पत्रांक ६ — द्रव्य का स्वरूप | Patrānk 6 — Dravya kā Svarūp
२० नवम्बर १९९३
प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
बिटिया ! द्रव्य, गुण, पर्याय सर्व सिद्धांतों की नींव है । इन्हें समझे
बिना शास्त्र में प्रवेश नहीं हो सकता । अतः हमें सबसे पहले इसी की
जानकारी लेनी है । इसका बारंबार वाचन और अभ्यास करना चाहिए ।
जिसे द्रव्य, गुण, पर्याय समझ में आ जाते हैं, वह सब शास्त्रों का अर्थ
समझने लगता है; फिर उसे शास्त्रों का यथार्थ अर्थ समझने में कोई
कठिनाई नहीं होती ।
हमने गत पत्र में संक्षेप में विश्व का स्वरूप समझा । जहाँ जीवादिक
सब द्रव्य दिखायी देते हैं वह लोक है । ‘लोक’ शब्द का अर्थ होता है
देखना । अवलोकन करना शब्द इसी लोक शब्द से तैयार हुआ है, उसका
भी अर्थ देखना ऐसा होता है ।
ये सब द्रव्य नित्य हैं । इनका कभी नाश नहीं होता । तथा जितने हैं
उतने ही रहते हैं, घटते बढ़ते नहीं हैं, नवीन उत्पन्न भी नहीं होते । इनकी
आदि नहीं है अर्थात् वे अनादि हैं और उनका नाश नहीं होता, अंत नहीं होता,
अर्थात् अनंत हैं । सभी द्रव्य अनादिअनंत होने से उनके समूह से बना हुआ
यह विश्व भी अनादिअनंत है ।
इसे जानने से हमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि नाश के भय से
हम निर्भय हो जाते हैं । ‘इस जगत का नाश होगा, कुछ करोड वर्षों के बाद
पृथ्वी का नाश होगा’ आदि बातें सुनकर हमें भय लगता है । उससे निर्भय
हो जाते हैं । ‘अरे ! मैं भी मरूँगा, मेरा नाश होगा’ इस विचार से जो
हमारी नींद हराम हो जाती है; विश्व का अविनाशी स्वरूप जानने से इन
आकुलताओं का अभाव होता है ।
जरा सोचो तो सही, विश्व का स्वरूप जाननेपर भी हमें बहुत लाभ
हो गया है । मैं एक अनादिअनंत जीवद्रव्य हूँ और मेरा कभी भी नाश
नहीं होगा यह समझते ही कितनी शांति अनुभव में आती है । मेरा कोई
रक्षणकर्ता नहीं है और संहारकर्ता भी नहीं है यह समझते ही सब हीनदीनपना
नष्ट हो जाता है ।
विश्व का स्वरूप सर्वज्ञ ने स्वयं जाना और उसका कथन किया । वह
कथन शास्त्रों द्वारा हमने जाना । इसका अर्थ यह हुआ कि सर्वज्ञ ने जो
प्रत्यक्ष जाना उसे हमने परोक्ष रीति से जाना अर्थात् हम भी अरहंत-सिद्ध के
जाति-कुल के चेतनमय, ज्ञानमय हैं यह सिद्ध हुआ । ऐसा होनेपर ज्ञान की
और स्व की महिमा आये बिना नहीं रहती ।
विज्ञान में ऐसा सिद्धांत है कि Matter is always constant. It is
never destroyed. It only changes its form. ‘Matter’ अर्थात्
पुद्गल के बारे में यह कथन है; क्योंकि वैज्ञानिकों ने अब तक मात्र पुद्गल
का ही अभ्यास किया है । जो बात एक द्रव्य के बारे में सच है वही सब
द्रव्यों के बारे में सच है कि सब द्रव्य नित्य हैं, द्रव्य का कभी नाश नहीं होता
मात्र उनकी अवस्थायें बदलती हैं ।
रीना, स्कूल में तुमने ‘शोभादर्शक यंत्र’-कॅलिडिओस्कोप बनाया था,
याद है ? उसमें रंगीन कांच के टुकडे ड़ालकर बंद कर दिया था । शोभादर्शक
जैसे-जैसे घुमाते थे वैसे-वैसे नये-नये आकार, अनेक आकृतियाँ - Combinations
उसके अंदर बनती हुयी दिखायी देती थी । तद्वत् ही द्रव्य जितने थे उतने ही
हैं, नित्य ही हैं उनकी अवस्थायें सतत नयी-नयी होती हैं ।
हमें दृश्यमान चीज़ों की विविध रचनायें, उनकी नयी उत्पत्ति और उनके
विनाश ये सब दिखायी देते हैं । वे उत्पत्ति और विनाश अवस्थाओं के हैं, द्रव्यों
के नहीं । द्रव्य कायम टिकते हैं और मात्र उनकी अवस्थायें बदलती हैं ।
‘द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं’ यह समझने के बाद सहज ही
मन में सवाल उठता है कि द्रव्य किसे कहते हैं ? उत्तर है - ‘गुणों के
समूह को द्रव्य कहते हैं’ । द्रव्य के अन्य नाम पदार्थ, वस्तु, अर्थ, चीज़ आदि
हैं । विश्व की परिभाषा में ‘द्रव्यों का समूह विश्व है’ कहा था, वहाँ द्रव्यों का
एक दूसरे के साथ एकक्षेत्रावगाह संबंध था । अब द्रव्य की परिभाषा में
जो ‘गुणों का समूह’ ऐसा कहा है उसमें गुणों का द्रव्य के साथ नित्यतादात्म्य
संबंध होता है और गुणों का एक दूसरे के साथ अविनाभावी संबंध होता
है । एकक्षेत्रावगाह संबंध के बारे में हमने गत पत्र में विस्तार से जान ही
लिया है । नित्यतादात्म्य संबंध क्या है ? उसके बारे में अब विचार करेंगे ।
नित्य याने कायम, सदैव । तादात्म्य याने एकरूपता, जो कभी भिन्न नहीं
होता । गुणों का द्रव्य के साथ नित्यतादात्म्य संबंध है अर्थात् द्रव्य से गुण
कभी भी भिन्न नहीं हो सकते । जैसे उष्णता अग्नि का गुण है उसे अग्नि से
भिन्न नहीं कर सकते । मिठास शक्कर का गुण है उसे शक्कर से भिन्न नहीं
कर सकते । ठीक उसीतरह गुण कभी भी द्रव्य से भिन्न नहीं हो सकते ।
गुणों का एक दूसरे से अविनाभावी संबंध होता है अर्थात् जहाँ एक गुण
है वहाँ उस द्रव्य के अन्य गुण हैं ही । जैसे, शक्कर में सफेदी और मिठास
गुण हैं तो सफेदी और मिठास इनका अविनाभावी संबंध है । उन दोनों को
अलग नहीं कर सकते । सोने में पीलापना और वजनपना गुण हैं । उनका
एक दूसरे से अविनाभावी संबंध है । पुद्गलद्रव्य के स्पर्श, रस, गंध, वर्ण
आदि गुणों का आपस में अविनाभावी संबंध है । जहाँ एक गुण है वहीं अनंत
गुण हैं । इनके इस समूह को ही द्रव्य कहते हैं । ये गुण द्रव्य से अलग
नहीं हो सकते और ना ही नये गुण द्रव्य में जोड़े जा सकते हैं । द्रव्य में
जितने अनंत गुण हैं उतने ही रहते हैं । जितने अनंत गुण अरिहंत-सिद्धों में
हैं उतने ही अनंत गुण प्रत्येक जीवद्रव्य में हैं । तुम्हारे में और मुझमें भी
अनंत गुण हैं । परमाणु में भी अपने-अपने अनंत गुण हैं । प्रत्येक द्रव्य स्वयं
में परिपूर्ण है ।
ये गुण सामान्य और विशेष ऐसे दो प्रकार के होते हैं । सामान्य
अर्थात् जो सब द्रव्यों में पाये जाते हैं । प्रत्येक द्रव्य के अपने-अपने स्वतंत्र
ऐसे सभी द्रव्यों में पाये जानेवाले अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व,
प्रदेशत्व आदि अनंत सामान्य गुण हैं । जो गुण सब द्रव्यों में न रहकर किसी
विशिष्ट द्रव्य में पाये जाते हैं, उन्हें ‘विशेष गुण’ कहते हैं । सामान्य गुणों
के द्वारा द्रव्य की सिद्धि होती है और विशेष गुणों के द्वारा वह कौनसा विशिष्ट
द्रव्य है यह पहचाना जा सकता है । जैसे, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि
पुद्गलद्रव्य के विशेष गुण हैं । जिस द्रव्य में ये गुण पाये जाते हैं वह
पुद्गलद्रव्य है ऐसा हम पहचान सकते हैं ।
ज्ञान, दर्शन, सुख, चारित्र, वीर्य आदि जीवद्रव्य के विशेष गुण हैं ।
इसलिए जिस द्रव्य में ज्ञानादि गुण पाये जाते हैं वह जीवद्रव्य है, ऐसा हम
पहचान सकते हैं । सुख भी जीवद्रव्य का विशेष गुण है । वह जीवद्रव्य में
ही है, अन्य द्रव्यों में नहीं है । पुद्गलद्रव्य में सुख नाम का गुण ही नहीं
है । फिर भी हम अज्ञानी जन तो पूरी जिंदगी सुख पाने के लिए धनसंपत्ति,
घरबार आदि पुद्गलद्रव्य के संग्रह में ही लगे रहते हैं । मानो सारा सुख
इन्हीं में भरा हो ।
विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य हैं उनके विशेष गुणों द्वारा उनका
स्वरूप देखते हैं ।
जीवद्रव्य – जिसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख, वीर्य, क्रियावती शक्ति
आदि विशेष गुण पाये जाते हैं, वह जीवद्रव्य है ।
पुद्गलद्रव्य - जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, क्रियावती शक्ति आदि
विशेष गुण पाये जाते हैं वह पुद्गलद्रव्य है । जीव को स्पर्श, रस, गंध, वर्ण
आदि गुणों का ज्ञान होता है, परंतु जीव में ये कोई भी गुण नहीं हैं । जीव
और पुद्गल इन दोनों द्रव्यों में क्रियावती शक्ति है, उस शक्ति के कारण
जीव और पुद्गल या तो गमन करते हैं या स्थिर रहते हैं । गमन करना
या स्थिर रहना क्रियावती शक्ति का कार्य है । अन्य चार द्रव्यों में यह गुण
नहीं है । अन्य चार द्रव्य अनादि से स्थिर ही हैं । उनका गमन या हलन-
चलन नहीं होता ।
धर्मद्रव्य – स्वयं गमन करते हुये जीव और पुद्गलों को गमन करने
में जो निमित्त होता है उसे धर्मद्रव्य कहते हैं । धर्मद्रव्य जबरदस्ती गमन नहीं
कराता, वह मात्र गमन में अनुकूल रहता है । जैसे स्वयं गमन करते हुये
मछली को पानी अनुकूल रहता है । कुओ का पानी स्वतः स्थिर है, परंतु
मछली को गमन में निमित्त होता है । वैसे धर्मद्रव्य स्वयं स्थिर है परंतु जीव
और पुद्गलों को गमन में अनुकूल रहता है । ‘गतिहेतुत्व’ धर्मद्रव्य का विशेष
गुण है ।
अधर्मद्रव्य – गमनपूर्वक स्थिर होनेवाले जीव और पुद्गलों को स्थिर
होने में जो निमित्त होता है वह अधर्मद्रव्य है । जैसे पथिक को वृक्ष की छाया
ठहरने में निमित्त होती है । वैसे गमन करता हुआ जीव या पुद्गल स्वयं
स्थिर होता है, तब अधर्मद्रव्य उसे स्थिर होने में अनुकूल रहता है । इसलिए
‘स्थितिहेतुत्व’ अधर्मद्रव्य का विशेष गुण है ।
आकाशद्रव्य – सभी द्रव्यों को अवगाहना देना अर्थात् ठहरने के लिए
जगह देना आकाशद्रव्य का विशेष गुण है । इसे ‘अवगाहनहेतुत्व’ कहते
हैं । हमें जो नीला-नीला आकाश दिखायी देता है, वही आकाशद्रव्य है ना ?
नहीं, बिलकुल नहीं; क्योंकि जो दिखायी देता है, जिसमें वर्ण है, वह तो
पुद्गलद्रव्य है । पुद्गल को छोड़कर अन्य पाँच द्रव्य तो अरूपी हैं, अमूर्तिक
हैं । हम जिसे Space कहते हैं, अवकाश कहते हैं वह आकाशद्रव्य है ।
इसका अनंत विस्तार है, इसका अंत ही नहीं है । आकाशद्रव्य के मध्य में
जहाँ छहों द्रव्य रहते हैं, उसे लोकाकाश कहते हैं और उसके सभी ओर
दसों दिशाओं में अनंत-अनंत अलोकाकाश है । वर्तमान में वैज्ञानिकों को
ज्ञात जो ग्रह, तारे, नक्षत्र, सूर्य आदि हैं वे तो लोकाकाश के एक छोटे से
हिस्से में हैं ।
आकाशद्रव्य अन्य द्रव्यों को अवगाहन देता है इसका अर्थ वह उन
वस्तुओं के (द्रव्यों के) सिर्फ इर्द-गिर्द रहता है, ऐसा नहीं है । सब द्रव्यों के
आर-पार आकाशद्रव्य व्याप्त है । यदि हम लोहे का घन देखेंगे तो वह
आकाशद्रव्य में है और आकाशद्रव्य उसके अंदर और बाहर सर्वत्र व्याप्त है ।
वैसे देखा जाये तो छहों द्रव्य एक दूसरे को अवगाहन देते हैं अर्थात् एक ही
जगह में रहते हैं, उनमें परस्पर एकक्षेत्रावगाह संबंध है ।
कालद्रव्य - लोकाकाश में असंख्यात प्रदेश हैं । इसमें प्रत्येक प्रदेशपर
एक-एक कालद्रव्य स्थित है । सभी द्रव्यों के परिणमन में निमित्त होना
(परिणमन हेतुत्व) कालद्रव्य का विशेष गुण है । हमें जो क्षण, मिनिट, घण्टा,
दिन, महिना, काल (Time) समझ में आता है उसे व्यवहारकाल कहते हैं ।
कालद्रव्य की एक पर्याय को समय कहते हैं, ऐसे असंख्यात समयों का एक
सैकण्ड़ बनता है ।
इसतरह गुणों के द्वारा द्रव्य को पहचाना जाता है । तत्त्वों की भाषा में
गुण लक्षण है और द्रव्य लक्ष्य है । जैसे ज्ञान यह लक्षण है और आत्मा लक्ष्य
है । जिसमें ज्ञान है वही आत्मा है । आत्मा को जानना है तो लक्षण द्वारा
जानना होगा, अनुभवना होगा, दूसरा कोई भी उपाय नहीं है । भगवान की
पूजा करने से, उपवास करने से, लाखों रुपया दान देने से आत्मा का अनुभव
नहीं होगा । परंतु जहाँ ज्ञान लक्षण है वहाँ दृष्टि करने से, वहाँ उपयोग
केंद्रित करने से, अंतर्मुख होकर चेतना लक्षण द्वारा जानने से ही आत्मा
अनुभव में आ सकता है । तत्त्वों के बारे में ऐसा कथन सुनने से मन में
ऐसा विचार आता है कि तो फिर पूजा, दया, दान आदि सब व्यर्थ ही है
क्या ? क्या इन्हें छोड़ दें ? जैसा वस्तु का स्वरूप है, जानना तो वैसा ही
है, श्रद्धा में भी वैसा ही मानना है । जिसे तत्त्वों का अभ्यास है, उसे तो
तत्त्व का निरूपण करनेवाले सर्वज्ञ के प्रति अतीव परम भक्तिभाव आये
बिना नहीं रहता ।
अतः समाधान यह है कि पूजा, स्वाध्याय, दान आदि छोड़ने का तो
प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । तत्त्व के अभ्यासी को तो और अधिक भक्ति
का भाव आता है । वे अधिकाधिक समय और धन खर्च करते हुये दिखायी
देते हैं । आजकल के जमाने में तो धन देना आसान है, लेकिन समय देना
मुश्किल हो गया है; क्योंकि ऐसी बातों के लिए समय देने के लिए हमारे
पास समय ही कहाँ बचता है ? फिर भी तत्त्व रुचिवाले धन और समय
दोनों देते हैं ।
आगम का यह अभ्यास करते हुये शुरू-शुरू में समझने में अनेक
भ्रांतियाँ होती हैं । जीवद्रव्य के गुणधर्म क्या हैं ? यह जानते हुये बीच में ही
मनुष्य व्यवहार करें या न करें ऐसे सवाल उठते हैं । यह सवाल ऐसा
हास्यास्पद है जैसा कि हम जब ऑक्सिजन के गुणधर्म पढ़ते हैं कि वह
वायुरूप है, ज्वलन में मदद करता है, तब यदि कोई कहे कि पानी तो द्रवरूप
है, वह तो आग बुझाता है यह कैसे ? पानी को भी ऑक्सिजन की भांति
ज्वलनशील होना चाहिए । यह सवाल जैसे हास्यास्पद है, वैसा ही तुम्हारा
पूजा-अर्चा, दान, स्वाध्याय छोड़ देनेवाला सवाल है । हमने अपने आपको
जीवद्रव्य न मानकर मनुष्य ही मानकर उस मनुष्यपर्याय जितना ही माना है
इसलिए ऐसा सवाल उठता है ।
आगम का याने तत्त्वों का अभ्यास करके हमें सर्व प्रथम तत्त्वनिर्णय
करना है । ये सर्वज्ञ कथित तत्त्व ऐसे ही हैं, इसप्रकार से परीक्षाप्रधानी
बनकर अपनी बुद्धि के कसौटी पर कसना होगा । यह सब निर्णय विचारों में
करना है, बुद्धि का यह काम है । षोडशकारण पूजा में लिखा है कि –
‘ज्ञानाभ्यास करें मनमांहि । ताकों मोह महातम नाहीं ।।’
जिसके विचारों में तत्त्वों का चिंतन चलता रहता है उसके आचरण में
स्वच्छंद पापक्रियायें नहीं होती । धर्म क्या है, पुण्य क्या है, पाप क्या है यह
समझे बिना हम क्या कर रहे हैं और उसका फल क्या होगा ? यह समझ
में नहीं आ सकता ।
आगम के द्वारा, शास्त्राभ्यास के द्वारा हमें अपनी पहचान करनी है ।
विश्व में अनंत द्रव्य हैं, उनमें से मैं एक स्वतंत्र परिपूर्ण द्रव्य हूँ और मुझमें
(प्रत्येक में) अनंत गुण हैं यह हमने जाना । परंतु ध्यान रहे, जीव द्रव्य
अरूपी होने से इसके अनंत गुण भी अरूपी हैं अतः हमें दिखायी नहीं देते;
परंतु घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि अरूपी होनेपर भी यह
‘चेतन’ द्रव्य है, ज्ञान उसका गुण है । देखो न ! ये शब्द पढ़कर कौन जान
रहा है ? - जीव । पंद्रह वर्ष पहले की याद किसके द्वारा होती है ? – ज्ञान
के द्वारा । ज्ञान किसका ? - जीव का । अमुक विशिष्ट बात कठिन है,
समझ में नहीं आती, यह कौन जानता है ? – ज्ञान अर्थात् जीव ।
यह ज्ञान गुण हर क्षण जानने का कार्य करता रहता है । नींद में
भी ? हाँ, हाँ नींद में भी ! तुम नहीं कहती हो कि आज मुझे नींद ठीक
नहीं आयी या आज मुझे गहरी नींद आयी ? तो फिर इसे किसने जाना ?
दिनरात ज्ञान गुण हमें बता रहा है कि यह मैं यहाँ हूँ। जहाँ यह ज्ञान
गुण है, वहीं अन्य अनंत गुण अविनाभावी संबंध के कारण हैं ही । जहाँ
ज्ञानादि सर्व गुण हैं, उसे ही जीवद्रव्य कहा है । तो फिर हो गयी ना जीवद्रव्य
की सिद्धि ?
विश्व और द्रव्य के बारे में हमने जाना । गुण और पर्याय की जानकारी
लेनेपर द्रव्य का स्वरूप अधिक स्पष्ट होगा ।
मोना, तुमने जयपुर शिबिर के बारे में पूछा था । वहाँ रोज प्रातः पांच
बजे से रात्री के दस बजे तक आठ-दस घण्टे प्रवचन, क्लास, पूजन-विधान,
भक्ति, रोज अभ्यास और अंत में परिक्षायें ऐसा हमारा कार्यक्रम था । बाहरगांव
से ८५० लोग और जयपुर निवासी दो-तीन हजार लोग उपस्थित रहते थे ।
इन शिबिरों में अनेक विद्वान तथा नये आत्मार्थी भाई-बहने भी शामिल होते
हैं । तत्त्वों का सूक्ष्म अभ्यास भी यहाँ चलता है । मैंने तत्त्वज्ञान पाठमाला,
नयचक्र और गुणस्थान प्रवेशिका इन तीनों विषयों की परीक्षा दी थी । उनमें
९६%, ९६% और १००% मार्क्स प्राप्त करके तीनों में ही प्रथम क्रमांक
हासिल किया । सबने आश्चर्यसहित सराहा और अभिनंदन किया । फिर से
कॉलेज के दिनों की याद आयी ।
अधिक अगले पत्र में लिखूँगी ।
तुम्हारी माँ
पाप रुप को पाप तो, जानत जग सहु कोई ।
पुण्यतत्त्व भी पाप है, कहत अनुभवी कोई ।।
अर्थ – जो पाप है उसको पाप जान, सब कोई उसे पाप ही मानते हैं; जो कोई पुण्य को भी पाप कहता है वह बुद्धिमान कोई विरला ही है ।
जब तक एक न जानता, परम पुनीत शुद्ध भाव ।
मूढ़ों के व्रत-तप सभी, शिव-कारण न कहाय ।।
अर्थ – जब तक एक परम शुद्ध व पवित्र भाव का अनुभव नहीं होता, तब तक मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव के द्वारा किये गये व्रत-तप-संयम व मूलगुण पालन को मोक्ष का उपाय नहीं कहा जा सकता ।
जब तक एक न जानता, परम पुनीत शुद्ध भाव ।
व्रत-संयम अरु शील-तप, निष्फल सारे जान ।।
अर्थ – हे जीव ! जब तक एक उत्कृष्ट शुद्ध वीतराग भाव का अनुभव न करें, तब तक व्रत, तप, संयम, शील ये सर्व पालना वृथा हैं, मोक्ष के लिए कार्यकारी नहीं हैं । पुण्य बांधकर संसार बढ़ानेवाले हैं ।
- श्री योगिन्दुदेव ‘योगसार’