जम आन अचानक दाबैगा | Jam An Achanak Dabaiga

जम आन अचानक दाबैगा

जम आन अचानक दाबैगा ।।टेक।।

छिनछिन कटत घटत थित ज्यौं जल, अंजुलिको झर जावैगा ।
जन्म तालतरुतैं पर जियफल, कोंलग बीच रहावैगा ।
क्यौं न विचार करै नर आखिर, मरन महीमें आवैगा ।।१।।

सोवत मृत जागत जीवत ही, श्वासा जो थिर थावैगा ।
जैसैं कोऊ छिपै सदासौं, कबहूं अवशि पलावैगा ।।२।।

कहूं कबहूं कैसें हू कोऊ, अंतकसे न बचावैगा ।
सम्यकज्ञानपियूष पिये सौं, ‘दौल’ अमरपद पावैगा ।।३।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १७४

अर्थ

मनुष्य संसारकी प्रवृत्तियोंमें इतना उलझा रहता है कि उसे इस बातकी कोई सुधि ही नहीं हो पाती कि उसके जीवनका सर्वोच्च लक्ष्य क्या है ? इतना ही नहीं; वह अपनी इन विविध प्रवृत्तियोंमें यह भी ध्यान नहीं रख पाता कि उसकी आयुके कितन अमूल्य क्षण व्यर्थ निकल गये और अब कितने शेष रह गये हैं। उसे यह भी भान नहीं होता कि हमारा संसारमें रहना सदा के लिए नहीं है, आयुकर्मक अनुसार वह क्षण कभी भी आ सकता है, जब हमें अपने इष्ट-बन्धुओंको बिलखता हुआ छोड़कर संसारसे इस पर्यायसे विदा लेनी होगी और परभवमें जन्म लेना पड़ेगा । कलाकार पं० दौलतरामजी इस प्रकारक मानवको बड़ी कुशलता और स्पष्टताक साथ संबोधते हैं। वे कहते हैं:- “जम आन अचानक दाबैगा, जम आन अचानक दाबैगा । छिन-छिन कटत घटत थित ज्यों जल, अंजुलिको झर जावेगा । जम आन अचानक दाबैगा ।।” अरे मानव, पता नहीं, यमराज आकर तुझे कब अचानक परलोक पहुँचा दे । जिस प्रकार अंजुलीका पानी प्रतिक्षण बूंद-बूंदक रूपमें गिरता रहता है और एक समय आता है जब सम्पूर्ण अंजुली जलसे रिक्त हो जाती है, उसी प्रकार मानव, तेरी आयु भी प्रतिक्षण घट रही है और वह समय भी आ सकता है जब तुम्हारी यह आय् समाप्त हो जाय और तुम्हें परलोक-यात्रा करनी पड़े । अरे मानव, पता नहीं, यमराज तुझे कब परलोक पहुँचा दे ।

स्रोत: अध्यात्म पदावली।

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