तर्ज : जैसो समकित महा सुखखान…
जैसो मुनिवर करें उपकार, दूजा कोई नहीं।
जैसो गुरुवर करें उपकार, दूजा कोई नहीं ।। टेक ।।
मुनिवर आत्मस्वरूप दिखावें।
शाश्वत चित्स्वरूप दर्शावें ।।
रागादिक ते भिन्न बतावें।
रत्नत्रयमय मार्ग सिखावें ।।
जैसे मुनिवर जगत हितकार… ।।।।
गुरु तत्त्वों का ज्ञान करावें।
निज-पर भेदज्ञान सिखलावें ।।
हेयरूप परभाव छुड़ावें।
उपादेय ज्ञायक दर्शावें ।।
मुनिमार्ग महासुखकार… ।।2।।
परम पवित्र मुनीश्वर जीवन।
ब्रह्मचर्य जिनका अति पावन ।।
निरखत ही आनंद उपजावे।
आकुलता सहजहिं मिट जावे ।।
शोभें मुनिवर महाअविकार… ।।3।।
यही भाव मुनि संगति पावें।
अपना जीवन सफल बनावें।।
दीक्षा धारें निज पद ध्यावें।
कर्म कलंक समूल नशावें ।।
पावें शिवपद परम सुखकार… ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २१६ से २१७
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ११३ से ११४