जैसो अपनो ज्ञायक भगवान्, दूजो कोई नहीं | jaiso apano j nayaka bhagavana dujo koi nahim

तर्ज : ऐसो समकित महा सुखखान …

जैसो अपनो ज्ञायक भगवान्, दूजो कोई नहीं ।। टेक ।।

जय-जय पंच परम गुरु सार, दर्शायो निजपद अविकार ।
ध्रुव परमेष्ठी मंगल रूप, भाऊँ नित चैतन्य स्वरूप।।
पाऊँ परमानंद अम्लान ।। दूजो. ।। 1।।

पाकर भेदज्ञान का मंत्र, मोह नाश साधू शिवपंथ।
हे प्रभु निज प्रभुता प्रगटाय, तिष्ठूँ तुम ढिंग आनंद पाय ।।
होऊँ साक्षात् ज्ञाता महान्।। दूजो. ।। 2।।

प्रभु साक्षी में जग्यो विवेक, मंगलमय शुद्धातम एक।
तीन लोक में परम महान्, अनन्य शरण ज्ञायक भगवान्।।
ज्ञायक तो ज्ञायक ही जान।। दूजो. ।। 3।।

शुद्धातम ही इक आराध्य, शुद्धातम ही साधन साध्य।
होय प्रत्यक्ष स्वानुभव माँहि, सहजहिं परमानंद विलसाय ।।
फिर परिणति भी हो नहिं म्लान ।। दूजो. ।। 4 ।।

हो निर्द्वन्द स्वरूप हि ध्याय, शिव सुख को बस एक उपाय ।
तज झूठे संकल्प-विकल्प, स्वयं सदैव रहूँ अविकल्प ।।
जामें धोखा नहीं सत्य मान।। दूजो. ।। 5।।

निज को भूल होय अपवित्र, जाने तब हो सहज पवित्र।
यह पर्याय स्वभाव सुजान, रहे भिन्न ज्ञायक भगवान्।।
जाको आश्रय महा सुखदान ।। दूजो. ।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३२९ से ३३०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’