते हैं ॥ १९४ ॥


जिणईंदाणं णेयो अट्ठमहापाडिहेरजुत्ताणं ।
दिव्वं समोवसरणं सव्वेसु वि अत्थि खेत्तेसु ॥ १९५

अर्थ: सभी क्षेत्रोंमें आठ महा प्रातिहार्योंसे युक्त जिनेन्द्र देवोंका दिव्य समवसरण रहता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १९५ ॥


ण वि धम्मो वोच्छिज्जइ केवलणाणी ण चावि परिहीणा । पुव्वविदेहे णेया सव्वेसु वि विउलविजएसु ॥ १९६

अर्थ: पूर्व विदेहके भीतर सभी विशाल विजयोंमें न धर्मकी व्युच्छित्ति होती है और न केवलियोंका भी अभाव होता है ॥ १९६ ॥


चाउव्वण्णो संघो पुव्वविदेहम्मि होंति संबद्धा । पुरिसोलिक्कमेण तहा । णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ १९७

अर्थ: पूर्व विदेहमें चातुर्वर्ण्य संघका संयोग पुरुषपरम्पराके क्रमसे सर्वदा रहता है, ऐसा सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ १९७ ॥


अमरंदिणमियचलणं अणंतवरणाणदंसणपईवं । वरपउमणंदिणमियं अणंतजिणसामियं वंदे ॥ १९८

अर्थ: जिनके चरणोंमें देवोंके इन्द्र नमस्कार करते हैं तथा जो उत्कृष्ट अनन्त ज्ञान-दर्शनरूपी प्रदीपसे संयुक्त व उत्तम पद्मनन्दि मुनिके द्वारा नमस्कृत हैं, ऐसे अनन्त जिनेन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १९८ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे महाविदेहप्पडियारे पुव्वविदेहवण्णणो णाम अट्ठमो उद्देसो समत्तो ॥ ८ ॥

णवमो उद्देसो

धम्मजिणिदं पणमिय सद्धम्मुवदेसयं विगयमोहं । धणधण्णसमिद्धवरं अवरविदेहं पवक्खामि ॥ १

अर्थ: सद्धर्मके उपदेशक और मोहसे रहित धर्मनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार करके धन-धान्यसे समृद्ध उत्तम अपर विदेहका वर्णन करते हैं ॥ १॥


अवरेण तदो गंतुं णामेण य रयणसंचयपुरादो । वरवेदिया विचित्ता कणयमया होइ णायव्वा ॥ २

अर्थ: उस रत्नसंचयपुरसे पश्चिममें जाकर सुवर्णमय विचित्र उत्तम वेदिका जानना चाहिये ॥ २॥


तत्तो दु वेदियादो’ पंचसया जोयणाणि गंतूणं । होदि णगो सोमणसो णिसधसमीवे समुद्दिष्ट्ठो ॥ ३

चत्तारि जोयणसया उव्विद्धो वित्थडो दु पंचसया । जोयणसयअवगाढो रुप्पमओ होइ णायव्वो ॥ ४

अर्थ (गाथा 3 से 4): उस वेदिकासे पांच सौ योजन जाकर सौमनस नामक पर्वत स्थित है। यह रजतमय पर्वत निषधके समीपमें चार सौ योजन ऊंचा, पांच सौ योजन विस्तृत और सौ योजन अवगाहसे युक्त जानना चाहिये ॥ ३-४॥


तत्तो दु वेदियादो गंतूणं भद्दसालवणमज्झे । मंदरपासे ज्ञेया बावीसा जोयणसहस्सा ॥ ५

पंचेव जोयणसया उव्विद्धो संखुंदसंकासो । पणुवीससमहिरेओ’ सयावगाढो दु वज्जमओ ॥ ६

अर्थ (गाथा 5 से 6): उस वेदिकासे बाईस हजार योजन प्रमाण भद्रशाल वनके मध्यमें जाकर शंख एवं कुन्द पुष्पके सदृश वर्णवाला वह पर्वत मन्दर पर्वतके पासमें पांच सौ योजन ऊंचा, तथा एक सौ पच्चीस योजन प्रमाण वज्रमय अवगाहसे युक्त जानना चाहिये ॥ ५-६॥


सोमणसस्सायामं तीससहस्सा य बेसया णैया । णवजोयणा य दिट्ठा छच्चेव कला हवे अहिया ॥ ७

अर्थ: सौमनस पर्वतका आयाम तीस हजार दो सौ नौ योजन और छह कला अधिक कहा गया है ॥ ७॥


चदुकूडतुंगसिहरो बहुभवणविभूसिओ मणभिगमो। बहुदेवदेविभवहो वणकाणणमंडिओ विउलो ॥ ८

वरवेदिहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ परमरम्मो । सोमपहदेवसहिओ जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ ९

अर्थ (गाथा 8 से 9): यह दिव्य पर्वत चार कूटोंसे युक्त, उन्नत शिखरवाला, बहुत भवनोंसे विभूषित, मनको अभिराम, बहुत देव-देवियोंके समूहसे संयुक्त, वन-काननोंसे मण्डित, विपुल, उत्तम वेदिकाओंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित अतिशय रमणीय, सोमप्रभ देवसे सहित और जिनभवनसे विभूषित है ॥ ८-९॥


तत्तो सोमणसादो तेवण्णसहस्स जोयणा गंतुं । अवरदिसे णायव्वा विज्जुपहँनामदो होइ ॥ १०

अर्थ: उस सौमनस पर्वतसे आगे तिरेपन हजार योजन जाकर पश्चिम दिशामें विद्युत्प्रभ नामक पर्वत जानना चाहिये ॥ १०॥


तवणिज्जोणिभो सेलो कुरुधणुपुट्ठद्ध होइ आयामो । सोमणससमो दिव्वो उण्णयचउभागअवगाढो ॥ ११

अर्थ: यह पर्वत तपाये गये सुवर्णके सदृश, कुरु क्षेत्रके अर्ध धनुषपृष्ठके प्रमाण आयामवाला, सौमनसके समान आकारवाला, दिव्य, उंचाईके चतुर्थ भाग प्रमाण अवगाहसे संयुक्त,


वणवेदिपूहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ परमरम्मो ।
जिणचंदभवणनिवहो विज्जुपहदेवसाहीणो ॥ १२

अर्थ (गाथा 11 से 12): वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, जिनभवनोंके समूहसे युक्त और विद्युत्प्रभ देवके स्वाधीन है ॥ ११-१२ ॥


तत्तो पच्छिमभागे गंतूणं पंचजोयणसयाणि ।
होइ हु कंचणवेदी णिसधसमीवे समुद्दिष्ट्ठा ॥ १३

अर्थ: उससे पश्चिम भागमें पांच सौ योजन जाकर निषध पर्वतके समीपमें सुवर्णमय वेदी निर्दिष्ट की गई है ॥ १३ ॥


विज्जुपहसेलादो गंतूणं भद्दसालवणमज्झे ।
बावीसं च सहस्सा जोयणसंखेहि तद्दि होदि ॥ १४

वरवेदिया विचित्ता पंचेव धणुसया दु वित्थिण्णा ।
बेकोससमुत्तुंगा णाणाविहरयणसंच्छण्णा ॥ १५

अर्थ (गाथा 14 से 15): विद्युत्प्रभ शैलसे बाईस हजार योजन प्रमाण भद्रशाल वनके मध्यमें जाकर वहां पांच सौ धनुष विस्तीर्ण, दो कोश ऊंची और नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त विचित्र उत्तम वेदिका है ॥ १४-१५ ॥


तत्तो अवरदिसाए पडमा णामेण जणवदो होइ ।
पउमुप्पलपुप्फेहि य पडोमिणिसंडेहि रमणीओ ॥ १६

वरकमलसालिपूहिं य वप्पिणगणिवेहिं मंडिओ रम्मो ।
णिप्पण्णसव्वधण्णो समिद्धगामेहिं संछण्णो ॥ १७

गंगासिंधूहि तहा वेदड्ढणगेण भूसिओ पवरो ।
छक्खंडपडमविजओ णिद्दिट्ठो सव्वदरिसीहि ॥ १८

अर्थ (गाथा 16 से 18): उससे पश्चिम दिशामें पद्मा नामक देश है । छह खण्डोंसे युक्त वह श्रेष्ठ पद्म विजय पद्म व उत्पल पुष्पों एवं पद्मिनियोंके समूहोंसे रमणीय, उत्तम कलम धानसे शोभायमान खेतोंके समूहोंसे मण्डित, रम्य, समस्त धान्योंकी निष्पत्तिसे सहित, समृद्ध ग्रामोंसे व्याप्त तथा गंगा व सिन्धु नदियों एवं वैताढ्य पर्वतसे भूषित है; ऐसा सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ १६-१८ ॥


तस्स देसस्स गेया णयरी णामेण अस्सपुरी ।
वणवेदिपूहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १९

मणिरयणभवणणिवहा कंचणपासादसंकुला रम्मा ।
जिणइंदगेहपउरा इंदपुरी णाई पञ्चक्खा ॥ २०

अर्थ (गाथा 19 से 20): उस देशकी राजधानी अश्वपुरी नामकी नगरी जानना चाहिये। यह नगरी वन-वेदियोंसे युक्त उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मणि एवं रत्नमय भवनसमूहसे सहित, सुवर्णमय प्रासादोंसे व्याप्त, रम्य तथा प्रचुर जिनेन्द्रगृहोंसे सहित होती हुई साक्षात् इन्द्रपुरी जैसी प्रतीत होती है ॥ १९-२० ॥


अवरेण तदो गंतुं सद्दावादिणामवेदो होइ ।
अद्धट्ठसिहरनिवहो जिणभवणविहूसिओ तुंगो ॥ २१

कंचणमओ विसालो गईंदकुंभाकदी परमरम्मो ।
वणवेदिपूहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ दिव्वो ॥ २२

अर्थ (गाथा 21 से 22): उसके पश्चिममें जाकर श्रद्धावती (शब्दावनि) नामक पर्वत है। यह पर्वत आठके आधे अर्थात् चार शिखरोंके समूहसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, उन्नत, सुवर्णमय, विशाल, गजराजके कुम्भके समान आकृतिवाला, अतिशय रमणीय, वन-वेदियोंसे युक्त,


मणिकंचणघरनिवहो अच्छरबहूकोडिसंजुदो रम्मो ।
काणणवणसंछण्णो सद्भावदिणामसुरजुत्तो ॥ २३

अर्थ (गाथा 21 से 23): उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मणिमय एवं सुवर्णमय गृहसमूहसे सहित, कई करोड़ अप्सराओंसे संयुक्त, रम्य, कानन-वनोंसे व्याप्त और श्रद्धावती नामक देवसे युक्त है ॥ २१-२३ ॥


अवरेण तदो गंतूं होइ सुपउमो त्ति णामदो विजओ ।
णीलुप्पलछण्णाहिं वप्पिणणिवहेहि संछण्णो ॥ २४

रयणावरेहिं जुत्तो पट्टणदोणामुहेहि संछण्णो ।
कब्बडमडंबणिवहो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ २५

अर्थ (गाथा 24 से 25): उससे पश्चिमकी ओर जाकर सुपद्म नामक विजय है। यह विजय नीलोत्पलोंसे व्याप्त वप्रिणसमूहोंसे घिरा हुआ, रत्नाकरोंसे युक्त, पत्तनों व द्रोणमुखोंसे व्याप्त, कर्वटों व मटंबोंके समूहोंसे सहित, रम्य और बहुत ग्रामोंसे व्याप्त है ॥ २४-२५ ॥


गंगाजलेण सित्तो सिंधूसलिलेण पीणिओ उदरो ।
वेतद्धतुंगमउडओ विजयणरिंदो मणभिरामो ॥ २६

अर्थ: उक्त विजय रूपी नरेन्द्र गंगाजलसे अभिषिक्त, सिन्धुसलिलसे प्रीणित (पुष्ट) उदरवाला अथवा उदार और वैताढ्य पर्वत रूपी उन्नत मुकुटसे सहित होता हुआ मनोहर है ॥ २६ ॥


देसम्मि तम्मि मज्झे सिंहपुरी णाम होइ वरणयरी ।
सीहपरक्कमजुत्ता णरसीहा जत्थ बहु अत्थि ॥ २७

अर्थ: उस देशके मध्यमें सिंहपुरी नामकी उत्तम नगरी है, जहां सिंहके समान पराक्रमसे युक्त बहुतसे श्रेष्ठ मनुष्य हैं ॥ २७ ॥


वणवेदिएहि जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा ।
धुव्वंतधयवडडाया जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ २८

अर्थ: यह दिव्य नगरी वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ २८ ॥


अवरेण तदो गंतूं खारोदा णामदो णदी होइ ।
मणिमयसोवाणजुदा णिम्मलसलिलेहि परिपुण्णा ॥ २९

कणयमयवेदिएणिवहा वणखंडविहूसिया मणभिरामा ।
मणिगेणणिवहेहि तहा तोरणद्वारेहि साहीणा ॥ ३०

अट्ठावीसाहि तहा सहस्सगुणिदाहि णदीहिं संजुत्ता ।
सीदोदासरिसलिलं पविसह दारेण तुंगेण ॥ ३१

अर्थ (गाथा 29 से 31): उससे पश्चिमकी ओर जाकर क्षारोदा नामकी नदी है । यह नदी मणिमय सोपानोंसे युक्त, निर्मल जलसे परिपूर्ण, सुवर्णमय वेदीसमूहसे सहित, वनखण्डोंसे विभूषित, मनको अभिराम, मणिगणोंके समूहोंसे तथा तोरणद्वारोंसे स्वाधीन और अट्ठाईस हजार नदियोंसे संयुक्त होकर उन्नत द्वारसे सीतोदा नदीके जलमें प्रवेश करती है ॥ २९-३१ ॥


अवरेण तदो गंतूं होइ महापउमणामवरदेसो ।
अमरकुमारसमाणा णरपवरा जत्थ दीसंति ॥ ३२

अर्थ: उससे पश्चिमकी ओर जाकर महापद्म नामका उत्तम देश है, जहांकि श्रेष्ठ मनुष्य देवकुमारोंके समान दिखते हैं ॥ ३२ ॥ यह देश उत्तम


वरगामणयरणिवहो मडंबखेडेहि मंडिओ दिव्वो ।
णयरायरपरिहिण्णो रयणद्दीवेहि संछण्णो ॥ ३३

अर्थ: ग्रामों व नगरोंके समूहसे सहित, मटंबों व खेडोंसे मण्डित, दिव्य नगरों व आकरोंसे व्याप्त और रत्नद्वीपोंसे घिरा हुआ है ॥ ३३ ॥


देसस्स तस्स णेया महापुरी णामदो त्ति वरणयरी ।
रयणमयभवणणिवहा मणिकंचणरयणपरिणामा ॥ ३४

मणिमयपायारजुदा णिम्मलमणिकणयगोउरदुवारा ।
जिणइंदभवणणिवहा सोहइ सा सव्वदोभद्दा ॥ ३५

अर्थ (गाथा 34 से 35): उस देशकी राजधानी महापुरी नामकी उत्तम नगरी जानना चाहिये । यह नगरी रत्नमय भवनसमूहसे सहित; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंके परिणाम स्वरूप; मणिमय प्राकारसे युक्त, निर्मल मणि व सुवर्णमय गोपुरद्वारोंसे संयुक्त, जिनेन्द्रभवनोंके समूहसे युक्त और सर्वतः मंगलमय होती हुई शोभायमान है ॥ ३४-३५ ॥


अवरेण तदो गंतुं विगडावदि णामदो हवे सेलो ।
कणयमओ उत्तुंगो णाणाविहरयणसंछण्णो ॥ ३६

वणसंडसंपरिउडो मणितोरणमंडिओ मणभिरामो ।
चत्तारिसिहरसहिओ जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ ३७

मायंगकुंभसरिक्खो विगडासुरणामदेवसाहीणो ।
बहुदेवभवणछण्णो वरपोक्खरणीहि रमणीओ ॥ ३८

अर्थ (गाथा 36 से 38): उससे पश्चिमकी ओर जाकर विक-[विज] टावती नामका शैल है । यह शैल सुवर्णमय, उन्नत, नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त, वनखण्डोंसे वेष्टित, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, चार शिखरोंसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, दिव्य, हाथीके कुम्भस्थलके सदृश, विकटासुर नामक देवके स्वाधीन, बहुत देवभवनोंसे व्याप्त और उत्तम पुष्करिणियोंसे रमणीय है ॥ ३६-३८ ॥


अवरेण तदो गंतुं होइ तदा पउमकावदी विजओ ।
पट्टणमंडवडउरो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ ३९

वररयणायरपउरो दोणामुहकव्वडेहिं कयसोहो ।
गंगासिंधूहि जुदो वेअड्ढगयेण रमणीओ ॥ ४०

अर्थ (गाथा 39 से 40): उससे पश्चिमकी ओर जाकर पद्मकावती नामका देश है । यह देश प्रचुर पहनों व मटंबोंसे सहित, बहुत ग्रामोंसे भरा हुआ, रम्य, उत्तम रत्नाकरोंकी प्रचुरतासे संयुक्त, द्रोणमुखोंसे व कर्वटोंसे शोभायमान, गंगा-सिन्धु नदियोंसे युक्त और वैताढ्य पर्वतसे रमणीय है ॥३९-४०॥


देसस्स रायधाणी विजयपुरी णामदो त्ति णिद्दिठ्ठा ।
वज्जिंदणीलमरगयवरपासादवरेहिं संछण्णा ॥ ४१

धवलब्भकूडसरिसाणाणाभवणेहि सोहिया दिव्वा ।
जिणभवणसिद्धभवण सुगंधगंधुद्धुदा रम्मा ॥ ४२

अर्थ (गाथा 41 से 42): उस देशकी राजधानी विजयपुरी नामसे निर्दिष्ट की गई है । यह नगरी वज्र, इन्द्रनील एवं मरकत मणिमय श्रेष्ठ प्रासादोंसे व्याप्त, धवल मेघकूटके सदृश नाना भवनोंसे शोभित, दिव्य, जिनभवनों व सिद्धभवनोंके समूहसे संयुक्त, सुगन्ध गन्धसे व्याप्त, रम्य, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम


वणवेदिपुहि जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा ।
णाणापडायणिवहा अमरिंदपुरी व पच्चक्खा ॥ ४३

अर्थ (गाथा 41 से 43): तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम और नाना पताकाओंके समूहसे सहित होती हुई साक्षात् इन्द्रपुरीके समान प्रतीत होती है ॥ ४१-४३ ॥


अवरेण तदो गंतुं सीदोद विभंगणामदो होइ ।
वरणदि अगाहलोया दक्खिणदो उत्तरे वहइ ॥ ४४

अर्थ: उससे पश्चिमकी ओर जाकर अगाध जलसे संयुक्त सीतोदा नामकी उत्तम विभंगा नदी है, जो दक्षिणसे उत्तरकी ओर बहती है ॥ ४४ ॥


वणवेदिपुहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा ।
अट्ठावीससहस्सानईहि परिवेडिया वहइ ॥ ४५

अर्थ: यह नदी वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम और अट्ठाईस हजार नदियोंसे वेष्टित होकर जाती है ॥ ४५ ॥


अवरेण तदो गंतुं संखा णामेण जणवदो होइ ।
आसालिच्छेत्तणिवहो पंडुरइच्छेहिं संछण्णो ॥ ४६

कल्लहारकमलकंदलणीलुप्पलकुमुदछण्णदीहीहि ।
वरपोक्खरिणीहिं तहा सोहइ सो जणवदो रम्मो ॥ ४७

अर्थ (गाथा 46 से 47): उससे पश्चिमकी ओर जाकर शंखा नामक देश है । वह रम्य देश उत्तम शालि धानके खेतोंके समूहसे सहित, पोंडा व ईखके वनोंसे व्याप्त तथा कह्लार, कमल, कन्दल, नीलोत्पल एवं कुमुदोंसे आच्छादित ऐसी दीर्घिकाओं एवं पुष्करिणियोंसे शोभायमान है ॥ ४६-४७ ॥


गंगा सिंधू य तहा गच्छंति य उत्तरेहिं य मुहेहि ।
देसम्मि तम्मि मज्झे रुप्पमओ होइ वेयड्डो ॥ ४८

अर्थ: वहां गंगा-सिन्धु नदियां उत्तरकी ओर जाती हैं । उस देशके मध्यमें रजतमय वैताढ्य पर्वत है ॥ ४८ ॥


तस्स देसस्स मज्झे अरजा णामेण होइ वरणयरी ।
अमरावइसमसरिसा मणिकंचणरयणसारेण ॥ ४९

अर्थ: उस देशके मध्यमें अरजा नामक श्रेष्ठ नगरी है । यह नगरी मणि, सुवर्ण एवं रत्न रूप धनसे अमरावतीके सम-सदृश है ॥ ४९ ॥


फलिहमणिभवणणिवहा कंचणपासादमंडिया दिव्वा ।
वणवेदिपुहि जुत्ता वरतोरणभूसिया रम्मा ॥ ५०

पोक्खरणिवाविपउरा जिणभवणविहूसिया मणभिरामा ।
उज्जाणवणसमिद्धा णरणारिगणेहि रमणीया ॥ ५१

अर्थ (गाथा 50 से 51): उक्त नगरी स्फटिकमणिमय भवनसमूहसे सहित, सुवर्णमय प्रासादोंसे मण्डित, दिव्य, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे भूषित, रम्य, प्रचुर पुष्करिणियों व वावियोंसे संयुक्त, जिनभवनोंसे विभूषित, मनको अभिराम, उद्यान-वनोंसे समृद्ध और नर-नारीगणोंसे रमणीय है ॥ ५०-५१ ॥


अवरेण तदो गंतुं आसीविसपव्वदो पुणो होइ ।
णिद्धंतकणयवण्णो बहुविहमणिकिरणपज्जलिओ ॥ ५२

रयणमयभवणणिवहो विज्जाहरगरुडकिंणरावासो ।
सुरसयसहस्सपउरो जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ ५३

अर्थ (गाथा 52 से 53): फिर उससे पश्चिमकी ओर जाकर आशीविष नामका पर्वत है । यह पर्वत खूब तपाये गये सुवर्णके सदृश वर्णवाला, बहुत प्रकारके मणियोंके किरणोंसे प्रज्वलित, रत्नमय भवनोंके समूहसे सहित; विद्याधर, गरुड़ एवं किन्नरोंका आवासस्थान, लाखों देवोंकी प्रचुरतासे युक्त, जिनभवनसे विभूषित,


वणवेदिहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ परमरम्मो ।
आसीविससुरसहिओ सुरिंदकरिकुंभसमसिहरो ॥ ५४

अर्थ (गाथा 52 से 54): दिव्य, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, अतिशय रमणीय, आशीविष नामक देवसे सहित और ऐरावत हाथीके कुम्भके सदृश शिखरसे संयुक्त है ॥ ५२-५४ ॥


तत्तो अवरदिसाए णलिणा णामेण जणवदो होइ ।
णलिणिवणेहि सरेहि य सोहइ सो सव्वदोभद्दो ॥ ५५

अर्थ: उससे पश्चिम दिशामें जाकर नलिना नामक देश है। सर्वतः मंगलमय वह देश नलिनीवनों और सरोवरोंसे शोभायमान है ॥ ५५ ॥


जवसालिधण्णपउरो तुवरीकप्पासगोहुमाइण्णो ।
वररायमासपउरो मरीचिवेल्लीहि संछण्णो ॥ ५६

गंगाणदीहि रम्मो सिंधूसरियहिं भूसियपदेसो ।
छक्खंडणलिणविजओ वेदद्ददणेण अभिरामो ॥ ५७

अर्थ (गाथा 56 से 57): छह खण्डोंसे युक्त यह नलिना देश जौ एवं शालि धान्यकी प्रचुरतासे सहित; तूवर, कपास व गेहूँसे भरपूर; उत्तम राजमाषकी प्रचुरतासे युक्त, मरीचि (मिर्च) की बेलोंसे व्याप्त, गंगा नदी व सिन्धु नदीसे भूषित प्रदेशवाला और वैताढ्य पर्वतसे सुशोभित है ॥ ५६-५७ ॥


तम्मि देसम्मि मज्झे विरया णामेण होइ वरणयरी ।
मणिरयणभवणणिवहा कंचणपायाररमणीया ॥ ५८

वेरुलियदारपउरा अगाहखाहीहिं परिउडा दिव्वा ।
जिणहंदभवणणिवहा उच्चंगपडायसंछण्णा ॥ ५९

अर्थ (गाथा 58 से 59): उस देशके मध्यमें विरजा नामक उत्तम नगरी है। यह नगरी मणियों एवं रत्नोंके भवनसमूहसे सहित, सुवर्णमय प्राकारसे रमणीय, वैडूर्य मणिमय प्रचुर द्वारोंसे सहित; अगाध खातिकाओंसे वेष्टित, दिव्य, जिनेन्द्रोंके भवनसमूहसे संयुक्त और उन्नत पताकाओंसे व्याप्त है ॥ ५८-५९ ॥


अवरेण तदो गंतुं होइ णदी सोहवाहिणीणामा ।
वणवेदिहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ ६०

मरगयकंचणविदुमसोवाणगणेहि सोहिया दिव्वा ।
संखेंदुकुंदपंडुर तरंगभंगेहि रमणीया ॥ ६१

अट्ठावीससाहि तहा सहस्सगुणिदाहि णदिहिं संजुत्ता ।
deहलितलेण पविसइ सीतोदा तोरणवरस्स ॥ ६२

अर्थ (गाथा 60 से 62): उससे पश्चिमकी ओर जाकर स्रोतोवाहिनी नामकी नदी है। यह नदी वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, मरकत, सुवर्ण एवं विद्रुममय सोपान समूहोंसे शोभित, दिव्य; शंख, चन्द्रमा एवं कुन्द पुष्पके समान धवल तरंग-भंगोंसे रमणीय और अट्ठाईस हजार नदियोंसे संयुक्त होती हुई उत्तम तोरणद्वारके देहलितलसे सीतोदा नदीमें प्रवेश करती है ॥ ६०-६२ ॥


णेया विभंगसरिया सीदोदजलं अणंतगंभीरं ।
पविसइ वेगेण पुणो घणंसायरसदाणिवहेण ॥ ६३

अर्थ: यह विभंगा नदी बादल अथवा समुद्र जैसे शब्द समूहके साथ वेगसे अनंतगंभीर (अथाह) सीतोदा नदीके जलमें प्रवेश करती है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ६३ ॥


अवरेण तदो गंतुं कुमुदा णामेण जणवदो होई । धणधण्णरयणणिवहो णयरायरमंडिओ पवरो ॥ ६४

कलमबहुपोसवलियहरिकेसरिरत्तसालिखेत्तड्डो । रज्जण्णमहिसमालिवसंतसालीहि संछण्णो ॥ ६५

गंगासिंधूहि सहा वेढड्ढणगेण भूसिओ देसो । बहुगामणयरपट्टणमडंबखेड्डेहि रमणीओ ॥ ६६

अर्थ (गाथा 64 से 66): उससे पश्चिमकी ओर जाकर कुमुदा नामका देश है। यह देश धन, धान्य एवं रत्नोंके समूहसे सहित, नगरों व आकरोंसे मण्डित, श्रेष्ठ; कलम धान, बहुपोष वल्लि, हरि केसरि व रक्तशालि धानके खेतोंसे व्याप्त, राजधानी (श्यामा) महिष शालि व बसंत शालिसे ढका हुआ(?) गंगा-सिन्धु नदियों तथा वैताढ्य पर्वतसे भूषित और बहुत ग्रामों, नगरों, पहनों, मटंबों एवं खेडोंसे रमणीय है ॥ ६४-६६ ॥


विसयम्मि तम्मि मज्झे होइ असोगा त्ति णामदो णयरी । सज्जणजणेहि भरिया कलगुणविण्णाणजुत्तेहि ॥ ६७

वरवज्जकणयमरगयणाणावासादसंकुला रम्मा । वेहूलियवेदिणिवहा मरगयवरतोरणुत्तुंगा ॥ ६८

ससिकंतरयणसिहरा जिणभवणविभूसिया परमरम्मा । पोक्खरणिवाविपउरा वणसंडविभूसिया दिव्वा ॥ ६९

अर्थ (गाथा 67 से 69): उस देशके मध्यमें अशोका नामकी नगरी है। यह नगरी कला-गुण एवं विज्ञानसे युक्त सज्जन जनोंसे परिपूर्ण, उत्तम वज्र, सुवर्ण व मरकतमय नाना प्रासादोंसे व्याप्त, रम्य, वैडूर्यमय वेदीसमूहसे युक्त, मरकतमय उत्तम उन्नत तोरणोंसे संयुक्त, चन्द्रकान्त मणियोंके शिखरोंसे सहित ऐसे जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे संयुक्त, दिव्य और वनखण्डोंसे विभूषित है ॥ ६७-६९ ॥


तत्तो अवरदिसाए सुहावदो णामदो णगो होइ । चउकूडसिहरसहिओ जिणभवणविभूसिओ दिव्वो ॥ ७०

कमलाभवेदिणिवहो फलिहामयतोरणेहि कयसोहो । कणिवारकेसरणिभो वणसंडविभूसिओ दिव्वो ॥ ७१

मणिमयपासादजुत्तो संगीयमुइंगसद्दगंभीरो । तण्णामदेवसहिओ सुरसुंदरिसंकुलो दिव्वो ॥ ७२

अर्थ (गाथा 70 से 72): उससे पश्चिम दिशामें सुखावह नामका पर्वत है। यह दिव्य पर्वत चार शिखरोंसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, दिव्य, उत्तम पद्म जैसी प्रभावानी वेदिकाओंके समूहसे सहित, स्फटिकमणिमय तोरणोंसे शोभायमान, कनेरके परागके सदृश प्रभावानी, वनखण्डोंसे विभूषित, दिव्य, मणिमय प्रासादोंसे युक्त, संगीत व मृदंगके शब्दसे गम्भीर, उसके नामवाले (सुखावह) देवसे सहित और देवांगनाओंसे व्याप्त है ॥ ७०-७२ ॥


अवरेण तदो गंतुं सरिदा णामेण जणवदो होई । बहुगामणवरपउरो रयणदीवेहि कयसोहो ॥ ७३

पट्टणमंडंबवरउडरो दोणामुहबहुविहेहिं रमणीओ । संवाहणिवहसहिओ कब्बडणिवहेहि रमणीओ ॥ ७४

अर्थ (गाथा 73 से 74): उससे पश्चिमकी ओर जाकर सरिता नामक देश है। यह देश प्रचुर ग्रामों व नगरोंसे युक्त, रत्नद्वीपोंसे शोभायमान, पत्तनों व मटंबोंकी प्रचुरतासे सहित, बहुत प्रकारके द्रोणमुखोंसे रमणीय, संवाहसमूहसे सहित और कर्बटसमुदायसे रमणीय है ॥ ७३-७४ ॥


णामेण विगयसोगा वरणयरी होइ तस्स देसस्स ।
मणिरयणभवणणिवहा कंचणपासादरमणीया ॥ ७५

ससिकंतवेदिणिवहा मरगयवरतोरणेहि रमणीया ।
धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ ७६

अर्थ (गाथा 75 से 76): उस देशकी राजधानी विगत (बीत) शोका नामकी उत्तम नगरी है। यह नगरी मणियों एवं रत्नोंके भवनसमूहसे सहित, सुवर्णमय प्रासादोंसे रमणीय, चन्द्रकान्त मणिमय बेदीसमूहसे युक्त, मरकतमय उत्तम तोरणोंसे रमणीय, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त, दिव्य और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ ७५-७६ ॥


तत्तो अवरदिसाए कणयमया वेदिया समुद्दिठ्ठा ।
बेकोससमुत्तुंगा पंचेव धनुस्सया वित्थडा ॥ ७७

अर्थ: उससे पश्चिम दिशामें जाकर सुवर्णमय वेदिका कही गई है। यह वेदिका दो कोश ऊंची और पांच सौ धनुष विस्तृत है ॥ ७७ ॥


तत्तो अवरदिसाए देवारण्णं हवे समुद्दिष्टं ।
णाणादुमगणगहणं बहुभवणसमाउलं रम्मं ॥ ७८

अर्थ: उससे पश्चिम दिशामें नाना वृक्षोंसे गहन और बहुतसे भवनोंसे व्याप्त रमणीय देवारण्य कहा गया है ॥ ७८ ॥


पण्दालीस सहस्सा सोज्झा रासी अवट्ठिया होइ ।
अणवट्ठिदा य सेसा सोहणरासी समुद्दिठ्ठा ॥ ७९

अर्थ: पैंतालीस हजार शोध्य राशि अवस्थित है, शेष शोधन राशि है जो अनवस्थित कही गई है ॥ ७९ ॥


सत्तावीससहस्सा बे चेव सया य सत्तणउदा य ।
सोहम्मि य परिसुद्धं सेसं अट्ठेहि पविहत्तं ॥ ८०

जं लद्धं णावव्वा विजयाणं तह य होइ विक्खंभं ।
अवरस्स विदेहस्स य समासओ होइ णिद्दिष्ट्ठो ॥ ८१

अर्थ (गाथा 80 से 81): सत्ताईस हजार दो सौ सत्तानवै [ (५०० X ४) + (१२५ X ३) + २९२२ + २२००० = २७२९७ ] को शोध्य राशिमेंसे कम करके शेषको आठसे विभक्त करनेपर जो लब्ध हो उतना ( ४५००० - २७२९७ ÷ ८ = २२१२ ७/८ ) अपर विदेहके विजयोंका विष्कम्भ जानना चाहिये, ऐसा संक्षेपसे निर्दिष्ट किया गया है ॥ ८०-८१ ॥


तेयालीससहस्सा सोज्झम्मि य सोहिऊण अवसेसं ।
चउभजिदूण य लद्धं वक्खाराणं तु विक्खंभं ॥ ८२

अर्थ: शोध्य राशिमेंसे तेतालीस हजारको घटाकर शेषको चारसे भाजित करनेपर जो लब्ध हो उतना [ ४५००० - ( १७७०३ + ३७५ + २९२२ + २२००० ) ÷ ४ = ५०० ] वक्षारोंका विष्कम्भ होता है ॥ ८२ ॥


चउदालीससहस्सा छच्चेव सया तहेव पणुवीसा ।
सोज्झम्मि सुद्धसेसं तिहि भजिद् होइ सरियाणं ॥ ८३

अर्थ: चवालीस हजार छह सौ पच्चीसको शोध्य राशिमेंसे घटाकर शेषको तीनसे भाजित करनेपर नदियोंके विष्कम्भका प्रमाण [ ४५००० - (१७७०३ + २००० +२९२२ + २२००० ) ÷ ३ = १२५ ] होता है ॥ ८३ ॥ ब्यालीस हजार


बादालीससहस्सा अट्ठत्तरि सोहिऊण सोज्झम्मि । जं सेसं तं होदि य देवारण्णस्स विक्खंभं ॥ ८४

अर्थ: अठत्तरको शोध्य राशिमेंसे घटाकर जो शेष रहे उतना [ ४५००० - ( १७७०३ + २००० + ३७५ + २२००० ) = २९२२ ] देवारण्यका विष्कम्भ होता है ॥ ८४ ॥


दीवस्स दु विक्खंभे विक्खंभविवहीण मंदरगिरिस्स । सेसद्धकदे होदि य सोज्झा राशी वियाणाहि ॥ ८५

अर्थ: द्वीपके विष्कम्भमेंसे मन्दर गिरिके विष्कम्भको घटाकर शेषको आधा करनेपर ( १००००० - १०००० / २ ) शोध्य राशि होती है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८५ ॥


विक्खंभइच्छरहिदं विक्खंभवसेस मेलवेदूणं । जं लद्धं तं गेया सोहणरासी हवे दिट्ठा ॥ ८६

अर्थ: इच्छित विष्कम्भसे रहित शेष सबके विष्कम्भको मिलाकर जो लब्ध हो उतनी शोधन राशि निर्दिष्ट की गई जानना चाहिये ॥८६॥


सीदोदाविक्खंभं सोहेऊणं विदेहविक्खंभे । सेसद्धेण दु गेया आयामं होइ विजयाणं ॥ ८७

अर्थ: विदेहके विष्कम्भमेंसे सीतोदाके विष्कम्भको घटाकर शेषको आधा करनेसे विजयोंका आयाम होता है ( देखिये पीछे गा. ७, १२-१३ ) ॥ ८७ ॥


तत्तो देववणादो गंतूणं उत्तरे दिसाभागे । अवरं देवारण्णं होइ महादुमगणाहण्णं ॥ ८८

अर्थ: उस देववनसे उत्तर दिशाभागमें जाकर महा वृक्षोंके समूहसे व्याप्त दूसरा देवारण्य है ॥ ८८ ॥


कप्पूरअगरुणिवहं असोयपुण्णायणायतणगहणं । कुडवकयंबाइण्णं चंपयमंदारसंछण्णं ॥ ८९

अर्थ: यह देवारण्य कपूर व अगरु वृक्षोंके समूहसे सहित; अशोक, पुन्नाग व नाग तरुओंसे गहन; कुटज एवं कदंब वृक्षोंसे व्याप्त तथा चंपक व मन्दार वृक्षोंसे घिरा हुआ है ॥ ८९ ॥


तम्मि दु वेवारण्णे देवाणं होंति दिव्वणगराणि । कोडाकोडीणि तहा कंचणमणिरयणणिवहाणि ॥ ९०

अर्थ: उस देवारण्यमें देवोंके सुवर्ण, मणियों एवं रत्नोंके समूहसे युक्त करोड़ों दिव्य नगर हैं ॥ ९० ॥


भवणाणि जिणिंदाणं तत्थेव हवंति तुंगकूडाणि । वरइंदणीलमरगयकक्केयणरयणणिवहाणि ॥ ९१

अर्थ: वहां उत्तम इन्द्रनील, मरकत एवं कर्केतन रत्नोंके समूहसे निर्मित, उन्नत शिखरोंवाले जिनेन्द्रोंके भवन हैं ॥ ९१ ॥


पुव्वेण तदो गंतं कणयमया वेदिया समुद्दिठ्ठा । पंचसयदण्डविडुला उव्विद्धा होइ बे कोसा ॥ ९२

अर्थ: उससे पूर्वमें जाकर सुवर्णमय वेदी कही गई है । यह वेदी पांच सौ धनुष विस्तृत और दो कोश ऊंची है ॥ ९२ ॥


तत्तो पुव्वेण पुणो वप्पा विजओ त्ति णामदो देसो । होइ धणधण्णणिवहो बहुगामसमाउलो रम्मो ॥ ९३

अर्थ: उससे पूर्वकी ओर वप्राविजय नामका देश है । यह दिव्य देश धन-धान्यसमूहसे सहित, बहुत ग्रामोंसे व्याप्त, रम्य, प्रचुर पत्तनों व मटंबोंसे संयुक्त; द्रोणमुखों,


पट्टणमंडवपडरो द्रोणामुहखेडकव्वडसणाहो ।
बहुरयणदीवणिवहो णयरायरमंडिओ दिव्वो ॥ ९४

अर्थ (गाथा 93 से 94): खेडों व कर्बटोंसे सनाथ, बहुतसे रत्नद्वीपोंके समूहसे युक्त, और नगरों व आकरोंसे मण्डित है ॥ ९३-९४ ॥


रत्तारत्तोदाओ णदिओ जत्थ होंति दिव्वाओ ।
वरपव्वदो वि रम्मो वेढद्धो होइ वरसिहरो ॥ ९५

तित्थयरचक्कवट्टीबलदेवा वासुदेवमंड लिया ।
उप्पज्जंति महप्पा वप्पाविजयम्मि णायव्वा ॥ ९६

अर्थ (गाथा 95 से 96): जहां रक्ता-रक्तोदा नामकी दिव्य नदियां तथा उत्तम शिखरवाला रमणीय वैताढ्य नामक श्रेष्ठ पर्वत भी है। उस वप्रा विजयमें तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव एवं मण्डलीक महापुरुष उत्पन्न होते रहते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ९५-९६ ॥


तस्स देसस्स णेया विजयपुरी णामदो त्ति विक्खाया ।
होइ मणिकणयणिवहा सुरिंदणयरीसमा दिव्वा ॥ ९७

रविकंतवेदिणिवहा विदुमवरतुंगगोउरसणाहा ।
मणिरयणभवणणिवहा जिणइंदघरेहि रमणीया ॥ ९८

अर्थ (गाथा 97 से 98): उस देशकी राजधानी विजयपुरी नामसे विख्यात नगरी जानना चाहिये। सुरेन्द्रनगरीके समान वह दिव्य नगरी मणियों एवं सुवर्णके समूहसे संयुक्त, सूर्यकान्त मणिमय वेदीसमूहसे सहित, विद्रुममय उत्तम ऊंचे गोपुरोंसे सनाथ, मणियों एवं रत्नोंके भवनसमूहसे युक्त और जिनेन्द्रगृहोंसे रमणीय है ॥ ९७-९८ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ पुणो चंदपव्वदो तुंगो ।
कोरंटकुसुमवण्णो णाणाविहरयणकिरणड्डो ॥ ९९

कणयमयवेदिणिवहो वेडुलियमहंतगोडरसणाहो ।
वणखंडमंडिओ सो मणियमपासादसंछण्णो ॥ १००

मत्तकरिकुंभसिहरो चउकूडविहूसिओ परमरम्मो ।
चंदसुररायसहिओ जिणभवणविराजिओ दिव्वो ॥ १०१

अर्थ (गाथा 99 से 101): उसके पूर्वमें जाकर चन्द्र नामका उन्नत वक्षार पर्वत है। वह पर्वत कोरंट वृक्षके फूलोंके समान वर्णवाला, नाना प्रकारके रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त, सुवर्णमय वेदी-समूहसे सहित, वैडूर्यमणिमय महा गोपुरोंसे सनाथ, वनखण्डोंसे मण्डित, मणिमय प्रासादोंसे व्याप्त, मत्त हाथीके कुम्भस्थल जैसे शिखरवाला, चार कूटोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, चन्द्र नामक देवराजसे सहित, दिव्य और जिनभवनसे सुशोभित है ॥ ९९-१०१ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ सुवप्पो त्ति जगवदो विउलो ।
बहुगामणयरणिवहो रयणद्दीवेहि संछण्णो ॥ १०२

कव्वडमडंबणिवहो पट्टणदोणामुहेहि घणणिबिडो ।
संवाहखेडपडरो बहुविहणयरेहि संछण्णो ॥ १०३

अर्थ (गाथा 102 से 103): उसके पूर्वमें जाकर सुवप्र नामक विशाल देश है। यह देश बहुत ग्रामों व नगरोंके समूहसे सहित, रत्नद्वीपोंसे व्याप्त, कर्बटों व मटंबोंके समूहसे संयुक्त, पट्टनों व द्रोणमुखोंसे अत्यन्त निबिड, संवाहों व खेडोंके प्राचुर्यसे युक्त और बहुत प्रकारके नगरोंसे व्याप्त है ॥ १०२-१०३ ॥ इस देशके


चौद्दससहस्सोहिं य णईहिं सहिया महाणदी रत्ता । रत्तोदा वि तह च्चिय वहंति देसस्स मज्झेण ॥ १०४

अर्थ: मध्यमें चौदह हजार नदियोंसे सहित महानदी रक्ता तथा उतनी ही नदियोंसे संयुक्त रक्तोदा भी, ये दो नदियां बहती हैं ॥ १०४ ॥


दक्खिणमुहेण गंतं वेदीणिवहेहि तोरणजुदेहि । सीदोदाए सलिले पविसंति दु तोरणमुहेण ॥ १०५

अर्थ: उक्त दोनों नदियां तोरण युक्त वेदीसमूहसे सहित होकर दक्षिणकी ओर जाती हुई तोरणद्वारसे सीतोदाके जलमें प्रवेश करती हैं ॥१०५॥


वेदड्ढो वि य सेलो मेरुं काऊण णाइ सुणिविट्ठो (६) । देसस्स मज्झभागे रयणमओ सेढिसंजुत्तो ॥ १०६

अर्थ: देशके मध्य भागमें तीन श्रेणियोंसे संयुक्त रजतमय वैताढ्य पर्वत भी स्थित है जो मेरु जैसा प्रतीत होता है ॥१०६॥


णामेण बहुजयंती सुवप्पविजयस्स होइ वरगयरी । कंचणपावारजुदा मरगयवरतोरणसणाहा ॥ १०७

वरपउमरायमरगयकक्केयणइंदणीलगहरणिवहा । वेडूलियवज्जकंचणजिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ १०८

अर्थ (गाथा 107 से 108): सुवप्रा विजयकी राजधानी वैजयन्ती नामक नगरी है। यह दिव्य नगरी सुवर्णमय प्राकारसे युक्त, मरकतमय उत्तम तोरणोंसे सनाथ; उत्तम पद्मराग, मरकत, कर्केतन व इन्द्रनील मणियोंसे निर्मित ऐसे गृहसमूहसे सहित और वैडूर्य, वज्र एवं सुवर्णमय जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ १०७-१०८ ॥


[ 'पुव्वेण तदो गंतं वरणई गंभीरमालिणीणामा । होइ विहंगा गेया कंचणसोवाणरमणीया ॥ १०९

मरगयवेदीणिवहा कक्केयणतोरणेहि संछण्णा । णाणात रुवरगहणा वणसंडविहूसिया दिव्वा ॥ ११० ]

अट्ठावीसाहिं तहा सहस्सणइयाहि संजुया सरिया । दक्खिणमुहेण गंतं सीदोदजले समाविसइ ॥ १११

अर्थ (गाथा 109 से 111): उसके पूर्वमें जाकर गम्भीरमालिनी नामकी उत्तम विभंगा नदी है। यह नदी सुवर्णमय सोपानोंसे रमणीय, मरकतमय वेदीसमूहसे संयुक्त, कर्केतन रत्नोंसे निर्मित तोरणोंसे व्याप्त, अनेक उत्तम वृक्षोंसे गहन, वनखण्डोंसे विभूषित, दिव्य और अट्ठाईस हजार नदियोंसे संयुक्त होती हुई दक्षिणकी ओर जाकर सीतोदाके जलमें प्रवेश करती है ॥ १०९-१११ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं होइ महावप्पणामओ देसो । [ 'बहुवप्पसालिणिवहो जवगोधुममासे संछण्णो ॥ ११२

रयणागरेहि रम्मो मडंबणिवहेहि मंडिओ दिव्वो । ] बहुपट्टणेहिं पुण्णो कब्बडखेडेहि रमणीओ ॥ ११३

अर्थ (गाथा 112 से 113): उसके पूर्वमें जाकर महावप्रा नामका देश है। यह देश बहुतसे खेतों व शालिसमूहसे सहित; जौ, गेहूं व उड़दसे व्याप्त, रत्नाकरोंसे रमणीय, मटंबोंके समूहसे मण्डित, दिव्य, बहुत पत्तनोंसे पूर्ण, कर्बटों व खेडोंसे रमणीय, धान्यसे परिपूर्ण ग्रामोंके समूहसे संयुक्त,


धणधण्णदंगामणिवहो णाणादोणामुहेहि कयसोहो । वरदीवणयरपउरो संवाहविहूसिओ रम्मो ॥ ११४

वेढद्धपव्वएण य रत्तारत्तोदएहि कयसोहो । पोक्खरणिवाविपउरो वणसंडविहूसिओ दिव्वो ॥ ११५

अर्थ (गाथा 112 से 115): नाना द्रोणमुखोंसे शोभायमान, उत्तम द्वीपों व नगरोंके प्राचुर्यसे सहित, संवाहोंसे विभूषित, रम्य, वैताढ्य पर्वत व रक्ता-रक्तोदा नदियोंसे शोभायमान, प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे युक्त, दिव्य और वनखण्डोंसे विभूषित है ॥ ११२-११५ ॥


देसस्स तस्स णेया होइ जयंत त्ति णामं णयरी । वेढुलियकणयमरगयरयणप्पासायसंछण्णा ॥ ११६

वरपउमरायपायारंपरिउड्डा खाइयाहि संजुत्ता । जासवणकुसुमसमणिभमणितोरणभासुरा रम्मा ॥ ११७

सिसिरयरहारसंणिभजिणिंदभवणेहि सोहिया दिव्वा । वरपंचवण्णणिम्मलपडायाणिवहेहिं सोहंता ॥ ११८

अर्थ (गाथा 116 से 118): उस देशकी राजधानी जयन्ता नामकी नगरी जानना चाहिये । यह नगरी वैडूर्यमणि, सुवर्ण व मरकत रत्नोंके प्रासादोंसे व्याप्त; उत्तम पद्मराग मणिमय प्राकारसे वेष्टित, खातिकाओंसे संयुक्त, जपाकुसुमके सदृश मणिमय तोरणोंसे भासुर, रम्य, चन्द्र व हारके सदृश वर्णवाले जिनेन्द्रभवनोंसे शोभित, दिव्य, और उत्तम पांच वर्णवाली निर्मल पताकाओंके समूहोंसे शोभायमान है ॥ ११६-११८ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं होइ पुणो सूरपव्वदो रम्मो । णवचंपयवरवण्णो जिणभवणविहूसिओ तुंगो ॥ ११९

कणयमयवेदिणिवहो मरगयमणितोरणेहि कयसोहो । अद्धट्ठकूडसहिओ बहुभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ १२०

आइच्चदेवसहिओ वणसंडविहूसिओ मणभिरामो । सुरसुंदरिसंछण्णो पउमिणिसंडेहि रमणीओ ॥ १२१

अर्थ (गाथा 119 से 121): उससे पूर्वकी ओर जाकर रम्य सूर पर्वत है । यह पर्वत उत्तम नवीन चम्पकके समान वर्णवाला, जिनभवनसे विभूषित, उन्नत, सुवर्णमय वेदिसमूहसे युक्त, मरकतमणिके तोरणोंसे शोभायमान, आठके आधे अर्थात् चार कूटोंसे सहित, बहुत भवनोंसे विभूषित, दिव्य, आदित्य नामक देवसे सहित, वनखण्डोंसे विभूषित, मनको अभिराम, देवांगनाओंसे व्याप्त और पद्मिनीखण्डोंसे रमणीय है ॥ ११९-१२१ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं होइ तहा वप्पकावदी विजओ । धणधण्णरयणणिवहो गोमहिसीसमाउलो दिव्वो ॥ १२२

बहुकव्वडेहिं रम्मो पट्टणणिवहेहि मंडिओ दिव्वो । रयणावरेहि पुण्णो मडंबखेडेहि रमणीओ ॥ १२३

दोणामुहेहि छण्णो णाणागामेहि तह य कयसोहो । संवाहणयरपउरो वरदीवेहि विहूसिओ रम्मो ॥ १२४

अर्थ (गाथा 122 से 124): उसके पूर्वमें जाकर वप्रकावती नामका देश है । यह देश धन-धान्य व रत्नसमूहसे सहित, गायों व भैंसोंसे भरपूर, दिव्य, बहुत कर्बटोंसे रमणीय, पत्तन-समूहोंसे मण्डित, दिव्य, रत्नाकरोंसे पूर्ण, मटंबों व खेडोंसे रमणीय, द्रोणमुखोंसे आच्छन्न, नाना ग्रामोंसे शोभायमान, प्रचुर संवाहों व नगरोंसे सहित, रम्य और उत्तम द्वीपोंसे विभूषित है ॥ १२२-१२४ ॥


देसस्स तस्स णेया होदि य अवराजिंद त्ति वरणयरी । कंचणपायारजुदा मणितोरणभासुरा दिव्वा ॥ १२५

वेरुलियवज्जर मरगयपवालवरकणयमवणसंछण्णा । जिणिंदभवणणिवहा सुगंधगंधुधुद्धा रम्मा ॥ १२६

अर्थ (गाथा 125 से 126): उस देशकी राजधानी अपराजिता नामकी उत्तम नगरी जानना चाहिये । यह नगरी सुवर्णमय प्राकारसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे भासुर, दिव्य; वैडूर्य, वज्र, मरकत, प्रवाल और उत्तम सुवर्णके भवनोंसे घिरी हुई, जिनेन्द्रभवनोंके समूहसे सहित, रम्य तथा सुगन्ध गन्धसे युक्त है ॥ १२५-१२६ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ णदी फेणमालिणीणामा । मरगयकंचणविद्दुमसोवाणगणेहि सोहंती ॥ १२७

कंचणवेदीहि जुदा ससिकंतमणीहि तोरणुत्तुंगा । वियरंतमच्छकच्छवसुगंधजलपूरिया दिव्वा ॥ १२८

अट्ठावीसाहि तहा सहस्सणदियाहि संजुदा रम्मा । दक्खिणमुहेण गंतुं पवहइ सीदोदमज्झेण ॥ १२९

अर्थ (गाथा 127 से 129): उससे पूर्वकी ओर जाकर फेनमालिनी नामकी रमणीय नदी है । यह नदी मरकत, सुवर्ण एवं विद्रुममय सोपानगणोंसे शोभित; सुवर्णमय वेदियोंसे युक्त, चन्द्रकान्त मणिमय उन्नत तोरणोंसे संयुक्त, विचरते हुए मत्स्यों व कछुओंसे सहित, सुगन्धित जलसे परिपूर्ण, दिव्य तथा अट्ठाईस हजार नदियोंसे संयुक्त होती हुई दक्षिणकी ओर जाकर सीतोदाके मध्यसे बहती है ॥ १२७-१२९ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं वग्गू णामेण जणवदो होइ । बहुगामसमाइण्णो णाणाविहधण्णसंपण्णो ॥ १३०

दिव्वसंवाहणिवहो दिव्वमडंबेहि भूसिओ रम्मो । दिव्वणयरेहि पुण्णो दिव्वायरमंडिओ पवरो ॥ १३१

दिव्वखेडेहि जुत्तो दिव्वमहापट्टणेहि रमणीओ । दिव्वबहुकव्वडजुदो दिव्वो वरदोणमुहेहिंसहिओ ॥ १३२

वेदड्डरिसभपव्वदरत्तारत्तोदणएहि रमणीओ । पोक्खरणिवाविपउरो वणसंडविहूसिओ दिव्वो ॥ १३३

अर्थ (गाथा 130 से 133): उससे पूर्वकी ओर जाकर वग्गू नामक देश है । यह देश बहुत ग्रामोंसे व्याप्त, नाना प्रकारके धान्यसे सम्पन्न, दिव्य संवाहसमूहसे सहित, दिव्य मटंबोंसे भूषित, रम्य, दिव्य नगरोंसे पूर्ण, दिव्य आकरोंसे मण्डित, श्रेष्ठ, दिव्य खेडोंसे युक्त, दिव्य महा पट्टनोंसे रमणीय, बहुतसे दिव्य कर्वटोंसे युक्त, दिव्य, उत्तम द्रोणमुखोंसे सहित, वैताढ्य व ऋषभ पर्वतों तथा रक्ता-रक्तोदा नदियोंसे रमणीय, प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे सहित, दिव्य और वनखण्डोंसे विभूषित है ॥ १३०–१३३ ॥


देसस्स तस्स णेया चक्कपुरी णामदो त्ति वरणयरी । वरचक्कवट्टिसहिया णरपवरा सव्वकालम्मि ॥ १३४

अर्थ: उस देशकी राजधानी चक्रपुरी नामकी उत्तम नगरी जानना चाहिये, जहां श्रेष्ठ चक्रवर्ती सहित उत्तम मनुष्य सब कालमें


वेरुलियवेदिणिवहा कंचणवरतोरणेहि रमणीया ।
वज्जिंदणीलमरगयविद्दुमपासादसंछण्णा ॥ १३५

भिंगारकलसदप्पणचामरघंटाधयवडाजुत्ता ।
मुत्तादामसँमग्गा जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ १३६

अर्थ (गाथा 134 से 136): रहते हैं। उक्त दिव्य नगरी वैडूर्य मणिमय वेदिसमूहसे युक्त, सुवर्णमय उत्तम तोरणोंसे रमणीय; वज्र, इन्द्रनील, मरकत एवं विद्रुमसे निर्मित प्रासादोंसे व्याप्त; भृंगार, कलश, दर्पण, चामर, घंटा आदिक तथा ध्वजपटोंसे युक्त, मुक्तामालाओंसे परिपूर्ण और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ १३४-१३६ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ महाणागपव्वदो तुंगो ।
णागवरकुंभसरिसो चउसिहरविहूसिओ दिव्वो ॥ १३७

वणवेदिहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ मणोभिरामो ।
णागसुररायसहिओ जिणभवणविहूसिओ विउलो ॥ १३८

अर्थ (गाथा 137 से 138): उससे पूर्वकी ओर जाकर उन्नत महानाग नामक पर्वत है। यह विशाल पर्वत उत्तम हाथीके कुम्भके सदृश, चार शिखरोंसे विभूषित, दिव्य, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, नाग नामक देवराजसे सहित और जिनभवनसे विभूषित है ॥ १३७-१३८ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ सुवग्गू त्ति जणवदो रम्मो ।
अमरकुमारसमाणा णरपवरा जत्थ दीसंति ॥ १३९

अर्थ: उससे पूर्वमें जाकर सुवल्गू नामक रमणीय देश है, जहांके श्रेष्ठ मनुष्य देवकुमारोंके सदृश दिखते हैं ॥ १३९ ॥


चारुखेडेहिं जुत्तो चारुमहापट्टणेहि रमणीओ ।
चारुवरकव्वडेजुदो चारु पुणो दोणमुहसहिओ ॥ १४०

चारुसंवाहणिवहो चारुमडंबेहि भूसिओ रम्मो ।
चारुणयरेहि जुत्तो चारुमहागामसंछण्णो ॥ १४१

रत्ताणदिसंजुत्तो वेयड्ढगुणेण मंडिओ पवरो ।
रत्तोदाएण जुदो रिसिभंगिरिविहूसिओ दिव्वो ॥ १४२

अर्थ (गाथा 140 से 142): यह दिव्य देश सुन्दर खेडोंसे युक्त, सुन्दर महा पट्टनोंसे रमणीय, सुन्दर उत्तम कर्बटोंसे युक्त, सुन्दर द्रोणमुखोंसे सहित, सुन्दर संवाहसमूहसे संयुक्त, सुन्दर मटंबोंसे भूषित, रम्य, सुन्दर नगरोंसे युक्त, सुन्दर महाग्रामोंसे व्याप्त, रक्ता नदीसे युक्त, वैताढ्य पर्वतसे मण्डित, श्रेष्ठ, रक्तोदासे युक्त और ऋषभ गिरिसे विभूषित है ॥ १४०-१४२ ॥


देसस्स तस्स णेया खग्गपुरी णामदो त्ति वरणयरी ।
मरगयपासादजुदा पवालवरतोरणारम्मा ॥ १४३

वरवज्जरजदमरगयकंचणपासादसंकुला रम्मा ।
घंटापडायणिवहा वरभवणविहूसिया दिव्वा ॥ १४४

अर्थ (गाथा 143 से 144): उस देशकी राजधानी खड्गपुरी नामकी उत्तम नगरी जानना चाहिये। यह नगरी मरकत मणिमय प्रासादोंसे युक्त, प्रवालमय उत्तम तोरणोंसे रमणीय, उत्तम वज्र, रजत, मरकत एवं सुवर्णके प्रासादोंसे व्याप्त, रमणीय, घंटा व पताकासमूहसे संयुक्त, दिव्य व उत्तम भवनोंसे विभूषित है ॥ १४३-१४४ ॥ उससे पूर्वकी ओर जाकर ऊर्मिमालिनी नामकी नदी


पुव्वेण तदो गंतूं होइ णदी उम्मिमालिणी णाम ।
विदिया विभंगसरिया दो णामा होंति सव्वाणं ॥ १४५

अर्थ: है। इसका दूसरा नाम विभंगा सरित् है। इन सब नदियोंके दो नाम होते हैं ॥१४५॥


वेरुलियवेदिणिवहा विदुमवरतोरणेहि संजुत्ता ।
मणिमयसोवाणजुदा सुगंधसलिलेहि संपुण्णा ॥ १४६

वणसंडेहि य सहिया अट्ठावीसासहस्ससंजुत्ता ।
दक्खिणमुहेण गंतूं सीदोदजलं विसह सरिया ॥ १४७

अर्थ (गाथा 146 से 147): उक्त नदी वैडूर्य मणिमय वेदीसमूहसे सहित, विद्रुममय उत्तम तोरणोंसे संयुक्त, मणिमय सोपानोंसे युक्त, सुगन्ध जलसे सम्पूर्ण, वनखण्डोंसे सहित और अट्ठाईस हजार नदियोंसे युक्त होती हुई दक्षिणकी ओर जाकर सीतोदाके जलमें प्रवेश करती हैं ॥ १४६-१४७ ॥


वरतोरणदाराणं देहलियाणं तलेण पविंसंति ।
सव्वाओ सरियाओ णायव्वा होंति णिद्दिट्ठा ॥ १४८

अर्थ: सब नदियां उत्तम तोरणद्वारोंकी देहलियोंके तलसे प्रवेश करती हैं, ऐसा निर्दिष्ट किया गया जानना चाहिये ॥ १४८ ॥


पुव्वेण तदो गंतूं गंधिलणामो त्ति जणवदो होइ ।
वरगंधसलिलपउरो जवगोहुममुग्गसंपण्णो ॥ १४९

वरगामणयरपट्टणमडंबदोणमुहेहिं संछण्णो ।
संवाहखेडकब्बडवररयणायरेण मंडिओ दिव्वो ॥ १५०

रिसभगिरिरूप्पपव्वदरत्तारत्तोदएहि रमणीओ ।
कमलुप्पळछण्णेहि य वावीदीहीहि कयसोहो ॥ १५१

अर्थ (गाथा 149 से 151): उससे पूर्वकी ओर जाकर गन्धिला नामक देश है । यह देश उत्तम गन्धयुक्त प्रचुर जलसे परिपूर्ण; जौ, गेहूं एवं मूंगसे सम्पूर्ण; उत्तम ग्रामों, नगरों, पत्तनों, मटंबों व द्रोणमुखोंसे व्याप्त; संवाहों, खेडों, कर्बटों एवं रत्नाकरोंसे मण्डित; दिव्य, ऋषभगिरि व रूपाचल पर्वतों एवं रक्ता-रक्तोदा नदियोंसे रमणीय, तथा कमलों व उत्पलोंसे व्याप्त ऐसी वापियों एवं दीर्घिकाओंसे शोभायमान है ॥ १४९-१५१ ॥


देसस्स तस्स दिट्ठा होदि यउज्झ त्ति णामदो णयरी ।
अज्जुणपायारजुदा पवालमणितोरणदुवारा ॥ १५२

ससिसूरकंतमरगयपवालवरपउमरायघरनिवहा ।
फलिहमणिकणयविद्दुमजिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ १५३

अर्थ (गाथा 152 से 153): उस देशकी राजधानी अयोध्या नामक नगरी निर्दिष्ट की गई है। यह दिव्य नगरी रजतमय प्राकारसे युक्त, प्रवाल मणिमय तोरणद्वारोंसे सहित; चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, मरकत प्रवाल एवं उत्तम पद्मराग मणियोंके गृहसमूहसे सहित तथा स्फटिक मणि, सुवर्ण एवं विद्रुममय जिनभवनोंसे विभूषित है ॥१५२-१५३॥


पुव्वेण तदो गंतूं णामेण य देवपव्वदो होइ ।
ससिकंतवेदिणिवहो पवालवरतोरणुत्तुंगो ॥ १५४

मत्तकरिकुंभसरिसो चउसिरहरविहूसिओ मणभिरामो ।
तुंगजिणभवणणिवहो बहुभवणसमाउलो रम्मो ॥ १५५

अर्थ (गाथा 154 से 155): उससे पूर्वकी ओर जाकर देव (देवमाल) नामका पर्वत है। यह पर्वत चन्द्रकान्त मणिमय वेदीसमूहसे सहित, प्रवालमय उत्तम उन्नत तोरणोंसे संयुक्त, मत्त हाथीके कुम्भके सदृश, चार शिखरोंसे विभूषित, मनको अभिराम, उन्नत जिनभवनोंके समूहसे सहित, बहुत भवनोंसे व्याप्त, रम्य, नाना वृक्षसमूहोंसे गहन, बहुत


णाणादुमगणगहणो बहुदेवसमाउलो परमरम्मो ।
तण्णामदेवसहिदो दीहीपोक्खरणीरमणीओ ॥ १५६

अर्थ (गाथा 154 से 156): देवोंसे व्याप्त, अतिशय रमणीय, उसके ( अपने ) नामवाले देवसे सहित और दीर्घिकाओं एवं पुष्करिणियोंसे रमणीय है ॥ १५४-१५६ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं होइ पुणो गंधमालिणी विअओ ।
वरगंधसालिपउरो पुंडुच्छुवणेहि संछण्णो ॥ १५७

छण्णउइगामकोडीहि मंडिओ विविहधण्णणिवहेहि ।
छन्वीससहस्सेहि य आगरणिवहेहि संछण्णो ॥ १५८

चउवीससहस्सेहि य कव्बडणिवहेहि मंडिओ दिव्वो ।
अडदालीससहस्सेहि य पट्टणपवरेहि कयसोहो ॥ १५९

दोणामुहेहि य तहा णवणउदिसहस्सएहि संजुत्तो ।
चत्तारिसहस्सेहि य मडंबणिवहेहि रमणीओ ॥ १६०

चोद्दसयसहस्सेहि संवाहवरेहि भूसिओ देसो ।
दुगुणट्ठसहस्सेहि य खेडाहि य मंडिओ पवरो ॥ १६१

छप्पण्णरयणदीवेहि मंडिओ विविहरयणणिवहेहिं ।
मागधवरतणुएहि य पभासदीवेण रमणीओ ॥ १६२

रत्ताणदीए जुत्तो रत्तोदाएण तह य रमणीओ ।
गोवइगिरिणा सहिओ विज्जाहरसेलसंजुत्तो ॥ १६३

अर्थ (गाथा 157 से 163): उससे पूर्वकी ओर जाकर गन्धमालिनी देश है। यह देश उत्तम गन्धवाली प्रचुर शालि धान्यसे संयुक्त, पौंड़ा व ईखके वनोंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके धान्यके समूहोंसे संयुक्त ऐसे छयानवै करोड़ ग्रामोंसे मण्डित, छब्बीस हजार आकरोंके समूहोंसे व्याप्त, चौबीस हजार कर्वटसमूहोंसे मण्डित, दिव्य, अड़तालीस हजार श्रेष्ठ पट्टनोंसे शोभायमान, निन्यानवै हजार द्रोणमुखोंसे संयुक्त, चार हजार मटंबोंके समूहोंसे रमणीय, चौदह हजार उत्तम संवाहोंसे भूषित, द्विगुणित आठ हजार ( १६००० ) खेटोंसे मण्डित, श्रेष्ठ, विविध प्रकारके रत्नसमूहोंसे युक्त ऐसे छप्पन रत्नद्वीपोंसे मण्डित; मागध, वरतनु एवं प्रभास द्वीपोंसे रमणीय; रक्ता नदीसे युक्त, तथा रक्तोदा नदीसे रमणीय, वृषभ-गिरिसे सहित, और विद्याधरशैल ( विजयार्ध पर्वत ) से संयुक्त है ॥ १५७-१६३ ॥


देसम्मि तम्मि मज्झे होइ अवन्झा त्ति णामदो णयरी ।
कंचणपवालमरगयकक्केयणरयणघरणिवहा ॥ १६४

बारहसहस्सरथेहि मंडिया विविधरयणणिवहेहिं ।
चउथरचउक्कएहि य सहस्ससंखेहि रमणीया ॥ १६५

गोउरदारसहस्सा कंचणमणिरयणमंडिया दिव्वा ।
तोरणदारा णेया पंचेव सया हु णयरीए ॥ १६६

अर्थ (गाथा 164 से 166): उस देशके मध्यमें अवन्ध्या नामकी नगरी है। यह दिव्य नगरी सुवर्ण, प्रवाल, मरकत एवं कर्केतन रत्नोंके गृहसमूहसे युक्त; विविध प्रकारके रत्नसमूहोंसे संयुक्त ऐसे बारह हजार रथमार्गोंसे मण्डित, एक हजार चत्वरों-चतुष्पथोंसे रमणीय, एक हजार गोपुरद्वारोंसे सहित, तथा सुवर्ण मणि एवं रत्नोंसे मण्डित है। उस नगरीमें पांच सौ तोरणद्वार जानना चाहिये। सुवर्णमय प्राकारसे युक्त,


कंचणपायारजुदा अगाहखाईहिं परिउड्डा रम्मा । पोक्खरणिवाविपउरा उज्जाणवणेहि रमणीया ॥ १६७

धुव्वंतधयवडाइया जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । णाणाजणसंकिण्णा सुरिंदणगरी व रमणीया ॥ १६८

तित्थयरपरमदेवा गणहरदेवा य चक्कवट्टीया । बलदेववासुदेवा णरपवरा जत्थ जायंति ॥ १६९

अरहंतपरमदेवेहि भासिओ धम्मदीवपज्जलिआ । धम्माणुभासरहिया मिच्छत्तकुलिंगपरिहीणा ॥ १७०

अर्थ (गाथा 164 से 170): अगाध खातिकासे वेष्टित, रम्य, प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे संयुक्त, उद्यान-वनोंसे रमणीय, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, जिनभवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय और नाना जनोंसे संकीर्ण वह नगरी सुरेन्द्रनगरीके समान रमणीय है, जहां तीर्थंकर परमदेव, गणदेव, चक्रवर्ती, बलदेव एवं वासुदेव रूप पुरुष-पुंगव जन्म लेते हैं । तथा वह नगरी अरहंत परमदेवोंसे उपदिष्ट धर्म-प्रदीपसे प्रकाशित, धर्माभासोंसे रहित और मिथ्यात्व व कुलिंगसे हीन है ॥ १६४-१७० ॥


बम्हाविण्हूमहेसरदुग्गाभाइच्चचंदबुद्धाणं । भवणाणि णत्थि तम्मि दु विदेहवस्सम्मि णायव्वा ॥ १७१

अर्थ: उस विदेह वर्षमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, दुर्गा, सूर्य, चन्द्र और बुद्धदेवके भवन नहीं हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ १७१ ॥


णइयाइयवइसेसियमीमंसंसंखकपिलमदभेदा । सुद्धोदणादिदरिसणं कदाचि ण वि होंति विजएसु ॥ १७२

अर्थ: उन विजयोंमें नैयायिक, वैशेषिक, मीमांसक, सांख्य-कपिल, ये मतभेद तथा शुद्धोदन (बुद्ध) आदिके दर्शन कदाचित् भी नहीं होते ॥ १७२ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं कणयमया वेदिया पुणो होइ । जोयणमद्धत्तुंगा पंचेव धनुस्सया विउला ॥ १७३

अर्थ: उससे आगे पूर्वकी ओर जाकर सुवर्णमय वेदिका है, जो अर्ध योजन ऊंची और पांच सौ धनुष विस्तृत है ॥१७३॥


पुव्वेण तदो गंतुं पंचसया जोयणाणि वेदीदो । णीलसमीवे होइ य कणयमओ दिव्ववरसेलो ॥ १७४

अर्थ: उस वेदीसे आगे पांच सौ योजन पूर्वकी ओर जाकर नील पर्वतके समीपमें सुवर्णमय दिव्य उत्तम पर्वत स्थित है ॥ १७४ ॥


बावीससहस्साईं गंतूण य भद्दसालवणमज्झे । वरगंधमादणणगो मेरुसमीवे समुद्दिट्ठो ॥ १७५

अर्थ: भद्रशाल वनके मध्यमें बाईस हजार योजन जाकर मेरुके समीपमें स्थित उत्तम गन्धमादन पर्वत कहा गया है ॥ १७५॥


चत्तारिकूडसहिओ जिणभवणविहूसिओ परमरम्मो । वणवेदिएहि जुत्तो वरतोरणमंडिओ दिव्वो ॥ १७६

बहुभवणसंपरिउडो तण्णामादेवरायसाहीणो । अमरविलासिणिपउरो गयकुंभसमो समुत्तुंगो ॥ १७७

अर्थ (गाथा 176 से 177): यह उन्नत पर्वत चार कूटोंसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, अतिशय रमणीय, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, बहुत भवनोंसे वेष्टित, उसीके नामवाले देवराजके स्वाधीन, प्रचुर देवांगनाओंसे सहित और हाथीके कुम्भके सदृश है ॥ १७६-१७७ ॥


पुव्वेण तदो गंतुं तेवण्णसहस्सजोयणपमाणो।
वेरुलियेरयणवण्णो होइ णगो मालवंतो त्ति ॥ १७८

चट्ठूहिसिहरसहिओ बहुभवणसमाउलो परमरम्मो।
तण्णामदेवसहिओ जिणभवणविहूसिओ दिव्वो ॥ १७९

मरगयपासादजुदो विदुमवरतोरणेहि रमणीओ।
बहुदेवदेविविण्हदो गइंदसंठाणरमणीओ ॥ १८०

सुरणगरसंपरिउडो वावीपोक्खरणिवावणसणाहो।
वणसंडमणभिरामो धयवडधुव्वंतकयसोहो ॥ १८१

अर्थ (गाथा 178 से 181): उससे आगे पूर्वकी ओर तिरेपन हजार योजन प्रमाण जाकर वैडूर्य रत्नके समान वर्णवाला मालवन्त नामक पर्वत है। यह पर्वत चार शिखरोंसे सहित, बहुत भवनोंसे युक्त, अतिशय रमणीय, उसीके ही नामवाले देवसे सहित, जिनभवनसे विभूषित, दिव्य, मरकतमय प्रासादोंसे युक्त, विद्रुममय उत्तम तोरणोंसे रमणीय, बहुत देव-देवियोंके समूहसे युक्त, गजेन्द्राकृतिसे रमणीय, देवनगरोंसे वेष्टित, वापियों, पुष्करिणियों व खेतोंसे सनाथ, वनखण्डोंसे मनोहर और फहराते हुए ध्वजपटोंसे शोभायमान है ॥१७८-१८१॥


पुव्वेण तदो गंतुं पंचसया जोयणाणि सेलादो।
कणयमया वरवेदी होइ पुणो णीलपासम्मि ॥ १८२

अर्थ: पुनः उस पर्वतसे पूर्वकी ओर पांच सौ योजन जाकर नील पर्वतके पासमें सुवर्णमय उत्तम वेदी स्थित है ॥१८२॥


तत्तो दु पव्वदादो गंतूणं भद्दसालवणमज्झे।
बावीसं च सहस्सा सीदापासम्मि सा वेदी ॥ १८३

अर्थ: वह वेदी उस पर्वतसे आगे भद्रशाल वनके मध्यमें बाईस हजार योजन जाकर सीताके पासमें स्थित है ॥१८३॥


बेगाउददड्तुंगा सगाउण्णयद्धभागवित्थिण्णा।
णाणामणिगणणिवहा सुरभवणसमाउला रम्मा ॥ १८४

अर्थ: यह रमणीय वेदी दो कोश ऊंची, ऊंचाईके आठवें भाग (५०० धनुष) प्रमाण विस्तीर्ण, नाना मणिगणोंके समूहसे युक्त और देवभवनोंसे व्याप्त है ॥१८४॥


णेया णदीण तीरे वीसदिवक्खारपव्वदाणं तु।
भवणाणि जिणिंदाणं णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहि ॥ १८५

अर्थ: नदियोंके किनारे बीस वक्षार पर्वतोंके ऊपर सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट जिनेन्द्रोंके भवन जानना चाहिये ॥१८५॥


पासादा णायव्वा पणुवीसा जोयणा दु वित्थारा।
पण्णासा आयामा किंचूणडतीसउडत्तुंगा ॥ १८६

अर्थ: वे प्रासाद पच्चीस योजन विस्तृत, पचास योजन आयत और कुछ कम अड़तीस योजन ऊंचे जानना चाहिये ॥१८६॥


तिण्णेव वरदुवारा मणितोरणमंडिया मणभिरामा।
वणवेदिपुहिं जुत्ता णाणामणिरयणपरिणामा ॥ १८७

घंटापडायपउरा मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा।
भिंगारकळसणिवहा वरदप्पणभूसिया पवरा ॥ १८८

अर्थ (गाथा 187 से 188): तीन उत्तम द्वारोंसे युक्त, मणिमय तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, वन-वेदियोंसे युक्त, नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप, प्रचुर घंटों व पताकाओंसे सहित, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, शृंगारों व कलशोंके समूहसे सहित,


लंबंतकुसुममाला गंधव्वमुदिंगसद्दगंभीरा । वरबुब्बुदेहिं छण्णा किंकिणिझंकाररमणीया ॥ १८९

बज्जंततूरणिवहा सुरबहुणट्टेहि सुट्ठेरमणीया । कालागरुगंधड्ढा बहुकुसुमच्चयच्चणसणाहा ॥ १९०

बलिधूवदीवणिवहा कुंकुमंकप्पूरगंधसंपण्णा । णाणापडायपउरा बहुकोदुगमंगलसणाहा ॥ १९१

अर्थ (गाथा 187 से 191): उत्तम दर्पणोंसे विभूषित, श्रेष्ठ, लटकती हुई पुष्पमालाओंसे संयुक्त, गन्धर्वों व मृदंगके शब्दसे गम्भीर, उत्तम बुद्बुदोंसे व्याप्त, किंकिणियोंके झंकारसे रमणीय, बजते हुए वादित्रसमूहसे युक्त, बहुतसे नर्तक देवोंसे अतिशय रमणीय, कालागरुके गन्धसे व्याप्त, बहुत कुसुमों द्वारा की गई पूजासे सनाथ; बलि, धूप व दीपोंके समूहसे संयुक्त; कुंकुम व कपूरके गन्धसे सम्पन्न, नाना पताकाओंके प्राचुर्यसे सहित और बहुत कौतुक मंगलोंसे सनाथ है ॥ १८७-१९१ ॥


सीहासणछत्तत्तयभामंडलचामरादिसंजुत्ता । जिणपडिमा णिद्दिट्ठा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ १९२

अर्थ: उन जिनप्रासादोंमें सिंहासन, तीन छत्रों, भामण्डल व चामरादिसे संयुक्त ऐसी नाना रत्नोंके परिणाम रूप जिनप्रतिमायें निर्दिष्ट की गई हैं ॥१९२॥


एक्केक्के पासादे जिणपडिमा विविहरयणसंछण्णा । अट्ठसयं अट्ठसयं गायव्वा होंति णियमेण ॥ १९३

अर्थ: विविध रत्नोंसे व्याप्त ये जिनप्रतिमायें एक एक प्रासादमें नियमसे एक सौ आठ एक सौ आठ जानना चाहिये ॥१९३॥


पंचधणुस्सयतुंगा पलियंकासणणिबद्धवरदेहा । लक्खणवंजणकलिया अंगोवंगेहि संछण्णा ॥ १९४

अर्थ: उक्त जिनप्रतिमायें पांच सौ धनुष ऊंची, पर्यंकासनसे युक्त उत्तम देहवाली तथा लक्षणों व व्यंजनोंसे युक्त अंगोपांगोंसे व्याप्त हैं ॥१९४॥


अट्ठसयं अट्ठसयं एक्केक्कजिणिंदपडिमस्स । उवयरणा णिद्दिट्ठा कंचणमणिरयणकयसोहा ॥ १९५

अर्थ: एक एक जिनेन्द्रप्रतिमाके सुवर्ण, मणि व रत्नोंसे की गई शोभासे सम्पन्न एक सौ आठ एक सौ आठ उपकरण निर्दिष्ट किये गये हैं ॥१९५॥


ससुरासुरदेवगणा विज्जाहरगरुडकिंणरा जक्खा । महि मं करंति सददं जिणपडिमाणं पयत्तेण ॥ १९६

अर्थ: सुर व असुर देवोंके समूह, विद्याधर, गरुड़, किन्नर और यक्ष निरन्तर उन जिनप्रतिमाओंकी प्रयत्नपूर्वक महिमा (पूजा) करते हैं ॥१९६॥


सयलावरवोहसहियं संतिकरं सयलदोसपरिहीणं । वरपउमनंदिणमियं संतिजिणिंदं णमंसामि ॥ १९७

अर्थ: पूर्ण ज्ञानसे सहित, शान्तिकारक, समस्त दोषोंसे रहित और उत्तम पद्मनन्दिसे वन्दित ऐसे शान्ति जिनेन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १९७॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे महाविदेहाहियारे अवरविदेहवण्णणो णाम णवमो उद्देसो समत्तो ॥ ९ ॥

दसमो उद्देसो

कुंथुजिणिंदं पणमिय कम्मारिकलंकपंकडग्गुक्कं । लवणसमुद्दविभागं वोच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥ १

जंबूद्दीवं परियदि समंतदो लवणतोयउदधी दु । सो बेण्णिसयसहस्सा णिद्दिट्ठो चक्कवालेण ॥ २

पुव्वेण दु पायालं वलयमुहं तह य होइ अवरेण । दक्खिणदिसे कदंबगजुवकेसरि होइ उत्तरदो ॥ ३

पंचाणउदिसहस्सा ओगाहिय लवणचक्कवालम्मि । ते खिदिविवरे जाणुसु अरंजणागारसंठाणा ॥ ४

मूलेसु य वदणेसु य वित्थारा दससहस्स णिद्दिट्ठा । ओगाढ सयसहस्सा तत्तियमित्ता य मज्झेसु ॥ ५

पायालस्स विभागो हवदि य तेत्तीसजोयणसहस्सा । तिण्णिसया तेसीसा एक्कतिभागेण अहियेया ॥ ६

हेट्ठिल्लम्हि विभागे वादो उदकं तु उबरिमतिभागे । मज्झिल्लम्हि विभागे जलवादो चलाचलो तत्थ ॥७

मज्झिल्लम्हि दु भागे उप्पीडे लवणउदस्सभो परमो । उप्पीडे उवसंते अवट्ठिदा बेल डयदिस्स ॥ ८

अर्थ (गाथा 1 से 8): कर्म-शत्रुरूपी कलंक-पंकसे रहित ऐसे कुंथु जिनेन्द्रको प्रणाम करके आनुपूर्वीके अनुसार लवण समुद्रके विभागको कहते हैं ॥ १ ॥ दो लाख योजन विस्तारवाला वह लवण समुद्र वृत्ताकार होकर चारों ओरसे जम्बूद्वीपको वेष्टित करता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ २ ॥ पूर्वमें पाताल, पश्चिममें वलयमुख (वडवामुख), दक्षिण दिशामें कदंबक और उत्तरमें यूपकेसरी, इस प्रकार ये चार पाताल लवण समुद्रकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ३ ॥ वलयाकार लवण समुद्रमें पंचानबै हजार योजन जाकर वे पाताल अंजनके आकारसे स्थित हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४ ॥ इनका विस्तार मूलमें व मुखमें दश हजार योजन, अवगाह एक लाख योजन तथा इतना (एक लाख यो.) ही मध्यमें विस्तार भी निर्दिष्ट किया गया है ॥ ५ ॥ पातालके तीन त्रिभागोंमेंसे प्रत्येक त्रिभाग तेतीस हजार तीन सौ तेतीस योजन और एक तृतीय भागसे अधिक (३३३३३ १/३ यो.) है ॥ ६ ॥ पातालोंके अधस्तन त्रिभागमें वायु, उपरिम त्रिभागमें जल, और मध्यम त्रिभागमें चलाचल जल-वायु है ॥ ७ ॥ मध्यम त्रिभागके उत्पीड़ित होनेपर अर्थात् उसके जलभागसे रहित होकर केवल वायुसे परिपूर्ण होनेपर लवण समुद्रका उत्कृष्ट उत्सेध होता है । उत्पीड़नके शान्त होनेपर समुद्रकी बेला अवस्थित रहती है ॥ ८ ॥ उनके


तेसिं उस्ससणेण य सिहा पवट्टेदि सव्वदो लवणे । सोलसहस्स मज्झे जोयणअद्धं तु तह अंते ॥ ९

अर्थ: उच्छ्वाससे अर्थात् नीचेके दो त्रिभागोंके केवल वायुसे पूर्ण होनेपर लवण समुद्रके सब ओर मध्यमें सोलह हजार योजन और अन्तमें अर्ध योजन प्रमाण शिखा प्रवृत्त होती है ॥ ९ ॥


अवराणि य अण्णाणि य सहस्सं तम्हि सागरे । ओगाडाणि समंतेण जलउदो वित्थडाणि य ॥ १०

अर्थ: उस समुद्रमें अन्य एक हजार जघन्य पाताल भी हैं। उनका अवगाह और मध्यम विस्तार (सौ योजन) समान है (?) ॥ १० ॥


चदुसु वि दिसासु चत्तारि जेट्ठया मज्झिमा य विदिसासु । अवरुत्तरमेक्केक्कं पणुवीस सयं जहण्णा दु ॥ ११

अर्थ: चारों दिशाओंमें चार ज्येष्ठ पाताल और विदिशाओंमें चार मध्यम पाताल हैं। इनमेंसे एक एकके इस ओर तथा उस ओर एक सौ पच्चीस जघन्य पाताल स्थित हैं ॥ ११ ॥


एगसहस्सं अट्ठुत्तरं तु पादालसंख विण्णेया । मुहमूलेसु सयं खलु सहस्स ओवेह डहराणं ॥ १२

अर्थ: पातालोंकी संख्या एक हजार आठ जानना चाहिये। इन जघन्य पातालोंका विस्तार मुखमें और मूलमें सौ योजन तथा उद्वेध एक हजार योजन प्रमाण है ॥ १२ ॥


मुहमूले वेहो वि य डहराणं दसगुणं तु मज्झिमया । सव्वत्थ मज्झिमा वि य दसगुणिद महल्लया होंति ॥

अर्थ: मध्यम पातालोंके मुख व मूलमें विस्तार तथा उद्वेधका प्रमाण जघन्य पातालोंकी अपेक्षा दशगुणा (१०००) है। ज्येष्ठ पाताल सर्वत्र मध्यम पातालोंकी अपेक्षा दशगुणित ह ॥ १३ ॥


णव चेव सयसहस्सा अडदालाहं सहस्स छव्च सया । तेसीदिजोयणाई समधिय परिधी समुद्दिट्ठा ॥ १४

अर्थ: लवण समुद्रकी [मध्यम] परिधि नौ लाख अड़तालीस हजार छह सौ तेरासी योजनोंसे कुछ अधिक कही गई है ॥ १४ ॥


सत्तावीससहस्सा दोण्णि य लक्खा तहेव सत्तरि सयं । साहियतिण्णि य कोसा तहुंतरं जाण जेट्ठाणं ॥ १५

अर्थ: ज्येष्ठ पातालोंका अन्तर दो लाख सत्ताईस हजार एक सौ सत्तर योजन और तीन कोशसे कुछ अधिक जानना चाहिये (९४८६८३ - ४०००० ÷ ४ = २२७१७० ३/४) ॥ १५ ॥


एक्कं च सदसहस्सा पंचासीदा य तेरससहस्सा । मज्झिमपादालाणं तहंतरं साहियक्कोसं ॥ १६

अर्थ: [ज्येष्ठ] और मध्यम पातालोंका अन्तर एक लाख तेरह हजार पचासी योजन और एक कोशसे कुछ अधिक है (२२७१७० ३/४ - १००० ÷ २ = ११३०८५ ३/८) ॥ १६ ॥


सत्तसदट्ठानउददा सत्तत्तीसा य जोयणा भणिया। खुल्लगपादालाणं अंतरमधियं मुणेदव्वं ॥ १७

अर्थ: क्षुद्र पातालोंका अन्तर सात सौ अट्ठानबै योजन और [ एक योजनके एक सौ छन्बीस भागोंमेंसे ] सैंतीस भागोंसे कुछ अधिक कहा गया जानना चाहिये {११३०८५ ३/७ - (१२५ x १००) ÷ १२६ = ७९८ २९९/१००८ } ॥ १७ ॥


पुण्णिमदिवसे लवणो सोलसजोयणसहस्सउच्छंगो। अमवासिदिणे णेया एयारसजोयणसहस्सा ॥ १८

अर्थ: लवण समुद्र पूर्णिमाके दिन सोलह हजार योजन और अमावस्याके दिन ग्यारह हजार योजन ऊंचा जानना चाहिये ॥ १८ ॥


समहियतिभाग जोयण तिण्णेव सया हवंति तेत्तीसा। उच्छेओदयपडिवड्ढी दिवसे दिवसे समुद्दिठ्ठा ॥ १९

अर्थ: लवण समुद्रके जलमें प्रतिदिन एक त्रिभागसे अधिक तीन सौ तेतीस योजन प्रमाण वृद्धि कही गई है ॥ १९ ॥


किण्हेण होइ हाणी सुक्किलपक्खेण होइ परिवड्ढी। पण्णरसेणं विभत्ता पंचसहस्सा समुद्दिठ्ठा ॥ २०

अर्थ: कृष्ण पक्षमें लवण समुद्रके जलमें [ प्रतिदिन ] पन्द्रहसे विभक्त पांच हजार ( ५०००/१५ = ३३३ १/३ ) योजन प्रमाण हानि और शुक्ल पक्षमें उतनी ही वृद्धि कही गई है ॥ २० ॥


मुहभूमिविसेसेण य उच्छेयं भजिदं तु सा हवे वड्ढी। इच्छागुणिदं मुहपक्खित्ते य होइ इच्छफलं ॥ २१

अर्थ: भूमिमेंसे मुखको कम करके उत्सेधका भाग देनेपर वृद्धिका प्रमाण आता है। इच्छासे गुणित वृद्धिको मुखमें मिलानेपर इच्छित फल होता है ॥ २१ ॥


वित्थार दससहस्सा मज्झम्मि दु होइ लवणठवहिस्स। अवगाढो दु सहस्सं मक्खीपक्खोवमो अंते ॥ २२

अर्थ: लवण समुद्रका विस्तार मध्यमें दश हजार योजन और अवगाह एक हजार योजन प्रमाण है। अन्तमें वह मक्खीके पंखके समान है ॥ २२ ॥ लवण समुद्रके अवगाह अर्थात्


अवगाढे पुण णेओ हाणी वड्ढी य होइ लवणस्स । पविसंतो परिवड्ढी णीयंती होइ परिहाणी ॥ २३

अर्थ: विस्तारमें हानि और वृद्धि जानना चाहिये । इनमेंसे प्रवेश करते समय वृद्धि और आते समय हानि हुई है ॥ २३॥


पंचाणउदिसहस्सा जोयणसंखा य हाणिवड्ढिस्स । खेत्तस्स दु णायव्वा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ २४

अर्थ: सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट हानि-वृद्धिके क्षेत्रका प्रमाण पंचानवै हजार योजन जानना चाहिये ॥ २४॥


मज्झम्मि दु णायव्वो अवट्ठिओ तत्थ होइ अवगाढो। दोसु वि पासेसु तहा खेत्तो अणवट्ठिदो लवणे ॥ २५

अर्थ: वहाँ लवण समुद्रका अवगाह ( विस्तार ) मध्यमें अवस्थित और दोनों ही पार्श्व भागोंमें विस्तारक्षेत्र अनवस्थित है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २५॥


पंचाणउदइ भागा हाणी वड्ढी दु होइ णायव्वा । इच्छगुणं काऊणं जं लद्धं होइ इच्छफलं ॥ २६

अर्थ: जलशिखाके विस्तारमें [ सोलह हजार योजन प्रमाण ऊंचाईमेंसे प्रत्येक योजनकी ऊंचाईपर आठसे भाजित ] पंचानवै भाग ( ९५/८ ) प्रमाण हानि अथवा वृद्धि होती है, ऐसा जानना चाहिये । इस हानि-वृद्धिको इच्छासे गुणित करके जो प्राप्त हो वह इच्छित फल होता है ॥ २६॥


बादलीस सहस्सा गंतूणं जोयणाणि वेदीदो । बेलंधरदेवाणं अट्ठेव य पव्वदा होंति ॥ २७

अर्थ: वेदीसे ब्यालीस हजार योजन जाकर बेलंधर देवोंके आठ पर्वत हैं ॥२७॥


जोयणसहस्सुत्तुंगा कलसद्धसमाणभासुरा विउला । वणवेदिपुढिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ २८

वलयामुहाण गेया दो दो पासेसु होंति णायव्वा । अक्खयअणादृणिहणा णाणामणिरयणपरिणामा ॥ २९

अर्थ (गाथा 28 से 29): एक हजार योजन ऊंचे, अर्ध कलशके समान भासुर, विशाल, वन-वेदियोंसे युक्त, दिव्य और उत्तम तोरणोंसे मण्डित वे पर्वत वलयमुख (वडवामुख) प्रभृति पातालोंके दो पार्श्वभागोंमें दो दो हैं, ऐसा जानना चाहिये। ये पर्वत अक्षय, अनादिनिधन और नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप हैं ॥२८-२९॥


पुव्वेण होंति गेया कोत्थुभणामा णगा हु कणयमया । कोत्थुभणामसुरिंदा वसंति वेलंधरा तेसु ॥ ३०

अर्थ: इनमेंसे पूर्वकी ओर कौस्तुभ [और कौस्तुभास] नामक सुवर्णमय पर्वत हैं। उनके ऊपर कौस्तुभ [और कौस्तुभास] नामक वेलंधर सुरेन्द्र रहते हैं ॥३०॥


दक्खिणदिसेण गेया दगभासा अंकरयणमयसेला । दगभासदेवसहिदा बहुविहपासादसंछण्णा ॥ ३१

अर्थ: दक्षिण दिशाकी ओर [उदक और] उदकभास देवोंसे सहित तथा बहुत प्रकारके प्रासादोंसे व्याप्त अंकरत्नमय [उदक और] उदकभास नामक शैल जानना चाहिये ॥३१॥


पच्छिमदिसेण सेला रूप्पमया संखजुवलवरणामा । संखजुगलाभिधाणा वसंति वेलंधरा देवा ॥ ३२

अर्थ: पश्चिम दिशामें उत्तम शंखयुगल (शंख व महाशंख) नामवाले रजतमय शैल जानना चाहिये। इनके ऊपर शंखयुगल (शंख और महाशंख) नामक बेलंधर देव निवास करते हैं ॥३२॥


उत्तरदिसेणं गेया वेहूलियमया हवंति वरसेला । दगसीमंदेवसहिदा दससीमा होंति णामेण ॥ ३३

अर्थ: उत्तर दिशामें वैदूर्यमणिमय उदकसीम [उदक और उदवास] नामक उत्तम शैल हैं। इनके ऊपर उदकसीम [उदक और उदवास] नामक देव हैं ॥ ३३ ॥ सब ही दिव्य पर्वत


सव्वे वि वेदिसहिया वरतोरणमंडिया मणाभिरामा ।
धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविभूसिया दिव्वा ॥ ३४

अर्थ: वेदीसे सहित, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित और जिनभवनसे विभूषित हैं ॥ ३४ ॥


पायालाणं णेया उभये पासेसु तह य सिहरेसु ।
आयासे णिविट्ठा पण्णगदेवाण णगराणि ॥ ३५

अर्थ: पातालोंके उभय पार्श्वभागोंमें तथा शिखरोंपर आकाशमें पन्नग (नागकुमार) देवोंके नगर निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ३५ ॥


बावत्तरिं सहस्सा बाहिरमब्भंतरं च बावत्ता ।
अग्रोदगं धरंता अट्ठावीसं सहस्साणि ॥ ३६

एयं च सयसहस्सा सुजण सहस्साणि चेव बावत्ता ।
वेलासु दोसु अग्गोदगे य लवणम्हि अच्छंता ॥ ३७

अर्थ (गाथा 36 से 37): लवण समुद्रकी बाह्य (धातकीखंडकी ओर) वेलाको धारण करनेवाले बहत्तर हजार, अभ्यन्तर (जम्बूद्वीपकी ओर) वेलाको धारण करनेवाले ब्यालीस हजार और अग्रोदक (जलशिखा) को धारण करनेवाले अट्ठाईस हजार इस प्रकार लवण समुद्रमें दोनों वेलाओंके ऊपर व अग्रोदक (शिखर) पर एक लाख ब्यालीस हजार (७२००० + ४२००० + २८०००) नागकुमार देव स्थित हैं ॥३६-३७॥


तत्तो वेदीदो पुण बायालसहस्स जोयणा गंतूं ।
विदिसामु होंति दीवा बायालसहस्सविच्छिण्णा ॥ ३८

अर्थ: पुनः उस वेदीसे ब्यालीस हजार योजन जाकर विदिशाओंमें ब्यालीस हजार योजन विस्तीर्ण [ आठ ] द्वीप हैं ॥ ३८ ॥


दीवेसु तेसु णेया णगराणि हवंति रयणणिवहाणि ।
णागाणं णिविट्ठा गोउरपायार णिवद्धाणि ॥ ३९

अर्थ: उन द्वीपोंमें रत्नसमूहोंसे युक्त और गोपुर एवं प्राकार समूहसे संयुक्त नागकुमारोंके नगर निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये ॥ ३९ ॥


वेदीदो गंतूणं बारह तह जोयणसहस्साणि ।
वायव्वदिसेण पुणो होइ समुद्देम्मि वरदीवो ॥ ४०

बारहसहस्सुत्तुंगो वित्थिण्णायामतेत्तिओ चेव ।
कंचणवेदीसहिओ मरगयवरतोरणुत्तुंगो ॥ ४१

ससिकंतसूरकंतो कक्कयणपउमरायमणिवहो ।
वरवज्जकणयविद्दूममरगयपासादसंजुत्तो ॥ ४२

गोदुमणामो दीवो णाणावरुगहणसंकुलो रम्मो ।
पोक्खरिणवाविपउरो जिणभवणविभूसिओ दिव्वो ॥ ४३

अर्थ (गाथा 40 से 43): वेदीसे वायव्य दिशाकी ओर बारह हजार योजन जाकर समुद्रमें गोतम नामक उत्तम द्वीप है। यह दिव्य द्वीप बारह हजार योजन ऊंचा, इतने ही विस्तार व आयामसे संयुक्त, सुवर्णमय वेदीसे सहित, मरकत मणिमय उत्तम तोरणोंसे उन्नत; चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, कर्केतन एवं पद्मराग मणियोंके समूहसे सहित; उत्तम वज्र, सुवर्ण, विद्रुम एवं मरकत मणिमय प्रासादोंसे संयुक्त; नाना वृक्षोंके वनोंसे व्याप्त, रम्य, प्रचुर पुष्करिणियों एवं वापिकाओंसे युक्त और जिनभवनोंसे विभूषित है ॥ ४०-४३ ॥


बेकोससमहिरेया बासट्ठा जोयणा समुत्तुंगा ।
गोद्दुमसुरस्स भवणं तदद्धविक्खंभआयामं ॥ ४४

अर्थ: इस द्वीपमें दो कोश अधिक बासठ योजन ऊंचा, इससे आधे विस्तार व आयामसे सहित, दो कोश अवगाहसे युक्त, नाना मणियों एवं रत्नोंसे मण्डित, तथा


बेगाउवअवगाहं णाणामणिरयणमंडियं दिव्वं ।
जोयणअट्टुतुंगं तदद्धविक्खंभ वरदारं ॥ ४५

अर्थ (गाथा 44 से 45): आठ योजन ऊंचे एवं इससे आधे विस्तारवाले उत्तम द्वारोंसे युक्त गोतम सुरका दिव्य भवन है ॥४४-४५॥


पहलाउगा महप्पा दसधणुउच्चंगदिव्ववरदेहा ।
दीवेसु होंति देवा आभरणविभूसियसरीरा ॥ ४६

अर्थ: द्वीपमें पल्य प्रमाण आयुके धारक, महात्मा, दश धनुष ऊंचे उत्तम दिव्य शरीरसे युक्त और आभरणोंसे विभूषित देहवाले देव स्थित हैं ॥ ४६ ॥


वेदीदो गंतूणं पंचसया जोयणाणि लवणम्मि ।
चदुसु वि दिसासु होंति हु जोयणसयवित्थडा दीवा ॥ ४७

अर्थ: वेदीसे पांच सौ योजन लवण समुद्रमें जाकर चारों ही दिशाओंमें एक सौ योजन विस्तारवाले द्वीप हैं ॥ ४७ ॥


पुणरवि तत्तो गंतुं पण्णासा जोयणाणि पंचसया ।
विदिसासु होंति दीवा पण्णासा वित्थडा णेया ॥ ४८

अर्थ: फिर भी उक्त वेदीसे पांच सौ पचास योजन लवण समुद्रके भीतर जाकर विदिशाओंमें पचास योजन विस्तारवाले द्वीप जानना चाहिये ॥ ४८ ॥


दिसाविदिसंतरदीवा पण्णासा वित्थडा जलणिहिम्मि ।
वेदीदो गंतूणं पंचैव य जोयणसयाणि ॥ ४९

अर्थ: पुनः वेदीसे पांच सौ योजन समुद्रमें जाकर दिशा-विदिशाओंके अन्तरालमें पचास योजन विस्तृत अन्तरद्वीप हैं ॥ ४९ ॥


गिरिसिसगया दीवा पणुवीसा वित्थडा समुद्दिठ्ठा ।
वेदीदो गंतूणं छव्वेव य जोयणसयाणि ॥ ५०

अर्थ: वेदीसे छह सौ योजन जाकर [ हिमवान्, विजयार्ध व शिखरी ] पर्वतोंके शिखरपर (प्रणिधि भागमें ) स्थित द्वीप पच्चीस योजन विस्तृत कहे गये हैं ॥ ५० ॥


चदुसु वि दिसासु चउरो विदिसासु वि तेत्तिया समुद्दिठ्ठा ।
गिरिसीसगया अट्ठ य तावदिया अंतरे दीवा ॥ ५१

अर्थ: चारों दिशाओंमें चार, विदिशाओंमें चार, गिरिशिखरगत आठ और इतने ही द्वीप दिशा-विदिशाओंके अन्तरमें स्थित कहे गये हैं ॥ ५१ ॥


चउवीस वि ते दीवा चउकोसा उट्ठिया जलादादो ।
वरवेदियाहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ ५२

अर्थ: वे चौबीस ही दिव्य द्वीप जलसे चार कोश ऊंचे, उत्तम वेदियोसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित हैं ॥ ५२ ॥


एगोरुगा य लंगोलिगा य वेसाणिया य ते कमसो ।
पुव्वादिसु णाएव्वा अभासगा उ परा होंति ॥ ५३

अर्थ: पूर्वादिक दिशाओंमें स्थित उक्त द्वीपोंमें क्रमसे एक ऊरुवाले, पुच्छवाले, विषाणी और अभाषक ( गूंगे ) मनुष्य होते हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ ५३ ॥


सक्कुलिकण्णा णेया कण्णप्पावरणे लंबकण्णा य ।
ससकण्णा कुमाणुस्सा कमसो विदिसासु विण्णेया ॥ ५४

अर्थ: विदिशाओंमें क्रमसे शष्कुलिकर्ण, कर्णप्रावरण, लंबकर्ण और शशकर्ण कुमानुष जानना चाहिये ॥ ५४ ॥


सीहमुहा अस्समुहा साणमुहा अंतेरेसु महिसमुहा ।
सूयरमुहवग्धमुहा धूगेमुहा कविमुहा चेव ॥ ५५

अर्थ: अन्तरद्वीपोंमें सिंहमुख, अश्वमुख, श्वानमुख, महिषमुख, शूकरमुख, व्याघ्रमुख, वूकमुख और कपिमुख मनुष्य होते हैं ॥ ५५॥


हेमगिरिस्स य पुव्वावरम्हि मच्छमुहकालवदणा य । तह दक्खिणवेअड्डे मेसमुहा गोमुहा होंति ॥ ५६

मेहमुहा विज्जुमुहा सिहरिस्स गिरिस्स पुव्वअवरम्हि । आदंसणहत्थिमुहा उत्तरवेअड्डणगसीसे ॥ ५७

अर्थ (गाथा 56 से 57): हिमवान् पर्वतके पूर्व व पश्चिम भागमें मत्स्यमुख और काल-मुख, दक्षिण वैताढ्यके दोनों ओर मेषमुख और गोमुख, शिखरी पर्वतके पूर्व व पश्चिम भागमें मेघमुख और विद्युन्मुख, तथा उत्तर वैताढ्य शिखरपर आदर्शमुख और हस्तिमुख मनुष्य रहते हैं ॥ ५६-५७ ॥


एगोरुगा गुहाए भूमिं जेमंति सेसगा य दुमे । जेमंति पुप्फफलभोयणाणि पल्लाउगा सव्वे ॥ ५८

अर्थ: एक ऊरुवाले कुमानुष गुफामें रहते हुए मिट्टीको खाते हैं, तथा शेष कुमानुष वृक्षके नीचे रहकर पुष्प व फल रूप भोजनोंको खाते हैं। इन सबकी आयु एक पल्य प्रमाण होती है ॥ ५८ ॥


अदिकाहलोहहीणा मंदकसाया पियंवदा धीरा । धम्माभासं किच्चा मिच्छत्तकलं कदोसेण ॥ ५९

धम्मफलं मग्गंता कायकिलेसं करित्तु गरुयं पि । अण्णाणतिमिरछण्णा पंचग्गितवं परमघोरं ॥ ६०

ते तेण तवेण तहा मरिऊणं अंतरेसु दीवेसु । उप्पज्जंति महप्पा कुमाणुसा भोगसंपण्णा ॥ ६१

अर्थ (गाथा 59 से 61): अधिक क्रोध व लोभसे रहित, मंदकषायी, प्रियभाषी और धीर प्राणी मिथ्यात्व रूप कलंकके दोषसे धर्माभासका सेवन करके, धर्मफल (सुख) को खोजते हुए भारी कायक्लेशको करके, तथा अज्ञानांधकारसे व्याप्त होते हुए अतिशय घोर पंचाग्नि तपको तपकर उस घोर तपके प्रभावसे मरकर वे प्राणी अन्तरद्वीपोंमें भोगोंसे सम्पन्न कुमानुष महात्मा उत्पन्न होते हैं ॥ ५९-६१ ॥


सम्मद्दंसणहीणा काऊणं बहुविहं तवोकम्मं । उप्पज्जंति यधण्णा कुमाणुसा रूवपरिहीणा ॥ ६२

अर्थ: सम्यग्दर्शनसे हीन होकर जो बहुत प्रकारके तपश्चरणको करते हैं वे पापी सुन्दरतासे रहित होते हुए कुमानुष उत्पन्न होते हैं ॥ ६२ ॥


अंदिमाणगव्विदा जे साहूणं पुण करंति अवमाणं । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६३

अर्थ: मानसे अत्यन्त गर्वित होकर जो साधुओंका अपमान करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ६३ ॥


संजमतवोघणाणं णिग्गंथाणं असंति जे पावा । ते कालगदा संतो कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६४

अर्थ: जो पापी संयम व तपरूपी धनसे युक्त निग्रंथोंको भूंकते हैं, अर्थात् निन्दा करते हैं, वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ६४ ॥


संजमतवेण हीणा मायाचारी हवंति जे पावा । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६५

अर्थ: जो पापी संयम व तपसे हीन तथा मायाचारी होते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ६५ ॥


रसइड्डिसाद्गारवमेहुणसण्णेहि मोहिदा जे दु । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६६

अर्थ: जो रस, ऋद्धि एवं सात इन तीन गारवोंसे तथा मैथुन संज्ञासे मोहित हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ६६ ॥


थूलसुहुमादिचारं णालोचइ जे गुरू ण पासम्मि । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६७

अर्थ: जो गुरुओंके पासमें स्थूल व सूक्ष्मादि क्रियाओंकी आलोचना नहीं करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ६७ ॥


सज्झायंणियमवंदण गुरुणा सहियं तु जे ण कुव्वंति । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६८

अर्थ: जो गुरुके साथ स्वाध्याय, नियम व वन्दना नहीं करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ६८ ॥


रिसिसंघं छंडित्ता अच्छइ जइ को वि तह य एगागी । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ६९

अर्थ: यदि कोई ऋषिसंघको छोड़कर एकाकी रहते हैं तो वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ६९ ॥


सव्वेहिं जणेहिं समं कलहं कुव्वंति जे दु पाविट्ठा । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७०

अर्थ: जो पापी सब जनोंके साथ कलह करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७० ॥


आहारसण्णपउरा लोभकसाएण संठिदा जे दु । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७१

अर्थ: जो आहार संज्ञाकी प्रचुरतासे संयुक्त और लोभ कषायसे मोहित हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७१ ॥


धरिऊण लिंगरूवं पावं कुव्वंति जे दु पाविट्ठा । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७२

अर्थ: जो पापिष्ठ [जिन] लिंग रूपको धारण कर पाप करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७२ ॥


ण करंति जे दु भत्ती अरहंताणं तहेव साहूणं । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७३

अर्थ: जो अरहंतों तथा साधुओंकी भक्ति नहीं करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७३ ॥


चाउव्ववणे संघे वच्छल्लं तह य जे ण कुव्वंति । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७४

अर्थ: जो चातुर्वर्ण्य संघमें वात्सल्य भावको नहीं करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७४ ॥


सिद्धांतं छंडित्ता जोइसमंतादिएसु जे मूढा । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७५

अर्थ: जो सिद्धान्तको छोड़कर ज्योतिष एवं मंत्रादिकोंमें मुग्ध होते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७५ ॥


धणधण्णसुवण्णादि संजदरूवम्हि जे दु गिण्हंति । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७६

अर्थ: जो संयत रूपमें धन, धान्य एवं सुवर्णादिको ग्रहण करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७६ ॥


कण्णाविवाहमादि संजदरूवम्हि जेणुमोदंति । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७७

अर्थ: जो संयत अवस्थामें कन्याविवाहादिकी अनुमोदन करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७७ ॥


मोणं परिच्चइत्ता भुंजंति पुणो वि जे दु पाविट्ठा । ते कालगदा संता कुमाणुसा होंति णायव्वा ॥ ७८

अर्थ: जो पापिष्ठ मौनको छोड़कर भोजन करते हैं वे मरकर कुमानुष होते हैं ॥ ७८ ॥ कर्मोदयसे सम्यक्त्वकी विराधना करके


कम्मोदएण जीवा सम्मत्तं विराहिऊणं ते सव्वे ।
उप्पज्जंति वराया कुमाणुसा लवणदीवेसु ॥ ७९

अर्थ: वे सब जीव बेचारे इन लवण समुद्रके द्वीपोंमें कुमानुष उत्पन्न होते हैं ॥ ७९ ॥


गब्भादो ते मनुया णिस्सरिऊणं सुहेण वरजुअला ।
उणवण्णदिणेहिं पुणो सुजोव्वणा होंति णायव्वा ॥ ८०

अर्थ: वे मनुष्य सुखपूर्वक गर्भसे उत्तम युगलके रूपमें निकल कर उनंचास दिनमें यौवन युक्त हो जाते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८० ॥


बेधणुसहस्सतुंगा मंदकसाया महंत्तलायण्णा ।
सुकुमारपाणिपादा णीलुप्पलसुरहिगंधङ्गा ॥ ८१

वरपंचवण्णजुत्ता णिम्मलदेहा अणेगसंठाणा ।
कप्पतरुजणियभोगा पलिदोवमभाउगा सव्वे ॥ ८२

अर्थ (गाथा 81 से 82): वे सब दो हजार धनुष ऊंचे, मंदकषायी, अतिशय सौन्दर्यसे परिपूर्ण, सुकुमार हाथ पैरोंसे सहित, नीलोत्पलके समान सुगन्ध गन्धसे व्याप्त, उत्तम पांच वर्णोंसे युक्त निर्मल देहवाले, अनेक आकारसे सहित, कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न भोगोंसे युक्त और पल्योपम प्रमाण आयुसे सहित होते हैं ॥ ८१-८२ ॥


लवणोवहिद्वीवेसु य भोत्तूणं कुमाणुसाण वरभोगं ।
मरिऊण सुहेण पुणो णरणारिगणा य जे तेसु ॥ ८३

उप्पज्जंति महप्पा मणिकंचणमंडिदेसु दिव्वेसु ।
सुरसुंदरिपरिवरेसु य ते सव्वे देवलोएसु ॥ ८४

अर्थ (गाथा 83 से 84): जो नर-नारीगण लवणोदधिके उन द्वीपोंमें कुमानुषोंके उत्तम भोगको भोगकर सुखसे मरते हैं वे सब महात्मा मणियों व सुवर्णसे मण्डित तथा प्रचुर देवाङ्गनाओंसे संयुक्त ऐसे दिव्य देवलोकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ ८३-८४ ॥


भवणवइवाणविंतरजोइसभवणेसु ताण उप्पत्ती ।
ण य अण्णत्थुप्पत्ती बोद्धव्वा होइ णियमेण ॥ ८५

अर्थ: उनकी उत्पत्ति नियमसे भवनपति, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके भवनोंमें होती है, अन्यत्र नहीं होती; ऐसा जानना चाहिये ॥ ८५ ॥


सम्मद्दंसणरयणं जेहिं सुगहियं णरेहिं णारीहिं ।
ते सव्वे मरिऊणं सोहम्माईसु जायंति ॥ ८६

अर्थ: जिन नर-नारियोंने सम्यग्दर्शनरूपी रत्नको ग्रहण कर लिया है वे सब मरकर सौधर्मादिक स्वर्गोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ ८६ ॥


पण्णारसयसहस्सा एगासीदा सयं च उगुदाळं ।
किंचिविसेसेणूणा होइ य लवणोवहिप्परिधी ॥ ८७

अर्थ: लवणोदधि की परिधि पन्द्रह लाख इक्यासी [हजार] एक सौ उनतालीस (१५८११३९) योजनसे कुछ कम है ॥ ८७ ॥


बाहिरसूचीवग्गो अब्भंतरसूचिवग्गपरिहीणो ।
जंबुद्दीवपमाणा खंडा ते होंति णायव्वा ॥ ८८

अर्थ: अभ्यन्तर सूचीके वर्गसे रहित बाह्य सूचीके वर्गको [ वर्गात्मक जम्बू-द्वीपके विष्कम्भसे विभक्त करनेपर ] जम्बूद्वीपके प्रमाण खण्ड होते हैं {(५०००००² - १०००००²) ÷ १०००००² = २४} ॥ ८८ ॥ विष्कम्भसे रहित [बाह्य] सूचीको चौगुणे


सूची विक्खंभूणा विक्खंभचउग्गुणेण संगुणिदं । जंबुद्दीवपमाणं खंडा ते होंति णायव्वा ॥ ८९

अर्थ: विष्कम्भसे गुणित करके पुन: [ एक लाखके वर्गसे विभक्त करनेपर ] जम्बूद्वीपके प्रमाण खण्ड होते हैं {(५०००००-२०००००) X (२००००० X ४) ÷ १०००००² = २४} ॥ ८९ ॥


जंबुद्दीवो दीवो जावदिओ होइ खेत्तमणिदेण । तावदियाणि दु लवणे खेत्तेण हवंति चउवीसा ॥ ९०

अर्थ: क्षेत्रफलकी अपेक्षा जितना जम्बूद्वीप है उतने क्षेत्रके प्रमाणसे लवण समुद्रके चौबीस खण्ड होते हैं ॥ ९० ॥


दुगुणिम्हि तु विक्खंभे दोसु वि पासेसु सोहियस्स कदी ।
सोझस्स दु चदुभागो वग्गिदगुणिदं च दसगुणं गणिदं ॥ ९१

अर्थ: दोनों ही पावों (बाह्य सूची) मेंसे दुगुणे व्यासको घटाकर शेषके वर्गको शोध्य राशिके चतुर्थ भागके वर्गसे गुणित कर पुन: दशगुणा करनेपर प्राप्त राशिके वर्गमूल प्रमाण [वलयाकार क्षेत्रका] क्षेत्रफल होता है (?) ॥ ९१ ॥


विक्खंभकदीय कदी दसगुण करणी य होदि चदुभजिदं । वासद्धकदीय कदी दसगुण करणीय गणितपदं ॥ ९२

अर्थ: विष्कम्भके वर्गके वर्गको दशगुणा कर उसका वर्गमूल निकालनेपर जो प्राप्त हो उसमें चारका भाग देनेसे [वृत्त क्षेत्रका] क्षेत्रफल होता है। अथवा, अर्ध व्यासके वर्गके वर्गको दशगुणा करके उसका वर्गमूल निकालनेपर [वृत्तक्षेत्रका] क्षेत्रफल निकलता है ॥ ९२ ॥


एगट्ठ णव य सत्त य तिय छ च्छक्क पंच णव य छहस य । जोयणसंखा भणिया लवणसमुद्दि गणितपदं ॥ ९३

अर्थ: अंकक्रमसे एक, आठ, नौ, सात, तीन, छह, छह, पांच, नौ, छह और दश (१८९७३६६५९६१०) इतने योजन प्रमाण लवण समुद्रका क्षेत्रफल कहा गया है ॥ ९३ ॥


एगणवसत्तछच्चदुदुगतिपयंतियसत्तछद्दसुण्णं । जोयणसंखा भणिदा उभयोरिवि होइ गणितपदं ॥ ९४

अर्थ: एक, नौ, सात, छह, चार, दो तीन, पांच, तीन, सात, छह और शून्य, इन अंकोंके क्रमसे जो संख्या (१९७६४२३५३७६०) उत्पन्न हो उतने योजन प्रमाण जम्बूद्वीप और लवण समुद्र इन दोनोंका सम्मिलित क्षेत्रफल कहा गया है ॥ ९४ ॥


दीवस्स समुद्दस्स वा विक्खंभं चदुहिं संगुणं णियतं । तिण्णि सदसहस्स ऊणा सा सूची सव्वकरणेसु ॥ ९५

अर्थ: द्वीप अथवा समुद्रके विष्कम्भको चारसे गुणित करके जो प्राप्त हो उसमेंसे तीन लाख कम कर देनेपर शेष रहा नियमसे सब करणोंमें उसकी सूची (बाह्य) का प्रमाण होता है ॥ ९५ ॥


जत्थिच्छसि विक्खंभं लवणादी जाव ताव दुगरासी । अण्णोण्णेहि य गुणिदे पुणरवि गुणिदं सदसहस्सा ॥

अर्थ: लवण समुद्रको आदि लेकर जिस किसी भी द्वीप अथवा समुद्रके विस्तारके जाननेकी इच्छा हो उतने दो अंकोंको रखकर परस्परमें गुणा करनेपर जो राशि प्राप्त हो उसे एक लाखसे फिरसे गुणित करना चाहिये [ जैसे पुष्कर द्वीपका विस्तार - १००००० x (२ x २ x २ x २)= १६००००० यो. ] ॥ ९६ ॥


लवणसमुद्दस्स तहा बज्जमया वेदिया समुद्दिट्ठा । अट्ठेव य उव्विद्धा कंचणमणिरयणसंछण्णा ॥ ९७

अर्थ: तथा लवण समुद्रकी सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंसे व्याप्त आठ योजन ऊंची वज्रमय वेदिका कही गई है ॥ ९७ ॥


मूले बारह जोयण मज्झे अट्ठेव जोयणा णेया । सिहरे चत्तारि हवे वित्थिण्णा वेदिया दिव्वा ॥ ९८

अर्थ: यह दिव्य वेदिका मूलमें बारह, मध्यमें आठ और शिखरपर चार योजन बिस्तीर्ण है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ९८ ॥


बेजोयणअवगाहा धयचामरमंडिया मणभिरामा । सुरसुंदरिसंजुत्ता सुरभवणसमाउला रम्मा ॥ ९९

धुव्वंतधयवडाया जिणभवणविहूसिया परमरम्मा । परिवेढिऊण उवहिं समंतदो संठिया दिव्वा ॥ १००

अर्थ (गाथा 99 से 100): दो योजन अवगाहसे युक्त, ध्वजाओं व चामरोंसे मण्डित, मनको अभिराम सुरसुन्दरियोंसे संयुक्त, रम्य, देवभवनोंसे व्याप्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित और जिनभवनसे विभूषित ऐसी वह अतिशय रमणीय दिव्य वेदिका लवण समुद्रको सब ओरसे वेष्टित करके स्थित है ॥ ९९-१०० ॥


चदुगोउरसंजुत्ता चोद्दसवरतोरणेहि रमणीया । वरकप्परुक्खपउरा णाणात रुसंकुला रम्मा ॥ १०१

अर्थ: उक्त रमणीय वेदिका चार गोपुरोंसे संयुक्त, चौदह उत्तम तोरणोंसे रमणीय, श्रेष्ठ कल्पवृक्षोंकी प्रचुरतासे सहित और नाना वृक्षोंसे व्याप्त है ॥ १०१ ॥


अट्ठद्धकम्मरहियं अट्ठमहापाडिहेरसंजुत्तं । वरपउमणंदिणमियं अरतित्थयरं णमंसामि ॥ १०२

अर्थ: आठके आधे अर्थात् चार कर्मोंसे रहित, आठ महाप्रातिहार्योंसे संयुक्त और श्रेष्ठ पद्मनन्दिसे नमस्कृत ऐसे अर तीर्थंकरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १०२ ॥


॥ इय जम्बूदीवपण्णत्तिसंगहे लवणसमुद्दवावण्णणो णाम दसमो उद्देसो समत्तो ॥ १० ॥

एक्कारसमो उद्देसो (भाग 1/2)

मल्लिजिणिंदं पणमिय महंतवरणाणदंसणपईवं । दीवोवहिअहलोगं सुरलोयं संपवक्खामि ॥ १

अर्थ: महान् व उत्तम ज्ञान-दर्शनरूपी प्रदीपसे युक्त मल्लि जिनेन्द्रको प्रणाम करके द्वीप, उदधि, अधोलोक और सुरलोककी प्ररूपणा करते हैं ॥ १ ॥


धादगिसंडो दीवो उदधिं लवणोदयं परिक्खिवदि । चत्तारिसयसहस्सा वित्थिण्णो चक्कवालम्हि ॥ २

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीप लवण समुद्रको वेष्टित करता है। यह द्वीप वलयाकारसे चार लाख योजन विस्तृत है ॥ २ ॥


दक्खिणउत्तरभागेसु तस्स दो दक्खिणुत्तरायामा । दीवस्स दु उसुगारा धादगिदीवं पविभजंति ॥ ३

अर्थ: उस धातकीखण्ड द्वीपके दक्षिण-उत्तर भागोंमें दक्षिण-उत्तर आयत ऐसे दो इष्वाकार पर्वत हैं, जो धातकीखण्ड द्वीपका विभाग करते हैं ॥ ३ ॥


णिसधस्सुच्छेहसमा पुट्ठा कालोदयं च लवणं च । बाहिरपरंतेसु य खुरप्परूवा गिरी होंति ॥ ४

अंते अंकमुहा खलु सहस्समेयं च होंति वित्थिण्णा । सयमेयं उव्वेहो आयामो दक्खिणुत्तरदो ॥ ५

अर्थ (गाथा 4 से 5): निषध पर्वतके समान उत्सेधवाले तथा लवण व कालोद समुद्रसे स्पृष्ट ऐसे वे इष्वाकार पर्वत बाह्य भागमें क्षुरप्रके आकार तथा अभ्यन्तर भागमें अंकमुख हैं। इनका विस्तार एक हजार योजन, उद्वेध एक सौ योजन और आयाम दक्षिण-उत्तरमें [ धातकीखण्डके विस्तार प्रमाण ] है ॥ ४-५ ॥


वंसधरा वंसधरो चउग्गुणो होइ धादगीसंडे । वंसादो वि य वंसो चउग्गुणो होइ बोद्धव्वो ॥ ६

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें कुलपर्वतसे कुलपर्वत और क्षेत्रसे क्षेत्र चौगुणे जानना चाहिये [ जैसे भरतक्षेत्रका अभ्यन्तर विस्तार ६६१४ १२/२२ यो. है, इससे चौगुणा ( २६४५८ २/११ यो. ) हैमवतक्षेत्रका अभ्यन्तर विस्तार है ] ॥ ६ ॥


जो जस्स पडिनिही खलु णदी दहो चावि अहव वंसधरो । उव्वेधुव्वेहसमा दुगुणा दुगुणा य वित्थारो ॥ ७

अर्थ: इस द्वीपमें स्थित नदी, द्रह और कुलपर्वत, इनमें जो जिसका प्रतिनिधि है उसका उद्वेध [ जम्बूद्वीपके समान; परन्तु विस्तार [ जम्बूद्वीपकी अपेक्षा ] दूना दूना है ॥ ७ ॥


अरविवरसंठियाणि य धादगिसंडम्हि होंति वंसाणि । अंतो संखित्ताइं बाहिरपासम्हि रुंदाई ॥ ८

अर्थ: धातकीखण्डमें स्थित क्षेत्र अरविवर ( पहियेके मध्यमें लगी हुई लकड़ियोंके बीचके छेद ) के आकार होते हुए अभ्यन्तर भागमें संक्षिप्त और बाह्य पार्श्वमें विस्तीर्ण हैं ॥ ८ ॥


धादगिसंडे दीवे सव्वत्थ समा हवंति वंसधरा । भरहेसु रेवदे खलु वित्थिण्णा दीहवेद्दड्ढा ॥ ९

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें वर्षधर पर्वत सर्वत्र समान हैं। यहां भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें विस्तीर्ण दीर्घ वैताढ्य पर्वत स्थित हैं ॥ ९ ॥


अंकमुहसंठिदाई अंतो वंसाणि धादगीसंढे । सत्तिमुहसंठिदाई बाहिरसगडुद्धियाबाहा ॥ १०

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्र अन्तमें अंकमुखाकार और बाह्यमें शक्तिमुखाकारसे स्थित हैं। इनकी भुजा गाड़ीकी ऊर्ध्विकाके समान है ॥ १० ॥


लक्खा य अट्ठवीसा छादालंसहस्समेव पण्णं च । धादगिसंडे मज्झे परिरयमेत्तं वियाणाहि ॥ ११

अर्थ: धातकीखण्डके मध्यमें परिधिका प्रमाण अट्ठाईस लाख छयालीस हजार पचास ( २८४६०५० ) योजन जानना चाहिये ॥ ११ ॥


इगिदालंसयसहस्सा दससहस्सा सदा य णव होंति । एगट्ठा किंचूणा बाहिरदो धादगीसंढे १२

अर्थ: धातकीखण्डकी बाह्य परिधि इकतालीस लाख दश हजार नौ सौ इकसठ ( ४११०९६१ ) योजनसे कुछ कम है ॥ १२ ॥


अट्ठसदा बादाला अट्ठत्तरिमेगसयसहस्सं च । वंसधरेसु य रुद्धं जं खेत्तं धादगीसंढे ॥ १३

अर्थ: धातकीखण्डमें एक लाख अठत्तर हजार आठ सौ ब्यालीस [ योजन और दो कला ( १७८८४२ २/२१२ ) ] प्रमाण क्षेत्र पर्वतोंसे रुद्ध है ॥ १३ ॥


वंसधरविरहिदं खलु जं खेत्तं हवदि धादगीसंढे । तस्स दु छेदा णियमा बे चेव सदाणि बाराणि ॥ १४

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपमें जो पर्वत रहित क्षेत्र है उसके नियमसे दो सौ बारह खण्ड हैं {(१+४+१६+६४+१६+४+१) × २=२१२} ॥ १४ ॥


छच्चेव सहस्साई छच्च सया चोद्दसुत्तरा होंति । अब्भंतरविक्खंभो ऊणत्तीसं च भागसदं ॥ १५

अर्थ: छह हजार छह सौ चौदह योजन और दो सौ बारह भागोंमेंसे एक सौ उनतीस भाग ( ६६१४ १२९/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] अभ्यन्तर विष्कम्भ है ॥ १५ ॥


बारस चेव सहस्सा पयासीदा सदा य पंच हवे । मज्झम्हि दु विक्खंभो भागा य हवंति छत्तीसा ॥ १६

अर्थ: बारह हजार पांच सौ इक्यासी योजन और छत्तीस भाग ( १२५८१ ३६/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] मध्यविस्तार है ॥ १६ ॥


अट्ठारस य सहस्सा सिगिदालीसा सया य पंच भवे । बाहिरदो विक्खंभो पंचावण्णं च भागसयं ॥ १७

अर्थ: अठारह हजार पांच सौ सैंतालीस योजन और पचवन भाग ( १८५४७ ५५/२१२ ) प्रमाण [ भरतक्षेत्रका ] बाह्य विष्कम्भ है ॥ १७ ॥


धादगिपुक्खरमेरू चदुरासीदिं च जोयणसहस्सा । उच्छेधेण दु एदे सहस्समोगाढ धरणितले ॥ १८

अर्थ: धातकीखण्ड और पुष्कर द्वीप सम्बन्धी मेरु चौरासी हजार योजन ऊंचे और पृथिवीतलमें एक हजार योजन प्रमाण अवगाहसे सहित हैं ॥ १८ ॥


जत्थिच्छसि विक्खंभं चुल्लयमेरुम्हि उवदिट्ठाणं । दसभाजिदे जं लद्धं सहस्ससहिदं वियाणाहि ॥ १९

अर्थ: ऊपरसे नीचेकी ओर आते हुए जितने योजन नीचे जाकर इन क्षुद्र मेरुओंका विस्तार जानना अभीष्ट हो उनमें दशका भाग देनेपर जो प्राप्त हो, एक हजार योजनोंसे सहित उतना वहांपर विस्तार जानना चाहिये ॥ १९ ॥


मूलम्हि दु विक्खंभो पंचाणउद्दिं च जोयणसदाणिं ।
परिरयं तीससहस्सा वादालीसा य किंचूणा ॥ २०

अर्थ: इन मेरुओंका विस्तार मूलमें पंचानबै सौ ( ९५०० ) योजन प्रमाण है। इनकी परिधि तीस हजार ब्यालीस ( ३००४२ ) योजनसे कुछ कम है ॥ २० ॥


धरणितले विक्खंभो चदुणउद्दी होंति जोयणसदाणि ।
परिरय उणातीसं सत्त य पणुवीस साहीया ॥ २१

अर्थ: उक्त मेरुओंका विस्तार पृथिवीतलपर चौरानबै सौ ( ९४००) योजन प्रमाण और परिधि उनतीस [ हजार ] सात सौ पच्चीस ( २९७२५ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २१ ॥


पंचेव जोयणसया उड्ढं गंतूण णंदणं होइ ।
पंचसदा वित्थिण्णा पढमा सेढी दु चुल्लाणं ॥ २२

अर्थ: मेरुके ऊपर पांच सौ योजन जाकर पांच सौ योजन विस्तीर्ण नन्दन वन है । यह क्षुद्र मेरुओंकी प्रथम श्रेणी है ॥ २२ ॥


तेणउद्दिं पण्णासा बाहिरविक्खंभ परिरओ तस्स ।
उणातीससहस्सा पंच य सट्ठि साहीया ॥ २३

अर्थ: नन्दन वनके समीप क्षुद्र मेरुओंका बाह्य विष्कम्भ तेरानबै सौ पचास ( ९३५० ) योजन और इसकी परिधि उनतीस हजार पांच सौ सड़सठ ( २९५६७ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २३ ॥


तेसीदिं पण्णासा अंतोविक्खंभपरिरओ तस्स ।
छब्बीसं च सहस्सा चदुसद पंचेव साहीया ॥ २४

अर्थ: नन्दन वनके समीप क्षुद्र मेरुओंका अभ्यन्तर विष्कम्भ तेरासी सौ पचास ( ८३५० ) योजन और इसकी परिधि छब्बीस हजार चार सौ पांच ( २६४०५ ) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २४ ॥


पणवण्णं च सहस्सा पंचेव सदाणि उवरि गंतूणं ।
सोमणसं णाम वणं णंदणवणसरिसवित्थारं ॥ २५

अर्थ: नन्दन वनसे पचपन हजार पांच सौ योजन ऊपर जाकर उक्त वनके समान विस्तारवाला सौमनस नामक वन स्थित है ॥ २५ ॥


अट्ठत्तीससदाईं बाहिरविक्खंभपरिरओ तस्स ।
बारस चेव सहस्सा सत्तरसा होंति किंचूणा ॥ २६

अर्थ: सौमनस वनके समीपमें क्षुद्र मेरुओंका बाह्य विस्तार अड़तीस सौ ( ३८०० ) योजन और उसकी परिधि बारह हजार सत्तरह (१२०१७) योजनसे कुछ कम है ॥ २६ ॥


अट्ठावीससदाईं अंतोविक्खंभ० परिरओ तस्स ।
अट्ठासीदिसदाईं चदुवण्णा होंति साधीया ॥ २७

अर्थ: सौमनस वनके समीपमें उक्त मेरुओंका अभ्यन्तर विष्कम्भ अट्ठाईस सौ ( २८०० ) योजन और उसकी परिधि अठासी सौ चौवन (८८५४) योजनसे कुछ अधिक है ॥ २७ ॥


अट्ठावीससहस्सा उवरि गंतूण पंडुगं होदि ।
सेसवियप्पा उवरिं तुल्ला सव्वेसिं मेरूणं ॥ २८

अर्थ: सौमनस वनसे अट्ठाईस हजार योजन ऊपर जाकर पाण्डुक वन स्थित है। शेष ऊपरके विकल्प सब मेरुओंके समान हैं ॥ २८ ॥


दोण्हं मेरूणं तह। दोण्हं इसुगारेपव्वदाणं तु ।
धादगिदुमाण दोण्हं दोण्हं वरसामलिदुमाणं ॥ २९

अट्ठण्हं जमगाणं गयदंताणं तहेव अट्ठण्हं ।
दिसगयवरागामाणं सोलसवरतुंगसेलाणं ॥ ३०

चउवीसविभंगाणं अट्ठावीसामहाणदीणं तु ।
वक्खारगणण तहा बत्तीसण्हं विचित्तवण्णाणं ॥ ३१

बत्तीसद्दहवराणं बारसकुलपव्वदाण तुंगाणं ।
अट्ठण्हं णामेव्वा णामिगिरीणामसेलाणं ॥ ३२

अडसट्ठिकुमुदसंणिभवेदड्ढणगण धादगीसंडे ।
छण्णं कम्मखिदीणं छप्पण्णसदाण तह य कुंडाणं ॥ ३३

भादगिसंडस्स तहा चउवीसविहंगकुंडाणं ।
अडसट्ठिकणयसंणिभरिसभगिरीणामसेलाणं ॥ ३४

सव्वाण पव्वदाणं चदुसदवरकणयणामधेयाणं ।
जह वण्णणा दु पुव्वं णिरवयवा तह य कायव्वा ॥ ३५

अर्थ (गाथा 29 से 35): दो धातकी वृक्ष, दो शाल्मलि वृक्ष, आठ यमक, उसी प्रकार आठ गजदन्त, सोलह उन्नत उत्तम दिग्गजेन्द्र नामक शैल, चौबीस विभंगानदियां, अट्ठाईस महानदियां, विचित्र वर्णवाले बत्तीस वक्षार-पर्वत, बत्तीस उत्तम द्रह, उन्नत बारह कुलपर्वत, आठ नाभिगिरि नामक शैल, कुमुद (सफेद कमल) के सदृश अडसठ वैताढ्य पर्वत, छह कर्मभूमियां (२ भरत, २ ऐरावत, २ विदेह); गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदाके एक सौ छप्पन कुण्ड; चौबीस विभंगाकुण्ड, सुवर्ण सदृश अड़सठ ऋषभगिरि नामक शैल तथा चार सौ उत्तम कांचन नामक पर्वत, इन सबका पूर्वमें जैसा वर्णन किया गया है वैसा ही पूर्ण रूपसे यहां भी करना चाहिये ॥ २९-३५ ॥


सव्वे वि वेदिसहिदा सव्वे वणसंडमंडिया दिव्वा ।
सव्वे तोरणणिवहा जिणभवणविहूसिया दिव्वा ॥ ३६

अर्थ: सब ही [ उपर्युक्त मेरुपर्वतादि ] वेदियोंसे सहित, वनखण्डोंसे मण्डित, दिव्य, सब तोरणसमूहोंसे सहित और जिनभवनोंसे विभूषित हैं ॥ ३६ ॥


अट्ठावीससयणदीणं बारसवरभोगपउरभूमीणं ।
छक्खंडाण य णेया अडसट्ठा भेदभिण्णाणं ॥ ३७

जंबूदीवस्स पुणो जह पुव्वं वण्णणा समुद्दिठ्ठा ।
धादगिसंडस्स तहा णिरवयवा वण्णणा होइ ॥ ३८

अर्थ (गाथा 37 से 38): चौंसठ विजयोंकी एक सौ अट्ठाईस नदियों, बारह श्रेष्ठ भोगप्रचुर भूमियों (२ हैमवत, २ हरि, २ देवकुरु, २ उत्तरकुरु, २ रम्यक २ हैरण्यवत) और अड़सठ भेदोंसे भिन्न छह (६८ × ६) खण्डोंका जैसा वर्णन जम्बूद्वीपमें किया गया है वैसा ही वर्णन पूर्णतया धातकीखण्डमें भी है ॥ ३७-३८ ॥


जंबूदीवो भणिदो जावदियं चावि खेत्तगणिदेण ।
तावदियं च सयं खलु चोद्दालं धादगीसंडे ॥ ३९

अर्थ: जम्बूद्वीपके क्षेत्रफलका जितना प्रमाण कहा गया है उतने क्षेत्रफलकी अपेक्षा धातकीखण्डके एक सौ चवालीस खण्ड होते हैं ॥ ३९ ॥


एकारसट्ठत्तीसा इगिदाले तह य होदि णवणउदा ।
सगवण्णा छच्च सदा एगट्ठा खेत्तगणिदेण ॥ ४०

अर्थ: धातकीखण्डका क्षेत्रफल ग्यारह, अड़तीस, इकतालीस, निन्यानवै, सत्तावन और छह सौ इकसठ (११३८४१९९५७६६१) योजन प्रमाण है ॥ ४० ॥ एक, तीन,


एकं च तिण्णि तिण्णि य छह सुण्णं छक्कं दोण्णि तिण्णेयं । एक्कंचदुद्दोण्णिएक्कं धादगिसंडम्हि गणितपदं ॥ ४१

अर्थ: तीन, छह, शून्य, छह, दो, तीन, एक, एक, चार, दो और एक ( १२४११३२६०६३३१ ) इतने योजन प्रमाण [ जम्बूद्वीप व लवणसमुद्रसे संयुक्त ] धातकीखण्डका क्षेत्रफल है ॥ ४१ ॥


वरवज्जमया वेदी धादगिसंडस्स होइ णायव्वा । चउगोउरसंजुत्ता चउदसवरतोरणुत्तुंगा ॥ ४२

अर्थ: धातकीखण्डकी उत्तम वज्रमय वेदी चार गोपुरोंसे संयुक्त और उत्तम चौदह तोरणोंसे उन्नत जानना चाहिये ॥ ४२ ॥


धादगिसंडं दीवं उदधी कालोदओ परिक्खिवदि । सो अट्ठसयसहस्सा वित्थिण्णो चक्कवालम्हि ॥ ४३

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपको कालोद समुद्र वेष्टित करता है । वह मण्डलाकारमें आठ लाख योजन विस्तीर्ण है ॥ ४३ ॥


कालसमुद्दप्पहुदी बोद्धव्वा होंति टंकछिण्णाओ। उव्वेधेण सहस्सं पादाला णेव तत्थत्थि ॥ ४४

अर्थ: कालोद समुद्र आदि आगेके समुद्र टांकीसे उकेरे हुएके समान जानना चाहिये । ये एक हजार योजन गहरे हैं तथा उनमें पाताल नहीं हैं ॥ ४४ ॥


इगिणउदिसदसहस्सा सत्तरिसहस्साह छस्सदा णेया। जोयणपंचब्भहिया परिही कालोदए दिट्ठा ॥ ४५

अर्थ: कालोदक समुद्रकी परिधि इक्यानवै लाख सत्तर हजार छह सौ पांच ( ९१७०६०५ ) योजन प्रमाण निर्दिष्ट की गई है ॥ ४५ ॥


पंच तियं बारसयं बावट्टी छक्क तह य छादालं । णय सुण्णं वासी कालयणम्मि गणियपदं ॥ ४६

अर्थ: कालोद समुद्रका क्षेत्रफल पांच, तीन, बारह, बासठ, छह, छियालीस, नौ, शून्य और ब्यासी ( ५३१२६२६४६९०८२ ) इतने योजन प्रमाण है ॥ ४६ ॥


छावट्ठि अडदालं अडसट्ठि सत्तसीदिमसिदिं च । पण्णासं च चउक्कं हवदि य कालोदधीसंखा ॥ ४७

अर्थ: [ जम्बूद्वीपादिके क्षेत्रफलसे युक्त ] कालोद समुद्रका क्षेत्रफल छयासठ, अड़तालीस, अड़सठ, सतासी, अस्सी, पचास और चार ( ६६४८६८८७८०५०४ ) इतने योजन प्रमाण है ॥ ४७ ॥


जंबुद्दीवो भणिदो जावदियं चावि खेत्तगणिदेण । छहचेव सदा बावत्तरिं च कालोदधिं जाणे ॥ ४८

अर्थ: जम्बूद्वीपके क्षेत्रफलका जितना प्रमाण कहा गया है उसकी अपेक्षा कलोद समुद्रका क्षेत्रफल छह सौ बहत्तरगुणा जानना चाहिये ॥ ४८ ॥


गंगादीणदियाणं हिमवंतादी तहेव सेलाणं । ताणभिमुहेण होंति य कुमाणुसाणं महादीवा ॥ ४९

अर्थ: गंगादिक नदियों तथा हिमवान् आदि शैलोंके अभिमुख कुमानुषोंके महा द्वीप हैं ॥ ४९ ॥


वणवेदिहि जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा । कालोदयम्मि दीवा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ५०

अर्थ: कालोद समुद्रमें स्थित ये द्वीप सर्वदर्शियोंके द्वारा वन-वेदियोंसे संयुक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित और मनको अभिराम निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ५० ॥ कालोद समुद्रस्थ इन द्वीपोंमें स्थित कुमानुष


एगोरुगवेसाणिगलंगूलिग तह अभासया णेया । हयकरणा य कुमाणुस तहेव वरकण्णपावरणा ॥ ५१

लंबससकण्णमणुया तुरंगवरसीहसुणहमहिसमुहा । सूवरवग्घउल्लूमुह मिगवाणरमीणवरवयणा ॥ ५२

गोमेसमेघवयणा विज्जूभादरिसमत्तकरिवदणा । कालोदए समुद्दे कुमाणुसा होंति णिद्दिट्ठा ॥ ५३

अर्थ (गाथा 51 से 53): एक ऊरुवाले, वैषाणिक, लांगूलिक, तथा अभाषक, अश्वकर्ण, कर्णप्रावरण, लम्बकर्ण, शशकर्ण, तुरंगमुख, उत्तम सिंहमुख, श्वानमुख, महिषमुख, शूकरमुख, व्याघ्रमुख, उलूकमुख, मृगवदन, वानरवदन, मीनवदन, गोवदन, मेषवदन, मेघवदन, विद्युद्वदन, आदर्शवदन और गजवदन होते हैं; ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ ५१-५३ ॥


कोसेक्कसमुत्तुंगा पलिदोवमआउगा समुद्दिट्ठा । अमलपमाणाहारा चउत्थभत्तेण पारिंति ॥ ५४

अर्थ: एक कोश ऊंचे, एक पल्योपम प्रमाण आयुवाले और आंवलेके प्रमाण आहार करनेवाले ये कुमानुष चतुर्थ भक्तसे पारणा करते हैं ॥५४॥


भोत्तूण मणुयभोयं मरिदूण य ते कुमाणुसा सव्वे । उप्पज्जंति महप्पा तिवगदेवाण भवणेसु ॥ ५५

अर्थ: वे सब कुमानुष मनुष्योंके योग्य भोगको भोग कर और फिर मरकर भवनत्रिक देवोंके भवनोंमें महात्मा उत्पन्न होते हैं ॥ ५५ ॥


कालसमुद्दस्स तहा वज्जमया वेदिया समुद्दिट्ठा । चउगोउरसंजुत्ता चउदसवरतोरणुत्तुंगा ॥ ५६

अर्थ: धातकीखण्ड द्वीपके समान कालोदक समुद्रके भी चार गोपुरोंसे संयुक्त और उत्तम चौदह तोरणोंसे समुन्नत वज्रमय वेदिका निर्दिष्ट की गई है ॥५६ ॥


पोक्खरवरो दु दीवो उदधिं कालोदयं परिक्खिवदि । सोलस दु सयसहस्सा वित्थारो चक्कवालम्हि ॥ ५७

अर्थ: कालोद समुद्रको चारों ओरसे पुष्करवर द्वीप वेष्टित करता है। इसका मण्डलाकार विस्तार सोलह लाख योजन है ॥५७॥


तस्स य दीवस्सद्धं परिरयदि य माणुसोत्तरो सेलो । बाहिरभागणिविट्ठो तद्दीवड्ढं परिक्खिवदि ॥ ५८

अर्थ: उस द्वीपके अर्ध भागको मानुषोत्तर शैल वेष्टित करता है। पुष्करार्द्धके बाह्य भागमें स्थित यह पर्वत उक्त द्वीपके अर्ध भागको वेष्टित करता है ॥ ५८ ॥


सत्तरस एक्कवीसाणि उच्चिट्ठो माणुसुत्तरो सेलो । चत्तारि जोयणसया तीसं कोसं च उव्वेधो ॥ ५९

अर्थ: मानुषोत्तर शैल सत्तरह सौ इक्कीस योजन ऊंचा तथा चार सौ तीस योजन व एक कोश अवगाहसे संयुक्त है ॥ ५९ ॥


चत्तारि जोयणसदा चउवीसाइं च वित्थडा उवरिं । दस बावीसा मूले तेवीसा सत्त मज्झम्हि ॥ ६०

अर्थ: इसका विस्तार ऊपर चार सौ चौबीस योजन, मूलमें दश सौ बाईस योजन और मध्यमें सात सौ तेईस योजन है ॥ ६० ॥ मानुषोत्तर शैलपर चारों ही


मणुसुत्तरम्मि सेले चदुसु वि य दिसासु होंति चत्तारि । तुंगा विचित्तवण्णा मणिकंचणरयणपरिणामा ॥ ६१

धुव्वंतधयवडाया मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा । भिंगारकलसपउरा बहुकुसुम कयच्चणसणाहा ॥ ६२

कालागरुगंधद्धा संगीयमुदिंगसद्दगंभीरा । घंटाकिंकिणिणिवहा जिणिंदइंदीण वरभवणा ॥ ६३

मंदरसेलस्स वणे जिणिंदईंदाण पवरपासादा । जह वण्णिया असेसा तह एत्थ वि वण्णणा होइ ॥ ६४

अर्थ (गाथा 61 से 64): दिशाओंमें उन्नत, विचित्र वर्णवाले; मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे निर्मित; फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे युक्त, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, भृंगार एवं कलशोंकी प्रचुरतासे संयुक्त, बहुत कुसुमोंसे की गई पूजासे सनाथ, कालागरुकी गन्धसे व्याप्त, संगीत एवं मृदंगके शब्दसे गंभीर, तथा घंटा व किंकिणियोंके समूहसे सहित ऐसे श्रेष्ठ चार जिनेन्द्रप्रासाद हैं । जैसे पहिले मन्दर पर्वतके वनमें स्थित सब उत्तम जिनेन्द्रप्रासादोंका वर्णन किया गया है, वैसा ही वर्णन यहां भी जानना चाहिये ॥ ६१-६४ ॥


सत्तरससइसहस्सा चदुसद कोडी य सत्तवीसाणि । पोक्खरवरद्धमज्झे परिरयभेदं वियाणाहि ॥ ६५

अर्थ: एक करोड़ सत्तरह लाख चार सौ सत्ताईस ( ११७००४२७ ) योजन, यह पुष्करार्धके मध्यमें परिधिका प्रमाण जानना चाहिये ॥ ६५ ॥


बादालेसइसहस्सा तीससहस्सा सदा य बे कोडी । माणुसखेत्तपरिरओ सविसेसंचूणवण्णा य ॥ ६६

अर्थ: मनुष्यक्षेत्रकी परिधि एक करोड़ ब्यालीस लाख तीस हजार दो सौ उनचास ( १४२३०२४९ ) योजनसे कुछ कम है ॥ ६६ ॥


वंसधरा वंसधरो चदुगुणो होइ पुक्खरवरम्मि । वंसादो वि य वंसो चदुगुणो होइ बोद्धव्वो ॥ ६७

अर्थ: पुष्करवर द्वीपमें पूर्व पूर्व कुलपर्वतकी अपेक्षा आगे आगेका कुलपर्वत तथा पूर्व पूर्व क्षेत्रकी अपेक्षा आगे आगेका क्षेत्र भी चौगुणा जानना चाहिये ॥ ६७ ॥


तिण्णेव सयसहस्सा पणवण्णं होइ तह सहस्साईं । छहच्च सदा चुलसीदा रुद्धं तु णगेहि दीवद्धो ॥ ६८

अर्थ: पुष्करार्द्ध द्वीप तीन लाख पचवन हजार छह सौ चौरासी योजन प्रमाण पर्वतोंसे रुद्ध है ॥ ६८ ॥


वंसहरविरहियं खलु जं खेत्तं हवइ पोक्खरद्धम्हि । तस्स दु छेदा णियमा बे चेव सदाणि बारणि ॥ ६९

अर्थ: पुष्करार्द्ध द्वीपमें जो क्षेत्र कुलपर्वतोंसे रहित है उसके नियमसे दो सौ बारह ( १ + ४ + १६ + ६४ + १६ + ४ + १ ) x २ = २१२ ) खण्ड हैं ॥ ६९ ॥


इगिदलीससहस्सा ऊणासीदा सदा य पंच हवे । तेहत्तरिभागसदं अंतो भरहस्स विक्खंभो ॥ ७०

अर्थ: इकतालीस हजार पांच सौ उन्यासी योजन और एक सौ तिहत्तर भाग ( ४१५७९ १७३/२१२ ) प्रमाण भरतक्षेत्रका अभ्यन्तर विष्कम्भ है ॥ ७० ॥ भरतक्षेत्रका


तेवण्णं च सहस्सा पंचेव सयाणि बारणि । णवणउदिं भागसदं मज्झे भरहस्स विक्खंभो ॥ ७१

अर्थ: विस्तार मध्यमें तिरपन हजार पाँच सौ बारह योजन और एक सौ निन्यानबै भाग ( ५३५१२-१९९/२१२ ) प्रमाण है ॥ ७१ ॥


पणट्ठिं च सहस्सा चत्तारि सयाणि होंति छादाला । तेरस चेव य भागा बाहिरभरहस्स विक्खंभो ॥ ७२

अर्थ: बाह्य भरतक्षेत्रका विष्कम्भ पैंसठ हजार चार सौ छयालीस योजन और तेरह भाग ( ६५४४६ १३/२१२ ) प्रमाण है ॥ ७२ ॥


जंबुद्दीवो भणिदो जावदियो चावि खेत्तगणिदेण । तावदियाणि सहस्सा चुलसीदि सदं चे दीवद्धे ॥ ७३

अर्थ: क्षेत्रफलके प्रमाणसे जितना जम्बूद्वीप कहा गया है उतने प्रमाणसे पुष्करार्द्धके एक हजार एक सौ चौरासी ( ११८४ ) खण्ड जानना चाहिये ॥ ७३ ॥


बे दीवा बे उदधी जावदिया चावि खेत्तगणिदेण । तं तु दिवड्डं ऊणं (?) खेत्तपमाणेण दीवद्धे ॥ ७४

अर्थ: क्षेत्रफलकी अपेक्षा जितने मात्र दो द्वीप और दो समुद्र हैं उतने क्षेत्रप्रमाणसे पुष्करार्द्ध द्वीप डेढ़गुणेसे कुछ कम है (?) ॥ ७४ ॥


दोण्हं गिरिरायाणं दोण्हं इसुगारणामसेलाणं । सामलितरूण दोण्हं दोण्हं वरपउमरुक्खाणं ॥ ७५

अट्ठण्हं जमगाणं अट्ठण्हं वरकरिंददंताणं । बारसवेसहराणं बारसवरभोगभूमीणं ॥ ७६

दिसिगयवरणामाणं अट्ठण्हं दुगुणिदाण सेलाणं । चउसयकणयणगाणं णाभिगिरीणं तु अट्ठण्हं ॥ ७७

चउवीसवभंगाणं अट्ठावीसं महाणदीणं तु । बत्तीसदहवराणं वक्खाराणं तु तह य णायव्वा ॥ ७८

विज्जाधरसेलाणं अडसट्ठाणं तु तह य णायव्वा । अडसट्ठाणं च तहा वसभगिरीणामसेलाणं ॥ ७९

छण्हं कम्मखिडीणं छप्पण्णसदाण तह य कुंडाणं । अडवीससदणदीणं चउवीसवभंगकुंडाणं ॥ ८०

सट्ठी अट्ठहियाणं छहखंडविमंडियाण विजयाणं । पोक्खरवरअद्धस्स य अण्णे वि जगाणदीणं तु ॥ ८१

होंति महावेदीओ मणिकंचणरयणतोरणा दिव्वा । रयणमया पासादा वणसंडा तह य णायव्वा ॥ ८२

अर्थ (गाथा 75 से 82): पुष्करवर द्वीप सम्बन्धी दो मेरु, दो इष्वाकार नामक शैल, दो शाल्मली वृक्ष, दो श्रेष्ठ पद्म ( पुष्कर ) वृक्ष, आठ यमक, आठ उत्तम गजदन्त, बारह कुलपर्वत, बारह उत्तम भोगभूमियां, दुगुणित आठ अर्थात् सोलह दिग्गजेंद्र पर्वत, चार सौ कांचन पर्वत, आठ नाभिगिरि, चौबीस विभंगानदियां, अट्ठाईस महानदियां, बत्तीस उत्तम द्रह, तथा बत्तीस वक्षार पर्वत, अड़सठ विद्याधरशैल ( विजयार्ध ), तथा अड़सठ वृषभगिरि नामक पर्वत, छह कर्मभूमियां, एक सौ छप्पन कुण्ड, एक सौ अट्ठाईस नदियां, चौबीस विभंगाकुण्ड, छह खण्डोंसे मण्डित आठसे अधिक साठ अर्थात् अड़सठ विजय, तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी जो पर्वत व नदियां हैं उन सबके मणि, सुवर्ण एवं रत्नमय तोरणोंसे संयुक्त दिव्य महा वेदियां, रत्नमय प्रासाद तथा वनखण्ड जानना चाहिये ॥ ७५-८२ ॥


धुलवंतधयवडाइया जिणगेहा ताण होंति सव्वाणं ।
पोक्खरिणिवावियाओ णिद्दिष्ट्ठा तह य णायव्वा ॥ ८३

अर्थ: उन सबके फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे संयुक्त जिनगृह होते ह । तथा इन जिनगृहोंमें पुष्करिणियां एवं वापिकायें भी निर्दिष्ट की गई जानना चाहिये ॥ ८३ ॥


जंबूदीवो धादइसंडो पुक्खरवरो य तह दीवो ।
वारुणिवरं खीरवरो घयवर तह खोयवरदीवो ॥ ८४

णंदीसरो य अरुणो अरुणाभासो य कुंडलवरो य ।
संखवर रुचग भुजगो वर कुसवर कौंचवरदीवो ॥ ८५

एदे सोलस दीवा णामा एदे हि आणुपुव्वीए ।
तेण परं जे सेसा णामा संखा इमा तेसिं ॥ ८६

जावदियाणि य लोए सुभणामा ते इमेहि णामेहि ।
दीवा वि य णायव्वा बहुवों एक्केक्कणामेहि ॥ ८७

अर्थ (गाथा 84 से 87): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड, पुष्करवर द्वीप, वारुणिवर, क्षीरवर, घृतवर, क्षौद्रवर द्वीप, नन्दीश्वर, अरुण, अरुणाभास, कुण्डलवर, शंखवर, रुचगवर, भुजगवर, कुशवर और क्रौंचवर द्वीप, ये जो सोलह द्वीप है उनके ये अनुक्रमसे नाम हैं । इसके आगे जो शेष द्वीप हैं उनके नाम व संख्या यह है । वे द्वीप भी लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामोंसे सहित जानना चाहिये । बहुतसे द्वीप एक एक ( समान ) नामोंसे संयुक्त हैं ॥ ८४-८७ ॥


दीवं संखा णामं जंबूदीवादि जाव अरुणंते ।
वज्जिय सेसा दीवा सव्वे णामेहि सामण्णा ॥ ८८

अर्थ: जम्बूद्वीपको आदि लेकर स्वयम्भूरमण द्वीप तक अरुण पर्यन्त छोड़कर शेष सब द्वीप नामोंसे समान हैं ( ? ) ॥ ८८ ॥


जंबूदीवे लवणो धादगिसंडम्मि हवदि कालोदो ।
सेसाणं दीवाणं दीवसरिसणामया उदधी ॥ ८९

अर्थ: जम्बूद्वीपमें लवणसमुद्र और धातकीखण्ड द्वीपमें कालोद समुद्र है । शेष द्वीपोंके समुद्र द्वीपके समान नामवाले हैं ॥ ८९ ॥


जंबूदीवादीया दीवा लवणादिया तहा उदधी ।
जाव दु सयंभुरमणे विण्णेया दीव उदधी य ॥ ९०

अर्थ: जम्बूद्वीपको आदि लेकर द्वीप तथा लवण समुद्रको आदि लेकर समुद्र इस प्रकार स्वयम्भूरमण पर्यन्त द्वीप-समुद्र जानना चाहिये ॥ ९० ॥


लवणो कालयसलिले सयंभुरमणोवही य तिण्णेदे ।
मच्छाण कुम्मणिलया झसकुम्मविवज्जिया सेसा ॥ ९१

अर्थ: लवणोद, कालोद और स्वयम्भूरमण ये तीन समुद्र मछलियों और कछुओं ( जलचर जीवों ) के आवास रूप हैं; शेष समुद्र मछलियों और कछुओंसे रहित हैं ॥ ९१ ॥


अट्ठारसजोयणियो लवणे णवजोयणा णदिसुहेसु ।
छत्तीसगा य कालोदयम्मि अट्ठारसा णदिमुहेसु ॥ ९२

अर्थ: लवण समुद्रमें [ मध्यमें ] अठारह योजन व नदीमुखोंमें नौ योजन, कालोदक समुद्रमें [ मध्यमें ] छत्तीस योजन व नदीमुखोंमें अठारह योजन, तथा स्वयम्भूरमण


साहस्सिया दु मच्छा सयंभूरमणोदधिम्हि बोद्धव्वा । एमेव झसवराणं उक्कस्सं होइ उच्चत्ते ॥ ९३

अर्थ (गाथा 92 से 93): समुद्रमें एक हजार योजन [ दीर्घ ] मत्स्य जानना चाहिये । यही महामत्स्योंकी उत्कृष्ट ऊंचाई है ॥ ९२-९३ ॥


पत्तेयरसा चत्तारि सायरा तिण्णि होंति उदयरसा । अवसेसा य समुद्रा बोद्धव्वा होंति खोदरसो ॥ ९४

अर्थ: चार समुद्र प्रत्येक रस अर्थात् अपने अपने नामके अनुसार रसवाले, तीन समुद्र जलके समान रसवाले, और शेष समुद्र क्षोदरस ( ऊखके समान रसवाले ) जानना चाहिये ॥ ९४ ॥


लवणो वारुणितोओ खीरवरो घयवरो य पत्तेया । कालो पोक्खरउदधी सयंभूरमणो य उदयरसा ॥ ९५

अर्थ: लवण, वारुणीवर, क्षीरवर और घृतवर, ये चार समुद्र प्रत्येकरस तथा कालोद, पुष्करवर और स्वयम्भूरमण, ये तीन समुद्र उदकरस हैं ॥ ९५ ॥


जा दक्खिणदीवंते णीलादो दक्खिणे गदा रज्जू । तिस्से मज्झे गंठी किं वंसे अहव वंसधरे ॥ ९६

अर्थ: नील पर्वतसे दक्षिणकी ओर दक्षिण द्वीपान्तमें जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि [ अर्धच्छेद ] क्या वर्षमें है अथवा वर्षधर में है ? ॥ ९६ ॥


णिसधगिरिसुत्तरदो बेसदतेवट्ठि जोयणसदेसु । भागे च तिण्णि गंतूं सो गंठी होइ देवकुरु ॥ ९७

अर्थ: निषध पर्वतके उत्तरमें दो सौ तिरसठ योजन व तीन भाग जाकर वह ग्रन्थि देवकुरु [ में पड़ती ] है ॥ ९७ ॥


मंदरतलमज्झादो भरहंता जा गदा हवे रज्जू । तिस्से मज्झे गंठी किं वंसे अहव वंसधरे ॥ ९८

अर्थ: मन्दरतलके मध्य भागसे भरतक्षेत्र पर्यन्त जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि क्या वर्षमें है अथवा वर्षधरमें है ? ॥ ९८ ॥


सत्तावण्णं च सदा अट्ठसहस्सा कला य सत्तरसा । णिसहगिरिसुत्तरदो ओगाहिय सा हवे गंठी ॥ ९९

अर्थ: वह ग्रन्थि निषध पर्वतके उत्तरमें आठ हजार एक सौ सत्तावन योजन और सत्तरह कला अवगाहन करके स्थित है ॥ ९९ ॥


अब्भंतरम्मि भागे सयंभूरमणोदयस्स दीवस्स । पण्णत्तरि व सहस्सा ओगाहिय सा हवे गंठी ॥ १०१

अर्थ: मन्दरतलके मध्य भागसे स्वयम्भूरमण समुद्रमें जो रज्जु गई है उसके मध्यमें स्थित ग्रन्थि क्या द्वीपमें है अथवा समुद्रमें है ? ॥ १०० ॥ वह ग्रन्थि स्वयम्भूरमण समुद्रके अभ्यन्तर भागमें एक हजार पचत्तर योजन द्वीपका अवगाहन करके स्थित है ॥ १०१ ॥ मन्दरतलके मध्य भागसे लोकके अन्त तक


मंदरतलमज्झादो लोगंता जा गदा उदधिवंतं ।
तिस्से मज्झे गंठी इमं तु विज्जापदविसेस ॥ १०२

अर्थ: समुद्र पर्यन्त जो रज्जु गई है उसके मध्यमें जो ग्रन्थि स्थित है वह तो विद्यापदविशेष है ॥ १०२ ॥


पण्णत्तरि य सहस्सा ओगाहिथै सा दु होदि बोद्धव्वो ।
दीवम्हि समुद्दम्हि य मज्झे जो जत्थ पुच्छेज्जो ॥ १०३

अर्थ: वह ग्रन्थि एक हजार पचत्तर योजन अवगाहन करके द्वीप व समुद्रमें जानना चाहिये । मध्यमें जो जहां हो पूछना [ पूछकर जानना ] चाहिये (?) ॥ १०३ ॥


जे कम्मभूमिजादा मच्छा मणुया य पावसंजुत्ता ।
ते कालगदा संता उव्वेंति णिरएसु घोरेसु ॥ १०४

अर्थ: जो मनुष्य व मत्स्य ( तिर्यंच ) कर्मभूमिजात हैं वे पापसे संयुक्त होते हुए मृत्युको प्राप्त होकर भयानक नरकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १०४ ॥


पावेण अहोलोयं पुण्णेण पुणो वि उड्ढलोगं तु ।
गच्छंति णरा तिरिया विरिक्खलेत्तेसु संभूयो ॥ १०५

अर्थ: तिर्यग्लोक ( मध्यलोक ) में उत्पन्न हुए मनुष्य व तिर्यंच पापके वश होकर अधोलोकमें तथा पुण्यके वश होकर ऊर्ध्व लोकमें जाते हैं ॥ १०५ ॥


हेट्ठा मज्झे उवरिं वेत्तासणझल्लरीमुदिंगणिभो ।
मज्झिमवित्थारेण दु चोद्दसगुणमायदो लोगो ॥ १०६

अर्थ: यह लोक नीचे, मध्यमें और ऊपर क्रमसे वेत्रासन, झल्लरी व मृदंगके सदृश है । यह मध्यम लोकके विस्तार ( १ राजु ) की अपेक्षा चौदहगुणा आयत ( ऊंचा ) है ॥ १०६ ॥


लोयस्स दु विक्खंभो चदुप्ययारेण होदि बोद्धव्वो ।
सत्तेक्कगओ य पंचिक्कगओ य रज्जू मुणेयव्वो ॥ १०७

अर्थ: लोकका विस्तार [ अधोलोकके अन्तमें, मध्यलोकमें, ब्रह्म स्वर्गके अन्तमें तथा ऊर्ध्वलोकके अन्तमें क्रमसे ] सात, एक, पांच और एक राजु; इस तरह चार प्रकारका जानना चाहिये ॥ १०७ ॥


मुहतलसमासअद्धं उच्छेहगुणं गुणं च वेधेणं ।
घणगणिदं जाणेज्जो वेत्तासणसंठिदे खेत्ते ॥ १०८

अर्थ: मुख और तल ( भूमि ) को जोड़कर व उसे आधा करके फिर ऊंचाईसे तथा मुटाईसे गुणित करनेपर वेत्रासन सदृश क्षेत्र अर्थात् अधोलोकका घनफल प्राप्त होता है, ऐसा जानना चाहिये [ जैसे- मुख १ राजु, भूमि ७ राजु, ऊंचाई ७ राजु, मुटाई ७ राजु; ( १ + ७ / २ ) x ७ x ७ = १९६ राजु ] ॥ १०८ ॥


भणिदो य अधोलोगो छण्णउदि संदेण होदि रज्जूणि ।
णिप्पण्ण उड्ढलोगो संदेण खलु सत्तदालेणं ॥ १०९

अर्थ: अधोलोकका घनफल एक सौ छचानवै राजु तथा ऊर्ध्वलोकका एक सौ सैंतालीस [ ( १ + ५ / २ ) x ७ x ७ = १४७ ] राजु प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ १०९ ॥


मूलं मज्झेण गुणं मुहसहिदद्धं तु तुंगकदिगुणिदं । घणगणिदं जाणिज्जो मुदिंगसंठाणखेत्तम्हि ॥ ११०

अर्थ: हो उसमें मुखप्रमाणको मिलाकर और फिर उसे आधा करके ऊंचाईके वर्गसे गुणित करनेपर प्राप्त राशि मृदंगाकार क्षेत्र (मध्यलोक) में घनफलका प्रमाण जानना चाहिये (?) ॥ ११० ॥


तिरियालोयायारप्पमाणं हेट्ठा दु सत्तपुढवी णं । आयासंतंरिदाओ वित्थिण्णयरा य हेद्विट्ठा ॥ १११

धम्मा वंसा मेघा अजणरिद्वा य होदि अणिउज्झा । छठी मघवी पुढवी सत्तमिया माघवी णाम ॥ ११२

अर्थ (गाथा 111 से 112): तिर्यग्लोकके नीचे घर्मा, वंशा, मेघा, अंजना और अरिष्टा ये यादृच्छिक नामवाली तथा छठी मघवी और सातवीं माधवी नामक, ये उत्तरोत्तर अधिक अधिक विस्तीर्ण सात पृथिवियां आकाशसे अन्तरित होती हुईं नीचे नीचे स्थित हैं ॥१११-११२॥


रयणसक्करवालुयपंकप्पभ धूम पंचमी पुढवी । छठी तमप्पभा वि य सत्तमिया तमतमा णाम ॥ ११३

अर्थ: रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, पांचवीं धूमप्रभा, छठी तमःप्रभा और सातवीं तमस्तमःप्रभा, ये उक्त पृथिवियोंके नामान्तर हैं ॥११३॥


एयं च सयसहस्सा होदि असीदिं च जोयणसहस्सा । रयणप्पभाबहुलयं भागेसु वि तीसु पविभत्तं ॥११४

अर्थ: तीनों ही भागोंमें विभक्त रत्नप्रभाका बाहल्य एक लाख अस्सी हजार योजन प्रमाण है ॥ ११४ ॥


खरभागपंकबहुला अप्पबहुलो य होइ णायव्वा । एदे तिण्णि विभागा रयणप्पभणामपुढवीए ॥ ११५

अर्थ: खरभाग, पंकबहुलभाग और अब्बहुलभाग, ये तीन रत्नप्रभा नामक पृथिवीके विभाग जानना चाहिये ॥ ११५ ॥


सोलस दु खरे भागे पंकबहुले तहा य चुलसीदिं । अप्पबहुले असीदी बोद्धव्वा जोयणसहस्सा ॥ ११६

अर्थ: इनमेंसे खरभागका सोलह हजार, पंकबहुलभागका चौरासी हजार और अब्बहुलभागका अस्सी हजार योजन प्रमाण बाहल्य जानना चाहिये ॥ ११६ ॥ चित्रा, वज्रा, वैडूर्या, लोहितांका,


चित्ते वइरे वेरुलि लोहियअंके मसारगल्ले य ।
गोमज्जए पवाले य तह जोइरसेत्ति य ॥ ११७

णवमे अंजणे वुत्ते दसमे अंजणमूलये ।
अंके एक्कारसे वुत्ते फलिहंके बारसेत्ति य ॥ ११८

चंदणे वच्चगे चावि बहुले पण्णारसेत्ति य ।
सिलामए वि अक्खाए सोलसे पुढवी तले ॥ ११९

सोलस चेव सहस्सा रयणाई होंति चेव बोद्धव्वा ।
तलउवरिमम्मि भागे जेण दु रयणप्पभा णाम ॥ १२०

अर्थ (गाथा 117 से 120): मसारगल्ला, गोमेदका, प्रवाला, ज्योतिरसा, नवमी अंजना, दशमी अंजनमूलका, ग्यारहवीं अंका, बारहवीं स्फटिका, चन्दना, वर्चका ( सर्वार्थका ), पन्द्रहवीं बहुला ( बकुला ) और शिलामय, इस प्रकार तलभागमें सोलह हजार योजनकी मुटाईमें ये सोलह पृथिवियां हैं। चूंकि इसके तल व उपरिम भागमें रत्नादि हैं, इसीलिये इसका नाम रत्नप्रभा जानना चाहिये ॥ ११७-१२०॥


अवसेसा पुढवीओ बोद्धव्वा होंति पंकबहुलाओ ।
बहुलियेहिं य तेसिं छण्हं पि इमं कमं जाणे ॥ १२१

अर्थ: शेष छह पृथिवियां पंकबहुल जानना चाहिये । उन छहों पृथिवियोंके बाहल्यका क्रम यह है ॥ १२१॥


बत्तीस च सहस्सा अट्टावीसा तहेव चउवीसा ।
वीसा सोलस अट्ठ य ओसरणकमेण बहुलियं ॥ १२२

अर्थ: बत्तीस हजार, अट्ठाईस हजार, चौबीस हजार, बीस हजार, सोलह हजार और आठ हजार, इस प्रकार यह नीचे नीचे क्रमसे उक्त पृथिवियोंका बाहल्य जानना चाहिये ॥ १२२ ॥


पंकबहुलम्मि भागे बोद्धव्वा रक्खसाणमावासा ।
असुराण य चेव तह अवसेसाणं खरे भागे ॥ १२३

अर्थ: पंकबहुलभागमें राक्षसों और असुरकुमारोंके आवास तथा खरभागमें शेष व्यन्तर व भवनवासी देवोंके आवास जानना चाहिये ॥ १२३ ॥


असुरा णागसुवण्णा दीवोदधिथिणिअविज्जुदिसणामो ।
अग्गीवादकुमारा दसधा भणिदा भवणवासी ॥ १२४

अर्थ: असुरकुमार नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार, उदधिकुमार, स्तनितकुमार विद्युत्कुमार, दिक्कुमार, अग्निकुमार और वातकुमार, ये दश प्रकारके भवनवासी कहे गये हैं ॥ १२४॥


चउसट्ठि चुलसीदी बावत्तरि चेव सदसहस्साणि ।
छावत्तरि च छण्हं वादिदाणं च छण्णउदिं ॥ १२५

अर्थ: चौंसठ लाख ( ३४०००००+३०००००० ) चौरासी लाख ( ४४०००००+४०००००० ), बहत्तर लाख ( ३८०००००+३४००००० ), छहके छहत्तर लाख ( ४००००००+३६००००० ), और वायुकुमारोंके छ्यानबै लाख ( ५००००००+४६००००० ), यह उन दश प्रकारके भवनवासियोंके भवनोंका प्रमाण है ॥१२५॥ चमर व वैरोचनादि सब इन्द्रोंके क्रमशः चौंतीस लाख


चोत्तीस तीस चोदाल ताले अडतीसमेव चोत्तीसा ।
तालं छत्तीसं पि य छण्णं पण्णासमेव छादाला ॥ १२६

सव्वेसिं एदाणं पत्तेयं जिणघरे णमंसामि ।
सत्तेवे य कोडीओ बावत्तरिलक्खअब्भधिया ॥ १२७

अर्थ (गाथा 126 से 127): व तीस लाख, चवालीस लाख व चालीस लाख, अड़तीस लाख व चौंतीस लाख, छहके चालीस लाख व छत्तीस लाख, तथा पचास लाख व छयालीस लाख भवन हैं । इन सब भवनोंमेंसे प्रत्येक भवनमें जिनगृह हैं । उन जिनगृहोंको मैं नमस्कार करता हूँ । उनका समस्त प्रमाण सात करोड़ बहत्तर लाख ( ७७२००००० ) है ॥ १२६-१२७॥


सव्वे वि वेदिसहिया सव्वे वरतोरणेहि कयसोहा ।
सव्वे अणाइणिहणे सव्वे मणिरयणसंछण्णा ॥ १२८

धुव्वंतधयवडोया मुत्तादामेहि मंडिया दिव्वा ।
कालागरुगंधुड्ढा बहुकुसुमकयच्चणसणाहा ॥ १२९

णाइगिगणसंछण्णा संगीयमुदिंगसद्दगंभीरा ।
बज्जिंदणीलमरगयणाणामणिरयणपरिणामा ॥ १३०

अर्थ (गाथा 128 से 130): सब ही जिनप्रासाद वेदियोंसे सहित, सब उत्तम तोरणोंसे शोभायमान, सब अनादि-निधन, सब मणियों एवं रत्नोंसे व्याप्त, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित, मुक्तामालाओंसे मण्डित, दिव्य, कालागरुकी गन्धसे व्याप्त, बहुत कुसुमोंके द्वारा की गई पूजासे सनाथ, नर्तकियोंके समूहसे व्याप्त, संगीत एवं मृदंगके शब्दसे गंभीर; तथा वज्र, इन्द्रनील व मरकत रूप नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम स्वरूप हैं ॥ १२८-१३०॥


सत्ताणीयाणि तहा तिण्णि य परिखाहि सादरक्खाहि ।
सामाणियाहि जुत्ता णागकुमारा समुद्दिट्ठा ॥ १३१

अर्थ: नागकुमार देव सात अनीक, तीन प्रकारके परिषद, आत्मरक्ष और सामानिक देवोंसे युक्त कहे गये हैं ॥ १३१ ॥


बहुअच्छरेहिं जुत्ता सव्वाहरणेहि मंडियसरीरा ।
पुण्णेण समुप्पण्णा देवा भवणेसु णायव्वा ॥ १३२

अर्थ: बहुतसी अप्सराओंसे संयुक्त व समस्त आभरणोंसे अलंकृत शरीरवाले वे देव पुण्यके प्रभावसे उक्त भवनोंमें उत्पन्न होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३२ ॥


कडिसुत्तकडयकंठावरहारविभूसिया मणभिरामा ।
पजलंतमहामउडा मणिकुंडलमंडिया गंडा ॥ १३३

सुकुमारपाणिपादा णीलुप्पलसुरहिगंधणीसासा ।
लायण्णरूवकलिया संपुण्णमियंकवरवयणा ॥ १३४

सिंहासणमज्झगया सियचामरविज्जमाण बहुमाणा ।
सेदादवत्तचिण्हा भवणिंदा सुरवरा णेया ॥ १३५

अर्थ (गाथा 133 से 135): उपर्युक्त भवनवासी देवेन्द्र कटिसूत्र, कटक, कंठा व उत्तम हारसे विभूषित; मनको अभिराम, चमकते हुए महा मुकुटसे संयुक्त, मणिमय कुण्डलोंसे मण्डित कपोलोंवाले, सुकुमार हाथ-पैरोंसे युक्त, नीलोत्पलके समान सुगन्धित निश्वाससे सहित, लावण्यमय रूपसे संयुक्त, पूर्ण चन्द्रके सदृश मुखवाले, सिंहासनके मध्यमें स्थित, धवल चामरोंसे वीज्यमान, बहुत सम्मानित, तथा श्वेत छत्र रूप चिह्नसे संयुक्त हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ १३३-१३५ ॥ अधोलोकमें भूतोंके चौदह


चउदस चेव सहस्सा भूदाणं होंति अधियलोयम्हिं ।
सोलस चेव सहस्सा रक्खसदेवाण विण्णेया ॥ १३६

अर्थ: हजार और राक्षस देवोंके सोलह हजार [भवन] जानना चाहिये ॥ १३६ ॥


पढमादियउक्कस्सं बिदियादिय साधिकं हवे जहण्णं तु ।
धम्मायें भवणविंतर वाससहस्सा दस जहण्णा ॥ १३७

अर्थ: प्रथमादि पृथिवियोंमें जो उत्कृष्ट आयुका प्रमाण है वही साधिक (एक समय अधिक) द्वितीय आदि पृथिवियोंकी जघन्य आयुका प्रमाण होता है। धर्मा पृथिवीमें तथा भवनवासी और व्यन्तर देवोंकी जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण होती है ॥१३७॥


असुरेसु सागरेवम तिपल्लं पत्तं च णागभोमाणं ।
अड्ढादिज्जं सुवण्णा दु दीव सेसाँ दिवड्ढं च ॥ १३८

अर्थ: उत्कृष्ट आयु असुरकुमारोंकी एक सागरोपम, नागकुमारोंकी तीन पल्योपम, व्यन्तरोंकी एक पल्योपम, सुपर्णकुमारोंकी अढ़ाई पल्योपम, द्वीपकुमारोंकी दो पल्योपम और शेष भवनवासियोंकी उत्कृष्ट आयु डेढ़ पल्योपम प्रमाण है ॥१३८॥


पणुवीसं असुराणं सेसकुमाराण दसधणू चेव ।
विंतरजोइसियाणं दस सत्त धणू मुणेयव्वा ॥ १३९

अर्थ: असुरकुमारोंका शरीरोत्सेध पच्चीस धनुष और शेष कुमारोंका दश धनुष प्रमाण है। व्यन्तर व ज्योतिषी देवोंके शरीरकी उंचाई क्रमशः दश और सात धनुष प्रमाण जानना चाहिये ॥ १३९ ॥


पणुवीस जोयणाणं ओही विंतरकुमारवग्गाणं ।
संखेज्जजोयणाणि दु जोइसियाणं जहण्णोही ॥ १४०

अर्थ: व्यन्तर और कुमार देवोंके अवधिज्ञानका जघन्य क्षेत्र पच्चीस योजन तथा ज्योतिषियोंके जघन्य अवधिका क्षेत्र संख्यात योजन प्रमाण है ॥ १४० ॥


असुराणमसंखेज्जा कोडीओ सेसजोइसगणाणं ।
संखातीदसहस्सा उक्कस्सो ओधिविसओ दु ॥ १४१

अर्थ: असुरकुमारोंके उत्कृष्ट अवधिका क्षेत्र असंख्यात करोड़ योजन और शेष भवनवासी तथा ज्योतिषियोंके उत्कृष्ट अवधिका क्षेत्र असंख्यात हजार योजन प्रमाण है ॥ १४१ ॥


अप्पबहुलम्हि भागे पढमाए बिदीएँ होंति णिरया दु ।
वज्जित्ताण सहस्सं उवरिमतल्हेद्धिमंतल्यादो ॥ १४२

अर्थ: अब्बहुकभागमें प्रथम पृथिवीके उपरिम व अधस्तन तल भागमें एक एक हजार योजन छोड़कर नरक स्थित हैं ॥ १४२ ॥


तीसं च सयसहस्सा पणुवीसा तह य होइ पण्णरसा ।
दस तिण्णि सदसहस्सा एगं पंचूणयं पंच ॥ १४३

एसा दु णिरयसंखा रयणादीया कमेण पविभत्ता ।
संवग्गेणँ दु णिरया चदुरासीदिं च सदसहस्सा ॥ १४४

अर्थ (गाथा 143 से 144): तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दश लाख, तीन लाख, पांच कम एक लाख और केवल पांच, यह रत्नप्रभादिक पृथिवियोंमें क्रमसे नरकसंख्या कही गई है। इसको मिलानेपर समस्त बिलोंका प्रमाण चौरासी लाख होता है ॥ १४३-१४४॥


णेया तेरेक्कारस णव सत्त य पंच तिण्णि एक्कं च । रयणादितमतमंतो पुढवीणं पत्थडा भणिदा ॥ १४५

अर्थ: रत्नप्रभासे लेकर तमस्तमा पृथिवी तक क्रमशः तेरह, ग्यारह, नौ, सात, पांच, तीन और एक; इस प्रकार पाथड़े कहे गये हैं ॥ १४५ ॥


सीमंतगो दु पढमो णिरओ पुण रोरुगो त्ति बोद्धव्वो । भंतो भवदि चउत्थो उब्भंतो पंचमो णिरओ ॥ १४६

संभंतमसंभंतो विभ्भंतो चेव अट्ठमो णिरओ । तत्तो णवमो णिरओ दसमो तसिदो त्ति बोद्धव्वो ॥ १४७

चक्कंतमचक्कंतो विक्कंतो चेव तेरसो णिरओ । पढमाए पुढवीए तेरस णिरइंदया भणिया ॥ १४८

अर्थ (गाथा 146 से 148): प्रथम सीमन्तक, निरय ( नरक ), रोरुक, चतुर्थ भ्रान्त, पंचम उद्भ्रान्त, संभ्रान्त, असं भ्रान्त, आठवां विभ्रान्त, नौवां तप्त, दशवां त्रसित, चक्रान्त ( वक्रान्त ), अचक्रान्त ( अवक्रान्त ) और तेरहवां विक्रान्त, ये तेरह इन्द्रक बिल प्रथम पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १४६-१४८ ॥


थडगे थणगे चेव य मणगे वणगे तहेव बोद्धव्वा । घाडे तह संघाडे जिब्भे पुण जिब्भिंगे चेव ॥ १४९

लोले च लोलगे खलु तहेव थणलोलुवे य बोद्धव्वा । बिदियाए पुढवीए एयारस इंदया भणिया ॥ १५०

अर्थ (गाथा 149 से 150): थडग, स्तनक, मनक, वनक, घाट, संघात, जिह्व, जिह्विक, लोल, लोलक और स्तनलोलुक, ये ग्यारह इन्द्रक द्वितीय पृथिवीमें कहे गये जानना चाहिये ॥ १४९-१५० ॥


तत्तो तसिदो तवणो तावणो होइ पंचम णिदाहो । छट्ठो पुण पज्जलिदो उज्जलिदो सत्तमो णिरओ ॥ १५१

संजलिदो अट्ठमओ संपज्जलिदो य होदि णवमो दु । तदियाए पुढवीए णव खलु णिरइंदया भणिया ॥ १५२

अर्थ (गाथा 151 से 152): तप्त, त्रसित ( शीत ), तपन, तापन, पांचवां निदाघ, छठा प्रज्वलित, सातवां उज्ज्वलित, आठवां संज्वलित और नौवां संप्रज्वलित, ये नौ इन्द्रक बिल तृतीय पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५१-१५२ ॥


आरे मारे तारे तत्ते तमगे य होदि बोद्धव्वा । खाडे य खड्डखडे खलु इंदयणिरया चउत्थीए ॥ १५३

अर्थ: आर, मार, तार, तप्त, तमक, खाड और खडखड, ये सात इन्द्रक बिल चतुर्थ पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५३ ॥


तमे भमे झसे चेव अंधे तिमिसे य होदि बोद्धव्वा । पंचेंदयणिरया खलु पंचमखिदिए जहुद्दिष्टं ॥ १५४

अर्थ: तम, भ्रम, झष, अन्ध और तिमिस्र, ये पांच इन्द्रक बिल पांचवीं पृथिवीमें कहे गये हैं ॥ १५४ ॥


हिमवहल्लल्लक्कं इंदयणिरया हवंति छट्ठाए । एक्को पुण सत्तमिए अवधिट्ठाणो त्ति बोद्धव्वा ॥ १५५

अर्थ: हिम, वर्द्दल और लल्लक, ये तीन इन्द्रक बिल छठी पृथिवीमें तथा केवल अवधिष्ठान नामक एक इन्द्रक बिल सातवीं पृथिवीमें जानना चाहिये ॥ १५५ ॥ जो दुराचारी जीव विषयोंमें आसक्त हैं,


विसयासत्ता जीवा कसावलेस्मुक्कडा य लोहिल्ला ।
दारुणमंसाहारा पडंति णरए दुरायारा ॥ १५६

अर्थ: तीव्र कषाय व दुर्लेश्यासे सहित हैं, लोभसे युक्त हैं, क्रोधी हैं, तथा मांसभोजी हैं वे नरकोंमें पड़ते हैं ॥१५६॥


पिसुणासया य चंडा मच्छरिया चोरकवडमायावी ।
णिंदणवधकरणरदा पडंति णिरए खडखडंतो ॥ १५७

अर्थ: जो जीव पिशुनाशय अर्थात् परनिन्दा रूप अभिप्रायसे सहित, क्रोधी, मात्सर्य भावसे संयुक्त, चोर, कपटी, मायाचारी तथा परनिन्दा व जीवहिंसा करनेमें तल्लीन हैं वे खडखड नरक ( चतुर्थ पृथिवीका अन्तिम इन्द्रक बिल ) पर्यन्त नरकमें पड़ते हैं ॥ १५७॥


जोयणसयप्पमाणा तत्तकवल्लिम्हि ते दु छुब्भंति ।
डज्झंति धगधगंता महिसोरडियं करेमाणा ॥ १५८

अर्थ: [ इन नरकोंमें परस्पर ] वे नारकी वहां सौ योजन प्रमाण संतप्त कड़ाहीमें डाले जाते हैं, जहां वे महिषके समान रुदन करते हुए धग्-धग् शब्दपूर्वक जलते हैं ॥१५८॥


हुम्मंति ओरसंता दढप्पहारेहि णरयपालेहिं ।
छिंदंति तडतडंता वज्जकुठारेहिं घेत्तूणं ॥ १५९

अर्थ: वे रुदन करते हुए नरकपालों अर्थात् अम्बावरीष जातिके असुरकुमारोंके द्वारा दृढ़ प्रहारोंसे मारे जाते हैं। वे उन्हें पकड़ कर वज्रके समान कठोर कुठारोंके द्वारा तड़-तड़ शब्दपूर्वक छेदते हैं ॥ १५९ ॥


भज्जंति कडकडेहि हड्डई चूरंति लउडपहारेहिं ।
बंधेविं अग्गिमज्झे छुहंति जमदूव रोसेहिं ॥ १६०

अर्थ: यमके दूतोंके समान वे क्रुद्ध होकर उन्हें कड़-कड़ शब्दोंके साथ भग्न करते हैं, डंडोंके प्रहारों द्वारा उनकी हड्डियोंको चूर-चूर करते हैं, तथा बांधकर अग्निके मध्यमें डालते हैं ॥ १६० ॥


रोवंति य विलवंति य पायपडंतम्मि णाहि मेल्लैंति ।
पीडंति चादुरोधो काऊण छुहंति चुल्लीसु ॥ १६१

अर्थ: इस अवस्थामें वे नरकी रोते व विलाप करते हैं। पैरोंमें गिरनेपर भी वे असुरसमूह उन्हें छोड़ते नहीं हैं, किन्तु पीड़ा देते हैं। चारों ओरसे अवरुद्ध करके वे उन्हें चूल्होंमें फेंकते हैं ॥ १६१ ॥


तत्तकवल्लिहिं छुड्ढा अण्णे खरफरुसवज्जसूलेहिं ।
अण्णे वइतरणीहि य खारणदीएहि छुब्भंति ॥ १६२

अर्थ: दूसरे कितने ही नारकी संतप्त कड़ाहीमें फेंके जाते हैं, तथा कितने ही अन्य नारकी तीक्ष्ण स्पर्शवाली वज्रशूलियोंपर व क्षारनदी वैतरणीमें फेंक दिये जाते हैं ॥ १६२ ॥ कितने ही पापी नारकी वसा, रुधिर एवं पीवके


वसरुहिरपूयमज्झे तडतडफुट्टंते सव्वसंधीसु । पीलिज्जंति अधण्णा जंतसहस्सेहि घेत्तूणं ॥ १६३

अर्थ: बीच समस्त सन्धियोंमें तड़-तड़ टूटते हुए ग्रहण करके हजारों यंत्रोंके द्वारा पेरे जाते हैं ॥ १६३ ॥


लंबंतचम्मपोट्टा अण्णे धावंति तुरियवेगेणं । पेच्छंते गिरिवरंदे तत्थ निलुक्कंति झाडेहिं ॥ १६४

अर्थ: जिनके पेटका चमड़ा लटक रहा है ऐसे अन्य नारकी बड़े वेगसे दौड़कर महान् पर्वतोंको देखते हैं और वहां झाड़ोंमें छिप जाते हैं ॥ १६४ ॥


दरिविवरेसु पइट्ठा तत्थ वि खज्जंति वग्घसिंघेहिं । सप्पेहि घोणसेहि य खज्जंति हु वज्जतुंडेहि ॥ १६५

अर्थ: कितने ही नारकी गुफाओंके भीतर प्रविष्ट होकर वहां भी बाघों और सिंहोंके द्वारा खाये हैं, तथा कितने ही वज्रके समान कठोर मुखवाले सर्पों व घोणसों ( विशेष जातिके सर्पों ) के द्वारा खाये जाते हैं ॥ १६५ ॥


कंदरविवरदरीसु वि सिलाण विच्चेसु तेसु पविसंति । तत्थ वि य धगधगंतो सहसा उट्ठाविओ अग्गी ॥ १६६

अर्थ: कितने ही नारकी उन कन्दराओं व गुफाओंके भीतर भी शिलाओंके मध्यमें प्रविष्ट होते हैं। वहांपर भी सहसा धग्-धग् करती हुई अग्नि प्रज्वलित हो उठती है ॥ १६६ ॥


सुमेरेदि पुव्वकम्मं गुलगुलु गज्जंति भीमसरहेण । कालसिला उप्पाडेंति उप्पयंता अधण्णाणं ॥ १६७

अर्थ: वे पूर्वकृत कर्मका स्मरण करते हैं और हाथीके समान भयंकर शब्दसे गुल-गुल गर्जना करते हुए कूदकर पापी नारकियोंके लिये कालशिलाओंको उखाड़ते हैं ॥ १६७ ॥


घादंता जीवाणं णिययं खायंति तह य मंसाणि । सासिज्जंति अधण्णाचाराणं णरयपालेहिं ॥ १६८

अर्थ: तथा जीवोंका घात करनेवाले उन दुराचारी नारकियोंको स्वकीय मांस खिलाकर अम्बावरीष जातिके असुरकुमारों द्वारा शिक्षित ( दण्डित ) किया जाता है ॥ १६८ ॥


संडासेहिं य जीहा उप्पाडिज्झंति तह रसंताणं । छिंदंति हत्थपादौ कण्णाहरणासियादीणि ॥ १६९

अर्थ: उक्त देवोंके द्वारा चिल्लाते हुए उन नारकियोंकी जीभें संसियोंसे उखाड़ी जाती हैं तथा हाथ, पैर, कान, अधरोष्ठ एवं नासिका आदि अंग-उपांग छेदे जाते हैं ॥ १६९ ॥


फाडेंति आरडंतो मोग्गरछुरियापहारघाएहिं । असिवत्तवणेहि तहा पावंति महंतदुक्खाणि ॥ १७०

अर्थ: रोते हुए वे नारकी जीव मुद्गर एवं छुरीके प्रहारों व अभिघातों द्वारा फाड़े जाते हैं तथा असिपत्रवनोंके द्वारा महान् दुःखोंको प्राप्त होते हैं । ॥ १७० ॥


हुववहजालापहदा डज्झंता वि पियं पलोयंता ।
पविसंति तत्थ सहसा असिपत्तवणं महाघोरं ॥ १७१

अर्थ: उक्त नारकी जीव आगकी ज्वालाओंसे आहत होकर जलते हुए भी प्रिय समझ कर सहसा वहां महा भयानक असिपत्रवनमें प्रविष्ट होते हैं ॥ १७१ ॥


छिंदंति य भिंदंति य ऊपरि पडंतेहिं पत्तखग्गेहिं ।
वरुंडिया व जंति वायवसा पडियपत्तेहिं ॥ १७२

अर्थ: वहांपर वे ऊपर गिरते हुए पत्तों रूपी खड्गोंके द्वारा छेदे-भेदे जाते हैं । वायुके वश ऊपर गिरे हुए पत्तोंसे वे रुंड (छिन्नसिर) के समान जाते हैं ॥ १७२ ॥


गलसंखलासु बद्धा संछुब्भंति य तत्तचुल्लीहिं ।
तत्तकवल्लीसु अण्णे पच्चंति य सिमिसिमंतेणं ॥ १७३

अर्थ: वे नारकी गलेकी सांकलोंमें बांधे जाकर गरम चूल्हेमें फेंके जाते हैं तथा दूसरे नारकी तपे हुए कड़ाहोंमें सिम-सिम शब्द पूर्वक पकाये जाते हैं ॥ १७३ ॥


अच्छोडेप्पिणु अण्णे संबलिरुक्खम्मि कंटयाइण्णे ।
कट्टिज्जंति रसंता मंसवसारुहिरविच्छड्ढो ॥ १७४

अर्थ: अन्य नारकी कण्टकोंसे व्याप्त सेमर वृक्षके ऊपर पटके जाकर रोते हुए मांस, वसा एवं रुधिरके विस्तारसे संयुक्त होकर काटे जाते हैं ॥ १७४ ॥


छिंदंति य करवत्ते बंधेप्पिणु संखलाहिं खंभेसु ।
कप्पिज्जंति रसंता करंगुलीयाओ चक्केहिं ॥ १७५

अर्थ: उक्त नारकी खम्भोंमें सांकलोंसे बांधे जाकर करपत्र ( आरी ) के द्वारा छेदे जाते हैं तथा रोते हुए उनके हाथोंकी अंगुलियां चक्रों द्वारा काटी जाती है ॥ १७५ ॥


एवं छिंदणभिंदणताडणदहद्दहणदंडभेओ य ।
पावंति वेयणाओ रयणाइतमतमं जोमं ॥ १७६

अर्थ: इस प्रकार रत्नप्रभासे लेकर तमस्तमा पृथिवी पर्यन्त वे नारकी जीव छेदना, भेदना, ताड़न करना, तपाना व आगमें जलाना आदि दण्डविशेषोंको प्राप्त होकर वेदनाओंको प्राप्त करते हैं ॥ १७६ ॥


सत्त वि फरुसाओ कक्कसघोराओ दुक्खबहुलाओ ।
णामं पि ताण घेत्तुं ण सक्कए केंहं पुणो वसिदुं ॥

अर्थ: उक्त सातों पृथिवियां कठोर स्पर्शसे संयुक्त, कर्कश, भयानक और प्रचुर दुःखोंसे व्याप्त हैं । उनका नाम लेना भी जब शक्य नहीं है तब भला उनमें रहना कैसे शक्य होगा ? ॥ १७७ ॥ उन रत्नप्रभादिक


एक्कं च तिण्णि सत्त य दस सत्तरसं तहेव बावीसा । तेतीसउदधिआऊ पुढवीणं होंति उक्कस्सं ॥ १७८

अर्थ: पृथिवियोंमें स्थित नारकियोंकी क्रमशः एक, तीन, सात, दश, सत्तरह, बाईस तथा तेतीस सागरोपम प्रमाण उत्कृष्ट आयु है ॥ १७८ ॥


जंबूदीवस्स तहा धादइखंडस्स पोक्खरद्धस्स । खेत्तेसु समुद्दिठ्ठा सत्तरिसदभेदभिण्णेसु ॥ १७९

जे उप्पण्णा तिरिया मणुया वा घोरपावसं जुत्ता । मरिऊण पुणो णेया णरयं गच्छंति ते जीवा ॥ १८०

अर्थ (गाथा 179 से 180): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड तथा पुष्करार्द्ध द्वीपके एक सौ सत्तर भेदोंसे भिन्न क्षेत्रों ( जम्बूद्वीपका १ भरत, १ ऐरावत व ३२ विदेह; धातकीखण्डके २ भरत, २ ऐरावत व ६४ विदेह; तथा पुष्करार्द्धके भी २ भरत, २ ऐरावत और ६४ विदेह ) में जो मनुष्य अथवा तिर्यंच उत्पन्न होते हैं वे जीव घोर पापसे संयुक्त होते हुए मरकर नरकमें जाते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १७९-१८० ॥


लवणे कालसमुद्दे सयंभुरमणोदहिम्मि जे मच्छा । पंचेदिया दु तिरिया सयंभुरमणस्स दीवस्स ॥ १८१

ते कालगदा संतो णरयं गच्छंति णिच्चिदघणकम्मा । सम्मत्तरयणरहिया मिच्छत्तकलंकिदो जीवा ॥ १८२

अर्थ (गाथा 181 से 182): लवणोद, कालोद और स्वयंभूरमण समुद्रमें जो मत्स्य हैं वे तथा स्वयंभूरमण द्वीपके जो पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव हैं वे दृढ़ कर्मोंसे व्याप्त होकर सम्यक्त्व-रत्नसे रहित और मिथ्यात्वसे कलंकित होते हुए मरकर नरकको जाते हैं ॥ १८१-१८२ ॥


पणवीसकोडिकोडीउद्धारपमाणविउलपल्लाणं । जावदिया खलु रोमा तावदिया होंति दीवउधी ॥ १८३

अर्थ: पच्चीस कोड़ाकोड़ि उद्धारपल्योंके जितने रोम होते हैं उतने द्वीप-समुद्र हैं ॥ १८३ ॥


बारसकोडाकोडी पण्णासं लक्खकोडि पल्लाणं । जेत्तियमेत्ता रोमा दीवा पुण तेत्तिया होंति ॥ १८४

उदधी वि होंति तेत्तिय णिद्दिठ्ठा सव्वभावदरिसीहि । बणवेदिएहि जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १८५

अर्थ (गाथा 184 से 185): बारह कोड़ाकोड़ि पचास लाख करोड़ ( साढ़े बारह कोड़ाकोड़ि ) उद्धारपल्योंके जितने रोम होते हैं उतने द्वीप होते हैं तथा उतने ही समुद्र होते हैं, ऐसा सर्वभावदर्शियों ( सर्वज्ञों ) द्वारा निर्दिष्ट किया गया है । ये दिव्य द्वीप-समुद्र वन-वेदियोंसे युक्त और उत्तम तोरणोंसे मण्डित हैं ॥ १८४-१८५ ॥


जंबूधादइपोक्खरसयंभुरमणाभिधाण जे दीवा । ते वज्जित्ता चदुगे अवसेसअसंखदीवेसु ॥ १८६

जे उप्पण्णा तिरिया पंचिंदिय सण्णिणो य पज्जत्ता । पल्लाउगा महप्पा बेदंडसहस्सउत्तंगा ॥ १८७

अर्थ (गाथा 186 से 187): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड, पुष्करार्द्ध और स्वयंभूरमण नामक जो चार द्वीप हैं उनको छोड़कर शेष असंख्यात द्वीपोंमें उत्पन्न हुए जो पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्त तिर्यंच जीव पल्य प्रमाण आयुसे युक्त, महात्मा, दो हजार धनुष ऊंचे, सुकुमार कोमल


सुकुमारकोमलंगो मंदकसाया फलासिणो जीवा । जुवलाजुवलुव्वण्णा चउत्थभत्तेण पारिंति ॥ १८८

ते सव्वे मरिऊणं णियमा गच्छंति तह य सुरलोयं । ण य अण्णत्थुप्पत्ती णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ १८९

अर्थ (गाथा 186 से 189): अंगोंवाले, मंदकषायी, फलभोजी एवं युगल-युगल रूपसे उत्पन्न होकर चतुर्थ भक्तसे भोजन करते हैं; वे सब मरकर नियमसे सुरलोकको जाते हैं । उनकी उत्पत्ति सर्वदर्शियों द्वारा अन्यत्र नहीं निर्दिष्ट की गई है ॥१८६-१८९॥


जंबूधादगिपोक्खरदीवाणं तीसु भोगभूमीसु । जे जादा णरतिरिया णियमा ते जंति सुरलोयं ॥ १९०

भवणवइवाणविंतरजोइसभवणेसु ताण उप्पत्ती । सम्मत्तेण य जुत्ता सोधम्मादीसु जायंति ॥ १९१

अर्थ (गाथा 190 से 191): जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड और पुष्कर द्वीपोंकी तीन ( उत्तम, मध्यम व जघन्य ) या तीस भोगभूमियोंमें जो मनुष्य व तिर्यंच उत्पन्न होते हैं वे नियमसे सुरलोकको जाते हैं । [ इनमें जो सम्यक्त्वसे रहित होते हैं ] उनकी उत्पत्ति भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके भवनोंमें है । किन्तु जो सम्यक्त्वसे युक्त हैं वे सौधर्मादिकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १९०-१९१ ॥


जे सेसा णरतिरिया धम्मं काऊण सुद्धभावेण । ते कालगदा संता विमाणवासेसु जायंति ॥ १९२

अर्थ: शेष जो मनुष्य व तिर्यंच शुद्ध भावसे धर्मको करके मरणको प्राप्त होते हैं वे विमानवासी देवोंमें उत्पन्न होते हैं ॥ १९२ ॥


णवणउदिजोयणाईं उड्ढं गंतूण तह सहस्साईं । तो चूलियाए उवरिं होइ विमाणं उडुविमाणं ॥ १९३

अर्थ: निन्यानबे हजार योजन ऊपर जाकर मेरुकी चूलिकाके ऊपर ऋतु विमान स्थित है ॥ १९३ ॥


मणिरयणभित्तिचित्तं कंचणवरवइरसोहियपदेसं । माणुसखेत्तपमाणं होइ विमाणं उडुविमाणं ॥ १९४

अर्थ: मणिमय एवं रत्नमय भित्तियोंसे विचित्र और सुवर्ण व उत्तम वज्रसे शोभित प्रदेशवाला वह ऋतु-विमान मानुषक्षेत्रके प्रमाण अर्थात् पैंतालीस लाख योजन विस्तृत है ॥ १९४ ॥


एक्कं तु उडुविमाणं माणुसखेत्तेण होदि सममाणं । अवसेसा दु विमाणा लोगादो जाव लोगंतं ॥ १९५

अर्थ: एक ऋतु विमान तो मानुषक्षेत्रके बराबर है, शेष विमान लोकसे लोकके अन्त तक हैं ॥ १९५ ॥


तं सुविणिम्मलंकोमलतोरणवरमंगलुस्सविदसोहं । पासादवलभिविरहियें उब्भासंतं दसदिसाओ ॥ १९६

णिच्चं मणोभिरामं फुरंतमणिकिरणसोहसंभारं । कंचणरयणमहामणिल्लहसंतपासादसंधायं ॥ १९७

अर्थ (गाथा 196 से 197): वह विमान पवित्र, निर्मल, कोमल व श्रेष्ठ तोरणरूप मंगलोत्सवसे शोभायमान; प्रासाद व वलभियोंसे विरचित, दशों दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला, नित्य मनोहर, प्रकाशमान मणिकिरणोंकी शोभाके संभारसे संयुक्त; सुवर्ण, रत्नों व महामणियोंसे चमकते हुए प्रासादसमूहसे सहित;


जयविजयवेजयंतीपडायबहुकुसुमसोहकयमालं । बिलसंतणाभिदामं चोक्खं सुचियं पवित्तं च ॥ १९८

जगजगजगंतसोहं अब्भुब्भूदरूवसारसंठाणं । पुप्फोवयारपउरं बहुकोदुयमंगलसणाहं ॥ १९९

जंबूणयरयणमयं णिच्चुज्जलचोक्खरयणसोहंतं । किं जंपिएण बहुणा पुण्णफलं चेव पच्चक्खं ॥ २००

अर्थ (गाथा 196 से 200): जयन्ती, विजयन्ती व वैजयन्ती पताकाओं तथा बहुतसे फूलोंकी मालाओंसे शोभायमान; नाभिमें मालासे सुशोभित, चोखा, शुचि एवं पवित्र, अतिशय चमकते हुए सौधोंसे सहित, अत्यन्त अद्भुत श्रेष्ठ रूप व आकृतिसे संयुक्त, प्रचुर पुष्पोंके उपहारसे युक्त, बहुत कौतुक व मंगलोंसे सनाथ, सुवर्ण व रत्नोंसे निर्मित, और नित्य उज्ज्वल चोखे रत्नोंसे शोभायमान है । बहुत कहनेसे क्या ? यह प्रत्यक्ष पुण्यका ही फल है ॥ १९६-२०० ॥


जं तत्थ देवदेवीण वरसुहं जं च रूवलायण्णं । को वण्णेज्ज मणुस्सो अवि वाससहस्सकोडीहिं ॥ २०१

अर्थ: वहां देव-देवियोंको जो उत्तम सुख और रूप-लावण्य प्राप्त है उसका वर्णन कौनसा मनुष्य हजारों करोड़ वर्षोंमें भी कर सकता है ? ॥ २०१ ॥


तत्तो दु असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । विमलं णाम विमानं जत्थावासा सपुण्णाणं ॥ २०२

अर्थ: ऋतु विमानसे असंख्यात सौ करोड़ योजन अतिक्रमण करके विमल नामक विमान है जहां पुण्यात्मा जीवोंका निवास है ॥ २०२ ॥


तत्तो दु पुणो गंतूं जोयणकोडीसदा असंखेज्जा । चंदं णाम विमानं अत्थि सुरुवं मणभिरमं ॥ २०३

अर्थ: फिर उससे असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर सुन्दर आकृतिसे युक्त मनोहर चन्द्र नामक विमान स्थित है ॥ २०३ ॥


तत्तो दु असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । वग्गूणामविमाणं पमुदिदपक्कीलिदं रम्मं ॥ २०४

अर्थ: उससे असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर वल्गु नामक विमान है जो प्रमोदप्राप्त देवोंकी क्रीड़ाका रमणीय स्थल है ॥ २०४ ॥


तत्तो वि असंखेज्जा जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं । वीरं णाम विमानं पंचमपडलो समुद्दिष्ट्ठो ॥ २०५

अर्थ: उससे भी असंख्यात सौ करोड़ योजन जाकर वीर नामक विमान है । यह पांचवां पटल कहा गया है ॥ २०५ ॥


पत्तेयं पत्तेयं जोयणकोडीसदा असंखेज्जा । सव्वाण विमाणाणं पडलं पडलं तदो होइ ॥ २०६

अर्थ: इसके आगे प्रत्येक प्रत्येक असंख्यात सौ करोड़ योजनके अन्तरसे सब विमानोंके पटल हैं ॥ २०६ ॥ फिर इससे आगे


तत्तो य पुणो अरुण णंदण णलिणं च कंचणं रुहिरं ।
चंदावणं च भणियं तहेव पुण रिद्धिसं होई ॥ २०७

अर्थ: अरुण, नन्दन, नलिन, कांचन, रोहित, चंचत्, अरुण ( मरुत् ), तथा ऋद्धीश विमान कहे गये हैं ॥ २०७ ॥


तत्तो य पुणो गंतूं जोयणकोडीसदा अदिक्कम्मं ।
वेरुलिय त्ति विमाणं पभंकरं चेव रमणीयं ॥ २०८

रुधिरं अंकं फलिहं तवणिज्जं चेव उत्तमसिरीयं ।
मेघं तह वीसदिमं मणिकंचणभूसियपदेसं ॥ २०९

अर्थ (गाथा 208 से 209): पुनः उससे सैकड़ों करोड़ योजन जाकर वैडूर्य विमान और रमणीय प्रभंकर ( रुचक ) विमान है। उससे आगे रुधिर ( रुचिर ), अंक, स्फटिक, तपनीय तथा बीसवां उत्तम श्रीसे युक्त और मणि एवं सुवर्णसे भूषित प्रदेशवाला मेघ विमान है ॥ २०८-२०९ ॥


अब्भं तह हारिद्दं पउमं तह लोहियंक वइरं च ।
णंदावत्तविमाणं पभंकरं चेव रमणिज्जं ॥ २१०

अवरं च पिट्ठणामं तह गयं होइ मत्तणामं च ।
एदे तीस विमाणा एगत्तीसं पभं णाम ॥ २११

एदे एक्कत्तीसं हवंति पडला सुहम्मकप्पस्स ।
सेढिविमाऐहि गदा लोगादो जावं लोगंतं ॥ २१२

अर्थ (गाथा 210 से 212): इसके आगे अभ्र, हारिद्र, पद्म, लोहित, अंक, वज्र, नंदावर्त, रमणीय प्रभंकर, पृष्ट नामक, गज और मत्त ( मित्र ) नामक, ये तीस विमान तथा इकतीसवां प्रभ नामक; इस प्रकार ये इकतीस पटल सौधर्म कल्पके हैं जो श्रेणिबद्ध विमानोंके साथ लोकसे लोक पर्यन्त स्थित हैं ॥ २१०-२१२ ॥


एकतीसदिमं पडलं जंबूणदरयणअंकवइरमयं ।
तमूले सोहम्मं जत्थ सुरिंदो सयं वसइ ॥ २१३

समचउरंसा दिव्वा जोयणमेगं च समधियं जत्थ ।
णामेण सा सुधम्मा सोधम्मं जीएं णामेण ॥ २१४

अर्थ (गाथा 213 से 214): इकतीसवां पटल सुवर्ण, रत्न, अंक व वज्रमय है। उसके मूलमें सौधर्म कल्प है जहां स्वयं सुरेन्द्र रहता है, तथा जहां समचतुष्कोण दिव्य एक योजनसे कुछ अधिक विस्तृत सुधर्मा नामकी सभा है, जिसके नामसे उस कल्पका भी सौधर्म नाम प्रसिद्ध है ॥ २१३-२१४ ॥


तत्थ दु विक्खंभेमज्झे हवंति णयराणिमाणिं चत्तारि ।
कंचणमसोगमंदिरमसारगल्लं च सोहम्मे ॥ २१५

अर्थ: वहां सौधर्म कल्पमें विष्कम्भके मध्यमें कांचन, अशोक, मंदिर और मसारगल्ल, ये चार नगर हैं ॥ २१५ ॥


तो तत्थ लोगपाला चदुसु वि य दिसासु होंति चत्तारि ।
जमवरुणसोममादी एदेसु हवंति णगरेसुं ॥ २१६

अर्थ: वहां चारों दिशाओंमें स्थित इन नगरोंमें यम, वरुण और सोमादि ( सोम और कुबेर ) ये चार लोकपाल रहते हैं ॥ २१६ ॥


वेमाणिया य एदे जमवरुणकुबेरसोममादीयो ।
पडिइंदा इंदस्स दु उत्तमभोगा महिइड्डीया ॥ २१७

अर्थ: उत्तम भोग एवं महर्द्धिसे संयुक्त ये यम, वरुण, कुबेर और सोमादि वैमानिक देव इन्द्रके प्रतीन्द्र होते हैं ॥ २१७ ॥


एक्कत्तीसं पडलाई बत्तीसं चेव सयसहस्साईं । ताईं तु विमाणाई हवंति सोहम्मकप्पस्स ॥ २१८

अर्थ: इकतीस पटल और वे बत्तीस लाख विमान सौधर्म कल्पके हैं ॥ २१८ ॥


मज्झिमयम्मि विमाणे मसारगल्लम्मि मणहरालोए । मज्झम्मिं रयणचित्ता सोहम्मसहा विमाणं च ॥ २१९

बत्तीससयसहस्साण सामिओ दिव्ववरविमाणाणं । तेलोककपायडमडो जत्थ सुरिंदो सयं वसइ ॥ २२०

अर्थ (गाथा 219 से 220): मनोहर आलोकवाले मध्यम मसारगल्ल विमानमें रत्नोंसे चित्रित सौधर्मसभा व विमान है, जिसमें बत्तीस लाख उत्तम दिव्य विमानोंका स्वामी व तीन लोकोंका प्रगट सुभट स्वयं सौधर्म सुरेन्द्र निवास करता है ॥ २१९-२२० ॥


सो भुंजइ सोहम्मं सयलं समंतेणं तिहुयणेण समं । बहुविहपावविहम्मो सद्धम्मो सोहणो जस्स ॥ २२१

अर्थ: वह सौधर्म इन्द्र, जिसके कि पासमें बहुत प्रकारके पापोंका विघातक शोभायमान उत्तम धर्म विद्यमान है, समस्त सौधर्म कल्पको त्रिभुवनके समान सब ओरसे पालता है ॥ २२१ ॥


णिरुवहदजठरकोमलअदिसयवररूवसत्तिसंपण्णो । तरुणाइच्चसमाणो समचउरंसेण ठाणेण ॥ २२२

अर्थ: उक्त इन्द्र अपघात रहित उदरसे संयुक्त, अत्यन्त सुन्दर रूप व शक्तिसे सम्पन्न, तरुण सूर्यके समान तेजस्वी और समचतुरस्रसंस्थानसे युक्त है ॥ २२२ ॥


वरमउडकुंडलहरो उत्तममणिरयणपवरपालंबो । केऊरकडयसुत्तयवरहारविहूसियसरीरो ॥ २२४

अर्थ: वह उत्तम मुकुट व कुण्डलोंको धारण करनेवाला, उत्तम मणियों व रत्नोंके श्रेष्ठ प्रालम्ब ( गलेका आभूषण ) से युक्त तथा केयूर, कटक, सूत्र व उत्तम हारसे विभूषित शरीरसे संयुक्त है ॥ २२४ ॥


तत्तो दु विमाणादो गंतूणं जोयणा असंखेज्जा । तो होदि पभविमाणं पभमंडलमंडियं दिव्वं ॥ २२५

अर्थ: उस विमानसे असंख्यात योजन जाकर प्रभामण्डलसे मण्डित दिव्य प्रभ विमान स्थित है ॥ २२५ ॥


तीए पुण मज्झद्देसे भासुररूवा सभा सुहम्मा चिट्ठइ तीए वि मज्झद्देसे खग्गं किर उत्तमसिरीयं ॥ २२७

अर्थ: उस सुरेन्द्रके अंगोंकी उपमा कैसे की जा सकती है जिसके अनन्त सौन्दर्यवाले रूपमें अनुपम कान्ति विद्यमान है ॥ २२३ ॥ उस प्रभ विमानमें प्रभंकरा नामकी राजधानी है । उसका नाम अमरावती, इन्द्रपुरी व सौधर्मपुरी भी है ॥ २२६ ॥ उसके मध्य देशमें भास्वर रूपवाली सुधर्मा नामकी सभा है । उसके भी मध्य देशमें उत्तम श्रीसे संयुक्त खग्ग (!) है ॥ २२७ ॥


खग्गसहस्सवगूढं मणिकंचणरयणभूसियसरीरं । किं बहुणा तं खग्गं अच्छेरयसारसंभूदं ॥ २२८

अर्थ: उक्त छत्र हजारों खड्गोंसे आलिंगित तथा मणि, सुवर्ण एवं रत्नोंसे भूषित शरीरवाला है । बहुत कहनेसे क्या ! वह खग्ग आश्चर्यजनक श्रेष्ठ द्रव्योंसे उत्पन्न हुआ है ॥२२८॥


तस्स बहुमज्झदेसे रमणिज्जुज्जलंविचित्तमणिसोहं । सिंहासनं सुरम्मं सपायपीठं अणोवमियं ॥ २२९

अर्थ: उसके बहुमध्य भागमें रमणीय, उज्ज्वल व विचित्र मणियोंसे शोभायमान एवं पादपीठसे सहित सुन्दर अनुपम सिंहासन है ॥ २२९ ॥


सो तत्थ सुहम्मवदी वरचामरविज्जमाणबहुमाणो । संतुट्ठसुहणिसण्णो सेविज्जई सुरसहस्सेहिं ॥ २३०

अर्थ: उसके ऊपर संतुष्ट होकर सुखपूर्वक स्थित वह सौधर्म इन्द्र उत्तम चामरोंसे वीज्यमान व बहुत सन्मानको प्राप्त होकर हजारों देवोंसे सेवित है ॥ २३० ॥


तं च सुहम्मवरसभं सीहासणमुत्तमं सुरिंदं च । अच्छरसाण य सोहं को वण्णेदुं समुच्छहदि ॥ २३१

अर्थ: उस उत्तम सुधर्मा सभा, उत्तम सिंहासन, सुरेन्द्र और अप्सराओंकी शोभाका वर्णन करनेके लिये कौन उत्साहित होता है ? अर्थात् कोई भी उनका वर्णन करनेके लिये समर्थ नहीं है ॥ २३१ ॥


दिव्वविमाणसभाए तीए अच्छेररूवकलिदाए । को उवमाणं कीरइ तिहुयणसारक्कसारारूए ॥ २३२

अर्थ: आश्चर्यजनक रूपसे सहित और तीनो लोकोंकी सारभूत वस्तुओंमें अद्वितीय उस दिव्य विमानसभाके लिये कौनसी उपमा की जाय ? अर्थात् वह सर्वश्रेष्ठ होनेसे उपमातीत है ॥ २३२ ॥


को व अणोवमरूवं रूवं उवमेज्ज अण्णरूवेणं । अमराहिवस्स सयलं अच्छब्भुदरूवसारस्स ॥ २३३

अर्थ: अत्यन्त आश्चर्यजनक श्रेष्ठ रूपसे संयुक्त उस सुरेन्द्रके अनुपम सुन्दरतासे परिपूर्ण समस्त रूपकी अन्य किसके रूपसे तुलना की जा सकती है ! अर्थात् नहीं की जा सकती ॥ २३३ ॥


जोयणसयं समहियं सा तस्स सभा स्वभावणिम्मिदा । भरइ निरंतरणिच्चिदा देवेहि महाणुभावेहिं ॥ २३४

अर्थ: एक सौ योजनसे कुछ अधिक व स्वभावसे निर्मित वह सौधर्म इन्द्रकी सभा महान् प्रभाववाले देवोंसे निरन्तर भरी रहती है ॥ २३४ ॥


विलसंतधयवड्डाया मुत्तामणिहेमजाळकयसोहा । पुढवीवरपरिणामा णिच्चचिदं सुरहिमहल्लेहिं ॥ २३५

अर्थ: शोभायमान ध्वजा-पताकाओंसे सहित; मोतियों, मणियों व सुवर्णके समूहसे की गई शोभासे सम्पन्न, पृथिवीके उत्तम परिणाम


गोसीसमलयचंदनसुगंधगंधुद्धुरेण गंधेण ।
वासेदि व सुरलोयं सा सग्गसिरी विक्खंबंती ॥ २३६

अर्थ (गाथा 235 से 236): रूप तथा सुगन्धित मालाओंसे सदा व्याप्त रहनेवाली वह सभा स्वर्गश्रीको तिरस्कृत करती हुई सुगन्ध गन्धसे उत्कट गन्धके द्वारा स्वर्गलोकको सुवासित करती है ॥२३५-२३६॥


सक्को वि महद्धीओ महाणुभागो महाजुदी धीरो ।
भासुरवरबोधिधरो सम्मादिट्ठी तिणाणीओ ॥ २३७

सो कायपडिउचारो पुरिसो इव पुरिसकारणिक्फण्णो ।
भुंजदि उत्तमभोगं देवीहिं समं गुणसमिद्धं ॥ २३८

अर्थ (गाथा 237 से 238): महाविभूतिसे संयुक्त, महाप्रभावसे सहित, महाकान्तिका धारक, धीर, भास्वर उत्तम रूपको धारण करनेवाला, सम्यग्दृष्टि, तीन (मति, श्रुत व अवधि) ज्ञानोंसे युक्त, पुरुषके समान कायप्रवीचारसे सहित तथा पौरुषसे निष्पन्न वह सौधर्म इन्द्र भी देवियोंके साथ गुणोंसे समृद्ध उत्तम भोगको भोगता है ॥२३७-२३८॥


बत्तीसं देविंदा (?) तायत्तीसा य उत्तिमो पुरिसा ।
चुलसीईं च सहस्सा देवा सामाणिया तस्स ॥ २३९

अट्ठ य पणट्ठसोया ताओ अङ्गरुवसारसोहाओ ।
अग्गवरमहिसियाओ अच्छेरयपेच्छणिज्जाओ ॥ २४०

अर्थ (गाथा 239 से 240): उक्त इन्द्रके बत्तीस देवेन्द्र, त्रायस्त्रिंश, चौरासी हजार सामानिक देव ये उत्तम पुरुष हैं; तथा शोकसे रहित, अत्यन्त श्रेष्ठ रूपसे सुशोभित एवं आश्चर्यपूर्वक दर्शनीय ऐसी उत्तम आठ अग्रमहिशियां होती हैं ॥२३९-२४०॥


अणियाणं सत्तण्ह य परिसाणं सामिओ सुरवरिंदो ।
चुलसीदिं च सहस्सा (?) परिसाए आदरक्खाणं ॥ २४१

अर्थ: उक्त सुरेन्द्र सात अनीकों, अभ्यन्तरादि परिषदोंमें बैठने योग्य चौरासी [१२+१४+१६] हजार परिषद देवों तथा [३३६०००] आत्मरक्ष देवोंका स्वामी है ॥२४१॥


संणद्धबद्धकवयो उप्पीळियसारपट्टियामज्झो ।
बहुविहउज्जयहत्था सूरसमत्था य आयरक्खो य ॥ २४२

अर्थ: युद्धके लिये उद्यत होकर कवचको व मध्यमें सारपट्टिकाको कसकर बांधे हुए तथा बहुत प्रकार उद्यम युक्त हाथोंवाले ये आत्मरक्षक देव शूरोंमें समर्थ होते हैं ॥२४२॥


चत्तारिकोयवालाणं तत्थ जमवरुणसोममादीणं ।
सामित्तं भट्टित्तं करेदि कालं असंखेज्जं ॥ २४३

अर्थ: वह सौधर्म इन्द्र वहां यम वरुण और सोमादि (सोम व कुवेर) चार लोकपालोंके स्वामित्व व भर्तृत्वको असंख्यात काल तक करता है ॥ २४३ ॥


संखेज्जवित्थडाणि य असंखपारमाणवित्थडाणिं च ।
दिव्वविमाणाणि तहिं कोडिसहस्साणि बहुवाणिं ॥ २४४

अर्थ: उपर्युक्त दिव्य विमान संख्यात योजन विस्तारवाले व असंख्यात योजन विस्तारवाले हैं । उनमें हजारों करोड़ योजन (असंख्यात) विस्तारवाले विमान बहुत (अपनी संख्याके ५/८ भाग) हैं ॥ २४४ ॥ संख्यात विस्तारवाले विमान संख्यात करोड़


संखेज्जवित्थडा किर संखेज्जा जोयणाण कोडीओ । जे होंति असंखेज्जा ते दु असंखेज्जकोडीओ ॥ २४५

अर्थ: योजन तथा जो असंख्येय विस्तारवाले हैं वे असंख्यात करोड़ योजन विस्तृत हैं ॥ २४५ ॥

एक्कारसमो उद्देसो (भाग 2/2)

सिरिवच्छसंखसत्थियअरविंदयचक्कवट्टिया बहुया । समचउरंसा तंसा अणेगसंठाणपरिणामा ॥ २४६

अर्थ: बहुतसे विमान श्रीवृक्ष, शंख, स्वस्तिक, पद्म व चक्रके समान वर्तुलाकार तथा बहुतसे समचतुष्कोण व त्रिकोण अनेक आकारोंमें परिणत हैं ॥ २४६ ॥


पायारगोउरट्ठालएहि वरतोरणेहिं चित्तेहि । वंदणमालाहि तहं वरमंगलपुण्णकलसेहिं ॥ २४७

अर्थ: उक्त विमान प्राकार, गोपुर, अट्टालयों, विचित्र उत्तम तोरणों, वन्दनमालाओं तथा मंगलकारक उत्तम पूर्णकलशोंसे [ सुशोभित हैं ] ॥ २४७ ॥


कंचणमणिरयणमया णिम्मलमलवज्जिदा रयणचित्ता । बहुपुप्फगंधपउरा विमाणवासा सपुण्णाणं ॥ २४८

अर्थ: सुवर्ण, मणियों एवं रत्नोंके परिणाम स्वरूप; निर्मल- मलसे रहित, रत्नोंसे विचित्र और बहुत पुष्पोंकी गन्धसे प्रचुर वे विमानालय पुण्यात्मा जीवोंके हैं ॥ २४८ ॥


अगरुयतुरुक्कचंदणगोसीससुगंधवासपडिपुण्णो । पवरच्छराहि भरिया अच्छेरयरूवसाराहिं ॥ २४९

अर्थ: उक्त विमान अगरु, तुरुष्क, चन्दन व गोशीर्ष रूप सुगन्धित द्रव्योंसे परिपूर्ण तथा आश्चर्यजनक सुन्दर रूपवाली श्रेष्ठ अप्सराओंसे व्याप्त हैं ॥ २४९ ॥


तत्थ पभम्मि विमाणे एरावणवाहणो दु वज्जधरो । इंदो महाणुभावो जुदीए सहिदो महद्दीओ ॥ २५०

अर्थ: वहां प्रभ नामक विमानमें ऐरावत वाहन ( आभियोग्य ) देवसे संयुक्त, वज्रको धारण करनेवाला, महाप्रभावशाली तथा कान्तिसे सहित महर्द्धिक सौधर्म इन्द्र रहता है ॥ २५० ॥


बेसागरोवमाई तस्स ठिदी तम्मि वरविमाणम्मि । भासुरवरबोंधिधरो अच्छेव्वभुदरूवसंठाणो ॥ २५१

अर्थ: उस उत्तम विमानमें स्थित उसकी आयु दो सागरोपम प्रमाण है । वह इन्द्र भास्वर उत्तम रूपको धारण करनेवाला तथा अतिशय आश्चर्यकारक रूप व आकृतिसे संयुक्त है ॥ २५१ ॥


दोण्हं वाससहस्सा तस्स य आहारकारणं दिट्ठं । उस्सासो णिस्सासो दोण्हं पुण तत्थ पक्खाणं ॥ २५२

अर्थ: उसके आहारकालका प्रमाण दो हजार वर्ष तथा उच्छ्वास-निश्वासका काल दो पक्ष प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ २५२ ॥


सत्तरदणी य गेयो उच्छेहो तस्स सुरवरिंदस्स । सेसाणं पि सुराणं सोहम्मे होइ उच्छेहो ॥ २५३

अर्थ: उस श्रेष्ठ सुरेन्द्रका उत्सेध सात रत्नि प्रमाण जानना चाहिये । सौधर्म स्वर्गमें स्थित शेष देवोंका भी उत्सेध सात रत्नि है ॥ २५३ ॥


अट्ठगुणमहड्डीओ सुहविउरुव्वणविसेससंजुत्तो । समचउरंससुसंठिय संघदणेसु य असंघदणो ॥ २५४

अर्थ: अणिमा-महिमा आदि आठ गुणों व महा-ऋद्धिसे सहित, शुभ विक्रियाविशेषसे संयुक्त, समचतुरस्र शरीरसंस्थानसे युक्त, [ छह ] संहननोंमें संहननसे रहित, आभिनिबोधिकज्ञानी,


णामिणिबोहियणाणी सुदणाणी ओधिणाणिया केई । सागारो उवजोगो उवजोगो चेव अणगारो ॥ २५५

अर्थ (गाथा 254 से 255): श्रुतज्ञानी व कोई अवधिज्ञानी तथा साकार व निराकार उपयोगसे सहित है ॥ २५४-२५५ ॥


मणजोगि कायजोगी वयजोगी काय होंति ते सव्वे । देवा इर दिविलोए चदुसु वि ठाणेसु णायव्वा ॥ २५६

अर्थ: वे सब देव मनोयोगी, वचनयोगी और काययोगी होते हैं । स्वर्गलोकमें देव चार ही गुणस्थानोंमें स्थित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ २५६ ॥


उप्पज्जंति चवंति य देवाणं तत्थ सदसहस्साइं । गेहविमाणा दिव्वा अकिट्टिमा सासदसभावा ॥ २५७

अर्थ: वहां अकृत्रिम एवं शाश्वत स्वभाववाले जो लाखों दिव्य गृहविमान हैं उनमें देव उत्पन्न होते व मरते हैं ॥ २५७ ॥


पउमा सिवा य सुलसा सची य अंजू तहेव कालिंदी । सामा भामू य तहा सक्कस्स दु अग्गमहिसीओ ॥ २५८

अर्थ: पद्मा, शिवा, सुलसा, शची, अब्जू, कालिंदी, श्यामा तथा भानु, ये सौधर्म इन्द्रकी अग्रमदेवियां हैं ॥ २५८ ॥


पउमा दु महादेवी सव्वंगसुजादसंदरसुरूवा । कलमहुरसुस्सरसरा इंदियपल्हायणकरी य ॥ २५९

सव्वंगसुंदरी सा सव्वालंकारभूसियसरीरा । रूवे सद्दे गंधे फासेण य णिच्च सा सुभगा ॥ २६०

अर्थ (गाथा 259 से 260): सब अंगोंमें उत्पन्न सुन्दर रूपसे सहित, कल एवं मधुर सुन्दर स्वरसे संयुक्त, इन्द्रियोंको आह्लादित करनेवाली, सर्वांगसुन्दरी तथा सब अलंकारोंसे भूषित शरीरसे संयुक्त जो पद्मा महादेवी है वह रूप, शब्द, गन्ध व स्पर्शसे नित्य ही सुभग है ॥ २५९-२६० ॥


पियदंसणाभिरामा इट्ठा कंता पिया य सक्कस्स । सोलसदेविसहस्सा विउरुव्वदि उत्तमसिरीया ॥ २६१

अर्थ: उक्त महादेवी इन्द्रकी प्रियदर्शना, अभिराम वल्लभा व इष्ट प्रिया है । उत्तम श्रीसे संयुक्त वह देवी सोलह हजार देवियोंके रूपोंकी विक्रिया करती है ॥ २६१ ॥


इट्ठाओ कंताओ जोव्वणगुणसालिणीओ सव्वाओ । पीदिं जणंति तस्स दु अप्पडिरूवेहिं रूवेहि ॥ २६२

अर्थ: यौवन गुणसे शोभायमान सब इष्ट वल्लभायें अपने अनुपम रूपोंवाले रूपोंसे इन्द्रको प्रीति उत्पन्न करती हैं ॥ २६२ ॥


पीदिमाणंदमणा विणएण कदंडजली णमंसंति । विणएण विणयकलिदं सक्कं चित्तेण रामेंति ॥ २६३

अर्थ: मनमें प्रीति व आनन्दको धारण करनेवाली वे देवियां विनयसे हाथ जोड़कर नमस्कार करती हैं और विनयसे सहित होती हुई मन लगाकर नम्रतापूर्वक सौधर्म इन्द्रको रमती हैं ॥ २६३ ॥


विउरुव्वणा पभावो रूवं फासो तहेव गंधो य । अट्ठण्ह वि देवीणं एस सभावो समासेण ॥ २६४

अर्थ: विक्रिया, प्रभाव, रूप, स्पर्श तथा गन्ध यह संक्षेपसे आठों ही देवियोंका स्वभाव है । अर्थात् ये उन आठों ही देवियोंके समान होते हैं ॥ २६४ ॥


हियमणोगथभावं ताओ णाऊण अमरबहुयाओ ।
हियइच्छिदाई बहुसो पूरैति मणोरहसदाई ॥ २६५

अर्थ: वे देवांगनायें इन्द्रके हृदय अथवा मनमें स्थित भावको जानकर उसके सैकड़ों अभीष्ट मनोरथोंको बहुत प्रकारसे पूर्ण करती हैं ॥२६५॥


बत्तीससहस्साई वल्लहियाणं पुणो वि अवराणं ।
सव्वंगसुंदरीणं अच्छेरयपेच्छणिज्जाणं ॥ २६६

अर्थ: अग्रदेवियोंके अतिरिक्त उक्त सौधर्म इन्द्रके बत्तीस हजार वल्लभायें होती हैं जो सर्वांगसुन्दरी एवं साश्चर्य दर्शनीय हैं ॥ २६६ ॥


पत्तेयं पत्तेयं वल्लहियाओ य ताओ सव्वाओ ।
विउरुव्वंति सुरूवा सोलसदेवीसहस्साणि ॥ २६७

अर्थ: उन सब वल्लभाओंमें प्रत्येक वल्लभा अपने रूपके साथ सोलह हजार देवियोंके रूपोंकी विक्रिया करती है ॥ २६७ ॥


पंचपलिदोवमाई आउट्ठिदि विसयइड्ढितुल्लाणं ।
सव्वाणं देवीणं एसेव कमो मुणेयव्वो ॥ २६८

अर्थ: विषय व ऋद्धिमें समानताको प्राप्त उन देवियोंकी आयुस्थिति पांच पल्योपम प्रमाण है। सब देवियोंके यही क्रम जानना चाहिये ॥ २६८॥


बेसागरोवमाई आउट्ठिदि तस्स सुरवरिंदस्स ।
ताव अणेगा देवी उप्पज्जंती चवंती य ॥ २६९

अर्थ: उस श्रेष्ठ सुरेन्द्रकी आयुस्थिति दो सागरोपम प्रमाण है। इतने समयमें अनेक देवियां उत्पन्न होती हैं और मरती हैं ॥ २६९ ॥


पडिइंदतायतीसा सामाणिया तह य लोयवालाणं ।
तिण्हं पि य परिसाणं णामविभत्ती ससंखा य ॥ २७०

अर्थ: प्रतीन्द्र, त्रायस्त्रिंश, सामानिक, लोकपालों तथा तीनों ही परिषदोंके संख्या सहित नामोंका विभाग [इस प्रकार है] ॥ २७० ॥


समिदा चंदा य जंदू परिसाणं तिण्णि होंति णामाणि ।
अब्भंतरमज्झिमबाहिरा य कमसो सुणेयव्वा ॥ २७१

अर्थ: अभ्यन्तर, मध्यम और बाह्य, इन तीन परिषदोंके क्रमशः समिता, चन्द्रा व जनु ये तीन नाम जानना चाहिये ॥ २७१ ॥


दस दो य सहस्साई अब्भंतरवारिसाए समिदीए ।
मज्झिमपरिसा चंदो चउदससाहस्सिया भणिदा ॥ २७२

अर्थ: इनमेंसे समिता नामक अभ्यन्तर परिषद्में बारह हजार और चन्द्रा नामक मध्यम परिषद्में चौदह हजार देव कहे गये हैं ॥ २७२ ॥


बाहिरपरिसाए पुणो णामेण जंदू जगम्मि विक्खादा ।
सोलसयसहस्साई परिसाए तीए णायव्वा ॥ २७३

अर्थ: जो बाह्य परिषद् जगतमें ‘जतु’ नामसे प्रसिद्ध है उस बाह्य परिषद्में सोलह हजार देव जानना चाहिये ॥ २७३ ॥


अवरे वि य सेयणिया(?) सत्त वि य जहाकमं णिसामेह ।
पायाईगयहयाण य वसहाण य सिग्धगामीणं ॥

अर्थ: पदाति, गज, अश्व, शीघ्रगामी वृषभ तथा और भी जो सेना है; यथाक्रमसे उस सात प्रकारकी सेनाकी [विशेषताको] सुनो ॥ २७४ ॥ पदाति, पीठ, वृषभ, रथ, तुरग, गजेन्द्र


पायाइपीठेवसहा रहतुरयगइंददिव्वगंधव्वा ।
णट्ठाणीयाण तहा णीलंजस महद्धरी जत्थे ॥ २७५

अर्थ: और दिव्य गन्धर्व ये सात अनीक हैं, तथा जहां नर्तकी अनीकोंकी महत्तरी नीलंजसा है ॥२७५॥


वाऊ णामेण तहिं पायाइबलस्स महदरो णेओ ।
सण्णद्धबद्धकवओ सत्ताहि कच्छाहि परिकिण्णो ॥ २७६

अर्थ: युद्धमें उद्युक्त होकर कवचको बांधनेवाला व सात कक्षाओंसे वेष्टित वायु नामक देव उक्त सेनाओमेंसे पदाति सेनाका महत्तर जानना चाहिये ॥ २७६ ॥


पदमिल्लयकच्छाए चुलसीदी होंति सदसहस्साई ।
बिदियाए सदगुणा संणद्धा सुरवरा होंति ॥ २७७

अर्थ: प्रथम कक्षामें चौरासी लाख [ हजार ] और द्वितीय कक्षामें युद्धार्थ तत्पर रहनेवाले उत्तम देव उनसे दुगुणे होते हैं ॥२७७॥


उज्जुदसत्था सव्वे णाणाविहगहियपहरणाभरणा ।
संणद्धबद्धकवया आरक्खा सुरवरिंदस्स ॥ २७९

अर्थ: शस्त्र धारण करनेमें उद्युक्त व नाना प्रकारके शस्त्रों रूपी आभरणोंको ग्रहण करनेवाले तथा युद्धमें तत्पर होकर कवचको बांधे हुए वे सब सैनिक देव इन्द्रके रक्षक हैं ॥ २७९ ॥


बाहिरपरिसा णेया अल्लंरूंदा णिट्ठुरा पयंडा य ।
बंठा उज्जुदसत्था अवसारं तत्थ घोसंति ॥ २८०

अर्थ: बाह्य परिषद देव अत्यन्त स्थूल, निष्ठुर, क्रोधी, अविवादित और शस्त्रोंसे उद्युक्त जानना चाहिये। वे वहां ‘अपसर’ (दूर हटो) की घोषणा करते हैं ॥२८०॥


वेत्तलदागहियकरा मज्झिम आरूढवेसधारी य ।
कंचुइकदणेवत्था अंतेउरमहद्दरा बहुधो ॥ २८१

अर्थ: वेत रूपी लताको हाथमें ग्रहण करनेवाले, आरूढ़ वेषके धारक तथा कंचुकी (अन्तःपुरका द्वारपाल)की पोशाक पहने हुए मध्यम [ परिषद ] बहुधा अन्तःपुरके महत्तर होते हैं ॥ २८१ ॥


बब्बरिचिलाइखउजाकम्मंतियदासिचेडिवग्गो य ।
अंतेउरअभियोगा करंति णाणाविधे वेसे ॥ २८२

अर्थ: बर्बरी, किराती, कुब्जा, कर्मान्तिका, दासी और चेटी इनका समुदाय नाना प्रकारके वेषमें अन्तःपुरके अभियोगको करता है ॥ २८२ ॥


पीठाणीयस्स तहिं महदरओ सो हरि त्ति णायव्वो ।
उच्चासणा सहस्सा सवायपीठा तहिं देदि ॥ २८३

अर्थ: तथा पीठानीकका महत्तर हरि नामक देव जानना चाहिये। वह वहां पादपीठ सहित हजारों उच्च आसनोंको देता है ॥ २८३ ॥


तस्स वि य सत्तकच्छा बोद्धव्वा होंति आणुपुव्वीए ।
कच्छासु सो विरिंचदि भूमिभागं वियाणंतो ॥ २८४

अर्थ: उसकी भी क्रमशः सात कक्षायें जानना चाहिये। वह उन कक्षाओंमें भूमिके विभागको जानता हुआ उसे विभाजित करता है ॥ २८४ ॥ जो जिसके योग्य


जं जस्स जोगमहरिहं उच्चं णिच्चं च आसणं दिव्वं ।
तं तस्स भूमिभागं णाऊण तहिं तहिं देदि ॥ २८५

अर्थ: महार्ह (बहुमूल्य) ऊंचा व नीचा दिव्य आसन होता है वह उसके योग्य भूमिभागको जानकर वहां वहां उसे देता है ॥२८५॥


वसभाणीयस्स तहिं महदरओ सो दु णाम दामट्ठी ।
तस्स वि य सत्त कच्छा देवाणं वसमरूवाणं ॥ २८६

अर्थ: वहां वृषभानीकका महत्तर वह दामष्टि (दामयष्टि) नामक देव है । उसके भी वृषभरूप देवोंकी सात कक्षायें होती हैं ॥२८६॥


पवणंजओ त्ति णामेण तस्स वरतुरगमहदरो देवो ।
सत्ताहिं कच्छाहिं समं तुरयसहस्सा बहुं देइ ॥ २८७

अर्थ: उस अश्वसेनाका महत्तर पवनञ्जय नामक देव होता है । वह अपनी सात कक्षाओंके साथ अनेक सहस्र अश्वोंको देता है ॥२८७॥


एरावणो त्ति णामेण महदरो होदि सो गयाणीओ ।
विउरुव्वदि साहस्सा मत्तगयंदाण णेगाणं ॥ २८८

अर्थ: गजानीकका महत्तर वह ऐरावत नामक देव होता है । वह अनेक सहस्र मत्त गजेन्द्रोंकी विक्रिया करता है ॥ २८८॥


उत्तंगमुसलदंता पभिण्णकरडा महागुलगुलिता ।
सत्ताहिं कच्छाहिं ठिदा कुंजररूवेहि ते दिव्वा ॥ २८९

अर्थ: मूसलके समान उन्नत दांतोंसे सहित, मदको झरनेवाले गण्डस्थलोंसे युक्त, और गुल-गुल महा गर्जना करनेवाले वे दिव्य देव हाथी रूप सात कक्षाओंके साथ स्थित रहते हैं ॥२८९॥


अवरो वि रहाणीओ महदरओ मादलि त्ति विक्खादो ।
सत्ताहिं कच्छाहिं ठिदो देइ रहाणं सयसहस्सा ॥ २९०

अर्थ: मातली नामसे विख्यात दूसरा रथ अनीकका महत्तर भी सात कक्षाओंसे स्थित होकर लाखों रथोंको देता है ॥ २९० ॥


णामेण अरिट्ठजसो गंधव्वाणीयमहदरो अवरो ।
सत्ताहिं कच्छाहिं समं गायदि दिव्वं महुरसद्दे । ॥ २९१

अर्थ: अरिष्टयश नामसे प्रसिद्ध दूसरा गन्धर्व अनीकका महत्तर सात कक्षाओंके साथ मधुर स्वरसे दिव्य गान करता है ॥ २९१ ॥


णट्ठाणीयमहदरी णीलंजसे णट्टलक्खणपगब्भा ।
सत्ताहिं कच्छाहिं समं णच्चदि णट्टं बहुवियप्पं ॥ २९२

अर्थ: नाट्यलक्षणमें समर्थ नीलंजसा नामक नर्तक सैन्यकी महत्तरी सात कक्षाओंके साथ बहुत प्रकारका अभिनय करती है ॥ २९२ ॥


गाय॑ति य णच्च॑ति य अभिरामंति य अणोवमसुहेहिं ।
अमरे य अमरबहुओ इंदियविसएहिं सव्वेहिं ॥ २९३ ॥

अर्थ: वे देवांगनायें गाती हैं, नाचती हैं, तथा अनुपम सुखकारक सब इन्द्रियविषयोंसे देवोंको रमाती हैं ॥ २९३ ॥


इंदस्स दु को विहवं उवभोगं तस्स तह य परिभोगं ।
वण्णेऊण समत्थो सोहग्गं रूवसारं च ॥ २९४

अर्थ: उस इन्द्रके विभव, उपभोग, परिभोग, सौभाग्य तथा श्रेष्ठ रूपका वर्णन करनेके लिये कौन समर्थ है ! अर्थात् कोई नहीं है ॥२९४॥ इस प्रकार महाऋद्धिका


एवं तु महड्ढीयो महाणुभागी महाजुदी सक्को । तेल्लोक्कसारपिंडं भुंजदि अच्छेरयब्भूयं ॥ २९५

अर्थ: धारक, महाप्रभावसे संयुक्त, महाकान्तिसे सुशोभित वह सौधर्म इन्द्र तीनों लोकोंमें सारभूत आश्चर्य-जनक एवं अद्भुत (विषयसुखको) भोगता है ॥२९५॥


सो तस्स विउलतवपुण्णसंचओ संजमेण णिव्वण्णो । ण चइज्जइ वण्णेदुं वाससहस्साण कोडीहि ॥ २९६

अर्थ: उस सौधर्म इन्द्रका वह महान् तप युक्त पुण्यका संचय संयमसे उत्पन्न हुआ है। इसका वर्णन हजार करोड़ वर्षोंके द्वारा भी नहीं किया जा सकता ॥ २९६ ॥


इंदपुरीदो वि पुणो पुव्वाए दिसाए जोयणा बहुगा । गंतूण होइ तत्तो दिव्वविमाणं वरपभेत्ति ॥ २९७

अर्थ: इन्द्रपुरीसे पूर्व दिशामें बहुत योजन जाकर श्रेष्ठ प्रभ (स्वयंप्रभ) नामक दिव्य विमान है॥ २९७ ॥


जंबूणईरयणमयं अच्चब्भुदविचित्तवलहिपासादं । सासदसभावसोहं इंदपुरीए समप्पभं एदं ॥ २९८

अर्थ: सुवर्ण एवं रत्नोंसे निर्मित, अत्यन्त आश्चर्यजनक विचित्र व वलभी युक्त प्रासादोंसे संयुक्त तथा अविनश्वर स्वभाववाली शोभासे (अथवा सौधोंसे) सम्पन्न यह विमान इन्द्रपुरीके समान प्रभाववाला है ॥२९८॥


तत्थ दु महाणुभावो सोमो णामेण विस्सुदजसोघो । सामाणिश्रो सुरूवो पडिइंदो तस्स इंदस्स ॥ २९९

अर्थ: उस विमानमें ‘सोम’ नामसे प्रसिद्ध कीर्तिवाला, महाप्रभावशाली एवं सुन्दर रूपसे सम्पन्न ऐसा उस इन्द्रका सामानिक प्रतीन्द्र रहता है ॥२९९॥


अड्डुट्ठा कोडीओ अच्छरसाणं च तस्स सोमस्स । अग्गमहिसीओ चदुरो णायव्वा सपरिवाराओ ॥ ३००

अर्थ: उस सोम लोकपालके साढ़े तीन करोड़ (३५००००००) अप्सरायें और सपरिवार चार अग्रदेवियां जानना चाहिये ॥ ३०० ॥


तिणि य परिसा तस्स वि सत्तेव य होंति वरअणीयाणि । इंदादो अद्धद्धं परिवार उणो मुणेयव्वो ॥

अर्थ: उसके भी तीन परिषद् तथा सातों ही उत्तम सेनायें होती हैं। परन्तु परिवार इन्द्रसे आधा आधा जानना चाहिये ॥ ३०१ ॥


एवं तु सुकयतवसंचएण वदसंजमोवदेसेण । भासुरवरबोधिधरा देवा सामाणियो होंति ॥ ३०२

अर्थ: इस प्रकार व्रत एवं संयमसे युक्त पुण्य व तपके संचयसे वे सामानिक देव भास्वर उत्तम रूपको धारण करनेवाले होते हैं ॥ ३०२ ॥


दक्खिणदिसाए दूरं गंतूणं वरसिखं ति णामेण । दिव्वं रयणविमाणं जत्थ दु सामणिओ अवरो ॥ ३०३

अर्थ: दक्षिण दिशामें दूर जाकर वरशिख (वरशिष्ट) नामक दिव्य रत्नमय विमान है; जहां दूसरा सामानिक (यम) देव रहता है ॥ ३०३ ॥ पश्चिम दिशामें


पच्छिमदिसाए गंतूं णामेण य जलजलं ति विक्खायं । उत्तरदिसाए गंतूं दिव्वविमाणं रयणचित्तं ॥ ३०४

अर्थ: जाकर जल-जल (जलप्रभ) नामसे विख्यात और उत्तर दिशामें जाकर रत्नचित (वल्गु) दिव्य विमान है ॥३०४॥


एदेसु लोगपाला बसंति सामाणिया य अवरेसु । पडिइंदा इंदस्स तु चदुसु वि दिसासु णाएव्वा ॥ ३०५

अर्थ: इन विमानोंमें लोकपाल देव रहते हैं तथा इतर विमानोंमें सामानिक देव रहते हैं । इन्द्रके प्रतीन्द्र चारों ही दिशाओंमें स्थित जानना चाहिये ॥ ३०५ ॥


तुल्लबलरूवविक्कमपय । वजुत्ता हवंति ते सब्बे । सामाणिया वि देवा अणुसरिसा लोगवालाणं ॥ ३०६

अर्थ: वे सब तुल्य बल, रूप, विक्रम एवं प्रतापसे युक्त होते हैं । सामानिक देव भी लोकपालोंके सदृश होते हैं ॥३०६॥


अच्छब्भुदइड्ढिजुदा अच्छब्भुदरूवकित्तिसंजुत्ता । अच्छब्भुदेण णैया उववण्णा ते तवेणं पि ॥ ३०७

अर्थ: अत्यन्त आश्चर्यजनक ऋद्धिसे युक्त, तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक रूप एवं कीर्तिसे संयुक्त वे देव अतिशय आश्चर्यकारक तपसे ही उत्पन्न होते हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥ ३०७ ॥


उत्तरसेढीए पुणो गंतूणं जोयणा असंखेज्जा । ईसाणस्स तु सीमा दंडायदवेदिया दिव्वा ॥ ३०८

अर्थ: पुनः उत्तर श्रेणीमें असंख्यात योजन जाकर ईशान कल्पकी सीमा स्वरूप दण्डके समान आयत दिव्य वेदिका स्थित है ॥ ३०८ ॥


तत्तो दु पभादो वि य अद्वारसमम्मि वरविमाणम्मि । ईसाणेत्ति विमाणं ईसाणिंदो तहिं वसइ ॥ ३०९

अर्थ: उस प्रभ इन्द्रकी [ उत्तर दिशामें स्थित बत्तीस श्रेणिबद्धोंमें ] अठारहवें ईशान नामक श्रेष्ठ श्रेणिबद्ध विमानमें ईशानेन्द्र निवास करता है ॥ ३०९ ॥


तस्स वि य लोगपाला सत्ताणीया य तिणि परिसाओ । महदाइड्ढीए जुदो सोधम्मादो विसेसेण ॥ ३१०

अर्थ: उस ईशान इन्द्रके भी लोकपाल, सात अनीक और परिषद देव हैं । सौधर्म इन्द्रकी अपेक्षा यह विशेषतया महा ऋद्धिसे संयुक्त है ॥ ३१० ॥


चुलसीदिं च सहस्सा तस्स वि सामाणियाण देवाणं । बलरिद्धिसुहपभावो सोहम्मादो विसेसेण ॥ ३११

अर्थ: उसके भी सामानिक देवोंका प्रमाण चौरासी हजार है । यह सौधर्म इन्द्रकी अपेक्षा विशेषतया बल, ऋद्धि, सुख एवं प्रभावसे युक्त है ॥ ३११ ॥


धिदइड्डिविसयतुल्ला सामाणियलोगपालदेवेहिं । आणाइस्सरिएणं य अहिओ इंदो दु णायव्वो ॥ ३१२

अर्थ: सामानिक व लोकपाल देव धृति, ऋद्धि और विषयोंमें इन्द्रके समान होते हैं । इन्द्र केवल इनसे आज्ञा व ऐश्वर्यमें अधिक जानना चाहिये ॥ ३१२ ॥


सिरिमदि तहा सुसीमा वसुमित्त वसुंधरा य धुवसेणा । जयसेणा य सुसेणा अट्ठमिया से पभासंती ॥३१३

अर्थ: श्रीमती, सुसीमा, वसुमित्रा, वसुन्धरा, ध्रुवसेना, जयसेना, सुसेना और आठवीं प्रभासंती ( प्रभावती ), ये आठ ईशानेन्द्रकी अग्रदेवियां हैं ॥ ३१३ ॥


सोलस देविसहस्सा पत्तेयं महिलियाण परिवारा। वररूवसालिणीओ अच्छेरयपेच्छणिज्जाओ ॥ ३१४

अर्थ: इन महिलाओमेंसे प्रत्येकके उत्तम रूपसे शोभायमान और साश्चर्य दर्शनीय सोलह हजार परिवारदेवियां होती हैं ॥ ३१४ ॥


को एदाण मणुस्सो अणंतरूवाण चेव देवीणं । वण्णेउज्जं रूवविभवं इड्डिविलासं च सोक्खं च ॥ ३१५

अर्थ: अनन्त सौन्दर्यवाली इन देवियोंके रूप-वैभव, ऋद्धि, विलास व सौख्यका वर्णन कौन मनुष्य कर सकता है ? अर्थात् कोई भी नहीं कर सकता ॥ ३१५ ॥


मणिरयणहेमजालाडलेसु सिरिदामगंधकलियेसु । सुचिणिम्मलदेहधरा रमंति कालं तहिं सुचिरं ॥ ३१६

अर्थ: मणि, रत्न व सुवर्णके समूहसे व्याप्त तथा सुन्दर मालाओंके गन्धसे सहित वहां ( विमानोंमें ) शुचि एवं निर्मल देहको धारण करनेवाली वे देवियां चिर काल तक रमण करती हैं ॥ ३१६ ॥


ईसाणविमाणादो गंतूणं जोयणा असंखेज्जा । पच्छिमदिसासु दिव्वं होदि अवरं तु सव्वदोभद्दं ॥ ३१७

जंबूणयरयदमए णाणामणिकिरणविप्फुरंतम्मि । जत्थ जमो त्ति महप्पा पढमिल्लयलोगपालो सो ॥ ३१८

अर्थ (गाथा 317 से 318): ईशान विमानसे असंख्यात योजन जाकर पश्चिम दिशामें सर्वतोभद्र नामक दूसरा दिव्य विमान है, सुवर्ण व रजतसे निर्मित तथा नाना मणियोंकी किरणोंसे प्रकाशमान जिस विमानमें यम नामक महात्मा निवास करता है । वह उक्त इन्द्रका प्रथम लोकपाल है ॥ ३१७-३१८ ॥


सोधम्मे जह सोमो तह सो वि जमो अणोवमसिरीओ । सामाणियग्गमहिसीहिं चेय तहिं चउहिं संजुत्तो ॥ ३१९

अर्थ: सौधर्म विमानमें जिस प्रकार सोम लोकपाल रहता है उसी प्रकार अनुपम शोभावाला वह यम लोकपाल भी सामानिकों और चार अग्रदेवियोंसे संयुक्त होकर वहां रहता है ॥ ३१९ ॥


इंदविमाणादु पुणो गंतूणं जोयणा असंखेज्जा । अत्थि सुभद्द त्ति तहिं देवविमाणं रयणचित्तं ॥ ३२०

जत्थ कुबेरो त्ति सुरो पडिइंदो इंदतेयसुरसारो । सो विदियलोगपालो अच्छेरयभोगपरिभोगो ॥ ३२१

अर्थ (गाथा 320 से 321): पुनः इन्द्रकविमानसे असंख्यात योजन जाकर वहां रत्नोंसे विचित्र सुभद्र नामक देवविमान है, जहां इन्द्रके समान तेजस्वी श्रेष्ठ देवोंसे सहित और आश्चर्यजनक भोग-परिभोगोंसे संयुक्त वह कुबेर नामक द्वितीय लोकपाल प्रतीन्द्र रहता है ॥ ३२०-३२१ ॥


ईसाणिंदपुरादो गंतूणं जोयणा असंखिज्जा । पुव्वेण वरविमाणं समिदं किर णाम णामेणं ॥ ३२२

अर्थ: ईशानेन्द्रपुरसे असंख्यात योजन जाकर पूर्वमें समित ( अमित ) नामक उत्तम विमान है ॥ ३२२ ॥


तत्थ अणोवमसोभो मुत्तामणिहेमजालकलिदम्मि । वरुणो त्ति लोगपालो तिहुवणविक्खादकित्तीओ ॥

अर्थ: मुक्ता, मणि एवं हेमजालसे कलित उस विमानमें, जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें विख्यात है ऐसा अनुपम शोभावाला वरुण नामक लोकपाल निवास करता है ॥ ३२३ ॥


एवं ते देववरा हारविभूसिया महाबला । आलिलेववलकुंडले सच्छंदविडव्वणाभरणा ॥ ३२४

अर्थ: इस प्रकार वे श्रेष्ठ देव उत्तम हारसे विभूषित, महाबलवान्, सुन्दर व चंचल कुण्डलोंसे अलंकृत तथा इच्छानुसार विक्रिया एवं आभरणोंको धारण करनेवाले हैं ॥ ३२४ ॥


बहुविविहसोहविरइयदिव्वविमाणोहचित्तसोहाणि । ताणि विमाणवराई अच्छेरयपेच्छणिज्जाणि ॥ ३२५

सुकयतवसीलसंचयविणयसमाधी य धम्मसीलाणं । वररयणसमुब्भूदा ते आवासा सपुण्णाणं ॥ ३२६

अर्थ (गाथा 325 से 326): विविध प्रकारके बहुतसे प्रासादोंकी रचनासे सहित, दिव्य विमान समूहकी विचित्र शोभासे सम्पन्न, तथा आश्चर्यपूर्वक दर्शनीय वे उत्तम विमान भले प्रकार किये गये तप व शीलके संचय सहित विनय एवं धार्मिक स्वभाववाले पुण्यवान् जीवोंके निवास रूप होते हैं । वे आवास उत्तम रत्नोंसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२५-३२६ ॥


उत्तरलोयट्ठवदी अट्ठावीसं तु सयसहस्साणं । सामी ईसाणिंदो रयणविमाणाण दिव्वाणं ॥ ३२७

अर्थ: उत्तरलोकार्धका अधिपति ईशानेन्द्र अट्ठाईस लाख रत्नमय दिव्य विमानोंका स्वामी है ॥ ३२७ ॥


तत्तो उड्ढं गंतुं जोयणकोडी असंखेज्जा । ताहे सणक्कुमारे कप्पे रुजगंजणं णाम ॥ ३२८

णामेण अंजणं णाम तत्थ मणिकणयरयणवेयडियं । वणमालं तह णागं गरुळं च अणोवमसिरीयं ॥ ३२९

वरमणिविभूसियं च पियदंसणं च विक्खादं । बलभद्दं तह छट्ठे चक्कं च अणोवमसिरीयं ॥ ३३०

होइ अरिट्ठविमाणं विमलं तह देवसम्मिदं चेव । एदे चत्तालीसं इंदयपडला सुणेयव्वा ॥ ३३१

अर्थ (गाथा 328 से 331): प्रथम पटलसे असंख्यात करोड़ योजन ऊपर जाकर तब सनत्कुमार कल्पमें रुचकंजन (?) है । वहां मणियों, सुवर्ण एवं रत्नोंसे खचित अंजन नामक पटल, वनमाल, तथा नाग, अनुपम शोभावाला गरुड, उत्तम मणियोंसे विभूषित प्रसिद्ध प्रियदर्शन [ लांगल ], छठा बलभद्र, अनुपम शोभासे सम्पन्न चक्र पटल, अरिष्ट विमान, तथा विमल देवसम्मित (सुरसमिति), ये चालीस इन्द्रक पटल जानना चाहिये ॥३२८-३३१॥


बंभं बंभुत्तरं बंभतिलय तह लंत्तवं च काविट्ठं । सुक्कं च सहस्सारं णादव्वं आणदं चेव ॥ ३३२

पाणदपडलं च तहा पुप्फुत्तर सायरं च पण्णासं । आरणकप्पं च तहा अच्चुदकप्पं च णादव्वं ॥ ३३३

अर्थ (गाथा 332 से 333): इसके ऊपर ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, ब्रह्मतिलक (ब्रह्महृदय), लांतव, कापिष्ठ (?), शुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत पटल, तथा पुष्पोत्तर (पुष्पक), पचासवां सागर (शातंकर-शातक), आरण कल्प तथा अच्युत कल्प जानना चाहिये ॥ ३३२-३३३ ॥


हेट्ठिमगेवेज्जाण य आदीसु सुदंसणं अमोघं च । तह चेव सुप्पबुद्धं तदियं पडलं सुणेयव्वं ॥ ३३४

अर्थ: अधस्तन ग्रैवेयकोंके आदिमें सुदर्शन, अमोघ तथा तृतीय सुप्रबुद्ध पटल जानना चाहिये ॥ ३३४ ॥ मध्यम ग्रैवेयकोंके क्रमसे


मज्झिमगेवज्जेसु य तिण्णेव कमेण होंति णायव्वा । जसहरसुभद्दणामा सुविसाल कमेणं अहमिंदा ॥३३५

अर्थ: यशोधर, सुभद्र नामक और सुविशाल, ये तीन अहमिन्द्र पटल हैं ॥ ३३५ ॥


सुमणस तह सोमणसं भणियं पीदिकरं च इगिसट्ठि । उवरिमगेवज्जम्मि य तिण्णि य पडला समक्खादा ॥

अर्थ: उपरिम ग्रैवेयकमें सुमनस, सौमनस और इकसठवां प्रीतिकर, ये तीन पटल कहे गये हैं ॥३३६॥


ताहे अणुदिसं किर आदिच्चं चेव होदि णामेण । जस्स दु इमे विमाणा चदुदिसं होंति चत्तारि ॥ ३३७

अर्थ: तब अनुदिशोंमें आदित्य नामक दिव्य एक ही इन्द्रक पटल है, जिसकी चारों दिशाओंमें ये चार विमान हैं ॥ ३३७ ॥


अच्ची य अच्चिमालिणिं दिव्वं वइरोयणं पभासं च । पुव्वावरदक्खिणउत्‍तरेण आदिच्चदो होंति ॥ ३३८

अर्थ: अर्चि, अर्चिमालिनी, दिव्य वैरोचन और प्रभास ये चार विमान आदित्य पटलके पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तरमें हैं ॥ ३३८ ॥


एदे पंचविमाणा जे होंति अणुत्तरा दु सव्वट्ठे । जम्मि य सव्वट्ठादो सुहसादअणंतयं जत्थ ॥ ३३९

अर्थ: [ सर्वार्थसिद्धिके साथ ] ये पांच अनुत्तरविमान सर्वार्थ पटलमें हैं, जिस सर्वार्थसिद्धिमें अनन्त सुख-साता है ॥ ३३९ ॥


विजयं च वेजयंतं जयंतमपराजियं च णामेण । सव्वट्ठस्स दु एदे चदुसु वि य दिसासुं चत्तारि ॥ ३४०

अर्थ: विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नामक ये चार विमान सर्वार्थ पटलकी चारों ही दिशाओंमें स्थित हैं ॥३४०॥


एदे विमाणपडला होति तिसट्ठी कमेण बोद्धव्वा । कप्पा सोधम्मादी णादव्वा अच्‍चुदो जाम ॥ ३४१

अर्थ: ये विमानपटल क्रमसे तिरसठ होते हैं, ऐसा जानना चाहिये । सौधर्मसे लेकर अच्युत पर्यन्त कल्प जानना चाहिये ॥ ३४१ ॥


गेवज्जादिं काउं जावै विमाणा अणुत्तरा पंच । एदे विमाणवासी समए भणिदा समासेण ॥ ३४२

अर्थ: आगममें संक्षेपसे ग्रैवेयकको आदि लेकर पांच अनुत्तर विमानों तक ये विमानवासी [ कल्पातीत ] कहे गये हैं ॥ ३४२ ॥


एक्केक्कस्स विमाणस्स अंतरं जोयणा असंखेज्जा । एक्केक्कं च विमाणं होदि असंखेज्जवित्थारं ॥ ३४३

अर्थ: एक एक विमानका अन्तर असंख्यात योजन है, तथा एक एक विमान असंख्यात योजन प्रमाण विस्तारसे सहित है ॥ ३४३ ॥


माणुसखेत्तपमाणं सोधम्मे होदि उडुविमाणं तु । जंबूदीवपमाणं होदि विमाणं तु सव्वट्ठं ॥ ३४४

अर्थ: सौधर्म कल्पमें स्थित ऋतु विमानका विस्तार मनुष्यक्षेत्र प्रमाण ( पैंतालीस लाख योजन ) और सर्वार्थ विमानका विस्तार जम्बूद्वीप प्रमाण ( एक लाख योजन ) है ॥ ३४४ ॥


पुप्फोवइण्णएसु य सेढिविमाणेंसु चेव सव्वेसुं । आयामो विक्खंभो जोयणकोडी असंखेज्जा ॥ ३४५

अर्थ: पुष्पोंके समान इधर उधर बिखरे हुए प्रकीर्णक विमानोंका विस्तार [ संख्यात व असंख्यात योजन ] तथा सब ही श्रेणिबद्ध विमानोंका आयाम व विष्कम्भ असंख्यात करोड़ योजन है ॥ ३४५ ॥


सोहम्मीसाणसुरा रदणीओ होंति सत्त उच्चत्तं ।
छच्चेव दु उस्सेहो माहिँदसणक्कुमारेसु ॥ ३४६

बम्हा बम्हुत्तरिया देवा किर पंच होंति रयणीओ ।
तह अद्धपंचमा खलु लंतवकाविट्ठया होंति ॥ ३४७

सुक्कमहासुक्केसु य सदारकप्पे तहा सहस्सारे ।
चत्तारि य रयणीओ उच्छेहा होंति ते देवा ॥ ३४८

आणदपाणददेवा अद्धुट्ठा तह य होंति रदणीओ ।
आरणअच्चुदया पुण तिण्णेव कमेण णिद्दिट्ठा ॥ ३४९

आउट्ठिी वि ताणं बावीसा सागरोवमा भणिया ।
उस्सासो पक्खेणं वाससहस्सेण आहारो ॥ ३५०

हेट्ठिमगेवज्ज.णं मज्झिमयाणं च उवरिमाणं च ।
अद्धदादिज्जा भणिया अणुवकमेणं मुणेयव्वा ॥ ३५१

होदि दिवड्ढा रदणी अणुदिसाणं तु देवसंघाणं ।
रदणी किर उच्छेहो सव्वट्ठमणुत्तराणं तु ॥ ३५२

बे सत्त दस य चउदस सोलस अट्ठरसं वीस बावीसा ।
एक्कधिया य एत्तो उक्करसं जामे तेत्तीसं ॥ ३५३

उवरिं उवरिं च पुणो जाई विमा.णानि रइणपत्थारे ।
ताईं तु महल्लाइं सेणिमय.इं विसेसेणं(?) ॥ ३५४

वावीहि विमलजलेंसियलाहिं पडमुप्पलोवसोहाहिं ।
उज्जाणेहि य बहुसो रम्माई ये रहयसत्ताणं ॥ ३५५

तवविणयसीलकलिया विरदाविरदा य संजदा चेव ।
उप्पज्जंति मणुस्सा तिरिया वि सुरालये वि ॥ ३५६

अर्थ (गाथा 346 से 356): सौधर्म व ईशान कल्पोंमें देवोंकी ऊंचाई सात रत्नि तथा सनत्कुमार व माहेन्द्र कल्पोंमें छह रत्नि प्रमाण है ॥३४६॥ ब्रह्म व ब्रह्मोत्तर कल्पवासी देवोंकी ऊंचाई पांच रत्नि और लान्तव-कापिष्ठवासी देवोंकी ऊंचाई साढ़े चार रत्नि प्रमाण है ॥३४७॥ शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार कल्पोंमें उन देवोंकी ऊंचाई चार रत्नि प्रमाण है ॥ ३४८ ॥ आनत-प्राणतकल्पवासी देवोंकी ऊंचाई साढ़े तीन रत्नि तथा आरण-अच्युतकल्पवासी देवोंकी ऊंचाई तीन रत्नि प्रमाण ही निर्दिष्ट की गई है ॥ ३४९ ॥ उन आरण-अच्युतकल्पवासी देवोंकी आयुस्थिति बाईस सागरोपम प्रमाण कही गई है । [ जिन देवोंकी जितने सागरोपम प्रमाण आयु होती है उतने ] पक्षोंमें वे उच्छ्वास लेते और उतने ही हजार वर्षोंमें आहार ग्रहण करते हैं ॥ ३५० ॥ अधस्तन, मध्यम और उपरिम ग्रैवेयकोंमें अनुक्रमसे अढ़ाई, [ दो और डेढ़ रत्नि प्रमाण शरीरकी ऊंचाई ] कही गई है ॥३५१॥ अनुदिशोंके देवसमूहोंकी ऊंचाई डेढ़ रत्नि तथा सर्वार्थसिद्धि एवं विजयादि अनुत्तरवासी देवोंकी ऊंचाई एक रत्नि मात्र है ।। ३५२ ।। [ सौधर्म-ईशान आदिक युगलोंमें क्रमसे ] दो, सात, दश, चौदह, सोलह, अठारह, बीस और बाईस [सागरोपम ] तथा इससे आगे ग्रैवेयकादिकोंमें तेतीस सागरोपम तक एक एक सागर अधिक, इस प्रकार यह उत्कृष्ट [ आयुप्रमाण जानना चाहिये ] ॥३५३॥ रत्नप्रस्तारमें जो विमान ऊपर ऊपर हैं वे महान् हैं, श्रेणिमय विमान विशेष रूपसे महान् हैं (?) । ॥३५४॥ उक्त विमान निर्मल शीतल जलसे परिपूर्ण एवं पद्मों व उत्पलोंसे शोभायमान ऐसी वापियोंसे तथा उद्यानोंसे प्रेमी जीवोंके लिए बहुत रमणीय हैं ॥३५५॥ तप, विनय व शीलसे संयुक्त संयतासंयत और संयत मनुष्य तथा कितने ही तिर्यंच भी सुरालयमें उत्पन्न होते हैं ॥३५६॥


एक्कं पि साहुदाणं दादूणं सविभवेण सोधीए।
पावदि पुण्णं जीवो अपत्तपुव्वं भवसदेसु ॥ ३५७

अर्थ: स्वविभवानुसार शुद्धिपूवर्क एक साधुदानको ही अर्थात् मुनियोंको आहारादि देकर जीव जो पुण्य प्राप्त करता है वह पहिले सैकड़ों भवोंमें प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३५७॥


देवेसु वि इंदत्तं पावंति अणंतयं विसोधिं च।
केवलजिणठाणं पि य सम्मत्तगुणेण पावंति ॥ ३५८

अर्थ: जीव सम्यक्त्व गुणसे देवोंमें भी इन्द्र पदको प्राप्त करते हैं तथा अनन्त विशुद्धि एवं केवलजिन स्थान (अर्हन्त पद) को भी पाते हैं ॥ ३५८ ॥


सव्वट्ठविमाणादो उवरिं गंतूण होदि णादव्वा।
इसिपब्भारा पुढवी माणुसखेत्तप्पमाणेण ॥ ३५९

अर्थ: सर्वार्थ विमानसे ऊपर जाकर मानुषक्षेत्र प्रमाण (४५००००० योजन) ईषत्प्राग्भार पृथिवी जानना चाहिये ॥३५९॥


सेदादवत्तसरिसा अट्ठेव य जोयणा दु मज्झम्हि।
अंते अंगुलमेत्ता रुंदा पुढवी दु रयदमया ॥ ३६०

अर्थ: रजतमय वह पृथिवी श्वेत छत्रके सदृश होकर मध्यमें आठ योजन व अन्तमें एक अंगुल प्रमाण विस्तीर्ण (मोटी) है ॥३६०॥


तत्थ दु णिट्ठियकम्मा सिद्धा सुहसादपिंडसव्वस्सं।
अव्वाबाधमणंतं अक्खयसोक्खं अणुभवंति ॥ ३६१

अर्थ: उस ईषत्प्राग्भार पृथिवीपर (सिद्धक्षेत्रमें) अष्ट कर्मको नष्ट कर चुकनेवाले सिद्ध जीव सुख-साताके पिण्ड रूप सर्वस्वसे सहित, एवं बाधासे रहित अनन्त अक्षय सुखका अनुभव करते हैं ॥३६१॥


तस्स दु णत्थि समाणं ससुरासुरमाणुसम्मि लोयम्मि।
जेण समं उवमाणं तिलतुसमेत्तं पि कीरेज्ज ॥ ३६२

अर्थ: उस सुखके समान सुरलोक, असुरलोक व मनुष्यलोकमें कोई सुख नहीं है जिसके साथ उसकी तिल-तुष मात्र भी तुलना की जा सके ॥३६२॥


चिंतेमि पवरणगरं उवमिज्ज चिलादयावणंतं पि।
ण य होज्ज तस्स उवमो तिहुयणसोक्खेण मोक्खस्स ॥ ३६३

अर्थ: मैं श्रेष्ठ नगरका चिन्तन करता हूँ जहां अनादिसे अनन्त काल तक उस सुख की उपमा दी जा सके (?) किन्तु उस मोक्षसुखकी तीनों लोकोंके सुखसे तुलना नहीं हो सकती ॥३६३॥


अट्ठविहकम्ममुक्का परमगदिं उत्तमं अणुप्पत्ता।
सिद्धा साधियकज्जा कम्मविमोक्खे ठिदा मोक्खं ॥ ३६४

अर्थ: आठ प्रकारके कर्मोंसे रहित, उत्तम परमगतिको प्राप्त तथा कृतकृत्य सिद्ध जीव कर्मोंके छूटनेपर मोक्षमें स्थित हुए ॥ ३६४ ॥


सुणिदपरमत्थसारं मुणिगणसुरसंघपूजियं परमं।
वरपउमणंदिनमियं मुणिसुव्वदजिणवरं वंदे ॥ ३६५

अर्थ: उत्तम परमार्थके ज्ञाता, मुनिगण एवं सुरसमूहसे पूजित, और श्रेष्ठ पद्मन्न्दिसे नमस्कृत मुनिसुव्रत जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ३६५ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे बाहिरउवसंहारदीव-सायर-णरयगदि-देवगदि-सिद्धखेत्त-वण्णणो णाम एक्कारसमो उद्देसो समत्तो ॥ ११ ॥

बारसमो उद्देसो

णमिऊणं णमिणाहं णवकेवलदिव्वलब्धिसंपण्णं ।
जोइसपडलविभागं समासदो संपवक्खामि ॥ १

अर्थ: दिव्य नौ केवल-लब्धियोंसे सम्पन्न श्री नमिनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार करके संक्षेपसे ज्योतिष पटलके विभागका कथन करते हैं ॥१॥


अट्ठेव जोयणसदा असीदिअहिएहि उवरि गंतूणं ।
चंदस्स वरविमाणं फेणाणिभं होइ णायव्वा ॥ २

अर्थ: आठ सौ अस्सी योजन ऊपर जाकर फेन सदृश धवल उत्तम चन्द्रविमान है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २ ॥


वणवेदिहि जुत्ता वरतोरणमंडिया मणभिरामा ।
जिणपडिमासंछण्णा बहुभवणविहूसिया दिव्वा ॥ ३

पोक्खरिणिवावियउरा णाणावरकप्परुक्खसंछण्णा ।
सुरसुंदरिसंजुत्ता अणादिणिहणा समुद्दिष्ट्ठा ॥ ४

अर्थ (गाथा 3 से 4): ये विमान वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, मनको अभिराम, जिनप्रतिमाओंसे सहित, बहुत भवनोंसे विभूषित, दिव्य, प्रचुर पुष्करिणियों एवं वापियोंसे सहित, अनेक उत्तम कल्पवृक्षोंसे व्याप्त, सुरसुन्दरियोंसे संयुक्त और अनादि-निधन कहे गये हैं ॥३-४॥


विक्खंभायामेण य चंदाणं गाउदा हवे तिण्णि ।
तेरससयं च दंडा चउदालीसा समहिरेगा ॥ ५

अर्थ: चन्द्रोंके ये विमान विष्कम्भ व आयामसे तीन गव्यूति और तेरह सौ चवालीस धनुषसे कुछ ( ३३/६६ धनुष ) अधिक हैं ॥ ५ ॥


सोलस चेव सहस्सा अभिजोगसुरा हवंति चंदस्स ।
दिवसे दिवसे य पुणो वहंति बिंबं विउव्वित्ता ॥ ६

अर्थ: चन्द्रके सोलह हजार आभियोग्य जातिके देव हैं जो प्रतिदिन विक्रिया करके उसके बिम्बको ले जाते हैं ॥६॥


चत्तारिसहस्ससुरा दिव्वामलदेह रूवसंपण्णा ।
पुव्वेण दिसेण ठिया कुंदेंदुणिभा महासीहा ॥ ७

अर्थ: इनमें दिव्य एवं निर्मल देह व रूपसे सम्पन्न तथा कुन्दपुष्प व चन्द्रके सदृश धवल महा सिंहके आकार चार हजार देव पूर्वदिशामें स्थित रहते हैं ॥ ७ ॥


उच्छंगदंतमुसला पभिण्णकरडा मुहा गुलगुलंता ।
चत्तारिसहस्सगया दक्खिणदो होंति णिद्दिठ्ठा ॥ ८

अर्थ: ऊंचे उठे हुए दांत रूपी मूसलोंसे सहित, मदको बहानेवाले गण्डस्थलोंसे युक्त और मुखसे महा गर्जना करनेवाले ऐसे हाथीके आकार चार हजार देव दक्षिणमें निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ८ ॥


संखिंदुकुंदघवळा मणिकंचणरयणमंडिया दिव्वा ।
चत्तारि सहस्साइं हवंति अवरेण वरवसभा ॥ ९

अर्थ: शंख, चन्द्र एवं कुंदपुष्पके सदृश धवल तथा मणि, सुवर्ण व रत्नोंसे मण्डित दिव्य उत्तम वृषभके आकार चार हजार देव पश्चिममें स्थित रहते हैं ॥ ९ ॥


मणपवणगमणदच्छा वरचामरमंडिया मणभिरामा ।
उत्तरदिसेण होंति हु चत्तारिसहस्स वरतुरया ॥ १०

अर्थ: मन अथवा पवनके सदृश गमनमें दक्ष, उत्तम चामरोंसे मण्डित और मनको अभिराम ऐसे उत्तम अश्वके आकार चार हजार देव उत्तर दिशामें होते हैं ॥१०॥ इसी प्रकार सूर्यबिम्बको


एवं आदिच्चस्स वि दुगुणट्ठसहस्सवाहणा होंति । अवसेसगहगणाणं अट्ठसहस्सा समुद्दिठ्ठा ॥ ११

अर्थ: भी ले जानेवाले दुगुणे आठ अर्थात् सोलह हजार वाहन देव होते हैं । शेष ग्रहगणोंके वाहन देव आठ हजार कहे गये हैं ॥ ११ ॥


णक्खत्ताणं णेया चत्तारि सहस्स होंति अभियोगा । ताराणं णिद्दिट्ठा विण्णि सहस्सा सुरा होंति ॥ १२

अर्थ: नक्षत्रोंके चार हजार और ताराओंके दो हजार आभियोग्य देव निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये ॥ १२ ॥


जंबुद्दीवे लवणे धादगिसंडे य कालउदहिम्मि । पोक्खरवरद्धदीवे चंदविमाणा परिभवंति ॥ १३

अर्थ: चन्द्रविमान जम्बूद्वीप, लवण समुद्र, धातकीखण्ड, कालोद समुद्र और पुष्करार्द्ध द्वीपमें परिभ्रमण करते हैं अर्थात् ये यहां गतिशील हैं ॥ १३ ॥


बेचदुबारससंखा बादाला दुराधिया य सदरी य । चंदा हवंति णेया जहाकमेणं तु णिद्दिट्ठा ॥ १४

अर्थ: [ उपर्युक्त जम्बूद्वीपादिकमें ] यथाक्रमसे दो, चार, बारह, ब्यालीस और दो अधिक सत्तर अर्थात् बहत्तर चन्द्र निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये ॥ १४ ॥


मणुसुत्तरादु परदो पोक्खरदीवम्मि ससिगणा णेया । बारससय चउसट्ठा समासदो होंति णायव्वा ॥ १५

अर्थ: मानुषोत्तर पर्वतसे आगे पुष्करद्वीपमें बारह सौ चौंसठ चन्द्रविमान हैं, ऐसा संक्षेपसे जानना चाहिये ॥ १५ ॥


चदुदालसयं आदि चत्तारि हवंति उत्तरा चंदा । पोक्खरवरद्धदीवे अट्ठेव य होंति गच्छा दु ॥ १६

अर्थ: पुष्करवर द्वीपमें आदी एक सौ चवालीस, और चय चार चन्द्र हैं । गच्छ यहां आठ है [ अभिप्राय यह कि वहां आठ वलयस्थानोंमें उत्तरोत्तर चार चार बढ़ते हुए चन्द्रविमानोंका प्रमाण इस प्रकार है-१४४, १४८, १५२, १५६, १६०, १६४, १६८, १७२ ] ॥ १६ ॥


रूवूगं दलगच्छं उत्तरगुणिदं तु आदिसंजुत्तं । गच्छेण पुणो गुणिदं सव्वधणं होइ णायव्वं ॥ १७

अर्थ: एक कम गच्छके अर्ध भागको चयसे गुणित करके प्राप्त राशिमें आदिको मिलाकर पुनः गच्छसे गुणा करनेपर सर्वधनका प्रमाण जानना चाहिये ॥ १७ ॥


एमेव दु सेसाणं दीवसमुद्देसु आणणविहाणं । चंदाइच्चाण तहा णायव्वा होइ णियमेण ॥ १८

अर्थ: शेष द्वीप-समुद्रोंमें चन्द्रों व सूर्योंकी संख्या लानेके लिये नियमसे यही विधान जानना चाहिये ॥ १८ ॥


णवरि विसेसो जाणे आदिमगच्छा य दुगुणदुगुणा दु । उत्तरधणपरिमाणं चदुरा सव्वत्थ णिद्दिट्ठा ॥ १९

अर्थ: विशेषता यह है कि शेष द्वीप-समुद्रोंमें उनके प्रमाणको लानेके लिये आदी और गच्छ उत्तरोत्तर दुगुणे दुगुणे जानना चाहिये । उत्तरधनका प्रमाण सर्वत्र चार निर्दिष्ट किया गया है ॥ १९ ॥


पदगतमवहकउत्तरसमाहदं दलिदं आदिणा सहिदं । गच्छगुणमुवचिदाणं गणिदसरीरं विणिद्दिट्ठं ॥ २०

अर्थ: …(?) ॥ २० ॥


पोक्खरवरउवहीदो सयंभुरमणो त्ति जाव सलिलणिही। एदम्हि अंतरम्हि दु ससीण संखं पवक्खामि ॥ २१

अर्थ: पुष्करवर समुद्रसे स्वयम्भूरमण समुद्र तक इस अन्तरमें स्थित चन्द्रोंकी संख्या कहते हैं ॥ २१ ॥


पोक्खरवरउवहीए चोद्दाल सदा हवंति आदीए । जोयणलक्खे लक्खे चदु चदु चंदा पवड्ढंति ॥ २२

अर्थ: पुष्करवर समुद्रके प्रथम वलयमें एक सौ चवालीस [ दो सौ अठासी ] चन्द्र स्थित हैं। आगे एक एक लाख योजनपर चार चार चन्द्र बढ़ते जाते हैं ॥ २२ ॥


बत्तीससदसहस्सा पोक्खरजलहिस्स जाण विक्खंभं । तत्तो दुगुणा दुगुणा दीवसमुद्दा य विहिणा ॥ २३

अर्थ: पुष्करवर समुद्रका विष्कम्भ बत्तीस लाख योजन प्रमाण जानना चाहिये । इससे आगेके द्वीप-समुद्र उत्तरोत्तर दुगुणे दुगुणे विस्तृत हैं ॥ २३ ॥


वलयाए वलयाए चदुरुत्तरसंतिया हवे चंदा । इगतीसं तह चउक्का मेलविदा होंति पिंडेण ॥ २४

अर्थ: वलय-वलयमें अर्थात् आगे प्रत्येक वलयमें स्थित चन्द्र उत्तरोत्तर चार चार अधिक हैं। तथा इकतीस चतुष्कोंको मिलानेपर पिण्डफल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥


वारुणिदीवादीए अट्ठासीदा हवंति बिणिसदा । पुणरवि चउरो चउरो लक्खे लक्खे य वड्ढंति ॥ २५

अर्थ: वारुणीवर द्वीपके आदिमें दो सौ अठासी [ पांच सौ छ्यत्तर ] चन्द्र हैं। पुनः आगे लाख-लाख योजनपर चार चार चन्द्र बढ़ते गये हैं ॥ २५ ॥


बारुणिवरजलधीए आदिम्मि हवंति ससिगणा गेया । छावत्तरि पंचसदा चदुचदुवड्ढी दु वलएसु ॥ २६

अर्थ: वारुणीवर समुद्रके आदिमें पांच सौ छ्यत्तर [ ग्यारह सौ बावन ] चन्द्र जानना चाहिये । इसके आगे सब वलयोंमें चार चारकी वृद्धि है ॥ २६ ॥


खीरवरे आदीए सदा दु एक्कारसा य बावण्णा । चंदविमाणा दिट्ठा लक्खे लक्खे य चतुरधिया ॥ २७

अर्थ: क्षीरवर द्वीपके आदिमें ग्यारह सौ बावन (?) और इसके आगे लाख लाख योजनपर चार चार अधिक चन्द्रविमान निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ २७ ॥


खीरोदसमुद्दम्मि दु तिण्णेव सदा हवंति चतुरधिया । बिणिसहस्सा गेया वलए वलए य चउवड्ढी ॥ २८

अर्थ: क्षीरोद समुद्रमें [ प्रथम वलयमें ] दो हजार तीन सौ चार (?) चन्द्रविमान जानना चाहिये । इसके आगे प्रत्येक वलयमें चारकी वृद्धि होती गई है ॥ २८ ॥


घदवरदीवादीए छायालसदा हवंति अट्ठहिया । बाणउदिसदा सोळस तेणेव कमेण जलहिम्मि ॥ २९

अर्थ: घृतवर द्वीपके आदिमें छयालीस सौ आठ (?) और उसी क्रमसे घृतवर समुद्रके आदिमें बानबे सौ सोलह (?) चन्द्रविमान जानना चाहिये ॥ २९ ॥


अट्ठारस य सहस्सा चत्तारिसदा हवंति बत्तीसां । खोद्वरम्मि दु दीवे वलए वलए य चदुवड्ढी ॥ ३०

अर्थ: क्षौद्रवर द्वीपके आदिमें अठारह हजार चार सौ बत्तीस (?) चन्द्रविमान हैं। आगे वलय वलयमें चारकी वृद्धि होती गई है ॥ ३० ॥ क्षौद्रवर समुद्रके


छत्तीसं च सहस्सा अट्ठेव सदा हवंति चउसट्ठा ।
खोदसमुद्दब्भम्मे दु लक्खे लक्खे य चदुरधिया ॥ ३१

अर्थ: प्रथम वलयमें छत्तीस हजार आठ सौ चौंसठ (?) चन्द्र हैं । इसके आगे लाख लाख योजनपर वे चार चार अधिक हैं ॥ ३१ ॥


तेहत्तरिं सहस्सा सत्तेव सदा हवंति अट्ठवीसा ।
णंदीसरम्मि दीवे तेणेव कमेण ते चंदा ॥ ३२

अर्थ: उसी क्रमसे नन्दीश्वर द्वीपमें तिहत्तर हजार सात सौ अट्ठाईस (?) चन्द्र हैं ॥ ३२ ॥


आदूच्चाण वि एवं दीवसमुद्दाण तह य वलएसु ।
परिवड्डी णायव्वा समासदो होइ णिद्दिठ्ठा ॥ ३४

अर्थ: इसी प्रकार द्वीपों तथा समुद्रोंके वलयोंमें संक्षेपसे निर्दिष्ट की गई सूर्योंकी भी वृद्धि जानना चाहिये ॥ ३४ ॥


तारागहरिक्खाणं एसेव कमेण ताण परिवड्डी ।
णवरि विसेसो जाणे गुणगारा होंति अण्णोण्णा ॥ ३५

अर्थ: इसी क्रमसे उन ताराओं, ग्रहों और नक्षत्रोंकी भी वृद्धि हुई है । विशेष इतना जानना चाहिये कि यहां गुणकार भिन्न भिन्न हैं ॥ ३५ ॥


एदेसिं चंदाणं असंखदीवोदधीसु जादाणं ।
सव्वाणं मेलवणं कहेमि संखेवदो ताणं ॥ ३६

अर्थ: असंख्यात द्वीप-समुद्रोंमें स्थित इन सब चन्द्रोंके सम्मिलित प्रमाणको संक्षेपसे कहते हैं ॥ ३६ ॥


बत्तीसा खलु वलया पोक्खरउदहिम्मि होंति णायव्वा ।
वलयाए वलयाए चदुरधिया होंति ससिबिंबा ॥ ३७

अर्थ: पुष्कर समुद्रमें बत्तीस वलय जानना चाहिये । प्रत्येक वलयमें चार चार चन्द्रबिम्ब अधिक होते गये हैं ॥ ३७ ॥


वारुणिदीवे णेया वलया चउसट्ठि होंति णिद्दिठ्ठा ।
अट्ठावीसा य सया वारुणिउवहिस्स विण्णेया ॥ ३८

अर्थ: वारुणी द्वीपमें चौंसठ वलय निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये । तथा वारुणी समुद्रमें एक सौ अट्ठाईस वलय जानना चाहिये ॥ ३८ ॥


खीरवरणामदीवे बे चेव सया हवंति छप्पण्णा ।
वलयाण तह य संखा णिद्दिठ्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ३९

अर्थ: तथा क्षीरवर नामक द्वीपमें स्थित वलयोंकी संख्या सर्वदर्शियों द्वारा दो सौ छप्पन निर्दिष्ट की गई है ॥ ३९ ॥


पढमवलएसु चंदा सायरदीवाण तह य सव्वाणं ।
मूलधणेत्ति य सण्णा विदुसेहिं पयासिदा णेया ॥ ४१

अर्थ: सब समुद्रों तथा द्वीपोंके प्रथम वलयोंमें स्थित चन्द्रोंकी संख्याकी ‘मूलधन’ यह संज्ञा विद्वानों द्वारा प्रकाशित की गई जानना चाहिये ॥ ४१ ॥


जे वड्ढिदा दु चंदा वलए वलए हवंति णिद्दिठ्ठा ।
ते उत्तरधणसण्णा उभओ पुण होइ सव्वधणं ॥ ४२

अर्थ: शेष समुद्रोंके दुगुणे तथा शेष द्वीपोंके भी दुगुणे वलय हैं । इस प्रकार वे वलय लोक पर्यन्त दुगुणे दुगुणे होते गये हैं ॥ ४० ॥ वलय वलयमें जो चन्द्रोंकी वृद्धि निर्दिष्ट की गई है उसकी ‘उत्तरधन’ और इन दोनोंकी ‘सर्वधन’ संज्ञा है ॥ ४२ ॥ एक सौ चवालीस,


चउदाळसंद्रा णेया बत्तीसा तह य एगरूवं च । तिसु ठाणेसु णिविट्ठा संदिट्ठी मूलदव्वस्स ॥ ४३

अर्थ: बत्तीस तथा एक अंक, इन तीन स्थानोंमें मूल द्रव्यकी संदृष्टि निविष्ट है ॥ ४३ ॥


सोलस चेव चउक्का इगितीसा तह य एगरूवं च । तिण्णेव होंति ठाणा उत्तरदव्वस्स संदिट्ठी ॥ ४४

अर्थ: सोलह चतुष्क, इकतीस, तथा एक अंक, ये तीन ही स्थान उत्तर द्रव्यकी संदृष्टिमें हैं ॥ ४४ ॥


उवहिस्स पढमवलए जेत्तियमेत्ता हवंति ससिबिंबा । दीवस्स पढमवलए तेत्तियमेत्ता हवे दुगुणा ॥ ४५

अर्थ: समुद्रके प्रथम वलयमें जितने चन्द्रबिम्ब होते हैं द्वीपके प्रथम वलयमें उससे दुगुणे मात्र होते हैं ॥ ४५ ॥


एसो कमो दु जाणे दीवसमुद्देसु थावरससीणं । उत्तरधणपरिहीणं जादिधणं होइ णिद्दिट्ठं ॥ ४६

अर्थ: द्वीप-समुद्रोंमें स्थिरशील चन्द्रोंका यही क्रम जानना चाहिये । उत्तरधनसे हीन [ सर्वधनको ] आदिधन [ मूलधन ] निर्दिष्ट किया गया है ॥ ४६ ॥


उवहिस्स दु आदिधणं वलयपमाणेण तह य संगुणिदे । उत्तरहीणं तु पुणो मूलधणं होइ वलयाणं ॥ ४७

अर्थ: तथा समुद्रके आदिधनको वलयोंके प्रमाणसे गुणित करनेपर वलयोंका उत्तरधनसे रहित मूलधन होता है ॥ ४७ ॥


उत्तरधणमिच्छंतो उत्तररासीणं तह य मज्झधणं । रूऊणेण य गुणिदे वलएण य होइ वड्ढिधणं ॥ ४८

अर्थ: उत्तर राशियोंके उत्तरधनकी इच्छा करके मध्यधनको [ चौंसठ अंकोंसे भाजित करके ] एक कम वलयप्रमाणसे [ तथा चौंसठ संख्यासे ] गुणित करनेपर वृद्धिधन प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥


दीवस्स पढमवलए गुणिदे वलएण ससिगणे सव्वे । वड्ढिधणं वज्जित्ता मूलधणं होइ दीवस्स ॥ ४९

अर्थ: द्वीप [अथवा समुद्र] के प्रथम वलयमें स्थित समस्त चन्द्रसमूहको वलयप्रमाणसे गुणित करनेपर वृद्धिधनको छोड़कर द्वीप [अथवा समुद्र]का मूलधन होता है [जैसे तृतीय समुद्रमें २८८ x ३२ = ९२१६] ॥ ४९॥


चदुउत्तर चदुरादी वड्ढिधणं तह य होइ वलयाणं ।
समकरणं काऊणं वड्ढिधणं तह य चेत्तव्वं ॥ ५०

अर्थ: तथा चारका आदि लेकर जो वलयोंके उत्तरोत्तर चार चार चन्द्रोंकी वृद्धि हुई है, यह उनका वृद्धिधन है। इस वृद्धिधनको समकरण ( संकलन ) करके ग्रहण करना चाहिये ॥ ५० ॥


वड्ढीणे मज्झचंदे गुणिदे तह रूवहीणवलएण ।
वलयाणं सव्वाणं वड्ढिधणं होइ णायव्वा ॥ ५१

अर्थ: वृद्धियोंके मध्य चन्द्र ( मध्यधन ) को एक कम वलयप्रमाणसे [गुणित करके पुनः उसे चौंसठसे ] गुणित करनेपर जो प्राप्त हो वह सब वलयोंका वृद्धिधन जानना चाहिये (देखिये गाथा ४८ का उदाहरण) ॥ ५१ ॥


दीवोवहीण एवं सव्वाणं तह य होदि णियमेण ।
मुलुत्तररासीणं मेळवणं तह य कायव्वा ॥ ५२

अर्थ: इसी प्रकार नियमसे सब द्वीप-समुद्रोंका वृद्धिधन होता है। तथा मूल व उत्तर राशियोंका योग करना चाहिये ॥५२॥


एवं मेळविदे पुण वलयाणं जे घणाणि सव्वाणि ।
चदुगुणचदुगुणचंदा दीवसमुद्देसु ते होंति ॥ ५३

अर्थ: इस प्रकार उन दोनों राशियोंके मिलानेपर वलयोंके जो सब धन हों वे आगेके द्वीप-समुद्रोंमें [अपने अपने मध्यधनसे अधिक] चौगुने चौगुने चन्द्र होते हैं ॥ ५३ ॥


दीवोदहीण रूवा विरलेढूणं तु रूवपरिहीणं ।
चदुरो चदुरो य तहा दादूणं तेसु रूवेसु ॥ ५४

अर्थ: एक कम द्वीप-समुद्रोंके अंकोंका विरलन कर तथा उन अंकोंके ऊपर चार चार अंक देकर परस्पर गुणा करनेपर जो प्राप्त हो


अण्णोण्णगुणेण१ तहा आदिधणं संगुणं तदो किच्चा ।
इच्छोवहिदीवाणं इच्छधनं होइ णायव्वं २ ॥ ५५

अर्थ (गाथा 54 से 55): [एक कम] उससे आदिधनको गुणित करके प्राप्त राशि प्रमाण इच्छित समुद्र या द्वीपका इच्छित धन होता है, ऐसा जानना चाहिये (विशेष जाननेके लिये देखिये षट्खंडागम पु. ४ पृ. १५९) ॥ ५४-५५ ॥


दीवोवहिपरिमाणं विरलेदूणं तु सव्वरूवाणि ।
अट्ठद्धं अट्ठद्धं दाऊणं ३ य तेसु रूवेसु ॥ ५६

अण्णोण्णब्भत्थेण य रूऊणेण य तिरूवभजिदेण ।
आदिधणं संगुणिदे सव्वधणं होदि बोद्धव्वो ४ ॥ ५७

अर्थ (गाथा 56 से 57): द्वीप-समुद्रों प्रमाण सब अंकोंका विरलन कर और उन अंकोंके ऊपर आठके आधे चार चार अंकोंको देकर परस्पर गुणा करनेपर जो राशि प्राप्त हो उसमेंसे एक कम करके शेषमें तीनका भाग दे । फिर लब्ध राशिसे आदिधनको गुणित करनेपर सब धनका प्रमाण होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ५६-५७ ॥


ते पुव्वुत्तो ५ रूवा दुगुणिता विरलिदेसु रूवेसु ।
दो दो रूवं दातुं अण्णोण्णगुणेण लद्धेण ॥ ५८

रूवविहीणेणं तहा तिरूवभजिदेण लद्धसंखेण ।
आदिधणं संगुणिदे तह चेव य होदि सव्वधणं ॥ ५९

अर्थ (गाथा 58 से 59): पूर्वोक्त उन अंकोंको दुगुणे कर विरलित करे, फिर उन अंकोंके ऊपर दो दो अंक देकर परस्पर गुणित करनेपर जो लब्ध हो उसमेंसे एक कम करके शेषमें तीनका भाग दे । इस प्रकारसे जो संख्या प्राप्त हो उससे आदिधनको गुणित करनेपर सर्वधनका प्रमाण प्राप्त होता है ॥ ५८-५९ ॥


माणुसखेत्तवहिद्धा सेसोवहिदीवरूव ७ विरलित्ता ।
करणं काऊण तदो ८ चंदाणं होइ सव्वाणं ॥ ६०

अर्थ: मनुष्य क्षेत्रके बाह्य भागमें स्थित शेष समुद्रों एवं द्वीपोंके अंकोंका विरलन कर करण (?) करनेपर सब चन्द्रोंका [प्रमाण] होता है ॥ ६० ॥


तह ते चेव यं ९ रूवा दुगुणिता विरलिदूण करणेणं १० ।
सो चेव होदि रासी दीवसमुद्देसु चंदाणं ॥ ६१

अर्थ: तथा करणके द्वारा उन्हीं अंकोंको दुगुणे कर विरलित करके द्वीप-समुद्रोंमें चन्द्रोंकी वही राशि होती है ॥ ६१ ॥


एवं होदि त्ति ११ पुणो रज्जुच्छेदा छरूवपरिहीणा ।
जंबुद्दीवस्स तहा छेदविहीणं तदो किच्चौ १२ ॥ ६२

रज्जूच्छेदविसेसा १३ दुगुणिता तह य दोहिं पासेसु १४ ।
विरलित्ता तेसुं १५ पुणो दो दो दाऊण रूवेसुं १६ ॥ ६३

अण्णोण्णगुणेण तहा दोसु वि पासेसु जादरासीणं ।
ताण पमाणं वोच्छं समासदो आगमबलेण ॥ ६४

अर्थ (गाथा 62 से 64): इस प्रकार राजुके जितने अर्धच्छेद हैं उनमेंसे छह अंकोंको तथा जम्बूद्वीपके अर्धच्छेदोंको भी कम करके राजुके अर्धच्छेदविशेषोंको दुगुणे कर व दोनों पार्श्वोंमें विरलित करके तथा उन अंकोंके ऊपर दो दो अंकोंको देकर परस्पर गुणा करनेपर जो दोनों पार्श्वोंमें राशियां उत्पन्न होती हैं उनका प्रमाण संक्षेपसे आगमानुसार कहते हैं ॥ ६२-६४ ॥


अट्ठसट्ठिलक्खभजिदं उभये पासेसु रज्जुणिप्पण्णं ।
सो चेव दु णायव्वो सेढिस्स असंखभागो त्ति ॥ ६५

अर्थ: है उसे ही श्रेणिका असंख्यातवां भाग जानना चाहिये ॥ ६५॥


सेढिस्स सत्तभागो चउसट्ठीलक्खजोयणविभत्तो ।
एवं होदूण ठिदा रासीणं छेदणा जे दु ॥ ६६

सव्वाणि जोयणाणि य रासीणं भागहाररूवाणि ।
दंडंगुलाणि य पुणो कायव्वं तह पयत्तेणं ॥ ६७

अर्थ (गाथा 66 से 67): श्रेणिके सातवें भागको चौंसठ लाखसे विभक्त करे, ऐसा होकर स्थित जो राशियोंके अर्धच्छेद हैं, तथा राशियोंके भागहार रूप जो सब योजन हैं, प्रयत्नपूर्वक उनके दण्ड एवं अंगुल करना चाहिये ॥ ६६-६७॥


छप्पण्णा बेण्णिसदा सूचीअंगुल करित्तु घेत्तूणं ।
उभये पासेसु तहो छेदणं रासिमज्झादो ॥ ६८

अर्थ: तथा उभय पार्श्वोंमें अर्धच्छेदोंकी राशिके मध्यमेंसे दो सौ छप्पन अंगुल करके ग्रहण करना चाहिये ॥ ६८॥


सेढी हवंति अंसा संखेज्जो अंगुला हवे छेदा ।
वामे दाहिणपासे णिद्दिठ्ठा सव्वदरिसीहिं ॥ ६९

अर्थ: वाम व दाहिने पार्श्वमें अंश श्रेणि होते हैं तथा संख्यात अंगुल छेद होते हैं, ऐसा सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ ६९॥


अंसो अंसगुणेण य छेदा छेदेण चेव संगुणिदे ।
छेदंसाणं दिट्ठं उप्पण्णाणं तु परिमाणं ॥ ७०

अर्थ: अंशोंको अंशोंसे तथा छेदोंको छेदोंसे गुणित करनेपर उत्पन्न छेदों व अंशोंका प्रमाण निर्दिष्ट किया गया है ॥ ७०॥


पण्णट्ठि च सहस्सा पंचेव सया तहेव छत्तीस ।
पदरंगुलाणि जादा संखेज्जगुणेणं तच्छेदो ॥ ७१

अंसादु समुप्पण्णं जगपदरं तह यं होइ णिद्दिष्ट्ठे ।
अवसेसे जे वियप्पा ते संखेवेणं च वोच्छामि ॥ ७२

अर्थ (गाथा 71 से 72): संख्येयगुणसे वे छेद पैंसठ हजार पांच सौ छत्तीस प्रतरांगुल होते हैं तथा अंशोंसे जगप्रतर उत्पन्न होता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है। अवशेष जो और विकल्प हैं उनका संक्षेपसे कथन करते हैं ॥ ७१-७२॥


जो उप्पण्णो रासी जोइसदेवाण सो समुद्दिष्ट्ठो ।
संखेज्जदिमे भागे भवणाणि हवंति णायव्वा ॥ ७३

अर्थ: जो राशि उत्पन्न होती है वह ज्योतिषी देवोंका प्रमाण कहा गया है। संख्यातवें भागमें उनके भवन होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ७३॥


सव्वे वि वेदिणिवहा सव्वे बहुभवणमंडिया रम्मा ।
सव्वे तोरणपउरा सव्वे सुरसुंदरीछिण्णा ॥ ७४

णाणामणिरयणमया जिणभवणविहूसिया मणभिरामा ।
जोदिसगणाण णिलया णिद्दिद्वा सव्वदरिसीहिं ॥ ७५

अर्थ (गाथा 74 से 75): ज्योतिषी देवसमूहके सब ही भवन सर्वदर्शियों द्वारा वेदीसमूहसे सहित, सब ही बहुत भवनोंसे मण्डित, रमणीय, सब ही तोरणोंसे प्रचुर, सब ही देवांगनाओंसे परिपूर्ण, नाना मणियों एवं रत्नोंके परिणाम रूप, जिनभवनसे विभूषित तथा मनोहर निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ ७४-७५॥ संक्षेपसे निर्दिष्ट किये गये ज्योतिषियोंके


बिंबाणि समुद्दिठ्ठा जोदिसयाणं समासदो णेया ।
एत्तो’ जोदिसरासी समासदो संपवक्खामि ॥ ७६

अर्थ: बिम्ब जानने योग्य हैं । आगे संक्षेपमें ज्योतिषियोंकी राशिका कथन करते हैं ॥ ७६ ॥


जो पुव्वुत्ता संखा रज्जुस्स दु छेदाणाणै किंचूणा ।
विरलिता तेसु पुणो चउ चउ दादूण रूवेसु ॥ ७७

अण्णोण्णगुणेण तदो रूऊणेण’ य तिरूवभजिदेण ।
पोक्खरडवहीचंद्रे गुणिदेण य होदि मूलधणं ॥ ७८

अर्थ (गाथा 77 से 78): राजुक अर्धच्छेदोंकी जो पूर्वोक्त संख्या है, कुछ कम उसका विरलन करके तथा उन अंकोंके ऊपर चार-चार अंक देकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उसमेंसे एक अंक कम कर शेषमें तीनका भाग दे । इस प्रकारसे जो लब्ध हो उससे पुष्कर समुद्रके चन्द्रोंको गुणित करनेपर मूलधन प्राप्त होता है ॥ ७७-७८ ॥


उत्तरधणमवि एवं आणिज्जो चेव तेणें करणेण ।
णवरि विसेसो णेयो रूवं पक्खित्तु वलएसु ॥ ७९

अर्थ: इसी प्रकार उसी करणके द्वारा उत्तरधनको भी ले आना चाहिये । विशेष इतना जानना चाहिये कि वलयोंमें एक अंकका प्रक्षेप किया जाता है ॥ ७९ ॥


रूवं पक्खित्ते पुण रिणरासिचउक्कसोलसादी य ।
दुगुणा दुगुणा गच्छदि सयंभुरमणोदधी जाव ॥ ८०

अर्थ: एक अंकका प्रक्षेप करनेपर फिर ऋणराशि चतुष्क व सोलह आदि स्वयम्भूरमण समुद्र तक दुगुणे दुगुणे क्रमसे जाती है ॥ ८० ॥


एवं पि आणिउणं पुव्वुत्तविहाणकरणजोगेण ।
उत्तरधणम्मि मज्झे सोधित्ता सुद्धअवसेसं ॥ ८१

मूलधणे पक्खित्ते सव्वधणं तह य होदि णिट्टिट्ठं ।
चंद्राणं णायव्वा जाव रज्जुग्गे सुक्केण ॥ ८२

अर्थ (गाथा 81 से 82): इस प्रकार पूर्वोक्त विधानकरणके योगसे लाकर और उसे उत्तरधनके मध्यमेंसे कम करके शुद्धशेषको मूलधनमें मिला देनेपर चन्द्रोंका सर्वधन होता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है। इसी प्रकार ही सूर्योंका भी सर्वधन जानना चाहिये ॥ ८१-८२ ॥


चदुकोडिजोयणेहि य अडदाला सदसहस्से भोगेहिं ।
सेढी दु समुप्पण्णों दोसु वि पासेसु णाग्रव्वा ॥ ८३

अर्थ: दोनों ही पाश्र्वमें चार करोड़ अड़तालीस लाख योजनोंसे विभक्त जगश्रेणि उत्पन्न जानना चाहिये ॥ ८३ ॥


सा चेव होदि रज्जू चउसट्ठीलक्खजोयणेहि पविभत्ता ।
एवं होदूण ठिदां रासीणं छेदणा जे दु ॥ ८४

ते अंगुलाणि किच्चा पुणरवि अण्णोण्णसंगुणे जादं ।
जोदिसगणाणं बिंबा णिद्दिठ्ठा सम्बदरिसीहिं ॥ ८५

अर्थ (गाथा 84 से 85): वही चौंसठ लाख (४४८०००००/७) योजनोंसे विभक्त राजु होती है । ऐसा होकर स्थित राशियोंके जो अर्धच्छेद होते हैं उनके अंगुल करके फिरसे भी परस्पर गुणित करनेपर ज्योतिषी समूहोंके बिम्बोंका प्रमाण होता है, ऐसा सर्वदर्शियों द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ ८४-८५ ॥


जो उप्पण्णो रासी पंचसु ठाणेसु तह य काऊणं ।
सगसगगुणगारेहिं गुणिदव्वं तह पयत्तेण ॥ ८६

अर्थ: उक्त प्रकारसे जो राशि उत्पन्न हुई है उसको पांच स्थानोंमें रख करके प्रयत्नपूर्वक अपने अपने गुणकारोंसे गुणित करे ॥ ८६ ॥


एगेगभट्ठवीसा अड्ठासीदा तहेव रूवेहिं । गुणिदे चंदादइच्चा णक्खत्ता गहगणा होंति ॥ ८७

अर्थ: उक्त पांच गुणकारोंमें एक ( चन्द्र ), एक ( सूर्य ), अट्ठाईस ( नक्षत्र ) तथा अठासी ( ग्रह ) अंकोंसे गुणित करनेपर चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र एवं ग्रहसमूहका प्रमाण होता है ॥ ८७ ॥


छावट्ठिं च सहस्सा णव चेव सया पण्हत्तरिं होंति । गुणगारा णादव्वा ताराणं कोडकोडीओ ॥ ८८

अर्थ: छ्यासठ हजार नौ सौ पचत्तर कोड़ाकोड़ी ( ६६९७५००००००००००००० ) यह ताराओंका गुणकार जानना चाहिये ॥ ८८ ॥


पंचेव य रासीओ मेलावेदूण तह य एयत्थं । जोदिससुराणं दव्वं उप्पण्णं होदि तह य णादव्वा ॥ ८९

अर्थ: तथा इन पाँचों राशियोंको एकत्र मिलानेपर समस्त ज्योतिषी देवोंका द्रव्य होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ८९ ॥


‘गुणगारभागहारा वोवट्टेत्तूण’ तह य अवसेसं । जोदिसगणाण दव्वं होदि पुणो तह य णादव्वा ॥ ९०

अर्थ: तथा गुणकार और भागहारका अपवर्तन करके अवशेष ज्योतिर्गणोंका द्रव्य होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ९० ॥


पण्णट्ठिसहस्सेहि य छत्तीसेहि य सदेहिं पंचेहिं । पदरंगुलेहि भजिदे जगपदरं होदि उप्पण्णं ॥ ९१

अर्थ: पैंसठ हजार पांच सौ छत्तीस प्रतरांगुलोंका जगप्रतरमें भाग देनेपर समस्त ज्योतिषी देवोंका प्रमाण उत्पन्न होता है ॥ ९१ ॥


णउदी सत्तसदेहि य धरणीदो सब्बहेट्ठिमा तारा । णउसु सदेसु य उड्ढं जे तारा ते सव्वोवरिमिया ॥ ९२

अर्थ: पृथिवीसे सात सौ नब्बे [योजन ऊपर जाकर] सबसे नीचे तारा स्थित हैं। नौ सौ योजन ऊपर जाकर जो तारा स्थित हैं वे सबसे ऊपर हैं ॥९२॥


एवं जोदिसपडलव्वेहुलियं दस सदं वियाणाहि । तिरियं लोगक्खेत्तं लोगंत घणोदधिं पुट्ठं ॥ ९३

अर्थ: इस प्रकार ज्योतिषपटलका बाहल्य एक सौ दश योजन प्रमाण जानना चाहिये। तिर्यग्लोक क्षेत्र लोकान्तमें घनोदधि वातवलयसे स्पृष्ट है ॥ ९३ ॥


णउदुत्तरसत्तसदं दस सीदी चदुदुगं तियचउक्कं । तारारविससिरिक्खा बुद्धभगव [गुरु] यंगिरारसणी ॥ ९४

अर्थ: चित्रा पृथिवीसे सात सौ नब्बे योजन ऊपर जाकर तारा, इससे दश योजन ऊपर सूर्य, उससे अस्सी योजन ऊपर चन्द्र, उससे चार योजन ऊपर नक्षत्र, उससे चार योजन ऊपर बुध, उससे तीन योजन ऊपर शुक्र, उससे तीन योजन ऊपर [गुरु], उससे तीन योजन ऊपर अंगारक (मंगल) और उससे तीन योजन ऊपर शनि स्थित है ॥ ९४ ॥


चंदस्स सदसहस्सं सहस्स रविणो सदं च सुक्करस । वासाहिएहि पल्लं दिट्ठं गरिट्ठणामस्स ॥ ९५

सेसाणं तु गहाणं पल्लद्धं आउअं मुणेदव्वा । ताराणं तु जहण्णं पादद्धं पादमुक्कस्सं ॥ ९६

अर्थ (गाथा 95 से 96): उत्कृष्ट आयु चन्द्रकी एक लाख वर्षोंसे अधिक एक पल्य, सूर्यकी एक हजार वर्षोंसे अधिक एक पल्य, शुक्रकी सौ वर्षोंसे अधिक एक पल्य, बृहस्पतिकी पूरा एक पल्य तथा शेष ग्रहोंकी अर्ध पल्य प्रमाण जानना चाहिये। ताराओंकी जघन्य आयु पादार्ध अर्थात् पल्यके आठवें भाग (१/८) और उत्कृष्ट पाद (१/४) पल्य प्रमाण जानना चाहिये। [ शेष सूर्यादिकोंकी जघन्य आयु पल्योपमके चतुर्थ भाग ( १/४ ) प्रमाण है ] ॥९५-९६॥


एगट्ठिभाग जोयणस्स ससिमंडलं तु छप्पण्णं । रविमंडलं तु अडदालीसं एगट्ठिभागाणं ॥ ९७

अर्थ: चन्द्रमण्डलका [उपर्िम तलविस्तार] योजनके इकसठ भागोंमेंसे छप्पन भाग ( ५६/६१ ) तथा सूर्यमण्डलका उन इकसठ भागोंमेंसे अड़तालीस भाग प्रमाण है ॥ ९७ ॥


सुक्कस्स हवदि कोसं कोसं देसूणयं बिहप्फदिणो । सेसाणं तु गहाणं तह मंडलमद्धगाउदियं ॥ ९८

अर्थ: शुक्रके विमानतलका विस्तार एक कोश, बृहस्पतिके विमानतलका कुछ कम एक कोश, तथा शेष ग्रहोंके मण्डलका विस्तार अर्ध कोश प्रमाण है ॥ ९८ ॥


गाउदचउत्थभागो णायव्वा सव्वइड्ढरिया तारा । साहिय तह मज्झिमया उक्कस्सा अद्धगाउदिया ॥ ९९

अर्थ: सब लघु ताराओंका विस्तार एक कोशके चतुर्थ भाग प्रमाण, मध्यम ताराओंका एक कोशके चतुर्थ भागसे कुछ अधिक, तथा उत्कृष्ट ताराओंका अर्ध कोश प्रमाण है ॥ ९९ ॥


तारंतरं जहण्णं णायव्वा सत्तभागगाउदियं । पण्णासा मज्झिमया उक्कस्सं जोयणसहस्सं ॥ १००

अर्थ: ताराओंका जघन्य अन्तर एक कोशके सातवें भाग ( १/७ ), मध्यम अन्तर पचास योजन, और उत्कृष्ट अन्तर एक हजार योजन प्रमाण है ॥ १०० ॥


रविससिअंतरं डहरं लक्खूणं तिहिं सदेहिं सट्ठाहिं । एगं च सदसहस्सं छस्सद सट्ठी य उक्कस्सं ॥ १०१

अर्थ: एक लाख योजनमेंसे तीन सौ साठ योजन कम करनेपर जो शेष रहे ( १००००० - ३६० = ९९६४० यो. ) उतना [ जम्बूद्वीपमें ] एक चन्द्रसे दूसरे चन्द्र तथा एक सूर्यसे दूसरे सूर्यके जघन्य अन्तरका प्रमाण होता है। उनके उत्कृष्ट अन्तरका प्रमाण एक लाख छह सौ साठ योजन है ॥ १०१ ॥


णवणउदिं च सहस्सा छच्चेव सदा जहण्ण चत्ताला । एयं च सदसहस्सा छस्सद सट्ठी य उक्कस्सं ॥ १०२

अर्थ: उपर्युक्त जघन्य अन्तरका प्रमाण निन्यानवै हजार छह सौ चालीस और उत्कृष्ट अन्तरका प्रमाण एक लाख छह सौ साठ [ योजन ] है ॥ १०२ ॥


इगिवीसेक्कारसयं आबाधा हवदि अत्थसेलस्स । दुगुणं पुण गिरिसहिदं जोदिसरहिदस्स वित्थारं ॥ १०३

अर्थ: अस्तशैल (मेरु) और ज्योतिष विमानोंका अन्तर ग्यारह सौ इक्कीस योजन प्रमाण है। इसको दुगुणा करके मेरुके विस्तारको मिला देनेपर ज्योतिषी देवोंसे रहित क्षेत्रका विस्तारप्रमाण होता है ॥ १०३ ॥


जोदिसगणाण संखा भणिदा जा जा हूँ जंबुदीवम्हि । ताओ दुगुणा दुगुणा बोद्धव्वा खिलवज्जाओ ॥ १०४

अर्थ: ज्योतिर्गणोंकी जो जो संख्या जम्बूद्वीपमें कही गई है, लवण समुद्रमें स्थिर ताराओंसे रहित उनकी संख्या उससे दुगुणी जानना चाहिये ॥ १०४ ॥


खीणा पुण विण्णेया अवट्ठिदा होंति जंबुदीवम्हि ।
पिंडग्गेणं तु ताओ जिणदिट्ठा होंति छत्तीस ॥ १०५

अर्थ: जम्बूद्वीपमें अवस्थित जो स्थिर तारा जिनेन्द्र भगवान्‌के द्वारा देखे गये हैं वे समुदित रूपमें छत्तीस हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ १०५ ॥


बे चंदा इह दीवे चत्तारि य सायरे लवणतोए ।
धादगिसंडे दीवे बारस चंदा य सूरा य ॥ १०६

अर्थ: चन्द्र और सूर्य यहां जम्बूद्वीपमें दो, लवण समुद्रमें चार तथा धातकीखण्ड द्वीपमें बारह हैं ॥ १०६ ॥


बादालीसं चंदा कालसमुद्दम्हि होंति बोद्धव्वा ।
पोक्खरवरद्धदीवे बावत्तरि ससिगणा भणिदा ॥ १०७

अर्थ: कालोद समुद्रमें ब्यालीस चन्द्र जानना चाहिये । अर्ध पुष्करवर द्वीपमें बहत्तर चन्द्रगण कहे गये हैं ॥ १०७ ॥


बे चंदा बे सूरा णक्खत्ता खलु हवंति छप्पण्णा ।
छावत्तरी य गहसद् अंबूदीवे अणुचरंति ॥ १०८

अर्थ: जम्बूद्वीपमें दो चन्द्र, दो सूर्य, छप्पन (२८ × २) नक्षत्र तथा एक सौ छहत्तर (८८ × २) ग्रह संचार करते हैं ॥ १०८ ॥


अट्ठावीसं रिक्खा अट्ठासीदं च गहकुलं भणिदं ।
एक्केक्कं चंदस्स दु परिवारो होदि णायव्वो ॥ १०९

अर्थ: अट्ठाईस नक्षत्र तथा अठासी ग्रहकुल, यह एक एक चन्द्रका परिवार होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १०९ ॥


छावट्टिं च सहस्सा णव य सया पणहत्तरी होंति ।
एयस्ससीपरिवारो ताराणं कोडिकोडीओ ॥ ११०

अर्थ: छयासठ हजार नौ सौ पचत्तर कोड़ाकोड़ि तारे एक चन्द्रके परिवार स्वरूप होते हैं ॥ ११० ॥


जोइसवरपासादा अणादिणिहणा सभावनिप्पण्णा ।
वणवेदिपूहिं जुत्ता वरतोरणमंडिया दिव्वा ॥ १११

बहुदेवदेविपउरा जिणभवणविहूसिया परमरम्मा ।
वेडुलियवज्जमरगयक्केंकेयणपउमरायमया ॥ ११२

अर्थ (गाथा 111 से 112): उपर्युक्त ज्योतिषी देवोंके उत्तम प्रासाद अनादि-निधन, स्वभावसे उत्पन्न, वन-वेदियोंसे युक्त, उत्तम तोरणोंसे मण्डित, दिव्य, बहुत देव-देवियोंसे प्रचुर, जिनभवनसे सुशोभित, अतिशय रमणीय; तथा वैडूर्य, वज्र, मरकत, कर्केतन एवं पद्मराग मणियोंके परिणाम रूप होते हैं ॥ १११-११२ ॥


अट्ठट्ठकम्मरहियं अणंतणाणुज्जलं अमरमहियं ।
वरपउमनंदिनमियं अरिट्ठणेमिं जिणं वंदे ॥ ११३

अर्थ: जो आठके आधे अर्थात् चार घातिया कर्मोंसे रहित, अनन्त ज्ञानसे उज्ज्वल, देवोंसे पूजित एवं श्रेष्ठ पद्मनन्दिसे नमस्कृत हैं उन अरिष्टनेमि जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ११३ ॥


॥ इय जंबुद्दीवपण्णत्तिसंगहे जोइसलोयवण्णणा णाम बारसमो उद्देसो समत्तो ॥ १२ ॥

तेरसमो उद्देसो

पासजिणिंदं पणमिय पणट्ठघणवादिकम्ममलपडलं । परमेट्ठिनासिदत्थं पमाणभेदं पवक्खामि ॥ १

अर्थ: दृढ़ घातिया कर्म रूप मलके समूहको नष्ट कर देनेवाले पार्श्व जिनेन्द्रको प्रणाम करके अरहन्त परमेष्ठीके द्वारा उपदिष्ट प्रमाणभेदका कथन करते हैं ॥ १ ॥


दुविधो य होदि कालो ववहारो तह य परमत्थो । ववहार मणुयलोए परमत्थो सव्वलोयम्मि ॥ २

अर्थ: व्यवहार और परमार्थके भेदसे काल दो प्रकारका है । इनमें व्यवहारकाल मनुष्यलोकमें और परमार्थकाल सर्व लोकमें पाया जाता है ॥ २ ॥


संखेज्जमसंखेज्जं अणंतयं तह य होदि तिवियप्पो । भाणुगदीए दिट्ठो समासदो कम्मभूमिम्मि ॥ ३

अर्थ: संख्येय, असंख्यात और अनन्त इस प्रकारसे कालके तीन भेद हैं। यह काल कर्मभूमिमें संक्षेपसे सूर्यगतिके अनुसार देखा जाता है ॥३॥


कालो परमणिरुद्धो अविभागी तं विजाण समओ त्ति । सुहुमो अमुत्तिकोऽगुरुलहुवत्तणालक्खणो कालो ॥ ४

अर्थ: जो काल परमनिरुद्ध (परमनिकृष्ट) अर्थात् विभागके अयोग्य अविभागी है उसे समय जानना चाहिये । यह काल सूक्ष्म, अमूर्तिक व अगुरुलघु गुणसे युक्त होता हुआ वर्तना स्वरूप है ॥ ४ ॥


आवलि असंखसमया संखेज्जावलिसमूह उस्सासो । सत्तूस्सासो थोवो सत्तत्थोवा लवो भणिदो ॥ ५

अर्थ: असंख्यात समयोंकी एक आवलि, संख्यात आवलियोंके समूह रूप उच्छ्वास, सात उच्छ्वासोंका स्तोक, और सात स्तोकोंका एक लव कहा गया है ॥ ५ ॥


अट्ठतीसद्धलवा णाली बेणालिया मुहुत्तं तु । एयसमयेण हीणं भिण्णमुहुत्तं तदो सेसं ॥ ६

अर्थ: साढ़े अड़तीस लवोंकी नाली, दो नालियोंका मुहूर्त, और एक समयसे हीन शेष मुहूर्तको भिन्नमुहूर्त कहते हैं ॥ ६ ॥


तीसमुहुत्तं दिवसं तीसं दिवसाणि मासमेक्को हु । बे मासाणि उदू णं तिण्णिउदू अयणमेक्को दु ॥ ७

अर्थ: तीस मुहूतोंका दिन, तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी ऋतु, और तीन ऋतुओंका एक अयन होता है ॥ ७ ॥


वस्सं बेअयणं पुण पंच य वस्साणि होंति जुगमेगं । बिण्णिजुगं दसवस्सं दसगुणिदं होदि वस्ससदं ॥ ८

अर्थ: दो अयनोंका वर्ष, पांच वर्षोंका एक युग, दो युग प्रमाण दश वर्ष और दश वर्षोंको दशसे गुणित करनेपर सौ वर्ष होते हैं ॥८॥


वस्ससदं दसगुणिदं वस्ससहस्सं तु होदि परिमाणं । वस्ससहस्सं दसगुण दसवस्ससहस्समिदि जाणे ॥ ९

अर्थ: सौ वर्षोंको दशसे गुणित करनेपर सहस्र वर्ष और सहस्र वर्षोंको दशसे गुणित करनेपर दश सहस्र वर्षोंका प्रमाण जानना चाहिये ॥९॥


दसवस्ससहस्साणि य दसगुणिदं वस्ससदसहस्सं तु । एत्तो अंगपमाणं वोच्छामि य वस्सगणणाए ॥ १०

अर्थ: दशगुणित दशवर्षसहस्र का वर्षशतसहस्र (एक लाख वर्ष) होता है। आगे वर्षगणनासे अंगप्रमाण कालका कथन करते हैं ॥ १० ॥


वाससदसहस्साणि दु चुलसीदिगुणं हवेज्ज पुव्वंगं ।
पुव्वंगसदसहस्सा चुलसीदिगुणं हवे पुव्वं ॥ ११

अर्थ: चौरासीसे गुणित एक लाख वर्ष प्रमाण अर्थात् चौरासी लाख वर्षोंका एक पूर्वांग और चौरासीसे गुणित एक लाख पूर्वांग प्रमाण एक पूर्व होता है ॥११॥


पुव्वस्स दु परिमाणं सत्तरि खलु कोडि सदसहस्साणिं ।
छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं ॥ १२

अर्थ: पूर्वका प्रमाण सत्तर लाख छप्पन हजार करोड़ (७०५६००००००००००) जानना चाहिये ॥ १२ ॥


पुव्वं पव्वं णउदं कुमुदं पदमं च णलिण कमलं च ।
तुडियं अडडं अममं हाहा हूहू य परिमाणं ॥ १३

अहवि दु लदा छदा वि य महालदंगं महालदा य पुणो ।
सीसपकंपिय हत्थप्पहेलियं हवदि अचलप्पं ॥

एवं एसो कालो संखेज्जो होदि वस्सगणणाए ।
गणणावदिक्कंतो हवदि य कालो असंखेज्जो ॥ १५

अर्थ (गाथा 13 से 15): [इसी विधानसे अपने अपने अंगके साथ - यथा पूर्वांग-पूर्व व पर्वांग-पर्व इत्यादि ] पूर्व, पर्व, नयुत, कुमुद, पद्म, नलिन, कमल, त्रुटितं, अटट, अमम, हाहा, हूहू लता [लतांग], लता, तथा महालतांग, महालता, शीर्षप्रकंपित, हस्तप्रहेलित और अचलात्म, इस प्रकार वर्षोंके गणना-क्रमसे यह काल संख्येय है । गणनासे रहित काल असंख्येय होता है ॥ १३-१५ ॥


अंतादिमज्झहीणं अपदेसं चेव इंदिए गेज्झं ।
जं दव्वं अविभागी तं परमाणू मुणेयव्वा ॥ १६

अर्थ: जो द्रव्य अन्त, आदि व मध्यसे रहित; अप्रदेशी, इन्द्रियोंसे अग्राह्य (ग्रहण करनेके अयोग्य) और विभागसे रहित हो उसे परमाणु जानना चाहिये ॥ १६ ॥


जस्स ण कोइ अणुदरो सो अणुआ होदि सव्वदव्वाणं ।
जावे परं अणुत्तं तं परमाणू मुणेयव्वो ॥ १७

अर्थ: सब द्रव्योंमें जिसकी अपेक्षा अन्य कोई अणुतर न हो वह अणु होता है। जिसम आत्यन्तिक अणुत्व हो उसे सब द्रव्योंमें परमाणु जानना चाहिये ॥ १७ ॥


सत्थेण सुतिक्खेण य छेत्तुं भेत्तुं च जं किर ण सक्कं ।
तं परमाणुं सिद्धा भणंति आदि पमाणेण ॥ १८

अर्थ: जो अतिशय तीक्ष्ण शस्त्रसे छेदा-भेदा न जा सके उसे सिद्ध अर्थात् केवलज्ञानी परमाणु कहते हैं। यह प्रमाणव्यवहारकी अपेक्षा आदिभूत है, अर्थात् आगे कहे जानेवाले अवसन्नासन्नादिके प्रमाणका मूल आधार परमाणु ही है ॥ १८ ॥


परमाणूहिं य णेवा अंताणंतहि मेलिदेहिं तहा ।
ओसण्णासण्णेत्ति य खंधो सो होदि णादव्वो ॥ १९

अर्थ: अनन्तानन्त परमाणुओंके मिलनेसे अवसन्नासन्न नामक स्कन्ध होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १९ ॥ उन आठ अवसन्नासन्न द्रव्योंसे एक सन्ना-


अट्ठेहिं तेहिं दिट्ठा ओसण्णासण्णएहिं दव्वेहिं ।
सण्णासण्णो त्ति तदो खंधो णामेण सो होइ ॥ २०

अर्थ: सन्न नामक स्कन्ध होता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ २० ॥


अट्ठेहिं तेहिं णेया सण्णासण्णेहि तह य दव्वेहिं ।
ववहारियपरमाणू णिद्दिट्ठो सव्वदरिसीहिं ॥ २१

अर्थ: उन आठ सन्नासन्न द्रव्योंसे एक व्यावहारिक परमाणु (त्रुटिरेणु) होता है, ऐसा सर्वदर्शियोंके द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ॥ २१ ॥


परमाणू तसरेणू रहरेणू अग्गयं च बालस्स ।
लिक्खा जूवा य जवो अट्ठगुणविवड्डिदा कमसो ॥ २२

अर्थ: परमाणु, त्रसरेणु, रथरेणु, [क्रमशः उत्तम, मध्यम व जघन्य भोगभूमिज तथा कर्मभूमिके] बालका अग्रभाग, लिक्षा, यूका और यव, ये क्रमसे आठगुणी वृद्धिको प्राप्त हैं ॥ २२ ॥


अट्ठेहिं जवेहिं वुत्तो णिप्पण्णं अंगुलं तु तं तिविहं ।
उच्छेहणामधेयं पमाणमादंगुलं चेव ॥ २३

अर्थ: पुनः आठ यवोंसे एक अंगुल निष्पन्न होता है। वह अंगुल उत्सेध, प्रमाण और आत्मांगुलके भेदसे तीन प्रकार है ॥ २३ ॥


एक्केक्काणं ताणं तिविहा जाणादि अंगुलवियप्पा ।
घणपदरसूचिअंगुल समासदो होदि णिद्दिट्ठा ॥ २४

अर्थ: उनमेंसे एक एक अंगुलके सूच्यंगुल, प्रतरांगुल और घनांगुल, इस प्रकार संक्षेपसे तीन तीन भेद जानना चाहिये ॥ २४ ॥


उच्छेहअंगुलेहिं य पंचंचेव सएहिं तहेव णेत्तूणं ।
णामेण समुद्दिठ्ठो होदि पमाणंगुलो एक्को २५

अर्थ: तथा पांच सौ उत्सेधांगुलोंको ग्रहण कर नामसे एक प्रमाणांगुल होता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है ॥ २५ ॥


परमाणुणादिएहि य आगंतूणं तु जो समुप्पण्णो ।
सो सूचिअंगुलो त्ति य णामेण य होदि णिद्दिट्ठो ॥ २६

अर्थ: परमाणु आदिकोंके क्रमसे आकर जो अंगुल उत्पन्न हुआ है वह नामसे ‘सूच्यंगुल (उत्सेधसूच्यंगुल)’ निर्दिष्ट किया गया है ॥ २६ ॥


जम्हि य जम्हि य काले भरहेरवएसु होंति जे मणुया ।
तेसिं तु अंगुलाई आदंगुल णामदो होइ ॥ २७

अर्थ: भरत और ऐरावत इन दो क्षेत्रोंमें जिस जिस कालमें जो मनुष्य होते हैं उनके अंगुल नामसे आत्मांगुल कहे जाते हैं ॥ २७ ॥


उच्छेहअंगुलेण य उच्छेहं तह य होइ जीवाणं ।
णारयतिरिय मणुस्साणं देवाणं तह य णायव्वा ॥ २८

अर्थ: उत्सेधांगुलसे नारकी, तिर्यंच, मनुष्य तथा देव, इन जीवोंके शरीरका उत्सेधप्रमाण होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ २८ ॥


सव्वाणं कलसाणं भिंगाराणं तहेव दंडाणं ।
धणुफलहेलंसत्तित्तोमरहलमुसलरहाण खन्धाणं ॥ २९

सगडाणं जुग्गाणं सिहासणचामरादवत्ताणं ।
आदंगुलेण दिट्ठा घरसयणादीण परिमाणं ॥ ३०

अर्थ (गाथा 29 से 30): सब कलश, भृंगार, दण्ड, धनुष, फलक (या धनुष्फलक) शक्ति, तोमर, हल, मूसल, रथ, शकट, युग, सिंहासन, चामर, आतपत्र तथा गृह व शयनादिकोंका प्रमाण आत्मांगुलसे कहा गया है ॥ २९-३० ॥ द्वीप, उदधि, शैल, जिनभवन,


दीवोदहिसिलाणं जिणभवणाणं नदीण कुंडाणं । वंसादीण पमाणं पमाणे तह अंगुले दिट्ठा ॥ ३१

अर्थ: नदी, कुण्ड तथा क्षेत्रादिकोंका प्रमाण प्रमाणांगुलसे निर्दिष्ट किया गया है ॥ ३१ ॥


छहिं अंगुलेहिं पादो बेपादेहि य तहा विदत्थी दु । बेहिं विदत्थीहि तहा हत्थो पुण होइ णादव्वो ॥ ३२

अर्थ: छह अंगुलोंसे एक पाद, दो पादोंसे एक वितस्ति तथा दो वितस्तियोंसे एक हाथ होता है; ऐसा जानना चाहिये ॥३२॥


बेहत्थेहि य किक्खू बेकिक्खूहिं य हवे तहा दंडो । दंडधणुज्जुगनाली अक्खं मुसलं च चदुररणी ॥ ३३

अर्थ: दो हाथोंसे एक किष्कु (रिंष्कु) और दो किष्कुओंसे एक दण्ड होता है । दण्ड, धनुष, युग, नाली, अक्ष और मूसल, ये सब चार रत्नि प्रमाण होते हैं । इसीलिये इन सबको धनुषके पर्याय नाम जानना चाहिये ॥३३॥


बेदंडसहस्सेहि य गाउदमेत्तं तु होइ णादव्वो । चउगाउदेहि य तहा जोयणमेत्तं विणिद्दिट्ठं ॥ ३४

अर्थ: दो हजार दण्डोंसे एक गव्यूति (कोश) होती है, ऐसा जानना चाहिये। तथा चार गव्यूतियोंसे एक योजन निर्दिष्ट किया गया है ॥ ३४ ॥


जं जोयणवित्थिण्णं तं तिगुणं परिरएण सविसेसं । तं जोयणमुव्विद्धं पल्ल पलिदोवमं णाम ॥ ३५

अर्थ: जो एक योजन विस्तीर्ण, विस्तारकी अपेक्षा कुछ अधिक तिगुणी परिधिसे संयुक्त तथा एक योजन उद्वेध (अवगाह) से युक्त हो ऐसे उस गर्तविशेषका नाम पल्य व पल्योपम है ॥ ३५ ॥


ववहारुद्धारद्धा पल्ला तिण्णेव होंति णादव्वा । संखा दीवसमुद्दा कम्मट्ठिदी वण्णिया तदिए ॥ ३६

अर्थ: व्यवहार, उद्धार और अद्धा, इस प्रकार पल्य तीन प्रकारके होते हैं । इनमें व्यवहारपल्य उद्धारपल्यादि रूप संख्याका कारण है । उद्धारपल्यसे द्वीप-समुद्रोंकी संख्या तथा तृतीय अद्धापल्यसे कर्मोंकी स्थिति वर्णित है ॥ ३६ ॥


एगाहिं बीहिं तीहि य उक्कस्सं जाव सत्तरत्ताणं । संणद्धं संणिचिदं भरिदं बालग्गकोडीहिं ॥ ३७

अर्थ: एक दिन, दो दिन, तीन दिन अथवा उत्कर्षसे सात दिन तकके [मेंढ़ेके] करोड़ों बालाग्रोंसे उपर्युक्त पल्य (गड्ढा) को अत्यन्त सघन रूपमें भरना चाहिये ॥ ३७ ॥


वस्ससदे वस्ससदे एक्केक्कं अवहडस्स जो कालो । सो कालो णादव्वो णियमा एक्कस्स पल्लस्स ॥ ३८

अर्थ: फिर उसमेंसे सौ सौ वर्षमें एक एक बालाग्रके अपहृत करनेमें (निकालनेमें) जो काल लगे वह काल नियमसे एक पल्य प्रमाण जानना चाहिये ॥ ३८ ॥


ववहारे जं रोमं तं छिण्णमसंखकोडिसमयेहि । उद्धारे ते रोमा दीवसमुद्दा दु एदेण ॥ ३९

अर्थ: व्यवहार पल्यमें जितने रोम होते हैं उनको असंख्यात करोड़ वर्षोंके समयोंसे खण्डित करनेपर जो राशि प्राप्त हो उतना उद्धार पल्यके रोमोंका प्रमाण होता है । इससे द्वीप-समुद्रोंका प्रमाण जाना जाता है ॥ ३९ ॥


उद्धारे जं रोमं तं छिण्ण संतेगवस्ससमयेहिं । अद्धारे ते रोमा कम्मट्ठिदी वण्णिया तदिए ॥ ४०

अर्थ: उद्धार पल्यमें जो रोमप्रमाण है उसे एक सौ वर्षोंके समयोंसे खण्डित करनेपर जो प्राप्त हो उतने रोम अद्धार पल्यमें होते हैं । इस तृतीय पल्यसे कर्मोंकी स्थिति वर्णित है ॥ ४० ॥ इन दश कोड़ाकोड़ी पल्योंके


एदेसिं पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दसगुणिदं । तं सागरोवरमस्स दु उवमा एक्कस्स परिमाणं ॥ ४१

दस सागरोवरमाणं पुण्णाओ होंति कोडिकोडीओ । ओसप्पिणीय कालो सो चेवुस्सप्पिणीए वि ॥ ४२

पल्लो सायर सूवी पदरो घणंगुलो य जगसेढी । लोगपदरो य लोगो अट्ठ दु माणा मुणेयव्वा ॥ ४३

सव्वण्हुसाधणत्थं पच्चक्खप्पमाण तह य अणुमाणं । होदि उवमा पमाणं अविरुद्धं आगमपमाणं ॥ ४४

सुहुमंतरिदपदत्थे दूरात्थे जो सुणेइ णाणेण । सो सव्वण्हू जाणह धूमणुमाणेण जह अग्गी ॥ ४५

अर्थ (गाथा 41 से 45): बराबर एक सागरोपमका प्रमाण होता है ॥ ४१ ॥ पूर्ण दश कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण एक अवसर्पिणी काल और उतना ही उत्सर्पिणी काल भी होता है ॥ ४२ ॥ पल्य, सागर, सूच्यंगुल, प्रतरांगुल, घनांगुल, जगश्रेणि, लोकप्रतर और लोक, ये आठ उपमा मानके भेद जानना चाहिये ॥ ४३ ॥ सर्वज्ञसिद्धिके लिये प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमा प्रमाण और अविरुद्ध आगम प्रमाण है; अर्थात् इन चार प्रमाणोंके द्वारा सर्वज्ञ सिद्ध होता है ॥ ४४ ॥ जो सूक्ष्म ( परमाणु आदि ), अन्तरित ( राम-रावणादि ) और दूरस्थ ( मेरु आदि ) पदार्थोंको प्रत्यक्ष रूपसे जानता है उसे सर्वज्ञ समझना चाहिये, जैसे धूमानुमानसे अग्निका ज्ञान ॥ ४५ ॥


रागो दोसो मोहो तिण्णेदे जस्स णत्थि जीवस्स । सो णवि मोसं भासदि तस्स पमाणं हवे वयणं ॥ ४६

सो दु पमाणो दुविहो पच्चक्खो तह य होदि य परोक्खो । पच्चक्खो दु पमाणो दुविहो सो होदि णायव्वो ॥४७

अर्थ (गाथा 46 से 47): जिस जीवके राग द्वेष और मोह ये तीन दोष नहीं हैं वह असत्य भाषण नहीं करता, अत एव उसका वचन प्रमाण होता है ॥ ४६ ॥ वह प्रमाण प्रत्यक्ष और परोक्षके भेदसे दो प्रकार है। इनमें जो प्रत्यक्ष प्रमाण है वह भी दो प्रकार जानना चाहिये- प्रथम सकल प्रत्यक्ष और


पच्चक्खो तह सयलो पढमो बिदिओ य वियलपच्चक्खो । सयलो केवलणाणं ओहीमणपज्जवा वियला ॥ ४८

अर्थ (गाथा 47 से 48): द्वितीय विकल प्रत्यक्ष। इनमें सकल प्रत्यक्ष केवलज्ञान और विकल प्रत्यक्ष अवधि व मनःपर्यय ज्ञान हैं ॥४७-४८॥


खइओ एयमणंतो तिकालसव्वत्थगहणसामत्थो । बाधारहिदो णिच्चो णिद्दिट्ठो सयलपच्चक्खो ॥ ४९

अर्थ: सकल प्रत्यक्ष क्षायिक, एक, अनन्त, त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थोंके ग्रहण करनेमें समर्थ, बाधारहित और नित्य निर्दिष्ट किया गया है ॥ ४९ ॥


दव्वे खेत्ते काले भावे जो परिमिदो दु अवबोधो । बहुविहभेदपभिण्णो सो होदि य वियलपच्चक्खो ॥ ५०

अर्थ: जो ज्ञान द्रव्य क्षेत्र, काल और भावमें परिमित (परिमाणयुक्त) तथा बहुत प्रकारके भेद-प्रभेदोंसे युक्त है वह विकल प्रत्यक्ष है ॥ ५० ॥


पुग्गलसीमेहिं ठिदो पच्चक्खो सप्पभेद अवधी दु । देशावधि परमावधि सव्वावधिपुढि तिवियप्पो ॥ ५१

अर्थ: अवधिज्ञान पुद्गलसीमाओंसे स्थित, अर्थात् रूपी द्रव्यको विषय करनेवाला, प्रत्यक्ष अर्थात् इन्द्रियोंकी अपेक्षा न करके आत्ममात्रसापेक्ष और प्रभेदोंसे सहित है। मूलमें वह देशावधि, परमावधि और सर्वावधि इन तीन भेदोंसे संयुक्त है ॥ ५१ ॥


परमणगदाण अत्थं मणेण अवधारियूण अवबोधो । रिजुविपुलमदिवियप्पो मणपज्जवणाण पच्चक्खो ॥ ५२

अर्थ: जो ज्ञान दूसरेके मनमें स्थित पदार्थको मनसे निर्धारित करके जानता है वह प्रत्यक्ष स्वरूप मनःपर्यय ज्ञान कहा जाता है। इसके ऋजुमति व विपुलमति, इस प्रकार दो भेद हैं ॥५२॥


बिदिओ दु जो पमाणो तह चेव य होदि सो परोक्खो त्ति । दुविहो सो वि परोक्खो मदिसुदभेदेण णिद्दिट्ठा ॥

अर्थ: द्वितीय जो प्रमाण है वह ‘परोक्ष’ कहा जाता है। वह परोक्ष भी मति और श्रुतके भेदसे दो प्रकार कहा गया है ॥ ५३ ॥


बुद्धिपरोक्खपमाणो बहुविहभेदेहिं सो दु संजुत्तो । तस्स दु भेदविहत्थं किंचि समासेण वोच्छामि ॥ ५४

अर्थ: परोक्ष प्रमाण स्वरूप जो बोध है वह बहुत प्रकारके भेदोंसे संयुक्त है। संक्षेपसे उसके कुछ भेद-विकल्पोंका कथन करते हैं ॥ ५४ ॥


उग्गहईहावायाधारणभेदेहिं चदुविहो होइ । इंदियभेदेण पुणो अट्ठावीसा समुद्दिठ्ठा ॥ ५५

अर्थ: इनमें मतिज्ञान अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा, इन भेदोंसे चार प्रकार है। पुनः इन्द्रियभेद (इन्द्रिय ५ व अनिन्द्रिय १) से उसके अट्ठाईस भेद कहे गये हैं ॥ ५५ ॥


अभिमुहनियमियबोहो ण आभिनियोहियमणिंदिइंदियजं । बहुयाहि उग्गहादि य कय उत्तीसा तिसद भेदा ॥

अर्थ: अभिमुख होकर नियमित रूपसे पदार्थको जो जाने वह आभिनिबोधिक ( मतिज्ञान ) कहलाता है। यह इन्द्रियज और अनिन्द्रियज स्वरूपसे दो प्रकारका है। फिर उसके बहुआदिक एवं अवग्रहादिकी अपेक्षा तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं ॥ ५६ ॥


विसईविसएहि जुदो सण्णिवादस्स जो दु अवबोधो । समणंतरादिगहिदे अवग्गहो सो हवे णेओ ॥ ५७

अर्थ: विषयी और विषयसे युक्त सन्निपातके अनन्तर जो आद्य ग्रहण होता है वह अवग्रह है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ५७ ॥


अवगहिदत्थस्स पुणो सगसगविसएहि जादसारस्स । जं च विसेसग्गहणं ईहाणाणं भवे तं तु ॥ ५८

अर्थ: अपनी अपनी विशेषताओंके साथ जिसके सारांशको ग्रहण कर लिया गया है ऐसे अवग्रहगृहीत पदार्थके विषयमें जो विशेष ग्रहण होता है वह ईहा मतिज्ञान है ॥ ५८ ॥


ईहिदअत्थस्स पुणो थाणू पुरिसो त्ति बहुवियप्पस्स । जो णिच्छियावबोधो सो दु अवाओ वियाणाहि ॥ ५९

अर्थ: यह स्थाणु है या पुरुष, इस प्रकार बहुत विकल्प रूप ईहित पदार्थके विषयमें जो निश्चित ज्ञान होता है उसे अवाय जानना चाहिये ॥ ५९ ॥


तह य अवायमदिरस्स कुंजरसद्दे त्ति णिच्छिदत्थस्स । कालंतरअविसरणं सा होदि य धारणाबुद्धी ॥ ६०

अर्थ: यह ‘हाथीका शब्द है’ इस प्रकार अवाय मतिज्ञानके द्वारा निश्चित अर्थका कालान्तरमें विस्मरण न होना, वह धारणा ज्ञान कहा जाता है ॥ ६० ॥


सोदूण देवदोत्ति य सामण्णेण य विचाररहिदेण । जस्सुप्पज्जइ बुद्धी अवग्गहं तस्स णिद्दिट्ठं ॥ ६१

अर्थ: ‘देवता’ इस प्रकार सुनकर जिसके विचार रहित सामान्यसे बुद्धि उत्पन्न होती है उसके अवग्रह निर्दिष्ट किया गया है ॥ ६१ ॥


हरिहरहिरण्णगब्भा ताणं मज्झेसु को दु सव्वण्हू । एवं जस्स दु बुद्धी ईहाणाणं हवे तस्स ॥ ६२

अर्थ: विष्णु, शिव और हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), [ये देव कहे जाते हैं।] उनके मध्यमें सर्वज्ञ कौन है, इस प्रकार जिसके [ ईहात्मक ] बुद्धि होती है उसके ईहाज्ञान होता है ॥६२॥


जो कम्मकलुसरहिओ सो देवो णत्थि एत्थ संदेहो।
जस्स हु एवं बुद्धी अवायणाणं हवे तस्स ॥ ६३

अर्थ: जो कर्म-मलसे रहित होता है वह देव है, इसमें कोई सन्देह नहीं है; इस प्रकार जिसके निश्चय रूप बुद्धि होती है उसके अवायज्ञान होता है ॥ ६३ ॥


रागद्दोसविरहिदं सव्वण्हू ण य कदावि विस्सरदि।
एवं खलु जस्स मदी धारणाणं हवे तस्स ॥ ६४

अर्थ: राग-द्वेष रहित सर्वज्ञ होता है, इस बातको जो कभी नहीं भूलता है उसके धारणाज्ञान होता है ॥ ६४ ॥


जो दु अवग्गहणाणो सो दुवियप्पो जिणेहि पण्णत्तो।
अत्थावग्गह पढमो तह वंजणवग्गहो बिदिओ ॥ ६५

अर्थ: इनमें जो अवग्रह ज्ञान है उसे जिनदेवने दो प्रकार कहा है- प्रथम अर्थावग्रह तथा द्वितीय व्यञ्जनावग्रह ॥६५॥


दूरेण य जं गहणं इंदियणोइंदिएहिं अत्थिक्कं।
अत्थावग्गहणाणं णायव्वं तं समासेण ॥ ६६

अर्थ: दूरसे ही जो चक्षुरादि इन्द्रियां तथा मनके द्वारा विषयोंका ग्रहण होता है उसे संक्षेपसे अर्थावग्रह ज्ञान जानना चाहिये ॥ ६६ ॥


पासित्ता जं गहणं रसफरसणसद्दगंधविसएहिं।
वंजणवग्गहणाणं णिद्दिट्ठं तं वियाणाहि ॥ ६७

अर्थ: छूकर जो [कर्ण], रस, स्पर्श, शब्द और गन्ध विषयका ग्रहण होता है उसे व्यञ्जनावग्रह निर्दिष्ट किया गया जानो ॥ ६७ ॥


मणचक्खुविसयाणं णिद्दिट्ठा सव्वभावदरिसीहिं।
अत्थावग्गहबुद्धी णायव्वा होदि एक्का दु ॥ ६८

अर्थ: सर्वज्ञोंके द्वारा निर्दिष्ट एक अर्थावग्रह ज्ञान ही मन और चक्षुके विषयमें होता है, ऐसा जानना चाहिये [अभिप्राय यह कि व्यञ्जनावग्रह चक्षु और मनको छोड़कर शेष चार ही इन्द्रियोंसे होता है, किन्तु अर्थावग्रह चक्षु और मनके द्वारा भी होता है] ॥ ६८ ॥


अवसेसइंदियाणं अवग्गहादीणि होति णिद्दिट्ठा।
अट्ठावग्गहणाणं तहवग्गहबंजणं चेव ॥ ६९

अर्थ: शेष इन्द्रियोंके अवग्रहादिक चारों निर्दिष्ट किये गये हैं। उनमें अवग्रह दो प्रकारका है- अर्थावग्रह व व्यञ्जनावग्रह ॥६९॥


सव्वेदे मेलविदा अट्ठावीसा हवंति मदिभेदा।
छच्चदुगुणिदेण तदो चदु पक्खित्तेण ते होंति ॥ ७०

अर्थ: इन सबको मिलानेपर मतिज्ञानके अट्ठाईस भेद होते हैं। वे भेद छह (इन्द्रियां ५ व मन १) को चार (अवग्रहादि) से गुणा करने और उनमें चार जोड़ने (६ × ४ + ४ = २८) से होते हैं ॥ ७० ॥


बहुबहुविहखिप्पेसु य अणिसरिद अणुत्त तह धुवत्थेसु।
उग्गहईहादीया भेदा तह होंति पुव्वुत्ता ॥ ७१

अर्थ: वे पूर्वोक्त अवग्रह-ईहादिक भेद बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त तथा ध्रुव, इन छह पदार्थोंके विषयमें होते हैं ॥ ७१ ॥


एक्केक्कविहेसु तहा णीसरिदाखिप्पउत्तयधुवेसु ।
धारणावायादीया होंति पुणो तेसु णायव्वा ॥ ७२

अर्थ: तथा एक, एकविध, निःसृत, अक्षिप्र, उक्त और अध्रुव, इन छह पदार्थोंके विषयमें धारणा व अवाय आदि ज्ञान होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ७२ ॥


णयणेहिं बहुं पस्सदि बहुसद्दं सुणदि बहुरसं खादि । बहुगंधं अग्घायदि बहुफासं विंददे जीवो ॥ ७३

अर्थ: जीव नयनोंसे बहुत देखता है ( चाक्षुष बहवग्रह ), बहुत शब्द सुनता है ( श्रोत्रज बहवग्रह ), बहुत रसको खाता है ( रसनेन्द्रियज बहवग्रह ), बहुत गन्धको सूंघता है ( घ्राणज बहवग्रह ), और बहुत स्पर्शको जानता है ( स्पर्शनेन्द्रियज बहवग्रह ) ॥ ७३ ॥


अत्थं बहुयं चिंतइ परोक्खबुद्धी दु होइ जीवस्स । एवं अत्थुवलद्धी अवग्गहादी सुणेयव्वा ॥ ७४

अर्थ: जीव बहुत अर्थका चिन्तन करता है (अनिन्द्रियज बहवग्रह), यह जीवकी परोक्षबुद्धि है। इस प्रकारकी अर्थोपलब्धि रूप अवग्रहादि ज्ञान जानना चाहिये ॥ ७४ ॥


बहुवे बहुविहभेदे खिप्पे तहणिस्सिदे अणुत्ते य । होंति धुवे इदरेसु वि अवग्गहादी चदुवियप्पा ॥ ७५

अर्थ: बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त और ध्रुव तथा इनसे इतर ( अल्प, एकविध, अक्षिप्र, निःसृत, उक्त व अध्रुव ) इन अर्थभेदोंमें अवग्रहादि रूप चार प्रकारके ज्ञान होते हैं ॥ ७५ ॥


एवं होंति तदो बहुवादी बारसेहिं संगुणिदा । ईहादियट्ठवीसा तिण्णिसदा होंति छत्तीसा ॥ ७६

अर्थ: इस प्रकार ईहादिक अट्ठाईस भेदोंको बहु आदिक बारह प्रकारके पदार्थोंसे गुणित करनेपर वे तीन सौ छत्तीस ( २८ x १२ = ३३६ ) होते हैं ॥ ७६ ॥


बिदिओ दु जो पमाणो मदिपुव्वो तह य होदि सुदणाणो । सो वि अणेगवियप्पो णिद्दिट्ठो जिणवरिंदेहि ॥ ७७

अर्थ: मतिज्ञानके निमित्तसे उत्पन्न होनेवाला जो द्वितीय श्रुतज्ञान प्रमाण है वह भी जिनेन्द्रोंके द्वारा अनेक भेद युक्त निर्दिष्ट किया गया है ॥ ७७ ॥


धूमं दट्ठूण तहा अग्गीउवलद्धी जह फुडो होइ । णदिपूरं दट्ठूण य उवरि वरिट्ठो त्ति जह बोहो ॥ ७८

जह आगमलिंगेण य लिंगी सव्वण्हु पायडो होइ । मदिपुव्वेण तह च्चिय सुदणाणे पायडो होइ ॥ ७९

अर्थ (गाथा 78 से 79): जिस प्रकार धूमको देखकर स्पष्टतया अग्निकी उपलब्धि होती है, जिस प्रकार नदीपूरको देखकर उपरिम वृष्टिका बोध होता है, तथा जिस प्रकार आगम रूप साधनसे साध्य रूप सर्वज्ञ प्रकट है; उसी प्रकार मतिज्ञानके निमित्तसे श्रुतज्ञान प्रकट होता है [ अभिप्राय यह है कि धूमदर्शन (मतिज्ञान) से होनेवाला अग्निका अनुमान, नदीप्रवाहसे होनेवाला उपरिम वृष्टिका अनुमान, तथा आगमान्यथानुपपत्ति रूप हेतुसे होनेवाला सर्वज्ञके अस्तित्वका अवबोध, यह सब ज्ञान मतिज्ञानपूर्वक उत्पन्न होनेसे श्रुतज्ञानके अन्तर्गत है ।] ॥ ७८-७९ ॥


देवासुरिंदमइदं अणंतसुहपिंडमोक्खफलपडिरं । कम्ममलपडलदलणं पुण्ण पवित्तं सिवं भद्दं ॥ ८०

पुव्वंगभेदमभिण्णं अणंतअत्थेहिं संजुदं दिव्वं । णिच्चं कलिकलुसहदं णिकाचिदमनुत्तरं विमलं ॥ ८१

अर्थ (गाथा 80 से 81): पूर्व व अंग रूप भेदोंमें विभक्त, यह श्रुतज्ञान प्रमाण देवेन्द्रों व असुरेन्द्रोंसे पूजित, अनन्त सुखके पिण्ड रूप मोक्ष फलसे संयुक्त, कर्म रूप मलके पटलको नष्ट करनेवाला, पुण्य, पवित्र, शिव, भद्र, अनन्त अर्थोंसे संयुक्त, दिव्य, नित्य, कलि रूप कलुषको दूर करनेवाला, निकाचित, अनुत्तर, विमल, सन्देह रूप अन्ध-


संवेहतिमिरदलणं बहुविहगुणजुत्त समासोवाणं। मोक्खग्गदारभूदं णिम्मलवरबुद्धिसंदोहं ॥ ८२

सव्वण्हमुहेविणिग्गय पुव्वावरदोसरहिद परिसुद्धं। अखययमणादिणिहणं सुदणाणपमाण णिद्दिट्ठं ॥ ८३

अर्थ (गाथा 80 से 83): कारको नष्ट करनेवाला, बहुत प्रकारके गुणोंसे युक्त, स्वर्गकी सीढ़ी, मोक्षके मुख्य द्वारभूत, निर्मल एवं उत्तम बुद्धिके समुदाय रूप, सर्वज्ञके मुखसे निकला हुआ, पूर्वापरविरोध रूप दोषसे रहित, विशुद्ध, अक्षय और अनादि-निधन कहा गया है ॥ ८०-८३ ॥


वत्तिपमाणेण तहो वयप्पमाणं तदो पुणो होदि। वत्तारो वि वियाणह अट्ठारसदोसपरिहीणो ॥ ८४

अर्थ: व्यक्ति ( अथवा वक्तृ ) की प्रमाणतासे वचनमें प्रमाणता होती है। जो क्षुधा-तृषा आदि अठारह दोषोंसे रहित हो उसे वक्ता ( हितोपदेशी ) जानना चाहिये ॥ ८४ ॥


जो खुहातिसभयहीणो दोसो तह रोगमोहपरिचत्तो। चिंताजरादिरहिदो सो सव्वण्हू समुद्दिठ्ठो ॥ ८५

अर्थ: जो क्षुधा, तृषा व भयसे हीन; राग, द्वेष व मोहसे परित्यक्त; तथा चिन्ता व जरा आदिसे रहित है वह सर्वज्ञ कहा गया है ॥ ८५ ॥


जो मिच्चुजरारहिदो मदविब्भमसेदखेदपरिहीणो। उप्पत्तिरदिविहीणो सो परमेट्ठी वियाणाहि ॥ ८६

अर्थ: जो मृत्यु व जरासे रहित, मद, विभ्रम, स्वेद व खेदसे परिहीन; तथा उत्पत्ति व रतिसे विहीन है उसे परमेष्ठी जानना चाहिये ॥ ८६ ॥


णिंदाविसादहीणो जो सुरमणुएहिं पूजिदो णाणी। अट्ठद्धकम्मरहिदो सो देवो तिहुयणे सयले ॥ ८७

अर्थ: जो निन्दा व विषादसे हीन, देवों एवं मनुष्योंसे पूजित, ज्ञानी और चार घातिया कर्मोंसे रहित है वह सकल त्रिभुवनमें देव है ॥ ८७ ॥


जो कल्लाणसमग्गो अइसयचउतीसभेदसंपुण्णो। वरपडिहेरसहिदो सो देवो होदि सव्वण्हू ॥ ८८

अर्थ: जो सम्पूर्ण कल्याणोंसे युक्त, चौंतीस अतिशयभेदोंसे परिपूर्ण और उत्तम प्रातिहार्योंसे सहित है वह सर्वज्ञ देव है ॥ ८८ ॥


सो जगसामी णाणी परमेट्ठी वीदराग जिणचंदो। जगणाहो जगबंधू हरिहरकमलासणो बुद्धो ॥ ८९

अरहंतपरमदेवो तिहुयणणाहो जगुत्तमो वीरो। पुरुसोत्तमो महंतो तिहुयणतिलओ जगुत्तुंगो ॥ ९०

तवणे अणंतणाणी अणंतविरिओ अणंतसुहधामो। अजरो अमरो अरहो पूय पवित्तो सुहो भद्दो ॥ ९१

अर्थ (गाथा 89 से 91): वह जगत्‌का स्वामी, ज्ञानी, परमेष्ठी, वीतराग, जिन-चन्द्र, जगन्नाथ, जगबन्धु, हरि ( विष्णु ), हर ( शिव ), कमलासन ( ब्रह्मा ), बुद्ध, अरहन्त परमदेव, त्रिभुवननाथ, जगोत्तम, वीर, पुरुषोत्तम, महान्, त्रिभुवनतिलक, जगोत्तंग; अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त वीर्य व अनन्त सुख रूप अनन्तचतुष्टयसे सहित; अजर, अमर, अर्हत्, पूत, पवित्र, शुभ, भद्र, चन्द्र, वृषभ, कमल इत्यादि एक हजार आठ नामोंका धारक होता है। जो गुण अर्थात् इन


चंदो वसहो कमलो अट्ठुत्तरं तह सहस्स णामधरो ।
जो गुणणामसमग्गो सो देवो णत्थि संदेहो ॥ ९२

अर्थ (गाथा 89 से 92): सार्थक नामोंसे समग्र है वह देव होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८९-९२॥


गब्भावयारकाले जम्मणकाले तहेव णिक्खमणे ।
केवलणाणुप्पण्णे परिणिव्वाणम्मि समयम्मि ॥ ९३

पंचसु ठाणेसु जिणो पंचमहाणामपत्तकल्लाणो ।
महदाइड्ढिसमुदए सुरिंदईंदेहिं परिमहिओ ॥ ९४

सेदमलरहिददेहो गोखीरसमाणवण्णवररुहिरो ।
वरवइरसुसंघदणो समचउरंसरीरसंठाणो ॥ ९५

अदिसयरूवेण जुदो णवचंपयसुरहिंगंधवरदेहो ।
अट्ठसयलक्खणधरो अणंतबलविरियसंपण्णो ॥ ९६

पियहियमहुरपलावो सभाबदसअदिसएहिं संजुत्तो ।
सो सव्वण्हू होहिदि णिद्दिट्ठो आगमपमाणे ॥ ९७

अर्थ (गाथा 93 से 97): जो जिन देव गर्भावतारकाल, जन्मकाल, निष्क्रमण, केवलज्ञानोत्पत्तिकाल और निर्वाणसमय, इन पांच स्थानों (कालों) में पांच महाकल्याणकोंको प्राप्त होकर महा ऋद्धियुक्त सुरेन्द्र-इन्द्रोंसे पूजित है तथा स्वेद व मलसे रहित देहका धारक (१-२), गायके दूधके समान वर्णवाले (धवल) उत्तम रुधिरसे संयुक्त (३), उत्तम वज्रवृषभनाराचसंहननसे सहित (४), समचतुरस्रशरीरसंस्थानसे संयुक्त (५), अतिशय (अनुपम) रूपसे युक्त (६), नव चम्पकके सदृश सुरभि गन्धसे परिपूर्ण उत्तम देहका धारक (७), एक सौ आठ लक्षणोंको धारण करनेवाला (८), अनन्त बल-वीर्यसे सम्पन्न (९); और प्रिय, हित एवं मधुर भाषण करनेवाला (१०); इस प्रकार इन दश जन्मातिशयोंसे संयुक्त है वह सर्वज्ञ है; इस प्रकार आगमप्रमाणमें निर्दिष्ट किया गया है ॥९३-९७॥


गाउय तह सयचउरो सुभिक्खणिरुवद्दवो हवइ देसो ।
जहिं जहिं विहरइ अरहो तहिं तहिं होइ णाधव्वो ॥

अर्थ: जहां जहां अरहंत भगवान् विहार करते हैं वहां वहां चार सौ कोश (एक सौ योजन) प्रमाण देश सुभिक्षसे संयुक्त होकर (१) उपद्रव (हिंसा) से रहित होता है (२) ॥९८॥


गगणेण पुणो वच्चइ अकालामिच्चू तहेव परिहीणो ।
उवसग्गसुत्तिरहिदो सव्वाभिमुहो जिणो होइ ॥ ९९

अर्थ: जिन भगवान् अकाल मृत्युसे रहित होते हुए आकाशमार्गसे गमन करते हैं (३), तथा उपसर्ग व भोजनसे रहित होकर (४-५) सर्वाभिमुख (चतुर्मुख) रहते हैं (६) ॥९९॥


तह सव्वविज्जसामी छाही देहस्स तह य परिहीणो ।
अच्छिणिमेसथिरदियो णहलोमावड्डिणिट्ठवणो ॥ १००

घादिक्वयजादेहि य दसभेदेहि अदिसएहिं जुदो ।
एवं जो संजादो सो देवो तिहुयणवखादो ॥ १०१

अर्थ (गाथा 100 से 101): तथा वे सब विद्याओंके स्वामी (७), देहकी छायासे विहीन (८), अक्षिनिमेषसे विरहित (९) और नखों व रोमोंकी वृद्धिके विनाशक होते हैं (१०) । इस प्रकार जो घातिया कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न हुए इन दश अतिशयोंसे युक्त होता है वह त्रिभुवनमें ‘देव’ विख्यात है ॥ १००-१०१ ॥


अदिसयवयणेहि जुदो मागधभव्वेहि दिव्वघोसेहिं । तरस दु रूवं दट्ठु मेत्तीभावो दु जीवाणं ॥ १०२

अर्थ: जिन भगवान् दिव्य घोषवाले अर्धमागधी रूप अतिशयवचनों (दिव्यध्वनि) से युक्त होते हैं (१), उनके रूपको देखकर जीवोंमें मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है (२) ॥ १०२ ॥


जत्थच्छइ जिणणाहो होदि पुणो तस्स विउलयणसंडो । सव्वरिदुहिं संपुण्णो णाणाफलकुसुमसंषण्णो ॥ १०३

अर्थ: जिनेन्द्र देव जहां स्थित होते हैं वहांका विशाल वनखण्ड छह ऋतुओंसे परिपूर्ण होकर नाना फल-फूलोंसे सम्पन्न होता है (३) ॥ १०३ ॥


दप्पणतलसमपट्टा रयणमई होदि दिव्ववरभूमी । जहिं जहिं विहरइ णाहो परमाणंदो दु जीवाणं ॥ १०४

अर्थ: वहांकी दिव्य उत्तम रत्नमय भूमि दर्पणतलके समान पृष्ठवाली हो जाती है (४) । जहां जहां जिनेन्द्र भगवान् विहार करते हैं वहां जीवोंको परमानन्द प्राप्त होता है (५) ॥ १०४ ॥


वादो वि मंदमंदो सुगंधगंधुद्धुरेण गंधेण । फेडंतो वहइ पुणो तणकंटयसक्करदीणि ॥ १०५

अर्थ: वहां सुगन्ध गन्धसे उत्कट ऐसे गन्धसे संयुक्त मंद-मंद वायु भी तृण-कण्टकों व कंकरोंको नष्ट करती हुई बहने लगती है (६) ॥१०५॥


जोयणमेत्तपमाणे गंधोदगवुट्ठि णिवडइ खिदीए । इंदस्स दु आणाए देवेहि विउव्विया संता ॥ १०६

अर्थ: एक योजन प्रमाण पृथिवीपर इन्द्रकी आज्ञासे देवों द्वारा विक्रियासे निर्मित गन्धोदककी वृष्टि गिरती है (७) ॥ १०६ ॥


वरपउमरायकेसरमउल सुखप्फासकणयदलणिवयं । पायण्णासे कमलं पुर-पच्छे सत्त ते होंति ॥ १०७

अर्थ: भगवान्के विहार समय पादन्यास करनेमें उत्तम पद्मराग मणिमय केसरसे युक्त, मृदुल व सुखकर स्पर्शवाले तथा सुवर्णमय पत्रसमूहसे संयुक्त ऐसे कमलकी रचना होती है। वे कमल आगे पीछे सात होते हैं (८) ॥ १०७ ॥


फलभारणमियसालीजवादिबहुसारसस्सधिरुरोमं । हरिसिद इव वरधरणी पस्सती जिणवरविभूदिं ॥ १०८

अर्थ: फलभारसे झुकी हुई शाली धान्य व जौ आदि रूप श्रेष्ठ बहुत शस्यरूपी रोमांचको धारण करनेवाली उत्तम पृथिवी मानों हर्षित होकर जिनेन्द्रकी विभूतिको ही देख रही है (९) ॥ १०८ ॥


सरए णिम्मलसलिलं सर इव गयणं तु भादि रयरहिदं । छहइदिसतिमिरादी णट्ठुदि तहा जिम्हभावं च ॥

अर्थ: तालाबमें निर्मल जल और आकाश तालाबके समान रजसे रहित होकर शोभायमान होता है (१०-११), छह और दो अर्थात् आठों दिशायें अन्धकार आदिसे रहित हो जाती हैं तथा जीवोंमें कुटिल भाव नहीं रहता १२ (?) ॥१०९॥


कंचणमणिपरिणामो आरसहस्सेहि संजुदो दिव्वो । वरधम्मचक्क पुरदो गच्छइ देवेहिं परिवरिओ ॥ ११०

अर्थ: सुवर्ण एवं मणियोंके परिणाम रूप एवं हजार आंरोंसे संयुक्त दिव्य उत्तम धर्मचक्र देवोंसे वेष्टित होकर आगे चलता है (१३)


जो मंगलेहिं सहिदो अदिसयगुणचउद्दसेहिं संजुत्तो ।
देवकदेहि य दिव्वो सो एक्को जगवई होइ ॥ १११

अर्थ: ॥ ११० ॥ जो मंगलोंसे सहित होकर इन देवकृत चौदह (१४) अतिशय रूप गुणोंसे संयुक्त है वह एक ही देव जगत्का स्वामी होता है ॥१११॥


छत्तधयकलसचामरदप्पणसुवदीकथालभिंगारा ।
अट्ठवरमंगलाणि य पुरदो गच्छंति देवस्स ॥ ११२

अर्थ: छत्र, ध्वजा, कलश, चामर, दर्पण, सुप्रतीक (सुप्रतिष्ठ), थाल [बींजना] और भृंगार, ये आठ उत्तम मंगलद्रव्य जिनेन्द्र देवके आगे चलते हैं ॥ ११२ ॥


वेरुलियरयणदंडा मुत्तादामेहिं मंडिया पवरा ।
देवेहिं परिग्गहिदो सिदाधवत्ता विराजंति ॥ ११३

अर्थ: वैडूर्यरत्नमय दण्डसे युक्त, मुक्तामालाओंसे मण्डित और देवोंसे परिगृहीत श्रेष्ठ धवल छत्र विराजमान होते हैं ॥ ११३ ॥


मरगयदंडुत्तुंगा मणिकंचणमंडिया मणभिरामा ।
पवणवसे णच्चंता विजयपडाया मुणेयव्वा ॥ ११४

अर्थ: मरकतमय उन्नत दण्डसे संयुक्त, मणि एवं सुवर्णसे मण्डित, मनको अभिराम और पवनसे प्रेरित होकर नृत्य करनेवाली ऐसी विजयपताका जानना चाहिये ॥ ११४ ॥


वेरुलियवज्जमरगय कक्केयणपउमरायपरिणामा ।
पप्फुल्लकमलवयणा कलसा सोहंति रयणमया ॥ ११५

अर्थ: वैडूर्य, वज्र, मरकत, कर्केतन और पद्मराग इनके परिणाम रूप और विकसित कमलसे संयुक्त मुखवाले ऐसे रत्नमय कलश सुशोभित होते हैं ॥ ११५ ॥


कणयमयचारुदंडा संखिंदुतुसारहारसंकासा ।
सुरदेविकरयलच्छा सोहंति य चामरा बहवा ॥ ११६

अर्थ: सुवर्णमय सुन्दर दण्डसे संयुक्त; शंख, चन्द्र, तुषार व हारके सदृश धवल और देवांगनाओंके हाथोंसे लक्षित ऐसे बहुतसे चामर शोभायमान होते हैं ॥ ११६ ॥


आइच्चमंडलाणिभा णाणामणिरयणदंडकयसोहा ।
देवकुमारकरस्था दप्पणपंती विराजंति ॥ ११७

अर्थ: सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान तथा नाना मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित दण्डसे सुशोभित ऐसी कुमार देवोंके हाथोंमें स्थित दर्पणपंक्तियां विराजमान होती हैं ॥११७॥


णाणाविहवत्थेहि य कमलोहच्छन्न य मंडपग्गेसु ।
देवेहिं परिग्गहिदो सुवदीका ते विराजंति ॥ ११८

अर्थ: मण्डपके अग्र भागोंमें नाना प्रकारके वस्त्रोंसे शोभायमान व देवोंसे परिगृहीत सुप्रतीक (सुप्रतिष्ठ) विराजमान होते हैं ॥११८॥


पुप्फक्खएहिं भरिदा कुंकुमकप्पूरचंदणादीहिं ।
रयणमया वरथाला सोहंति विलासिणिकरस्था ॥ ११९

अर्थ: पुष्पों व अक्षतोंमे तथा कुंकुम, कपूर व चन्दन आदिसे परिपूर्ण ऐसे विलासिनियोंके हाथोंमें स्थित उत्तम रत्नमय थाल शोभायमान होते हैं ॥ ११९ ॥


वज्जिंदणीलमरगयपवालवरकणयरयदपरिणामा ।
अच्छरसाण सिरस्था भिंगारा ते विराजंति ॥१२०

अर्थ: अप्सराओंके सिरपर स्थित ऐसे वे वज्र, इन्द्रनील, मरकत, प्रवाल, उत्तम सुवर्ण और चांदीके परिणाम रूप भृंगार विराजमान होते हैं ॥ १२० ॥


अमरेहि परिग्गहिदा पुरदो अट्ठेव मंगला जस्स ।
गच्छंति जाण होदि हु सो जगसामी ण संदेहो ॥ १२१

अर्थ: जिसके आगे देवोंसे परिगृहीत आठों मंगलद्रव्य चलते हैं वह निःसन्देह जगका स्वामी है, ऐसा जानो ॥ १२१॥


वेरुलियरयणखंधो पवालमिदुपल्लवड्डवरसाहो । मरगयपत्तच्छण्णो असोयवरपायवो दिव्वो ॥ १२२

अर्थ: रत्नमय स्कन्धसे सहित, प्रवाल रूप मृदु पल्लवोंसे व्याप्त ऐसी उत्तम शाखाओंसे सहित और मरकतमय पत्तोंसे आच्छन्न ऐसा दिव्य उत्तम अशोकवृक्ष सुशोभित होता है ॥ १२२ ॥


मंदारकुंदकुवलयणीलुप्पलबउलकमलणिवहेहिं । गुंजंतमत्तमहुयर णिवडइ कुसुमाण वरवुट्ठी ॥ १२३

अर्थ: मन्दार, कुन्द, कुवलय, नीलोत्पल, बकुल और कमलोंके समूहोंसे गूंजते हुए मत्त भ्रमरोंसे युक्त कुसुमोंकी उत्तम वृष्टि गिरती है ॥ १२३ ॥


सत्तसयकुभासेहि य अट्ठारसदेसभाससंजुत्ता । दिव्वमणोहरवाणी णिद्दिट्ठा लोयणाहस्स ॥ १२४

अर्थ: तीन लोकके प्रभु जिनेन्द्र देवकी दिव्य एवं मनोहर वाणी (दिव्यध्वनि) सात सौ कुभाषाओं तथा अठारह देशभाषाओंसे संयुक्त निर्दिष्ट की गई है ॥ १२४ ॥


कडयकडिसुत्तकुंडलमउडाइदिविव्हूसिदा परमरूवा । जक्खिंदा जिणणाहं चामरणिवहेहि विज्‍जंति ॥ १२५

अर्थ: कटक, कटिसूत्र, कुण्डल एवं मुकुट आदिसे विभूषित और अतिशय सुन्दर रूपसे संयुक्त ऐसे यक्षेन्द्र चामरसमूहोंसे जिनेन्द्रदेवको हवा करते हैं ॥ १२५ ॥


फलिहसिलापरिघंडियं कंचणमणिरयणजालविच्छुरियं । सिंहासणं महग्घं सपायपीठं मणभिरामं ॥ १२६

अर्थ: सुवर्ण, मणि एवं रत्नोंके समूहसे खचित और पादपीठसे सहित ऐसा मणिमय शिलाके ऊपर रचा गया महार्घ सिंहासन मनोहर प्रतीत होता है ॥ १२६ ॥


सयलघणतिमिरदलणं दिणयरसयकोडिकिरणसंकासं । भामंडलं विराजइ तिहुयणणाहस्स णायव्वा ॥ १२७

अर्थ: समस्त घने अन्धकारको नष्ट करनेवाला एवं सौ करोड़ सूर्यों की किरणोंके सदृश तेजसे संयुक्त ऐसा त्रिलोकीनाथका भामण्डल सुशोभित होता है ॥ १२७ ॥


पवलपवणाभिणाहयपक्खुभियसमुद्दघोसघणसद्दं । दुंदुभिरवं मनोहरं बहुविहसद्देहिं संजुत्तं ॥ १२८

अर्थ: प्रबल पवनसे ताड़ित होकर क्षोभको प्राप्त हुये समुद्रके निर्घोष अथवा मेघके समान शब्द करनेवाला एवं बहुत प्रकारके शब्दोंसे संयुक्त ऐसा दुंदुभीका शब्द मनोहर होता है ॥ १२८ ॥


वेरुलियविमलदंडं मुत्तामणिहेमदामलंबंतं । छत्तत्तयं विराजइ तिहुयणणाहस्स रमणीयं ॥ १२९

अर्थ: वैडूर्यमणिमय निर्मल दण्डसे युक्त और लटकती हुई मुक्ता, मणि एवं सुवर्णकी मालाओंसे सुशोभित ऐसे त्रिभुवनाथके रमणीय तीन छत्र विराजमान होते हैं ॥ १२९ ॥


एदेहि बाहिरेहि य अब्भंतरगुणगणेहि संजुत्तो । सो होदि देवदेवो जो मुक्‍को कम्मकलुसादो ॥ १३०

अर्थ: जो इन बाह्य गुणों [ प्रातिहार्यों ] एवं अभ्यन्तर गुणगणोंसे संयुक्त तथा कर्म-मलसे रहित होता है वह देवोंका देव है ॥ १३० ॥


मोहणिकम्मस्स खए खाइयसम्मत्तं होइ जीवस्स । तह य जहाक्खादं पुण चारित्तं णिम्मलं तस्स ॥ १३१

अर्थ: मोहनीय (दर्शनमोहनीय) कर्मका क्षय होनेपर जीवके क्षायिक सम्यक्त्व तथा [ चारित्रमोहनीयके क्षयसे ] उसके निर्मल यथाख्यात चरित्र होता है ॥ १३१ ॥


णाणावर णस्स खए होइ अणंतं तु केवलं णाणं । विदियावरणस्स खए केवलवरदंसणं होइ ॥ १३२

अर्थ: ज्ञानावरणका क्षय होनेपर अनन्त केवलज्ञान और द्वितीय आवरण अर्थात् दर्शनावरणका क्षय होनेपर उत्तम केवलदर्शन होता है ॥ १३२ ॥


दाणंतराय खइए अभयपदाणं तु होइ जीवस्स । लाभंतराय खइए दुल्लहलाभं हवे तस्स ॥ १३३

अर्थ: दानान्तरायके क्षीण होनेपर जीवके क्षायिक अभयदान और लाभान्तरायके क्षीण होनेपर उसके दुर्लभ क्षायिक लाभ होता है ॥ १३३ ॥


भोगांतराय खीणे असे सभोगं तु होदि णादव्वा । उवभोगकम्म खइए उवभोगं होइ जीवस्स ॥ १३४

अर्थ: भोगान्तरायके क्षीण होनेपर जीवके समस्त क्षायिक भोग और उपभोगान्तराय कर्मके क्षीण होनेपर क्षायिक उपभोग होता है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १३४ ॥


विरियंतराय खीणे अणंतविरियं हवे समुद्दिट्ठं । णवकेवललद्धिजुदो सो सव्वण्हू ण संदेहो ॥ १३५

अर्थ: वीर्यान्तरायके क्षीण होनेपर अनन्त वीर्य प्रगट होता है, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है। जो उपर्युक्त इन नौ केवललब्धियोंसे संयुक्त होता है वह सर्वज्ञ है, इसमें सन्देह नहीं ॥ १३५ ॥


अमरिंदणमियचलणो अट्ठारससहस्ससीलधरो । चुलसीदिसयसहस्स णिम्मलगुणरयणसंपण्णो ॥ १३६

तस्स वयणं पमाणं पयत्थगब्भं तु तेण उद्दिट्ठं । मोक्खाभिलासिणा खलु घेत्तव्वं तं पयत्तेणं ॥ १३७

अर्थ (गाथा 136 से 137): जिसके चरणोंमें देवोंके इन्द्र नमस्कार करते हैं तथा जो अठारह हजार शीलोंका धारक एवं चौरासी लाख निर्मल गुण रूपी रत्नोंसे सम्पन्न है, उसका तत्त्वार्थविषयक वचन प्रमाण है। मोक्षाभिलाषी जीवको उस (सर्वज्ञ) के द्वारा निर्दिष्ट पदार्थस्वरूपको प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करना चाहिये ॥ १३६-१३७ ॥


जं तेण कहिय धम्मं अणंतसोक्खस्स कारणं सो दुं । तं धम्मं घेत्तव्वं सिवमिच्छंतेण पुरिसेण ॥ १३८

अर्थ: उस सर्वज्ञ देवने जिस धर्मका उपदेश दिया है वह अनन्त सुख ( मोक्षसुख ) का कारण है । अत एव मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषके द्वारा वह धर्म ग्रहण करने योग्य है ॥ १३८ ॥


जवि चलइ मेरुसिहरं चालिज्जंतं पि सुरवरभडेहिं । णो जिणवरेहिं दिट्ठं संचलइ पयासियं सत्थं ॥ १३९

अर्थ: उत्तम देव सुभटोंके द्वारा चलाये जानेपर कदाचित् मेरुशिखर विचलित भी हो सकता है, परन्तु जिनेन्द्रोंके द्वारा उपदिष्ट व प्रकाशित शास्त्र चलायमान नहीं हो सकता । अर्थात् वह पदार्थों के यथार्थ स्वरूपका निरूपक होनेसे प्रतिवादियोंके द्वारा अखण्डनीय है ॥ १३९ ॥


परमेट्ठिभासिदत्थं उड्ढाहोतिरियलोयसंबद्धं । जंबूदीवनिबद्धं पुव्वावरदोसपरिहीणं ॥ १४०

अर्थ: ऊर्ध्व, अधः व तिर्यक् लोकसे सम्बद्ध जो जम्बूद्वीपनिबद्ध शास्त्र है उसका विषय चूंकि परमेष्ठी द्वारा भाषित है, अत एव वह पूर्वापर [ विरोध रूप ] दोषसे रहित है ॥ १४० ॥


गणधरदेवेण पुणो अत्थं लद्धूण गंथियं गंथं । अक्खरपदसंखेज्जं अणंतअत्थेहिं संजुत्तं ॥ १४१

अर्थ: अरहन्तके द्वारा उपदिष्ट उपर्युक्त अर्थको ग्रहण कर फिर गणधर देवके द्वारा वह ग्रन्थके रूपमें रचा गया । वह अक्षरों व पदोंकी अपेक्षा संख्येय होकर भी अनन्त अर्थोंसे संयुक्त है ॥ १४१ ॥ आचार्यपरम्परासे प्राप्त


आयरियेपरंपरेण य गंथत्थं चेव आगयं सम्मं ।
उवसंघरित्तु लिहियं समासदो होइ णायव्वं ॥ १४२

अर्थ: उक्त समीचीन ग्रन्थार्थको ही उपसंहार कर यहां संक्षेपसे लिखा गया है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १४२ ॥


णाणाणरवइमहिदो विगयभओ संगभंगडग्गुक्को ।
सम्मद्दंसणसुद्धो संजमतवसीलसंपण्णो ॥ १४३

जिणवरवय णविणिग्गयपरमागमदेसओ महासत्तो ।
सिरिणिलओ गुणसहिदो सिरिविजयगुरु त्ति विक्खाओ ॥ १४४

अर्थ (गाथा 143 से 144): नाना नरपतियोंसे पूजित, भयसे रहित, संगभेदसे विमुक्त, सम्यग्दर्शनसे शुद्ध; संयम, तप व शीलसे सम्पन्न, जिनेन्द्रके मुखसे निर्गत परमागमके उपदेशक, महासत्त्वशाली, लक्ष्मीके आलयभूत और गुणोंसे सहित ऐसे श्री विजय गुरु विख्यात हैं ॥ १४३-१४४ ॥


सोऊण तस्स पासे जिणवय णविणिग्गयं अमदरुहूदं ।
रइदं किंचुद्देसे अत्थपदं तह य लद्धूणं ॥ १४५

अर्थ: उनके पासमें जिन भगवान्‌के मुखसे निकले हुए अमृतस्वरूप परमागमको सुनकर तथा अर्थ-पदको पाकर कुछ (१३) उद्देशोंमें यह ग्रन्थ रचा है ॥ १४५ ॥


चउरो इसुगारणगो मंदरसेला हवंति पंचेव ।
सामलिदुमा य पंच य जंबूरुक्खादिया पंच ॥ १४६

वीसदि जमगणगा पुण णामिगिरी तेत्तिया समुद्दिद्वा ।
वींसदि देवारण्णा तीसेल य भोगभूमी दु ॥ १४७

कुलपव्वदा वि तीसा चालीसा दिसगया णगा णेया ।
सट्ठी विमंगसरियों महाणदी होंति सदलीया ॥ १४८

पउमद्दहादि य तीसा वक्खारणगा हवंति सयमेगं ।
सत्तरि सय वेअड्ड्ढा रिसभगिरी तेत्तिया चेव ॥ १४९

सदलि सय राजधानी छक्खंडा तेत्तिया समुद्दिद्वा ।
चत्तारिसया कुंडा पण्णासा होंति णायव्वा ॥ १५०

अर्थ (गाथा 146 से 150): मानुषक्षेत्रके भीतर चार इष्वाकार पर्वत (दो धातकीखण्डमें व दो पुष्कारार्द्धमें), पांच मन्दर पर्वत, पांच शाल्मलि वृक्ष और पांच ही जम्बूवृक्षादि भी हैं। वहां बीस (जं. द्वी. ४ + धा. ८ + पु. ८) यमक पर्वत, उतने ही नामिगिरि, बीस देवारण्य और तीस (६ + १२ + १२) भोगभूमियां निर्दिष्ट की गयी हैं। कुलपर्वत भी तीस, दिग्गज पर्वत चालीस (८ + १६ + १६), विभंगा नदियां साठ (१२ + २४ + २४), और गंगादिक महानदियां सत्तर (१४ + २८ + २८) जानना चाहिये। पद्मद्रहादि तीस (६ + १२ + १२), वक्षार पर्वत एक सौ (२० + ४० + ४०), वैताढ्य पर्वत एक सौ सत्तर (३४ + ६८ + ६८), और ऋषभगिरि भी उतने मात्र (३४ + ६८ + ६८) ही हैं। एक सौ सत्तर (३४ + ६८ + ६८) राजधानियां, उतने (१७०) ही छह खण्ड, तथा चार सौ पचास {(१४ + ६४ + १२) + (२८ + १२८ + २४) +


बावीससदा णेया पण्णासा तोरणा समुद्दिद्वा । कुंडाणं णायव्वा महाणदीणं विभंगाणं ॥ १५१

अड्ढाइज्जा दीवा बे उदही माणुसम्मि खेत्तम्मि । अण्णे वि बहुवियप्पा णायव्वा तत्थ जे होंति ॥ १५२

अहतिरिये उड्ढलोएसु तेसु जे होंति बहुवियप्पा दु । सिरिविजयस्स महप्पा ते सव्वे वण्णिदा किंचि ॥ १५३

अर्थ (गाथा 146 से 153): ( २८ + १२८ + २४ ) } कुण्ड जानना चाहिये । महानदियों, विभंगानदियों और कुण्डों सम्बन्धी तोरण बाईस सौ पचास निर्दिष्ट किये गये जानना चाहिये । उक्त मनुष्य क्षेत्रमें अढ़ाई द्वीप, दो समुद्र तथा अन्य भी जो वहां बहुतसे विकल्प ज्ञातव्य हैं; इनके अतिरिक्त अधोलोक, तिर्यग्लोक और ऊर्ध्वलोकमें जो बहुत विकल्प हैं; श्री विजय गुरुके माहात्म्यसे यहां मैंने उन सबका किंचित् वर्णन किया है ॥ १४६-१५३ ॥


गयरायदोसमोहो सुदसायरपारओ महपगब्भो । तवसंजमसंपण्णो विक्खाओ माघणंदिगुरू ॥ १५४

अर्थ: राग, द्वेष व मोहसे रहित; श्रुत-सागरके पारगामी, अतिशय बुद्धिमान् तथा तप व संयमसे सम्पन्न ऐसे माघनन्दि गुरु विख्यात हैं ॥ १५४ ॥


तस्सेव य वरसिस्सो सिद्धंतमहोदहम्मि धुयकल्लुसो । णव [तव] णियमसीलकलियो गुणजुत्तो सयलचंदगुरू ॥ १५५

अर्थ: जिन्होंने सिद्धान्तरूपी समुद्रमें अवगाहन करके कर्म-मलको धो डाला है तथा जो नवीन [तप], नियम व शीलसे सहित एवं गुणोंसे युक्त थे ऐसे सकलचन्द्र गुरु उनके ही उत्तम शिष्य हुए हैं ॥ १५५ ॥


तस्सेव य वरसिस्सो णिम्मलवरणाणचरणसंजुत्तो । सम्मद्दंसणसुद्धो सिरिणंदिगुरु त्ति विक्खाओ ॥ १५६

अर्थ: इनके ही उत्तम शिष्य निर्मल व उत्तम ज्ञान-चारित्रसे संयुक्त और सम्यग्दर्शनसे शुद्ध ऐसे श्री नन्दिगुरु विख्यात हुए ॥ १५६ ॥


तस्स निमित्तं लिहियं जंबुद्दीवस्स तह य पण्णत्ती । जो पढइ सुणइ एदं सो गच्छइ उत्तमं ठाणं ॥ १५७

अर्थ: उनके निमित्त यह जम्बूद्वीपकी प्रज्ञप्ति लिखी गयी है । इसको जो पढ़ता व सुनता है वह उत्तम स्थान (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥ १५७॥


पंचमहव्वयसुद्धो दंसणसुद्धो य णाणसंजुत्तो । संजमतवगुणसहिदो रागादिविवज्जिदो धीरो ॥ १५८

पंचाचारसमग्गो छहजीवदयापरो विगदमोहो । हरिसविसायविहूणो णामेण य वीरनंदि त्ति ॥ १५९

अर्थ (गाथा 158 से 159): पांच महाव्रतोंसे शुद्ध, सम्यग्दर्शनसे शुद्ध, ज्ञानसे संयुक्त, संयम व तप गुणसे सहित, रागादि दोषोंसे रहित, धीर, पंचाचारोंसे परिपूर्ण, छह कायके जीवोंकी दयामें तत्पर, मोहसे रहित और हर्ष-विषादसे विहीन ऐसे वीरनन्दि नामक आचार्य हुए हैं ॥ १५८-१५९ ॥


तस्सेव य वरसिस्सो सुत्तत्थवियक्खणो महपगब्भो । परपरिवादणियत्तो णिस्संगो सव्वसंगेसु ॥ १६०

सम्मत्तअभिगदमणो णाणे तह दंसणे चरित्ते य । परितत्तित्तियममणो बळणंदिगुरू त्ति विक्खाओ ॥ १६१

अर्थ (गाथा 160 से 161): उनके ही उत्तम शिष्य बलनन्दि गुरु विख्यात हुए । ये सूत्रार्थके मर्मज्ञ, अतिशय बुद्धिमान्, परनिन्दासे रहित, समस्त परिग्रहोंमें निर्ममत्व, सम्यक्त्वसे अभिगत मनवाले और ज्ञान, दर्शन व चरित्रके विचारमें मन लगानेवाले थे ॥ १६०-१६१॥ उनके शिष्य गुणगणोंसे कलित; त्रिदण्ड अर्थात् मन, वचन


तस्स य गुणगणकलिदो तिदंडरहिदो तिसल्लपरिसुद्धो । तिण्णि वि गारवरहिदो सिस्सो सिद्धांतपारगो ॥ १६२

तवनियमजोगजुत्तो उज्जत्तो णाणदंसणचरित्ते । आरंभकरणरहिदो णामेण य पउमनंदि त्ति ॥ १६३

अर्थ (गाथा 162 से 163): व कायकी दुष्प्रवृत्तिसे रहित; माया, मिथ्यात्व व निदान रूप तीन शल्योंसे परिशुद्ध; रस, ऋद्धि और साता इन तीन गारवोंसे रहित; सिद्धान्तके पारंगत; तप, नियम व समाधिसे युक्त; ज्ञान, दर्शन व चारित्रमें उद्यक्त; और आरम्भ क्रियासे रहित पद्मनन्दि नामक मुनि (प्रस्तुत ग्रन्थके रचयिता) हुए हैं ॥ १६२-१६३ ॥


सिरिविजयगुरुसयासे सोऊणं आगमं सुपरिसुद्धं । मुणिपउमनंदिणा खलु लिहियं एयं समासेण ॥ १६४

अर्थ: श्री विजय गुरुके पासमें अतिशय विशुद्ध आगमको सुनकर मुनि पद्मनन्दिने इसको संक्षेपसे लिखा है ॥ १६४ ॥


सम्मदंसणसुद्धो कदवदकरमो सुसीलसंपण्णो । अणवरयदाणसीलो जिणसासणवच्छलो वीरो ॥ १६५

णाणागुणगणकलिओ गरवइसंपूजिओ कलाकुसलो । वारा-णयरस्स पहू णरुत्तमो संत्तिभूवालो ॥ १६६

अर्थ (गाथा 165 से 166): सम्यग्दर्शनसे शुद्ध, व्रत क्रियाको करनेवाला, उत्तम शीलसे सम्पन्न, निरन्तर दान देनेवाला, जिनशासनवत्सल, वीर, अनेक गुणगणोंसे कलित, नरपतियोंसे पूजित, कलाओंमें निपुण और मनुष्योंमें श्रेष्ठ ऐसा शक्ति भूपाल ‘वारा’ नगरका शासक था ॥ १६५-१६६ ॥


पोक्खरणिवाविदरे बहुभवणविहूसिए परमरम्मे । णाणाजणसंकिण्णे धणधण्णसमाउले दिव्वे ॥ १६७

सेम्मादिट्ठिजणोघे मुणिगणणिवहेहि मंडिए रम्मे । देसम्मि पारियत्ते जिणभवणविहूसिए दिव्वे ॥ १६८

जंबुदीवस्स तहा पण्णत्ती बहुपयत्थसंजुत्तं । लिहियं संखेवेण वाराए अच्छमाणेण ॥ १६९

अर्थ (गाथा 167 से 169): प्रचुर पुष्करिणियों व वापियोंसे संयुक्त, बहुत भवनोंसे विभूषित, अतिशय रमणीय, नाना जनोंसे संकीर्ण, धन-धान्यसे व्याप्त, दिव्य, सम्यग्दृष्टि जनोंके समूहसे सहित, मुनिगणसमूहोंसे मण्डित, रम्य और जिनभवनोंसे विभूषित ऐसे दिव्य पारियात्र देशके अन्तर्गत वारा नगरमें स्थित होकर मैंने अनेक विषयोंसे संयुक्त इस जम्बूद्वीपकी प्रज्ञप्तिको संक्षेपसे लिखा है ॥ १६७-१६९ ॥


छदुमत्थेण विरइयं जं किं पि हवेज्ज पवयणविरुद्धं । सोधंतु सुगीदत्था पवयणवच्छलदाए णं ॥ १७०

अर्थ: मुझ जैसे अल्पज्ञके द्वारा रचे गये इसमें जो कुछ भी आगमविरुद्ध लिखा गया हो उसको विद्वान् मुनि प्रवचनवत्सलतासे शुद्ध करलें ॥ १७० ॥


पुव्वंगविउलविडवं वत्थुवसाहाहि मंडियं परमं । पाहुडसाहाणिवहं अणिओगपलाससंछण्णं ॥ १७१

अर्थ: अंग-पूर्व रूप विशाल विटपसे संयुक्त, वस्तुओं (उत्पादपूर्वादिके अन्तर्गत अधिकारविशेषों) रूप उपशाखाओंसे मण्डित, श्रेष्ठ, प्राभृतरूप शाखाओंके समूहसे सहित, अनुयोगों रूप पत्तोंसे व्याप्त, अभ्युदय रूप प्रचुर


अब्भुदयकुसुमपउरं णिस्सेयसअमदसादफलणिवहं । सुददेवदामिरक्खं सुकप्पतरुं णमंसामि ॥ १७२

अर्थ (गाथा 171 से 172): पुष्पोंसे परिपूर्ण, अमृतके समान स्वादवाले निश्रेयस रूप फलोंके समूहसे संयुक्त और श्रुतदेवतासे रक्षणीय ऐसे श्रुत रूप कल्प-तरुको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १७१-१७२ ॥


चारुगुणसलिलपउरं संजमउत्तुंगडम्मिसंघायं । णिम्मलतवपायालं समिदिमहामच्छसंछण्णं ॥ १७३

जमणियमदीवपउरं वरगुत्तिगंभीरसीलमज्जादं । णिव्वाणरयणणिवहं धम्मसमुद्दं णमंसामि ॥ १७४

अर्थ (गाथा 173 से 174): सुन्दर गुणों रूप जलकी प्रचुरतासे संयुक्त, संयम रूप उन्नत ऊर्मिसमूहसे सहित, निर्मल तप रूप पातालोंसे परिपूर्ण, समितियों रूपी महामत्स्योंसे व्याप्त, यम-नियम रूप प्रचुर द्वीपों (जलजन्तुविशेषों) से संयुक्त, श्रेष्ठ गुप्तियों एवं गम्भीर शील रूप मर्यादासे सहित और निर्वाण रूप रत्नसमूहसे सम्पन्न ऐसे धर्म रूप समुद्रको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १७३-१७४ ॥


घणघादिकम्मदलणं केवलवरणाणदंसणपहवं । भव्वयणपउमबंधुं तिलोयणाहं गुणसमिद्धं ॥ १७५

विबुधबईमउडमणिगणकरसञ्चिलसुधोयचारुपयक मलं । वरपउमणंदिणमियं वीरजिणिंदं णमंसामि ॥ १७६

अर्थ (गाथा 175 से 176): दृढ़ घातिया कर्मोंको नष्ट करनेवाले, केवलज्ञान व केवलदर्शन रूप उत्तम दीपकसे युक्त, भव्य जनों रूप पद्मोंको विकसित करनेके लिये सूर्य समान, तीनों लोकोंके अधिपति, गुणोंसे समृद्ध, विबुधपतियों अर्थात् इन्द्रोंके मुकुटोंमें स्थित मणिगणोंके किरण रूप जलमें भले प्रकार धोये गये सुन्दर चरण-कमलोंसे संयुक्त और श्रेष्ठ पद्मनन्दिसे नमस्कृत ऐसे वीर जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥ १७५-१७६ ॥