जैन तत्त्व परिचय — डॉ. उज्ज्वला शहा | Jain Tattva Parichay (दैनिक स्वाध्याय)

पुस्तक: पत्रों द्वारा जैन तत्त्व परिचय — लेखिका: डॉ. श्रीमती उज्ज्वला दिनेशचंद्र शहा

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लेखिका का मनोगत

‘जितने व्यक्ति उतनी कल्पनायें’ इस लोकोक्ति के अनुसार धर्म के बारे
में अनेक लोगों की अनेक प्रकार की कल्पनायें होती हैं । एक दूसरे का सुनकर
और बिना किसी शास्त्राधार व्यक्ति धर्म के बारे में, देव के बारे में अपनी राय
बिना हिचकिचाहट प्रस्तुत करता रहता है । लौकिक जीवन के प्रत्येक पहलू में
तो हम ‘विशेषज्ञ’ को ही खोजते हैं । जैसे कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक
अंग उपांगों का विशेषज्ञ चाहिए । शिक्षा प्राप्त करने / कराने के लिए भी
विशेषज्ञ चाहिए और व्यापार के क्षेत्र में भी हर प्रकार के विशेषज्ञ चाहिए । कोई
भी चीज़ खरीदते वक्त समस्त जानकारी हासिल करके, भरोसे लायक जगह से
और पूरी जाँच पड़ताल करके ही खरीदते हैं । लौकिक कार्यों में ऐसा सजग
और सावधान व्यक्ति भी जब धर्म के बारे में अंधश्रद्धा से कुछ भी करने या
मानने को तैयार होता है, तब बड़ा आश्चर्य होता है ।
इसका एक ही कारण है और वह है तत्त्वज्ञान के बारे में अज्ञान ! सच्चे
देव, गुरु, शास्त्र, वीतराग धर्म इत्यादि के स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से कुछ
कुल परंपरा से आयी हुयी रूढियाँ, कुछ दूसरों का विपरीत व्यवहार देख-
देखकर अंगिकृत की हुयी बातें, कुछ अन्य धर्मियों के संस्कार और कुछ अपने
भौतिकवाद को पुष्ट करनेवाली अपनी ही मतिकल्पनाओं के कारण सच्चे धर्म का
स्वरूप ही अपने ध्यान में नहीं आता ।
हम भी इन्हीं में से ही एक थे । हमारा तो परमसौभाग्य यह रहा कि
सन १९७२ में कुंभोज - बाहुबली में प. पू. आचार्य समंतभद्र महाराज जी ने
हमें स्वाध्याय की प्रेरणा दी । उसके बाद सन १९७५ में पंडित बाबूभाईजी
मेहता के नेतृत्व में पूरे भारतभर के सिद्धक्षेत्रों, अतिशय क्षेत्रों की १०० दिन
की यात्रा में हम सम्मिलित हुये । उस वक्त लगातार सौ दिन यात्रा और
प्रवचनों का अपूर्व लाभ मिला और धर्म के क्षेत्र में हम कितने अनभिज्ञ और
पिछड़े हुये हैं - इसका ज्ञान हुआ । तीन-तीन डिग्रियाँ और उनमें प्राप्त हुये
‘गोल्ड-मेडल्स’ के कारण निजबुद्धि के बारे में दुरभिमान तो नहीं कह सकते
मगर गर्व (गौरव) तो था ही ।
परंतु तत्त्वज्ञान के सामने यह लौकिक शिक्षा कितनी नगण्य है, कितनी
तुच्छ है उसका एहसास हुआ । मेरे पती श्री. दिनेशचंद्रजी भी तीन-तीन विषय
में ग्रैज्युएट हैं । हम दोनों का स्थिर व्यवसाय और लौकिक निश्चितता, रीना-
मोना जैसी दो प्यारी व समझदार बेटियाँ - इन सब अनुकूलताओं के कारण
हमारे जैसे सुखी हम ही हैं, ऐसा लगे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं था । यह
तो सहज मानवीय मनोविज्ञान है ।
मात्र तत्त्वज्ञान ही लौकिक अनुकूलताओं से सुखबुद्धि तोड़ सकता है ।
मेरे ससुरजी श्री. माणिकलाल हरिचंद शहा को शिक्षा के बारे में अपार प्रेम
और लगन थी । लौकिक शिक्षा के समान धार्मिक शिक्षा के बारे में भी
उन्होंने बारम्बार प्रेरणा दी थी । कभी-कभी भिन्न-भिन्न प्रवचनकारों का
लाभ मिलता रहा और इस बीच में धर्म का अभ्यास भी होता रहा । जैसे-
जैसे अधिक अभ्यास होता रहा वैसे-वैसे उसका मर्म भी समझ में आने
लगा, सच्चे धर्म का स्वरूप ध्यान में आने लगा, स्वाध्याय की रुचि बढ़ने
लगी, हम बारम्बार शिबिर-प्रवचन अटेंड करने लगे । प्राथमिक ज्ञान के
बिना मात्र प्रवचन सुनने से या ग्रंथ वाचन करने से उसका मर्म ध्यान में
नहीं आता यह अपने ही अनुभव से प्रतीत हुआ ।
स्वाध्याय हेतु हम दोनों ने अगस्त १९९२ से धंदा-पानी व्यवसाय छोड़कर
निवृत्ति ले ली । दोनों बेटियाँ भी घर से दूर गयी थी - रीना की तो शादी हुयी
थी और मोना मेडिकल के आखरी वर्ष की स्टडी हेतु हॉस्टेलपर रहने गयी थी ।
इसी दरम्यान सोलापूर के श्राविकाश्रम की तरफ से ब्र. विद्युल्लता बहनजी ने हम
दोनों को प्रवचन हेतु सोलापूर आमंत्रित किया । परंतु उस वक्त कुछ कारणवश
हम जा नहीं पायें इसलिए मैंने ‘श्राविका’ पत्रिका के लिए सहज एक पत्ररूप
लेख भेज दिया । वह लेख ‘श्राविका’ में छपकर आया । ब्र. विद्युल्लताजी ने उस
लेख की सराहना की और यह उपक्रम चालू रखने का अनुरोध किया । मैं भी
लेख लिखती रही और ब्र. विद्युल्लताजी ने बारम्बार मुझे प्रोत्साहित भी किया ।
गत तीन सालों से मैं जैन तत्त्वज्ञान विषयक प्राथमिक जानकारी पत्ररूप
से लिखती रही । मेरी यह चेष्टा हास्यास्पद थी, फिर भी अनेकों ने मुझे
प्रोत्साहन दिया और प्रशंसा की । जिसतरह छोटा बालक जिंदगी में पहली बार
खड़ा रहने की चेष्टा करता है तब हम तालियाँ बजाकर उसे उत्तेजन देते हैं वैसा
ही यह प्रसंग रहा ।
वाचकों की अनुकूल प्रतिक्रियायें आती ही रहीं और इसको पुस्तकाकार
रूप देने की माँग भी होने लगी । श्री. अरविंदभाई मोतीलाल दोशी जो रोज
शास्त्र स्वाध्याय के लिए श्री. दिनेशजी के पास आते हैं उन्होंने पुस्तक छपवाने
के बारे में निरंतर आग्रह रखा । इस अपेक्षा से सब लेखोंपर विशेष दृष्टिकोण
से देखा, जहाँ आवश्यक था वहाँपर अधिक खुलासा करके बीच के पत्र
नं. १६ और १७ लेख नये लिखकर भी जोड़े । पं. ब्र. यशपालजी जैन, जयपुर
ने ये समग्र लेख पढ़कर अत्यंत समाधान व्यक्त किया और कुछ महत्त्वपूर्ण
सलाह भी दी । एतदर्थ मैं उनकी शतशः आभारी हूँ ।
श्री. महावीर पाटील, शास्त्री, संपादक - वीतराग विज्ञान (मराठी) ने भी
लेख पढ़कर पत्रशैली की प्रशंसा की और पुस्तक छपाने के लिए प्रोत्साहित भी
किया । इन मूल मराठी लेखों को पुस्तकरूप बनाने में मेरे पती श्री. दिनेशचंद्रजी
का बहुत बड़ा योगदान रहा । कोई भी काम निश्चितता के साथ करने की
उनकी आदत और कितनी भी प्रतिकूलतायें आनेपर भी हाथ में लिया हुआ कार्य
सुचारुरूप से पूर्ण करने की उनकी वृत्ति यहाँपर बहुत उपयुक्त रही । पुस्तक
के संपादन का कार्य भी उन्होंने ही यशस्वी रूप से सम्हाला ।
जैन तत्त्वज्ञान का अभ्यास प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिए । छोटे-
बड़े, जैन-अजैन हर जीव को उससे निश्चित ही ‘निजस्वरूप’ पहचानने में मदद
होती है । ‘जैन सिद्धान्त - प्रवेशिका’ जैसी प्रश्नोत्तररूप किताबें विद्यमान हैं
ही । उन्हीं प्रश्नोत्तरों को बोलचाल की बोली (भाषा) में विस्तृत विवेचन और
उदाहरणों सहित लिखने का प्रयत्न किया है । अनेक बार शास्त्राधार लेकर तत्त्वों
में कहीं भूल न हो इस बारे में पूर्ण सावधानी रखी है । जैन तत्त्वों का प्राथमिक
अभ्यास करनेवालों को यह विश्लेषण उपयुक्त होगा ऐसी मैं आशा रखती हूँ ।
इन लेखों के निमित्त से मेरा जैन तत्त्वों के विषय में सतत मनन, चिंतन होता
रहा, यही मेरे लिए सबसे बड़ा लाभ हुआ ऐसा मैं मानती हूँ ।
यद्यपि हमने जैन तत्त्वज्ञान का यत्किचित् अध्ययन हिंदी और गुजराती
भाषा में किया है, तो भी पुस्तकरूप में लिखना सहज बात नहीं है । मराठी
भाषा और साहित्य से भी मेरा अधिक परिचय नहीं है, हिंदी की तो बात ही क्या
करनी ? फिर भी मूल मराठी में तथा उसी को हिंदी में लिखकर इस विषय
को प्रस्तुत करने का मैंने एक छोटा सा प्रयत्न किया है । कितनी सफलता
मिली है, इसका निर्णय मैं पाठकोंपर छोड़ती हूँ । ये सारे पत्ररूप लेख माँ अपनी
बेटियों को लिखती है, इसलिए वाचक भी माँ की भाषा को नहीं वरना उसकी
भावना को देखेंगे, समझेंगे इसी आशा के साथ, मुझे अपनी माँ जिनवाणी से प्राप्त
यह जैनतत्त्व का परिचय मैं अपनी बेटियों एवं समस्त साधर्मियों को दे रही हूँ ।
आशा है पाठक लाभान्वित होंगे ।

  • डॉ. श्रीमती उज्ज्वला शहा

प्रकाशकीय

आज यह पुस्तक आपके हाथ में देते हुये मुझे बहुत आनंद महसूस
हो रहा है । चूँकि बीस वर्ष पूर्व जब मैं जैन सिद्धांतों के संपर्क में आया
था तब यह वाक्य सुना था कि ‘जिसकी होनहार भली हो, उसे वैसे ही उचित
निमित्त मिलते हैं’ । उस वक्त उसका सही अर्थ समझ में नहीं आया था,
पर आज ध्यान में आता है कि जैन तत्त्वज्ञान समझनेवाले एक से बढ़कर
एक उत्कृष्ट विद्वान पंडितों का लाभ मिलता रहा कि जिससे हमें जैन दर्शन
की रुचि बढ़ी सो बढ़ी ही ।
किन-किन लोगों का नाम उद्धृत करें । एक से बढ़कर एक उत्तम
व्यक्तियों का मार्गदर्शन मिला । पं. नेमचंदजी रखियालवाले, पं. कैलासचंदजी
बुलंदशहरवाले, पं. चिमणलालजी कामदार ने जैन तत्त्व की नींव ड़ाली । इनकी
पढ़ाने की शैली ऐसी जिज्ञासोत्पादक थी कि आगे क्या है ? ऐसा प्रश्न सहज
खड़ा हो जाता था और जैनदर्शन के बारे में अपनी मान्यतायें कितनी अपरिपक्व
हैं यह भी पद-पद पर महसूस होने लगा था । इन तीनों में से किसी को भी
पहला नंबर नहीं दे सकते क्योंकि हरेक के अनंत उपकार हैं हमपर ! सभी
समान ही हैं हमारी दृष्टि से !
इसतरह जैन तत्त्वों की जो पहचान हमें इनसे प्राप्त हुयी, इन्होंने तो
तत्त्वरूपी बीज हममें बोये और जो अंकुरित हुये उसे मुख्यरूपसे पं. खेमचंदजी,
ब्र. सुशीलाश्री, पं. बाबूभाईजी मेहता ने सींचा और सदोदित आधारस्तंभ और
दीपस्तंभ के रूपसे मार्ग दर्शानेवाले आदरणीय पं. हुकमचंदजी भारिल्ल ने उसे
वृद्धिंगत किया । इसतरह जैन दर्शन की महिमा हममें उत्पन्न हुयी । मन ही
मन ऐसा लगता रहा कि यह जो खजाना हमें प्राप्त हुआ है वह अन्य जीवों को
भी मिले । इसी कारण गत पंद्रह वर्षों से पर्युषण पर्व निमित्त मुझे जहाँ-जहाँ
प्रवचनार्थ जाने का प्रसंग बना, वहाँ-वहाँ जैन सिद्धांतों की पहचान हो - इस हेतु
“लघु जैन सिद्धांत प्रवेशिका” के माध्यम से मैं पर्युषण पर्व में भी दिनमें ३ बार
इसी विषय को नियमित रूपसे सिखाता रहा । प्रथम शुरू-शुरू में थोड़ी बहुत
नाराजी रहती थी परंतु विरोध नहीं था और एक-दो दिन में ही श्रोतावर्ग में
विषय को समझने की खूब उत्सुकता जागृत होती थी ।
आप यह विश्लेषण क्यों नहीं लिखते, उसे पुस्तकाकार क्यों नहीं बनाते
ऐसी सलाह अनेक लोगों ने दी । लेकिन आज तक वह काम मुझसे नहीं
बना । परंतु दैवयोग से श्रीमती उज्ज्वलाजी के मन में क्या विचार जागृत हुये
भगवान जाने, उसने इस विषय को लेकर ‘श्राविका’ पत्रिका में पत्ररूप लेख
लिखने की शुरुवात की । जैसा-जैसा विषय आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे वाचकों का
प्रतिसाद भी बढ़ता गया । अनेक लोगों ने ‘आप इसे पुस्तकरूप से छपाये तो
नये-नये जिज्ञासुओं को यह बहुत कार्यकारी सिद्ध होगा’ इसतरह की माँग
की । और जो काम आज तक मुझसे नहीं हो पाया था, मैं कर नहीं सकता
था और जो करनेवाला भी नहीं था वह उससे सहजरूप से बनता गया यह
देखकर हम दोनों ने इसे पुस्तकरूप से छापने की ठान ली ।

अनेक लोगों की ऐसी मान्यता है कि धर्म तो बुढ़ापे में करने की चीज़
है । लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं है कि धर्म यह एक सायन्टिफिक विषय है,
इतना न्यायपूर्ण और लॉजिकल विषय है, इतना परफेक्ट है कि वह भी एक
अभ्यास का विषय हो सकता है । लौकिक जीवन में हम अनेकविध कोर्सेस
करने में आगे-पीछे नहीं देखते, सब कोर्सेस करने की चाह रखते हैं । छोटा
१०-१२ वर्ष का बालक कॉम्प्युटर सीखे तो हम उसकी सराहना करते हैं लेकिन
१०-१२ वर्ष का बालक शास्त्राभ्यास करे तो अनेकों की भौयें टेढ़ी होती हैं ।
चूँकि एक वर्तमान भव के कल्याण के लिए तत्त्वज्ञान का और शास्त्रों का
अध्ययन करने में क्या बाधा है ? हमें चाहिए कि सर्वप्रथम यह विषय क्या है
उसके बारे में समझें, उसकी जानकारी प्राप्त करें और फिर उसके बारे में
अपनी राय बना लें । परंतु इस विषय को जाने बिना या समझे बिना उसके
बारे में राय बना लेना ठीक बात नहीं है । यह विषय समझ में आये इस हेतु
उसकी प्राथमिक जानकारी इस पुस्तक के माध्यम से देने का प्रयत्न लेखिका
ने किया है । इसमें विषय को सरल और सीधी भाषा में प्रस्तुत किया है और
तात्त्विक शब्द समझाने के लिए बोलीभाषा का उपयोग बड़ी खूबी से किया है ।
इसीलिए पत्ररूप शैली में लिखकर मानो वाचकों से निकटता प्राप्त करने का
लेखिका का प्रयास रहा है ।

यह हिंदी संस्करण अब नये रुप में प्रस्तुत है । मैटर वही होनेपर भी
अब बड़े अक्षरों में दुबारा डी.टी.पी. कराके छपवा रहे हैं । चारों भाषाओं में इस
पुस्तक की माँग दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है । नित्य नये-नये लोग इस
पुस्तक के कारण जिनागम का अभ्यास करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं ।

पुस्तक प्रकाशित करने का हमारा प्रयत्न अपेक्षा से कई अधिकगुणा
सफल होते हुये दिखायी दे रहा है ।

  • पं. दिनेशभाई शहा

पत्रांक १ — तत्त्व-प्रवेश | Tattva-Pravesh

११ मई १९९३

डॉ. (सौ.) उज्ज्वला दिनेशचंद्र शहा,
१५७/९ निर्मला निवास,
सायन (पूर्व), मुंबई - ४०० ०२२.
फोन : ०२२-२४०७ ३५८१

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
तुम दोनों - एक शादी करके और एक पढ़ाई के लिए हमें छोड़कर
चली गयी हो । मोना तुम्हारे हॉस्टेल में जाने के बाद शुरू-शुरू में तुम्हारे
खानपान के बारे में, घर छोड़कर तुम्हें अकेला रहना पड़ेगा इस बारे में, तुम
वहाँ कैसे अॅडजस्ट हो सकोगी इस बारे में मुझे अनेक विकल्प आते थे ।
अब वह चिंता नहीं रही । आज कल हमेशा यही एक विकल्प आता है कि
अब तुम दोनों सच्चे अर्थ में समाज के संपर्क में रहती हो जहाँ अनेक धर्मों
के, अनेक मतों के लोगों से तुम्हारा संबंध आयेगा । उनकी मान्यतायें, उनकी
श्रद्धा और अंधश्रद्धा आदि का तुमपर प्रभाव पड़ने की संभावना है । ऐसे
प्रसंग में सनातन सत्य धर्म क्या है ? यह तुम्हें बताने की आवश्यकता भासित
होती है । घर के संस्कार, थोड़ा बहुत तत्त्वश्रवण का लाभ तुम्हें बचपन से
ही है । इस वज़ह से ‘अपना धर्म, अपने देव, अपना कुलाचार’ ऐसा समझकर
वे बातें तुम्हें आदरणीय और उत्तम लगती होगी लेकिन अब वही बातें सचमुच
योग्य हैं या नहीं, तत्त्व न्याययुक्त हैं या नहीं आदि की परीक्षापूर्वक प्रतीति
करनी चाहिए ।
तुम दोनों के निमित्त से यह लिखना प्रारंभ किया है । जो ज्ञानधन
हमने उपार्जित किया हुआ है और कर रहे हैं वह तुम्हें और तुम जैसे अन्य
जिज्ञासुओं को मिले यही मेरी कामना है ।
सबसे पहले ‘ईश्वर’ अथवा ‘भगवान’ का स्वरूप समझना पड़ेगा ।
यह कोई ‘Superhuman Power’ है या कोई मानवसदृश प्राणी है ? यह
समझने के लिए कुछ मूलभूत बातें हमें समझनी होगी । इसके लिए सर्वप्रथम
आत्मा क्या चीज़ है यह समझेंगे ।
आत्मा – तुम, मैं और अन्य सब जीव जो जानने का कार्य करते
हैं, सुखदुःख का अनुभव करते हैं, योग्य-अयोग्य का निर्णय करते हैं, मुझे
यह नहीं समझता अथवा समझता है – ऐसा जो जानते हैं, वह जाननेवाला
ही आत्मा है ।
इस आत्मा का शरीर के साथ जो संबंध अथवा संयोग होता है इस
संयोग को हम ‘सजीव’ प्राणी कहते हैं । देखो, प्राणीशास्त्रज्ञ भी उसे सजीव
कहते हैं, जीव नहीं कहते । जो जीव सहित है वह सजीव है । आत्मा चेतन
है, जीव है और शरीर अचेतन है, जड़ है । शरीर में ज्ञान नहीं है, शरीर
सुखदुःख का अनुभव नहीं कर सकता । यह संबंध कुछ निश्चित काल तक
रहता है । यह संबंध खत्म होता है उसे हम मरण कहते हैं । देखो, संबंध
खत्म हुआ है, न जीव का अंत हुआ और न अचेतन का याने शरीर के
परमाणुओं का । मरण के उपरांत इस जीव का अन्य शरीर के साथ संबंध
होता है उसे जन्म कहते हैं । जन्म से लेकर मरण तक जीवन अथवा आयु
है, उसे भव कहते हैं । मनुष्य की अपेक्षा हम इसे ‘मनुष्यभव’ अथवा
‘मनुष्यपर्याय’ कहते हैं । पर्याय याने अवस्था । यह सचमुच जीव की अवस्था
नहीं है परंतु ‘जीव + शरीर’ के संयोग की अवस्था है । यह जो संयुग
(मिश्रण) तैयार हुआ उसके गुणधर्म ‘शुद्ध जीव’ द्रव्य से भिन्न हैं । इसमें
जो ‘जीव’ है वह तो जाननेवाला - माननेवाला तद्वत् प्रतीति करनेवाला है । यह
जीव अपने भिन्न अस्तित्व और भिन्न गुणधर्म को न पहिचानकर संयुग के
अस्तित्व को अपना अस्तित्व मानता है और उसके गुणधर्मों को अपने गुणधर्म
मानता है । ध्यान से देखो, वह मानता है इसलिए वैसा होता है, ऐसी बात
नहीं है परंतु उसकी गलत (विपरीत) मान्यता के अनुसार उसका जानना भी
विपरीत होता है और आचरण भी विपरीत होता है; इसीको शास्त्र में मिथ्यादर्शन,
मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र कहा है । उसके कारण सूक्ष्म कर्म परमाणु
आकर आत्मा के साथ बंधते हैं । कर्म का यह Process या Theory भविष्य
में समझाऊंगी ।
अज्ञानी जीव ने जीव और शरीर की संयोगी अवस्था को ‘स्व’ माना,
इसलिए दृश्यमान शरीर ही ‘मैं’ हूँ ऐसी मिथ्या कल्पना इस जीव की जन्म
से ही रहती है । शरीर गोरा, लम्बा, दुबला तो मैं गोरा, लम्बा, दुबला; शरीर
रोगी तो मैं रोगी, शरीर का संयोग होनेपर मैं जन्मा और वियोग में मैं मरा,
शरीर के अनुकूल सामग्री में मैं सुखी ऐसी अनेकविध मिथ्या कल्पनाओं के
कारण यह जीव तथाकथित सुख-सामग्री प्राप्त करने के लिए मेहनत करता
है । एतदर्थ पैसा कमाने के लिए यह जीव दिनरात कष्ट उठाता है ।
तुम विज्ञान की विद्यार्थिनी हो इसलिए केमिस्ट्री-रसायन विज्ञान का
उदाहरण देती हूँ । विज्ञान के विद्यार्थियों को तत्त्वज्ञान का यह विषय सहजता
से-आसानी से समझ में आ सकता है । जैन धर्म का अर्थ है ‘वस्तुस्वरूप’
अथवा ‘वस्तुविज्ञान’ । फिजिक्स में-भौतिक विज्ञान में हम केवल Matter
(पदार्थ) का अभ्यास करते हैं परंतु जैनदर्शन में Matter यह छह द्रव्यों में
से एक द्रव्य है । इन छह द्रव्यों में जीव यह एक द्रव्य है । जैन तत्त्वज्ञान
में इन छह द्रव्यों का स्वरूप तो बताया ही है, मुख्यतः जीवद्रव्य का स्वरूप
विस्तार से समझाकर अपने शुद्ध जीव स्वरूप का अनुभव कैसे करना इसका
कथन किया है । मैं स्वतः जीवद्रव्य हूँ इसलिए ‘मेरा’ स्वरूप क्या है यह
जानने की तीव्र अभिलाषा स्वाभाविक ही है । बचपन में खोये हुये, अनाथाश्रम
में रहनेवाले बालक को अपने माँ-बाप मिलनेपर जैसा आनंद होता है वैसा
आनंद और उत्साह ‘स्व’ का स्वरूप सुनने और पढ़ने से होता है । हाँ, तो
मैं उदाहरण बता रही थी । जिस प्रकार H₂O अर्थात् पानी के मूलतत्त्व
हायड्रोजन और ऑक्सिजन हैं । हायड्रोजन एवं ऑक्सिजन का मिश्रण ही पानी
है । इसमें ‘O’ अर्थात् ऑक्सिजन के गुणधर्म H₂O अर्थात् पानी के गुणधर्मों
से भिन्न हैं । हमें यदि ऑक्सिजन के गुणधर्म जानने हो और उसे H₂O में
से भिन्न करना हो तो सबसे प्रथम वह भिन्न गुणधर्मवाला है और उसे भिन्न
किया जा सकता है, इसकी पूर्ण श्रद्धा होना जरूरी है । केमिस्ट्री के अध्यापकों
से उसे सीखना पड़ेगा । शुद्ध ऑक्सिजन प्राप्त करने के लिए कौनसी प्रक्रिया
करनी पड़ती है इसका अभ्यास करना पड़ेगा और उनके मार्गदर्शन में तद्वत्
प्रात्यक्षिक करनेपर शुद्ध ऑक्सिजन प्राप्त करना सहज साध्य है ।
उसीतरह जीव + शरीर इस संयुग में से जीवद्रव्य के गुणधर्म उस
संयुग के गुणधर्मों से भिन्न हैं । इस संयुग में से शुद्ध जीव भिन्न हो सकता
है । जो जीव पूर्ण शुद्ध हो गये हैं उनके मार्गदर्शन के अनुसार प्रथम शुद्ध
जीव पदार्थ के गुणधर्मों का याने स्वभाव का अभ्यास, ज्ञान करना होगा, शुद्ध
जीव भिन्न कर सकते हैं ऐसी श्रद्धा करनी होगी और वैसा प्रात्यक्षिक करके
अपने शुद्ध जीव का अनुभव करना होगा । यह जीव को स्वयं करना होगा,
अन्य जीव इसे शुद्ध नहीं कर सकते । जब यह अनुभव-प्रतीति होगी तब इसे
सम्यक्त्व हुआ याने सम्यग्दर्शन (यथार्थ श्रद्धा), सम्यग्ज्ञान (यथार्थ ज्ञान)
और सम्यक्चारित्र (यथार्थ आचरण) हुआ ऐसा कहा जायेगा । ऐसा जीव
अपने आप को सदैव शरीर से भिन्न जानता-अनुभवता है और अपनी आत्मा
में ही स्थिर होने का बारंबार प्रयत्न करता है । आत्मस्थिरता बढ़ती जाती
है तब व्रतीश्रावक और मुनि ये अवस्थायें प्राप्त होती हैं ।
ऊपर की यह अवस्था ‘शुद्ध + अशुद्ध’ अवस्था है । शुद्ध जीव की
(‘स्व’ की) पूर्ण श्रद्धा और प्रतीति तो इस जीव को हो गयी है, परंतु अब
भी वह संयुग की अवस्था में है । यद्यपि सगाई होनेपर लड़की मायके में ही
रहती है, परंतु अब मायके के घर में ‘यह मेरा घर’ ऐसी अपनेपन की
पहले जैसी भावना नहीं रही अथवा जैसे कोई व्यक्ति भाड़े के मकान में
रहता है उस मकान में रहते हुये भी इसे उसमें अपनेपन की भावना नहीं
रहती । वैसे भेदज्ञान होनेपर शरीर के रहते हुये भी ज्ञानी जीव को शरीर के
साथ अपनापन या एकत्वबुद्धि नहीं रहती ।
आत्मा में अधिकाधिक लीनता और स्थिरता करते-करते ऐसी अवस्था
होती है कि आठ कर्मों में से चार कर्मों का पूर्ण अभाव होता है । पूर्ण शुद्ध
आत्मा का अनुभव सतत रहता है । ज्ञान का पूर्ण विकास होता है उन्हें
‘सर्वज्ञ’ कहते हैं । कषायों का पूर्ण अभाव होनेपर उन्हें ‘वीतराग’ कहते
हैं । ऐसे वीतरागी सर्वज्ञ जीव के अभी चार कर्म शेष हैं, अभी शरीर से संबंध
है इनको अरहंत कहते हैं । वे हितोपदेश देते हैं अर्थात् जिस विधि से, जिस
मार्ग से आत्मानुभवपूर्वक मुनि बनकर वे अरहंत (अरिहंत) अर्थात् देव हुये,
उस मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं । अरहंत के सर्व आत्मिक गुणों का पूर्ण
विकास हो चुका है अर्थात् पूर्ण शुद्ध अवस्थायें प्रकट हो गयी हैं ।
ईश्वर क्या है इस प्रश्न से हमने प्रारंभ किया था । अरिहंत शरीरसहित
ईश्वर या परमात्मा है इसलिए उन्हें सकल परमात्मा कहते हैं । अरिहंत
अवस्था के बाद इस जीव को सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है । वहाँ शरीर का
और शेष चार कर्मों का संबंध भी सदा के लिए नष्ट होता है - इस जीव को
‘निकल परमात्मा’ कहते हैं । शुद्ध जीव पूर्ण शुद्ध अवस्था को प्राप्त हुआ
है । अब इसे कोई संयोग नहीं रहा, जीव मुक्त हो गया । अब दुबारा उसे
जन्म नहीं लेना पड़ेगा, जन्म मरण से रहित सिद्ध दशा अनंत काल तक
चलती रहेगी ।

इसतरह अरिहंत और सिद्ध इन दो अवस्थाओं में जो जीव हैं उन्हें
सच्चे देव या परमात्मा कहते हैं ।

देवगति, मनुष्यगति, तिर्यंचगति और नरकगति इन चारों गतियों में जीव
सम्यग्दर्शन तो प्राप्त कर सकता है परंतु मात्र मनुष्यगति में पुरुष ही मुनि
बनकर अरहंत और सिद्ध बन सकते हैं । उसके बाद उन्हें फिर दूसरा भव
धारण नहीं करना पड़ता, फिर से उनका अवतार (जन्म) नहीं होता ।

ईश्वर क्या है यह समझने के पश्चात् उसका स्वरूप क्या है यह
हम आगे समझेंगे । तुम्हारे कोई प्रश्न हो तो अवश्य पूछना लेकिन विषयानुरूप
उसका जवाब मैं आगे-पीछे जरूर दूँगी ।

शेष शुभ ।

तुम्हारी माँ

तुमने भाग्य से अवसर पाया है, इसलिये तुमको हठ से
भी तुम्हारे हित के लिए प्रेरणा करते हैं। जैसे हो सके वैसे
इस शास्त्र का अभ्यास करो । अन्य जीवों का जैसे बने वैसे
शास्त्राभ्यास कराओ । जो जीव शास्त्राभ्यास करते हैं उनकी
अनुमोदना करो । पुस्तक लिखवाना और पढ़ने पढ़ाने वालों की
स्थिरता करनी इत्यादि शास्त्राभ्यास के बाह्य कारण उनका साधन
करना, क्योंकि उनके द्वारा भी परंपरा कार्य सिद्धि होती है व
महत् पुण्य उत्पन्न होता है ।

  • ‘सत्तास्वरूप’ ८८

पत्रांक २ — सच्चे देव का स्वरूप | Sacche Dev ka Swaroop

१५ जून १९९३

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
तुम्हारी जिज्ञासा के अनुसार गत पत्र में हमने ‘आत्मा’ क्या है ? यह
समझने का प्रयत्न किया और प्रत्येक जीव अपनी आत्मा के शुद्ध स्वभाव की
श्रद्धा, उसका ज्ञान एवं उसमें लीनता (स्थिरता अर्थात् आचरण-रमणता) करके
स्वयं परमात्मा बन सकता है यह भी समझने का प्रयत्न किया ।
इस परमात्मा का स्वरूप विस्तार से जानना जरुरी है; जिसे हम
परमात्मा, भगवान, ईश्वर, परमेश्वर, सच्चा देव, देवाधिदेव आदि नामों से
कहते हैं । वैसे देवगति के जीवों को भी देव कहते हैं, परंतु वह अर्थ यहाँ
अभिप्रेत नहीं है ।
हमें अपने शुद्धात्मस्वरूप को जानने के लिए जिन्होंने शुद्धात्मस्वरूप
प्रगट किया है, ऐसे वीतरागी और सर्वज्ञ ही हमें अभीष्ट हैं । उन सच्चे देव
को जानना अति आवश्यक है । ऐसी वीतरागता कुछ अंशों में प्रगट करनेवाले
दिगंबर जैन मुनि का स्वरूप एवं शुद्ध स्वरूप के प्रतिपादक तथा मोक्षमार्ग
के निरूपक सत्शास्त्र को जानना भी अति आवश्यक है ।
‘रत्नकरंड श्रावकाचार’ नामक ग्रंथ में शुरू में ही श्लोक है कि सत्यार्थ
आप्त (अरहंत भगवान), आगम (जिनेन्द्रकथित उपदेश) एवं तपोभृत (दिगंबर
जैन मुनि) को यथार्थ जानना सम्यग्दर्शन का कारण है ।
इस सम्यग्दर्शन से ही धर्म की शुरुवात होती है । श्रद्धा यथार्थ होगी
तो ही ज्ञान और आचरण यथार्थ होगे । सम्यग्दर्शन के बिना किये हुये
व्रत, तप, संयम को शास्त्र में ‘अंक बिना बिंदी’ कहा है । अगर हम एक
के बाद एक शून्य लिखते गये परंतु उसके पहले कोई अंक न लिखे तो
उसकी कीमत शून्य ही होगी । मूल में ही भूल होगी तो आगे का सब गलत
ही होगा ना ?

मैं आत्मा हूँ । अगर मुझे अपने स्वभाव को अर्थात् शुद्धात्म स्वरूप
को जानना है तो पहले परमात्मा को जानना पड़ेगा । यदि सच्चे देव का
स्वरूप जानने में ही भूल होगी तो शुद्धात्मा का स्वरूप जानने में भी भूल
होगी ही । भगवान का यथार्थ स्वरूप न जानते हुये उनका स्मरण, चिंतन,
पूजन, भक्ति करने से कोई लाभ नहीं ।
जिसप्रकार हम छोटे बालक को दर्पण के सामने ले जाकर उसे यह
सिखाते हैं कि ‘देख, यह तू है’ । उसका फोटो बताकर भी ऐसा सिखाते हैं
कि ‘यह तू है’ । उसीप्रकार भगवान के सामने जाकर ऐसा विचार करना
चाहिए कि यह मेरे शुद्ध आत्मा का प्रगट रूप अर्थात् प्रतिबिंब है ।
देखो, णमोकार महामंत्र में अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु
को नमस्कार किया गया है, किसी व्यक्ति विशेष को नहीं । अरहंत और
सिद्ध देव हैं । देव का लक्षण क्या है यह जानना अत्यंत आवश्यक है ।
जिसतरह सोने को कसौटी पत्थर पर कसकर सोना परखा जाता है, उसीतरह
देव की परीक्षा की कसौटी पूर्ण वीतरागता और सर्वज्ञता है । अरहंत वीतरागी,
सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं । सिद्ध भगवान वीतरागी और सर्वज्ञ हैं ।
वीतरागी अर्थात् ‘बीत गया है राग जिनका’ । तीव्र द्वेष और तीव्र राग
का अभाव होते-होते अति मंद राग बाकी रहता है तथा उसका भी अभाव
करके जीव पूर्ण वीतरागी होता है । उस जीव को ‘वीतरागी’ कहते हैं । राग-
द्वेष का दूसरा नाम कषाय है । चार शब्दों में कहना हो तो क्रोध, मान,
माया और लोभ ।
जैसे-जैसे कषायों का अभाव होता जाता है वैसी-वैसी वीतरागता बढ़ती
जाती है । सम्यग्दर्शन होते ही वीतरागता की शुरुवात होती है, क्योंकि वहाँ
(अनंतानुबंधी) क्रोध, मान, माया, लोभ चारों कषायों का अभाव होता है ।
आत्मा का स्वरूप देखनेपर उसमें अरहंत सिद्ध के समान ही अनंत गुण हैं,
जैसे ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, सुख, वीर्य इत्यादि । जब इन सब गुणों की
आंशिक शुद्धता प्रगट होती है, तब जीव साधक कहलाता है और जब पूर्ण
शुद्ध अवस्था प्रगट होती है तब वही जीव भगवान-परमेश्वर कहलाता है ।
वीतरागता चारित्र गुण की शुद्ध अवस्था है । कषाय चारित्र गुण की

अशुद्ध अवस्था है । शुभभाव और अशुभभाव चारित्र गुण की अशुद्ध अवस्था
के ही दो भेद हैं । इसे निम्नांकित चार्ट से इसप्रकार समझ सकते हैं –
चारित्र गुण की अवस्था

  • शुद्ध
  • अशुद्ध
    • शुभ (पुण्य)
    • अशुभ (पाप)
      जैनदर्शन को छोड़कर दूसरे किसी भी अन्य दर्शनों में इस शुद्ध अवस्था
      का वर्णन नहीं है और उसके प्राप्ति का मार्ग भी नहीं है ।
      सम्यग्दर्शन (श्रद्धा गुण की शुद्ध अवस्था), सम्यग्ज्ञान (ज्ञान गुण की
      शुद्ध अवस्था अर्थात् अतींद्रिय ज्ञान) और सम्यक्चारित्र (चारित्र गुण की आंशिक
      शुद्धता याने आंशिक वीतरागता) एकसाथ होती है । उस समय कषाय के
      एक चौकड़ी का याने अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ का अभाव होता
      है । गृहस्थावस्था में यह कार्य होता है ।
      अधिक आत्मस्थिरता के कारण वीतरागता बढ़नेपर व्रत ग्रहण करने के
      रागरूप परिणाम होते हैं तब उन्हें व्रती श्रावक कहते हैं (दो कषाय चौकड़ी
      का अभाव) । गृहस्थ अवस्था त्यागकर मुनिव्रत अंगीकार करनेपर जब
      वीतरागता और भी वृद्धिंगत होती है और तीन कषाय चौकड़ी का अभाव होता
      है तब उन्हें मुनि कहते हैं ।
      ऐसे मुनि अंतरंग में ही लीन रहते हैं तब पूर्ण वीतरागी बनते हैं,
      कषायों का अंश भी नहीं रहता । पूर्ण वीतरागता के पश्चात् वे सर्वज्ञ बनते
      हैं अर्थात् उनका ज्ञान पूर्ण विकसित होकर ‘केवलज्ञान’ कहलाता है । ऐसी
      वीतरागी और सर्वज्ञ अवस्था को अरहंत कहते हैं । शरीर का सद्भाव होने
      पर भी वे आत्मा में ही पूर्ण लीन रहते हैं । अरहंत की ॐकाररूप दिव्यध्वनि
      खिरती है, वह बिना इच्छा के ही खिरती है । उसमें मोक्षमार्ग का उपदेश
      होता है इसलिए उन्हें हितोपदेशी कहते हैं । वे जन्म, मरण, क्षुधा, तृष्णा,
      रोग, जरा (वृद्धत्व), भय, गर्व, राग, द्वेष, मोह, चिंता, रति, निद्रा, विस्मय,
      विषाद, खेद, और स्वेद इन अठारह दोषों से रहित होते हैं । हितोपदेशी होने

से अरहंत को आप्त कहते हैं । जिसके पास शस्त्र, अस्त्र, वस्त्र, माला,
अलंकार, स्त्री इत्यादि हैं, वे तो भगवान हो ही नहीं सकते क्योंकि वीतरागी
भगवान को राग-द्वेष, इच्छा, भक्तों का रक्षण या शत्रु का संहार करने के
भाव ही नहीं होते । हमें अपना निजकल्याण करना है अतः प्रथम ‘स्व’ कौन
है ? यह पहचानना आवश्यक है । तथा ‘स्व’ का पूर्ण शुद्ध स्वरूप मात्र
सच्चे देव को जानने से ही ख्याल में आता है । जिसप्रकार किसी ने इमली
दिखायी तो मुँह में पानी आता है, माता-पिता की याद आनेपर आँखों में आँसू
आते हैं, दादा-दादी का फोटो देखनेपर उन्होंने किये हुये लाड़-प्यार की याद
आती है । उसी प्रकार अरहंत, सिद्ध का स्मरण होते ही अंतरंग में वीतरागता
और सर्वज्ञता का ज्ञान होता है । जिसे ऐसा नहीं होता, उसने भगवान का
स्वरूप (वीतरागी और सर्वज्ञ) जाना ही नहीं ।
भगवान के सामने मात्र हाथ जोड़ना, नमस्कार करना, जप करना
भक्ति नहीं है । किंतु उनके गुणों के प्रति अनुराग-महिमा आना, आदर
भासित होना ही सच्ची भक्ति है । यदि उनके गुणों के बारे में जानकारी ही
नहीं होगी तो गुणों के प्रति आदर महसूस भी कैसे होगा ?
हम कषायों से ही परिचित हैं; क्योंकि रोज कषाय ही तो करते हैं !
परंतु वीतरागता का अनुभव अभी तक हमें न होने से वीतरागता की महिमा
हमें भासित नहीं होती । इसी वज़ह से जिन्हें आंशिक वीतरागता प्रगट हुयी
है ऐसे ज्ञानियों के ही भगवान के प्रति सच्ची भक्ति होती है । कषायों को
दबाने से वीतरागता उत्पन्न नहीं होती परंतु वीतरागता प्रगट होनेपर कषायों
की उत्पत्ति ही नहीं होती; इस उत्पन्न न होने को ही नाश हुआ कहते हैं ।
अब तक हमने यह देखा कि सम्यग्दर्शनपूर्वक मुनिपना और मुनिपनापूर्वक
देवपना होता है । जब मुनि को ही सम्पूर्ण परिग्रह आदि पापों का अभाव है,
उनके द्वारा अहिंसादि महाव्रतों का पालन होता है, मुख्यतः वे ज्ञान और ध्यान
में ही लीन रहते हैं, तो उनसे भी श्रेष्ठ अरहंत पद के धारक भगवान तो
उनसे भी श्रेष्ठ होना ही चाहिए । अरहंतों को परिग्रह (अस्त्र, वस्त्र, शस्त्र,
धन, धान्य, दास, दासी, अलंकार इत्यादि) कैसे हो सकते हैं ? कभी नहीं
हो सकते । अतः उनके प्रतिबिम्ब भी वीतरागता के सूचक ही होना चाहिए ।
सर्वज्ञ की संक्षिप्त परिभाषा इसप्रकार है - ‘ज्ञ’ अर्थात् To know –

जानना । जो सब को जानते हैं वे सर्वज्ञ हैं । सर्व अर्थात् विश्व में जीवद्रव्य,
पुद्गलद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य और कालद्रव्य ये छह द्रव्य हैं ।
इनकी संख्या तुम जानती ही हो । जीव अनंत, पुद्गल अनंतानंत, धर्म-अधर्म
आकाश एक-एक और कालद्रव्य असंख्यात हैं । इन सब द्रव्यों को, प्रत्येक
द्रव्य के अनंत गुणों को, प्रत्येक गुण की भूतकालीन, वर्तमानकालीन और
भविष्यकालीन सभी पर्यायों को, प्रत्येक पर्याय के अविभाग प्रतिच्छेदों को (पर्याय
शक्ति को मापनेवाला यह शक्ति का सबसे छोटा अंश है) एक समय में
युगपत् प्रत्यक्ष जानने का सामर्थ्य केवलज्ञान में है । ऐसा अनंतज्ञान जिन्हें
प्रगट हुआ है, उन्हें सर्वज्ञ कहते हैं । यह केवलज्ञान अतींद्रिय है । जब
आत्मा आत्मा में ही लीन होकर अपने को पूर्णरूपसे जानता है, उसीमें स्थिर
हो जाता है तब अन्तर्मुहूर्त में ही केवलज्ञान प्रगट हो जाता है जिसमें विश्व
के सर्व पदार्थ सहजरूप से झलकने लगते हैं । फिर भूत वर्तमान या भविष्य
काल की भी उसमें बाधा नहीं आती ।

तत्त्वाभ्यास की महिमा के बारे में हम अगले पत्र में समझेंगे । वीतरागता
और सर्वज्ञता शब्दों का अर्थ समझ में आनेपर भगवान का स्वरूप ख्याल में
आने में देर नहीं लगेगी । तुम्हें देव-स्तुति याद होगी, उसमें भी सर्वज्ञ और
वीतरागी का वर्णन इसप्रकार है –

सकल ज्ञेय-ज्ञायक – सर्वज्ञ; तदपि निजानंद रसलीन – वीतरागी, जिसने
राग-द्वेष कामादिक जीते – वीतरागी, सब जग जान लिया – सर्वज्ञ; सब जीवों
को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया – हितोपदेशी ।

पूर्ण वीतरागता प्रगट होनेपर ही सर्वज्ञता प्रगट होती है । देखो, यह
कितना सहज सुंदर नैसर्गिक नियम है । अगर किसी रागी-द्वेषी जीव
को सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती तो कितना अनर्थ होता इसका विचार भी नहीं
कर सकते । आज जगत में अधिक बुद्धि का उपयोग भी व्यक्तिगत स्वार्थ
के लिए और दूसरों के संहार के लिए हो रहा है यह हम पद-पद पर
देखते ही हैं ।

आज हमने सच्चे देव का स्वरूप निश्चित किया कि जो वीतरागी और
सर्वज्ञ हैं वे ही सच्चे देव हैं । अन्य किसी को भी देवपना अर्थात् ईश्वरपना
संभवता नहीं । सरागी देवताओं को कुदेव कहा गया है क्योंकि उनको पूजने

से राग-द्वेष की उत्पत्ति होती है और उनके उपदेश से मिथ्यात्व का पोषण
होता है । कुछ लोग अदेव को भी देव मानते हैं उसे देवमूढता कहा गया
है । जैसे पत्थर, नदी, धन (लक्ष्मी), नाग, गाय आदि को पूजना ।

कुदेवों को और अदेवों को देव मानना, उनके प्रति पूज्यत्व का या प्रशंसा
का भाव आना इसमें मिथ्यात्व का-अतत्त्वश्रद्धान का दोष (पाप) लगता ही
है; परंतु जो लोग वीतरागी सर्वज्ञ को ही देव मानते हैं किंतु उनका स्वरूप
विपरीत मानते हैं उनको भी वह दोष लगता है । जैसे वीतरागी देव से मन्नत
माँगना, उनके सामने पैसा, पुत्र, यश आदि की माँग करना या इच्छा करनी,
रोग ठीक हो जाये इसलिए पूजा, विधान करना यह भी मूर्खता का और
अज्ञानता का ही प्रतीक है । हाँ, ज्ञानी भी संकट के समय में ईश्वर की
भक्ति, पूजा करते हैं परंतु संकट से देव मुझे बचायेंगे इस भावना से नहीं
अपितु अपना चित्त वीतरागता के प्रति लगे और अशुभ परिणामों से बचे इतने
मात्र के लिए करते हैं ।

भगवान को कर्ता-हर्ता मानना, इच्छावाला मानना, रक्षणकर्ता मानना,
भगवान की इच्छा के सामने अन्य कोई उपाय नहीं ऐसा मानना यह सब
अज्ञान है । भगवान के स्वरूप को न जानने से यह अज्ञान उत्पन्न होता है ।

भगवान का स्वरूप जानकर वीतरागी अरहंत, सिद्धों को पूजने से हमें
अपने वीतराग स्वरूप शुद्धात्म स्वभाव की पहचान होती है और हमारी दृष्टि
त्रिकाली शुद्ध आत्मस्वभाव के सन्मुख होती है । ऐसा होनेपर ही सच्चे देव
की सच्ची भक्ति, पूजा होती है ।

मुझे पता है कि इस पत्र में बहुत सारे नये शब्द लिखे गये हैं जिसका
अर्थ अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा होगा । परंतु धीरज रखो, और दो पत्रों
के बाद विषय मूल से लिखना प्रारंभ करूंगी तब सब कुछ आसान लगेगा ।

अच्छा तो अगले पत्ररूप से फिर मिलते हैं ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ३ — तत्त्वाभ्यास की महिमा | Patrānk 3 — Tattvābhyās kī Mahimā

१२ जुलाई १९९३

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
गत दो पत्रों के प्रतिफल में प्राप्त प्रतिक्रिया और अधिक जानने की
तुम्हारी रुचि और उत्साह को देखते हुये यह पत्र लिख रही हूँ ।
परमात्मा का स्वरूप कैसा होता है इसके बारे में हमने पिछले पत्र
में देखा । प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकता है यह भी जाना । उसके
लिए ‘मैं आत्मा हूँ’ यह सबसे पहले मालूम होना आवश्यक है । हाल में
मनुष्य अवस्था में रहते हुये भी शरीर, मन, वाणी से मैं भिन्न हूँ और मेरा
अर्थात् शुद्धात्म स्वरूप का ज्ञान शास्त्राभ्यास के द्वारा करके, उसी प्रकार
प्रात्यक्षिक करके यह आत्मा अनुभव में आ सकता है ऐसा सौ टका विश्वास

  • श्रद्धा चाहिए ।
    कैसी मज़े की बात है देखो । आज के विज्ञान युग के जो आविष्कार
    हैं वे कभी कल्पनालोक की बातें हुआ करती थी; किंतु दृढ़ आस्था और
    आत्मविश्वास से खोज करते-करते उन्हें भी जब सत्य सिद्ध कर दिया है
    तो आत्मा-परमात्मा के बारे में जो भी कथन जिनवाणी में-दिव्यध्वनि में आया
    है वह तो त्रिकाल सत्य है और उसका दृढ़ श्रद्धान निश्चित ही जीव को
    भगवान बनाने में समर्थ है । जिनेन्द्र की वाणी ही सत्य को प्रतिपादन करती
    है अन्य वाणी नहीं, क्योंकि जिनेन्द्र का स्वरूप ही वीतरागी और सर्वज्ञ है ।
    वीतरागी याने जिनको मोह, राग, द्वेष का लवलेश भी नहीं है तो वे झूठ कहेंगे
    ही क्यों ? और सर्वज्ञ याने सब कुछ जाननेवाले वे झूठ कहेंगे ही कैसे ?
    जो सब कुछ जानते हैं उनका ही कथन यथार्थ होगा । इस श्रद्धा के बल
    पर हम भगवान क्यों नहीं बन सकते ?
    तीर्थंकरों की यह दिव्यध्वनि ॐकाररूप से उनके सर्वांग में से इच्छा
    के बिना खिरती है । समवशरण में बैठे हुये जीव - मनुष्य, तिर्यंच और देवगति
    के जीव अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार उसका अर्थ ग्रहण करते हैं । गणधर
    आचार्य भगवान के इस उपदेश को ग्रहण करके द्वादशांग की रचना करते
    हैं । इसीको आगम कहते हैं । यह आगम आचार्यों की परम्परा से दीर्घकाल
    तक प्राप्त होता है । उसमें से कुछ अंश आज ग्रंथरूप से उपलब्ध है । पूर्व
    काल में हुये अनेक महान आचार्यों के अपने ऊपर महान उपकार हैं कि
    उन्होंने परम्परा से प्राप्त गुरुओं का उपदेश, आगम का अभ्यास और स्वानुभव
    से प्राप्त ऐसा ज्ञान का भंडार ग्रंथरूप से लिखकर रखा है जो आज भी हमें
    उपलब्ध है । हमारे पूर्वजों के भी महान उपकार हैं कि दो हजार वर्षों से
    भी पुराने ग्रंथ उन्होंने आज तक हमारे लिए सुरक्षित रखें, हमें उपलब्ध
    करायें । पहले तो सब हस्तलिखित ही था । छपाई के इस युग में घर-घर
    में ग्रंथ पहुँच गये हैं ।
    देव, गुरु और शास्त्र तो वंदनीय हैं; क्योंकि उन्हीं के कारण हमें धर्म
    का स्वरूप याने वस्तुस्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है । अरहंत, सिद्ध, साधु
    इन्हें हम ‘लोगुत्तमा’ अर्थात् लोक में-विश्व में सबसे उत्तम कहते हैं, मंगल
    कहते हैं; उत्तमपना और मंगलपना उन्हें वीतराग विज्ञानता के कारण प्राप्त
    हुआ है । हम देवों के आगे नतमस्तक होते हैं, उनकी शरण में जाते हैं ।
    परंतु ये देव किसकी शरण में गये थे ? वे तो वीतराग विज्ञान स्वरूप निज
    शुद्ध आत्मा में नत और रत हो गये । हम ईश्वर के चरण में इसलिए
    झुकते हैं कि हम उनका आदर्श अपने सामने रखें, उन्होंने कौनसा मार्ग
    अपनाया यह देखने के लिए और न कि सिर्फ भगवानदास बनने के लिए ।
    कॉलेज में जाकर अध्यापकों की सिर्फ स्तुति करने से, सिर्फ उनके
    चरणों में झुकने से तुम्हें डिग्री (उपाधि) प्राप्त नहीं होगी । उन अध्यापकों के
    निर्देशन में स्वयं अभ्यास और बारम्बार प्रयोग करके ही कोई भी ज्ञान, कला,
    पदवी प्राप्त कर सकते हैं । यहाँपर भी ऐसा ही है । अरहंत, सिद्ध, साधु
    को मात्र नमस्कार करना कार्यकारी नहीं है, परंतु ‘केवलि पण्णत्तं धम्मं सरणं
    पव्वज्जामि’ याने केवलीप्रणीत जो धर्म है, उसकी शरण में जाना चाहिए अर्थात्
    उस मार्ग का अवलंब लेना चाहिए ।
    धर्म के बारे में लोगों के विविध मत-मतांतर सुनने में आते हैं । कोई
    कहते हैं हमें धर्म का उद्धार करना चाहिए । वे शायद यह नहीं जानते हैं
    कि धर्म का आधार लेने से दुःखी और अज्ञ जीवों का उद्धार होता है । हरेक
    को चाहिए कि वे धर्म का नहीं अपितु धर्म के आधार से अपना उद्धार
    करें । धर्म अर्थात् वस्तुका स्वरूप, वस्तु याने द्रव्य । धर्म तो तीनों काल में
    जैसा है, वैसा ही रहता है । जैसे अग्नि का धर्म उष्णता है । पांच हजार
    वर्षों के पहले भी अग्नि उष्ण थी और आज भी उष्ण ही है; भारत में भी
    उष्ण है और अमरिका में भी उष्ण ही है । इसीसे पता चलता है कि वस्तु
    का धर्म याने स्वभाव तीनों काल में और तीनों लोकों में एक जैसा कायम
    रहता है, कभी बदलता नहीं है ।
    वस्तु के धर्म याने स्वरूप का कथन सत्शास्त्रों में किया हुआ है ।
    उसका हमें अभ्यास करना चाहिए, वह भी किसी के मार्गदर्शन से, नहीं
    तो अपनी बुद्धि से गलत अर्थ ग्रहण करके हम दिशाहीन हो सकते हैं ।
    जिसतरह स्कूल में क, ख, ग, घ से शुरुवात करके हर वर्ष अधिकाधिक
    ज्ञान दिया जाता है, उसीतरह इस बारे में भी प्रारंभिक विषय से शुरुवात
    करके ही आगे बढ़ना चाहिए । अधिकांश लोग इस तत्त्वज्ञान से और अभ्यास
    से दूर ही रहते हैं ।
    अनेकों को यह एक Scientific Study है इसका पता नहीं है ।
    बेटा, औरों की तो बात ही क्या, मुझे भी बचपन में ऐसा ही लगता था कि
    अपने भगवान और गुरु दिगंबर रहते हैं, अपने धर्म में उपवास और व्रत
    कठिन होते हैं, पूजा, व्रत, दानधर्म व यात्रा करने से धर्म होता है । सच कहो
    तो तत्त्वज्ञान के अभ्यास के बिना धर्म का स्वरूप ही नहीं समझा जा सकता
    तो फिर धर्म (वीतरागता) प्रगट करना तो दूर ही है ।
    कुछ लोग जो लौकिक दृष्टि से सुखी हैं, जिन्हें थोड़ी बहुत लौकिक
    सफलता और समृद्धि मिली हैं, उन्हें ऐसा लगता हैं कि हमें नहीं चाहिए वह
    तत्त्वज्ञान और अध्यात्म । जब हमें मोक्ष की चाह ही नहीं है, तो हम फिजूल
    में वर्तमान सुखों से वंचित क्यों रहें ?
    जरा सोचो तो सही, जो सुख तत्त्वज्ञान के अभ्यास से नष्ट होता होगा
    उसे सुख ही कैसे कहा जायेगा ? तुम्हें याद हैं ? बचपन में तुम तुमने देखे
    हुये सपने मुझे विस्तार से बताया करती थी, उन्हें बताते हुये भी कभी
    तुम ड़रती थी और कभी हँसती थी । मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं देखकर
    तुम्हें गुस्सा भी आता था कि तुम्हारे कहने का किसी भी प्रकार का कोई
    असर क्यों नहीं होता ? परंतु अब तुम समझ सकती हो कि सपनों में
    देखे हुये दृश्यों की और उनसे उत्पन्न भावों की जागृत अवस्था में कोई भी
    कीमत नहीं करता ।

तत्त्वों के अभ्यास करने से ऐसे सपने टूटते हैं, जागृत अवस्था आती
है । जिन बातों में सुख है ही नहीं उनमें से सुखबुद्धि नष्ट होती है ।

हम जिसे सुख मानते हैं वह संसार का सुख सचमुच चिन्तारहित
Tension Free है क्या ? ‘मेरा यह ऐश्वर्य कायम कैसे रहेगा ? मेरे प्रिय
माँ, बाप, पुत्र मुझे छोड़कर चले तो नहीं जायेंगे ? मुझे लम्बा आयुष्य तो
प्राप्त होगा की नहीं, मैं और मेरे कुटुंबी जन निरोगी रहेंगे या नहीं ?’ ऐसी
एक दो नहीं, अनेक चिंताओं से हम घिरे रहते हैं ।

देखो ना, समाज के अनेक स्तरों के अनेक व्यक्ति मेरे पास आते हैं,
दरिद्री से लेकर अमीरों तक और बालकों से लेकर वृद्धों तक । उनका दुःख
उनकी बीमारी तक ही मर्यादित नहीं रहता । अपने नज़दिकी कुटुंबियों से भी
जो दुःख कहे नहीं जाते ऐसे दुःख ये लोग फॅमिली डॉक्टर होने के नाते मुझे
बताते हैं । अमीर और बाहयतः सुखी दिखनेवाले ये लोग जब अपने दुःख
बताते हैं, तो वे मुझे अंतर्मुख बनाते हैं । इन दुःखों के कारण और उनके
उपाय ये दोनों अपने तत्त्वज्ञान में ही मिलते हैं । तब तत्त्वाभ्यास की जरूरत
और महत्ता और भी अधिक तीव्रता से महसूस होती है ।

तत्त्वाभ्यास से मनुष्य धर्मांध होता है यह सोच-समझ भी सर्वथा गलत
है । सत्य क्या है, असत्य क्या है यह बताकर, असत्य मतों का न्यायपूर्वक
खंडन करके सत्य धर्म - दिगंबर जैन धर्म अर्थात् केवलीप्रणीत उपदेश ही
सत्य क्यों है ? इसका प्रतिपादन अनेक ग्रंथों में किया हुआ है । जैसे
मोक्षमार्गप्रकाशक, रत्नकरंड श्रावकाचार, राजवार्तिक आदि ।

कोई कहते हैं कि हमें तो सब धर्म एक जैसे ही हैं । (१) हम
सब धर्मों का तत्त्वज्ञान पढ़ते हैं, (२) सब देवों को नमस्कार करते हैं,
(३) णमोकार मंत्र में भी तो विश्व के सर्व साधुओं को नमस्कार करने को
कहा है ना ? उसका उत्तर ऐसा है -

(१) सर्व धर्मों के तत्त्वज्ञान पढ़ने का कोई निषेध तो नहीं है क्योंकि
ऊपर जिन ग्रंथों के नाम लिखे हैं, उन ग्रंथों के ग्रंथकर्ताओं ने अन्य सब
दर्शनों का (अन्य तत्त्वज्ञान का) भी तुलनात्मक अध्ययन किया था । हमने
कभी सुने भी नहीं होंगे ऐसे धर्मों के नाम और उन धर्मों के तत्त्वज्ञान का
सूक्ष्म विवेचन उन ग्रंथों में किया हुआ है । इसके अतिरिक्त उन आचार्यों का
और पंडितों का न्यायशास्त्र का गहन अध्ययन था । इन्होंने सब धर्मों का
अध्ययन करके पश्चात् जैन दर्शन ही कैसे श्रेष्ठ है यह साधार सिद्ध किया
है । ऐसा निर्णय करने लायक लम्बी उम्र हरेक व्यक्ति को मिलेगी ही यह
संभव नहीं है ।
(२) सब देवों को याने कुदेवों को, अदेवों को नमस्कार करनेवाला
व्यक्ति परीक्षाप्रधानी हो ही नहीं सकता । मामुली मिट्टी का घड़ा खरीदना हो
तो भी हम उसे ठोक बजाकर खरीदते हैं लेकिन देव के बारे में वह देव है
या नहीं इसका विचार न करके सबको एक ही नाप से नापते हैं और सब
को समान समझते हैं । इसी को विनय मिथ्यात्व कहा है ।
हम ये बातें लोकरूढ़ी से, अन्य धर्मियों से निरंतर होनेवाले संस्कारों के
कारण विचार किये बिना ही करते हैं; विचार करनेवालों को पुराने खयालात के
समझते हैं और अपने को सर्वधर्मसमभाव है ऐसा दावा करते हैं । सच तो
यह है कि समभाव का अर्थ साम्यभाव अर्थात् न राग न द्वेष । परंतु जो सब
देव-देवताओं को नमस्कार करते हैं वे रागवश ही तो करते हैं ।
(३) णमोकार मंत्र में ‘णमो लोए सव्व साहूणं’ अर्थात् ‘जगत के सब
साधुओं को नमस्कार’ ऐसा जो कहा है वहाँ साधु शब्द का अर्थ है दिगंबर
जैन मुनि । आचार्य, उपाध्याय और साधु इन सबको मिलकर भी ‘साधु’ शब्द
से संबोधित किया जाता है जैसे ‘साहू मंगलं’, ‘साहू लोगुत्तमा’ आदि । जब कोई
व्यक्ति णमोकार मंत्र पढ़कर उसके अर्थ में से भी अनर्थ कर सकता है तो
शास्त्र पढ़कर वह क्या-क्या अनर्थ करेगा इसकी कल्पना भी नहीं की जाती ।
‘शास्त्रों के अर्थ करने की पद्धति’ के बारे में हम अगले पत्र में समझेंगे ।
कुछ लोग कहते हैं आप चाहे जितना स्वाध्याय कीजिए हम से बने
उतनी मदद करने को हम अवश्य तैयार हैं परंतु हमें इसमें मत घसीटो ।
ऐसा अगर कहते रहेंगे तो कोई भी ज्ञान एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक
नहीं जायेगा ।
आजकल ढ़ाई-तीन बरस के बच्चों को स्कूल में भरती करते हैं, भरती
कराने के लिए माँ-बाप कहीं-कहीं बीस पचीस हजार रुपये डोनेशन भी देते
हैं और स्कूल में प्रवेश मिलनेपर अपने आपको कृतकृत्य समझते हैं । शुरू-
शुरू में बच्चे जोर शोर से रोते हैं फिर भी माँ-बाप बड़ी शांति से उन्हें रोते
बिलखते छोड़कर घर लौटते हैं । इसका यही एक कारण है की वे जानते
हैं शिक्षण के बिना कोई चारा नहीं है, मान, प्रतिष्ठा, पैसा कुछ मिलनेवाला
नहीं हैं । तत्त्वज्ञान की आवश्यकता और महत्ता हम माँ-बाप को जब तक
महसूस नहीं होती तब तक हम अपने बच्चों को वह कैसे दे सकते हैं ? और
तो और, आज कल अनेक बच्चे अंग्रेजी मिडियम में पढ़ते हैं और वे भी इस
तत्त्वज्ञान के अभ्यास से अधिक दूर होते जाते हैं । इसकारण हम माँ-बाप
की जिम्मेदारी और भी बढ़ गयी है । यह हमारा कर्तव्य है कि जिनवाणी का
अनमोल भंडार उन्हें भी उपलब्ध हो । अंग्रेजी भाषा में भी जैन तत्त्वज्ञान
भाषांतरित रूप से उपलब्ध हो रहा है । यह इन बच्चों का भाग्य ही है ।

हमारा पहला पत्र पढ़कर रेश्मा ने कहा था, भाषा के कारण कुछ शब्द
समझ में नहीं आये परंतु दो तीन बार पढ़नेपर विषय समझ में आया । आत्मा
और शरीर के बारे में मेरे विचार आज तक अलग ही थे परंतु वस्तुस्थिति
कुछ और ही है यह मुझे समझ में आया ।

अरी बिटिया, लौकिक जीवन में तो हम अनेक विषयों का ज्ञान संपादन
करते रहते हैं । रीना, तेरे ससुरजी - शशीकांतभाईजी का उदाहरण देखो
ना । नानाविध विषयों के संबंध में उनका वाचन और गहरा अध्ययन सराहनीय
है । विविध क्षेत्रों में प्राप्त अत्याधुनिक टेक्नॉलॉजी, मेडिकल सायन्स, आयुर्वेद,
फिल्म टेक्नॉलॉजी, नयी खोज आदि के बारे में और अन्य भी अनेक विषयों
के वे जानकार हैं । जैन तत्त्वज्ञान के जानने में उनकी जिज्ञासा भी सराहनीय
है । ऐसा open mindedness (खुला चिन्तन) होगा तो कोई भी विषय
समझने में देर नहीं लगेगी ।

आचार्य अमृतचंद्र ने अपने ‘आत्मख्याति’ ग्रंथ में कहा है, ‘अयि कथमपि
मृत्वा तत्त्वकौतुहली सन्’ याने ‘अरे भाई ! किसी भी प्रकार से - मरकर भी
तत्त्व का अभ्यास करने की जिज्ञासा कर, कुतुहल कर ।’ आज इतना
लिखकर ही विराम लेती हूँ । अगले पत्र द्वारा फिर मिलेंगे ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ४ — जैन शास्त्रों के अर्थ करने की पद्धति | Patrānk 4 — Jain Śāstroṁ ke Arth Karne kī Paddhati

१५ अगस्त १९९३

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
पत्रों की तुम बड़ी आतुरता से राह देखती हो यह पढ़कर अच्छा
लगा । इन पत्रों को सम्हाल कर रखती हो यह बहुत अच्छी बात है । क्योंकि
बार-बार पढ़ने से उसका मर्म अधिक ख्याल में आता है । शुरुवात में अनेक
नये शब्द पढ़कर उलझन में पड़ सकती हो लेकिन पुनः-पुनः वाचन करने से
वे शब्द याद हो जाते हैं । हम टी.व्ही. सिरीयल देखते हैं तब पहले दो तीन
एपिसोड देखने के बाद ही पात्रों की पहचान होने लगती है, है ना ?
हम सभी को तत्त्वज्ञान की नितांत आवश्यकता है । यह हमने पिछले
पत्र में लिखा था । परंतु तत्त्वाभ्यास करना याने नक्की क्या करना ? ऐसा
अगला सवाल हमारे मन में खड़ा होता है । क्योंकि जैन शास्त्र तो बहुत सारे
हैं । हम अपने आप वाचन करने लगते हैं तो कुछ अर्थबोध नहीं होता । जैन
शास्त्रों का ही नहीं प्रत्येक विषय के बारे में ऐसा ही होता है । मेडिकल
सायन्स की, इंजिनियरिंग की किताबें बजार में उपलब्ध होनेपर भी सम्बन्धित
कॉलेज में भरती होकर, वहाँ पढ़कर ही विद्यार्थी डॉक्टर अथवा इंजिनियर
बनता है । हर एक विषय का ज्ञान उस विषय के जानकार विशेषज्ञ से ही
प्राप्त करना चाहिए ।
जैन शास्त्रों में से अर्थ निकालना यह आत्मज्ञानी गुरु का ही काम
है । जिन्होंने वीतरागता प्रगट की है, वे ही शास्त्रों के शब्द का मर्म जानते
हैं और वे ही उसमें से अर्थ निकाल सकते हैं । शास्त्रों का अर्थ करना केवल
शब्दार्थ तक ही सीमित नहीं है । शब्दार्थ के साथ भावार्थ, आगमार्थ, नयार्थ,
मतार्थ भी समझना आवश्यक है ।
अपना घर का ही उदाहरण देखो । किसी अनजान बालिका को कहा
कि देख यह जो दूध है ना, उसमें घी है उसे अलग कर दो । वह बालिका
या तो उलझन में पड़ेगी या आजकल के स्मार्ट बच्चों की तरह कहेगी, ‘माँ,
तुम तो कुछ समझती तो है नहीं, तुम्हें दूध में घी कहाँ दिख रहा है ?’
उसकी जगह घर में अगर ऐसी कोई जानकार महिला हो कि जो घी
कैसे बनाया जाता है यह जानती है और हमेशा घी बनाने की जिसे प्रैक्टिस
है वह दूध से घी बनाने की विधि बता सकती है । वैसे ही शास्त्र के जानकार
आचार्य हमें शास्त्रों में से अर्थ कैसे ग्रहण करना इसकी विधि बताते हैं । अब
उसकी चर्चा करेंगे ।

शब्दार्थ – गाथा का अथवा वाक्यों का शब्दशः अर्थ करना उसे शब्दार्थ
कहते हैं । मात्र शब्दार्थ करने से उसका भाव समझेगा ही ऐसा नहीं । जैसे
छोटे बच्चे सिनेमा के गीत गुनगुनाते हैं ‘मुझे प्यार हो गया’ परंतु उसका भाव
तो वे नहीं जानते । शास्त्रों का मर्म समझने के लिए शब्दार्थ के साथ भावार्थ
जानना भी जरूरी है ।

भावार्थ – शब्दों का मर्म विशद करके बतानेवाला भावार्थ है । संस्कृत,
प्राकृत का गाढ़ा पंडित है इसलिए वह भावार्थ निकाल सकेगा ही ऐसा
नहीं । शब्दों के अर्थ के साथ-साथ उनमें छिपे हुये भावों को समझना
पड़ेगा । जैसे कोई बालक बिना पूछे ६ से ९ के शो में सिनेमा देखकर घर
लौटेगा तो उसकी माँ उससे कहेगी, ‘बहुत सयाना है तू ! जा दूसरा शो भी
देखकर आ ।’ माँ की बात का व्यंगार्थ समझेगा तो बालक को अपनी भूल
का एहसास होगा और यदि मात्र शब्दार्थ ग्रहण करेगा तो वह सोचेगा माँ
मुझपर आज प्रसन्न है, तभी तो दूसरा शो देखने को कह रही है । वैसा ही
मानकर वह पुनश्च सिनेमा देखने चला जाये तो मूर्ख ही माना जायेगा ।

आगमार्थ – जिनागम अर्थात् संपूर्ण जैन आगम - जिसे हम शास्त्र
कहते हैं, उस जिनागम का चार अनुयोगों में विभाजन होता है । विवक्षित
कथन अध्यात्म ग्रंथ का है, आचार ग्रंथ का है, करणानुयोग का है या
प्रथमानुयोग का है यह देखकर उसके अनुसार उसका अर्थ जानना और उस
कथन का अभिप्राय समझना आवश्यक है । वैसा जाने बिना जिनवाणी के ही
दो भिन्न-भिन्न कथनों में विरोध भासित होना संभव है ।

नयार्थ – सम्यक्श्रुतज्ञान के अंश को नय कहते हैं । वस्तु को अनेक
अपेक्षाओं से जाना जा सकता है । जिस अपेक्षा से कथन किया हो उस
अपेक्षा से अर्थ समझना इसे नयार्थ कहते हैं । जैसे, जब हम ‘घी का
घड़ा’ ऐसा कहते हैं तब ‘जिस घड़े में घी रखा है वह घड़ा’ इसतरह संयोग
की अपेक्षा से मिट्टी के घड़े को घी का घड़ा कहा है ऐसा यथार्थ अर्थ
समझ लेते हैं ।
हमने पहले पत्र में लिखा था कि शरीरसहित जीव को शरीर के संयोग
की अपेक्षा से मनुष्यजीव, तिर्यंचजीव आदि कहते हैं । वर्तमान में जीव की
कौनसी अवस्था है और उस अवस्था के कौनसे गुणधर्म हैं, यह अपेक्षासहित
बताना एक नय का काम है तो शुद्ध जीव के स्वरूप का वर्णन करना दूसरे
नय का काम है । ‘किसी अपेक्षा से’ इसके लिए ‘कथंचित्’ अर्थात् स्यात्
शब्द का प्रयोग किया जाता है । जैन शास्त्रों का कथन स्यात् कथन अर्थात्
स्यात् वाद याने स्याद्वादरूप है । इसी कारण जिनवाणी को ‘स्याद्वादमयी
वाणी’ कहते हैं । शास्त्र में हर कथन के साथ स्यात् कहकर अपेक्षा का
कथन किया ही होगा ऐसा नियम नहीं है, फिर भी जैन शास्त्रों में स्यात्
कथन ही होता है । इसलिए कहाँ कौनसी अपेक्षा के साथ कथन किया है
यह जानना अत्यावश्यक है । ‘नयचक्र’ अपने आप में बहुत बड़ा और गंभीर
विषय है उसका विस्तार तो अभी संभव नहीं है, पर दो चार नयों के नाम यहाँ
बता देती हूँ - निश्चयनय, व्यवहारनय, द्रव्यार्थिकनय, पर्यायार्थिकनय । इनका
अर्थ अभी नहीं बताऊँगी । भविष्य में कभी पढ़ोगी तब तक उसके लिए
आपको उत्सुकता जगे इसलिए अभी उनमें से कुछ नाम लिखे हैं ।
मतार्थ – शास्त्रों का कथन अर्थात् मात्र वीतराग सर्वज्ञ का कथन ही
किसतरह सत्य है उसके लिए अनेक तर्क और युक्तियाँ दी जाती हैं । कोई
दो पंक्ति का श्लोक क्यों न हो, परंतु उसमें से प्रत्येक शब्द अन्य मतों का
(अन्य दर्शनों का) खंडन कर सकता है ।
जैन शास्त्र सर्वज्ञ कथित हैं । ॐकाररूप से दिव्यध्वनि खिरती है ।
गणधर इसकी द्वादशांगों में रचना करते हैं । अनेक आचार्यों की परम्परा से
यह द्वादशांग का उपदेश चलता आ रहा है । आत्मानुभवी वीतरागी दिगंबर
जैन मुनियों ने उस परम्परा उपदेश के अनुसार शास्त्र लिखे हैं । सिर्फ पहली
पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक Pass on नहीं किया लेकिन स्वयं आत्मानुभव से
उस वाणी की प्रतीति करके ही उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया है ।
इसतरह स्वमत की नाना युक्तियों से स्थापना तथा परमत के दोषदर्शन करके
उनका निराकरण करना मतार्थ है ।

संपूर्ण जैन आगम को चार विभागों में विभाजित कर सकते हैं । ग्रंथ
में कौनसे विषय की चर्चा है, किसका वर्णन है उसके अनुसार यह विभाजन
होता है । इस पद्धति को अनुयोग कहते हैं । प्रथमानुयोग, चरणानुयोग,
करणानुयोग और द्रव्यानुयोग ऐसे ये चार अनुयोग हैं ।

प्रथमानुयोग – जीवों को धर्म के प्रति रुचि जागृत हो इस हेतु से
कथारूप से तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि के चरित्र का वर्णन जिन ग्रंथों में किया
जाता है और जिन ग्रंथों में कथाओं के माध्यम से तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया
जाता है उसे प्रथमानुयोग कहते हैं ।

शुरुवात में जीवों को पुण्य का और उसके फल में प्राप्त होनेवाली
सामग्री का आकर्षण रहता है । इसलिए पुण्य का माहात्म्य बताकर जीवों को
सत् धर्म के प्रति रुचि उत्पन्न कराते हैं । छोटे बच्चों को टॉफी-चॉकलेट की
लालच दिखाकर स्कूल में जाने के लिए उनका मन तैयार कराते हैं वैसे ही
यह है । णमोकार मंत्र का माहात्म्य बताकर देवदर्शन, णमोकार मंत्र, पूजा,
स्वाध्याय इनके प्रति जीवों को प्रेरित किया जाता है । तत्पश्चात् ऐसे जीवों को
अरिहंत, सिद्ध का स्वरूप, उनका बताया हुआ मार्ग अर्थात् उपदेश का ज्ञान
कराया जाता है ।

णमोकार मंत्र के माहात्म्य से एक बात याद आ गयी । तुम दोनों को
बातें प्रिय लगती हैं इसलिए बताती हूँ । प्राध्यापक शिवाजीराव भोसले (महाराष्ट्र
के एक सुप्रसिद्ध वक्ता जो जैनदर्शन पर भी व्याख्यान देते हैं, विश्वविद्यालय
में कुलपति रह चुके हैं) की यह बात है । उन्हीं के मुख से १९८४ में सुनी
थी । उनके गाँव फलटण में एक स्त्री थी जो किसी को भी बिच्छू काटनेपर
मंत्र पढ़कर बिच्छू का विष उतारती थी । कितने ही लोग उसके पास बिच्छू
काटनेपर इलाज के लिए जाते थे । बचपन में इस बात ने उनके मनपर
गहरा प्रभाव डाला था । बड़ा होनेपर उन्होंने उस स्त्री से पूछनेपर उन्हें
पता चला कि वह स्त्री ‘णमोकार मंत्र’ पढ़कर बिच्छू के विष का इलाज
करती थी । उन्होंने विचार किया कि णमोकार मंत्र का इतना माहात्म्य है तो
जैन तत्त्वज्ञान का माहात्म्य कितना बड़ा होगा ! ऐसा सोचकर उस घटना से
प्रेरणा पाकर उन्होंने जैन फिलॉसॉफी (तत्त्वज्ञान) का गहरा अध्ययन किया ।
इसीप्रकार जिन कथाओं से धर्माचरण की प्रेरणा मिले, वह शैली प्रथमानुयोग
कही जाती है ।
प्रथमानुयोग के कथाओं द्वारा हमें योग्य संस्कार प्राप्त होते हैं । हमारे
इर्द-गिर्द जो लोकरूढ़ियाँ चलती हैं, हम जो बातें सुनते-पढ़ते हैं, हम
टी.व्ही. देखते हैं, गाने सुनते हैं इन सबका प्रभाव हमारे मनपर होता
रहता है । इनके बारे में हम जाने-अनजाने में विचार करते रहते हैं ।
वैसे ही हम प्रथमानुयोग की कहानियाँ पढ़ेंगे तो हमारा मन भी उसी के
बारे में सोचेगा ।
कुछ लोगों को पुराणकथाओं की कई बातें असंभवनीय लगती हैं ।
कितने ही लोग इन बातों की मज़ाक उड़ाते हैं । परंतु आज के विज्ञान युग
में कितनी ही अशक्य लगनेवाली बातें सहज शक्य हो रही हैं तो फिर भूतकाल
में उनका होना शक्य नहीं था ऐसा क्यों सोचे ? पूर्व काल में मंत्रसामर्थ्य
अवगत था आज तंत्रसामर्थ्य (तांत्रिकज्ञान) विकसित हो गया है । इसलिए
वैज्ञानिक अभ्यासात्मक दृष्टिकोण से उनकी तरफ देखना पड़ेगा ।
कोई भी अनुयोग पढ़ो, चारों अनुयोगों का सार वीतरागता है, यह
वीतरागता उन ग्रंथों में से प्रतीत होगी - समझ में आयेगी तो ही उस अनुयोग
का वांचना कार्यकारी होगा । प्रथमानुयोग कथा कहानियों के लिए नहीं, किंतु
वीतरागता प्राप्त कराने के लिए ही है । तीर्थंकरों का चरित्र पढ़कर यह पता
चलता है कि किसतरह एक बालक आत्मज्ञानपूर्वक मुनि, अरिहंत और सिद्ध
बनता है । किसी जीव का अनेक भवों का वर्णन पढ़कर यह बात ध्यान में
आती है कि प्राप्त मनुष्यपर्याय जितना ही मैं नहीं हूँ । सर्वाधिक संपत्ति और
वैभव के स्वामी चक्रवर्ती भी उन सारे वैभवों का त्याग करके मुनि बनकर मोक्ष
की प्राप्ति करते हैं । इस बात से भी यह सिद्ध होता है कि संपत्ति, वैभव
या अधिकार में कहीं भी कुछ भी सुख नहीं है ।
चरणानुयोग - आचरण के बारे में ये जो ग्रंथ हैं उनमें प्रारंभ में ही
सम्यग्दर्शन का माहात्म्य और उसका स्वरूप बताकर सम्यग्दर्शनपूर्वक ही व्रत
और तप होते हैं इसका वर्णन आता है । सम्यग्दर्शन को ही प्रथम कर्तव्य
बताया है । सम्यग्दर्शन से धर्म की शुरुवात होती है, मोक्षमार्ग प्रारंभ होता
है । आगे चलकर इस मोक्षमार्ग का स्वरूप कैसा होता है इसका बाह्य
आचरणों के द्वारा वर्णन करते हैं । अंतरंग में वीतरागता और उस वीतरागता
के अनुरूप बाह्य आचरण का सुमेल रहता है इसलिए उन्हें मोक्षमार्ग का
सहचर कहा है ।

जिन्हें तत्त्वज्ञान जानना है उन जीवों को भी सदाचार युक्त जीवन जीना
अत्यंत आवश्यक है, नहीं तो तत्त्वज्ञान सुनकर शांति के बदले क्रोधाग्नि भभक
उठता है, ऐसे भी लोग देखने में आते हैं । तुम्हें पता ही है कि उबलते हुये
तेल में शीतल स्वभावी पानी का एक छींटा भी पड़े तो ताड़-ताड़ आवाज होकर
आग लगने की संभावना रहती है; परंतु उसके बदले पकोड़े ड़ालने से तलकर
ऊपर आते हैं । तीव्र कषायी जीवों का भी जिनवाणी सुनकर विरोध बढ़ता है
और भयानक रूप लेता है । अपने ही कल्याण की बातें सुनकर जिन्हें क्रोध
उत्पन्न होता है उनका कल्याण होना अभी दूर है ऐसा समझना चाहिए ।

धार्मिक अभ्यास का अर्थ धर्मांधता नहीं है । लौकिक सज्जनता और
नैतिकता के बिना कोरा शास्त्राभ्यास बदनामी का कारण बनता है । उसका
उपदेश और संस्कार तो तुम्हें माता-पिता, दादा-दादी, स्कूल के शिक्षक
से प्राप्त हुआ ही है । वह तो प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य ही है ।
कहा भी है -

माता वैरी पिता शत्रु येन बालो न पाठिताः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

करणानुयोग - करण याने गणित के सूत्र । जीवों के अनेक प्रकार
के भाव, शरीरादि की अपेक्षा से जीवों का वर्णन, गुणस्थान, मार्गणा, कर्मों का
विस्तृत वर्णन, त्रिलोक की रचना आदि अनेक चीज़ों का सूक्ष्म वर्णन इस
अनुयोग में किया है । इसमें गणित के सूत्र, विविध संख्या, संख्यामान,
संख्यातीत ऐसे असंख्यात का और अनंत का स्वरूप और उनके भी अनेक
भेद बतायें हैं । हमने जो गणित विषय पढ़ा है उसमें केवल Innumerable
कहकर संख्यातीत को बताया जाता है परंतु इस करणानुयोग में Innumerable
के भी पल्य, सागर, सूच्यंगुल, घनांगुल, जगत्श्रेणी, जगत्प्रतर, लोक आदि
मापदण्डों का वर्णन पढ़कर हम आश्चर्य से दंग होकर रहते हैं । उसके आगे
अनंतों (Infinite) के भी अनेक प्रकार बताये हैं । यह बहुत ही Interesting
Subject है । बुद्धि के लिए आव्हान तो है ही, अनेक प्रकार की विचित्र बातों
का ज्ञान भी होता है । और सच कहूँ तो ये ग्रंथ पढ़नेपर केवलज्ञान के याने
सर्वज्ञता के स्वरूप की अगाधता का भान होता है ।

अनेक प्रकार के जीव, उनकी ८४ लाख योनियाँ, काल के नापने का
साधन, परिणामों की विचित्रता आदि देखनेपर संसारसागर की अगाधता का
भावभासन होता है । प्राप्त मनुष्यपर्याय कितनी अल्प है और उसका सही
उपयोग करने से अर्थात् जिनवरकथित मार्ग की पहचान और प्राप्ति करने
से ही बचने का उपाय हो सकता है इसका पद-पद पर एहसास होने लगता
है । इस अनुयोग के पढ़ने से ज्ञान में वृद्धि होती ही है, बुद्धि भी तीक्ष्ण होती
है, उपयोग सूक्ष्म होता है, सर्वज्ञ की प्रचीति होती है ।

द्रव्यानुयोग – इसे ही परमागम अथवा अध्यात्मशास्त्र ऐसा भी कहते
हैं । इसमें आत्मा की अनुभूति प्राप्त हो इस उद्देश से आत्मा का वर्णन, अन्य
द्रव्यों से उसकी भिन्नता, भेदज्ञान, आत्मिक शक्तियाँ आदि का वर्णन है ।
इसमें द्रव्य, गुण, पर्यायों का स्वरूप बताकर उनके भेद-प्रभेद बतलाकर अभेद
ऐसे आत्मा का वर्णन और उसे जानने का मार्ग बताया है । प्रयोजनभूत तत्त्वों
का स्वरूप बताकर स्वतत्त्व की प्राप्ति का उपाय बताया है ।

जिनवाणी की अगाधता देखकर उसकी उपेक्षा करना, अरुचि प्रदर्शित
करना उचित नहीं है । जिनवाणी में तो शुद्धात्मा का वर्णन और उस शुद्धात्मा
को जानने का मार्ग बताया है; और यह शुद्धात्मा अन्य कोई नहीं स्वयं मैं
ही हूँ ऐसा हरेक को लगना चाहिए । अगर अपनी अभिनंदन सभा चल रही
हो और अनेक वक्ता अपनी स्तुति कर रहें हो तो वह अपने को प्रिय लगती
है, उसमें कंटाला और आलस नहीं आता वैसे ही शास्त्रों के बारे में लगना
चाहिए क्योंकि इसमें अपनी याने आत्मा की ही चर्चा है । यदि हमें ये शास्त्र
पढ़ने हैं तो शुरुवात कहाँ से और कैसे करें इसके बारे में अगले पत्र में
समझेंगे ।

अच्छा ! पत्रोत्तर जरूर लिखना ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ५ — विश्व का स्वरूप | Patrānk 5 — Viśva kā Svarūp

२ अक्टूबर १९९३

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
पर्युषण के उपलक्ष्य में प्रवचनार्थ हम दोनों औरंगाबाद गये थे, आते ही
पत्र लिख रही हूँ । हमारे इन पत्रों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है ।
औरंगाबाद की श्रीमती फडकुले वहां की महिलाओं का सामूहिक स्वाध्याय
कराती है । उन्होंने कहा, ‘आपका पत्र ‘सच्चे देव का स्वरूप’ हमें स्वाध्याय
के लिए बहुत उपयोगी रहा । आपके पत्र हम सामूहिक रूप से पढ़ते हैं ।
ऐसी भी माँ होती है यह देखकर हमें आश्चर्य और आनंद हुआ ।’
कुर्ला-मुंबई के रमेश चाचाजी ने कहा, ‘बचपन में ग्रंथों की पवित्रता के
हौआ के कारण और छुआछूत के अनेक बंधनों के कारण शास्त्रों से हम दूर-
दूर ही रहे । अब मोक्षमार्गप्रकाशक, रत्नकरंडश्रावकाचार पढ़ना शुरू किया
है । लेकिन कुछ समझ में नहीं आता इसलिए फिर रख देते हैं । किंतु
आपके पत्र तो बहुत उपयोगी प्रतीत हुये । सीधी-सादी भाषा में आपने जो
उपक्रम चालू किया है वह बहुत अच्छा है ।’ चूँकि चाचाजी बहुत ही स्पष्टवादी
और सत्य बोलनेवाले व्यक्ति हैं, मैं इसे उनका आशीर्वाद ही समझती हूँ ।
अब तक हमने शास्त्राभ्यास के बारे में केवल प्राथमिक जानकारी प्राप्त
की । शास्त्रों का अभ्यास, वाचन, श्रवण करने के लिए तो और भी कुछ
समझना होगा, पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ जानने पड़ेंगे । अपने पास
धनसंपत्ति, जड़-जवाहरात से भरी पड़ी तिजोरी है लेकिन उसकी चावी न हो
तो ? जिनवाणी के विषय में आज हमारी ऐसी ही अवस्था हो गयी है ।
शास्त्र भंडार तो बहुत बड़ा है, परंतु उसमें प्रवेश करने के लिए उसमें आनेवाले
शब्दों के अर्थ और मर्म का पता नहीं होगा तो वैसी ही अवस्था होगी जैसी
परदेश में वहाँ की भाषा का ज्ञान न होनेपर होती है । इसका उपाय करने
के लिए पंडित गोपालदासजी बरैय्या ने जैन सिद्धांत प्रवेशिका लिखकर प्रश्न
और उत्तर के रूप में शब्दों की परिभाषायें लिखी हैं । गत सदी में हुये वे
एक महान विद्वान पंडित थे ।
प्रथम में प्रथम ‘विश्व किसे कहते हैं ?’ इस प्रश्न से शुरुवात की
है । हम भी उसी के बारे में समझेंगे । विश्व अर्थात् जगत, जग, ब्रम्हांड,
लोक, दुनिया, जो-जो कुछ है वह सब । हम Universe याने पृथ्वी, चंद्र,
सूर्य, तारे, ग्रह और अवकाश में अन्य जो चीजें हैं ऐसा अर्थ समझते हैं ।
किंतु विश्व शब्द का अर्थ इतने मात्र तक सीमित नहीं है, बहुत व्यापक है ।
उसकी परिभाषा है, ‘द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं ।’ जैसे समाज यह
कोई चीज़ नहीं है, लोगों के समूह को ही समाज कहते हैं; तद्वत् विश्व याने
द्रव्यों का समूह । यह समूह किसप्रकार है यह हम आगे देखेंगे ।

ये द्रव्य जातिअपेक्षा से छह हैं और संख्या की अपेक्षा से कुल अनंत
हैं । उनके नाम इसप्रकार हैं – जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य,
आकाशद्रव्य और कालद्रव्य । उनकी संख्या इसप्रकार है - जीवद्रव्य अनंत हैं,
पुद्गलद्रव्य अनंतानंत (अनंत × अनंत) हैं, धर्मद्रव्य एक है, अधर्मद्रव्य एक
है, आकाशद्रव्य एक है और कालद्रव्य असंख्यात (लोकप्रमाण) हैं ।

स्वामी कार्तिकेय आचार्य ने लिखा हुआ ‘कार्तिकेयानुप्रेक्षा’ नाम का ग्रंथ
है उसमें ‘लोकानुप्रेक्षा’ में विश्व का और द्रव्य का स्वरूप बताया है । और
भी अनेक ग्रंथों में इसका वर्णन है । महान आचार्य स्वामी कार्तिकेय भी
लिखते हैं कि यह सर्वज्ञ ने बताया हुआ स्वरूप है । कोई भी ग्रंथ देखो, कोई
भी आचार्य ऐसा नहीं लिखते है कि मैं ऐसा कहता हूँ । जो वस्तु का स्वरूप
सर्वज्ञ के ज्ञान में आया और उन्होंने जो बताया वही अनेक आचार्यों ने
ग्रंथों में लिखा है । मेडिकल सायन्स हो या विज्ञान की अन्य कोई शाखा-
उपशाखा हो, उसमें कोई विशिष्ट बात के बारे में निश्चित रूप से पता नहीं
हो तो सायन्टिस्ट उसके बारे में अलग-अलग Theories याने संभावनायें
बतातें हैं; लेकिन यह जो सर्वज्ञकथित आगम है वह Theory नहीं बल्कि
Fact है, वस्तुस्थिति है, वस्तुविज्ञान है ।

प्रथम लोकाकाश का स्वरूप बताते हैं । आकाश नाम का जो द्रव्य है
उसका क्षेत्रविस्तार अनंत है जिसका कोई पार न हो ऐसा अनंत-अनंत आकाश
है । उस आकाश के बीचों बीच लोक है । सब द्रव्य याने छहों द्रव्य जहाँ
इकट्ठे रहते हैं उन छह द्रव्यों के समूह को लोक कहते हैं । इस लोक को
याने विश्व को किसी ने निर्माण नहीं किया है, किसी ने धारण नहीं किया है
और उसका रक्षणकर्ता भी कोई नहीं है (कार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा ११५) ।
इसका भावार्थ ऐसा है कि अन्यमती की कल्पना के अनुसार ब्रम्हा जगत की
रचना करता है, विष्णु उसकी रक्षा करता है, शंकर उसका संहार करता है,
शेष नाग ने इसे धारण किया है, आधार दिया है, प्रलय होते ही सब शून्य
होता है, मात्र ब्रम्हा की सत्ता रहती है और उसी में से सृष्टि की उत्पत्ति होती
है ये सब बातें कल्पित हैं । इन सबका निषेध इस गाथा के द्वारा किया
है । गत पत्र में हमने देखा ही था कि ‘मतार्थ’ करना अर्थात् विपरीत मतों
का खंडन करना वह इस गाथा के द्वारा किया है ।
इसमें लोक का स्वरूप आगे लिखते हैं कि जीवादि जो छह द्रव्य हैं
उनका परस्पर एकक्षेत्रावगाहरूप प्रवेश अर्थात् मिलापरूप अवस्थान को लोक
कहते हैं । छह द्रव्यों का समूह लोक है । ये सब द्रव्य नित्य अर्थात् कायम
रहनेवाले हैं इसलिए लोक भी नित्य है, अनादि अनंत है । यहाँ ‘एकक्षेत्रावगाह
संबंध’ शब्द आया है, उसका अर्थ है एक ही जगह में रहना, एक ही क्षेत्र
में निवास करना अर्थात् हरेक द्रव्य की सत्ता भिन्न-भिन्न रहते हुये भी एक
ही जगह में अनेक वस्तुओं का रहना । सब द्रव्य एक दूसरे को अवगाहन
देते हैं, एकमेक हो जाते हैं, समा जाते हैं । जैसे, एक घनफूट कांच का
घन है । उसमें से प्रकाश आरपार जाता है अर्थात् जिस एक घनफूट जगह
(Space) में कांच है उसी जगह में प्रकाश भी रहता है । कांच और प्रकाश
ने एक दूसरे को अवगाहन दिया है ।
और एक दृष्टांत देखेंगे । समझो, एक कमरे में एक पीला बल्ब
जलाया तो उसका प्रकाश उस पूरे कमरे में फैल जाता है । उसी कमरे में
दूसरा नीले रंग का बल्ब जलाया तो उसका प्रकाश भी उस कमरे में सर्वत्र
फैलेगा । यहाँ नीले और पीले प्रकाश ने एक दूसरे को अवगाहन दिया । तुम
और एक प्रयोग करके देखना । एक ग्लास पूरा पानी से भर लो । उसमें
और पानी डाले तो गिर जायेगा परंतु उसमें राख ड़ालने पर वह उसी में समा
जायेगी । उसी में पिन्स डालो वें अंदर घुस जायेगी । राख और पानी ने
परस्पर अवगाहन दिया वे एक दूसरे में समा गये । इसतरह छह द्रव्य
परस्पर एक दूसरे को अवगाहन देते हैं । जिस आकाश के क्षेत्र (Space)
में धर्मद्रव्य है, वहीं अधर्मद्रव्य है, वहीं असंख्यात कालद्रव्य हैं, वहीं अनंत
जीवद्रव्य हैं और वहीं पर अनंतानंत पुद्गुलद्रव्य भी हैं । कोई भी द्रव्य अपने
लिए स्वतंत्र जगह की माँग नहीं करता । सब द्रव्य एकक्षेत्रावगाही होनेपर भी
याने एक ही जगह में रहते हुये भी प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, प्रत्येक का
अस्तित्व भिन्न-भिन्न है, प्रत्येक द्रव्य के अपने-अपने गुणधर्म कायम हैं ।

एक जीवद्रव्य अन्य जीवद्रव्यों को अवगाहन देता है, एक पुद्गल परमाणु
भी अन्य अनंत परमाणुओं को उतनी ही जगह में अवगाहन दे सकता है ।
ऐसा किसतरह कह सकते हैं ? मालूम है ? एक ही सिद्धशिला पर अनंत
सिद्ध भगवान विराजमान हैं तो भी प्रत्येक का अस्तित्व याने सत्ता भिन्न-भिन्न
है । निगोद के एक शरीर में अनंत जीव रहते हैं फिर भी प्रत्येक जीव का
अस्तित्व याने सत्ता भिन्न-भिन्न है । इससे यह सिद्ध होता है कि जीवद्रव्य
परस्परों को अवगाहन देते हैं । निगोद नाम सूक्ष्म एकेंद्रिय जीवों का है ।
उनकी विस्तृत जानकारी यहाँ नहीं लिखूंगी क्योंकि वह अलग विषय है ।

अनादिकाल से ये छहों द्रव्य इकट्ठे रहनेपर भी छह द्रव्यों में से सात
द्रव्य नहीं हुये या छहों द्रव्य मिलकर एक द्रव्य नहीं हुआ है, जीवद्रव्य
अन्य पुद्गलस्वरूप या अन्य द्रव्यरूप या अन्य जीवरूप नहीं हुआ है और
ना ही अन्य कोई द्रव्य जीवद्रव्यरूप हो गया है । इसलिए पृथ्वी, जल,
अग्नि, वायु इत्यादि के संयोग से जीव उत्पन्न होता है यह मान्यता गलत
साबित होती है ।

सभी द्रव्य परस्पर को अवगाहन देते हैं तो भी अवगाहन शक्ति को
आकाशद्रव्य का विशेष गुण बताया गया है । क्योंकि आकाशद्रव्य सब से बड़ा
द्रव्य है और उसके छोटे से भाग में अन्य सब द्रव्य ठहरते हैं, समा जाते
हैं । आकाश यह एक संपूर्ण अखंड द्रव्य है । उसके जिस भाग में अन्य
पाँच द्रव्य रहते हैं या दिखायी देते हैं उसे लोकाकाश कहते हैं और लोकाकाश
के बाहर का जो आकाशद्रव्य का विस्तार है उसे अलोकाकाश कहते हैं ।

प्रत्येक द्रव्य का विस्तार कितना बड़ा है, यह बताने के लिए ‘प्रदेश’
नाप के रूप में एक इकाई है । प्रदेश को Smallest Unit of Space or
Area कह सकते हैं । प्रत्येक द्रव्य कितना क्षेत्र घेरता है यह दर्शाने के लिए
वह द्रव्य कितने प्रदेशी है यह बताया जाता है । पुद्गल परमाणु सब से छोटा
है इसका दूसरा भाग नहीं हो सकता । यह एक प्रदेश रोकता है इसलिए
परमाणु को एकप्रदेशी कहते हैं । अब इन प्रदेशों की संख्या से याने नाप से
छह द्रव्य कितना क्षेत्र घेरते हैं अर्थात् वे कितने प्रदेशी हैं यह हम देखेंगे ।
आकाशद्रव्य सब से बड़ा द्रव्य है, वह अनंतप्रदेशी है । लोकाकाश
आकाशद्रव्य का ही भाग है वह असंख्यातप्रदेशी है । प्रत्येक जीवद्रव्य
असंख्यातप्रदेशी है । जीवद्रव्य की यह विशेषता है कि जीवद्रव्य के प्रदेशों का
संकोच-विस्तार हो सकता है । जीव के प्रदेशों का अधिक विस्तार संपूर्ण
लोकाकाश जितना होता है (केवलिसमुद्घात) और अधिक से अधिक संकोच
सूक्ष्म निगोद शरीर जितना होता है । धर्मद्रव्य संपूर्ण लोकाकाश में फैला हुआ
एक द्रव्य है इसलिए वह असंख्यातप्रदेशी है । अधर्मद्रव्य भी पूरे लोकाकाश
में फैला हुआ है इसलिए वह भी असंख्यातप्रदेशी है । कालद्रव्य एकप्रदेशी
है । लोकाकाश के जो असंख्यात प्रदेश हैं उन प्रत्येक प्रदेशपर एक-एक
कालद्रव्य स्थित है । शास्त्रों में इसे रत्नों की राशि की भांति कहा है ।
अब रह गया पुद्गलद्रव्य । वास्तव में देखा जाये तो पुद्गल परमाणु
द्रव्य है और वह एकप्रदेशी है; परंतु मात्र पुद्गल में ही ऐसी शक्ति है कि
दो या अधिक या अनंत पुद्गल परमाणु इकट्ठे होकर उनका स्कंध बनता है
और उसे भी ‘पुद्गल’ कहते हैं । इस अपेक्षा से पुद्गल को एकप्रदेशी,
बहुप्रदेशी और अनंतप्रदेशी कहते हैं । ‘पुद्’ याने जुड़ना और ‘गल’ याने
बिखरना । उसके नाम से ही उसकी विशेषता समझ में आती है । और भी
एक मज़े की बात है – जितनी जगह में एक पुद्गल परमाणु रहता है उसी
एक प्रदेश में अनंत पुद्गल परमाणु रह सकते हैं, समा जाते हैं, एक दूसरे
को अवगाहन देते हैं । इसीलिए तो लोकाकाश के असंख्यात प्रदेशों में अनंतानंत
पुद्गलद्रव्य रहते हैं ।
लोकाकाश का आकार तो हम सब को पता ही
है । परंतु हम हमेशा चित्र में जैसा देखते हैं वैसा एक
ही डायमेन्शन का नहीं है, वह तो घन है – Three
Dimentional है । हम जिस आकृति से परिचित हैं,
वह तो केवल लम्बाई - चौड़ाई दिखानेवाला चित्र है ।
यहाँ जो चित्र दर्शाया है, लोकाकाश वैसा घनाकार
है । उसकी उँचाई १४ राजू है; पूर्व-पश्चिम लम्बाई नीचे ७ राजू, मध्य में
१ राजू, ऊपर ५ राजू और फिर सबसे उपर १ राजू है । दक्षिणोत्तर मोटाई
सर्वत्र ७ राजू है । इसतरह लोकाकाश का विस्तार ३४३ घनराजू है । अभी
यहां ‘राजू’ का नाप लिखना उचित नहीं है; क्योंकि अपना विषय दूसरा
चल रहा है । लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेशपर छहों द्रव्यों के प्रदेश परस्पर
एक-दूसरे में समाये हुये हैं । देखो ना, लोकाकाश के प्रत्येक भाग में
आकाशद्रव्य स्वयं तो है ही, उसी में जीवद्रव्यों के प्रदेश भी हैं, उसी में
पुद्गलद्रव्य भी हैं, उसी में धर्मद्रव्य के प्रदेश, अधर्मद्रव्य के प्रदेश और कालद्रव्यों
के प्रदेश भी हैं ।

इन छहों में मात्र जीवद्रव्य ही जान सकता है, उसमें ज्ञान है, उसे
चेतनद्रव्य कहा गया है । जीवद्रव्य को छोड़कर अन्य पांच द्रव्य अजीव हैं,
अचेतन हैं, जड़ हैं । उनमें जानने की शक्ति नहीं है । जीव में ही ऐसा गुण
है कि जो स्वयं को और अन्य को जान सकता है । जो जीव सर्वज्ञ हैं उनका
ज्ञान पूर्ण विकसित होने के कारण सब द्रव्य उनके ज्ञान में झलकते हैं याने
सर्वज्ञ सर्व द्रव्यों को एकसाथ जानते हैं ।

इन छह द्रव्यों में मात्र पुद्गलद्रव्य ही रूपी है, अन्य पांच द्रव्य अरूपी
हैं । स्पर्श, रस, गंध, वर्ण ये पुद्गलद्रव्य के विशेष गुण हैं । इसपर से यह
बात ख्याल में आती है कि हम जो कुछ देखते हैं, सुनते हैं, सूंघते हैं,
स्पर्श से अनुभवते हैं - पांचों इंद्रियों से जो कुछ जानते हैं वह सब पुद्गल
ही हैं; क्योंकि मात्र पुद्गल ही रूपी हैं । जीवद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य,
आकाशद्रव्य और कालद्रव्य अरूपी हैं ।

बेटी ! तुम कहोगी की विश्व का स्वरूप जानने की व्यर्थ की मेहनत
हम क्यों करें ? तुम्हारा कहना सच है, क्योंकि आजकल के Busy Life में
अपने लाभ के बारे में सोचना ही योग्य है, यही समझदारी है । परंतु विश्व
को जाने बिना स्वयं को भी नहीं जान सकेंगे । इसकारण विश्व का जानना
जरूरी है । जैसे कि अपने बाप-दादा की बड़ी इस्टेट हो, और वह सौ
रिश्तेदारों में बट गयी हो तो हमारी दृष्टि अपने हिस्सेपर और अपने हिस्से
में कितनी सम्पत्ति मिली, उसपर जायेगी न ? उसीतरह इस विश्व का
स्वरूप जानकर इसमें मेरा स्थान कहाँ है, मेरा विस्तार कितना बड़ा है, मेरा
अधिकार क्या है ? इसे हमें निश्चित करना होगा ।

मैं कौन हूँ ? – विश्व में जो अनंत जीवद्रव्य हैं उनमें से मैं एक
जीवद्रव्य हूँ । मेरा वास्तव्य कहाँ है ? पूरे लोकाकाश में ? - नहीं । तो फिर
कहाँ है ? – वर्तमान में प्राप्त जो यह शरीर है वहींपर मेरा (जीवद्रव्य का)
वास्तव्य है, अस्तित्व है । अभी-अभी हमने समझा था कि इस जीवद्रव्य के
प्रदेश जिस क्षेत्र में व्याप्त है वहींपर अनंत पुद्गलद्रव्य (कर्म, शरीर आदि) भी
हैं । वहींपर आकाशद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और कालद्रव्य भी हैं । जीव,
धर्म, अधर्म, आकाश और काल अरूपी होने से हमें दिखायी नहीं देते । मात्र
पुद्गल ही दिखायी देता है, ज्ञान में आता है । इसलिए वही मैं हूँ ऐसी सहज
ही कल्पना होती है और प्राप्त शरीर ही मैं हूँ ऐसी भ्रांत धारणा होती है ।
पं. दौलतरामजी छहढ़ाला में इस जीव की भूल के बारे में लिखते हैं –

‘तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान ।’

जरा सोचो, जीव अनादि से पुद्गल के संयोग में है लेकिन पुद्गलरूप
नहीं हुआ । अपनी ही भूल से उसने वैसा माना है और उस कारण वह दुःखी
है । तो फिर हम क्या करें ? सब छोड़ दें ? नहीं । अपना अधिकार क्या
है ? वह देखना है । हम कौन हैं और हम क्या कर सकते हैं इसका पहले
ज्ञान करना होगा । हम जान सकते हैं और यदि हमारी मान्यता गलत हो
तो उसे ठीक कर सकते हैं । सर्व प्रथम इतना ही करना है ।

मोना, कुछ महिनों के बाद ही शादी होने के पश्चात् तुम ससुराल
जाओगी । शुरुवात में नई दुल्हन को सब कहते हैं – ‘रहने दो, कोई काम
नहीं करना ।’ इसके पीछे एक रहस्य है । घर के काम से छुट्टी पाकर
टी.व्ही. देखने के लिए यह छूट नहीं है । परंतु घर के कामकाज किस
पद्धति से करने चाहिए – ससुराल के रीतिरिवाज, पद्धति क्या हैं यह ध्यान से
देखने-सीखने के लिए यह Training Period होता है । अपना काम तो
करना ही है, अपना काम हम नहीं करेंगे तो हमारा काम कौन करेगा ?
इसलिए उसके बारे में योग्य ज्ञान पहले करना होगा ।

तद्वत् हमें धर्म प्रगट करना है तो उसके लिए सबसे पहले तत्त्वों का
ज्ञान करना होगा, तत्त्वज्ञानपूर्वक गलत मान्यता को सही करना होगा ।

विश्व का स्वरूप अति संक्षेप में हमने देखा । अधिक चर्चा अगले पत्र
में करेंगे ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ६ — द्रव्य का स्वरूप | Patrānk 6 — Dravya kā Svarūp

२० नवम्बर १९९३

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।

बिटिया ! द्रव्य, गुण, पर्याय सर्व सिद्धांतों की नींव है । इन्हें समझे
बिना शास्त्र में प्रवेश नहीं हो सकता । अतः हमें सबसे पहले इसी की
जानकारी लेनी है । इसका बारंबार वाचन और अभ्यास करना चाहिए ।
जिसे द्रव्य, गुण, पर्याय समझ में आ जाते हैं, वह सब शास्त्रों का अर्थ
समझने लगता है; फिर उसे शास्त्रों का यथार्थ अर्थ समझने में कोई
कठिनाई नहीं होती ।

हमने गत पत्र में संक्षेप में विश्व का स्वरूप समझा । जहाँ जीवादिक
सब द्रव्य दिखायी देते हैं वह लोक है । ‘लोक’ शब्द का अर्थ होता है
देखना । अवलोकन करना शब्द इसी लोक शब्द से तैयार हुआ है, उसका
भी अर्थ देखना ऐसा होता है ।

ये सब द्रव्य नित्य हैं । इनका कभी नाश नहीं होता । तथा जितने हैं
उतने ही रहते हैं, घटते बढ़ते नहीं हैं, नवीन उत्पन्न भी नहीं होते । इनकी
आदि नहीं है अर्थात् वे अनादि हैं और उनका नाश नहीं होता, अंत नहीं होता,
अर्थात् अनंत हैं । सभी द्रव्य अनादिअनंत होने से उनके समूह से बना हुआ
यह विश्व भी अनादिअनंत है ।

इसे जानने से हमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि नाश के भय से
हम निर्भय हो जाते हैं । ‘इस जगत का नाश होगा, कुछ करोड वर्षों के बाद
पृथ्वी का नाश होगा’ आदि बातें सुनकर हमें भय लगता है । उससे निर्भय
हो जाते हैं । ‘अरे ! मैं भी मरूँगा, मेरा नाश होगा’ इस विचार से जो
हमारी नींद हराम हो जाती है; विश्व का अविनाशी स्वरूप जानने से इन
आकुलताओं का अभाव होता है ।

जरा सोचो तो सही, विश्व का स्वरूप जाननेपर भी हमें बहुत लाभ
हो गया है । मैं एक अनादिअनंत जीवद्रव्य हूँ और मेरा कभी भी नाश

नहीं होगा यह समझते ही कितनी शांति अनुभव में आती है । मेरा कोई
रक्षणकर्ता नहीं है और संहारकर्ता भी नहीं है यह समझते ही सब हीनदीनपना
नष्ट हो जाता है ।

विश्व का स्वरूप सर्वज्ञ ने स्वयं जाना और उसका कथन किया । वह
कथन शास्त्रों द्वारा हमने जाना । इसका अर्थ यह हुआ कि सर्वज्ञ ने जो
प्रत्यक्ष जाना उसे हमने परोक्ष रीति से जाना अर्थात् हम भी अरहंत-सिद्ध के
जाति-कुल के चेतनमय, ज्ञानमय हैं यह सिद्ध हुआ । ऐसा होनेपर ज्ञान की
और स्व की महिमा आये बिना नहीं रहती ।

विज्ञान में ऐसा सिद्धांत है कि Matter is always constant. It is
never destroyed. It only changes its form. ‘Matter’ अर्थात्
पुद्गल के बारे में यह कथन है; क्योंकि वैज्ञानिकों ने अब तक मात्र पुद्गल
का ही अभ्यास किया है । जो बात एक द्रव्य के बारे में सच है वही सब
द्रव्यों के बारे में सच है कि सब द्रव्य नित्य हैं, द्रव्य का कभी नाश नहीं होता
मात्र उनकी अवस्थायें बदलती हैं ।

रीना, स्कूल में तुमने ‘शोभादर्शक यंत्र’-कॅलिडिओस्कोप बनाया था,
याद है ? उसमें रंगीन कांच के टुकडे ड़ालकर बंद कर दिया था । शोभादर्शक
जैसे-जैसे घुमाते थे वैसे-वैसे नये-नये आकार, अनेक आकृतियाँ - Combinations
उसके अंदर बनती हुयी दिखायी देती थी । तद्वत् ही द्रव्य जितने थे उतने ही
हैं, नित्य ही हैं उनकी अवस्थायें सतत नयी-नयी होती हैं ।

हमें दृश्यमान चीज़ों की विविध रचनायें, उनकी नयी उत्पत्ति और उनके
विनाश ये सब दिखायी देते हैं । वे उत्पत्ति और विनाश अवस्थाओं के हैं, द्रव्यों
के नहीं । द्रव्य कायम टिकते हैं और मात्र उनकी अवस्थायें बदलती हैं ।

‘द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं’ यह समझने के बाद सहज ही
मन में सवाल उठता है कि द्रव्य किसे कहते हैं ? उत्तर है - ‘गुणों के
समूह को द्रव्य कहते हैं’ । द्रव्य के अन्य नाम पदार्थ, वस्तु, अर्थ, चीज़ आदि
हैं । विश्व की परिभाषा में ‘द्रव्यों का समूह विश्व है’ कहा था, वहाँ द्रव्यों का
एक दूसरे के साथ एकक्षेत्रावगाह संबंध था । अब द्रव्य की परिभाषा में
जो ‘गुणों का समूह’ ऐसा कहा है उसमें गुणों का द्रव्य के साथ नित्यतादात्म्य
संबंध होता है और गुणों का एक दूसरे के साथ अविनाभावी संबंध होता

है । एकक्षेत्रावगाह संबंध के बारे में हमने गत पत्र में विस्तार से जान ही
लिया है । नित्यतादात्म्य संबंध क्या है ? उसके बारे में अब विचार करेंगे ।
नित्य याने कायम, सदैव । तादात्म्य याने एकरूपता, जो कभी भिन्न नहीं
होता । गुणों का द्रव्य के साथ नित्यतादात्म्य संबंध है अर्थात् द्रव्य से गुण
कभी भी भिन्न नहीं हो सकते । जैसे उष्णता अग्नि का गुण है उसे अग्नि से
भिन्न नहीं कर सकते । मिठास शक्कर का गुण है उसे शक्कर से भिन्न नहीं
कर सकते । ठीक उसीतरह गुण कभी भी द्रव्य से भिन्न नहीं हो सकते ।
गुणों का एक दूसरे से अविनाभावी संबंध होता है अर्थात् जहाँ एक गुण
है वहाँ उस द्रव्य के अन्य गुण हैं ही । जैसे, शक्कर में सफेदी और मिठास
गुण हैं तो सफेदी और मिठास इनका अविनाभावी संबंध है । उन दोनों को
अलग नहीं कर सकते । सोने में पीलापना और वजनपना गुण हैं । उनका
एक दूसरे से अविनाभावी संबंध है । पुद्गलद्रव्य के स्पर्श, रस, गंध, वर्ण
आदि गुणों का आपस में अविनाभावी संबंध है । जहाँ एक गुण है वहीं अनंत
गुण हैं । इनके इस समूह को ही द्रव्य कहते हैं । ये गुण द्रव्य से अलग
नहीं हो सकते और ना ही नये गुण द्रव्य में जोड़े जा सकते हैं । द्रव्य में
जितने अनंत गुण हैं उतने ही रहते हैं । जितने अनंत गुण अरिहंत-सिद्धों में
हैं उतने ही अनंत गुण प्रत्येक जीवद्रव्य में हैं । तुम्हारे में और मुझमें भी
अनंत गुण हैं । परमाणु में भी अपने-अपने अनंत गुण हैं । प्रत्येक द्रव्य स्वयं
में परिपूर्ण है ।
ये गुण सामान्य और विशेष ऐसे दो प्रकार के होते हैं । सामान्य
अर्थात् जो सब द्रव्यों में पाये जाते हैं । प्रत्येक द्रव्य के अपने-अपने स्वतंत्र
ऐसे सभी द्रव्यों में पाये जानेवाले अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व,
प्रदेशत्व आदि अनंत सामान्य गुण हैं । जो गुण सब द्रव्यों में न रहकर किसी
विशिष्ट द्रव्य में पाये जाते हैं, उन्हें ‘विशेष गुण’ कहते हैं । सामान्य गुणों
के द्वारा द्रव्य की सिद्धि होती है और विशेष गुणों के द्वारा वह कौनसा विशिष्ट
द्रव्य है यह पहचाना जा सकता है । जैसे, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि
पुद्गलद्रव्य के विशेष गुण हैं । जिस द्रव्य में ये गुण पाये जाते हैं वह
पुद्गलद्रव्य है ऐसा हम पहचान सकते हैं ।
ज्ञान, दर्शन, सुख, चारित्र, वीर्य आदि जीवद्रव्य के विशेष गुण हैं ।
इसलिए जिस द्रव्य में ज्ञानादि गुण पाये जाते हैं वह जीवद्रव्य है, ऐसा हम

पहचान सकते हैं । सुख भी जीवद्रव्य का विशेष गुण है । वह जीवद्रव्य में
ही है, अन्य द्रव्यों में नहीं है । पुद्गलद्रव्य में सुख नाम का गुण ही नहीं
है । फिर भी हम अज्ञानी जन तो पूरी जिंदगी सुख पाने के लिए धनसंपत्ति,
घरबार आदि पुद्गलद्रव्य के संग्रह में ही लगे रहते हैं । मानो सारा सुख
इन्हीं में भरा हो ।

विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य हैं उनके विशेष गुणों द्वारा उनका
स्वरूप देखते हैं ।

जीवद्रव्य – जिसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख, वीर्य, क्रियावती शक्ति
आदि विशेष गुण पाये जाते हैं, वह जीवद्रव्य है ।

पुद्गलद्रव्य - जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, क्रियावती शक्ति आदि
विशेष गुण पाये जाते हैं वह पुद्गलद्रव्य है । जीव को स्पर्श, रस, गंध, वर्ण
आदि गुणों का ज्ञान होता है, परंतु जीव में ये कोई भी गुण नहीं हैं । जीव
और पुद्गल इन दोनों द्रव्यों में क्रियावती शक्ति है, उस शक्ति के कारण
जीव और पुद्गल या तो गमन करते हैं या स्थिर रहते हैं । गमन करना
या स्थिर रहना क्रियावती शक्ति का कार्य है । अन्य चार द्रव्यों में यह गुण
नहीं है । अन्य चार द्रव्य अनादि से स्थिर ही हैं । उनका गमन या हलन-
चलन नहीं होता ।

धर्मद्रव्य – स्वयं गमन करते हुये जीव और पुद्गलों को गमन करने
में जो निमित्त होता है उसे धर्मद्रव्य कहते हैं । धर्मद्रव्य जबरदस्ती गमन नहीं
कराता, वह मात्र गमन में अनुकूल रहता है । जैसे स्वयं गमन करते हुये
मछली को पानी अनुकूल रहता है । कुओ का पानी स्वतः स्थिर है, परंतु
मछली को गमन में निमित्त होता है । वैसे धर्मद्रव्य स्वयं स्थिर है परंतु जीव
और पुद्गलों को गमन में अनुकूल रहता है । ‘गतिहेतुत्व’ धर्मद्रव्य का विशेष
गुण है ।

अधर्मद्रव्य – गमनपूर्वक स्थिर होनेवाले जीव और पुद्गलों को स्थिर
होने में जो निमित्त होता है वह अधर्मद्रव्य है । जैसे पथिक को वृक्ष की छाया
ठहरने में निमित्त होती है । वैसे गमन करता हुआ जीव या पुद्गल स्वयं
स्थिर होता है, तब अधर्मद्रव्य उसे स्थिर होने में अनुकूल रहता है । इसलिए
‘स्थितिहेतुत्व’ अधर्मद्रव्य का विशेष गुण है ।

आकाशद्रव्य – सभी द्रव्यों को अवगाहना देना अर्थात् ठहरने के लिए
जगह देना आकाशद्रव्य का विशेष गुण है । इसे ‘अवगाहनहेतुत्व’ कहते
हैं । हमें जो नीला-नीला आकाश दिखायी देता है, वही आकाशद्रव्य है ना ?
नहीं, बिलकुल नहीं; क्योंकि जो दिखायी देता है, जिसमें वर्ण है, वह तो
पुद्गलद्रव्य है । पुद्गल को छोड़कर अन्य पाँच द्रव्य तो अरूपी हैं, अमूर्तिक
हैं । हम जिसे Space कहते हैं, अवकाश कहते हैं वह आकाशद्रव्य है ।
इसका अनंत विस्तार है, इसका अंत ही नहीं है । आकाशद्रव्य के मध्य में
जहाँ छहों द्रव्य रहते हैं, उसे लोकाकाश कहते हैं और उसके सभी ओर
दसों दिशाओं में अनंत-अनंत अलोकाकाश है । वर्तमान में वैज्ञानिकों को
ज्ञात जो ग्रह, तारे, नक्षत्र, सूर्य आदि हैं वे तो लोकाकाश के एक छोटे से
हिस्से में हैं ।

आकाशद्रव्य अन्य द्रव्यों को अवगाहन देता है इसका अर्थ वह उन
वस्तुओं के (द्रव्यों के) सिर्फ इर्द-गिर्द रहता है, ऐसा नहीं है । सब द्रव्यों के
आर-पार आकाशद्रव्य व्याप्त है । यदि हम लोहे का घन देखेंगे तो वह
आकाशद्रव्य में है और आकाशद्रव्य उसके अंदर और बाहर सर्वत्र व्याप्त है ।
वैसे देखा जाये तो छहों द्रव्य एक दूसरे को अवगाहन देते हैं अर्थात् एक ही
जगह में रहते हैं, उनमें परस्पर एकक्षेत्रावगाह संबंध है ।

कालद्रव्य - लोकाकाश में असंख्यात प्रदेश हैं । इसमें प्रत्येक प्रदेशपर
एक-एक कालद्रव्य स्थित है । सभी द्रव्यों के परिणमन में निमित्त होना
(परिणमन हेतुत्व) कालद्रव्य का विशेष गुण है । हमें जो क्षण, मिनिट, घण्टा,
दिन, महिना, काल (Time) समझ में आता है उसे व्यवहारकाल कहते हैं ।
कालद्रव्य की एक पर्याय को समय कहते हैं, ऐसे असंख्यात समयों का एक
सैकण्ड़ बनता है ।

इसतरह गुणों के द्वारा द्रव्य को पहचाना जाता है । तत्त्वों की भाषा में
गुण लक्षण है और द्रव्य लक्ष्य है । जैसे ज्ञान यह लक्षण है और आत्मा लक्ष्य
है । जिसमें ज्ञान है वही आत्मा है । आत्मा को जानना है तो लक्षण द्वारा
जानना होगा, अनुभवना होगा, दूसरा कोई भी उपाय नहीं है । भगवान की
पूजा करने से, उपवास करने से, लाखों रुपया दान देने से आत्मा का अनुभव
नहीं होगा । परंतु जहाँ ज्ञान लक्षण है वहाँ दृष्टि करने से, वहाँ उपयोग

केंद्रित करने से, अंतर्मुख होकर चेतना लक्षण द्वारा जानने से ही आत्मा
अनुभव में आ सकता है । तत्त्वों के बारे में ऐसा कथन सुनने से मन में
ऐसा विचार आता है कि तो फिर पूजा, दया, दान आदि सब व्यर्थ ही है
क्या ? क्या इन्हें छोड़ दें ? जैसा वस्तु का स्वरूप है, जानना तो वैसा ही
है, श्रद्धा में भी वैसा ही मानना है । जिसे तत्त्वों का अभ्यास है, उसे तो
तत्त्व का निरूपण करनेवाले सर्वज्ञ के प्रति अतीव परम भक्तिभाव आये
बिना नहीं रहता ।

अतः समाधान यह है कि पूजा, स्वाध्याय, दान आदि छोड़ने का तो
प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता । तत्त्व के अभ्यासी को तो और अधिक भक्ति
का भाव आता है । वे अधिकाधिक समय और धन खर्च करते हुये दिखायी
देते हैं । आजकल के जमाने में तो धन देना आसान है, लेकिन समय देना
मुश्किल हो गया है; क्योंकि ऐसी बातों के लिए समय देने के लिए हमारे
पास समय ही कहाँ बचता है ? फिर भी तत्त्व रुचिवाले धन और समय
दोनों देते हैं ।

आगम का यह अभ्यास करते हुये शुरू-शुरू में समझने में अनेक
भ्रांतियाँ होती हैं । जीवद्रव्य के गुणधर्म क्या हैं ? यह जानते हुये बीच में ही
मनुष्य व्यवहार करें या न करें ऐसे सवाल उठते हैं । यह सवाल ऐसा
हास्यास्पद है जैसा कि हम जब ऑक्सिजन के गुणधर्म पढ़ते हैं कि वह
वायुरूप है, ज्वलन में मदद करता है, तब यदि कोई कहे कि पानी तो द्रवरूप
है, वह तो आग बुझाता है यह कैसे ? पानी को भी ऑक्सिजन की भांति
ज्वलनशील होना चाहिए । यह सवाल जैसे हास्यास्पद है, वैसा ही तुम्हारा
पूजा-अर्चा, दान, स्वाध्याय छोड़ देनेवाला सवाल है । हमने अपने आपको
जीवद्रव्य न मानकर मनुष्य ही मानकर उस मनुष्यपर्याय जितना ही माना है
इसलिए ऐसा सवाल उठता है ।

आगम का याने तत्त्वों का अभ्यास करके हमें सर्व प्रथम तत्त्वनिर्णय
करना है । ये सर्वज्ञ कथित तत्त्व ऐसे ही हैं, इसप्रकार से परीक्षाप्रधानी
बनकर अपनी बुद्धि के कसौटी पर कसना होगा । यह सब निर्णय विचारों में
करना है, बुद्धि का यह काम है । षोडशकारण पूजा में लिखा है कि –

‘ज्ञानाभ्यास करें मनमांहि । ताकों मोह महातम नाहीं ।।’

जिसके विचारों में तत्त्वों का चिंतन चलता रहता है उसके आचरण में
स्वच्छंद पापक्रियायें नहीं होती । धर्म क्या है, पुण्य क्या है, पाप क्या है यह
समझे बिना हम क्या कर रहे हैं और उसका फल क्या होगा ? यह समझ
में नहीं आ सकता ।

आगम के द्वारा, शास्त्राभ्यास के द्वारा हमें अपनी पहचान करनी है ।
विश्व में अनंत द्रव्य हैं, उनमें से मैं एक स्वतंत्र परिपूर्ण द्रव्य हूँ और मुझमें
(प्रत्येक में) अनंत गुण हैं यह हमने जाना । परंतु ध्यान रहे, जीव द्रव्य
अरूपी होने से इसके अनंत गुण भी अरूपी हैं अतः हमें दिखायी नहीं देते;
परंतु घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि अरूपी होनेपर भी यह
‘चेतन’ द्रव्य है, ज्ञान उसका गुण है । देखो न ! ये शब्द पढ़कर कौन जान
रहा है ? - जीव । पंद्रह वर्ष पहले की याद किसके द्वारा होती है ? – ज्ञान
के द्वारा । ज्ञान किसका ? - जीव का । अमुक विशिष्ट बात कठिन है,
समझ में नहीं आती, यह कौन जानता है ? – ज्ञान अर्थात् जीव ।

यह ज्ञान गुण हर क्षण जानने का कार्य करता रहता है । नींद में
भी ? हाँ, हाँ नींद में भी ! तुम नहीं कहती हो कि आज मुझे नींद ठीक
नहीं आयी या आज मुझे गहरी नींद आयी ? तो फिर इसे किसने जाना ?

  • ज्ञान गुण ने ।

दिनरात ज्ञान गुण हमें बता रहा है कि यह मैं यहाँ हूँ। जहाँ यह ज्ञान
गुण है, वहीं अन्य अनंत गुण अविनाभावी संबंध के कारण हैं ही । जहाँ
ज्ञानादि सर्व गुण हैं, उसे ही जीवद्रव्य कहा है । तो फिर हो गयी ना जीवद्रव्य
की सिद्धि ?

विश्व और द्रव्य के बारे में हमने जाना । गुण और पर्याय की जानकारी
लेनेपर द्रव्य का स्वरूप अधिक स्पष्ट होगा ।

मोना, तुमने जयपुर शिबिर के बारे में पूछा था । वहाँ रोज प्रातः पांच
बजे से रात्री के दस बजे तक आठ-दस घण्टे प्रवचन, क्लास, पूजन-विधान,
भक्ति, रोज अभ्यास और अंत में परिक्षायें ऐसा हमारा कार्यक्रम था । बाहरगांव
से ८५० लोग और जयपुर निवासी दो-तीन हजार लोग उपस्थित रहते थे ।
इन शिबिरों में अनेक विद्वान तथा नये आत्मार्थी भाई-बहने भी शामिल होते
हैं । तत्त्वों का सूक्ष्म अभ्यास भी यहाँ चलता है । मैंने तत्त्वज्ञान पाठमाला,

नयचक्र और गुणस्थान प्रवेशिका इन तीनों विषयों की परीक्षा दी थी । उनमें
९६%, ९६% और १००% मार्क्स प्राप्त करके तीनों में ही प्रथम क्रमांक
हासिल किया । सबने आश्चर्यसहित सराहा और अभिनंदन किया । फिर से
कॉलेज के दिनों की याद आयी ।
अधिक अगले पत्र में लिखूँगी ।

तुम्हारी माँ

पाप रुप को पाप तो, जानत जग सहु कोई ।
पुण्यतत्त्व भी पाप है, कहत अनुभवी कोई ।।

अर्थ – जो पाप है उसको पाप जान, सब कोई उसे पाप ही मानते हैं; जो कोई पुण्य को भी पाप कहता है वह बुद्धिमान कोई विरला ही है ।

जब तक एक न जानता, परम पुनीत शुद्ध भाव ।
मूढ़ों के व्रत-तप सभी, शिव-कारण न कहाय ।।

अर्थ – जब तक एक परम शुद्ध व पवित्र भाव का अनुभव नहीं होता, तब तक मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव के द्वारा किये गये व्रत-तप-संयम व मूलगुण पालन को मोक्ष का उपाय नहीं कहा जा सकता ।

जब तक एक न जानता, परम पुनीत शुद्ध भाव ।
व्रत-संयम अरु शील-तप, निष्फल सारे जान ।।

अर्थ – हे जीव ! जब तक एक उत्कृष्ट शुद्ध वीतराग भाव का अनुभव न करें, तब तक व्रत, तप, संयम, शील ये सर्व पालना वृथा हैं, मोक्ष के लिए कार्यकारी नहीं हैं । पुण्य बांधकर संसार बढ़ानेवाले हैं ।

  • श्री योगिन्दुदेव ‘योगसार’

पत्रांक ७ — गुण का स्वरूप | Patrānk 7 — Guṇ kā Svarūp

१८ अप्रैल १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।

मोना, तुम्हारी शादी को दो महिने हो गये । तुम्हारी शादी में हमने
सबको भेटस्वरूप दी हुयी किताबें-संस्कार, बिदाई की बेला, आप कुछ
भी कहो, णमोकार महामंत्र, सामान्य श्रावकाचार (सभी मराठी भाषा में)
तुमने पढ़ी या नहीं ? तुम्हारे दादा ने (पिताजी ने) और भी चार-पांच
पुस्तकों का मराठी अनुवाद करके जयपुर भेज दिया है । छपनेपर तुम
दोनों को दूँगी ही ।

पत्र क्र. ५ और ६ में हमने विश्व का और द्रव्य का स्वरूप देखा
था । शादी की धूमधाम में बहुत दिन बीत गये इसलिए फिर से थोड़ा याद
कर लेते हैं । छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं । इस विश्व में एक
आकाशद्रव्य, एक धर्मद्रव्य, एक अधर्मद्रव्य, अनंत जीवद्रव्य, अनंतानंत पुद्गलद्रव्य
और असंख्यात कालद्रव्य हैं । आकाशद्रव्य के मध्य में जिस क्षेत्र में सब द्रव्य
पाये जाते हैं उसे ‘लोक’ कहते हैं । इन सब अनंतानंत द्रव्यों का प्रत्येक का
अपना स्वतंत्र अस्तित्व है । दो द्रव्य मिलकर कभी भी एक नहीं होते या एक
द्रव्य से दो या अधिक द्रव्य भी उत्पन्न नहीं होते । ये सब द्रव्य एकक्षेत्रावगाही
हैं अर्थात् एक ही क्षेत्र (Space) में रहते हैं । एक दूसरे को अवगाहन देते
हैं, समा लेते हैं फिर भी एकमेक नहीं होते ।

ये सभी द्रव्य अनादिअनंत हैं । किसी भी द्रव्य का कभी भी नाश नहीं
होता और उनकी नयी उत्पत्ती भी नहीं होती ।

गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं । प्रत्येक द्रव्य अनंत गुणात्मक है ।
द्रव्य और गुण में नित्यतादात्म्य संबंध है अर्थात् गुण द्रव्य से अलग नहीं हो
सकते । द्रव्य में जो अनंत गुण हैं उनका एक दूसरे से अविनाभावी संबंध
है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ एक गुण है वहाँ उस द्रव्य के अन्य
सभी अनंत गुण हैं, हैं और हैं ही । शास्त्र में ‘ज्ञानमात्र आत्मा’ ऐसा एक

गुण की अपेक्षा से कथन करनेपर भी आत्मा के अनंत गुण उसमें समाविष्ट
हैं ऐसा जानना चाहिए ।
आज हमें गुणों का स्वरूप क्या है इसके बारे में समझना है । गुण
किसे कहते हैं इस प्रश्न का उत्तर है – ‘जो द्रव्य के संपूर्ण भागों में और
उसकी संपूर्ण अवस्थाओं में रहता है उसको गुण कहते हैं ।’ द्रव्य में जो
अनंत गुण हैं, उनमें से प्रत्येक गुण द्रव्य के संपूर्ण क्षेत्र में फैला हुआ है,
संपूर्ण क्षेत्र में व्याप्त है । तात्पर्य यह है कि जितना बड़ा द्रव्य है उतना ही
बड़ा उस द्रव्य का प्रत्येक गुण है । जैसे सोना यह एक द्रव्य है ऐसा
उदाहरण के लिए समझेंगे । उसमें पीलापना, वजनपना, चमकीलापना ये गुण
हैं । पीलापना यह गुण संपूर्ण सोने में है, वजनपना यह गुण भी संपूर्ण सोने
में है, चमकीलापना भी संपूर्ण सोने में है ।
मिसरी में मिठास यह गुण मिसरी के संपूर्ण भागों में है, वैसा सफेदी
यह गुण भी मिसरी के संपूर्ण भागों में है, उसीतरह कठिनपना यह गुण भी
मिसरी के संपूर्ण भागों में रहता है ।
जीवद्रव्य असंख्यातप्रदेशी है । उसका ज्ञान गुण संपूर्ण असंख्यात प्रदेशों
में रहता है, उसका सुख गुण भी संपूर्ण असंख्यात प्रदेशों में रहता है, उसका
अस्तित्व गुण संपूर्ण असंख्यात प्रदेशों में रहता है । हमें लगता है मस्तिष्क
में ज्ञान है और हृदय में सुख, परंतु वास्तव में वैसा नहीं है ।
एक ही क्षेत्र में ये जो अनंत गुण रहते हैं उन्हीं की द्रव्य संज्ञा है ।
गुणों के ऊपर कोई आवरण डालकर द्रव्य बना हो ऐसा नहीं है । थैली में
गेहूँ जैसे भी द्रव्य में गुण नहीं हैं । द्रव्य को गुणों का पिंड अथवा पुंज कहा
है । जैसे उष्णता, दाहकता और प्रकाश गुण जहाँ हैं, उसीको अग्नि कहते
हैं । ऐसा नहीं है कि अग्नि भिन्न है और उष्णता भिन्न । ऐसा भी नहीं
होता कि अग्नि के अमुक भाग में उष्णता है और अन्य भाग में प्रकाश ।
गुण और द्रव्य भिन्न नहीं हैं । अनंत गुणों के पुंज अथवा पिंड को ही
एक नाम दिया है ‘द्रव्य’ । गुणों का समूह होने से द्रव्य को ‘गुणी’ ऐसा
भी कहा जाता है ।
तुम कहोगी, 'जब भिन्न हैं ही नहीं तब दो अलग-अलग नाम दिये ही

क्यों ? इतने अनंत गुण कहे ही क्यों ? मात्र द्रव्य ही का नाम बताना
था ।’ चूँकि जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल-ऐसे भिन्न-भिन्न
छह नाम हैं, इसका अर्थ ही यह निकलता है कि उन द्रव्यों में अपनी-अपनी
विशेषता, अपने-अपने गुणधर्म भिन्न-भिन्न हैं । अन्यथा उनका इसतरह वर्गीकरण
नहीं कर सकते थे । ये गुणधर्म ही गुण हैं । गुणों के दूसरे नाम हैं – शक्ति,
धर्म, अंत, भाव, अर्थ ।
अब तक हमने गुण की आधी ही परिभाषा देखी है कि गुण द्रव्य के
संपूर्ण भागों में रहता है । परंतु मात्र इतना ही कहने से काम नहीं
चलेगा । उस परिभाषा का एक हिस्सा और है कि ‘गुण द्रव्य के संपूर्ण
अवस्थाओं में रहता है ।’ द्रव्य की कोई भी अवस्था क्यों न हो, उसके
सब अनंत गुण उसमें कायम रहते हैं । जैसे सोने में पीलापना, भारीपना,
चमकीलापना गुण हैं वे उसके संपूर्ण भागों में तो रहते ही हैं, परंतु उस सोने
की ‘हार’ आदि संपूर्ण अवस्थाओं में भी कायम रहते हैं ।
हम अपने स्वद्रव्य का विचार करेंगे । मैं एक जीवद्रव्य हूँ । मुझमें
अनंत गुण हैं । वे मेरे सब असंख्यात प्रदेशों में रहते हैं, पूर्ण व्याप्त हैं और
मेरी किसी भी अवस्था में वे अनंत ही रहेंगे । जीव किसी भी अवस्था में
हो-अतिसूक्ष्म एकेंद्रिय अवस्था हो या सिद्ध अवस्था हो, प्रत्येक जीव में अनंत
गुण सदा ही विद्यमान हैं । गुण कभी भी कम या अधिक नहीं होते । गुणों
की परिभाषा समझनेपर हम निश्चित (चिंतारहित) हो जाते हैं । हमें परीक्षा
में अधिकाधिक गुण (अंक) कैसे प्राप्त हो इसकी हम दिनरात चिंता करते
हैं । भले मार्ग से (अभ्यास से) या बुरे मार्ग से (कॉपी करके) गुण बढ़ाने
के चक्कर में हर व्यक्ति व्यस्त रहता है लेकिन द्रव्य के बारे में वैसी
चिंता नहीं है ।
धन के बारे में भी वही हाल है । अपने पास थोड़ा बहुत धन होगा
तो निरंतर चिंता रहती है कि कोई चुरा तो न लेगा ? यह धन कैसे
बढ़ेगा ? इसे बँक में ड़ाले या शेअर्स खरीदे ? द्रव्य और गुण का स्वरूप
ख्याल में आते ही सब आकुलता नष्ट हो जाती है, कारण कि द्रव्य से गुण
कोई निकाल कर ले नहीं सकता तद्वत् ही गुण बढ़ाने की भी कोई चिंता
नहीं रहती ।

गुण की परिभाषा के साथ-साथ आज हम एक नयी बात समझेंगे -
‘स्वचतुष्टय’ । प्रत्येक वस्तु का याने द्रव्य का अपना चतुष्टय अर्थात् चार बातें
सदा होती हैं । वे हैं – द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव । द्रव्य शब्द का अर्थ तो
अब हम जानते हैं । क्षेत्र का अर्थ है द्रव्य जितनी जगह घेरता है । आजकल
हम घर खरीदते समय उसका क्षेत्रफल Area कितना है यह देखते हैं । परंतु
वहाँ तो Carpet Area, Built Area, Super Built Area और न जाने
क्या-क्या बातें होती हैं । लेकिन द्रव्य के बारे में ऐसी कोई उलझन नहीं
है । द्रव्य के अनंत गुण जितनी जगह में रहते हैं उतना उस द्रव्य का क्षेत्र
है । एक ही घर में रहनेवाले अनेक सदस्यों के कमरे अलग-अलग होते
हैं । लेकिन द्रव्य में गुणों के बारे में वैसा नहीं होता । जितना क्षेत्र एक गुण
व्यापता है उतना ही-वही क्षेत्र दूसरा गुण व्यापता है और वही क्षेत्र सर्व अनंत
गुण व्यापते हैं । जो क्षेत्र द्रव्य का है वही क्षेत्र उसके गुणों का है । जैसे
सोना जितना बड़ा है उतने ही क्षेत्र में उसके गुण – पीलापना, भारीपना,
चमकीलापना आदि हैं ।
स्वचतुष्टय में से द्रव्य और क्षेत्र का ज्ञान होने के पश्चात् अब हम काल
और भाव के बारे में समझेंगे । काल याने परिणमन । द्रव्य की विशिष्ट
अवस्था, पर्याय । इसके बारे में विस्तृत चर्चा हम आगामी पत्र में करेंगे । भाव
अर्थात् गुण की चर्चा तो हम कर ही रहे हैं ।
प्रत्येक द्रव्य का अपना स्वतंत्र स्वचतुष्टय होता है । अर्थात् प्रत्येक द्रव्य
का स्वयं का अपना द्रव्य (स्वद्रव्य), अपना क्षेत्र (स्वक्षेत्र), अपना परिणमन
(स्वकाल) और अपने गुण याने भाव (स्वभाव) होता है । गुण की जो परिभाषा
है उसमें से यह चतुष्टय सिद्ध कर सकते हैं । गुण की परिभाषा है, ‘जो
द्रव्य के (द्रव्य) संपूर्ण भागों में (क्षेत्र) और उसकी संपूर्ण अवस्थाओं में
(काल) रहते हैं उन्हें गुण (भाव) कहते हैं ।’
इसपरसे यह सिद्धांत निकलता है कि प्रत्येक द्रव्य का स्वचतुष्टय भिन्न-
भिन्न है अर्थात् प्रत्येक द्रव्य का अस्तित्व भिन्न-भिन्न है, स्वतंत्र है । इस
सिद्धांत से ‘जीव अनंत में विलीन हो जाता है’ इस अन्यमती की कल्पना का
निराकरण हो जाता है । सिद्ध अवस्था में भी प्रत्येक जीवद्रव्य स्वतंत्र है,
प्रत्येक का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव भिन्न-भिन्न है ।

शक्कर का डिब्बा देखो । उस डिब्बे का स्वद्रव्य डिब्बे में, उसका
स्वक्षेत्र डिब्बे में, उसका स्वकाल डिब्बे में और उसका स्वभाव डिब्बे में है ।
इसीतरह शक्कर का स्वद्रव्य शक्कर में, शक्कर का स्वक्षेत्र शक्कर में,
शक्कर का स्वकाल शक्कर में और शक्कर का स्वभाव शक्कर में है । आज
मैं तुम्हें गृहकार्य दे रही हूँ । प्रतिदिन १०-१० वस्तुओं के स्वचतुष्टय भिन्न-
भिन्न ढूंढकर लिखो । जैसे कागज़ और उसपर जो स्याही के अक्षर हैं
उसमें कागज़ का स्वचतुष्टय भिन्न है और स्याही का स्वचतुष्टय भिन्न है ।
ऐसा करने से क्या लाभ है ? ऐसा करने से जीव की कर्ताबुद्धि के मूलपर
प्रहार होता है । हमें लगता है कि मैंने कितने सुंदर अक्षर लिखे हैं । परंतु
तत्त्वाभ्यास की दृष्टि से उसकी तरफ देखेंगे तो पता चलता है कि कागज़ का
स्वचतुष्टय भिन्न है, स्याही का स्वचतुष्टय भिन्न है, हाथ का स्वचतुष्टय
भिन्न है और मेरा याने जीवद्रव्य का स्वचतुष्टय भिन्न है ।

द्रव्य, गुण, पर्याय और उनका स्वरूप यह अत्यंत सुंदर विषय है ।
संपूर्ण आगम और अध्यात्म का रहस्य और उसका समाधान इन सिद्धांतों में
हैं । स्कूल में गणित विषय में भूमिती के Riders सुलझाते हुये या पहेलियाँ
बुझाते समय बुद्धि को जैसे गति मिलती है, वैसा ही यहाँपर होता है ।

कथा, कादंबरी, निबंध, प्रबंध आदि साहित्य का आस्वाद लेना हो तो
पहले भाषा का ज्ञान जरूरी है । तद्वत् ही अध्यात्म एक अत्यंत रसपूर्ण विषय
है । उसका आस्वाद लेना हो, रस चखना हो तो सबसे पहले इन सीधे सरल
सिद्धांतों को जानना जरूरी है । इस एक-एक सिद्धांत के ऊपर आगे-
आगे का सिद्धांत बताया जाता है, सिद्ध किया जाता है, Logically Prove
किया जाता है ।

बेटा, सच कहूँ ? पढ़ाई चलती है तब तक बुद्धि को बड़ा आव्हान
मिलता है । हम नित्य नया पढ़ते हैं, आत्मसात करते हैं । व्यवसाय में
जुड़नेपर बुद्धि में मंदता आती है । थोड़ी बहुत बुद्धि व्यवसाय के लिए लगती
है, बाकी बची बुद्धि पैसा और अधिकार बढ़ाने में खर्च होती है । फिर भी
समाधान नहीं होता ।

आगम और अध्यात्म का यह विषय सचमुच में बड़ा रसप्रद है ।
बुद्धि को तो आव्हान (उत्तेजना) है ही, मानसिक शांति भी बढ़ती है ।

हमें अपने परिवार की बातों की ओर शास्त्रीय तत्त्व की दृष्टि से देखने
की आदत लगती है ।

सोलापुर के डॉ. मिलिंद शहा से मुलाकात हुयी थी । उसे भी जैन
तत्त्वज्ञान के बारे में कौतुहल है । इसलिए ये पत्ररूप लेख वह स्वयं पढ़ता
है और अन्य लोगों को भी पढ़ने की प्रेरणा देता है ऐसा उसने मुझे
बताया । यह ठीक ही है । जिसे तत्त्व की महिमा आती है उसे सहज ही
ऐसा भाव आता है कि इस बात को अधिक से अधिक लोग जाने ।

अगर ऐसा हमें भासित नहीं हो तो कौओ से भी हम हीन - गये बीते
साबित होंगे, क्योंकि कौओ को खाने के लिए खुरचन (जली खिचड़ी) भी
मिलती है तो पहले काव-काव करके वह अन्य कौओं को इकट्ठा करता है
और फिर सब मिलकर खाते हैं ।

कौआ और चिडियाँ की कहानी सुनने की तुम्हारी उम्र तो अब नहीं
रही । इसलिए आज का पत्र यहींपर समाप्त करती हूँ ।

शेष शुभ ।

तुम्हारी माँ

बारम्बार कहने से पुनरुक्ति का दोष लगता है तथापि हे जीव तू मोहनिद्रा में सो रहा है सो क्यों जागता नहीं ? आत्मभाव से विपरीत राग-द्वेष विभाव को ग्रहण कर रहा है और पदपद पर पंचेंद्रिय के विषयभोगों के सुख में मग्न हो रहा है और उसकारण अनेक प्रकार के दुःखों को तू प्राप्त हो रहा है और तेरे आठ कर्मों का नाश नहीं हो रहा है । आत्मा के स्वभावरूपी महापदार्थ से भ्रष्ट होकर इस संसार में तू भ्रमण कर रहा है । हे जगत्वासी जीव ! तू पंचेंद्रियों के विषयसुख से उदासीन होकर जागृत बन और शुद्धात्मा के अनुभव में लीन हो जा कि जिससे पुनश्च तुझे इस संसार में आना नहीं पड़े ।

  • श्री. द्यानतरायजी - ‘द्यानतविलास’

पत्रांक ८ — पर्याय का स्वरूप | Patrānk 8 — Paryāy kā Svarūp

२० मई १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
पत्राचार के माध्यम से हर महिने में एक बार तो मिल ही लेते हैं ।
मुझे विश्वास है कि तुम नियमित स्वाध्याय एवं देवदर्शन करती ही होगी ।
नियमित स्वाध्याय की आदत ड़ालने से उसकी रुचि बढ़ेगी, उसका मर्म भी
समझ में आयेगा ।
हम (मैं और तुम्हारे पिताजी) सन ७२ में कुंभोज - बाहुबली वहाँ के
मंदिरों के फोटो खींचने हेतु गये थे, उस समय पू. समंतभद्र महाराजजी ने
स्वाध्याय की प्रेरणा दी थी । दवाखाने में खाली समय में पढ़ोगी तो भी कोई
बात नहीं ऐसा उन्होंने कहा था । उसके फलस्वरूप आज जीवन ही बदल
गया है । अब ४-५ घण्टे स्वाध्याय, वाचन, चर्चा, चिंतन-मनन और खाली
समय में मात्र डेढ़ घंटे दवाखाना चलता है । जब मैं दवाखाने में जाती हूँ, तब
तुम्हारे दादा जिज्ञासुओं को पढ़ाते हैं । उनका सामूहिक स्वाध्याय चलता है ।
उनका धार्मिक ग्रन्थों का अनुवाद का काम भी उस खाली समय में चलता
रहता है जब मैं रसोई घर में व्यस्त रहती हूँ ।
गत कुछ पत्रों द्वारा हमने विश्व, द्रव्य, गुण का स्वरूप और प्राथमिक
जानकारी ली थी । द्रव्य-गुण-पर्याय के स्वरूप के बारे में पुनः-पुनः श्रवण,
वाचन, मनन करना जरूरी है । केवल प्रश्न और उत्तर या उनकी परिभाषायें
याद करने से उनका स्वरूप ख्याल में नहीं आता । द्रव्य, गुण, पर्याय का
स्वरूप समझे बिना जैन तत्त्वज्ञान में प्रवेश ही नहीं होगा, तत्त्वज्ञान समझ
में ही नहीं आयेगा । आज मैं पर्याय के बारे में थोड़ी सी जानकारी लिखकर
भेज रही हूँ ।
गत पत्र में गुण की परिभाषा में हमने समझा था कि ‘जो द्रव्य के
संपूर्ण भागों में और उसकी संपूर्ण अवस्थाओं में रहता है, उसे गुण कहते
हैं ।’ यह जो अवस्था है उसे ही पर्याय कहते हैं । पर्याय के अवस्था, दशा,

हालत, अर्थ, परिणाम, परिणमन ऐसे भी अन्य नाम हैं । परिभाषा – ‘गुणों
के विशेष कार्य (परिणमन) को पर्याय कहते हैं ।’ प्रत्येक गुण प्रति समय
परिणमन करता है याने उसकी नयी-नयी अवस्था होती है । प्रत्येक समय में
पुरानी अवस्था नष्ट होकर नयी अवस्था प्राप्त होती है । पुरानी अवस्था का
नाश होना और नयी अवस्था का उत्पन्न होना इसी को अवस्था पलटना भी
कहते हैं । नयी अवस्था पहले अवस्था जैसी भी हो सकती है या अलग भी
हो सकती है अर्थात् अवस्था वैसी की वैसी हो सकती है परंतु वही अवस्था
नहीं रहती ।
द्रव्य अनंत गुणों से बना हुआ है । यह मैंने पहले समझाया था ।
उसके प्रत्येक गुण की अपनी स्वतंत्र अवस्था हर समय होती रहती है,
पलटती है । गुण अनादिअनंत हैं परंतु उसकी पर्याय एक समय मात्र रहती
है । क्षेत्र की अपेक्षा देखा जाये तो जितना गुण का विस्तार है उतना ही
उसकी पर्याय का विस्तार है । जितना बड़ा गुण का क्षेत्र है, पर्याय का क्षेत्र
भी उतना ही बड़ा है, पर्याय का क्षेत्र भी वही है । सोने में जितना क्षेत्र वर्ण
गुण का है उतना ही क्षेत्र वर्ण गुण की पीली पर्याय-अवस्था का है ।
पुद्गलद्रव्य के अनंत गुणों में वर्ण और रस ये दो गुण हैं उनका
उदाहरण हम देखेंगे । वर्ण गुण अनादिअनंत कायम रहता है । उस गुण की
हर समय में कोई ना कोई अवस्था होती रहती है । जैसे वर्ण यह गुण है
और लाल, नीला, सफेद, हरा आदि वर्ण गुण की अवस्थायें हैं । कैरी (कच्चा
आम) में वर्ण गुण की हरी अवस्था है । वर्ण गुण कायम रहते हुये उस वर्ण
गुण की पीली अवस्था होती है । हरा वर्ण पलटकर पीला वर्ण हो जाता है ।
तब गुण नहीं पलटता उसकी अवस्था ही पलटती है । यह बदलाव हमारे
ख्याल में आता है तब हमें लगता है कि अभी यह अवस्था बदल गयी है ।
यद्यपि ८-८ दिन तक कैरी हरी ही दिखती है परंतु यह जो हरेपन से पीलापन
में बदलाव होता है, अवस्था का पलटना होता है, वह प्रति समय हो रहा
है । कैरी की हरी अवस्था पलटकर फिरसे हरी हुयी तो अवस्था पलट गयी
ऐसा हमें महसूस नहीं होता । परंतु बदलाव प्रति समय होता रहता है और
धीरे-धीरे वह कैरी हरे से पीले रूप में बदलती है ।
अब रस गुण के बारे में देखेंगे । रस गुण की खट्टी अवस्था पलटकर
मिठी अवस्था हुयी । रस गुण का कार्य (परिणमन, पर्याय) हर समय में

निरंतर चल रहा है । सब द्रव्यों में पाये जानेवाले सामान्य गुण के बारे में
हम पढ़ेंगे तब हमारे ख्याल में आयेगा ही कि प्रत्येक द्रव्य में ‘द्रव्यत्व’ नामक
एक सामान्य गुण है, उसके कारण द्रव्य का अर्थात् उसके प्रत्येक गुण का
परिणमन निरंतर होता है । निरंतर अर्थात् एक समय का भी अंतर पड़े बिना,
सदैव, हर समय में होता है । रस गुण का कार्य (परिणमन) रस गुण में
होता है, वर्ण गुण का परिणमन वर्ण गुण में, गंध गुण का परिणमन गंध गुण
में और स्पर्श गुण का परिणमन स्पर्श गुण में ।
हम इस बात से परिचित ही हैं कि केवल पीला रंग देखकर आम लाये
तो वह खट्टा भी हो सकता है । इसलिए आम खरीदते समय हम वर्ण
(पीला), गंध (मधुर), रस (मीठा) और स्पर्श (नरम) देखकर खरीदते हैं ।
इससे और एक महान सिद्धांत हमारे ध्यान में आता है कि एक गुण दूसरे
गुण का कार्य, परिणमन या पर्याय नहीं करता, कर ही नहीं सकता ।
एक ही द्रव्य में रहनेवाले अनंत गुण स्वयं अपना-अपना कार्य करते
हैं, परिणमन करते हैं । जब एक द्रव्य में रहनेवाले अनंत गुण परस्पर एक
दूसरे का कार्य नहीं करते, तो फिर एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कार्य कैसे कर
सकता है ? समयसार ग्रंथ में भी कहा है, ‘यः परिणमति सः कर्ता’ जो
परिणमन करता है याने जो स्वयं पलटता है वह कर्ता है और जो परिणमन
हो रहा है वह उसका कर्म अथवा कार्य है ।
किसी एक विशिष्ट द्रव्य की पर्याय उसी द्रव्य में ही होती है । जो क्षेत्र
द्रव्य का है, वही क्षेत्र पर्याय का है । गुण द्रव्य के संपूर्ण क्षेत्र में व्यापता है,
तद्वत् पर्याय भी द्रव्य के संपूर्ण क्षेत्र में व्यापती है, पसरती है, फैलती है ।
जैसे मिसरी में रस गुण संपूर्ण मिसरी में व्याप्त है वैसे उस रस गुण की
मिठास भी संपूर्ण मिसरी में व्याप्त है ।
द्रव्य, गुण और पर्याय इन सभी का क्षेत्र (विस्तार) एक ही होनेपर भी
द्रव्य और गुण अनादि अनंत कायम रहनेवाले ध्रुव हैं और पर्याय एक समय
मात्र टिकनेवाली है । हर समय नयी-नयी पर्याय होती रहती है । पूर्व पर्याय
का नाश और नयी पर्याय का उत्पाद एक ही समय में होता है । जैसे
अंधकार का नाश और प्रकाश का उत्पाद एक ही समय में होता है । ऐसा
नहीं होता कि पहले अंधकार को हटाकर फिर प्रकाश को लाना पड़े ।

एक ही समय में पूर्व पर्याय का नाश हुआ, व्यय हुआ और उसी समय
में नयी पर्याय का उत्पाद हुआ । यह व्यय और उत्पाद हर समय चलता
रहता है परंतु ऐसा होनेपर भी द्रव्य कायम रहता है, द्रव्य के गुण कायम
रहते हैं । इस कायम रहने को ध्रौव्य कहते हैं ।

देखो तो सही, बातों-बातों में ही हमने वस्तुस्वरूप के बारे में एक
महान सिद्धांत को जाना कि वस्तु अर्थात् द्रव्य उत्पाद व्यय ध्रुवता से युक्त
है । तत्त्वार्थसूत्र नाम के ग्रंथ में सूत्र हैं, ‘उत्पादव्ययधौव्ययुक्तम् सत् ।’ ‘सत्
द्रव्यलक्षणम्’ । द्रव्य का लक्षण सत् है और यह सत् उत्पादव्ययध्रुवयुक्त अर्थात्
उत्पाद व्यय और ध्रुवता सहित है ।

द्रव्य में एक पर्यायरूप से उत्पाद, दूसरी पर्यायरूप से व्यय होता है
और उसी समय में द्रव्य कायम रहता है । अब हम सोने का दृष्टांत देखते
हैं – सोना कंगनरूप में था, उसकी अंगूठी बनायी । कंगन पर्याय का व्यय
हुआ, अंगूठी पर्याय का उत्पाद हुआ और सोना सोनारूपसे कायम रहा – यह
सब एक ही समय में हुआ ।

कंगन पर्यायरूप से सोना था, वह सोना स्वयं अंगूठी पर्यायरूप से
पलट गया अर्थात् अंगूठीरूप जो कार्य हुआ वह सोने में हुआ । सोना स्वयं
अंगूठीरूप हुआ, इसलिए अंगूठी का कर्ता सोना है । इससे यह बात समझ
में आती है कि जो कार्य हुआ वह द्रव्य में ही हुआ, द्रव्य के बाहर नहीं और
उस कार्य का कर्ता वही द्रव्य है, अन्य द्रव्य नहीं । अपनी पर्याय का कर्ता
स्वयं वही द्रव्य है, कोई भी अन्य द्रव्य उसका कर्ता नहीं है ।

जीवद्रव्य का कार्य (पर्याय) जीवद्रव्य में होता है । पुद्गल का कार्य
(पर्याय) पुद्गल में होता है । उसीतरह अन्य सभी द्रव्यों का – धर्म, अधर्म,
आकाश, काल द्रव्यों का परिणमन उस विशिष्ट द्रव्य में ही होता है और वह
द्रव्य ही अपने उस परिणमन का कर्ता है । जीव की जो पर्याय होती है उसका
कर्ता जीव है, अजीव की जो पर्याय होती है उसका कर्ता अजीव है । ये
सिद्धांत छहों द्रव्यों में घटित होते हैं । इस नियम का अपवाद नहीं होता ।
अपने स्वद्रव्यपर याने जीवद्रव्यपर यह सिद्धांत घटित करके अपने आप को
अधिकाधिक जानने का, पहिचानने का अपना प्रयत्न है ।

जीवद्रव्य में ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, सुख, वीर्य आदि अनंत गुण

हैं । प्रत्येक गुण की पर्याय उसी विशिष्ट गुण में होती है । विशिष्ट पर्याय
का कर्ता वही विशिष्ट गुण है । जानने का जो कार्य होता है, उसका कर्ता
ज्ञान गुण है । चारित्र का जो कार्य होता है, उसका कर्ता चारित्र गुण है और
यह जो कार्य होता है वह जीवद्रव्य में ही होता है, जीवद्रव्य के बाहर नहीं ।
ज्ञान, सुख, चारित्र आदि का जो कार्य होता है, वह जीवद्रव्य में ही होता है,
शरीर आदि पुद्गलों में नहीं ।

आगम के अभ्यास द्वारा यह तत्त्वदृष्टि अपनानी चाहिए । हमारी आज
तक की मान्यतायें दूर करके तत्त्व का अभ्यास करना होगा । हमारी दृष्टि
हमेशा बाहय चीज़ोंपर, परपदार्थोंपर ही रहती है । इस कारण धनादि में से
सुख प्राप्त होता है, गुरु से या पुस्तक में से ज्ञान प्राप्त होता है ऐसी ही
अडिग श्रद्धा होती है । जब कार्य (पर्याय) होता है तब अनुकूल अन्य
द्रव्यों को ‘निमित्त’ संज्ञा दी जाती है । परंतु वह विषय दूसरा है और उसकी
विस्तृत चर्चा किये बिना भ्रांति होने की ही संभावना अधिक होने से अभी उसकी
चर्चा नहीं करूंगी । पर्याय क्षणिक है, विनाशिक है, उसे टिकाने की कोशिश
करनेपर भी नहीं टिकती इसलिए मात्र पर्याय की तरफ देखनेवाले को आकुलता
हुये बिना नहीं रहती । परंतु वह पर्याय जिसमें से उत्पन्न होती है उस ध्रुव
द्रव्य की तरफ देखने से निराकुलता अनुभव में आती है ।

देखो, हम महिलाओं की दृष्टि सोने की पर्यायपर याने अलंकारों की
डिझाइनपर रहती है, इसलिए एक गहना तोड़कर दूसरा गहना बनवाने की
आकुलता रहती है । परंतु घर के बुजुर्ग व्यक्ति जिनकी दृष्टि स्वर्णपर है वे
‘कोई बात नहीं’ ऐसा कहकर निश्चित रहते हैं ।

तत्त्वज्ञान का अभ्यास यह चिंतारहित होने की अमूल्य औषधी है । हम
डॉक्टर्स नींद की दवाईयाँ देकर पेशंट को सुस्त करते हैं, सुला देते हैं और
दर्दनाशक दवाईयों से पेशंट की संवेदना कम करके इलाज करते हैं; परंतु वह
सही इलाज नहीं है । तत्त्वज्ञान तो हमें जागृत करके वस्तुस्वरूप का ज्ञान
कराता है, उसके कारण आकुलता और चिंता उत्पन्न ही नहीं होती । यही
आकुलतारहित होने का सच्चा मार्ग है ।

अस्तु, शेष चर्चा आगामी पत्र में करूंगी ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ९ — पुद्गलद्रव्य का स्वरूप | Patrānk 9 — Pudgaldravya kā Svarūp

२५ जुलाई १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
इस बार पत्र लिखने में विलंब हुआ; क्योंकि सिद्धचक्र विधान के आयोजन
का लाभ लेने मैं पूना गयी थी । तुम्हारी प्यारी नानी का आमंत्रण तो था
ही, आग्रह भी बहुत था । जहाँ ‘एक पंथ दो काज’ की कहावत चरितार्थ
होती हो, भला एसा मौका कौन गँवायेगा । वहाँ मैंने रोज सायंकाल में
आरती, स्तुति के बाद बच्चों को कहानियों के माध्यम से ‘सच्चे देव कैसे होते
हैं ? शास्त्र क्यों पढ़ने चाहिए ? अपने को पहचानना क्यों जरूरी है ? चार
गतियाँ कौनसी हैं ? इंद्रियाँ कितनी हैं और कौनकौनसी ? हम कौन हैं और
हमारा कार्य क्या हैं ?’ आदि बातों का ज्ञान कराया । कहानी सुनने के लोभ
से बच्चों की भीड़ लगती थी और वे प्रश्नों के उत्तर भी दिया करते थे । ‘मैं
जीवद्रव्य हूँ, शरीर पुद्गलद्रव्य है, हम इंद्रियों से जो-जो जानते हैं वह सब
पुद्गल है, चारों गतियों में सुख कहीं भी नहीं हैं ।’ ऐसे सही-सही उत्तर
वे बच्चे बड़ी शीघ्रता और उत्साहपूर्वक देते थे ।
बच्चों ने जिसे संक्षेप में समझा, उसे ही मैं थोड़े विस्तार से लिख रही
हूँ । विश्व में छह द्रव्य हैं । उसमें से जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल
ये पांच द्रव्य हमें दिखायी नहीं देते, किसी भी इंद्रिय द्वारा हम उन्हें जान
नहीं सकते । इन द्रव्यों को ‘अरूपी’ कहा है । माइक्रोस्कोप या इन्फ्रारेड
फोटोग्राफी से भी उनका अस्तित्व सिद्ध नहीं कर सकते । मात्र पुद्गलद्रव्य
ही रूपी है । उसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि गुण हैं और उस द्रव्य को
इंद्रियों द्वारा हम जान सकते हैं । जानने की शक्ति मात्र जीवद्रव्य में ही
है । जिन इंद्रियों द्वारा जीव जानता है वे इंद्रियाँ भी शरीर का ही भाग याने
अवयव होने से पुद्गल ही हैं । पुद्गल को मूर्तिक और अन्य पाँच द्रव्यों को
अमूर्तिक कहते हैं ।
जीव में स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द आदि नहीं हैं, परंतु जीव अपने

आपको और अन्य को जान सकता है । यह ज्ञान-दर्शन शक्ति अर्थात् जानने
देखने की शक्ति मात्र जीव में ही है इसलिए जीव को ‘चेतन’ कहते हैं । जीव
को छोड़कर अन्य पाँच द्रव्यों को अचेतन कहते हैं ।

छहों द्रव्य एक दूसरे को अवगाहन देते हैं, यह मैं पहले ही लिख चुकी
हूँ । जिस क्षेत्र में जीवद्रव्य व्याप्त है, उसी क्षेत्र में रहनेवाले शरीर को
जीव जानता है । परंतु आश्चर्य और दुर्भाग्य की बात यह है कि उस शरीर
में ही जीव ने ‘स्व’ की कल्पना कर ली है । जानने की शक्ति तो जीव की
है, परंतु वह शरीर की ही है ऐसी भ्रांति इस जीव को हो गयी । जाननेवाला
खुद को ही नहीं जानता इससे बड़ा दुर्दैव और क्या हो सकता है ? शरीर
को ‘मैं’ मानने के कारण शरीर संबंधी चीज़ों को ‘मेरा’ माना गया । पुद्गल
का स्वरूप ज्ञात न होने के कारण ही यह सब गड़बड़ और घोटाला हो
गया है ।

तुम कहोगी कि जब पुद्गल से जीवद्रव्य भिन्न ही है तो फिर केवल
जीवद्रव्य की ही जानकारी दो, अन्य बातों की क्या आवश्यकता है ? परंतु
रोजमर्रा की जिंदगी में भी हम देखते हैं कि जिन चीज़ों की मिलावट की
संभावना होती है उन चीज़ों का ज्ञान भी आवश्यक है । जैसे सोना और पीतल
इन दोनों धातुओं के लक्षण ज्ञात होंगे तो ही सोना खरीदते समय ठगायेंगे
नहीं । हीरा खरीदते समय हीरे के साथ-साथ कांच के गुणधर्म भी ज्ञात
होना जरूरी है ।

इसीप्रकार जीव और शरीरादि पुद्गल के विषय में समझना चाहिए ।
शास्त्रों में पुद्गल के बारे में जो विस्तृत वर्णन है उसका एकमात्र कारण यही
है कि जीव पुद्गलों में अहंपना करता है, उसके साथ एकमेक होनेरूप
कल्पनायें करता है, उन पुद्गलों को जानकर ‘मैं उनसे भिन्न हूँ उनरूप नहीं
हूँ’ ऐसा समझना होगा ।

पुद्गल के परमाणु और स्कंध ऐसे दो भेद हैं । जिसका दूसरा विभाग
नहीं हो सकता ऐसे सबसे छोटे पुद्गल को परमाणु कहते हैं । सच कहो
तो परमाणु ही पुद्गलद्रव्य है । दो या दो से अधिक परमाणुओं का बंध होता
है उसे स्कंध कहते हैं । स्कंध में दो, अनेक, असंख्य या अनंत भी परमाणु
हो सकते हैं ।

स्थूलता और सूक्ष्मता के आधार से स्कंध के छह भेद किये जाते
हैं । जैसे गेहूँ, थुली, भरड़, रवा, आटा और मैदा ऐसे भेद हम देखते
हैं ।
स्कंधों के भेद –
(१) स्थूल-स्थूल - वह पुद्गल स्कंध जिसके दो टुकड़े करनेपर
फिर से आपस में पूर्ववत् नहीं जुड़ सकते । जैसे पर्वत, लकड़ी, कोयला,
बाल आदि ।
(२) स्थूल - वह पुद्गल स्कंध जिसके दो विभाग तो हो सकते हैं
और फिर से एकत्रित करनेपर पुनः पूर्ववत् एकमेक हो जाते हैं । जैसे
पानी, तेल, दूध आदि द्रवपदार्थ ।
(३) स्थूल-सूक्ष्म - वह पुद्गल स्कंध जो आँखों से दिखायी देता है,
परंतु हाथों से पकड़ा नहीं जाता, जिसके टुकड़े भी नहीं कर सकते । जैसे
प्रकाश, अंधकार आदि ।
(४) सूक्ष्म-स्थूल - वह पुद्गल स्कंध जो आँखों से दिखायी नहीं
देता परंतु अन्य चार इंद्रियों द्वारा जाना जा सकता है । जैसे हवा, सुगंध,
स्वाद, आवाज आदि ।
(५) सूक्ष्म - वह पुद्गल स्कंध जो किसी भी इंद्रियों द्वारा जाना नहीं
जा सकता । इसका उदाहरण है कार्माणवर्गणा । कार्माणवर्गणा से जो बनता
है उसे द्रव्यकर्म या कार्माणशरीर कहने में आता है ।
(६) सूक्ष्म-सूक्ष्म - सबसे सूक्ष्म स्कंध । जैसे दो या अधिक परमाणुओं
से बनी अन्य वर्गणायें ।
प्रवचन में पुद्गल स्कंधों का यह वर्गीकरण सुनकर इंद्रजीत ने तुम्हारे
दादा से कहा था कि आपका यह वर्णन सुनकर Matter की Solid, Liquid
और Gas ये States याने अवस्थायें सिद्ध होती हैं । उस वज़ह से अन्य भेद
भी हम मान्य कर सकते हैं । विज्ञान के दृष्टिकोण से विश्लेषण करके उसने
जो निष्कर्ष निकाले वह प्रयत्न मुझे सराहनीय लगा । औरंगाबाद का इंद्रजीत,
सातारा का शिरीष, मुंबई का राजेश - ये सब इंजिनीयर हैं और जैन सिद्धांत
में विशेष रुचि रखनेवाले युवक हैं ।
ये सिद्धांत अद्भुत हैं और सर्वज्ञ कथित होने के कारण सत्य भी
हैं ।
स्थूल - सूक्ष्मता की अपेक्षा से इन स्कंधों के दूसरे प्रकार से भेद
(वर्गीकरण) किये जाते हैं । (१) आहारवर्गणा, (२) तेजसवर्गणा,
(३) भाषावर्गणा, (४) मनोवर्गणा, (५) कार्माणवर्गणा आदि २२ भेद हैं ।
(१) आहारवर्गणा यह वर्गणा सबसे स्थूल है । इस पुद्गल
स्कंध से औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर बनते हैं ।
तिर्यंच, मनुष्य, देव, नारकी जीवों के शरीर आहारवर्गणा से बनते हैं ।
हमें जो दिखायी देती हैं वे चीजें आहारवर्गणा से बनी हैं, जैसे मिट्टि, पत्थर,
लोहा, लकड़ी, वस्त्र, वनस्पति, तिर्यंच और मनुष्य के शरीर आदि ।
(२) तेजसवर्गणा इस वर्गणा से तेजसशरीर बनता है । इस
तेजसवर्गणा के कारण शरीर में कांति एवं उष्णता उत्पन्न होती है ।
(३) भाषावर्गणा इस वर्गणा के कारण आवाज याने ध्वनि बनती
है । विज्ञान में भी हम ध्वनिलहरी कहते हैं, उन्हें रेडिओ द्वारा पकड़ सकते
हैं, उसका पुनः प्रक्षेपण कर सकते हैं, उनकी लम्बाई नाप सकते हैं ।
(४) मनोवर्गणा इस पुद्गल स्कंध से द्रव्यमन की रचना होती
है । द्रव्यमन अष्टदल कमल के आकार का है और छाती में उसका स्थान
है । परंतु सूक्ष्म होने के कारण ऑपरेशन के समय भी अंदर कहीं दिखायी
नहीं देता । विचार, संकल्प, विकल्प, स्मरण, उपदेश का ग्रहण आदि कार्य
मन के द्वारा चलते हैं । उसे जानने का कार्य तो जीव ही करता है । हम
कहते भी हैं, मेरे मन में ऐसा विचार आया ।
(५) कार्माणवर्गणा इस वर्गणा से कार्माणशरीर बनता है । इससे
भी सूक्ष्म अन्य वर्गणायें हैं । पुद्गल के बारे में इतना जान लेनेपर कई बातें
हमारी समझ में आती हैं । शरीर आहारवर्गणा से बनता है, वाणी भाषावर्गणा
से, मन मनोवर्गणा से और कर्म कार्माणवर्गणा से बनता है । ये सभी पुद्गल
के ही भेद होने के कारण अचेतन हैं । किसी भी वर्गणा में ज्ञान-दर्शन अर्थात्
चैतन्य नहीं है । ज्ञान जीव का ही गुणधर्म है ।
शास्त्रों में कथन आता है कि, ‘मैं चैतन्यमात्र हूँ; शरीर, मन, वाणी,
कर्म आदि से भिन्न हूँ’ उसका अर्थ अब हमारी समझ में ठीक से आ सकता
है । उन्हें भिन्न करना नहीं है, वे जीव से भिन्न ही हैं ऐसा मात्र जानना
ही है । पुद्गल को जानना दोष नहीं है किंतु उसे अपना मानना, उसमें
आत्मबुद्धि करना दोष है ।
अपने को पहचानने के लिए दूसरों को जानना भी चाहिए । ‘अपने
को पहचानिए’ यह मंत्र सदा सामने रखकर उसी के लक्ष्य से शास्त्राभ्यास
करना चाहिए ।
दो दिन बाद हम शिबिर में सम्मिलित होने के लिए जयपुर जा रहे
हैं । वहाँ से लौटनेपर मिलेंगे ।

तुम्हारी माँ

तथा कितने ही जीव ऐसा मानते हैं कि जानने में क्या है,
कुछ करेंगे तो फल लगेगा । ऐसा विचार कर व्रत-तप आदि क्रिया
ही के उद्यमी रहते हैं और तत्त्वज्ञान का उपाय नहीं करते । सो
तत्त्वज्ञान के बिना महाव्रतादि का आचरण भी मिथ्याचारित्र ही नाम
पाता है, और तत्त्वज्ञान होनेपर कुछ भी व्रतादिक नहीं हैं तथापि
असंयत सम्यग्दृष्टि नाम पाता है । इसलिए पहले तत्त्वज्ञान का
उपाय करना, पश्चात् कषाय घटाने के लिए बाह्य साधन करना ।
– पं. टोडरमलजी ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’

पत्रांक १० — अस्तित्व गुण | Patrānk 10 — Astitva Guṇ

२७ अगस्त १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।

हमने अब तक विश्व, द्रव्य, गुण, पर्याय का स्वरूप समझा और
पुद्गलद्रव्य के बारे में थोड़ी सी जानकारी प्राप्त की । हम इंद्रियों द्वारा
जो कुछ जानते हैं वह सब पुद्गल ही है ऐसा ज्ञान होनेपर सहज ही प्रश्न
उठता है कि जीवद्रव्य कैसा है ? और उसको जानना हो तो कैसे जाने ?
जीवद्रव्य का विशेष जानने से पहले उसका सामान्य लक्षण जानना होगा ।
‘सब द्रव्यों में जो गुण पाये जाते हैं उन्हें सामान्य गुण कहते हैं’ यह तो
तुम्हें पता ही है । वैसे तो सामान्य गुण अनंत हैं; परंतु अनंत की चर्चा न
संभव है और न आवश्यक । वस्तु का सामान्य स्वरूप ख्याल में आ सके,
इसलिए छह सामान्य गुण जानना पर्याप्त है । ये छह गुण इसप्रकार हैं –
अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व, प्रदेशत्व ।

अस्तित्व याने सत्ता - विद्यमानता - सद्भाव । द्रव्य सर्वदा है । द्रव्य की
सत्ता सदाकाल रहती है ऐसा जानने के पश्चात् ही द्रव्य कैसा है, क्या काम
करता है ? यह जाना जा सकता है । अस्तित्व गुण की परिभाषा है –
‘जिस शक्ति के कारण से द्रव्य का कभी भी नाश नहीं होता और द्रव्य किसी
से उत्पन्न भी नहीं हो सकता उस शक्ति को अस्तित्व गुण कहते हैं ।’

अस्तित्व गुण यह दर्शाता है कि प्रत्येक द्रव्य की सत्ता अनादिकाल से
है और वह सत्ता सदा कायम रहनेवाली है तथा कोई भी द्रव्य नया उत्पन्न
नहीं होता । प्रत्येक द्रव्य का अपना-अपना अस्तित्व गुण है । दो या अधिक
द्रव्य मिलकर उनकी एक सत्ता नहीं होती, उसीतरह नया द्रव्य उत्पन्न होकर
द्रव्यों की संख्या भी नहीं बढ़ती ।

पुद्गल के बारे में वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि Matter is
always constant, it is never destroyed, it only changes its
form. वास्तव में छहों द्रव्यों के बारे में यह सिद्धांत सच उतरता है कि द्रव्य
हमेशा रहता है उसकी मात्र पर्याय बदलती है । वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में
केवल पुद्गल पर ही प्रयोग किये हैं, इसलिए पुद्गल के बारे में थोड़ी बहुत
जानकारी वे दे सकते हैं । परंतु आत्मा के प्रयोग आत्मा में ही हो सकते हैं,
आत्मा के द्वारा ही आत्मा को जान सकते हैं, आत्मानुभूति हो सकती है ।
ऐसे प्रयोग हमारे आचार्यों ने किये और तद्नुसार उन्हों ने शास्त्रों की रचना
की । यह भी विज्ञान है इसका नाम भी ‘वीतराग विज्ञान’ है ।

तत्त्वार्थसूत्र नाम के ग्रंथ में द्रव्य का लक्षण ‘सत्’ बताया है । ‘सत्
द्रव्य लक्षणम्’ सत् याने अस्ति-सत्ता । यह सत्ता किस कारण से है ? इसे
ईश्वर ने निर्माण किया और ईश्वर इस सत्ता को टिकाये रखता है ऐसा है
क्या ? नहीं । प्रत्येक द्रव्य की सत्ता उसके अपने अस्तित्व गुण के कारण
से है । इस सत्ता के लिए-अस्तित्व के लिए किसी भी परद्रव्य की मदद या
सहारे की आवश्यकता नहीं होती ।

दगडू नाम का एक आदमी था । उसके पास न जनम का प्रमाणपत्र,
ना कोई जीवित होने का प्रमाणपत्र था । वह किसी काम से सरकारी ऑफिस
में गया । क्लर्क ने उससे पूछा, ‘अरे, तू अस्तित्व में है, जीवित है इसका
तेरे पास कोई सबूत है ?’ दगडू कहता है, ‘साहब ! मैं जीता-जागता
आपके सामने हाजिर हूँ और आप मेरे जीवित होने का, अस्तित्व का सबूत
माँग रहे हैं ?’ हमारी भी स्थिति आज ठीक ऐसी ही हो गयी है । सारी
दुनिया को जाननेवाला, सब का ज्ञान करनेवाला, निर्णय करनेवाला, बुद्धिवंत
ऐसा यह आत्मा ही पूछ रहा है कि, ‘आत्मा है इसका सबूत क्या है ?’
जीव के सहवास के कारण कलेवर (शरीर) को भी जिंदा कहा जाता है और
जीव निकल जाने के बाद उसे मृत कहा जाता है । वह जीव ही आज कलेवर
में मैंपना स्थापित करके कह रहा है कि ‘आत्मा है इसे सिद्ध कीजिए नहीं
तो हम नहीं मानेंगे ।’

इसप्रकार सर्वप्रथम अस्तित्व का ही अस्तित्व सिद्ध करने की जिम्मेदारी
हम पर आती है । जीव का अस्तित्व पहले भी था, वर्तमान में भी है और
इस मनुष्य अवस्था के बाद (मृत्यु के पश्चात्) भी कायम रहनेवाला है ऐसा
बतानेवाले अस्तित्व गुण की सिद्धि हम निम्नानुसार कर सकते हैं ।

(१) एकेंद्रियों से लेकर पंचेंद्रियों तक अनेक जीव दिखायी देते हैं ।
मनुष्यों में भी कोई गरीब, कोई श्रीमंत, कोई अंधा, कोई लूला, एक ही घर
में कोई होशियार तो कोई मतिमंद ऐसी विषमता दिखायी देती है, ऐसा
क्यों ? ऐसा पूछनेपर उत्तर मिलता है कि उस जीव ने पूर्व में जैसे कर्म बांधे
थे उसके फल वह जीव भोग रहा है । इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म
बांधनेवाला जीव जो पूर्व में था वही जीव अब उस कर्म के फल भुगत रहा
है । इसतरह अस्तित्व गुण की सिद्धि होती है ।

(२) व्यंतरों की अनेक घटनायें हमारे देखने-सुनने में आती हैं । जो
जीव पूर्व में विशिष्ट व्यक्ति था वही जीव व्यंतर हो गया है अर्थात् जीव का
अस्तित्व कायम है ।

(३) पूर्वजन्म की अनेक कहानियाँ सिद्ध हो चुकी हैं । पूर्व के भव का
वही जीव इस भव में भी अस्तित्व में है यह सिद्ध होता है । जातिस्मरण (पूर्व
भव की स्मृति) द्वारा भी यह सिद्ध होता है ।

(४) प्रथमानुयोग में अनेक कथायें हैं । किसी जीव के अनेक भवों
का वर्णन उसमें आता है । भगवान आदिनाथ के समय मारीचि नाम का जीव
था, वही जीव करोडों-अरबों वर्षों पश्चात् सिंह हुआ और वही जीव दस भव
पश्चात् भगवान महावीर हुआ, वर्तमान में वही जीव सिद्ध अवस्था में है । जीव
का अस्तित्व कायम है ।

(५) बालक, युवा, वृद्ध अवस्थाओं में रहनेवाला एक ही जीव है ।
शरीर में इतना बड़ा बदलाव आनेपर भी जीव वही है, उस जीव का अस्तित्व
कायम है ।

(६) पच्चीस साल पहले मुझे क्रोध आया था इसका ज्ञान मुझे इस
समय हो सकता है । क्रोध निकल गया, फिर भी उसका ज्ञान करनेवाला
जीव कायम है ।

(७) साँप के काटनेपर मंत्र द्वारा जब वह व्यक्ति बोलने लगती है
तब कहती है कि वह (साँप) पूर्वजन्म का कोई वैरी था ।

(८) उमास्वामी आचार्य ने तत्त्वार्थसूत्र में बताया है कि -
‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ।’ ‘सत् द्रव्यलक्षणम् ।’

इसप्रकार अस्तित्व की सिद्धि तो हमने कर दी । परंतु इस अस्तित्व
का-सत्ता का स्वरूप कैसा है इसके बारे में थोड़ासा परिचय प्राप्त करेंगे ।
ऊपर कहा था वैसे यह सत्ता उत्पाद, व्यय, ध्रुवता युक्त है । प्रत्येक द्रव्य
अपने गुणों और पर्यायों से युक्त होता है (गुणपर्ययवत् द्रव्यम्) । उसमें द्रव्य
और उसके अनंत गुण नित्य होते हैं - ध्रुव होते हैं, उसमें वधघट नहीं होती,
उनका स्वरूप नहीं बदलता, जैसे हैं वैसे कायम रहते हैं । पर्याय हर समय
नयी-नयी बनती है, हर समय पूर्व पर्याय का नाश होता है । ये उत्पाद और
व्यय (उत्पत्ति और विनाश) पर्यायों के होते हैं ।

द्रव्य का प्रत्येक समय में बदलनेवाला अंश है उसकी अवस्था याने
पर्याय और उसी समय में ध्रुव रहनेवाला, कायम रहनेवाला, अपरिवर्तनीय अंश
है द्रव्य व गुण ।

द्रव्य का लक्षण ‘सत्’ है ऐसा जब हम कहते हैं तब वह ‘सत्’
उत्पाद, व्यय और ध्रुव से युक्त होता है । द्रव्य भी सत् है (नित्य अंश)
और पर्याय भी सत् है (अनित्य अंश) । प्रत्येक समय में द्रव्य किसी ना
किसी अवस्था में रहता ही है । द्रव्य अपनी पर्याय से भिन्न नहीं होता ।
यह पर्याय क्षणिक होती है । प्रत्येक समय में नयी पर्याय उत्पन्न होती है
और पुरानी पर्याय का विनाश होता है; इसकारण द्रव्य को क्षणिक मानना
योग्य नहीं है ।

जब हम ‘सोना’ इस वस्तु के बारे में विचार करते हैं तब पता चलता
है कि जो सोना सोनेरूप से कायम रहता है, उसे ध्रुव अंश, नित्य अंश कहते
हैं और उसकी जो हार, कंगन, कुंडल आदि अवस्थायें होती हैं, वे उत्पाद,
व्यय रूप हैं, उन्हें अनित्य अंश कहते हैं ।

जीव में पर्याय की अपेक्षा से मनुष्यपर्याय, देवपर्याय, नारकीपर्याय,
तिर्यंचपर्याय आदि उत्पाद-व्यय चलते रहते हैं । पर्याय के नाश को द्रव्य का
नाश मानने से दुःख होता है । परंतु एक पर्याय के नाश के साथ-साथ उसी
क्षण नयी पर्याय की उत्पत्ति होती है और द्रव्य तो सदा ही जैसा का वैसा
कायम रहता है इस बात का ज्ञान होते ही मरण के संबंध में दुःख, भय,
आकुलता का नाश होता है । वैसे ही इहलोक का भय, परलोक का भय,
अरक्षाभय आदि सप्त भयों का भी अंत होता है ।

एक अस्तित्व गुण के जानने से बहुत लाभ होता है । जैसे –

(१) मैं जीवद्रव्य हूँ और सत् होने के कारण अनादि अनंत हूँ। मैं
अनादिकाल से हूँ और अनंत काल तक मेरा अस्तित्व कायम रहनेवाला है ।
(२) मैं अजर अमर हूँ । (३) सात प्रकार के भयों का अभाव होता है ।
(४) ईश्वर जगत का उत्पन्नकर्ता, रक्षणकर्ता और विनाशकर्ता है इस विपरीत
मान्यता का अभाव होता है । (५) कर्म जीव का उत्पन्नकर्ता, रक्षणकर्ता या
विनाशकर्ता है इस खोटी मान्यता का अभाव होता है । (६) मैं दूसरों को
उत्पन्न करनेवाला, उनका रक्षण करनेवाला या नाश करनेवाला हूँ ऐसी खोटी
मान्यता का अभाव होता है । (७) दूसरा कोई मेरा उत्पन्नकर्ता, रक्षणकर्ता
या विनाशकर्ता है इस मिथ्या मान्यता का अभाव होकर हीन-दीनपना नष्ट
होता है । (८) मेरा अस्तित्व मेरे ही कारण है इसलिए मात्र स्व-अस्तित्वपर
दृष्टि केंद्रित करने से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति और धर्म की शुरुवात होती है ।

देखो तो सही, एक अस्तित्व गुण जान लेने से कितना सारा लाभ होता
है, अमर होने की कला हाथ लग जाती है । अपनी ही मूर्खता से, अज्ञान
के कारण शरीर के साथ संयोग-वियोग होनेपर हम अपना जन्म-मरण मानते
आये थे और कल्पना से ही दुःखी होते थे । अस्तित्व गुण जानने से अब
समझ में आया कि जीव कभी भी नहीं मरता । कहा भी है –

‘उत्पाद व्यय युत वस्तु है फिर भी सदा ध्रुवता धरे ।
अस्तित्व गुण के योग से कोई नहीं जग में मरे ।।’

केवल एक अस्तित्व गुण जानने से इतना सारा लाभ हुआ इसलिए
बाकी अन्य गुण शीघ्र जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है । उसकी चर्चा
अगली बार करेंगे ।

पर्युषण पर्व के निमित्त होनेवाले प्रवचनों का लाभ अवश्य लेना । मोना,
औरंगाबाद में ब्र. श्री. यशपालजी जैन आनेवाले हैं और रीना, मालाड में
श्री. प्रदीपजी झांझरी आनेवाले हैं । उनके प्रवचनों का लाभ तुम्हें अवश्य
लेना चाहिए ऐसी मेरी भावना है ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक ११ — वस्तुत्व गुण | Patrānk 11 — Vastutva Guṇ

२९ अक्टूबर १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
पत्राचार द्वारा हम जो स्वाध्याय कर रहे हैं उसे डेढ़ साल बीत चुके ।
हमारे साथ अन्य बहुत से लोग इसका लाभ ले रहे हैं, यह अच्छी बात
है । धार्मिक पत्रिका या पुस्तक देखते ही हम ऐसा सोच लेते हैं कि वह घर
के बुजुर्गों के लिए है हमें उससे कुछ प्रयोजन नहीं है । ऐसी मनोवृत्ति आज
कल अनेक लोगों की है । परंतु इसमें हर एक के अपने कल्याण की ही
बात है यह हमने गत दस पत्रों द्वारा देखा है ।
गत पत्र में अस्तित्व गुण की चर्चा करते हुये हमने विचार किया था कि
द्रव्य सत् है । द्रव्य की सत्ता याने अस्तित्व शाश्वत है - कायम है । द्रव्य नया
उत्पन्न भी नहीं होता, द्रव्य का विनाश भी नहीं होता । यह ‘सत्’ उत्पाद,
व्यय, ध्रुवता से युक्त है । प्रत्येक समय में द्रव्य की नयी अवस्था याने पर्याय
उत्पन्न होती है और पुरानी या पूर्व पर्याय का नाश होता है । द्रव्य की पर्याय
को ही द्रव्य का कार्य अथवा क्रिया कहने में आता है । वस्तु में होनेवाली यह
क्रिया उस वस्तु के अंगभूत शक्ति के कारण होती है । इस शक्ति को
ही वस्तुत्व गुण कहते हैं । इस वस्तुत्व गुण के बारे में आज हम चर्चा
करेंगे । वस्तुत्व गुण की परिभाषा है – ‘जिस शक्ति के कारण से द्रव्य में
अर्थक्रियाकारित्व होता है अर्थात् अपनी-अपनी प्रयोजनभूत क्रिया होती है उस
शक्ति को वस्तुत्व गुण कहते हैं ।’
इस परिभाषा में अर्थक्रियाकारित्व शब्द आया है । अर्थ याने द्रव्य,
अर्थक्रिया याने द्रव्य की क्रिया - द्रव्य का कार्य - द्रव्य का परिणमन - द्रव्य की
पर्याय । कारित्व याने करवाने की शक्ति । अर्थक्रियाकारित्व याने द्रव्य का
परिणमन होने का जो भाव है - शक्ति है वह द्रव्य के वस्तुत्व गुण के कारण
है । प्रत्येक द्रव्य में ही अपनी क्रिया करने की शक्ति स्वयं की है । उसे
वस्तुत्व गुण कहते हैं । वस्तुत्व गुण के कारण द्रव्य की ‘वस्तु’ संज्ञा है ।
द्रव्य अपने गुण पर्यायों में वसता है इसलिए उसे वस्तु कहते हैं ।

प्रत्येक द्रव्य का प्रतिसमय जो परिणमन हो रहा है, वह उस द्रव्य के
वस्तुत्व गुण के कारण हो रहा है । यह परिणमन किसी भी अन्य द्रव्य के
कारण, ईश्वर के कारण, कर्म के कारण या अपनी इच्छा के कारण नहीं
होता । किसी भी द्रव्य के पर्याय की यह उत्पाद-व्यय रूप क्रिया किसी भी
अन्य द्रव्य के कारण नहीं होती । कोई भी द्रव्य दूसरे अन्य द्रव्य की क्रिया
याने पर्याय (उत्पाद-व्यय रूप अवस्था) कर ही नहीं सकता ।

वस्तुत्व गुण की परिभाषा में ‘प्रयोजनभूत क्रिया’ शब्द आता है । प्रयोजन
अर्थात् हेतु - कारण । आँखों का क्या प्रयोजन है ? देखना । ज्ञान गुण का
प्रयोजन है ज्ञान करना, श्रद्धा गुण का प्रयोजन है श्रद्धा करना । प्रत्येक द्रव्य
और प्रत्येक गुण अपना-अपना प्रयोजनभूत कार्य करता है ।

शरीर के अवयवों का उदाहरण ही देखो ना ! एक ही शरीर के अवयव
होनेपर भी आँखे देखने का काम करती हैं, कान सुनने का काम करते हैं,
नाक सूँघने का काम करता है । परंतु ऐसा कभी भी नहीं होता कि आँखें
लाल हो गयी हैं, इसलिए कानों ने देखने का काम किया हो अथवा कान में
दर्द है इसलिए आँखों ने थोड़े समय के लिए सुनने का काम किया हो ।
प्रत्येक इंद्रिय अपना-अपना प्रयोजनभूत काम करता है, दूसरों के काम में
दखल नहीं देता, हेर-फेर नहीं करता, अपनी मर्यादा में रहकर अपना कार्य
करता है । बड़ी-बड़ी संस्थाओं अथवा बड़े एक ही परिवार में हर व्यक्ति
अपना-अपना काम करते हुये अपनी मर्यादा में रहे तो सुख-सुविधा से सारा
कारोबार चलता है । परंतु आज कल छोटे परिवारों में भी मानसिक तणाव और
कलह होते हैं, वे वस्तुत्व गुण के इस रहस्य को न जानने से ही होते हैं ।

एक ही द्रव्य में रहनेवाले जो अनंत गुण हैं, वे भी अपना कार्य आप
स्वयं ही करते हैं । ज्ञान गुण श्रद्धा गुण का कार्य नहीं करता, श्रद्धा गुण
चारित्र गुण का कार्य नहीं करता । इसका जिसे पता नहीं है उसे अज्ञानवश
ऐसे प्रश्न उठते हैं कि इतना जानते हो तो सम्यग्दर्शन क्यों नहीं हो रहा
अथवा दीक्षा क्यों नहीं ले रहे हो ? राजा वृषभदेव की कथा मालूम है ना ?
वे जन्म से ही सम्यग्दृष्टि थे (उनके श्रद्धा गुण का निर्मल परिणमन था),
सम्यग्ज्ञानी थे । फिर भी उनकी ८३ लाख पूर्व की आयु संसार (राजपाट)
सम्हालने में बीती । अंतरंग लीनता होकर (चारित्र गुण की पर्याय) मुनियोग्य
चारित्र दशा होने में उन्हें इतना समय लगा । क्योंकि प्रत्येक गुण का कार्य
उसके स्वयं के कारण होता है । यहाँ इस बात का पता लगता है कि श्रद्धा
गुण चारित्र गुण का कार्य नहीं करता । यहाँ जो यह दृष्टांत दिया है, वह
संसार में स्वच्छंदता से रहने के लिए नहीं, बल्कि वस्तुत्व गुण का स्वरूप
जानने के लिए दिया है ।
जीवद्रव्य अपनी प्रयोजनभूत क्रिया अर्थात् जानना-देखना आदि कार्य
करता है, परंतु अन्य जीवों का या पुद्गल का कार्य जीव नहीं कर सकता ।
अज्ञान के कारण यह जीव ऐसा मानता है कि परद्रव्य का कार्य मैं करता हूँ,
मेरी इच्छा के अनुसार परद्रव्यों का परिणमन मैं बदल सकता हूँ, कदाचित्
इच्छा के अनुसार कार्य हुआ तो कर्तृत्वबुद्धि का अहंकार पुष्ट करता है और
अन्यथा कार्य होनेपर आकुलता करता है, दुःखी होता है । परद्रव्यों में एकत्व
करने के कारण पर के कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व की मिथ्या भ्रमणा इस जीव
को होती है ।
यह जीव शरीर को ‘स्व’ मानता है अथवा ‘मेरा’ मानता है और शरीर
की क्रिया मैं करता हूँ ऐसा वृथा अभिमान करता है । जब अपनी इच्छा के
अनुसार शरीर की हलन-चलन आदि क्रिया होती है तब यह कर्तृत्वबुद्धि और
ही बढ़ती है । परंतु जब बीमार होना, वृद्धत्व आना, बाल सफेद होना या
नष्ट होना, कमजोरी आना आदि शरीर की क्रियायें अपनी इच्छा के विरुद्ध
होती हैं, तब यह जीव दुःखी होता है । जब यह जीव जानेगा कि, ‘मैं एक
जीवद्रव्य हूँ, मेरा जानने-देखनेरुप परिणमन मेरे में ही हो रहा है और
वह मेरे वस्तुत्व गुण के कारण से हो रहा है । तथा शरीर अनंत पुद्गल
परमाणुओं का बना हुआ है, उसमें प्रत्येक परमाणु अपने-अपने वस्तुत्व गुण
के कारण परिणमन कर रहा है’ तब उसके कर्तृत्वबुद्धि का, आकुलता का
और दुःख का अंत होगा ।
अस्तित्व गुण में हमने देखा था कि प्रत्येक द्रव्य का अस्तित्व (सत्ता)
भिन्न-भिन्न है, यह सत्ता उत्पाद, व्यय और धुव्रता से युक्त है । आरंभ में
गुण की परिभाषा में देखा था कि प्रत्येक द्रव्य का स्वचतुष्टय – स्वद्रव्य,
स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव भिन्न-भिन्न हैं और आज यह देखा कि
प्रत्येक द्रव्य में वस्तुत्व गुण है, जिसके कारण उस द्रव्य की उत्पादव्ययरूप
क्रिया चल रही है । इन सब बातों से प्रत्येक द्रव्य की स्वतंत्रता ध्यान में
आती है ।
देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक लोगों को जान की बाजी लगाकर
लड़ना पड़ा था । परंतु वस्तु की यह स्वतंत्रता प्राप्त नहीं करनी है, किंतु वस्तु
स्वभाव से ही स्वतंत्र है उसे मात्र जानना है । उस स्वतंत्र स्वभाव का हमें
ज्ञान करना है । इस ज्ञान के नहीं होने से हम भ्रांति से दुःखी हो रहे
हैं । वस्तुस्वरूप ज्ञात होने से यह सारा दुःख स्वयं दूर हो जाता है ।
वर्तमान में जिधर देखो उधर टेन्शन दिखायी देता है । दूसरों के परिणमन
का बोजा अपने माथेपर लादकर यह जीव दुःखी हो रहा है । बच्चों के पालने
पोसने की चिंता, उन्हें पढ़ाने की चिंता, उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार डॉक्टर-
इंजिनियर बनाने की चिंता, पैसा कमाने की और उसे टिकाये रखने की चिंता,
परिवार के सदस्यों को अपनी मर्जी के अनुरूप आचरण कराने की चिंता, रोग
या मरण प्राप्त न हो इसकी चिंता - इन चिंताओं का कोई अंत नहीं है ।
अपने आप को दूसरों का कर्ता-धर्ता मानकर यह जीव मिथ्या अहंकार करता
है और निरंतर दुःखी रहता है ।
कोई विशिष्ट कार्य अपनी शक्ति के - मर्यादा के बाहर है ऐसा लगता
है, तब यह जीव ईश्वर को कर्ता-धर्ता मानकर उसके पास दौड़ता है । सच्चे
देव का स्वरूप ज्ञात न होने के कारण वीतरागी भगवान के सामने पुत्र, पैसा,
स्वास्थ्य आदि की याचना करता है, अभिलाषा सहित भक्ति करता है अथवा
अन्यमती जैसा सरागी देवी-देवता, कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्रों के वश होकर
गृहित मिथ्यात्व का पोषण करता है ।
कोई विशिष्ट कार्य अपनी इच्छा के अनुसार होनेपर अपना अभिमान
पुष्ट करता है तथा अपनी इच्छा के विरुद्ध होनेपर कर्मपर सारा दोष लादकर
निश्चित हो जाता है । छोटे बच्चे को हौवा का भय दिखाकर हम खाना खिलाते
हैं या अभ्यास करने के लिए कहते हैं, वैसे इस जीव ने कर्म को हौवा बनाया
है । कर्म पुद्गल है और उसकी क्रिया उसके वस्तुत्व गुण से उसके स्वचतुष्टय
में होती है । मैं जीवद्रव्य हूँ और मेरा परिणमन मेरे वस्तुत्व गुण से मेरे में
हो रहा है इसका इस जीव को पता ही नहीं है ।
बेटा ! देखो तो सही, एक-एक गुण जानने से कितना लाभ होता
है ! स्वाध्याय से, तत्त्वचिंतन से वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान होते ही उसका
फल भी तत्काल ही मिलता है । आज पुण्यकार्य करो और कुछ काल के बाद
उसका फल मिलेगा ऐसा उधार का धंधा तत्त्वज्ञान में नहीं है । अभी तक
तो हम केवल सब द्रव्यों का सामान्य स्वरूप समझने का प्रयास कर रहे
हैं । इसके पश्चात् जीवद्रव्य का विशेष स्वरूप समझते समय विशेष आनंद
प्राप्त होगा इसमें संदेह नहीं है । उसके पूर्व बाकी के चार सामान्य गुण और
भी अभी हमें समझने हैं । वस्तुत्व गुण जानने से जो लाभ होता है उन्हें
संक्षेप में फिर से बताती हूँ ।

(१) प्रत्येक द्रव्य अपनी-अपनी प्रयोजनभूत क्रिया करता है इसलिए
कोई भी द्रव्य निरर्थक नहीं है । (२) प्रत्येक द्रव्य स्वयं अपना कार्य करता
है, दूसरे अन्य द्रव्य का कार्य नहीं करता । (३) प्रत्येक द्रव्य का कार्य उसके
वस्तुत्व गुण के कारण से होता है । अन्य द्रव्य के कारण नहीं होता । वस्तु
तो स्वतंत्र है ही, प्रत्येक वस्तु का कार्य भी स्वतंत्र है । (४) मैं जीवद्रव्य हूँ
और जानना मेरा कार्य है, उसके लिए मुझे अन्य द्रव्य की आवश्यकता नहीं
है । (५) मैं परद्रव्य का कार्य कर सकता हूँ इस कर्तृत्वबुद्धि का अभाव
होकर निराकुलता की प्राप्ति होती है । (६) परद्रव्यों का परिणमन उनके स्वयं
के स्वचतुष्टय में होता है ऐसा जानने से परद्रव्यों के प्रति राग-द्वेष उत्पन्न
नहीं होते । (७) मेरे में जो राग-द्वेष होते हैं, वे मेरे अपने ही कारण से
होते हैं, परपदार्थों के कारण से नहीं । (८) सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होकर
अपूर्व शांति का अनुभव होता है ।

वस्तुत्व गुण का स्वरूप बतानेवाला यह पद्य देखो –

वस्तुत्व गुण के योग से, हो द्रव्य में स्व-स्वक्रिया ।
स्वाधीन गुण-पर्याय का ही पान द्रव्यों ने किया ।।
सामान्य और विशेषता से कर रहे निज काम को ।
यों मान कर वस्तुत्व को पाओ विमल शिवधाम को ।।

वस्तुत्व गुण के बाद द्रव्यत्व गुण की चर्चा आगामी पत्र में करेंगे ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक १२ — द्रव्यत्व गुण | Patrānk 12 — Dravyatva Guṇ

२९ नवम्बर १९९४

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
जैन सिद्धांतों का अभ्यास, जो प्रत्येक जीव को हित का मार्ग दिखानेवाला
है, कितनी रुचि-उत्सुकता और उत्साह बढ़ाता है इसकी प्रतीति पुणे में
हुयी । पर्युषण पर्व में तुम्हारे दादा रोज तीन प्रवचन देते थे । डॉ. किरण शहा

  • श्रीमती मुग्धा शहा ने यह कार्यक्रम आयोजित किया था । वहाँ दादा ने
    हमेशा की तरह लघु जैन सिद्धांत प्रवेशिका पढ़ाना प्रारंभ किया । लोगों में
    इतनी रुचि उत्पन्न हुयी कि दुबारा अष्टान्हिका में (१० नवम्बर से १७
    नवम्बर) आठ दिन प्रतिदिन पाँच घण्टों का प्रवचनों का प्रोग्रॅम उन्होंने हम दोनों
    का बनाया । यह शिबिर श्री. विजय दोशी - श्रीमती ममता दोशी ने आयोजित
    किया था । उस समय से वहाँ अब रोज नियमितरूप से स्वाध्याय तो चल
    ही रहा है, इसके अलावा और एक दस दिन का शिबिर २० एप्रिल ९५ से
    श्री. प्रशांत दोशी - श्रीमती प्रज्ञा दोशी आयोजित करने जा रहे हैं । उस समय
    हम दोनों मिलकर प्रतिदिन आठ घण्टे प्रवचन करनेवाले हैं । विद्यालय और
    महाविद्यालयों के छात्र तथा बुजुर्ग सब मिलकर १००-१२५ लोग बड़े उत्साह
    से भाग लेते हैं । तत्त्वज्ञान की महिमा ही ऐसी अपूर्व है । बुद्धिमान व्यक्ति
    उसे शीघ्र जान लेते हैं ।

गत दो पत्रों में हमने अस्तित्व और वस्तुत्व गुणों का स्वरूप समझा ।
सब द्रव्यों में पाये जानेवाले सामान्य गुणों की चर्चा हम कर रहे हैं । छह
सामान्य गुणों में से द्रव्यत्व गुण का स्वरूप आज हम समझेंगे ।

अस्तित्व गुण बताता है कि द्रव्य की सत्ता अनादि अनंत है । वस्तुत्व
गुण दर्शाता है कि प्रत्येक द्रव्य का कार्य अर्थात् परिणमन उस द्रव्य के स्वयं
के कारण होता है । द्रव्यत्व गुण यह सिद्ध करता है कि प्रत्येक द्रव्य का यह
परिणमन निरंतर अखंडता से चलता रहता है । एक समय का भी विराम
लिये बिना प्रत्येक द्रव्य हर समय अपना कार्य करता है । द्रव्यत्व गुण की

परिभाषा ही यह है, ‘जिस शक्ति के कारण द्रव्य की अवस्था निरंतर बदलती
रहे, उस शक्ति को द्रव्यत्व गुण कहते हैं।’ द्रव्य कायम रहकर उसकी
अवस्था निरंतर बदलती है । इस कारण उत्पाद और व्यय अखंड प्रवाहरूप
से सदा चलते ही रहते हैं । पर्याय एक समय से अधिक काल तक टिक ही
नहीं सकती । अपनी अवस्था निरंतर (अंतर पड़े बिना) पलटने का यह गुण
प्रत्येक द्रव्य में न रहता तो द्रव्य ‘कूटस्थ’ बनने का प्रसंग आता । द्रव्य जिस
अवस्था में है, उसी अवस्था में कायम रह जाता । रोगी हमेशा रोगी ही
रहता, निरोगी नहीं बन पाता । बालक छोटा ही रह जाता, युवा नहीं हो
पाता । संसार अवस्था का नाश होकर सिद्ध अवस्था न हो पाती ।

दूध से दही हुआ, कैरी से आम हुआ, शिष्य को ज्ञान हुआ, रोगी
निरोगी हुआ । ये सभी परिणमन द्रव्यत्व गुण के कारण ही होते हैं । प्रत्येक
द्रव्य में, द्रव्य के प्रत्येक गुण में निरंतर जो परिणमन होता है वह उसके
अपने द्रव्यत्व गुण के कारण ही होता है । परंतु आज तक हम ऐसा मानते
आ रहे हैं कि इस कार्य का कर्ता कोई परद्रव्य है । गुरु से ज्ञान हुआ,
डॉक्टर के कारण रोग ठीक हुआ ऐसा जो कहते हैं, यह सब निमित्त का
कथन है, उपचार से ऐसा कहने में आता है; परंतु वस्तुस्थिति वैसी नहीं
है । यह बात हमें जाननी ही चाहिए ।

कैरी हरी थी, खट्टी थी, कठिन थी वही पलटकर आम पीला, मधुर
और नरम हुआ । यह पलटी हुयी अवस्था पंद्रह दिन बाद हमारी समझ में
आयी । हम मानते हैं कि हमने कैरी को ठीक रीति से घास (पाल) में
रखकर पकाया । परंतु कैरी पक गयी - आम बना उसमें द्रव्यत्व गुण अंतरंग
निमित्त है और कालद्रव्य बहिरंग निमित्त है । प्रत्येक गुण स्वतंत्ररूप से
परिणमित होता है । वर्ण गुण की हरी अवस्था पलटकर पीली हुयी उसका
कर्ता वर्ण गुण है । रस गुण की खट्टी अवस्था पलटकर मिठी अवस्था हुयी,
उसका कर्ता रस गुण है, स्पर्श गुण की कठिन पर्याय पलटकर नरम पर्याय
हुयी उसका कर्ता स्पर्श गुण है । वस्तु की स्वतंत्रता ही ऐसी है । प्रत्येक गुण
ही स्वतंत्ररूप से अपना-अपना कार्य करता है इतना ही नहीं, प्रत्येक समय
की पर्याय भी स्वतंत्ररूप से उस समय की योग्यता के अनुसार उत्पन्न होती
है । वर्तमान पर्याय भूत पर्याय के कारण नहीं बनती और भविष्य पर्याय का
कर्ता वर्तमान पर्याय नहीं होती । पहली पर्याय का नाश होता है उसी समय
दूसरी पर्याय उत्पन्न होती है । जो स्वयं विनाश को प्राप्त हो गया हो वह
अन्य किसी को कैसे उत्पन्न कर सकता है ?

तुम कहोगी, ‘कालद्रव्य ने तो परिणमन कराया ही है ना ? कालद्रव्य
को तो कर्ता मानोगी कि नहीं ?’ उसका उत्तर है कि कालद्रव्य निमित्त है
और निमित्त अकिंचित्कर होता है अर्थात् निमित्त कार्य में कुछ भी नहीं
करता । यह कैसे संभव है देखते हैं –

प्रत्येक द्रव्य हर समय अपना-अपना परिणमन कर रहा है । कालद्रव्य
भी अपने द्रव्यत्व गुण के कारण निरंतर परिणमन कर रहा है । उसके एक
पर्याय को एक समय कहते हैं । असंख्यात समयों का एक सैकंड, ६०
सैकंडों का एक मिनट होता है । घण्टा, दिन, महिना, वर्ष … आदि को
‘व्यवहारकाल’ कहते हैं । एक सैकंड में कालद्रव्य असंख्यात बार परिणमता
है, उदाहरण के तौर पर मानो कि १०० बार परिणमित होता है । प्रत्येक
द्रव्य एक सैकंड में १०० बार परिणमित होता है । एक-एक अवस्था पलटकर
उनकी भी १०० अवस्थायें पलटीं । इस परिणमन का कारण है उन द्रव्यों का
अपना-अपना द्रव्यत्व गुण । १ ली पर्याय से १०० वीं पर्याय तक १ सैकंड
काल बीता । और एक दृष्टांत देखने से जल्दि समझ में आयेगा ।

एक नवजात बालक है । उसके शरीर की अवस्था हर समय पलटती
हुयी एक साल बाद विशिष्ट अवस्था प्राप्त हुयी । बालक का विकास
हुआ, शरीर बढ़ गया । यह विकास कितना हुआ इसे देखने के लिए हम
उस बालक की लम्बाई (Height), वजन (Weight), बालक की मानसिक
और शारीरिक प्रगति (Mile Stones) आदि बातों का निरीक्षण करते हैं,
परंतु अलग-अलग बच्चों का शारीरिक या मानसिक विकास कम ज्यादा
होता है इसलिए कितनी बार अवस्था पलटी यह बताने के लिए कितना काल
व्यतीत हो गया अर्थात् कितनी बार उसने परिणमन किया यह बताने के लिए
काल की सापेक्षता से बालक एक साल का हुआ ऐसा हम कहते हैं । परंतु
पुद्गल (शरीर) और कालद्रव्य ये दो भिन्न द्रव्य हैं और वे अपने-अपने
परिणमन के कर्ता हैं ।

विद्यार्थी परीक्षा में तीन घण्टे बैठकर जो पेपर लिखते हैं वह कार्य
विद्यार्थी स्वयं करते हैं या तीन घण्टे की अवधि लिखने का कार्य करती है ?
एक व्यक्ति का हाथ जल गया । उसने मुझसे पूछा, ‘डॉक्टर, यह जखम
कब ठीक होगा ?’ जखम के लक्षणों को देखकर मैंने बताया, इसे ठीक
होने में आठ दिन लगेंगे । मेरे कहे अनुसार उसका जखम ठीक हो
गया । रोगी की अंगभूत शक्ति के कारण उसकी रोगी अवस्था पलटकर
निरोगी अवस्था प्राप्त हो गयी । इस शक्ति को ही हम द्रव्यत्व गुण कहते
हैं । जखम ठीक होने की शक्ति उसमें ही थी और यह कार्य हर समय चल
ही रहा था, समय-समय करके आठ दिनों बाद निरोगी अवस्था प्राप्त हुयी ।
यह अवस्था शरीर की, शरीर में, शरीर के गुणधर्म के कारण हुयी । शरीर
में कितनी अवस्थायें पलटने के बाद यह विशिष्ट अवस्था हुयी इसे नापने के
लिए कालद्रव्य की कितनी अवस्थायें हुयी इसे गिनकर हम कहते हैं आठ
दिन बीते । कालद्रव्य ने मात्र अपने में परिणमन किया, शरीर में कोई हेर-
फेर नहीं किया । फिर भी उपचार से हम कहते हैं कि यह कार्य काल के
कारण हुआ । यह उपचार का आरोप जिस द्रव्य पर आ सकता है उसे
निमित्त कहते हैं । परंतु निमित्त कार्य में कुछ भी नहीं करता, इसे हमने
अभी-अभी समझा है ।

समय-समय, क्षण-क्षण करते हुये काल का प्रवाह अखंड रीति से
चलता रहता है । काल कभी भी रुकता नहीं है इससे तो हम आप सब
परिचित ही हैं । काल एक द्रव्य है तद्वत् ही अन्य सभी द्रव्यों की अवस्थाओं
का प्रवाह अखंडरूप से हर समय एक-एक पर्याय इस रीति से यह पर्यायक्रम
निरंतर चलता रहता है । ये सब खाली बातें नहीं हैं, इसे शास्त्राधार है । दो
हजार साल पूर्व कुंदकुंदाचार्य ने समयसार लिखा, उसके एक हजार साल
पश्चात् आचार्य अमृतचंद्र ने उस ग्रंथपर टीका (ग्रंथ का विश्लेषण) लिखी जिसे
‘आत्मख्याति’ कहते हैं । उसमें ६५ वा कलश (कर्ता कर्म अधिकार का
२० वा कलश) इसतरह है –
स्थितेति जीवस्य निरंतराया स्वभावभूता परिणाम शक्तिः ।
तस्या स्थितायां स करोति भावं य स्वस्य तस्यैव भवेत् स कर्ता ।।

अर्थ – चेतनद्रव्य का - जीवद्रव्य का परिणमनरूप सामर्थ्य अनादि से
विद्यमान है ऐसा द्रव्य का सहज स्वभाव है । यह परिणामशक्ति निरंतराया
अर्थात् प्रवाहरूप है - एक समय मात्र खंड उसमें नहीं होता । उस परिणामशक्ति
द्वारा जीव जो भाव (शुद्ध या अशुद्ध) करता है उसका कर्ता वह जीव
स्वयं ही है । हमें कभी-कभी बहुत क्रोध उत्पन्न होता है, गुस्सा आता है,
उस समय हम अन्य व्यक्ति को क्रोध का कारण मानते हैं, परंतु असल में
इस क्रोध का कर्ता हम स्वयं ही है ।
द्रव्य पलटते हुये भी कायम रहता है, अनित्य होते हुये भी नित्य रहता
है । निरंतर पलटनेरूप पर्यायगत स्वभाव द्रव्य का ही है और निरंतर पलटते
हुये भी ध्रुव-त्रिकाली स्वभावरूप से कायम रहने का स्वभाव भी द्रव्य का ही
है । द्रव्य पलटते हुये भी नहीं पलटता, यह कैसे संभव हैं ?
दस साल के एक बालक को हम पहचानते हैं । उसी बालक को हमने
दस साल बाद देखा, अब वह बीस साल का युवान हो गया है, उसमें बहुत
कुछ बदल गया है फिर भी वह वही लड़का है यह बात हमारे ज्ञान में आती
है, अवस्था पलटनेपर भी वह वही है यह समझ सकते हैं ।
एक ही समय में द्रव्य नित्य भी है और अनित्य भी है । यदि हमें
आश्रय लेना हो, तो नित्य चीज का ही लेना होगा । पलटनेवाले व्यक्ति का
हम विश्वास नहीं करते । सदा पलटनेवाली पर्याय की तरफ देखकर हम
या तो उसे कायम रखने की इच्छा करते हैं या अपनी इच्छा के अनुरूप
विशिष्ट पर्याय प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं । परंतु यह बात वस्तुस्वरूप
से विरुद्ध होने के कारण ऐसा हो नहीं सकता और उस कारण से हम
दुःखी होते हैं । वस्तुस्वरूप का सही ज्ञान होनेपर ही यह आकुलता और
दुःख नष्ट होता है ।
शरीर हमेशा युवान रहे, बाल काले से सफेद न हो जाये, पैसा व
परिवार का संयोग कायम रहे, इसप्रकार से यह जीव वर्तमान पर्याय को
कायम टिकाना चाहता है और उसकी इच्छा के अनुरूप घटित नहीं होता तब
दुःखी होता है । कदाचित इच्छा के अनुसार कार्य हुआ (बच्चों की पढ़ाई
आदि) तो मिथ्या अहंकार करके अपने को उसका कर्ता मानता है ।
द्रव्यत्व गुण जानने से कितना सारा लाभ हुआ, है ना ? वह मुख्यतः
इसप्रकार है -
(१) प्रत्येक द्रव्य अनादि अनंत कायम रहता हुआ अपनी अवस्था

निरंतर बदलता है यह उस द्रव्य के द्रव्यत्व गुण के कारण होता है, परद्रव्य
या निमित्त कुछ भी कर नहीं सकता ।
(२) जीव की पर्याय शरीर के कारण, कर्म के कारण, ईश्वर के
कारण, अन्य जीवों के कारण, अजीवों के कारण पलट नहीं सकती ।
(३) अन्य किसी की भी पर्याय मेरे कारण से पलट नहीं सकती ।
आज तक मैं अन्य का कर्ता-धर्ता हूँ ऐसी मिथ्याबुद्धि थी, उसका नाश हुआ ।
(४) पर्याय जितना ही मैं हूँ ऐसा मानने के कारण मैं दुःखी हो रहा
था, परंतु अनित्यता याने पलटना यह पर्यायगत स्वभाव है, मैं तो अनादि अनंत
नित्य हूँ ऐसा जानने से आकुलता नष्ट हो गयी ।
(५) विशिष्ट प्रिय व्यक्ति का मरण क्यों हुआ ? वैभव था अब गरीबी
क्यों आयी ? किसी को अपंगत्व क्यों है ? अमुक घटना ऐसी ही क्यों
हुयी ? आदि विचारों का तूफान मन में मच जाता है और हम चिंतित - व्यथित
हो जाते हैं । द्रव्यत्व गुण के कारण से यह परिणमन उस विशिष्ट द्रव्य में
हो रहा है ऐसा योग्य कारण समझ में आने से मन को शांति मिलती है ।
(६) वर्तमान में जो मिथ्यात्व अवस्था है वह पलटकर सम्यक्त्व
प्राप्त करने की शक्ति प्रत्येक जीव में है । सम्यग्दर्शन का यह कार्य जीव
स्वयं ही स्वयं में कर सकता है । अरहंत से, शास्त्रों के पठन पाठन से,
यात्रा-पूजा करने से यह सम्यग्दर्शन का कार्य नहीं होगा । परंतु श्रद्धा गुण
की मिथ्यात्व अवस्था पलटकर श्रद्धा गुण स्वयं ही सम्यक्त्व अवस्था रूप
से परिणमनेवाला है ।
ऐसा होने के लिए तत्त्वनिर्णय की नितांत आवश्यकता है, उसके लिए
हमारा पत्ररूप स्वाध्याय चल ही रहा है । इन पत्रों को पुस्तकरूप कब दोगी
ऐसा सवाल अनेक वाचक पूछते हैं । उस सवाल का भी यही उत्तर है कि
इसकी पुस्तकरूप अवस्था इसके द्रव्यत्व गुण के कारण से ही होगी । वह
जब होनेवाली होगी तब होगी, उसे मात्र जानने का ही कार्य हम कर सकते
हैं । शेष चर्चा आगामी पत्र में करूंगी ।
तुम्हारी माँ

पत्रांक १३ — प्रमेयत्व गुण | Patrānk 13 — Prameyatva Guṇ

१० जनवरी १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व गुण समझने से वस्तुस्वरूप की पहचान होने
से अधिक जानने की जिज्ञासा जागृत हुयी है ऐसा तुम दोनों ने बताया,
बहुत आनंद हुआ । पढ़नेवाले व्यक्ति की तीव्र रुचि देखकर पढ़ानेवाले का
भी उत्साह द्विगुणित होता है, इसलिए वाचकों से पत्रों की प्रतिक्रियायें सदा
स्वागतार्ह हैं ।
गत पत्र में द्रव्यत्व गुण का दोहा नहीं लिखा ऐसा तुमने कहा है । वह
इसप्रकार है -
द्रव्यत्व गुण इस वस्तु को जग में पलटता है सदा ।
लेकिन कभी भी द्रव्य तो तजता न लक्षण सम्पदा ।
स्व-द्रव्य में मोक्षार्थी हो स्वाधीन सुख लो सर्वदा ।
हो नाश जिससे आज तक की दुःखदायी भव कथा ।।
द्रव्यत्व गुण की चर्चा में ‘सम्यग्दर्शन की पर्याय द्रव्यत्व गुण के कारण
से श्रद्धा गुण में होती है । अरिहंत से, दिव्यध्वनि से, स्वाध्याय से, पूजा से
या अन्य क्रियाओं से नहीं होती’ इसे पढ़कर रीना तुमने पूछा है कि, ‘शास्त्रों
में पुण्य को त्यागने योग्य (हेय) बताया है, फिर माँ, आप और पिताजी तो
प्रतिदिन प्रक्षाल, पूजन, अष्टक, स्वाध्याय आदि करते हैं, यह कैसे ?’ यह
बहुत ही मार्मिक प्रश्न है ।
बचपन में तुम दोनों तैरना सीख रही थी, याद है ? शुरुवात में पीठ
पर डिब्बा बांधकर पानी में उतरती थी और हाथ पैर हिलाने की प्रैक्टिस किया
करती थी । मार्गदर्शन के साथ सीखते हुये, योग्य तरीके से तैरने की कला
हासिल होने तक पानी के ऊपर तैरने के लिए डिब्बे की आवश्यकता थी ।
परंतु उस समय सिखानेवाले और सीखनेवाले को भी पक्का विश्वास था कि
यह डिब्बा जल्द से जल्द छोड़ने योग्य है अर्थात् ‘हेय’ है । डिब्बा छोड़कर
स्वतंत्र रूप से तैरना योग्य है परंतु जल्दबाजी में डिब्बा छोड़कर डूब जाना
योग्य नहीं है ।

तद्वत् ही शास्त्रस्वाध्याय, जिनेंद्रदर्शन, पूजन आदि का आधार-अवलंबन
लेकर हमें तत्त्वनिर्णय करके शुद्धात्मानुभूति करनी है । इन सब बातों का
आधार उनमें अटकने के लिए नहीं अपितु उसमें से आगे बढ़ने के लिए
है । परंतु ये सब छोड़कर स्वच्छंदता से पापों में मग्न होना योग्य नहीं
है । समयसार ग्रंथ में शुभभावों को ‘हस्तावलंब’ कहा है । ऊपर की
मंजिलपर जाने के लिए सीढ़ी चढ़ते समय रेलिंग का सहारा लेकर ऊपर
चढ़ते हैं परंतु मंजिलपर कदम रखते समय रेलिंग का सहारा छोड़कर याने
हस्तावलंब छोड़कर ही आगे बढ़ना पड़ता है । तद्वत् जिनेंद्र भगवंतों का दर्शन,
उनके बताए हुये उपदेश का श्रवण, चिंतन और तत्त्वनिर्णय किये बिना आत्मानुभव
नहीं होगा इसलिए ये सब बातें कार्यकारी, उपयुक्त हैं ही; परंतु आत्मानुभव
के समय में इन बातों का आधार छूट ही जाता है । विकल्पों में जब तक
ये बातें होगी तब तक आत्मानुभव नहीं होगा । यह बात ध्यान में रखकर
पुण्य को ‘हेय’ कहा है ।

इन बातों का ग्रहणपूर्वक त्याग होता है । जैसे महाविद्यालय में प्रवेश
प्राप्त करते समय हम S. S. C. उत्तीर्ण होकर विद्यालय का त्याग करते
हैं । जो कभी विद्यालय में ही नहीं गया अथवा S. S. C. होने के पूर्व आधी
अधूरी पढ़ाई करके विद्यालय छोड़ देता है वह महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त
करने के लिए पात्र नहीं होता, लायक नहीं होता । उसीतरह शास्त्र स्वाध्याय
से वस्तुस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके तत्त्वों का यथार्थ निर्णय हुये बिना आत्मानुभव
नहीं होगा, परंतु जिस समय आत्मानुभव होता है उस समय आत्मासंबंधी
विकल्प भी छूट जाते हैं, निर्विकल्प अवस्था होती है ।

आज का हमारा विषय है ‘प्रमेयत्व गुण’ । उसकी परिभाषा इसतरह
है, ‘जिस शक्ति के कारण से द्रव्य किसी ना किसी ज्ञान का विषय बनता है
उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं ।’ सरल भाषा में कहना हो तो, प्रत्येक द्रव्य में
ऐसी शक्ति है जिसके कारण से वह द्रव्य ज्ञान में झलकता है, जाना जाता
है । जिसतरह जीवद्रव्य में जानने की शक्ति है जिसे ज्ञान गुण कहते हैं
उसीतरह प्रत्येक द्रव्य में ‘ज्ञान में झलकना’, ‘किसी के ज्ञान में जाना जा
सकना’ ऐसी शक्ति है, जिसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं । सभी द्रव्यों में पाया
जानेवाला ऐसा यह सामान्य गुण होने के कारण प्रत्येक द्रव्य ज्ञान में झलकता
है, जाना जाता है, इसलिए विश्व में ऐसी कोई भी बात बाकी नहीं रहती जो
ज्ञान से जानी नहीं जा सकती, ज्ञान में नहीं झलकती । विश्व का स्वरूप
अनजाना (Unknown) नहीं रह सकता, गुप्त नहीं रह सकता ।
तुम कहोगी, ‘ऐसी कितनी सारी बातें हैं । जिसका हमें ज्ञान नहीं है,
हम जिन्हें नहीं जान सकते ।’ अरी सुन तो सही, प्रमेयत्व गुण यह बता रहा
है कि प्रत्येक द्रव्य किसी ना किसी ज्ञान में झलकता ही है । T. V. पर हम
क्रिकेट मॅच देखते हैं तब कभी-कभी ऐसा होता है कि विशिष्ट खिलाड़ी
आऊट हो गया है या नहीं यह बात दोनों ही अम्पायर्स के ज्ञान में नहीं
आती, उस समय तीसरे (Third) अम्पायर की मदद याने राय ली जाती
है अर्थात् अलग-अलग दिशाओं में रखे हुये T. V. कैमेरे से चित्रित किये हुये
मॅच के दृश्य फिरसे देखकर निर्णय दिया जाता है । ‘किसी ना किसी ज्ञान
में आना या झलकना’ का अर्थ अब समझ में आया होगा, इसी को प्रमेयत्व
गुण कहते हैं ।
दूसरा सरल दृष्टांत देखेंगे । सुगंध आँखों से दिखायी नहीं देती परंतु
नाक (घाणेंद्रिय) से जानी जाती है, आवाज को अन्य इंद्रियों से नहीं जाना जा
सकता, कर्णों से जान सकते हैं और खट्टा मीठा स्वाद आँखों से या कानों से
नहीं परंतु जिव्हा (रसनेंद्रिय) से जाना जा सकता है । जो चीज़ आँखों से
दिखती है वह अन्य इंद्रियों से ज्ञात होगी ही ऐसा नहीं है । पुद्गल के स्पर्श,
रस, गंध, वर्ण गुण तथा शब्द ज्ञान में जाने जा सकते हैं ऐसी प्रमेयत्व नाम
की शक्ति उस पुद्गल में है । सुई में धागा पिरोते समय मुझे दिखायी नहीं
देता, परंतु तुम्हें दिखता है अर्थात् जो मेरे ज्ञान में नहीं आया वह तुम्हारे
ज्ञान में आ गया ।
जीर्ण रोग से त्रस्त रोगी अपने रोग के निदान एवं चिकित्सा के लिए
अनेक डॉक्टरों से जाँच करवाता है । कभी डॉक्टर, कभी वैद्य, कभी और
कोई । उसे भी एक ही आशा रहती है कि इस रोग का निदान किसी ना
किसी के ज्ञान में आयेगा और वह औषधी बतलाकर मुझे ठीक कर देगा, मेरा
इलाज करेगा ।
प्रमेयत्व गुण के कारण द्रव्य किसी ना किसी ज्ञान का विषय होता है
ऐसा कहनेपर सहज ही प्रश्न उठता है कि ज्ञान के भी प्रकार हैं क्या ?
और वे कितने हैं और कौनकौनसे हैं ? उसका उत्तर है - ज्ञान गुण तो एक
है । परंतु जानने का कार्य पर्याय में होता है इसलिए पर्याय की अपेक्षा से
ज्ञान के भेद बताये जाते हैं । वे इसप्रकार हैं – मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान,
मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान । उसके विस्तार में न जाते हुये संक्षेप में
कहना हो तो अरिहंत और सिद्धों को छोड़कर अन्य सब जीवों को मतिज्ञान
और श्रुतज्ञान होता है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव आदि की मर्यादा सहित याने
विशिष्ट क्षेत्र की मर्यादा में, विशिष्ट काल की मर्यादा में रूपी पदार्थों के बारे
में जो ज्ञान होता है वह अवधिज्ञान है । विशिष्ट भावलिंगी मुनियों को दूसरे
के मन में स्थित रूपी पदार्थों के विचार जानने की जो शक्ति होती है उसे
मनःपर्ययज्ञान कहते हैं । केवलज्ञान का अर्थ है सबकुछ जानने की शक्ति ।
एक ही समय में युगपत् (एकसाथ) विश्व के अनंतानंत द्रव्य, प्रत्येक द्रव्य के
अनंत गुण, उनमें से प्रत्येक गुण की भूत-वर्तमान-भविष्य कालीन अनंत पर्यायें
और प्रत्येक पर्याय के अनंत अविभाग प्रतिच्छेद इन सबको प्रत्यक्ष जाननेवाला
जो ज्ञान है उसे केवलज्ञान कहते हैं । जिन्हें केवलज्ञान प्रगट हो गया उन्हें
‘केवली’ कहते हैं - ‘सर्वज्ञ’ कहते हैं । अरिहंत और सिद्ध सर्वज्ञ हैं ऐसा
हमने पत्र नं. १ और २ में देखा ही था ।
इससे सिद्ध होता है कि विश्व में ऐसी एक भी बात नहीं, एक भी
द्रव्य, गुण, पर्याय नहीं है कि जो केवलज्ञान में नहीं जानी जा सकती ।
केवलज्ञान में सर्व बातें जानने की ताकत है वैसे ही प्रत्येक द्रव्य में ज्ञान में
झलकने की ताकत है । अन्य किसी ज्ञान में चाहे झलके या न झलके,
केवलज्ञान में तो सभी द्रव्य झलकते ही हैं ।
प्रमेयत्व गुण को जानने से सर्वज्ञ की सिद्धि तो होती ही है, क्रमबद्ध
पर्याय की सिद्धि भी हो जाती है । केवलज्ञान में सब द्रव्य जाने जाते हैं -
झलकते हैं, उनके अनंत गुण भी झलकते हैं और प्रत्येक गुण की अनादि
अनंत काल की सभी पर्यायें भी झलकती हैं । तात्पर्य यह हुआ कि कौनसी
पर्याय कब होगी, किस पर्याय के बाद कौनसी पर्याय होगी, उस समय अन्य
द्रव्यों की अवस्थायें क्या होगी, काल की अपेक्षा से कौनसा काल होगा,
निमित्तरूपसे कौनसे द्रव्य होंगे इन सभी बातों का ज्ञान अनंत केवलियों
के ज्ञान में आया है, आ रहा है । इसीका तात्पर्य यह हुआ कि सभी बातें,
घटना सुनिश्चित हैं ।
‘बाप रे बाप ! तो फिर हम व्यर्थ ही मेहनत कर रहे हैं । जब जो
होनेवाला है वह होगा, फिर हमें स्वाध्याय करने की जरूरत नहीं है’ ऐसी
स्वच्छंदता - ऐसा पलायन कोई करता होगा तो इसपर से उस जीव की रुचि
कहां है यह सिद्ध होता है । जिसे आत्मानुभव याने सम्यग्दर्शन की पर्याय
प्रकट होती है उससे पूर्व की पर्यायें भी केवली के ज्ञान में झलकती ही हैं ।
जिनेन्द्रकथित तत्त्वोपदेश सुनकर ही तत्त्वनिर्णय, तत्त्वनिर्णयपूर्वक ही
पुरुषार्थ, पुरुषार्थपूर्वक ही आत्मानुभूति, आत्मानुभूतिपूर्वक ही चारित्रदशा और
ऐसी मुनिदशापूर्वक ही मोक्षदशा ऐसा पर्यायों का क्रम भी उनके ज्ञान में
आया है । उनके ज्ञान में ज्ञात हुयी ये बातें ही दिव्यध्वनिरूप से वाणी में
आयी, वह वाणी सुनकर गणधरों ने और अनेक आचार्यों ने तद्वत् अनुभव
करके शास्त्रों की रचना की और इसतरह से परंपरा से सर्वज्ञ का उपदेश
आज हमें प्राप्त है यह हमारा सद्भाग्य है ।
प्रमेयत्व गुण का स्वरूप ध्यान में आनेपर एक बात हमारी समझ में
आती है कि हम जो कुछ कर रहे हैं वे सभी बातें, सभी कार्य, सभी विचार
अन्य किसी के ज्ञान में शायद आ सके या नहीं आ सके, केवली के ज्ञान में
तो आते ही हैं । मात्र एक ही केवली के नहीं परंतु सर्व अनंत केवलियों
के । ऐसा जानते ही तीव्र पाप करने का भाव, चोरी करने का भाव, मिलावट
या भेल-सेल करने का भाव, झूठ बोलने का भाव उस जीव को नहीं होगा ।
जो व्यक्ति प्रमेयत्व गुण का स्वरूप जानता है, केवली का स्वरूप जानता है
वह व्यक्ति अनंत केवलियों के साक्षी में पाप करने के लिए उद्युक्त नहीं
होगा । समाज में हमें कुछ ऐसे भी व्यक्ति दिखायी देते हैं कि जो शास्त्रों
का अभ्यास करनेपर भी अन्याय और अनीति का आचरण करते हैं । ऐसा
क्यों ? ऐसा प्रश्न तुम मुझसे पूछोगी । उसका यही उत्तर है कि उन्होंने
शास्त्रों का मर्म नहीं जाना, केवली का स्वरूप भी नहीं जाना । ऐसे व्यक्ति
यदि केवली का याने अरिहंत - सिद्धों का स्वरूप ही नहीं जानते तो उनका
णमोकार मंत्र पढ़ना व्यर्थ है, उन्होंने सच्चे अर्थ में भगवान को नमस्कार भी
नहीं किया ऐसा कहना पड़ेगा । परंतु ऐसे लोगों का उदाहरण देखकर यदि
हम शास्त्राभ्यास छोड़ दें तो हमारे जैसे मूरख हम ही होंगे, ऐसा मूरख
ढूँढनेपर भी नहीं मिलेगा ।

हम कहते हैं कि आज के वैज्ञानिकों ने कितने सारे आविष्कार किये हैं,
पहले तो कुछ भी नहीं था । जैसे अणुऊर्जा - Atomic Energy का आविष्कार
आज के वैज्ञानिकों ने किया । अरी ! अणु में ऊर्जा होती है इसे तो इन
वैज्ञानिकों ने अभी जाना । उन वैज्ञानिकों ने अणु में ऊर्जा निर्माण नहीं करायी,
उस ऊर्जा का उन्हें ज्ञान हुआ । अणु में याने पुद्गल में प्रमेयत्व शक्ति होने
से वह किसी ना किसी ज्ञान में झलका । सर्वज्ञ के ज्ञान में तो यह पहले
से ही ज्ञात था, उसी समय उनके ज्ञान में यह भी ज्ञात हुआ था कि किस
काल में, किस व्यक्ति के ज्ञान में ये बातें जानी जायेगी अर्थात् कब कौनसा
आविष्कार होगा ।

प्रमेयत्व शक्ति जाननेपर कोई भी बात ‘चमत्कार’ नहीं लगती । जिन
बातों से हम परिचित नहीं है वे बातें हमें ‘चमत्कार’ या ‘आश्चर्य’ प्रतीत होती
हैं । परंतु वस्तुस्वरूप की दृष्टि से देखनेपर उसमें विस्मयकारक कुछ भी
नहीं होता ।

तत्त्वज्ञान मात्र तत्त्वज्ञान करने के लिए ही लाभदायक है ऐसा नहीं परंतु
हमारे दैनंदिन लौकिक जीवन में भी बहुत कार्यकारी है, उपयुक्त है । किसी
प्रिय व्यक्ति का मरण होनेपर शोक से आदमी पागलसा हो जाता है । परंतु
उस समय अगर वहाँ कोई तत्त्वज्ञान का जानकार होगा तो वह सोचेगा कि,
‘यह जीव जो इस शरीर के संयोग में था अब इस शरीर से वियोग होकर
यहाँ से निकल गया है, उसमें अस्तित्व गुण होने के कारण उसका नाश नहीं
हुआ है, उसका अस्तित्व कहीं ना कहीं तो है ही, उसमें प्रमेयत्व गुण होने
के कारण वह किसी ना किसी ज्ञान में आ रहा है कि अब वह कहाँ है, किस
अवस्था में है ।’

जैसे अपना बेटा खो गया है ऐसा समझनेपर किसी माँ को कितना
दुःख होगा, परंतु अगर उसे पता है कि मेरा लड़का अमेरिका में है और बड़े
सुखचैन में है तो उसे इतनी आकुलता नहीं होगी ।

पुद्गल रूपी द्रव्य है, इंद्रियों द्वारा उसका ज्ञान होता है इसलिए हम
केवल उसका ही विश्वास करते हैं । जीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल
ये अमूर्तिक - अरूपी द्रव्य हैं और इंद्रियों से नहीं जाने जा सकते इसलिए उन
द्रव्यों का अस्तित्व मानने से कुछ लोग इन्कार करते हैं । परंतु उन द्रव्यों में
प्रमेयत्व गुण होने के कारण सर्वज्ञ के ज्ञान में तो ये सब द्रव्य आते ही
हैं । इनमें से जीवद्रव्य में ऐसी विशेषता है कि उसमें प्रमेयत्व गुण भी है और
ज्ञान गुण भी है । आत्मा अपने स्वयं के ज्ञान गुण द्वारा स्वयं को जान सकता
है और अपने प्रमेयत्व गुण के कारण स्वयं के ज्ञान में जाना जा सकता
है । अपने शुद्ध स्वरूप का, अतींद्रिय आनंद का अनुभव अर्थात् वेदन अवश्य
अपने स्वयं के ज्ञान में आता है । सम्यग्दर्शन होनेपर अपने को नहीं समझता,
मात्र केवलज्ञानियों के ज्ञान में ही आता है ऐसा मानना न्यायसंगत नहीं है,
शास्त्रसंमत तो बिल्कुल नहीं है ।

ज्ञान गुण के कारण आत्मा को ‘ज्ञायक’ कहते हैं और प्रमेयत्व गुण
के कारण ‘ज्ञेय’ अथवा ‘प्रमेय’ कहते हैं । जीव ज्ञायक है और अन्य सब
द्रव्य ज्ञेय हैं । तात्पर्य यह हुआ कि इस विश्व के सब द्रव्यों के साथ जीव
का ‘ज्ञेयज्ञायक’ संबंध है । जीव स्वतंत्रपने से ज्ञायक है और अन्य द्रव्य
स्वतंत्रपने से प्रमेय - ज्ञेय हैं । परंतु अन्य द्रव्यों को ज्ञेय न मानकर यह जीव
उनमें एकत्व, ममत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व मानकर दुःखी होता है ।

आत्मख्याति ग्रंथ में बहुत सुंदर दृष्टांत दिया हुआ है । चंद्र की चांदनी
भूमिपर पड़कर भूमि को प्रकाशित करती है । इसलिए वह भूमि चंद्र की तो
नहीं हो जाती । चंद्र की तो मात्र चांदनी ही होती है, भूमि तो भूमि की ही
रहती हैं । तद्वत् जीवद्रव्य ज्ञान से अन्य द्रव्यों को जानता है अर्थात् प्रकाशित
करता है इसलिए अन्य द्रव्य जीव के नहीं हो जाते । जीव का मात्र ज्ञान है,
अन्य द्रव्य अन्य द्रव्य के हैं, प्रमेयत्व गुण के कारण ज्ञान में आते हैं, जाने
जाते हैं परंतु ज्ञान में प्रवेश नहीं करते । ज्ञान भी सब को जानता है इसलिए
ज्ञान को सर्वगत कहते हैं परंतु वह भी अन्य द्रव्य में प्रवेश नहीं करता ।

प्रमेयत्व गुण जानने से मुख्यतः क्या लाभ हुआ, फिरसे देखेंगे ।

(१) प्रत्येक द्रव्य अपने प्रमेयत्व गुण के कारण से ज्ञान में ज्ञात होता
है, झलकता है ।
(२) विश्व में रहनेवाले सभी अनंत द्रव्य जाने जाते हैं, कोई भी द्रव्य
अज्ञात (Unknown) रह नहीं सकता ।
(३) सभी अनंतानंत द्रव्य ज्ञान की एक समय की पर्याय में झलकतें
हैं उस ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं । इससे सर्वज्ञ की सिद्धि होती है ।
(४) प्रत्येक द्रव्य की अनादिअनंत काल की सभी पर्यायें युगपत् केवलज्ञान
में झलकती हैं, इसकारण प्रत्येक पर्याय क्रमबद्ध है यह बात ख्याल में आती
है अर्थात् क्रमबद्धपर्याय की सिद्धि होती है ।
(५) हमारे प्रत्येक कार्य को और परिणाम को सर्वज्ञ अर्थात् अरिहंत
सिद्ध जानते हैं यह समझते ही पाप प्रवृत्ति कम होने लगती है ।
(६) अरूपी द्रव्य जाने जा सकते हैं यह बात सिद्ध होती है ।
(७) प्रत्येक जीव अपने आप को जान सकता है । अपने को आत्मानुभव
अर्थात् सम्यग्दर्शन हुआ है इस बात का जीव को पता चलता है यह बात
सिद्ध होती है ।
(८) परद्रव्यों के साथ मेरा केवल ज्ञेय-ज्ञायक संबंध है, स्वामित्व -
कतृत्व -भोक्तृत्व संबंध नहीं है इस बात का भान होता है ।
देखो तो सही, प्रत्येक सामान्य गुण द्रव्य की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीट
रहा है । जितनी अधिक चर्चा करेंगे उतना अधिक मर्म समझ में आता है ।
प्रमेयत्व गुण संबंधी पद्य लिखकर आज की चर्चा पूरी करती हूँ ।
सब द्रव्य-गुण प्रमेय से बनते विषय हैं ज्ञान के,
रुकता न सम्यग्ज्ञान पर से जानियो यों ध्यान से ।
आत्मा अरूपी ज्ञेय निज यह ज्ञान उसको जानता,
है स्व-पर सत्ता विश्व में सुदृष्टि उसको जानता ।।
विशेष चर्चा आगामी पत्र में करेंगे ।
तुम्हारी माँ

पत्रांक १४ — अगुरुलघुत्व गुण | Patrānk 14 — Aguru-laghutva Guṇ

७ फरवरी १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
तुम पत्रों की बहुत आतुरता से राह देखती हो यह अच्छी बात है ।
इससे वस्तुस्वरूप और आत्मस्वरूप जानने की तुम्हारी तीव्र इच्छा, रुचि,
उत्सुकता दिखायी देती है । शास्त्र में कहा ही है –
तत्प्रति प्रीतिचित्तेन येन वार्तापि हि श्रुता ।
निश्चितं स भवेत् भव्यो भाविनिर्वाण भाजनम् ।।
अर्थात् आत्मासंबंधी चर्चा जो प्रीति से, उत्सुकता से सुनता है वह निश्चित
ही भव्य है और भविष्य में निर्वाण का पात्र है ।
छहों द्रव्यों में पाये जानेवाले सामान्य गुणों की चर्चा हम कर रहे हैं ।
हमने अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व इन गुणों का स्वरूप, उनका कार्य
देखा । उस कारण वस्तुस्वरूप की अर्थात् द्रव्यसंबंधी जानकारी हम समझ
रहे हैं । प्रत्येक वस्तु में अनंत गुण एकसाथ विद्यमान हैं, हर समय हैं, सदा
ही रहते हैं । वस्तु की सत्ता एक ही है । वस्तु एक ही है और वह वस्तु
कैसी है यह बतानेवाले जो गुण हैं वे अनंत हैं । अनंत का कथन करना या
सुनना मर्यादा के बाहर है इसलिए द्रव्य का स्वरूप समझने के लिए आवश्यक
ऐसे छह सामान्य गुणों की चर्चा शास्त्रों में की है ।
आज का अपना विषय है ‘अगुरुलघुत्व’ गुण । यह गुण अलौकिक है,
जैन सिद्धांतों का प्राण है, वस्तुस्वरूप समझने के लिए बड़ा मंत्र है । सच
देखा जाये तो कोई भी गुण बड़ा या छोटा नहीं है, श्रेष्ठ अथवा कनिष्ठ नहीं
है; परंतु इसे जानने से वस्तुव्यवस्था अच्छी तरह से हमारे ज्ञान में आती है
इसलिए इस गुण को महान कहा है । उसकी परिभाषा है, ‘जिस शक्ति के
कारण से द्रव्य में द्रव्यपना कायम रहता है, अर्थात् (१) एक द्रव्य दूसरे
द्रव्यरूप नहीं होता, (२) एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं होता और (३) द्रव्य
में रहनेवाले अनंत गुण बिखरकर अलग-अलग नहीं होते, उस शक्ति को
अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं ।’

अनादिकाल से अनंत द्रव्य अस्तित्व में हैं । उनमें से हर एक द्रव्य का
स्वरूप जैसा का तैसा कायम टिकता है, एक द्रव्य पलटकर दूसरे द्रव्यरूप
नहीं हो सकता । अनंत गुणों के समूह को द्रव्य ऐसी संज्ञा है । इन अनंत
गुणों में से एक भी गुण अलग नहीं हो सकता ऐसी शक्ति प्रत्येक द्रव्य में
विद्यमान है । एक भी गुण यदि निकलकर दूसरे द्रव्य में मिल जाये या नष्ट
हो जाये तो गुणों के समूह का भंग होगा अर्थात् द्रव्य के नाश का प्रसंग
आयेगा । एक द्रव्य के नाश के साथ विश्व के नाश का प्रसंग आयेगा । परंतु
ऐसा हो ही नहीं सकता । प्रत्येक द्रव्य में परद्रव्यरूप न होने की शक्ति है,
अनंत गुणों का समूह जैसा है वैसा कायम रहने की शक्ति है, इस शक्ति को
ही अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं ।

अगुरुलघु = अगुरु + अलघु । अ याने नहीं, गुरु याने बड़ा, लघु
याने छोटा । ‘यह शक्ति द्रव्य को बड़ा या छोटा नहीं होने देती, कायम
है वैसा रखती है यह तो समझ गये । परंतु किस के आधार से हम ऐसा
माने ?’ ऐसा तुम पूछोगी । अब तक के पत्रों में जो सिद्धांत हम पढ़
चुके हैं उनके द्वारा ही हम इसे सिद्ध करेंगे । उसके पूर्व पत्र नं ७ - ‘गुणों
का स्वरूप’ यह लेख पुनः दुबारा पढ़ो । उसमें प्रत्येक द्रव्य में स्वचतुष्टय
अर्थात् स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव होता है उसके बारे में चर्चा
की हुयी है ।

प्रत्येक द्रव्य का अपना स्वयं का द्रव्य उसका स्वद्रव्य है, उस द्रव्य का
विस्तार उसका स्वक्षेत्र है, उस द्रव्य का परिणमन उसका स्वकाल है और
उसके अनंत गुण उसका स्वभाव है । भाव अर्थात् गुण । इसे हम दृष्टांत से
समझेंगे । दो द्रव्य हैं A और B, A याने कांच का ग्लास और B याने पानी
ऐसा समझो । A द्रव्य में उसका अपना स्वचतुष्टय है वैसे B द्रव्य में भी
उसका अपना स्वचतुष्टय है । परंतु A द्रव्य की दृष्टि से देखा जाये तो B
द्रव्य का चतुष्टय परचतुष्टय है अर्थात् परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभाव
हैं । एक द्रव्य के स्वचतुष्टय का परचतुष्टय में प्रवेश हो ही नहीं सकता ।
उनका एक दूसरे में ‘अभाव’ है, नास्ति है । इसलिए A द्रव्य B द्रव्यरूप
हो नहीं सकता और एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कार्य भी नहीं कर सकता ।

A B
कांच का स्वद्रव्य कांच में पानी का स्वद्रव्य पानी में
कांच का स्वक्षेत्र कांच में पानी का स्वक्षेत्र पानी में
कांच का स्वकाल कांच में पानी का स्वकाल पानी में
कांच का स्वभाव कांच में पानी का स्वभाव पानी में

प्रत्येक द्रव्य का स्वचतुष्टय अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव भिन्न-
भिन्न होने के कारण ‘एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप नहीं होता ।’ यह अपनी
परिभाषा का पहला भाग सिद्ध हो गया । अब दूसरा भाग ‘एक गुण दूसरे
गुणरूप नहीं होता’ इसे सिद्ध करेंगे । अब सवाल दो द्रव्यों का नहीं, एक
ही द्रव्यों के दो गुणों का है । गुण याने भाव । एक द्रव्य के दो गुणों का
द्रव्य एक, क्षेत्र एक, काल एक परंतु भाव भिन्न-भिन्न होने के कारण एक
गुण दूसरे गुणरूप नहीं होता । पुद्गलद्रव्य के वर्ण और रस इन दोनों
गुणों की चर्चा कैरी के दृष्टांत से समझेंगे । कैरी में वर्ण (हरा) और रस
(खट्टा) इन दो गुणों के बारे में देखेंगे ।

जो द्रव्य कैरी का है वही द्रव्य वर्ण गुण का है और वही द्रव्य रस
गुण का है । जो क्षेत्र कैरी का है वही क्षेत्र वर्ण गुण का है और वही क्षेत्र
रस गुण का है । जो परिणमन काल कैरी का है, वही काल वर्ण गुण
का है और वही काल रस गुण का है । परंतु ‘भाव’ अर्थात् गुण - वर्ण और
रस गुण भिन्न-भिन्न अर्थात् अलग-अलग अर्थात् स्वतंत्र हैं । इस वजह
से एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं हो सकता । एक गुण दूसरे गुण का कार्य
नहीं करता ।

जीव का श्रद्धा गुण ज्ञान या चारित्र गुणरूप नहीं हो सकता । श्रद्धा
सम्यक् होनेपर भी चारित्र में क्रम पड़ता है । वह किसतरह होता है, देखते
हैं । सम्यग्दर्शन होते ही श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र आदि सभी गुणों में सम्यक्पना
आता है । अर्थात् विपरीतपना नष्ट होता है । आत्मा की अनुभूतिरूप - ‘यह
मैं’ ऐसी श्रद्धा, आत्मा का ज्ञान और आत्मा में स्थिरता होती है । ऐसा
होनेपर भी यह स्थिरता बहुत अल्प काल तक रहती है याने चारित्र की पूर्णता
नहीं होती । अधिक-अधिक आत्मस्थिरता होनेपर एक समय ऐसा आता है
कि जीव का उपयोग याने Attention - ध्यान चिरकाल के लिए आत्मा में ही
लीन हो जाता है, जिसे यथाख्यात चारित्र कहते हैं और पूर्ण वीतरागता की
प्राप्ति हो जाती है । ऐसा हो जाने के पश्चात् ज्ञान जो अब तक अल्प
विकसित था वह भी पूर्ण विकसित होता है अर्थात् अनंत ज्ञान याने केवलज्ञान
प्रकट होता है ।
हमारी परिभाषा का तीसरा भाग है, ‘द्रव्य में रहनेवाले अनंत गुण
बिखरकर अलग-अलग नहीं होते’ इसे अब तुम जल्दी से समझ सकोगी ।
विशिष्ट द्रव्य का और इसके अनंत गुणों का स्वद्रव्य और स्वक्षेत्र एक ही
है । अर्थात् जो स्वद्रव्य उस द्रव्य का है वही स्वद्रव्य उसके अनंत गुणों का
है, जो स्वक्षेत्र उस द्रव्य का है वही स्वक्षेत्र उसके अनंत गुणों का है । अनंत
गुणों में से प्रत्येक गुण का द्रव्य भी वही है और क्षेत्र भी वही है । इसलिए
ये सब अनंत गुण अपना स्वद्रव्य और स्वक्षेत्र छोड़कर बाहर नहीं जा
सकते । दूसरे द्रव्य में याने परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल, परभाव में प्रवेश नहीं
कर सकते । जैसे, गुरु का ज्ञान गुण शिष्य के ज्ञान (परद्रव्य) में प्रवेश नहीं
कर सकता ।
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ भी नहीं कर सकता - कारण अगुरुलघुत्व
गुण । विश्व में जितने द्रव्य हैं उतने कायम रहते हैं, कम या ज्यादा नहीं होते

  • कारण अगुरुलघुत्व गुण । निमित्त कार्य में फेरबदल, हेरफेर नहीं कर
    सकता - कारण अगुरुलघुत्व गुण । सम्यग्दर्शन हुआ, अब मुनि क्यों नहीं
    होता ? चारित्र क्यों नहीं है ? - कारण अगुरुलघुत्व गुण ।
    विश्व के अनंत द्रव्यों में प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है । प्रत्येक द्रव्य के अनंत
    गुणों में प्रत्येक गुण स्वतंत्र है और हर एक गुण की अनंत पर्यायों में प्रत्येक
    पर्याय स्वतंत्र है । हमें स्वतंत्र होने की चेष्टा करने की जरूरत ही नहीं है,
    हम स्वतंत्र ही है ऐसा जानना है । हम मान्यता में परतंत्रता की भ्रांत कल्पना
    करके दुःखी होते रहते हैं इसलिए हमें मात्र मान्यता ठीक याने सही करनी
    है । वस्तुव्यवस्था जैसी है वैसी मान्यता रखने से हम सुखी हो सकते हैं परंतु
    अपनी विपरीत मान्यतानुसार वस्तु याने द्रव्य रहे ऐसी वृथा चेष्टा करने से हमें
    दुःख ही भोगना पड़ेगा ।
    अनेक लोग आरोप लगाते हैं कि ऐसी स्वतंत्रता की शिक्षा देने से लोग
    स्वच्छंदी बनेंगे । परंतु उनका यह भय निराधार है । परचतुष्टय में मेरा प्रवेश
    ही नहीं होता और पर में मैं कुछ कर ही नहीं सकता ऐसा जानने से दृष्टि
    स्वचतुष्टयपर केंद्रित होगी, श्रद्धा ‘स्व’ को पकड़ेगी, ज्ञान ‘स्व’ को जानेगा
    और चारित्र ‘स्व’ में लीनता करेगा और यही तो हमारा उद्देश्य है ।
    इस विश्व में अनंत जीवद्रव्य, अनंतानंत पुद्गलद्रव्य, धर्म, अधर्म, आकाश
    और काल ये सब द्रव्य अनादिकाल से एकक्षेत्रावगाह संबंध से रहते आये
    हैं । फिर भी प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वरूप से कायम है । एक जीवद्रव्य
    दूसरे जीवद्रव्यरूप नहीं हुआ है अथवा जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्यरूप नहीं हुआ ।
    जीव के गुण पुद्गल में नहीं गये और पुद्गल के गुण जीव में आकर नहीं
    मिल गये । ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख, वीर्य आदि मेरे याने जीवद्रव्य के गुण
    हैं और स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि शरीर के याने पुद्गल के गुण हैं । गत
    पचास सालों से मेरा इस शरीर से संबंध है । एक ही जगह में दोनों का
    अस्तित्व है फिर भी इस शरीर में जानने की पात्रता याने शक्ति निर्माण नहीं
    हुयी और मुझमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि प्रवेश नहीं कर सके । मनुष्य
    की जीवित अवस्था में भी ज्ञान करनेवाला तो जीव ही है, शरीर तो जड़,
    अचेतन, कलेवर है । मनुष्य के मरनेपर वह शरीर ज्ञानहीन है यह हम
    प्रत्यक्ष देखते हैं, अनुभवते हैं, परंतु जीवित अवस्था में शरीर में ज्ञान नहीं
    है यह बात बतानेपर भी अनेकों के गले नहीं उतरती । शरीर में आत्मबुद्धि
    यही इसका कारण है ।
    अगुरुलघुत्व गुण के कारण द्रव्य का ‘द्रव्यपना’ कायम रहता है यह
    हमने देखा, एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप नहीं होता इसे भी हमने समझा ।
    उसीतरह यह बात भी जाननी जरूरी है कि द्रव्य गुणरूप भी नहीं होता और
    पर्यायरूप भी नहीं होता । द्रव्य और गुण का स्वरूप देखते समय हमने
    सीखा था कि द्रव्य एक है, अभेद है, अखंड है, नित्य है तथा गुण अनंत हैं,
    भेदरूप हैं । द्रव्य का स्वरूप समझने के लिए गुणों के द्वारा भेद करके
    समझाया था परंतु द्रव्य खंडित नहीं होता, द्रव्य सदा अभेद अखंड एक सत्ता
    मात्र ही रहता है ।
    जैसे, भारत एक देश है और उसमें महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान,
    मध्यप्रदेश, बंगाल, पंजाब आदि विभिन्न प्रांत हैं । भारत का स्वरूप - विस्तार
    समझाने के लिए भेद करके समझाया जाता है परंतु जब ‘भारत’ एक देश
    ऐसा विचार करते हैं तब विभिन्न प्रांतों के भेद नष्ट हो जाते हैं अर्थात् नजर
    में नहीं आते - दृष्टि में नहीं आते- गौण हो जाते हैं । भेद होनेपर भी ‘भारत’
    कहते ही उन भेदोंपर से अपनी दृष्टि हट जाती है और एक अखंड भारत
    दृष्टिगोचर होता है । आत्मानुभव के लिए भी ऐसी ही विधि है । द्रव्य का
  • आत्मा का स्वरूप समझाने के लिए गुणों का और पर्यायों का स्वरूप
    विस्तार से बताया जाता है । परंतु जब ‘अभेद, अखंड, नित्य, एक ऐसा मैं
    ज्ञायक ध्रुवद्रव्य’ दृष्टि में अर्थात् श्रद्धा में लिया जाता है तब गुणों और पर्यायों
    का भेद गौण हो जाता है, नष्ट हो जाता है, दृष्टि में नहीं आता । गुणों और
    पर्यायों के इस भेदरूप कथन को शास्त्र में व्यवहार ऐसी संज्ञा है और अभेद
    आत्मा का ध्यान करते समय यह भेद गौण हो जाता है, नष्ट हो जाता है,
    दृष्टि में नहीं आता इसलिए व्यवहार को ‘अभूतार्थ’ याने ‘नहीं है’ ऐसा कहते
    हैं । ‘समस्त व्यवहार अभूतार्थ है’ इस उक्ति का ऐसा अर्थ अभिप्रेत है ।
    द्रव्य गुणरूप नहीं होता उसीतरह द्रव्य पर्यायरूप भी नहीं होता ।
    अन्यथा पर्याय जो समयमात्र रहकर नष्ट होती है वैसा प्रसंग द्रव्य के बारे
    में भी आ जाता । द्रव्य तो अनादिअनंत, ध्रुव, अखंड, नित्य है और पर्याय
    प्रत्येक समय में नयी-नयी, उत्पाद व्यय होनेवाली, अनित्य है । ‘द्रव्य का
    द्रव्यपना कायम टिकता है’ इस कथन का अर्थ अब तुम्हारी समझ में आया
    ही होगा । तुम पूछोगी कि, ‘द्रव्य में कुछ बढ़ता नहीं और कम भी नहीं
    होता, गुण भी कम ज्यादा नहीं होते, तो फिर गुणों का विकास करो तथा
    दूसरों के गुण ग्रहण करो ऐसा क्यों कहने में आता है ?’ अरी, यह तो
    उपचार कथन है । द्रव्य में तथा गुणों में हीनाधिकता या वधघट होती ही नहीं
    परंतु पर्याय में कम ज्यादा शक्ति प्रगट होती है । जैसे, सूक्ष्म जीवों के ज्ञान
    की अत्यंत हीन पर्याय है और अरिहंत सिद्धों के अनंतज्ञान याने केवलज्ञान यह
    सर्वोत्कृष्ट पर्याय प्रगट है तथापि ज्ञान गुण की अपेक्षा से देखनेपर सभी जीवों
    का ज्ञान गुण समान शक्तिवाला है । गुणों का विकास करो ऐसा जब बताया
    जाता है तब गुणों में जो शक्ति विद्यमान है उसे पर्याय में प्रगट करो - व्यक्त
    करो ऐसा अर्थ समझना चाहिए । गुणों का ग्रहण करो ऐसा जब बताया जाता
    है तब सामनेवाले जीव ने जो पर्याय प्रगट की है वैसी शक्ति तुम्हारे में भी
    है और वह तुम्हें प्रकट करनी चाहिए ऐसा कहने का अभिप्राय है ।
    गुरु के ज्ञान गुण को तो शिष्य ग्रहण नहीं कर सकता । परंतु शिष्य
    के ज्ञान गुण की विकसित पर्याय प्रगट होनेपर शिष्य ने गुरु से ज्ञान ग्रहण
    किया ऐसा उपचार से कहने में आता है ।
    अगुरुलघुत्व गुण जानने से जो लाभ प्राप्त हुआ वह मुख्यरूप से
    इसप्रकार है
    (१) वस्तुस्वरूप का एवं वास्तुस्वातंत्र्य का ज्ञान होता है । (२) एक
    द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ भी नहीं कर सकता इस जैन सिद्धांत की सिद्धि
    इस गुण के द्वारा भी होती है । (३) एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप नहीं होता
    इसकारण अनंत द्रव्यों की सत्ता एवं संख्या कायम रहती है । (४) विश्व में
    छह द्रव्य एक क्षेत्र में रहनेपर भी प्रत्येक द्रव्य के अपने गुणधर्म कायम रहते
    हैं । (५) जीव और शरीर के इकट्ठे रहनेपर भी जीव स्वतंत्र है और पुद्गल
    स्वतंत्र है । उनमें से द्रव्य, गुण अथवा पर्याय तक एकदूसरे में प्रवेश नहीं
    कर सकती एवं एक दूसरे का कार्य वे नहीं कर सकते । मैं शरीर हूँ या
    शरीर का कर्ता-धर्ता हूँ इस खोटी बुद्धि का नाश होता है । (६) एक गुण
    दूसरे गुणरूप नहीं होता इस बात को समझने से श्रद्धा गुण पहले पूर्ण शुद्ध
    होता है और चारित्र गुण की शुद्धता में क्रमिक विकास होता है यह बात ख्याल
    में आती है । (७) ‘अनंत गुण बिखरकर अलग-अलग नहीं होते’ इसका
    तात्पर्य यह है कि जहाँ द्रव्य के एक गुण की सिद्धि कर सकते हैं वहींपर
    उस द्रव्य के अन्य अनंत गुण हैं यह बात सिद्ध होती है । जीव का ज्ञान गुण
    हमारे ध्यान में आता है वहींपर जीव के अनंत गुण हैं यह सिद्ध होता है ।
    अगुरुलघुत्व गुण का वर्णन करनेवाला यह पद्य देखो
    यह गुण अगुरुलघु भी सदा रखता महत्ता है महा,
    गुण द्रव्य को पररूप यह होने न देता है अहा !
    निज गुण पर्याय सर्व ही रहते सतत निज भाव में,
    कर्ता न हर्ता अन्य कोई यों लखो स्व-स्वभाव में ।।
    अब प्रदेशत्व गुण की चर्चा अगले पत्र में करेंगे ।
    तुम्हारी माँ

पत्रांक १५ — प्रदेशत्व गुण | Patrānk 15 — Pradeśatva Guṇ

८ मार्च १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
पत्र वाचन के कारण तुम्हारी इस विषय में रुचि बढ़ रही है यह अच्छी
बात है । सच पूछो तो स्वयं वाचन करने की अपेक्षा प्रवचन, चर्चा सुनने से
अधिक लाभ होता है । ऐसा अवसर भी तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होनेवाला है ।
हो सके तो इस अवसर का अवश्य लाभ उठाना । पूना में २० अप्रैल से ३०
अप्रैल तक हम दोनों (मैं और तुम्हारे पिताजी) प्रवचन करनेवाले हैं । उस
समय रोज सात घण्टे स्वाध्याय होगा । उसीतरह इस वर्ष देवलाली (नासिक)
में १४ मई से ३१ मई तक शिक्षण प्रशिक्षण शिबिर संपन्न होगा । उसमें
८-१० घण्टे विभिन्न विषयों पर प्रवचन, क्लास, प्रॅक्टिकल्स आदि लाभ होता है
यह बात तुम्हें अनुभव से ज्ञात ही है ।,
सामान्य गुणों की चर्चा से विश्व में जो छह द्रव्य हैं उनके स्वरूप का
हमें थोड़ा बहुत ज्ञान हो गया । आज का हमारा विषय है ‘प्रदेशत्व गुण’ ।
इस गुण की परिभाषा इसप्रकार है, ‘जिस शक्ति के कारण से द्रव्य का कोई
ना कोई आकार अवश्य रहता है उस शक्ति को प्रदेशत्व गुण कहते हैं ।’
विश्व में छह द्रव्य हैं, उनमें केवल पुद्गलद्रव्य ही रूपी है अर्थात्
मूर्तिक है और अन्य पाँच द्रव्य अरूपी हैं । मूर्त द्रव्य का आकार तो हमें
दिखायी देता है परंतु अरूपी द्रव्य के आकार के बारे में संदेह होता है । द्रव्य
का आकार याने उस द्रव्य का विस्तार याने क्षेत्र अर्थात् लम्बाई, चौड़ाई और
मोटाई आदि । रूपी द्रव्य का आकार रूपी होता है और अरूपी द्रव्य का
आकार अरूपी होता है । प्रत्येक द्रव्य का आकार उसके अपने प्रदेशत्व गुण
के कारण होता है, अन्य द्रव्य के कारण से नहीं होता । कोई भी द्रव्य या
कोई भी जीव परद्रव्य के आकार का कर्ता हो नहीं सकता ।
असंख्य प्रकार के पेड़-पौधे, विविध आकार के फूल पत्ते, विभिन्न आकारों
के पशु-पक्षी हम देखते हैं । इनका आकार किसने बनाया होगा ? कमल
के फूल का आकार किसने बनाया ? उसमें ही उस आकाररूप होने की
शक्ति है । जिसे प्रदेशत्व गुण के बारे में पता नहीं है वह मानता है कि कोई
ईश्वर इस सृष्टि का निर्माता है और वह ईश्वर इन सब चीज़ों को आकार
देता है । ईश्वर का एवं द्रव्य का स्वरूप ज्ञात न होने के कारण ऐसी भ्रांत
धारणायें होती हैं ।

अक्षर का सुंदर या टेढ़ा-मेढ़ा होना स्याही के प्रदेशत्व गुण से होता है
और हम मानते हैं मैंने सुंदर अक्षर लिखा । रंगोली से सुंदर फूल बनाया
वह मेरा कौशल्य है ऐसा हम मानते हैं, परंतु रंगोली के प्रदेशत्व गुण का यह
कार्य है । कोई शेठ कहता है मैंने मेरे धन से इतना बड़ा सुंदर महल
बनवाया है, परंतु ईंट, पत्थर की वह रचना पुद्गल के प्रदेशत्व गुण का कार्य
है । कोई काम बिगड़नेपर कारीगर का दोष बताता है और कारीगर कहता
है सिमेंट अच्छा नहीं था । लोटे में पानी रखनेपर पानी का जो आकार होता
है वह पानी के प्रदेशत्व गुण के कारण से है लोटे के कारण से नहीं है ।
लोटे के कारण अगर आकार हो जाता तो लोटे में पत्थर ड़ालकर देखो तो
सही कि वे उस आकार के बनते हैं या नहीं ? मैं रोटी गोल बनाती हूँ ऐसा
हमें अभिमान है, तो फिर आटे का आकार किस ने बनाया ? गेहूँ का
आकार किसने बनाया ? नैसर्गिक रीति से याने उन चीज़ों के प्रदेशत्व गुण
से उनके आकार बनते हैं । उसीतरह रोटी भी उसके प्रदेशत्व गुण से ही
गोल बनती है ।

कुम्हार ने घड़ा बनाया ऐसा हम कहते हैं, परंतु घड़े का आकार तो
मिट्टी के प्रदेशत्व गुण का कार्य है । सुनार कहता है, मैंने सोने का हार
बनाया है । परंतु हार का जो डिझाईन - आकार है वह सोने के प्रदेशत्व गुण
का कार्य है । कोई स्त्री अभिमान करती है कि मेरे बच्चे मेरे जैसे ही सुंदर
दिखते हैं और मेरे कारण ही वे इसतरह सुंदर बन गये । परंतु वास्तव में
उन शरीरों का आकार पुद्गल के प्रदेशत्व गुण का कार्य है ।

हाथी यह जीव है । उसके शरीर का आकार पुद्गल के प्रदेशत्व गुण
से होता है व उसमें जो जीव है उसका वैसा ही आकार जीव के प्रदेशत्व
गुण से होता है । वहाँ उस शरीर को जीव के उस आकार में निमित्त कहा
जाता है । सिद्ध भगवंतों के शरीर नहीं होता इसलिए शरीर के निमित्त से
होनेवाला आकार उन्हें नहीं है इसलिए सिद्धों को ‘निराकार’ कहने में आता
है फिर भी सिद्धों को आकार अवश्य है क्योंकि वे भी जीवद्रव्य हैं और उनमें
प्रदेशत्व गुण है ।
हम पहले ही देख चुके हैं कि प्रत्येक गुण अपने ही कारण अपना-
अपना प्रयोजनभूत कार्य करता है (वस्तुत्व गुण) और वह कार्य निरंतर चलता
रहता है (द्रव्यत्व गुण) । इसलिए प्रदेशत्व गुण का ‘द्रव्य का आकार’ यह
कार्य उसके अपने ही कारण निरंतर चलता है । आकार यह प्रदेशत्व गुण की
पर्याय प्रत्येक समय में उत्पाद-व्यय रूप से पलटती रहती है अर्थात् हर
समय नया-नया आकार होता रहता है । पर्याय याने यह आकार वैसा का
वैसा भी रह सकता है या अलग भी हो सकता है ।
मायके आनेपर तुम कहती हो, ‘कितने सालों से यह फर्निचर वैसा
का वैसा है, दिन ब दिन पुराना होता जा रहा है, तुम बोअर नहीं होती
हो ? पिताजी से कहकर बदलवा डालो सब !’ हमारी इच्छा नित्य नयी
उत्पन्न होकर आकुलता का कारण बनती है । यहाँ फर्निचर बदलने की
नहीं अपितु अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है । फर्निचर का आकार हर
समय नित्य नया ही बन रहा है उसके प्रदेशत्व गुण के कारण, अन्य गुणों
में भी अपना कार्य हर समय नया हो रहा है । सही दृष्टि से देखा जाये
तो हर समय नया आकार बन ही रहा है । हम परद्रव्य का और उसके गुणों
का कार्य याने परिणमन हमारी इच्छा के अनुसार पलटाना चाहते हैं परंतु
वस्तुव्यवस्था वैसी है नहीं इसलिए हम दुःखी होते हैं । हमारा कार्य तो
हमारे द्रव्य में हमारे गुणों में हो रहा है । जानना हमारा कार्य है, मानना
हमारा कार्य है इसलिए वस्तु का स्वरूप जैसा है वैसा जानो और मानो
तो सुख गुण की दुःखरूप पर्याय पलटकर सुखरूप पर्याय उत्पन्न होगी
अर्थात् हम सुखी होंगे ।
जीवद्रव्य का आकार छोटा-बड़ा होनेपर याने उसका संकोच विस्तार
होनेपर भी जीव के जो असंख्यात प्रदेश हैं वे कायम रहते हैं । जेसे, ढ़ेर
सारी कपास छोटे से तकिया में डाल सकते हैं या बड़ा स्पंज दबाकर हाथ
की मुट्ठी में पकड़ सकते हैं । उस समय वह कपास या स्पंज तो उतना ही
है परंतु कम क्षेत्र व्यापता है । तात्पर्य यह है कि जीव का आकार बदलनेपर
भी असंख्यातप्रदेशी क्षेत्र कायम रहता है । जीव का आकार छोटा या बड़ा
होनेपर याने संकोच या विस्तार होनेपर उसके सब असंख्यात प्रदेश तो कायम
रहते ही हैं, उसके अनंत गुण भी कायम रहते हैं । सूक्ष्म जीवाणू से लेकर
महाकाय प्राणियों तक अनेक आकारों में जीव पाये जाते हैं परंतु वे सब
असंख्यातप्रदेशी हैं और अनंत गुणों से युक्त हैं । अनंतप्रदेशी आकाश में
तथा एकप्रदेशी कालद्रव्य में तथा एकप्रदेशी पुद्गल परमाणु में भी प्रत्येक
में अनंत गुण हैं ।
आदिनाथ भगवान ५०० धनुष्य की उँचाई और महावीर भगवान ७ हाथ
की उँचाई सहित वर्तमान में सिद्ध अवस्था में विराजमान हैं । उनके आकार
में अंतर होनेपर भी अन्य अनंत गुणों की पर्यायों में कुछ अंतर नहीं है ।
दोनों ही अनंत चतुष्टय (अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, अनंत वीर्य) से
युक्त हैं । उनके सभी अनंत गुणों का सामर्थ्य पर्याय में पूर्ण प्रगट हो गया
है । इस कारण भगवान महावीर से अधिक सुख और ज्ञान भगवान आदिनाथ
में होगा ऐसा नहीं है । हमारे दैनंदिन जीवन में भी हम इस बात से परिचित
हैं कि बुद्धि किसी के लम्बाई या मोटाई पर निर्भर नहीं रहती । इसलिए
छोटा कदवाला व्यक्ति अपने आप को हीन मानता हो या लम्बा व्यक्ति अपने
आपको श्रेष्ठ मानता हो तो यह बात योग्य नहीं है । यहाँ और एक बात
बताना चाहती हूँ । सिद्धों के शरीर नहीं होता इसलिए उनका आकार पोला
(Hollow) होगा, शून्य समान अभावात्मक होगा ऐसी भी भ्रांति अनेक लोगों
में पायी जाती है । पहले के जमाने की सिद्धों की मूर्ति ऐसी भी देखने में
आती है कि धातु के अंदर मनुष्याकार बनाया हुआ है । परंतु सिद्धों का ठोस
याने घन आकार है । आत्मतत्त्व को विज्ञानघन कहा है । जीव में अनंत गुण
ठसोठस भरे हुये हैं ।
प्रदेशत्व गुण की हर समय नयी पर्याय होती है । प्रदेशत्व गुण के इस
विशेष कार्य (परिणमन) को ‘व्यंजनपर्याय’ कहते हैं । प्रत्येक द्रव्य में अनंत
गुण रहते हैं । इन सब गुणों का परिणमन याने पर्यायें होती रहती हैं । इनमें
से केवल प्रदेशत्व गुण का कार्य बताने के लिए उसे व्यंजनपर्याय कहा है और
अन्य अनंत गुणों के पर्यायों को ‘अर्थपर्याय’ कहते हैं । यह बहुत मजेदार
विषय है । कैसा, वह देखते हैं । व्यंजनपर्याय और अर्थपर्याय इन दोनों के
दो-दो भेद हैं - स्वभाव और विभाव ।
पर्याय
व्यंजनपर्याय
अर्थपर्याय
स्वभावव्यंजनपर्याय विभावव्यंजनपर्याय स्वभावअर्थपर्याय विभावअर्थपर्याय
स्वभावव्यंजनपर्याय – पर निमित्त के संबंध से रहित द्रव्य का जो
आकार होता है उसे स्वभावव्यंजनपर्याय कहते हैं । जैसे जीव का सिद्ध पर्याय
में आकार, पुद्गल परमाणु का आकार ।
विभावव्यंजनपर्याय – पर निमित्त के संबंध से द्रव्य का जो आकार
होता है उसे विभावव्यंजनपर्याय कहते हैं । जैसे जीव की नरनारकादि पर्याय,
पुद्गल के स्कंध का आकार ।
स्वभावअर्थपर्याय – पर निमित्त के संबंध से रहित जो अर्थपर्याय
(प्रदेशत्व गुण को छोड़कर अन्य अनंत गुणों की पर्यायें) होती हैं उसे
स्वभावअर्थपर्याय कहते हैं । जैसे जीव की केवलज्ञान पर्याय, पुद्गल परमाणु
की पर्यायें (आकार को छोड़कर) ।
विभावअर्थपर्याय – पर निमित्त के संबंध से जो अर्थपर्याय होती है उसे
विभावअर्थपर्याय कहते हैं । जैसे जीव के राग द्वेष आदि, पुद्गल स्कंध की
पर्यायें (आकार छोड़कर अन्य) ।
छहों द्रव्यों में से केवल जीव और पुद्गल ये दो द्रव्य ही स्वभाव या
विभाव पर्यायों से युक्त होते हैं । धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन चारों
द्रव्यों में स्वभावअर्थपर्याय और स्वभावव्यंजनपर्याय ऐसा दो प्रकार से ही
परिणमन होता है, उनमें विभाव परिणमन नहीं होता ।
जीव को संसार अवस्था में याने जब तक कर्म और शरीर का संबंध
है तब तक विभावव्यंजनपर्याय ही होती है और सिद्ध अवस्था में स्वभावव्यंजनपर्याय
शुरू होती है और अनंत काल तक स्वभावअर्थपर्याय चलती रहती है । तात्पर्य
यह है कि अन्यमती मानते हैं वेसा परमात्मा फिर से शरीररूप से ‘अवतार’
नहीं लेता । पुनश्च कर्म और शरीर का संबंध कभी भी नहीं होता । अरिहंत
भगवंतों के विभावव्यंजनपर्याय होती है, फिर भी अन्य गुणों का स्वभाव परिणमन
होने से स्वभावअर्थपर्याय भी होती हैं । अनंत सुख, अनंत ज्ञान आदि प्रगट
हुये हैं । प्रदेशत्व गुण के विभाव परिणमन के कारण अन्य गुणों के स्वभाव
परिणमन में बाधा नहीं आती । शायद इसलिए इस एक गुण के परिणमन
को अलग नाम दिया होगा ।

जीव का श्रद्धा गुण सम्यग्दर्शन के साथ शुद्ध होता है और उस समय
से स्वभावअर्थपर्याय शुरू होती है । परंतु सभी गुणों की पर्यायें अभी शुद्ध नहीं
हुयी है इसलिए उस जीव को स्वभाव और विभाव अर्थपर्यायें होती हैं ।

पुद्गल के बारे में ऐसा नहीं होता । परमाणु का आकार
स्वभावव्यंजनपर्याय है । जब परमाणु स्कंधरूप में बंधता है तब उसकी
विभावव्यंजनपर्याय होती है । स्कंध से छूटनेपर दुबारा परमाणु अवस्था में
आनेपर स्वभावव्यंजनपर्याय होती है । अर्थात् पुद्गलद्रव्य में स्वभावव्यंजनपर्याय
फिर से विभावव्यंजनपर्याय में पलट सकती है । परंतु जीव की स्वभावव्यंजनपर्याय
होनेपर दुबारा विभावव्यंजनपर्याय कभी भी नहीं होती ।

जीव और पुद्गल के इन अर्थ और व्यंजन पर्यायों में और एक मजे
की बात है । जीवद्रव्य में सिद्धों की स्वभावअर्थपर्यायें सब की एक जैसी होती
हैं और स्वभावव्यंजनपर्यायें सब की विभिन्न होती हैं । परंतु इससे विपरीत,
पुद्गल में स्वभावअर्थपर्यायें विभिन्न एवं स्वभावव्यंजनपर्यायें एक सी होती हैं ।
अर्थात् परमाणु का आकार एक जैसा रहता है, परंतु स्पर्श, रस, गंध, वर्ण,
आदि गुणों की कोई भी विभिन्न पर्यायें हो सकती हैं ।

प्रदेशत्व गुण जानने के कारण मुख्यतः निम्न लाभ ख्याल में आते हैं –

(१) प्रत्येक द्रव्य का कोई ना कोई आकार होता ही है, इसलिए जीव,
धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन अरूपी द्रव्यों का भी अपना-अपना आकार
है । (२) प्रत्येक द्रव्य का आकार उसके अपने प्रदेशत्व गुण से होता है, कोई
भी ईश्वर या परद्रव्य उस आकार का कर्ता हो ही नहीं सकता । (३) संसार
अवस्था में जीव का आकार प्राप्त शरीर के आकार के समान होनेपर भी वह
आकार शरीर के कारण नहीं परंतु जीव के प्रदेशत्व गुण के कारण होता
है । (४) पुद्गलद्रव्य का आकार मूर्तिक (रूपी) है, अन्य पांच द्रव्यों का
आकार (अरूपी) अमूर्तिक है । (५) शरीर का आकार शरीर के परमाणुओं
का आकार है, जीव उस आकार का कर्ता नहीं है । शरीर को सुडौल
(Shape में) रखने का कार्य जीव नहीं कर सकता । (६) द्रव्य के आकारपर
उसके गुणों की संख्या निर्भर नहीं रहती । अनंतप्रदेशी आकाशद्रव्य में जितने
अनंत गुण हैं उतने ही अनंत गुण एकप्रदेशी पुद्गल परमाणु में या कालाणु
में या अन्य द्रव्यों में होते हैं । (७) जीवद्रव्य के आकार में संकोच विस्तार
होनेपर भी उसके असंख्यात प्रदेश कायम रहते हैं, उनमें वध घट नहीं
होती । (८) जीवद्रव्य के आकारपर उसके अन्य गुणों का कार्य निर्भर नहीं
होता । इसलिए ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख आदि गुणों की पर्यायें जीवद्रव्य के
आकारपर निर्भर नहीं होती । (९) प्राप्त शरीर के आकार के कारण अपने
को हीन या श्रेष्ठ मानना गलत है ।

प्रदेशत्व गुण का वर्णन करनेवाला यह पद्य देखो –

प्रदेशत्व गुण की शक्ति से आकार द्रव्यों का रहे,
निजक्षेत्र में व्यापक रहे आकार भी स्वाधीन है ।
आकार है सबके अलग हो लीन अपने ज्ञान में,
जानो इन्हें सामान्य गुण रखिये सदा श्रद्धान में ।।

ज्ञान में लीन होने का उपदेश दिया है अर्थात् त्रिकाली, ध्रुव, ज्ञानमय
ऐसे आत्मद्रव्य का ध्यान करने का उपदेश दिया है । आकार एक पर्याय है
इसलिए वह एक समयवर्ती है, विनाशिक है और नयी-नयी उत्पन्न होनेवाली
है । ऐसी अस्थिर चीज़ का ध्यान नहीं हो सकता । इसकारण उन पर्यायों
से लक्ष्य (उपयोग) हटाकर सदा कायम रहनेवाले ज्ञान स्वभावपर उपयोग
केंद्रित करके एकाग्रता करने से स्वभावअर्थपर्याय शुरू होगी अर्थात् सम्यग्दर्शन,
आत्मानुभूति होगी ।

सामान्य गुणों की चर्चा आज समाप्त होती है । अगले पत्र से नया
विषय प्रारंभ होगा । फिर भी पहले सब पत्र पुनः पढ़ना जिस कारण द्रव्य
गुण पर्याय और सामान्य गुणों का स्वरूप ठीक याद होगा ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक १६ — पुद्गल के विशेष गुण और पर्यायें | Patrānk 16 — Pudgal ke Viśeṣ Guṇ aur Paryāyẽ

२ अप्रैल १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
गत अनेक पत्रों द्वारा हमने सब द्रव्यों में पाये जानेवाले सामान्य गुणों
में से मुख्य छह सामान्य गुणों का स्वरूप देखा । इस चर्चा के कारण द्रव्यों
का सामान्य स्वरूप तो हमारे ख्याल में आ गया, परंतु प्रत्येक द्रव्य की
भिन्नता, विशेषता जिस कारण से जानी जा सकती है उन विशेष गुणों के बारे
में जानना भी अत्यंत आवश्यक है । विशेष गुणों के द्वारा ही विशिष्ट द्रव्य
कौनसा है यह हम जान सकते हैं । जैसे जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि
विशेष गुण पाये जाते हैं वह पुद्गलद्रव्य है । इसलिए शरीर, हमें दिखायी
देनेवाली सभी चीजें, पांचों इंद्रियों से ज्ञात होनेवाली चीजें ये सब पुद्गल हैं इस
बात का पता चलता है । जिसमें ज्ञान करने की योग्यता है, जिसे सुख-दुःख
का अनुभव होता है वह जीवद्रव्य है यह बात ख्याल में आती है ।
अधिक सूक्ष्म विचार करनेपर एक बात ख्याल में आती है कि सच
देखा जाये तो द्रव्य या गुण ज्ञान में नहीं आते परंतु उनकी पर्यायें ज्ञान में आती
हैं, जानने में आती हैं । जैसे हम वर्ण गुण को नहीं अपितु वर्ण गुण की
सफेद, लाल, नीली आदि अवस्थाओं को अर्थात् पर्यायों को जानते हैं । अतः
केवल गुणों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, गुणों के साथ-साथ उनकी पर्यायों का
ज्ञान भी आवश्यक है । क्योंकि पर्याय ही ‘व्यक्त’ है, गुण तो ‘अव्यक्त’ है,
शक्तिरूप से विद्यमान है । जीवद्रव्य और उसके ज्ञान, सुख आदि गुण भी
‘अव्यक्त’ हैं परंतु जानना यह पर्याय (क्रिया), तथा सुख-दुःख का अनुभव-
संवेदन करना यह पर्याय व्यक्त है । इसलिए आज हम विशेष गुणों की पर्यायों
के बारे में चर्चा करेंगे । पुद्गलद्रव्य की पर्यायें हमें सदा इंद्रियों द्वारा जानने
में आती हैं, हम उनसे परिचित हैं इसलिए सर्वप्रथम पुद्गल के विशेष गुणों
की पर्यायों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे । प्रत्येक द्रव्य के विशेष गुणों की
चर्चा तो हमने ‘द्रव्य का स्वरूप’ इस छठवें क्रमांक के पत्र में देखी ही है
इसलिए अब मुख्यतः पुद्गल और जीव के विशेष गुणों की पर्यायों के संबंध
में हमें समझना है ।

पुद्गलद्रव्य में स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, क्रियावती शक्ति आदि विशेष गुण
हैं यह बात तो हम जानते ही हैं । उसमें स्पर्श गुण की आठ पर्यायें होती
हैं । वे इसप्रकार हैं – हलका-भारी, कड़ा-नरम, रूखा-चिकना, ठंड़ा-गरम
ऐसे चार जोड़े हैं । हलका-भारी में से एक समय में कोई एक ही पर्याय
होती है, उसीतरह प्रत्येक जोड़े में से एक पर्याय होती है इसलिए पुद्गल के
स्पर्श गुण की एक समय में एक साथ चार पर्यायें होती हैं । नियमसार,
पंचास्तिकाय आदि ग्रंथों में तो कथन आता है कि ये चार पर्यायें स्कंध की होती
हैं और सिर्फ परमाणु में स्पर्श गुण की एकसाथ दो ही पर्यायें होती हैं -
स्निग्ध या रूक्ष में से एक और ठंड़ा या गरम में से एक ।

स्पर्श गुण के संबंध में और एक मजे की बात याद आ गयी ।
पुद्गलद्रव्य में अनंत गुण होनेपर भी उनमें से केवल स्पर्श गुण की स्निग्ध
या रूक्ष पर्याय ही दो या अधिक परमाणुओं के बंध होने में कारणभूत होती
है । जीवद्रव्य में भी मोहनीय कर्म के उदय में जीव के जो मोह, राग, द्वेष
परिणाम होते हैं वे ही नवीन बंध को कारणभूत होते हैं ।

रस गुण की पांच पर्यायें हैं - खट्ठा, मीठा, कडवा, कषायला और
चरपरा । इन पांच पर्यायों में से एक समय में कोई भी एक ही पर्याय
होती है ।

गंध गुण की दो पर्यायें हैं - सुगंध और दुर्गंध । इन दो पर्यायों में से
कोई एक ही पर्याय एक समय में होती है ।

वर्ण गुण की पांच पर्यायें हैं – सफेद, लाल, काला, नीला और पीला ।
उनमें से एक समय में एक ही पर्याय होती है ।

शब्द यह स्कंध है । भाषावर्गणा शब्दरूप परिणमित होती है इसलिए
शब्द यह पर्याय है, गुण नहीं ।

क्रियावती शक्ति इस गुण की गतिरूप पर्याय अथवा स्थितिरूप पर्याय
होती है ।

उक्त संपूर्ण विवेचन से यह बात ध्यान में आती है कि स्पर्श, रस, गंध,
वर्ण की पर्यायें तथा शब्द यह पर्याय ये सब पुद्गल की पर्यायें हैं । पुद्गल
स्वयं अपनी पर्यायों को नहीं जानता, अपने विशिष्ट पर्याय के कारण पुद्गल
को कुछ सुख-दुःख भी नहीं होता इसलिए विशिष्ट पर्याय अच्छी है या बुरी
है ऐसा सवाल ही पैदा नहीं होता ।

इन सब पर्यायों को जाननेवाला जीव है । परंतु अज्ञानता के कारण इन
पर्यायरूप ही मैं स्वयं हूँ ऐसा वह मानता है । शरीर की पर्यायों को पुद्गल
की पर्यायें न मानकर अज्ञानी जीव उन्हें अपना स्वरूप मानता है । मैं गोरा,
मैं हलका, मैं भारी, मेरे हाथ नरम, मेरे बाल रूक्ष आदि हमने माना, तथा
उनमें से विशिष्ट पर्याय को अच्छी या बुरी मानकर, इष्ट या अनिष्ट मानकर
बिना प्रयोजन ही सुख-दुःख मानते आये हैं ।

स्पर्श, रस, गंध, वर्ण की पर्यायें तथा शब्द यह पर्याय पुद्गल द्रव्य
की हैं, इन पर्यायों का कर्ता पुद्गल है, जीव मात्र उन्हें जाननेवाला है । परंतु
इस जीव ने इन सब पर्यायों का कर्ता स्वयं को माना । जैसे, मैं स्वादिष्ट
भोजन बनाती हूँ, रोटी नरम बनाती हूँ, रंगीन चित्र बनाती हूँ, सुस्वर आवाज
में गाती हूँ ऐसा ही इस जीव ने माना है । जीव इंद्रियों द्वारा इन पर्यायों
को मात्र जानता है परंतु यह जानने के साथ उसमें सुख-दुःख मानकर यह
जीव इन पर्यायों को मैं भोग रहा हूँ ऐसा मानकर उनका भोक्ता बनना चाहता
है । गुलाबजाम खाते समय मीठा इस रस गुण की पर्याय का हम ज्ञान करते
हैं परंतु उसमें सुख की कल्पना करके यह जीव उसमें रममाण होता है ।
उसमें सचमुच सुख होता तो ७-८ गुलाबजाम खानेपर हम रुकते ही नहीं,
खाते ही रहते ।

शरीर की दुर्गंध पर्याय नहीं सुहाती तब उसपर सेंट का फव्वारा मारकर
कोई सुख मानता है, स्वयं सुगंधित हुआ ऐसा मानता है । सच पूछो तो
जीवद्रव्य में गंध गुण नहीं है इसलिए शरीर की दुर्गंध पर्याय भी जीव की नहीं
है तथा सेंट की सुगंध पर्याय भी जीव की नहीं है ।

जीव पांच इंद्रियों के माध्यम से इन पर्यायों का ज्ञान करता है ।
स्पर्शनेंद्रिय द्वारा पुद्गल के स्पर्श का, रसनेंद्रिय द्वारा रस का, घाणेंद्रिय द्वारा
गंध का, चक्षुइंद्रिय द्वारा वर्ण का और कर्णेद्रिय द्वारा शब्द का ज्ञान होता
है । ज्ञान करनेवाला जीव स्वयं है, इंद्रियाँ मात्र निमित्त हैं, माध्यम हैं । जैसे
खिड़की में से बाहर का दृश्य देखते समय देखने का काम तो हम करते हैं,
खिड़की नहीं । उसीतरह इंद्रियाँ स्वयं पुद्गल हैं, अचेतन हैं, उनमें ज्ञान गुण
नहीं है । ब्रेन (Brain) अथवा मज्जातंतू भी पुद्गल हैं उनमें ज्ञान गुण नहीं
है, उनके द्वारा ज्ञान करनेवाला जीव ही है और वही मैं हूँ ।
जीव स्पर्श का ज्ञान करता है परंतु जीव में स्पर्श गुण नहीं है इसलिए
जीव को अस्पर्शस्वभावी कहा है, अस्पर्शी कहा है । तद्वत् ही रस, गंध, वर्ण,
शब्द आदि का ज्ञान करनेवाला जीव है परंतु जीव में ये गुण या उनकी पर्यायें
नहीं हैं इसलिए जीव को अरस, अगंध, अवर्ण, अशब्द कहा जाता है ।
तुम कहोगी कि ‘जीव को ज्ञान करने के लिए इंद्रियों की जरूरत
तो पड़ती ही है ना ?’ बिल्कुल नहीं । अरिहंत, सिद्ध इंद्रियों द्वारा नहीं
जानते परंतु आत्मा से प्रत्यक्ष जानते हैं । विश्व के सभी द्रव्यों को, गुणों
को और उनकी तीनों काल की पर्यायों को वे युगपत् (एकसाथ) प्रत्यक्ष
जानते हैं । अवधि, मनःपर्यय ज्ञान में भी इंद्रियों की जरूरत नहीं पड़ती ।
इसीतरह आत्मा को अपने आप को जानते समय, आत्मानुभव करते समय
इंद्रियों द्वारा जानना बंद करके ही अंतर्मुख होकर प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा आत्मा
का ज्ञान होता है ।
शास्त्रों में पुद्गल का इतना सब वर्णन आता है वह केवल पुद्गल को
ठीक तरह से जानने के लिए नहीं है, परंतु ये सब गुण-पर्यायें पुद्गल की
हैं जीव की नहीं ऐसा समझने के लिए हैं । शरीर से भेदज्ञान करने हेतु
शरीर के लक्षण याने पर्यायों का विस्तृत कथन शास्त्र में आता है ।
ये सब पर्यायें ‘मैं’ नहीं ऐसा जानने-मानने से एकत्वबुद्धि का नाश
होता है । ये पर्यायें मेरी नहीं है ऐसा समझते ही ममत्वबुद्धि का अंत होता
है । इन पर्यायों का कर्ता पुद्गल है, मैं नहीं हूँ ऐसा निर्णय होते ही
कर्तृत्वबुद्धि नष्ट होती है । इन पर्यायों का मैं केवल जाननेवाला हूँ, भोगनेवाला
नहीं, ये पर्यायें मेरे सुख-दुःख के कारण नहीं, मैंने ही इनमें सुख-दुःख की
कल्पना की थी ऐसा ज्ञान होते ही भोक्तृत्वबुद्धि का अभाव होता है ।
देखो तो सही, पुद्गल की पर्यायों का ज्ञान होते ही कितनी सारी निश्चितता
एवं निराकुलता आती है । ये मेरी पर्यायें नहीं है ऐसा समझते ही उसी क्षण
हमारे मन में सवाल उठता है कि फिर मेरी पर्यायें कौनसी हैं ?

मान लो, तुम मुझे लेने के लिए रेल्वे स्थानकपर आ गयी हो । उस
वक्त तुम्हारी आँखों के सामने सेंकड़ों महिलायें दिखायी देती हैं । परंतु यह
मेरी माँ नहीं है इतना समझते ही तत्काल तुम्हारी दृष्टि उस स्त्रीपर से हटती
है और अन्यत्र तुम्हारी माँ को ढूँढने लगती है । जिससमय मैं याने तुम्हारी
माँ तुम्हारे नजर में आयेगी तब तुम्हारी दृष्टि अपनी माँपर ही केंद्रित
होगी । उसके पश्चात् यहाँ-वहाँ ढूँढने में या देखने में तुम्हें कोई रस नहीं
रहेगा । माँ तो अब तक दूर है फिर भी अब माँ दिखायी दी है इसका पक्का
विश्वास है, प्रतीति है । रास्ते में पहचानवाली अन्य महिलायें दिखायी देती हैं,
मिलती हैं परंतु अब चित्त माँ की तरफ लगा हुआ है । माँ के गले लगने
के लिए अब तीव्र उत्कंठा हो गयी है ।

उसीतरह ये सब पर्यायें पुद्गल की हैं यह बात समझ में आनेपर अब
दृष्टि इनपर जमती नहीं, टिकती नहीं । मेरी पर्यायें कौनसी हैं यह जानने
की उत्सुकता रहती है । जब जीव की पर्यायों का याने अपनी पर्यायों का
ज्ञान होगा तब इंद्रियों द्वारा पुद्गल की पर्यायें जानने में रस नहीं रहेगा ।
अपनी पर्यायें जानकर ये पर्यायें जिसमें से निकलती हैं वही त्रिकाली ‘मैं’
ऐसी लक्षणों द्वारा प्रतीति होते ही चित्त वहींपर स्थिर होगा - रममाण होगा ।
बारम्बार अंतर्मुख होकर अपने आपको देखते रहने में - अनुभवने में रस
बढ़ता जायेगा ।

उसके लिए सर्वप्रथम जीवद्रव्य के विशेष गुणों की पर्यायों का ज्ञान
करना आवश्यक है । अपना स्वरूप पहिचाने बिना इस जीव का अज्ञान एवं
चार गतियों में भ्रमण दूर नहीं होगा । सुख यह पर्याय जीव के सुख गुण की
है इसलिए सच्चा सुख अपने आपको जानने से ही प्रगट होगा ।

इसकी विस्तृत चर्चा हम आगामी पत्र द्वारा करेंगे । तब तक पुद्गल की
जो-जो पर्यायें हमारे ज्ञान में आयेगी वे मैं नहीं, मेरी नहीं, मैं उनका कर्ता
नहीं हूँ, मैं उनका भोक्ता नहीं हूँ ऐसा तुम बारम्बार अभ्यास करती रहना ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक १७ — जीव के विशेष गुण और पर्यायें | Patrānk 17 — Jīv ke Viśeṣ Guṇ aur Paryāyẽ

१० अप्रैल १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
अपना स्वयं का स्वरूप जानने की तुम्हारी उत्कंठता देखकर आठ दिन
के अंदर ही यह पत्र लिख रही हूँ । आत्मा का याने अपना स्वयं का स्वरूप

  • लक्षण जानने की तीव्र रुचि होना यह योग्य पात्रता का दर्शक है । ऐसे ही
    जीव जिनवाणी का उपदेश तत्काल ग्रहण करते हैं और समझते हैं । गत पत्र
    में हमने देखा था कि किसी भी विशिष्ट द्रव्य को जानना है तो उसके विशेष
    गुणों की पर्यायों द्वारा जाना जा सकता है - प्रगट लक्षणों से उस द्रव्य (लक्ष्यीभूत
    पदार्थ) को जाना जा सकता है ।
    प्रत्येक जीवद्रव्य में चेतना अर्थात् दर्शन और ज्ञान, श्रद्धा, चारित्र, सुख,
    वीर्य, क्रियावती शक्ति आदि विशेष गुण हैं । दर्शन गुण का कार्य है पदार्थों का
    सामान्य अवलोकन करना अर्थात् सामान्य प्रतिभास होना (Reception) ।
    जानना यह ज्ञान गुण का कार्य है । उसमें पदार्थों का विशेष प्रतिभास
    (Perception) होता है । जीव का कार्य जानना - देखना है ऐसा हम कहते
    हैं तब देखना यह दर्शन गुण का कार्य है और जानना यह ज्ञान गुण का
    कार्य है । जीव का उपयोग याने (Attention) जब देखने की ओर होता
    है उसे दर्शनोपयोग कहते हैं और उपयोग जब जानने की ओर होता है
    उसे ज्ञानोपयोग कहते हैं । जानने की क्रिया के पूर्व याने ज्ञानोपयोग के पूर्व
    उस पदार्थ का जो सामान्य अवलोकन होता है वह दर्शन गुण का कार्य
    अर्थात् दर्शनोपयोग है ।
    दर्शनगुण की चार पर्यायें हैं - चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और
    केवलदर्शन ।
    (१) चक्षुदर्शन : चक्षुइंद्रिय द्वारा जो मतिज्ञान होता है उसके पूर्व जो
    सामान्य प्रतिभास होता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं ।
    (२) अचक्षुदर्शन : चक्षु को छोड़कर अन्य चार इंद्रियाँ और मन
    इनके द्वारा जो मतिज्ञान होता है उसके पूर्व जो सामान्य प्रतिभास होता है उसे
    अचक्षुदर्शन कहते हैं ।
    (३) अवधिदर्शन : अवधिज्ञान के पूर्व होनेवाले सामान्य प्रतिभास को
    अवधिदर्शन कहते हैं ।
    (४) केवलदर्शन : केवलज्ञान के साथ-साथ होनेवाले सामान्य प्रतिभास
    को केवलदर्शन कहते हैं ।
    अभी-अभी हमने देखा था कि जीव का स्वभाव जानना-देखना है, जीव
    ज्ञाता दृष्टा है । इसमें देखना दर्शन गुण का कार्य है और जानना ज्ञान गुण
    का कार्य है । हमारा उपयोग जब देखने की ओर होता है तब जानने की ओर
    नहीं होता और जब उपयोग जानने की ओर लगता है तब देखने की ओर नहीं
    होता । हमें जो ज्ञानोपयोग होता है वह दर्शनोपयोगपूर्वक ही होता है । परंतु
    केवली भगवंतों का याने अरिहंत और सिद्धों का उपयोग एकसाथ ज्ञान और
    दर्शन दोनों में रहता है अर्थात् केवलदर्शन और केवलज्ञान युगपत् होते हैं ।
    ज्ञान गुण की ८ पर्यायें हैं – उनमें मिथ्याज्ञान की तीन पर्यायें हैं । वे
    इसप्रकार हैं – कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान । कुअवधिज्ञान को ही
    विभंगज्ञान ऐसा भी कहने में आता है । जब तक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
    अर्थात् आत्मज्ञान नहीं होता तब तक हम कितना भी पढ़े-लिखे, कितना भी
    शास्त्रज्ञान करे तो भी उसे मिथ्याज्ञान ही कहते हैं । आत्मज्ञानशून्य ऐसा
    जिनवाणी का ज्ञान भी मिथ्याज्ञान है ऐसा शास्त्र में ही बताया हैं । आत्मज्ञान
    होने के पश्चात् सभी ज्ञान - आत्मासंबंधी ज्ञान तथा अन्य पदार्थों संबंधी ज्ञान
    ‘सम्यग्ज्ञान’ हो जाता है । समझो मिथ्यादृष्टि को इतिहास, भूगोल, गणित
    का ज्ञान है उसे मिथ्याज्ञान कहते हैं और उसी जीव को सम्यग्दर्शन होनेपर
    उसके उस इतिहास, भूगोल और गणित के ज्ञान को भी सम्यग्ज्ञान कहते हैं
    क्योंकि अब उस जीव को वस्तुस्वरूप का ज्ञान है, स्व और पर का भेदविज्ञान
    है और स्व का प्रत्यक्ष अनुभव है ।
    सम्यग्ज्ञान की ५ पर्यायें हैं - सुमतिज्ञान, सुश्रुतज्ञान, सुअवधिज्ञान,
    मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान । जब तक केवलज्ञान नहीं होता तब तक सभी
    संसारी जीवों को एकेंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक के जीवों को मति और श्रुत
    ये दो ही ज्ञान (ये दो पर्यायें) होते हैं । इस ज्ञान का पूर्ण अभाव कभी भी
    नहीं होता । सूक्ष्म एकेंद्रिय जीव में भी ज्ञान का कुछ अंश पर्याय में प्रगट
    रहता ही है । कोई भी जीव कभी भी ज्ञान रहित हो ही नहीं सकता । पर्याय
    में ज्ञान का उघाड़ (बुद्धि) कम ज्यादा रह सकता है । मिथ्या या सम्यक्
    ऐसा भेद किये बिना ज्ञान की पांच पर्यायों का अर्थात् मतिज्ञान, श्रुतज्ञान,
    अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान एवं केवलज्ञान का स्वरूप अब देखेंगे ।
    मतिज्ञान - इंद्रिय और मन के निमित्त से पदार्थों को जानना इसे
    मतिज्ञान कहते हैं । यह तो परपदार्थों का परोक्ष ज्ञान हुआ । परंतु जब जीव
    निज आत्मा को जानता है तब इंद्रिय और मन की तरफ से उपयोग को
    हटाकर, अंतर्मुख बनकर, उपयोग को स्वसन्मुख करता है, उस समय निज
    आत्मा का जो ज्ञान होता है उसे मतिज्ञान कहते हैं । यह प्रत्यक्ष (स्वानुभव
    प्रत्यक्ष) ज्ञान है ।
    श्रुतज्ञान - मतिज्ञान से जाने हुये पदार्थ से संबंधित अन्य पदार्थ को
    जाननेवाले ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते हैं । जैसे, ‘शक्कर’ यह शब्द सुना
    या पढ़ा तब उस शब्द का जो ज्ञान हुआ वह मतिज्ञान है और उस शब्द के
    द्वारा सूचित होनेवाला शक्कर यह पदार्थ जाना वह श्रुतज्ञान है । तुम्हारे
    मस्तिष्क में से कौनसा सवाल उठ रहा है वह मैं समझ गयी । यही ना, कि
    जिन जीवों को केवल एक या दो इंद्रिय हैं उन्हें श्रुतज्ञान कैसे होता है ?
    उसका उत्तर है - एकेंद्रिय जीवों को स्पर्शन इंद्रिय के निमित्त से स्पर्श का
    ज्ञान होता है वह मतिज्ञान है और यह स्पर्श दुःखरूप है ऐसा जो ज्ञान हुआ
    वह श्रुतज्ञान है ।
    आत्मा के शुद्ध, अनुभूतिरूप श्रुतज्ञान को भावश्रुतज्ञान कहते हैं । ऐसे
    आत्मा के संबंध में विवेचन, चर्चा, लक्षण, आत्मानुभूति का उपाय आदि जिन
    शास्त्रों में बताया है उस समस्त आगम को - जिनवाणी को ‘द्रव्यश्रुत’ कहते
    हैं । इससे यह बात ख्याल में आती है कि द्रव्यश्रुत अथवा दिव्यध्वनि भी शब्दों
    की रचना है, वाणी है, ज्ञान की पर्याय नहीं है । यदि कोई कहेगा कि शास्त्र
    में ज्ञान नहीं है, दिव्यध्वनि में ज्ञान नहीं है तो अब तुम्हें आश्चर्य नहीं होगा,
    अपेक्षा ध्यान में आयेगी ।
    अवधिज्ञान – जो ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा के साथ
    रूपी पदार्थों को स्पष्ट जानता है उस ज्ञान को अवधिज्ञान कहते हैं । देवगति
    के देवों को और नरक गति के नारकियों को अवधिज्ञान होता ही है । इन
    दोनों भवों के जीवों में वह होता ही है इसलिए उसे ‘भवप्रत्यय अवधिज्ञान’
    कहते हैं । कुछ संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंचों और मनुष्यों को भी अवधिज्ञान हो सकता
    है । इस ज्ञान द्वारा भविष्यकालीन, भूतकालीन तथा अन्य क्षेत्र में हो रही
    वर्तमान घटनाओं को ये जीव जान सकते हैं, इसको गुणप्रत्यय अवधिज्ञान
    कहते हैं । यह कोई चमत्कार नहीं है । कुअवधिज्ञान द्वारा भी इन बातों को
    जान सकते हैं । इस ज्ञान के कारण उस विशिष्ट व्यक्ति को त्रिकालदर्शी
    या साधुपुरुष होने का दावा कराके अनेक भोले लोगों को उनकी चंगूल में
    फँसाया जाता है । परंतु अवधिज्ञान का स्वरूप मालूम होने से हमें अब उसमें
    कोई चमत्कार भासित होने की संभावना नहीं रहती । सम्यग्दृष्टि के अवधिज्ञान
    को सुअवधिज्ञान कहते हैं ।

मनःपर्ययज्ञान - यह ज्ञान किसी-किसी भावलिंगी मुनि को ही होता
है । नग्न दिगंबर भावलिंगी मुनि को छोड़कर अन्य किसी को भी नहीं हो
सकता । जो ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा सहित दूसरों के मन में
स्थित रूपी पदार्थों को स्पष्ट जानता है उसको मनःपर्ययज्ञान कहते हैं ।

केवलज्ञान – जो ज्ञान तीन काल के (भूत, वर्तमान, भविष्य) और
अलोकाकाश सहित तीनों लोकों के समस्त द्रव्य-गुण-पर्यायों को एक ही
समय में युगपत्, स्पष्ट, प्रत्यक्ष जानता है उसे केवलज्ञान कहते हैं । इसकी
विशेषता यह है कि केवली भगवान सब पदार्थों की तरफ देखकर सब
को जानते हैं ऐसा नहीं है, वे तो निज आत्मा में पूर्णतः रममाण हुये हैं ।
वे अपनी आत्मा को पूर्णरूप से जानते हैं । उन्हें अनंतज्ञान प्रगट हुआ है
और विश्व की समस्त चराचर मूर्त-अमूर्त वस्तुएँ उनके ज्ञान में प्रतिसमय
झलकती हैं । अनंत वस्तुओं का और अनादि से अनंत काल तक का
ज्ञान उन्हें वर्तमानवत् प्रत्यक्ष होता है । यही तो ज्ञान के स्वरप्रकाशकपने की
महिमा है, बड़प्पन है ।

इससे क्रमबद्धपर्याय की सिद्धि होती है इस बात को हमने प्रमेयत्व
गुण की चर्चा के संबंध में देखा ही था । भविष्य में होनेवाली पर्याय जान
सकते हैं क्योंकि वह ज्ञान की क्षमता है, योग्यता है, सामर्थ्य है । परंतु कोई
भी पर्याय रंचमात्र भी बदल नहीं सकते, आगे-पीछे नहीं कर सकते, उसमें
जरासा भी फेरफार नहीं कर सकते । प्रत्येक द्रव्य की प्रत्येक पर्याय स्वतंत्र
है और वह सुनिश्चित है ऐसा दृढ़ निर्णय होना यही पुरुषार्थ है; क्योंकि ऐसा
निर्णय होनेपर हमारी दृष्टि दूसरों की और अपनी भी पर्यायों पर से हटकर
अपने त्रिकाल कायम रहनेवाले द्रव्यस्वभाव पर केंद्रित होती है । इसलिए ज्ञान
की पर्यायों का स्वरूप जानकर क्रमबद्धपर्याय का निर्णय करना यही हमारा
कर्तव्य है । ‘पर्याय क्रमबद्ध होगी तो हमारा पुरुषार्थ क्या रहा ?’ ऐसा
विपरीत निष्कर्ष निकालना योग्य नहीं ।

एक समय में ज्ञान की एक ही पर्याय होती है । परंतु एक जीव को
कौन-कौनसे ज्ञान (पर्यायें) हो सकते हैं इसे अब देखते हैं । कम से कम
एक ज्ञान याने केवलज्ञान होता है । एक केवलज्ञान होनेपर अन्य ज्ञानों की
जरूरत ही क्या होगी, है ना ? किसी को दो ज्ञान होंगे तो मतिज्ञान और
श्रुतज्ञान होंगे । ये दोनों या तो मिथ्या होंगे या दोनों सम्यक् होंगे । किसी
को तीन ज्ञान हो सकते हैं वे इसप्रकार - (१) मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और
अवधिज्ञान - तीनों मिथ्या अथवा तीनों सम्यक् । अथवा (२) सुमतिज्ञान,
सुश्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ।

किसी को चार ज्ञान होंगे तो सुमतिज्ञान, सुश्रुतज्ञान, सुअवधिज्ञान, और
मनःपर्ययज्ञान ये चार ज्ञान होते हैं ।

जीव के श्रद्धा गुण की मुख्यतः दो पर्यायें होती हैं – मिथ्यादर्शन और
सम्यग्दर्शन ।

मिथ्यादर्शन - अतत्त्वश्रद्धान को मिथ्यादर्शन ऐसा कहा है । उस जीव
को स्वतत्त्व की श्रद्धा नहीं होती । जीवादि सात तत्त्वों के बारे में उसकी
विपरीत श्रद्धा होती है । देह में आत्मबुद्धि, रागद्वेषादि भावों में कर्तृत्व-
भोक्तृत्वबुद्धि, परपदार्थों में ममत्वबुद्धि, स्वामित्वबुद्धि, पुण्य को भला - पाप को
बुरा मानना, पुण्य करते-करते मोक्ष की प्राप्ति होगी ऐसी विपरीत मान्यताओं
को - श्रद्धा को मिथ्यादर्शन कहते हैं । यह जन्म से ही रहता है उसे अगृहित
मिथ्यादर्शन कहते हैं । कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्रों के सेवन से मिथ्यात्व का
पोषण होता है तथा नवीन मिथ्या कल्पनाओं की श्रद्धा उत्पन्न होती है उसे
गृहित मिथ्यादर्शन कहते हैं ।
सम्यग्दर्शन - जो जीव वीतराग सर्वज्ञ कथित तत्त्वों का उपदेश ग्रहण
करके जीवादि सात तत्त्वों का यथार्थ निर्णय करता है, देव-गुरु और शास्त्र के
स्वरूप का निर्णय करता है, मोक्षमार्ग का निर्णय करता है, स्वतत्त्व एवं
परतत्त्व का निर्णय करके स्व-पर भेदविज्ञान करता है और अंतर्मुख होकर स्व
का चिंतन मनन करके आत्मानुभव प्राप्त करता है तब उस जीव के श्रद्धा गुण
की सम्यग्दर्शन यह पर्याय प्रगट होती है ।

सम्यग्दर्शन की पर्याय के साथ ही उसी समय ज्ञान की सम्यग्ज्ञान
यह पर्याय और चारित्र की सम्यक्चारित्र यह पर्याय प्रारंभ होती है । केवल
तीन गुण ही नहीं परंतु जीव के सभी अनंत गुण स्वभावरूप से परिणमन
प्रारंभ करते हैं । आत्मा में लीन रहनेपर याने शुद्धोपयोग में अतींद्रिय
सुख की अनुभूति होती है । जितना कषायों का अभाव होगा उतनी अकषायरूप
शांति प्राप्त होगी ।

जीव शुद्धोपयोग में से शुभोपयोग में अथवा अशुभोपयोग में आनेपर भी
अब श्रद्धा की सम्यग्दर्शन पर्याय चालू ही रहती है । बारम्बार शुद्धोपयोग
करने से उसकी यह सम्यक् श्रद्धा दृढ़ होती रहती है ।

कदाचित् कोई जीव सम्यग्दर्शन से च्युत होकर मिथ्यादर्शन पर्याय प्राप्त
करता है । परंतु पुनश्च पुरुषार्थ से सम्यक्त्व प्राप्त कर सकता है । करणानुयोग
की अपेक्षा से श्रद्धा गुण की सासादन और मिश्र ये दो अवस्थायें (पर्याय)
सम्यक्त्व से गिरनेवाले जीवों में संभव हैं परंतु वे पर्यायें अल्पकाल के लिए
होती हैं और उसका वर्णन हमें यहाँ पर अपेक्षित नहीं हैं ।

चारित्र गुण की पर्यायों का विस्तृत वर्णन आगामी पूरे एक पत्र में
लिखूँगी क्योंकि वह विषय बड़ा है । सम्यग्दर्शन के साथ सम्यक्चारित्र यह
चारित्र गुण की पर्याय प्राप्त होनेपर भी उस पर्याय में सरागता एवं वीतरागता
एकसाथ विद्यमान रहती है । क्रम से कषाय (सरागता) कम होते हैं और
वीतरागता बढ़ती जाती है । कषाय पूर्णतः नष्ट होकर पूर्ण वीतरागता प्राप्त
होती है, उसके पश्चात् ही ज्ञान की मति-श्रुतज्ञान पर्याय का अभाव होकर
केवलज्ञान पर्याय उत्पन्न होती है ।

ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र के समान सुख और वीर्य ये भी जीव के
विशेष गुण हैं । सुख गुण की अतींद्रिय सुख यह स्वभावपर्याय है और हम
जिसे सुख मानते हैं वह इंद्रियजनित सुख और दुःख ये विभावपर्यायें हैं ।
आत्मानुभूति होती है उससमय अतींद्रिय ज्ञान और अतींद्रिय सुख प्रगट होता
है । जितनी आत्मस्थिरता बढ़ेगी उतना अधिक सुख होगा । पूर्ण वीतरागता
के साथ पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है और केवलज्ञान के होते ही अनंत सुख
की प्राप्ति होती है ।
वीर्य भी जीव का विशेष गुण है । वीर्य याने बल । शरीर का बल यह
जीव के वीर्य गुण का कार्य नहीं है । वीर्य गुण की पर्याय का नाम है
‘पुरुषार्थ’ । पर्याय में स्वभाव की रचना करना यह वीर्य गुण का कार्य
है । मोक्ष की ओर ले जानेवाला ही सच्चा पुरुषार्थ है । हम लौकिक में
जिसे पुरुषार्थ कहते हैं वह विभाव पर्याय है, क्योंकि उससे संसार का
ही पोषण होता है । आत्मा का स्वभाव तो अनादि से है वैसा ही कायम
है परंतु उस स्वभाव का निर्णय करना, दृष्टि को उस ओर ले जाना, स्वभाव
की श्रद्धा करना, स्वभाव में स्थिर होना यह सब वीर्य गुण का कार्य है,
इसीको ‘पुरुषार्थ’ कहते हैं ।
क्रियावती शक्ति यह भी जीव का विशेष गुण है । उसकी गतिरूप
और स्थितिरूप ऐसी दो पर्यायें हैं । जीव का गमन करना या स्थिर रहना
यह जीव की क्रियावती शक्ति का कार्य है और पुद्गल का गमन करना या
स्थिर रहना यह पुद्गल की क्रियावती शक्ति का कार्य है । जीव और शरीर
इनका एक ही काल में (एकसाथ) परिणमन होता है तब जीव को ऐसी भ्रांति
होती है कि शरीर का हलनचलन, क्रियायें मैं ही कर रहा हूँ ।
कौनसी पर्यायें पुद्गल की हैं और कौनसी मेरी अर्थात् जीव की हैं यह
समझने के बाद लक्षणों द्वारा जीव और पुद्गल को भिन्न-भिन्न पहचानना अब
आसान हो गया है । ‘अपने को पहिचानिए’ यह हमारा प्रयोजन होने से
विशेष गुणों का यह अभ्यास हमारे लिए बहुत कार्यकारी ठहरेगा । जीव और
पुद्गल को छोड़कर अन्य जो चार द्रव्य हैं – धर्म, अधर्म, आकाश और काल,
उनके विशेष गुणों के संबंध में ‘द्रव्य का स्वरूप’ नाम के पत्र में चर्चा हो ही
गयी है । चारित्र गुण विषयक पत्र भी शीघ्र भेज रही हूँ ।
तुम्हारी माँ

पत्रांक १८ — जीव का चारित्र गुण और पर्यायें | Patrānk 18 — Jīv kā Cāritra Guṇ aur Paryāyẽ

१६ अप्रैल १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
अब तक हमने पत्रों द्वारा विश्व, द्रव्य, गुण, पर्याय, सामान्य गुण, विशेष
गुण तथा अन्य भी कई बातों को जाना । जैन तत्त्वज्ञान का ‘ओनामा’ हमने
किया । ‘ओनामा करना’ का अर्थ होता है प्रारंभ करना, यह शब्द कैसे बना
पता है ? उसका फुलफॉर्म है ‘ओनामासिदं’ इस मराठी बोलीभाषा के शब्दों
का शुद्ध रूप - मूल शब्द हैं ‘ओम् नमः सिद्धं’ । पहले के जमाने में बालक
की पढ़ाई प्रारंभ करते समय उसका हाथ पकड़कर स्लेट के ऊपर ‘ॐ
नमः सिद्धं’ ऐसा लिखाया जाता था और ऐसा लिखकर ही पढ़ाई कराने का
शुभारंभ होता था । इससे किसी भी बात का प्रारंभ करने के अर्थ में
‘ओनामा करना’ ऐसा वाक्प्रचार प्रचलित है ।
सामान्य गुणों का स्वरूप हमने जाना । छहों द्रव्यों में ये गुण पाये
जाते हैं इसलिए जहाँ इन गुणों की सिद्धि होती है वह 'द्रव्य’ है इतना
तो हम जान सकते हैं । परंतु छहों द्रव्यों में से वह निश्चित कौनसा द्रव्य
है यह पहचानने के लिए उसके विशेष गुण जानना आवश्यक है । उन विशेष
गुणों की विस्तृत चर्चा हम करते आये हैं । गुण तो शक्ति है, Capacity
है जो अनादि से अनंत काल तक कायम रहती है, उसका प्रति समय प्रगट
रूप जो कार्य है - अवस्था है - व्यक्तरूप है उसे हम पर्याय कहते हैं । उस
प्रगट पर्याय द्वारा ही हमें गुण की पहचान होती है । इसलिए इन विशेष
गुणों की पर्यायों का अभ्यास हम कर रहे हैं । पुद्गल के विशेष गुणों
और पर्यायों की चर्चा के उपरांत गत पत्र में जीव के विशेष गुणों और उनकी
पर्यायों की चर्चा हमने की थी । उसमें से चारित्र गुण की चर्चा आज हम
करने जा रहे हैं ।
जीवद्रव्य अन्य द्रव्यों से भिन्न है वह उसके चैतन्य स्वभाव के कारण
याने ज्ञानदर्शन गुण के कारण । तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में ‘उपयोगो लक्षणम्’ ऐसा
जीव का लक्षण बताया है । उपयोग के भेद हैं ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग
याने जानना और देखना । उपयोग जब स्व को जानने में लगता है उसे
शुद्धोपयोग कहते हैं, जब परपदार्थों को जानते हुये शुभ भाव होते हैं उन्हें
जानने में उपयोग लगता है वह शुभोपयोग है और अशुभ भाव होते है उन्हें
जानने में उपयोग लगता है वह अशुभोपयोग है । ये शुभ-अशुभ भाव अर्थात्
रागद्वेष हैं, इसी को कषाय कहते हैं ।
अब तुम ही बताओ, यह कषाय क्या है ? द्रव्य है ? गुण है कि
पर्याय है ? द्रव्य तो नहीं क्योंकि छह द्रव्यों के नाम तो हमें पता है । कषाय
मात्र जीवद्रव्य में ही पायी जाती है परंतु सब जीवों में नहीं । अरिहंत - सिद्धों
में कषायें नहीं होती इसकारण कषाय गुण भी नहीं हो सकता । इससे पता
चलता है कि कषाय पर्याय है और वह जीव के चारित्र गुण की पर्याय है ।
परंतु वह स्वभाव पर्याय याने शुद्ध पर्याय नहीं परंतु विभाव पर्याय है, अशुद्ध
पर्याय है । चारित्र गुण के शुद्ध पर्याय को वीतरागता कहते हैं और अशुद्ध
पर्याय को सरागता-कषाय कहते हैं । अन्य गुणों की अपेक्षा चारित्र गुण में
यह विशेषता है कि यह गुण एक झटके में पूर्ण शुद्ध नहीं होता । क्रम से
शुद्धि बढ़ती है और अशुद्धि कम होती जाती है । सम्यग्दर्शन होनेपर चारित्र
गुण में आंशिक वीतरागता एवं आंशिक सरागता ऐसी दो धारायें एकसाथ
विद्यमान रहती हैं ।
मिथ्यात्व अवस्था में चारित्र गुण का केवल राग-द्वेषरूप परिणमन चलता
है, उसे कषाय कहते हैं । कषाय से हम परिचित हैं क्योंकि दिनरात हम
कषाय ही तो करते रहते हैं । जो कसता है - दुःख देता है उसे कषाय कहते
हैं अथवा जिससे संसार की प्राप्ति होती है (कस + आय) उसे कषाय कहते
हैं । कषाय को दो शब्दों में बताना हो तो राग और द्वेष तथा चार शब्दों में
बताना हो तो क्रोध, मान, माया और लोभ कहते हैं । सब कषायों को पच्चीस
नामों में विभाजित कर सकते हैं -
१ से ४ - अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ – (पहली चौकड़ी)
५ से ८ - अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ - (दूसरी चौकड़ी)
९ से १२ - प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ – (तिसरी चौकड़ी)
१३ से १६ - संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ – (चौथी चौकड़ी)
हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद
ये नौ नोकषाय मिलकर कुल पच्चीस कषायें हैं ।
जब जीव के क्रोध कषाय उत्पन्न होती है तब दूसरे का बुरा करने की
इच्छा होती है और उसके अर्थ गाली देना, कठोर वचन बोलना, मारना आदि
अनेक उपाय करता है ।
जब इसके मान कषाय उत्पन्न होती है तब औरों को नीचा और
अपने को ऊँचा दिखाने की इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय
सोचता है ।
जब इसके माया कषाय उत्पन्न होती है तब छल-कपट द्वारा कार्य
सिद्ध करने की इच्छा होती है ।
जब लोभ कषाय उत्पन्न होती है तब इष्ट पदार्थ के लाभ की इच्छा
होने से उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है । इसका विस्तृत वर्णन तुम्हें
मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रंथ के तीसरे अधिकार में ‘चारित्रमोह से दुःख’ इस
शीर्षक के अंतर्गत मिलेगा, वहाँ से जरूर पढ़ना ।
इन कषायों के साथ नोकषाय होती हैं । हास्य कषाय में खोटी कल्पना
करके विशिष्ट बात में हर्ष मानता है और हँसने लग जाता है । रति कषाय
में इष्ट वस्तु में अति आसक्त होता है । अरति कषाय में अनिष्ट वस्तु के
संयोग में व्याकुल होता है ।
शोक कषाय में इष्ट का वियोग या अनिष्ट का संयोग होने से अतिव्याकुल
होकर संताप से रोता है, पुकारता है, अति दुःख करता है । भय कषाय में
किसी को इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग का कारण जानकर डरता है,
भागता है, छिपता है । जुगुप्सा उत्पन्न होती है तब अनिष्ट वस्तु से घृणा
करता है । तीनों वेद कषायों में कामभावना जागृत होती है, संभोग की
इच्छा होती है ।
यें सभी कषायें दुखःरूप हैं क्योंकि उनसे आकुलता उत्पन्न होती है ।
तथा वे आगामी दुःख के कारण भी हैं क्योंकि कषायों से नवीन बंध होता है
और उस बंध का फल संसार परिभ्रमण है । जिनका सब कषायों का - सब
इच्छाओं का अभाव हो गया है ऐसे अरिहंत और सिद्ध पूर्ण वीतरागी हैं
और वे ही अनंत सुखी हैं । सर्वज्ञता के कारण उनके केवलज्ञान में संपूर्ण
लोकालोक का तीनों काल का ज्ञान एक समय में झलकता है परंतु वीतरागता
के कारण उन्हें राग-द्वेष नहीं होते । इससे विपरीत, हमारा ज्ञान अति अल्प
होनेपर भी वह राग सहित याने कषाय सहित होने से हमें दुःख ही होता
है । जैसे, हम हापूस का आम देखते हैं अर्थात् उसे जानने का कार्य (ज्ञान
गुण की पर्याय) होता है, उसी समय चारित्र गुण भी परिणमन करता है,
उसका रागरूप परिणमन होता है कि यह आम मुझे प्राप्त हो और मैं उसे
खाऊँ ऐसी इच्छा होती । जब तक इच्छा पूर्ण नहीं होती तब तक आकुलता
याने दुःख होता है । सच देखा जायें तो दुःख इच्छा से होता है, कषायों के
कारण होता है, परंतु हम परद्रव्य को सुख-दुःख का कारण मानकर निरंतर
राग-द्वेष करते रहते हैं ।
ऊपर हमने अनंतानुबंधी आदि चार चौकड़ी के नाम देखे । अब संक्षेप
में उनका स्वरूप हम देखते हैं । कषायों की तीव्रता या मंदता के अनुसार ये
भेद नहीं है परंतु उनकी जाति ही भिन्न-भिन्न हैं ।
मिथ्यात्व दशा में जीव के अनंतानुबंधी आदि चारों कषाय चौकड़ी विद्यमान
रहती हैं । अनंतानुबंधी कषाय के कारण जीव को अतत्त्वश्रद्धान होता है अर्थात्
जो तीव्रकषायी हैं उन्हें सत्य तत्त्वों का श्रद्धान हो नहीं सकता, आत्मा की और
धर्म की चर्चा में उन्हें तीव्र अरुचि एवं चीढ़ रहती है, ऐसा जीव कुदेव, कुगुरु,
कुशास्त्र का सेवन करने लग जाता है । मिथ्यात्व और अनंतानुबंधी कषाय वैसे
हाथ में हाथ मिलाकर चलते हैं, दोनों एक दूसरे को पूरक हैं ।
सच्चे देव, गुरु शास्त्र का स्वरूप समझकर उनके गुणों के प्रति भक्ति
करने से, प्रयोजनभूत तत्त्वों का चिंतन, मनन करने से ये कषाय और मोह
मंद पड़ते हैं और तब जीव सम्यग्दर्शन के लिए पात्र बनता है । ऐसा जीव
जब आत्मलीनता का पुरुषार्थ करता है तब आत्मानुभव होता है अर्थात् सम्यक्त्व
प्राप्त होता है और अनंतानुबंधी कषायों का अभाव होता है । तब उस चारित्र
गुण की पर्याय को स्वरूपाचरण चारित्र कहते हैं । इसी को सम्यक्त्वाचरण
चारित्र भी कहने में आता है ।
ऐसे सम्यक्त्वी जीव को अब तीन कषाय चौकड़ी का सद्भाव रहता
है । अप्रत्याख्यान कषायों के कारण किंचित् भी त्याग तथा व्रत नहीं होते ।
प्रत्याख्यान का अर्थ होता है त्याग । जो कषाय थोड़ा भी त्याग नहीं होने देते
वे अप्रत्याख्यान कषाय हैं । यह जीव जब अधिक आत्मस्थिरता करता है तब
अप्रत्याख्यान कषायों का अभाव होता है, उस अवस्था को देशचारित्र कहते
हैं । इसे दो कषाय चौकड़ी का अभाव तथा दो कषाय चौकड़ी का सद्भाव
रहता है । इस जीव को व्रतीश्रावक ऐसी संज्ञा है । प्रत्याख्यान कषायों का
सद्भाव होने से संपूर्ण अंतरंग और बहिरंग त्याग नहीं हो सकता, मुनियोग्य
अंतरंग स्थिरता नहीं होती ।
तीन कषाय चौकड़ी का अभाव होता है तब उस अवस्था को सकल
चारित्र कहते हैं । इस अवस्था में संज्वलन कषाय अभी विद्यमान हैं । उनके
कारण अंतरंग में पूर्ण स्थिरता एवं पूर्ण वीतरागता नहीं हो सकती । मुनि
अवस्था में २८ मूलगुण पालन करने का जो राग है, वह इन संज्वलन
कषायों का ही कार्य है ।
अंतरंग स्थिरता बढ़ते-बढ़ते जीव जब पूर्णरूप से अंतरंग में लीन
हो जाता है, पूर्ण वीतराग होता है तब संज्वलन कषायों का भी पूर्ण अभाव
होकर यथाख्यात चारित्र प्राप्त होता है । चारित्र गुण पूर्ण शुद्ध अवस्था को
प्राप्त होता है ।
ऊपर के संपूर्ण विवेचन से एक बात ज्ञान में आती है कि कषाय (राग)
करते-करते वीतरागता नहीं होती, अपितु कषायों का अभाव करके वीतरागता
होती है । शुभ या अशुभ राग दोनों कषाय ही हैं । ‘शुभराग करते-करते
वीतरागता की प्राप्ति नहीं होगी’ ऐसी पूर्ण प्रतीति, पक्का विश्वास, दृढ़ श्रद्धा
पहले होनी चाहिए । शुभराग तो छूटते नहीं हैं परंतु बढ़ती हुयी वीतरागता के
साथ उच्च प्रति (कोटि) Quality के शुभराग होते रहते हैं । चारित्र गुण की
पर्यायों संबंधी विवेचन संक्षेप में निम्न कोष्टक द्वारा फिरसे देखते हैं ।
मिथ्या चारित्र – अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन चारों
कषाय चौकड़ी का सद्भाव ।
स्वरूपाचरण चारित्र

अनंतानुबंधी कषाय चौकड़ी का अभाव और
अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन इन तीन कषाय चौकड़ी का सद्भाव
(सम्यग्दर्शन का प्रारंभ)
देश चारित्र – अनंतानुबंधी और अप्रत्याख्यान इन दो कषाय चौकड़ी का
अभाव तथा प्रत्याख्यान और संज्वलन इन दो कषाय चौकड़ी का सद्भाव ।
(व्रती श्रावक)
सकल चारित्र - अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान तीन कषाय
चौकड़ी का अभाव तथा संज्वलन कषाय चौकड़ी का सद्भाव । (मुनिदशा)
यथाख्यात चारित्र - चारों कषाय चौकड़ी तथा अन्य सभी नोकषायों का
पूर्ण अभाव, पूर्ण वीतरागता की प्राप्ति ।
हास्यादि नौ नोकषाय हैं वे क्रम से मंद होते-होते यथावकाश उनका भी
अभाव होता है । उनका क्रम विस्तारभय से यहाँ नहीं लिखा है । यह विषय
शायद अभी तुम्हें कठिन लगता होगा, परंतु आगे चलकर ‘कर्म’ ‘गुणस्थान’
आदि विषय पढ़ते समय तुम्हें असानी होगी ।
उक्त सब बातों का पता चलनेपर अब तुम्हारी समझ में आयेगा कि
मिथ्यात्व अवस्था में केवल बाह्य व्रतों का अंगीकार करने से या बाह्य त्याग
करने से अनंतानुबंधी आदि कषायों का अभाव नहीं होता परंतु उसके अर्थ
सम्यग्दर्शन प्राप्त करके आत्मस्थिरता करना एवं वीतरागता प्राप्त करना यही
एकमेव उपाय है ।
‘तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’ ऐसी सम्यग्दर्शन की परिभाषा है । ये
प्रयोजनभूत तत्त्व कौनसे हैं और उनका श्रद्धान करना याने क्या करना ये बातें
आगामी पत्र में करेंगे ।
तुम्हारी माँ