जैन विद्या के विविध आयाम
डॉ. वीरसागर जैन
प्रकाशक: izlkkd
अनुक्रमणिका
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- जैनधर्म
- अत्यन्त सरल है जैनधर्म
- धर्मत्मा ही कुशल है
- भक्ति की शक्ति
- वर्तमान को वर्द्धमान की आवश्यकता है
- परिवार के सदस्यों को भी धर्म के मार्ग में लगाओ
- जैनदर्शन
- जैनशास्त्र हम क्यों पढ़ें?
- अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता
- जैनदर्शन की दार्शनिकता
- जैनदर्शन और आधुनिक विज्ञान की तुलना
- जैनदर्शन और वाटर्न्ट ब्रेट्रिन
- ‘दत्त ज्ञान क्रियाहीनः’
- जैनदर्शन में ज्ञानमीमांसा
- जैनदर्शन में आत्मा एक नाम अनेक
- जैनदर्शन स्यादवाद एवं अनेकान्त : एक बौद्धिक चिन्तन
- आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में
- जैन विद्या के छात्रों को निर्देश
- दुरात्माएं स्फुटयते मतिः
- जैन अध्यात्म
- समयसारस्वरूपबोधम्
- आचार्य कुन्दकुन्द का दार्शनिक वैशिष्ट्य
- समयसार और परमसमय
- प्रवचनसारोऽपि : विरक्तुम वा अनुरक्तुम?
- तथा सम्यक् सम्यग्दर्शन
- दुनिया के ‘दस आश्चर्य’
- यह जगत् एक खुली किताब है
- ज्ञान और विवेक
- मन और समय के स्थान
- ‘विदेशी बच्चे’
- ज्ञान और आनन्द का महत्त्व एवं एकाग्रचित्त करने के दीपावली
- समयसार में परिग्रह-अपरिग्रह की अवधारणा
- जैन न्याय
- जैन न्याय का प्रारम्भिक परिचय
- जैनदर्शन में ‘सहाय’ का स्वरूप
- जैन आचार
- क्रोध से बचने के अनेक उपाय
- सामाजिक भावना
- पाँच समितियों का व्यापक अर्थ : श्रावकों की अपेक्षा से
- जैनचार्यों का सामाजिक चिन्तन
- बड़ा पुरुष है भगवान् महावीर की अहिंसा
- जैनधर्म : एक अद्भुत चिन्तन
- जैन साहित्य
- जैन साहित्य का महत्त्व
- सूत्र के बत्तीस दोषों का संक्षिप्त विवेचन
- ‘अशुद्ध पुस्तक शत्रु’
- शास्त्रों के श्रोता को भी विद्वान् होना चाहिए
- जैनचार्यों का गणित-विज्ञान
- प्रणय-स्तुति
- मोक्षमार्गप्रकाशक की सबसे बड़ी विशेषता
- जैनदर्शन में शिक्षा, शिक्षण और शिक्षार्थी
- जैन ग्रंथोद्धार
- तीर्थंकर नेमिनाथ और नारायण श्रीकृष्ण
- गोम्मटसार छन्दोद्वय
- ‘कषायपाहुड़’ का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक वैशिष्ट्य
- जायधवला : एक दृष्टि में
- जायधवला की विषयवस्तु
- प्राकृत भाषा
- पं. दौलतराम कासलीवाल का प्राकृतभाषा के प्रति अनुराग
- खाखेत-शिलालेख में निहित दार्शनिक तत्त्व
- प्राकृत भाषा में लोरी
- आरदी बाहुबली सामिणो
- बाहुबलि-स्तंभ
- देव-सत्थ-गुरु-वंदणा
- अत्यन्त सरल है जैनधर्म
- धर्मत्मा ही कुशल है
- भक्ति की शक्ति
पूरी पुस्तक (PDF): जैन_विद्या_के_विविध_आयाम.pdf (0.6 MB)