जैन तत्त्व परिचय — डॉ. उज्ज्वला शहा | Jain Tattva Parichay (दैनिक स्वाध्याय)

पत्रांक १९ — प्रयोजनभूत तत्त्व | Patrānk 19 — Prayojanbhūt Tattva

११ मई १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।

रीना, तुम पूना आयी थी, तुम्हें पता है कि तुमने प्रतिदिन ७ घण्टे ऐसे
१० दिवसीय शिबीर का लाभ लिया तो तुम्हें ७० घण्टे का प्राथमिक ज्ञान
प्राप्त हुआ । अगर तुम मायके में पूरा एक महिना भी रहती तो भी तुम्हें
यह ज्ञान प्राप्त न होता ! क्योंकि वहाँ तुम बेटी के नाते नहीं अपितु शिष्या
बनकर आयी थी ।

मोना, तुम तो दवाखाने के उद्घाटन की तैयारी में व्यस्त होने से आ
नहीं सकी इसका मुझे दुःख हुआ । अरी, रीना भी रोज आधा घण्टा बालकों
का क्लास चलाती थी । तुम्हारे पिताजी चार घण्टे, मैं तीन घण्टे, ढोकर
गुरुजी एक घण्टा और रीना आधा घण्टा पढ़ाते थे इसप्रकार कुल साढ़ेआठ
घण्टों का प्रतिदिन प्रोग्रॅम रहता था । अस्तु, दवाखाने में शुरू-शुरू में काफ़ी
समय खाली रहता है । वहाँ बैठे-बैठे तत्त्वज्ञान के अभ्यास का अवसर प्राप्त
होगा, उस बचे हुये वक्त का अधिक से अधिक लाभ उठा लो ।

रीना-मोना, गत पत्र में हमने चारित्र गुण की चर्चा की थी । द्रव्य, गुण,
पर्याय के अभ्यास द्वारा हमने पहले भी देखा था कि गुण उसके द्रव्य के
संपूर्ण भागों में रहते हैं । तात्पर्य यह हुआ कि जीवद्रव्य का ज्ञान गुण उसके
संपूर्ण भागों में रहता है, श्रद्धा गुण जीव के संपूर्ण भागों में रहता है तद्वत्
चारित्र गुण भी जीव के संपूर्ण भागों में रहता है ।

अर्थात् जितना (जो) क्षेत्र द्रव्य का होता है, उतना ही (वही) क्षेत्र उसके
प्रत्येक गुण का होता है और जितना (जो) क्षेत्र गुण का होता है उतना ही
(वही) क्षेत्र उस गुण की पर्यायों का होता है । इसका अर्थ यह हुआ कि
जो जीवद्रव्य का क्षेत्र है, वही उसके चारित्र गुण का क्षेत्र और वही चारित्र गुण
की पर्याय का क्षेत्र है । इससे इस बात का पता चलता है कि किसी भी द्रव्य
के गुणों की पर्यायें याने द्रव्य की पर्यायें उस विशिष्ट द्रव्य के क्षेत्र तक ही
मर्यादित रहती हैं, द्रव्य को छोड़कर द्रव्य के बाहर वे पर्यायें जा नहीं सकती,
फैल नहीं सकती ।
जीव के चारित्र गुण की विभावपर्याय याने कषाय (क्रोध, मान, माया,
लोभ) हो या स्वभावपर्याय-वीतरागता हो, उस पर्याय का क्षेत्र जीवद्रव्य के बाहर
नहीं होता । जीवद्रव्य के संपूर्ण भागों में यह पर्याय व्याप्त होती है, जीवद्रव्य
के बाहर अन्य द्रव्य में व्यापती नहीं । इसीलिए चारित्र की पर्याय शरीर में
नहीं, जीवद्रव्य में होती है ।
वर्तमान में हमारी जो मनुष्यपर्याय है - अवस्था है वह असमानजातीय
द्रव्यपर्याय है अर्थात् एक जीवद्रव्य और अनंत पुद्गल परमाणु (आहारवर्गणा,
तेजसवर्गणा, मनोवर्गणा, कार्माणवर्गणा आदि) ऐसे अन्य-अन्य जाति के द्रव्यों
की एकबंधानरूप - संयोगरूप स्थिति है । ऐसे संयोग में रहनेवाला जीव
उसके संयोग में रहनेवाले पुद्गल को याने देह को ‘स्व’ मानता है और
देहाश्रित क्रिया - आचरण (Behaviour) को अपना आचरण याने चारित्र मानता
है तब गडबड घोटाला शुरु होता है ।
जब चारित्र गुण की सकल चारित्र यह अवस्था होगी (तीन कषाय
चौकड़ी का अभाव और संज्वलन कषाय का सद्भाव इनके सहित वीतरागता)
तब उस मनुष्य का (मुनि का) बाह्य आचरण भी तदनुकूल रहता है । उसका
वर्णन चरणानुयोग के विभिन्न ग्रंथों में लिखा हुआ है । शरीर की इन क्रियाओं
को उपचार से चारित्र कहा जाता है । ऐसा कहना १००% सही होनेपर
भी वैसा ही मानना और मात्र बाह्य क्रियाओं को ही चारित्र मानना १००%
गलत है । जैसे कथन में ‘घी का घड़ा’ ऐसा हम कहते हैं परंतु उस समय
मान्यता में ‘जिस घड़े में घी रखा है वह घड़ा’ ऐसा यथार्थ मानते हैं ।
उसीतरह देह के आचरण को चारित्र कहने में दोष नहीं परंतु उस समय
मान्यता में ‘जिस देहधारी जीव के चारित्र गुण की सकल चारित्र यह वीतराग
पर्याय है उस देह की क्रिया’ ऐसा यथार्थ मानना चाहिए, तो ही वह कथन
भी यथार्थ होगा ।
वस्तुव्यवस्था अर्थात् तत्त्वों का सत्य स्वरूप न जानने से जीव परपदार्थों
को अथवा संयोगों को इष्ट अथवा अनिष्ट मानता है । जो पदार्थ इष्ट भासित
होते हैं उनके प्रति अनुराग उत्पन्न होने से उन पदार्थों को प्राप्त करने की
चेष्टा करता है और जो पदार्थ अनिष्ट भासित होते हैं उनके प्रति द्वेष उत्पन्न
होने से उन पदार्थों को दूर करने की इच्छा होती है तब वैसी चेष्टा करता
है । इससे ज्ञात होता है कि परपदार्थ या संयोग रागद्वेष के कारण नहीं होते
परंतु मिथ्यात्व (अतत्त्वश्रद्धान) यही कषायों का कारण है । तत्त्वों के संबंध में
विपरीत श्रद्धा, विपरीत ज्ञान एवं तदनुसार होनेवाला विपरीत आचरण इसी को
मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र कहते हैं । अनादि से चला आ रहा
यह मिथ्यात्व सहज ही याने उपजते ही याने निसर्गज है, इसे अगृहित
मिथ्यात्व कहते हैं । तथा कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्र के उपदेश से नया ग्रहण
किया हुआ मिथ्यात्व ‘गृहित मिथ्यात्व’ है ।

अन्य पशु-पंछियों को तो केवल अगृहित मिथ्यात्व है । परंतु मानवजाति
ने यहाँ भी अपना वर्चस्व (?) दिखा दिया । अगृहित मिथ्यात्व तो था ही,
ऊपर से गृहित मिथ्यात्व को अंगीकार करके वह तीव्र मिथ्यात्वी हुआ ।

सत्य बात यह है कि इस मानव जीवन में करने लायक एक ही
बात है ‘सम्यग्दर्शन की प्राप्ति एवं वीतरागता की वृद्धि’ । प्रत्येक जैन शास्त्र
में इसी का उपदेश दिया है । श्रावकाचार ग्रंथों में भी सर्वप्रथम सम्यग्दर्शन
अधिकार है क्योंकि श्रावक का सर्वप्रथम कर्तव्य सम्यग्दर्शन प्राप्त करना
यही होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को ही धर्म
अर्थात् मोक्षमार्ग कहते हैं । आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में सर्वप्रथम
बताया है -

‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ।’

तत्त्वों के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं । तथा आचार्य समंतभद्र
रत्नकरंड श्रावकाचार में कहते हैं -

‘सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वराः विदुः’ तथा ‘श्रद्धानं परमार्थानाम्
आप्त आगम तपोभृताम्’ सच्चे देव, गुरु, शास्त्र के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन
कहते हैं ।

तुम्हें कदाचित् संभ्रम होगा कि तत्त्वों के श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन करना
चाहिए कि सच्चे देव, गुरु, शास्त्रों के श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन ? अरी, दोनों एक
ही है । तत्त्वों का स्वरूप जाननेपर यह बात तुम्हारें ध्यान में आ जायेगी ।
इसमें सबसे पहले आवश्यक नियम तो यह है कि ये तत्त्व - अरिहंतों
ने - जिनेंद्रों ने बताये हुये तत्त्व ही होना जरूरी है । क्योंकि अन्यमतियों में
भी उनके अपने तत्त्व हैं और वे भी ‘हम आपको मुक्ति दिलाते हैं’ ऐसा दावा
करते हैं । मोक्षमार्गप्रकाशक ग्रंथ में ‘विविध मत समीक्षा’ नामक पांचवां
अध्याय पढ़नेपर विस्तृत जानकारी मिलेगी । छहढ़ाला में कहा है, ‘तातें जिनवर
कथित तत्त्व अभ्यास करिजे’ ।
ये प्रयोजनभूत सात तत्त्व हैं । हाँ, हाँ, मुझे पता है कि अब तुम
प्रश्नों की बरसात करोगी कि तत्त्व का मतलब क्या है ? प्रयोजन याने
क्या ? प्रयोजन तत्त्व का अर्थ क्या होता है ? वे सात ही क्यों हैं और उनके
नाम क्या है ?
तत्त्व याने तत् + त्व = ‘वह पना’, उस वस्तु का वह भाव, वस्तुपना ।
जैसे वृद्धत्व का अर्थ वृद्धपना, मातृत्व का अर्थ मातृपना होता है ।
प्रयोजन याने हेतु अर्थात् कारण । किसी विद्यार्थी से पूछा आपकी पढ़ाई
का प्रयोजन क्या है ? तब वह कहता है मुझे डॉक्टर बनना है यह मेरा
प्रयोजन है । व्यापार करनेवाले का प्रयोजन है धन प्राप्त करके धनवान बनना,
भोजन करनेवाले का प्रयोजन है भूख मिटाना । प्रत्येक जीव का प्रयोजन दुःख
दूर करने अर्थात् सुखी होने का है । ऐसी जो बातें हैं जिनका ज्ञान प्राप्त
करके और जिनकी दृढ़ श्रद्धा - प्रतीति - ये बातें ऐसी ही हैं अन्यथा नहीं ऐसा
पक्का विश्वास - निर्णय हुये बिना हमारा दुःख दूर नहीं होगा और सुख प्राप्त
नहीं होगा उन बातों को प्रयोजनभूत तत्त्व कहते हैं ।
अप्रयोजनभूत बातें जैसी हैं वैसी जानना, मानना अथवा विपरीत मानना
इस कारण से मिथ्यादर्शन नहीं होता परंतु प्रयोजनभूत बातें - तत्त्व अन्यथा
मानने से मिथ्यादर्शन होता है । छहढ़ाला में पं. दौलतरामजी कहते हैं,
‘जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधैं तिनमाहि विपर्ययत्व’ ।
अपना प्रयोजन क्या है ? दुःख दूर करना । किसका ? ‘स्व’ का ।
उसके लिए -
(१) सर्वप्रथम ‘स्व’ कौन है - मैं कौन हूँ इसे जाने बिना ‘स्व’ का
दुःख दूर कैसे होगा ? ‘स्व’ को जानने के लिए ‘स्व’ और पर (आपा पर)

का ज्ञान आवश्यक है ।
(२) ‘स्व’ और पर को एक जानकर पर का उपचार करने से ‘स्व’
का दुःख कैसे दूर होगा ?
(३) ‘स्व’ से पर भिन्न है इसलिए पर में अहंकार ममकार करने
से दुःख ही होता है ।
(४) ‘स्व’ और पर का ज्ञान होने से ही दुःख दूर होगा ।
इसमें स्वतत्त्व है जीवतत्त्व और परतत्त्व हैं अजीवादि तत्त्व । इन अजीवादि
तत्त्वों में हम अब तक एकत्व - अहंकार, ममत्व - ममकार प्रेम करते आये हैं
और दुःखी हो रहे हैं । तुम कहोगी अजीवादि तत्त्व मेरे अपने नहीं हैं तो उन्हें
जाने ही क्यों ? उसका उत्तर है कि पर को जानने में बाधा नहीं है, पर को
अपना मानने में बाधा-नुकसान है । जानने के कारण नुकसान होता तो
केवलज्ञानी संपूर्ण लोकालोक को जानते हैं फिर भी वे अनंत सुखी हैं । स्वतत्त्व
को-जीवतत्त्व को यह मैं हूँ ऐसा जानना है और पर - अजीवादि तत्त्वों को ये
मैं नहीं हूँ ऐसा जानना हैं ।
हमारा प्रयोजन है सुख प्राप्त करना । अनंत सुख मोक्ष में है इसलिए
मोक्षतत्त्व का स्वरूप जानना भी आवश्यक है । कहो तो, मोक्ष कहाँ है ?
स्वर्ग के ऊपर या नीचे ? चक्कर में पड़ गयी ना ? अरी, जहाँ बंध है वहीं
मोक्ष होता है । बंध जीव में होता है और मोक्ष भी जीव में ही होनेवाला
है । बंध और मोक्ष तो जीव की ही अवस्थायें हैं । जीवतत्त्व और अजीवतत्त्व
द्रव्यतत्त्व हैं, अन्य सब तत्त्व उन्हीं की अवस्थायें - पर्यायतत्त्व हैं । बंध का
अभाव होकर मोक्ष होनेवाला है इसलिए मोक्षतत्त्व और बंधतत्त्व का ज्ञान
जरूरी है । इसमें बंध का कारण है आस्रव तत्त्व इसलिए उसे जानना भी
आवश्यक है और मोक्ष का कारण याने मोक्ष का उपाय है संवर और निर्जरा
तत्त्व इसलिए उन्हें यथार्थ जानना भी जरूरी है ।
इसप्रकार ये सात तत्त्व हुये कि जिन्हें जानकर यथार्थ प्रतीति करना
यह सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है । अब इन्हीं तत्त्वों के नाम फिर से क्रम
से लिख रही हूँ- जीव, अजीव, आसव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष । कितना
आसान है ना ? ये नाम तुरन्त याद हो जाते हैं ।

रीना, तुमने पूना शिबिर में देखा है ना, कि ३ साल की सानिका,
५ साल की नताशा, ७ साल का रौनक तथा पीयुष, सुनय, आकाश ये छोटे-
छोटे बच्चे भी छह द्रव्य, सात तत्त्वों के नाम फटाफट बोल देते थे !
गत पत्र में चारित्र गुण की चर्चा में कौनसे कषायों के अभावपूर्वक
कौनसा चारित्र होता है यह हमने देखा था । इन सब के नाम भी बड़े बच्चों
को याद हो गये थे । ४ थी, ५ वी क्लास से लेकर डेंटल - इंजिनियरिंग
कॉलेज तक के ये बच्चे - आशित, दर्शन, प्राचि, नेहा, पूर्वा, सायली, पल्लवी,
मोनिका, अभिजीत, अमित, सुदीप और अन्य भी अनेक, एक दो शिबिरों में
ही इतने परफेक्ट तैयार हो गये हैं कि वे बधाई के पात्र हैं । अंग्रेजी मिडियम
में पढ़नेवाले ये बच्चे रोज साड़ेआठ घण्टे सभी प्रवचनों में उपस्थित रहते थे,
शिबिर की व्यवस्था में जुड़ जाते थे, शाम ६ बजने से पूर्व भोजन करके रीना
तुम्हारे क्लास में आकर बैठते थे । आजकल के बच्चों की आकलन शक्ति
(Grasping Power) बहुत है । पढ़ानेवाले का उत्साह द्विगुणित होता है ।
आज प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी मामुली सी पहचान हुयी । आगामी
कुछ पत्रों द्वारा हम विस्तृत चर्चा करेंगे । निम्नलिखित बातों पर हम विचार
करेंगे ।
तत्त्व किसे कहते हैं ? प्रयोजनभूत तत्त्व कौनसे हैं और कितने हैं ?
तत्त्वों के नाम तथा लक्षण के बारे में विस्तृत चर्चा, प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी
जीव की अनादि से होनेवाली विपरीत मान्यतायें, सात तत्त्वों में हेय, ज्ञेय,
उपादेय तत्त्व कौनसे हैं ? सात तत्त्वों को जानकर उनमें छिपी हुयी आत्मज्योति
कैसे पहचाने ? अर्थात् स्व-पर भेदविज्ञान कैसा करें ? क्योंकि हम शास्त्र-
स्वाध्याय करते हैं, श्रवण वाचन करते हैं वह शब्दज्ञान करने के लिए नहीं
अपितु आत्मज्ञान करने के लिए करते हैं ।
अधिक चर्चा फिर करेंगे । उसके पूर्व १४ मई से ३१ मई तक हम
देवलाली शिक्षण प्रशिक्षण शिबिर में जा रहे हैं ।
तुम्हारी माँ
रीना, तुमने पूना शिबिर में देखा है ना, कि ३ साल की सानिका,
५ साल की नताशा, ७ साल का रौनक तथा पीयुष, सुनय, आकाश ये छोटे-
छोटे बच्चे भी छह द्रव्य, सात तत्त्वों के नाम फटाफट बोल देते थे !

गत पत्र में चारित्र गुण की चर्चा में कौनसे कषायों के अभावपूर्वक
कौनसा चारित्र होता है यह हमने देखा था । इन सब के नाम भी बड़े बच्चों
को याद हो गये थे । ४ थी, ५ वी क्लास से लेकर डेंटल - इंजिनियरिंग
कॉलेज तक के ये बच्चे - आशित, दर्शन, प्राचि, नेहा, पूर्वा, सायली, पल्लवी,
मोनिका, अभिजीत, अमित, सुदीप और अन्य भी अनेक, एक दो शिबिरों में
ही इतने परफेक्ट तैयार हो गये हैं कि वे बधाई के पात्र हैं । अंग्रेजी मिडियम
में पढ़नेवाले ये बच्चे रोज साड़ेआठ घण्टे सभी प्रवचनों में उपस्थित रहते थे,
शिबिर की व्यवस्था में जुड़ जाते थे, शाम ६ बजने से पूर्व भोजन करके रीना
तुम्हारे क्लास में आकर बैठते थे । आजकल के बच्चों की आकलन शक्ति
(Grasping Power) बहुत है । पढ़ानेवाले का उत्साह द्विगुणित होता है ।

आज प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी मामुली सी पहचान हुयी । आगामी
कुछ पत्रों द्वारा हम विस्तृत चर्चा करेंगे । निम्नलिखित बातों पर हम विचार
करेंगे ।

तत्त्व किसे कहते हैं ? प्रयोजनभूत तत्त्व कौनसे हैं और कितने हैं ?
तत्त्वों के नाम तथा लक्षण के बारे में विस्तृत चर्चा, प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी
जीव की अनादि से होनेवाली विपरीत मान्यतायें, सात तत्त्वों में हेय, ज्ञेय,
उपादेय तत्त्व कौनसे हैं ? सात तत्त्वों को जानकर उनमें छिपी हुयी आत्मज्योति
कैसे पहचाने ? अर्थात् स्व-पर भेदविज्ञान कैसा करें ? क्योंकि हम शास्त्र-
स्वाध्याय करते हैं, श्रवण वाचन करते हैं वह शब्दज्ञान करने के लिए नहीं
अपितु आत्मज्ञान करने के लिए करते हैं ।

अधिक चर्चा फिर करेंगे । उसके पूर्व १४ मई से ३१ मई तक हम
देवलाली शिक्षण प्रशिक्षण शिबिर में जा रहे हैं ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक २० — सात तत्त्वों का स्वरूप (भाग १) | Patrānk 20 — Sāt Tattvõ kā Svarūp (Bhāg 1)

१० जून १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
जिनेन्द्र कथित तत्त्वों के अभ्यास में तुम्हारी बढ़ती हुयी रुचि को देखकर
मुझे आनंद होता है । अरी, ये तत्त्व ही ऐसे न्याययुक्त और तर्कसंगत हैं ।
उनका क्रमवार अभ्यास करने से वे सहज समझ में आते हैं ।
छह द्रव्य, सात तत्त्व, चार अभाव, छह कारक, पांच भाव, निमित्त
उपादान आदि का प्राथमिक ज्ञान होनेपर शास्त्रों के अर्थ सहज समझ में आते
हैं और मर्म समझने से उस विषय में रस बढ़ता है, रुचि बढ़ती है ।
छह द्रव्यों के बारे में हम अभ्यास कर चुके हैं । यह विश्व छह द्रव्यों
के समूह से बना हुआ है यह हमने देखा । प्रत्येक द्रव्य के सामान्य-विशेष
गुणों की भी चर्चा की । प्रत्येक द्रव्य का अस्तित्व भिन्न-भिन्न है, प्रत्येक द्रव्य
की सत्ता अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में ही मर्यादित है, द्रव्य उत्पादव्ययध्रुवता
से युक्त है अर्थात् प्रत्येक समय में नवीन पर्याय का उत्पाद और पूर्व पर्याय
का नाश होनेपर भी द्रव्य ध्रुवपने से कायम रहता है ये सब बातें हमने
विस्तारपूर्वक देखी हैं ।
यह सब पढ़ते समय एक बात का सदा स्मरण रखना है कि मुझे
अपने को पहचानना है तो इन छह द्रव्यों में मेरा स्थान कौनसा है ? उत्तर
है - मैं एक स्वतंत्र जीवद्रव्य हूँ । मेरा अस्तित्व मेरे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव
में है और मैं गुणपर्यायों से युक्त हूँ । ये पर्यायें प्रतिसमय पलटनेपर भी मैं
ध्रुवरूप से कायम टिका हुआ हूँ । वस्तुस्थिति ऐसी होनेपर भी ‘मैं एक
जीवद्रव्य + अनंत पुद्गल परमाणु’ ऐसे अनेक द्रव्यों की असमानजातीय
द्रव्यपर्याय-मनुष्यपर्याय को ही मैंने ‘स्व’ माना और इसीकारण मेरे सुखी होने
के प्रयत्न निष्फल रहे, व्यर्थ साबित हुये ।
द्रव्यों का अभ्यास करने के पश्चात् अब हमें प्रयोजनभूत तत्त्वों का
अभ्यास करना है । द्रव्यों के अभ्यास में और तत्त्वों के अभ्यास में अंतर
है । फोटो के दृष्टांत से तुम्हें तुरन्त समझ में आयेगा । तुम्हारे शादी के
बड़े ग्रुप फोटो याद है ना ? बीस-पच्चीस लोगों के भीड़ में हम खड़े रहते
हैं और सब की एक फोटो - ग्रुप फोटो निकाली जाती है उसमें चींटी जितने
दिखायी देते हैं । परंतु एक ही व्यक्ति का Close-up होगा, केवल एक
तुम्हारा नजदीक से लिया गया फोटो होगा तो उसमें सब सूक्ष्मता से - नाक,
आँखे, गहने, कपड़े सब कुछ स्पष्टरूपसे दिखायी देते हैं । द्रव्यों का अभ्यास
ग्रुप फोटो जैसे है और तत्त्वों का अभ्यास Close-up फोटो के समान है ।
गत पत्र में हमने प्रयोजन किसे कहते हैं, प्रयोजनभूत का तात्पर्य क्या है, तत्त्व
का मतलब क्या होता है ये सारी बातें देखी । जब मेरा प्रयोजन सुखी होने
का है, तब वह सुख प्राप्त करने के लिए कुछ बातों का ज्ञान होना अत्यंत
आवश्यक है । जिन बातों का ज्ञान हुये बिना अपना दुःख दूर नहीं होगा और
सुख प्राप्त नहीं होगा उन बातों को प्रयोजनभूत तत्त्व कहते हैं ।

जीवतत्त्व, अजीवतत्त्व, आस्रवतत्त्व, बंधतत्त्व, संवरतत्त्व, निर्जरातत्त्व और
मोक्षतत्त्व ये सात तत्त्व हैं । जीव और अजीव ये द्रव्यतत्त्व हैं और अन्य पांच
तत्त्व पर्यायतत्त्व हैं अर्थात् वे जीव और कर्म की अवस्थायें हैं । प्रथम हम
सरल और साधारण परिभाषा देखेंगे, बाद में उसका विस्तार करेंगे ।

जीवतत्त्व - जिसमें ज्ञानदर्शन, आनंद है वह ज्ञानानंदस्वभावी आत्मा
जीवतत्त्व है । अजीवतत्त्व – जिसमें ज्ञानदर्शन आनंद नहीं हैं ऐसे पुद्गल,
धर्म, अधर्म, आकाश और काल अजीवतत्त्व हैं । परंतु यह तो जीव और अजीव
तत्त्व की सामान्य परिभाषा - आगम भाषा हुयी । तत्त्वों के माध्यम से हमें
अपनी स्वयं की पहचान करनी है इसलिए इसी परिभाषा को थोड़ा सुधारकर
अध्यात्म भाषा में लिखना पड़ेगा वह इसतरह –

(१) जीवतत्त्व – जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन आनंद हैं वह जीवतत्त्व है ।

(२) अजीवतत्त्व – जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन आनंद नहीं हैं ऐसे मुझे
छोड़कर अन्य अनंत जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये
सब अजीवतत्त्व में आते हैं । देखो तो सही, अपेक्षा बदलते ही कथन भी
बदल गया |

मेरी अपेक्षा से अन्य सब जीव अजीवतत्त्व में सामिल होते हैं ।
क्या ? अरिहंत और सिद्ध भी अजीवतत्त्व ? इसे सुनते ही बड़ी खलबली
मचती है । यह बात सुनकर मेरे चचेरे भाई अविनाश ने कहा था, ‘अरी
बहन ! मुझे तो रातभर नींद नहीं आयी । अरिहंत और सिद्ध अजीवतत्त्व में
आते हैं ?’ एक तत्त्व का स्वरूप सुनकर अगर नींद उड़ जाती हो तो सात
तत्त्वों का यथायोग्य अभ्यास करके अनादि की मोहनिद्रा उड़ जायेगी और
सम्यक्त्व की प्राप्ति होगी इसमें क्या आश्चर्य है ?

(३) आस्रवतत्त्व – शुभाशुभ विकारी भाव उत्पन्न होना आस्रवतत्त्व
है । यह तो हुयी स्थूल परिभाषा । विस्तार से देखा जाये तो मिथ्यात्व,
अविरति (अव्रत परिणाम), प्रमाद, कषाय और योग ये जीव के परिणाम आस्रव
हैं । इन्हें भाव + आस्रव = भावास्रव कहते हैं । यह तो जीव की अवस्था
है । कर्म की अपेक्षा से देखनेपर उसी समय में ‘नवीन कर्मों का आना’
इसको द्रव्य + आस्रव = द्रव्यासव कहते हैं ।

(४) बंधतत्त्व – इसमें भी भावबंध और द्रव्यबंध ऐसे जीव और
कर्म की अपेक्षा से दो भेद हैं । शुभाशुभ विकारी भावों में (मोह रागद्वेष
में) अटकना भावबंध है और नवीन कर्मों का पुराने कर्मों के साथ बंध
जाना द्रव्यबंध है । कर्म के आने को आस्रव कहते हैं, कर्म के बंधन को
बंध कहते हैं ।

(५) संवरतत्त्व – आस्रव का रुक जाना इसे संवर कहते हैं । आत्मा
के अनुभव में लीन रहनेपर याने शुद्धोपयोग में जीव को मोह, राग, द्वेष
उत्पन्न नहीं होते इसलिए उसे आसव और बंध नहीं होते । आस्रवों के रुकने
को ही संवर कहते हैं । भावसंवर अर्थात् शुभाशुभ भावों का उत्पन्न न
होना परंतु यह तो नास्ति का कथन हुआ । अस्ति से कथन करना हो तो
वीतरागता की याने शुद्धि की उत्पत्ति होना भावसंवर है । द्रव्यसंवर अर्थात्
‘नवीन कर्मों का आना रुक जाना’ । अभी तो स्थूलरूप से इतना ही याद
रखना । उसके विस्तार में जानेपर ज्ञात होगा कि मिथ्यात्व का आस्रव रुकनेपर
अन्य आस्रव (अविरति आदि) चालू रहते हैं और वीतरागता की वृद्धि के साथ
वे भी रुक जाते हैं ।

(६) निर्जरातत्त्व – शुद्धि की वृद्धि होना इसे भावनिर्जरा कहते हैं ।
भावनिर्जरा में कषायों का उत्तरोत्तर अभाव और वीतरागता की वृद्धि होती है ।
कर्मों के बारे में कहना हो तो पूर्व में बंधे हुये कर्म जीव के वीतराग परिणामों
के कारण बहुत भारी मात्रा में खिर जाते हैं, निकल जाते हैं, जीव उन
कर्मफलों को नहीं भोगता उसे द्रव्यनिर्जरा कहते हैं । संवर अर्थात् नवीन कर्म
नहीं आते और निर्जरा अर्थात् पूर्व में जीव के साथ बंधे हुये कर्म बड़ी संख्या
में निकल जाते हैं - खिर जाते हैं । इसलिए संवर और निर्जरा के कारण जीव
से बंधे हुये कर्म उत्तरोत्तर कम होते जाते हैं ।
(७) मोक्षतत्त्व – पूर्ण वीतरागता, पूर्ण शुद्धि का प्रगट होना यह है
भावमोक्ष और कर्मों का संपूर्ण अभाव होना यह है द्रव्यमोक्ष । मिथ्यात्व,
अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये आसव अर्थात् बंध के कारण नष्ट होते
हैं और पूर्वबद्ध कर्मों का संपूर्ण अभाव होता है, वही मोक्ष है ।
उक्त विवेचन से अब इस बात का ज्ञान हुआ होगा कि आसव, बंध,
संवर, निर्जरा और मोक्ष जीव की एवं कर्म की अवस्थायें हैं । जीवद्रव्य की
बात आती है तब हम पर्यायों सहित अखंड द्रव्य का विचार करते हैं परंतु जब
तत्त्वों की बात आती है, तब पर्यायों को स्वतंत्र स्थान देकर उनके स्वरूप का
अलग कथन किया जाता है । स्वतत्त्व याने जीवतत्त्व को एक बाजू में रखते
ही विश्व की समस्त बातें परतत्त्व में-अजीवादि तत्त्व में आती हैं ।
तुम्हें राजा हरिश्चंद्र की कहानी मालूम ही है । एक बार राजा हरिश्चंद्र
का नाटक चल रहा था । हरिश्चंद्रपर आयी हुयी आपत्तियों को देखकर सारे
प्रेक्षक अश्रु की धारा में डूब गये । उससमय एक स्त्री बड़ी शांति से नाटक
के दृश्य देख रही थी । उसके बाजूवाली स्त्री से रहा नहीं गया, रोते-रोते ही
उसने उस स्त्री से पूछा, ‘कैसी दुष्ट हो तुम ? तुझे कुछ भी दुःख कैसे नहीं
हो रहा ?’ तब उस स्त्री ने उत्तर दिया, ‘अरी पगली, वह तो मेरा पति
है । हरिश्चंद्र का कितना भी अच्छा स्वांग धारण करे - भूमिका के साथ
कितना भी तन्मय (समरस) दिखायी दे, फिर भी वह जो है वही है । उसके
रूप में, स्वभाव में रंचमात्र अंतर पड़नेवाला नहीं है ।’
उसीप्रकार ये सातों तत्त्व भिन्न-भिन्न हैं । जीव की ही अवस्थायें होनेपर
भी इनसे जीवतत्त्व (स्वतत्त्व) भिन्न तत्त्व है । यह जीव शरीर के संयोग
में रहते हुये भी शरीर से याने अजीवतत्त्व से भिन्न है । यह जीव क्रोधादि
रूप प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर भी जीवतत्त्व भिन्न है और रागादि आस्रव तत्त्व
भिन्न है ।
जैसे हम मलीन कपड़ा देखते हैं । उस मलीन अवस्था में भी कपड़ा
भिन्न है और मैल भिन्न है । दोनों का अस्तित्व भिन्न है, दोनों का लक्षण

  • स्वरूप भिन्न है और इसी वजह से वे भिन्न हो सकते हैं । T. V. पर
    साबुन की इश्तहार (Advertisement) में भी यही तो बताते हैं । अंतर
    इतना है कि उनकी दृष्टि द्रव्यपर (धनपर) है और हमें द्रव्यदृष्टि करना है
    अर्थात् दृष्टि याने ज्ञान और श्रद्धा द्रव्यपर याने ‘स्व’ तत्त्वपर केंद्रित करनी
    है । मिथ्यात्व, राग-द्वेषों से युक्त मलीन अवस्था में भी जीवतत्त्व भिन्न है,
    त्रिकाल शुद्ध चैतन्यमय एकरूप है और मोहरागद्वेषरूप मलीनता भिन्न है ।
    कपड़ा मैला होनेपर भी कपड़ा साफ है (स्वच्छ है) ऐसी पूर्ण श्रद्धा
    होगी तो ही मैल दूर करने का उपाय हो सकता है । उसीप्रकार मिथ्यात्व,
    कषायों से सहित जीव में भी जीव तो सदा पूर्ण शुद्ध, निर्मल, ध्रुव, चैतन्यमय
    ही है ऐसी पूर्ण श्रद्धा हुये बिना मिथ्यात्वरूपी मैल दूर करने का उपाय नहीं
    हो सकता । देखो, अब जरा ध्यान से देखना । जीव की अवस्था मलीन है
    ऐसा ज्ञान होगा और उसीसमय श्रद्धा में जीव का स्वरूप शुद्ध है ऐसी श्रद्धा
    होगी तो ही मलीन अवस्था नष्ट करने का प्रयत्न हो सकता है । अगर
    मलीन अवस्था का ज्ञान ही नहीं होगा तो मलीन अवस्था को टालने का उपाय
    ही क्यों करें ? और मलीनता को ही अपना स्वरूप है ऐसी श्रद्धा करेगा तो
    भी मलीनता हटाने का उपाय कैसे करें ?
    अवस्थासहित याने पर्यायसहित द्रव्य में पर्यायरहित जो अंश (द्रव्यांश) है
    उसका विचार कैसे करना इसकी चर्चा हम अगली बार करेंगे ।
    इन सात तत्त्वों का सूक्ष्मता से अभ्यास करना अति आवश्यक है ।
    क्योंकि संपूर्ण अध्यात्मशास्त्र ही इन तत्त्वोंपर आधारित है, तत्त्वों की भाषा में
    है । तत्त्वों के संबंध में हमारी मान्यता विपरीत रहेगी तो अध्यात्मशास्त्र
    पढ़कर भी हमारे पल्ले कोई लाभ नहीं पड़ेगा ।
    सात तत्त्वों संबंधी शेष विवेचन आगामी कई पत्रों द्वारा देखेंगे ।
    तुम्हारी माँ

पत्रांक २१ — सात तत्त्वों का स्वरूप (भाग २) | Patrānk 21 — Sāt Tattvõ kā Svarūp (Bhāg 2)

८ जुलाई १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
सात तत्त्वों का साधारण स्वरूप गत पत्र में हमने देखा है । आज
जीव-अजीव इन दो तत्त्वों के संबंध में अधिक जानकारी लेंगे ।
मैं स्वयं जीवतत्त्व हूँ, इसलिए मुझे उसका ज्ञान करना ही चाहिए और
अजीवतत्त्व को जानना इसलिए जरूरी है कि ‘वह मैं नहीं हूँ’ इस बात को
समझने के लिए; क्योंकि हम अनादि से अजीव को जीव मानते आ रहे हैं
अथवा जीव और अजीव दोनों को एक मान रहे हैं । यह जीवतत्त्व क्या है
इसे हम प्रथम देखेंगे ।
छहढ़ाला में पं. दौलतरामजी लिखते हैं, “चेतन को है उपयोग रूप,
बिनमूरत चिनमूरत अनूप” । समयसार ग्रंथ में आचार्य कुंदकुंद कहते हैं,
“अहमेक्को खलु सुद्धो दंसणणाणमइओ सदारूवी” अर्थात् “मैं एक, शुद्ध,
सदा अरूपी ज्ञानदर्शनमय हूँ, अन्य कुछ भी - परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है ।”
समयसार नाटक में पं. बनारसीदासजी कहते हैं, “चेतनरूप अनूप अमूरत,
सिद्ध समान सदा पद मेरो ।” तत्त्वार्थसूत्र नामक ग्रंथ में आचार्य उमास्वामी
ने “उपयोगो लक्षणम्” ऐसा जीव का स्वरूप बताया है । मोक्षमार्गप्रकाशक
में पं. टोडरमलजी लिखते हैं, “अमूर्तिक प्रदेशों का पुंज, प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों
की धारी, अनादिनिधन वस्तु आप है और मूर्तिक पुद्गल द्रव्यों का पिंड,
प्रसिद्ध ज्ञानादिकों से रहित, जिनका नवीन संयोग हुआ है ऐसे शरीरादिक
पुद्गल पर हैं ।” आत्मसिद्धि शास्त्र में श्रीमद् राजचंद्र कहते हैं, “शुद्ध बुद्ध
चैतन्यघन स्वयं ज्योति सुख धाम ।”
ये सब कथन विभिन्न होनेपर भी सभी का अर्थ एक ही है । जीवतत्त्व
का ही यह वर्णन है । सर्वज्ञ भगवान ने जाना हुआ और बताया हुआ जीव
का स्वरूप संतों ने स्वयं अनुभव में जाना और बाद में शास्त्रों में बताया ।
हमें भी ऐसा स्वयं का अनुभव करना है ।

यहाँपर अब हम पहले जीवद्रव्य का विचार करेंगे । द्रव्य गुणपर्यायों
से युक्त होता है इस बात को हम जानते ही हैं । प्रत्येक समय में कोई ना
कोई पर्याय विद्यमान रहती ही है इसका तात्पर्य यह है कि द्रव्य पर्यायों से
युक्त ही होता है, पर्यायों से भिन्न नहीं हो सकता । पर्यायरूप से प्रतिसमय
बदलनेपर भी, द्रव्यरूप से नित्य वैसा ही और वही है । प्रत्येक द्रव्य-प्रत्येक
वस्तु हमें दो अंशों में दिखायी देती है । एक नित्य कायम रहनेवाला ध्रुव अंश
और एक सदा नया उत्पन्न और विनाश होनेवाला पर्याय अंश । इस नित्य
अंश को हम द्रव्यांश और अनित्य अंश को पर्यायांश कहेंगे । द्रव्यांश याने
नित्य अंश, नित्य होने से अनादिकाल से अनंतकाल तक है उसरूप में कायम
रहनेवाला है उसमें कुछ भी बदल या वधघट नहीं हो सकती । वही का वही

  • एकरूप ऐसा जो यह द्रव्यांश है उसे ही त्रिकाली, ध्रुव, परमपारिणामिक,
    एक, शुद्ध भाव कहते हैं ।
अपेक्षा वस्तु द्रव्यांश पर्यायांश
द्रव्य सामान्यविशेषात्मक सामान्य विशेष
क्षेत्र भेदाभेदात्मक अभेद भेद
काल नित्यानित्यात्मक नित्य अनित्य
भाव एकानेकात्मक एक अनेक

उक्त कोष्टक (Table) से यह बात ध्यान में आती है कि वस्तु का यह
द्रव्यांश सामान्य, अभेद, नित्य और एक है; सदा वैसे का वैसा कायम रहनेवाला
है, परिपूर्ण है । उसमें पूर्णता कहीं बाहर से नवीन लाने की जरूरत नहीं है
वह सदा ही पूर्ण है । वस्तु का पर्यायांश विशेष, भेदरूप, अनित्य एवं अनेकरूप
है । समयमात्र में बदलनेवाला है । द्रव्यांश की अपेक्षा से देखा जाये तो सभी
जीव समान ही हैं और पर्यायांश की अपेक्षा से देखनेपर अनेक भेद दिखायी
देते हैं । जैसे संसारी और मुक्त शरीर और कर्मों के संयोग की अपेक्षा से
हैं, अल्पज्ञ और सर्वज्ञ यह भेद ज्ञान की पर्याय के कारण पड़ता है, श्रावक-
मुनि ऐसा भेद चारित्र गुण की विशिष्ट पर्याय के कारण पड़ता है, एकेंद्रिय,
द्वींद्रिय आदि भेद शरीर का संयोग एवं ज्ञान के उघाड़ के कारण होते हैं ।
पर्यायांश की तरफ दृष्टि देनेपर ये सब भेद विद्यमान हैं । वह सत्य परिस्थिति
है फिर भी पर्यायांश की तरफ की आँख बंद करने से, दृष्टि में उस अंश
को गौण करके केवल द्रव्यांश की तरफ देखनेपर यह द्रव्यांश-ध्रुवांश सदा है
उसरूप - ज्ञानदर्शनमय है । प्रत्येक जीव का यह द्रव्यांश समान है । जैसा
सिद्ध भगवान का है वैसा निगोद के जीव का है । जैसा अनादिकाल पहले
था वैसा ही आज भी है ।

यह जो ध्रुव, नित्य, ज्ञानमय द्रव्यांश है वही जीवतत्त्व है । हमारा
प्रयोजन स्वतत्त्व से है इसलिए ‘यह मैं ज्ञानमय नित्य ध्रुव’ ऐसा स्वतत्त्व
याने मैं अर्थात् जीवतत्त्व हूँ इसतरह स्वयं की पहचान हमें करनी है ।
जीवद्रव्य और जीवतत्त्व में जो अंतर है वह अब स्पष्ट हो गया होगा । द्रव्य
कहते ही ‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् । सत् द्रव्यलक्षणम् ।’ यह बात ध्यान में
आती है । इसमें उत्पाद-व्यय यह पर्यायांश है और ध्रौव्य याने ध्रुवता यह
द्रव्यांश है । जीवतत्त्व कहते ही शुद्ध-अशुद्ध पर्यायों से भिन्न त्रिकाली शुद्ध
स्वरूप अर्थात् उत्पादव्यय को गौण करके मात्र ध्रुव तत्त्व - परमपारिणामिक
भाव ऐसा अर्थ होता है । पर्याय को कभी भी द्रव्य से हटा नहीं सकते, भिन्न
नहीं कर सकते । फिर भी यह सारा प्रयत्न-प्रयोग अपने ज्ञान में ही, श्रद्धा
में ही करना है ।

जिसप्रकार सोने के अनेक गहने कंगन, हार, अंगूठी, कमरपट्टा आदि
विविध अवस्थायें होते हुये भी जब हम मात्र ‘सोना’ की दृष्टि से देखते हैं
तब ये अवस्थायें हमारी नजर में गौण होकर सोना कितना है इसे हम
देखते हैं । अथवा जिसप्रकार अमेरिकन, भारतीय, जापानी, आफ्रिकन आदि
विभिन्न वंशीय मनुष्यों में शरीर की रचना, रंग, लम्बाई, केश इनमें अनेक
भेद होनेपर भी मनुष्यत्व की अपेक्षा से सब समान ही हैं, सब मानव ही
हैं । उसीप्रकार पर्यायों की अपेक्षा से जीवों के विभिन्न भेद दिखायी देनेपर
भी जीवतत्त्व की अपेक्षा से, ध्रुव द्रव्यांश की अपेक्षा से सब जीव समान ही
हैं । इसी वज़ह से ‘मम स्वरूप है सिद्ध समान’ ऐसा कहते हैं । अगर
कोई व्यक्ति पर्यायांश में स्वयं को सिद्ध समान मानता होगा तो उसकी
मान्यता मिथ्या होगी ।

सिद्ध भगवंतों में जैसा द्रव्यांश है, जैसा परिपूर्ण सामर्थ्य है वैसा पर्याय
में पूर्णतः प्रगट हुआ है । जैसा द्रव्यांश है वैसी ही प्रगट अवस्था है । वह
प्रगट अवस्था जानकर सिद्धों का द्रव्यांश भी उसीतरह है यह बात ध्यान में
आती है और मेरा भी द्रव्यांश सिद्धों के द्रव्यांश तथा पर्यायांश के समान

है इस बात का ज्ञान होता है । गणित के विषय में तुमने पढ़ा था कि
A = B, B = C, ∴ A = C ।

इसीलिए जिनेंद्र भगवान का दर्शन करना अत्यंत महत्व का है । हमें
जिनदर्शन से निजदर्शन साध्य करना है । जिनेंद्र के प्रगट पर्यायांश द्वारा
उनके द्रव्यांश का ज्ञान होता है और उनके द्रव्यांश के समान ही मैं स्वयं हूँ
इसका ज्ञान होकर दृष्टि स्वसन्मुख होती है । इसीलिए तो प्रवचनसार ग्रंथ
में आचार्य कुंदकुंद ने कहा है, “जो अरहंत को द्रव्यपने, गुणपने एवं पर्यायपने
से जानता है, उसका मोह (मिथ्यात्व) नष्ट होता है ।”

“पर्यायों से भिन्न द्रव्यांश वह मैं हूँ और वही जीवतत्त्व है” यह सूत्र
ज्ञान में आते ही सात तत्त्वों में से आसव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन
पर्यायों से मैं जीवतत्त्व-ध्रुव द्रव्यांश भिन्न हूँ यह समझना अब कठिन नहीं
होगा । पर्यायों में आसव-बंध के होते हुये भी उनसे भिन्न मैं नित्य, त्रिकाली
ध्रुव अंश हूँ यह बात समझते अब देर नहीं लगेगी । अपनी ही पर्यायों से
अपने द्रव्यांश को हम भिन्न देख रहे हैं तो परद्रव्यों का सवाल ही कहाँ उठता
है ? परद्रव्यों से संबंध रहेगा ही कैसे ? इसीलिए अजीवतत्त्व जो परद्रव्य
हैं उनसे जीवतत्त्व भिन्न है यह बात समझना अब आसान है । द्रव्यांश को
याने जीवतत्त्व को देखने के लिए पर्यायों को निकाल बाहर नहीं करना है
उनका नामनिशान भी नहीं मिटाना है - वैसा करना भी तो संभव नहीं है ।
मात्र अपनी नजर पर्यायोंपर से हटाकर, कायम रहनेवाले ध्रुव अंशपर स्थिर
करनी है, उसका आश्रय लेना है । उसीमें ‘मैं’ पना स्थापित होते ही उपयोग
अपने आप उसकी ओर मुड़ जाता है ।

सायन में हमारे घर के सामने मेनरोड होने से एक साथ दस-दस
लेन में कारें और ट्रक चलती हैं और ट्रॅफिक की आवाज निरंतर कानोंपर
आती है । फिर भी अपनी कार का हॉर्न तुम कैसे झट् पहचानती हो; क्योंकि
उसमें अपनेपना का भाव है ।

जीवतत्त्व यह दृष्टि का विषय है । निशानेबाजी करते समय दृष्टि केवल
निशानेपर स्थिर-केंद्रित की जाती है । उससमय अन्य सब चीजों का सद्भाव
है परंतु वे नजर में नहीं आती क्योंकि नजर मात्र एक ही बिंदुपर केंद्रित की
जाती है । उसीप्रकार पर्यायों में अनित्यता, अनेकता, अपूर्णता, मलीनता होनेपर
भी दृष्टि में उन सब को गौण करके मात्र ध्रुव नित्य अंशपर दृष्टि को स्थिर
करने से ‘यही मैं’ ऐसा ‘स्व’ पना स्थापित होनेपर जीवतत्त्व याने स्वतत्त्व
भिन्न अनुभव में आ सकता है ।

तुम कहोगी, ‘इतना ही करना है तो अजीवतत्त्व को जाने ही क्यों ?’
क्योंकि हमें अजीवतत्त्व में अहंबुद्धि, ‘मैं’ पना, एकत्व हो सकता है । परजीव
और अन्य परद्रव्य सभी अजीवतत्त्व हैं क्योंकि श्रद्धा में उन्हें स्थान नहीं है ।
उसके लिए सभी अजीव द्रव्यों को एवं अन्य जीवों को जानते रहने की
जरूरत नहीं है अपितु ये सब अजीवतत्त्व हैं ऐसा जानकर ‘अजीवतत्त्व मैं नहीं
हूँ’ ऐसा ज्ञान करना है । मुख्यरूप से शरीर से भिन्न जानना है क्योंकि
हमारी एकत्वबुद्धि हिमालय पर्वत से नहीं होती, विश्व के अन्य अनंत पदार्थों
से नहीं होती परंतु प्राप्त शरीर से और संयोगों से होती है ।

हम केवल शरीर के साथ एकत्व करके रुकते नहीं है तो क्रोधादि
कषायों से भी एकत्व, ममत्व स्थापित करते हैं । मैं बहुत दयावान हूँ, फलानी
व्यक्ति क्रोधी है, फलानी व्यक्ति मायाचारी है इसतरह राग परिणामों के साथ
याने आस्रव के साथ हम एकत्व स्थापित करके उसे अपना स्वभाव मानते
हैं । इसीलिए सात तत्त्वों में इन पर्याय तत्त्वों को भिन्न बताया है । इन सात
तत्त्वों का स्वरूप देखकर हम आज तक उन तत्त्वों के बारे में क्या-क्या
भ्रांत कल्पनायें-विपरीत मान्यतायें करते आये हैं इस बात को हम आगामी
पत्रों द्वारा देखेंगे । इन तत्त्वों में हेय, ज्ञेय, उपादेय तत्त्व क्या है इस बात को
भी हमें समझना है ।

इन सात तत्त्वों में ही पुण्य और पाप ये पदार्थ समाविष्ट हैं । आस्रव
में पुण्यासव और पापास्रव तथा बंध में पुण्यबंध और पापबंध इनका अंतर्भाव
(समावेश) होता है । जिनागम में कहीं-कहीं पुण्य और पाप को अलग
बताकर सात तत्त्वों की जगह नौ पदार्थ ऐसा भी कथन आता है । साततत्त्व
कहो अथवा नौ पदार्थ कहो दोनों का स्वरूप एक ही है । समझने के लिए
भिन्न कथन हैं ।

शेष वर्णन आगामी पत्रों में करूँगी ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक २२ — सात तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता (भाग १) | Patrānk 22 — Sāt Tattva-sambandhī Viparīt Mānyatā (Bhāg 1)

१५ सितम्बर १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
गत अनेक पत्रों द्वारा हमने सात तत्त्वसंबंधी मामुली पहचान करा ली
है । जिनेन्द्र भगवान के बताये हुये ये तत्त्व जानकर, उनका यथायोग्य श्रद्धान
करके, पश्चात् स्वतत्त्व की पहचान एवं अनुभूति हुये बिना सम्यग्दर्शन नहीं
होगा और उसके बिना सच्चे सुख की शुरुवात ही नहीं होगी । सच्चे देव-
गुरु-शास्त्रों को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी यह सत्य उपदेश प्राप्त नहीं हो
सकता । कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्रों द्वारा जीव मिथ्या उपदेश ग्रहण करता है
और गृहित मिथ्यात्वी बनता है । इन कुदेवादि को और मिथ्या उपदेश को
छोड़कर जब इस जीव को सत्य उपदेश प्राप्त होगा तभी इस जीव का
अतत्त्वश्रद्धान अर्थात् मोह (मिथ्यात्व) नष्ट हो सकता है । सात तत्त्वसंबंधी
विपरीत मान्यता ही मिथ्यात्व है ।
सात तत्त्वों की भूल अर्थात् सात तत्त्वसंबंधी जीव की भूल ऐसा अर्थ
है । क्योंकि तत्त्व तो जैसे हैं वैसे कायम रहते हैं परंतु जीव उनके संबंध की
मान्यता में भूल करता है । सात तत्त्व यह वस्तुस्थिति है । इस वस्तुस्थिति
को छोड़कर अन्य सभी मान्यतायें कल्पनाजन्य भ्रांतियाँ हैं । अज्ञानी की
मान्यता के अनुसार विश्व में द्रव्यों का परिणमन नहीं होता इसलिए वह दुःखी
है और इस दुःख को मिटाने के लिए कल्पनाजन्य भ्रांतियाँ दूर करना यही
एकमेव उपाय है ।
इन सात तत्त्वसंबंधी ‘विपरीत मान्यता’ का अर्थ होता है तत्त्व जैसे हैं
वैसे न मानकर अन्यथा मानना । प्रत्येक जीव अनादि से ही ऐसी मिथ्या
मान्यता करते आया है इसलिए सात तत्त्वों से वह भले ही परिचित न हो परंतु
तत्संबंधी विपरीत मान्यताओं से चिरपरिचित है । शायद इसीलिए पं. दौलतरामजी
ने ‘छहढ़ाला’ में और पं. टोडरमलजी ने ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में प्रथम इन
विपरीत मान्यताओं का वर्णन किया है और उसके पश्चात् उन तत्त्वों का सच्चा
स्वरूप बताया है । ठीक ही तो है, किसी जन्म से ही रोगी व्यक्ति को उसके
रोग के लक्षण, जो कि उसके नित्य परिचय में है, बताकर उसके बाद निरोगी
अवस्था का वर्णन और निरोगी होने का उपाय बताया जाये तो उसको विश्वास
होता है और वह उपाय भी करता है ।
जीव-अजीव तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -
इन दोनों तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता एकसाथ बताने का हेतु यह है कि
मिथ्यादृष्टि जीव
(१) दोनों को - जीव और अजीव को एक मानता है, अथवा
(२) अजीव को जीव मानता है, अथवा
(३) जीव को अजीव मानता है ।
अर्थात् शरीर और आत्मा इन दोनों को मिलाकर जीव मानता है, अथवा
शरीर को ही जीव मानता है अथवा आत्मा को शरीर मानता है । तात्पर्य यह
है कि इन दोनों का भिन्न स्वरूप उसके ज्ञान में नहीं आता ।
मान लो, किसी बालक को बज़ार से नीम्बू लाने के लिए कहा हो और
वह ककड़ी लेकर आ गया तो उसका अर्थ यही होगा कि वह बालक नीम्बू
को भी नहीं जानता और ककड़ी को भी नहीं जानता ।
जीवतत्त्व का वर्णन छहढ़ाला में ‘चेतन को है उपयोगरूप’ अर्थात् ‘जीव
का लक्षण ज्ञानदर्शन है’ ऐसा किया है । उससे तात्पर्य यह निकलता है कि
‘मेरा है उपयोगरूप’, ‘तुम्हारा है उपयोगरूप’, ‘निगोद का है उपयोगरूप’,
‘सिद्धों का है उपयोगरूप’, ‘सब जीवों का है उपयोगरूप’ । परंतु जीव ने
ज्ञानदर्शन को अपना रूप न मानकर प्राप्त शरीर को ही अपना रूप मान
लिया है । देखो तो, प्रातः उठते ही हम दर्पण के सामने खड़े होकर अपना
(?) रूप निहारते हैं, शरीर का फोटो देखकर यह मेरा फोटो मानकर खुष
होते हैं, शरीर सुंदर होगा तो मैं सुंदर हूँ मानकर गर्व करते हैं, शरीर रोगी
होगा तो मैं रोगी मानकर दुःखी होते हैं, नया शरीर प्राप्त होनेपर मैं जन्मा
और शरीर के छूटनेपर मैं मरा ऐसा मानते हैं । जरा ठंडे दिमाग से विचार
करना, अपनी मान्यतायें ऐसी ही हैं या नहीं ? कहा ही है, “तन उपजत

अपनी उपज जान, तन नशत आप को नाश मान ।” यहाँ तो केवल जन्म
और मरण की ही बात कही है परंतु इन दो अवस्थाओं के बीच की सभी
अवस्थायें समझ लेना, उन सभी अवस्थाओं को हम अपनी अवस्थायें मानते
आये हैं । जैसे तन गोरा होगा तो मैं गोरा, तन लम्बा होगा तो मैं लम्बा,
तन बढ़ रहा है तो मैं बढ़ रहा हूँ, तन कुरूप होगा तो मैं कुरूप, तन लूला-
लंगड़ा होगा तो मैं लूला-लंगड़ा हूँ आदि मानता है ।

केवल शरीर से एकत्व करके यह जीव रुकता नहीं है । धनसंपत्ति,
बालबच्चे, कुटुंब, बंगला, गाड़ी आदि अत्यंत भिन्न परपदार्थ कि जो सब अजीवतत्त्व
हैं, उनमें एकत्व करता है और इनके होने से मैं सुखी, मैं दुःखी, मैं गरीब,
मैं बालबच्चेवाला, मैं निराधार, मैं हीन-दीन आदि कल्पनायें करता है । दैनंदिन
जीवन में ऐसी कल्पनाओं के कारण लोग दुःखी होते दिखायी देते हैं । कोई
शादी नहीं होती इसलिए दुःखी है तो कोई बच्चा नहीं हो रहा इसलिए अपने
आप को अधूरा मानकर दुःखी है अथवा वैधव्य आनेपर अपने आप को हीन-
दीन मानकर कोई दुःखी है ।

शरीर ही मैं हूँ ऐसी मूल में ही भूल होने से उसपर आधारित सभी
मान्यतायें गलत ही होंगी इसमें क्या आश्चर्य ?

अनादिकाल से यह जीव अनेक गतियों में घूम रहा है । एक मैं स्वयं
याने आत्मा और अनंत पुद्गल परमाणु (शरीर) इनका संयोग-वियोग होना ही
अन्य-अन्य नवीन गतियों में भ्रमण करना है । मिथ्यात्व के कारण जीव
किसप्रकार मान्यता करता है उसे देखेंगे । मोक्षमार्गप्रकाशक में निम्न वर्णन
आता है -

(१) ‘यह मैं हूँ’ – ऐसी आत्मबुद्धि ।

आत्मा पुद्गल

स्वभाव (ज्ञानादि) विभाव (क्रोधादि) स्पर्श रस गंध वर्ण

आत्मा का स्वभाव ज्ञानादि और विभाव क्रोधादि तथा पुद्गल के
स्पर्शादि इन सबको मिलाकर यह मैं हूँ ऐसा अपना स्वरूप मानता है ।
अर्थात् शरीर मैं हूँ और ज्ञान तथा क्रोध करनेवाला मैं हूँ ऐसा स्वयं को
मानता है (एकत्वबुद्धि) ।
(२) ‘ये मेरे हैं’ – ऐसी स्वामित्वबुद्धि ।
आत्मा की और पुद्गल की अवस्थायें मिलाकर ये सब मेरी अवस्थायें
हैं ऐसा यह मानता है अर्थात् ज्ञान की और क्रोधादि की हीनाधिक दशा और
पुद्गल के वर्ण गुण की अवस्था, स्पर्श गुण की अवस्था, अन्य गुणों की
अवस्था आदि सब को अपनी स्वयं की अवस्था मानता है (ममत्वबुद्धि) ।
(३) ‘मैं इनका कर्ता हूँ’ - ऐसी कर्तृत्वबुद्धि ।
जीव और शरीर इनका निमित्त नैमित्तिक संबंध बहुत है । उसकारण
कभी-कभी जीव इच्छा करता है तब शरीर की क्रिया शरीर के कारण शरीर
में होती है परंतु जीव ऐसा मानता है कि ये मेरी क्रिया है । जैसे मैं बोलता
हूँ, मैं चलता हूँ (कर्तृत्वबुद्धि) ।
(४) ‘मैं इनका भोक्ता हूँ’ – ऐसी भोक्तृत्वबुद्धि ।
शरीर में ठंडी (शीत), बुखार (उष्ण), भूख, प्यास, रोग आदि अवस्थायें
होती हैं । मोह (मिथ्यात्व) के कारण यह जीव स्वयं ही उसमें सुख-दुःख
मानता है । इन सब अवस्थाओं को अपनी अवस्था मानकर मुझे बुखार आया
इसलिए मैं दुःखी हूँ ऐसा मानता है (भोक्तृत्वबुद्धि) ।
इसतरह यह जीव जो-जो पर्याय (मनुष्यपर्याय, देवपर्याय आदि) धारण
करता है, उस-उस पर्याय में अहंबुद्धि करता है । इसका कारण क्या है
इसके बारे में पं. टोडरमलजी लिखते हैं, "इस आत्मा को अनादि से इंद्रियज्ञान
है; उससे स्वयं अमूर्तिक है वह तो भासित नहीं होता, परंतु शरीर मूर्तिक है
वही भासित होता है और आत्मा किसी को आपरूप जानकर अहंबुद्धि धारण
करे ही करे, सो जब स्वयं पृथक् भासित नहीं हुआ तब उनके समुदायरूप
पर्याय में ही अहंबुद्धि धारण करता है । तथा अपने को और शरीर को
निमित्त नैमित्तिक संबंध बहुत हैं इसलिए भिन्नता भासित नहीं होती और जिस
विचार द्वारा भिन्नता भासित होती है वह मिथ्यादर्शन के जोर से हो नहीं
सकता; इसलिए पर्याय में ही अहंबुद्धि पायी जाती है ।”
इसप्रकार जीव-अजीव तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता का स्वरूप देखने
के बाद अब आस्रवतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता (अयथार्थ श्रद्धान) का स्वरूप
देखेंगे ।

आस्रवतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -

गत पत्र में हमने आस्रव का अर्थ क्या है उसे समझा था । मोह, राग,
द्वेष अर्थात् मिथ्यात्व और कषाय आस्रव है-विभाव हैं । स्वभाव के विरुद्ध भाव
को विभाव कहते है । जैसे पानी का स्वभाव शीतलता है और उष्णता यह पानी
का विभाव है । पर निमित्त से होता है वह विभाव है और निमित्त के बिना
जो होता है वह स्वभाव है । ज्ञान, आनंद, आत्मा का स्वभाव है । मोह, राग,
द्वेष आत्मा का विभाव है । ऐसा होनेपर भी मिथ्यादृष्टि जीव इन विभावों को
अपना स्वभाव मानता है । आस्रव दुःखरूप हैं, मिथ्यादृष्टि जीव उन्हें सुखरूप
मानता है । राग चाहे शुभ हो या अशुभ, वर्तमान में आकुलता उत्पन्न करते
हैं तथा उनसे बंध होता है इसकारण भविष्य में भी दुःख ही देते हैं ।

कहा ही है, ‘आसव दुःखकार घने रे, बुधिवंत तिन्हें निरवेरे’ ।

दुःख का कारण मोह, राग, द्वेष हैं, परंतु अज्ञानी संयोगों को, परपदार्थों
को दुःख का कारण मानकर यह रागद्वेष की श्रृंखला चालू ही रखता है ।
आस्रवतत्त्वसंबंधी भूल को संक्षेप में फिर से देखेंगे ।

(१) राग, द्वेष, मोह (आसव) ये विभाव हैं उनको अपना स्वभाव
मानता है ।

(२) रागादि और आत्मा भिन्न हैं परंतु राग-द्वेष और ज्ञान इनमें
एकत्व मानता है ।

(३) रागादि (आसव) दुःखरूप, बंध का कारण एवं भविष्य काल में
भी दुःख के हेतु हैं, परंतु उन्हें सुखरूप मानता है ।

(४) संयोग से मुझे दुःख होता है, प्रतिकूलता मुझे क्रोध उत्पन्न
कराती है ऐसा मानता है । परंतु दुःख का कारण आस्रव है इस बात को
जानता नहीं ।

स्वाभाविक ही है, राग-द्वेष अपने लगते हैं तो उन्हें बुरा कैसा कह
सकता हैं ? मिथ्यादृष्टि शुभराग को सुखकर मानता है, भला मानता है ।
उससे स्वर्गादिक सुख मिलेगा इसलिए शुभराग उसे अच्छा लगता है । परंतु
बंध का कारण सुखकर कैसे हो सकता है ? इस विपरीत मान्यता का वर्णन
छहढ़ाला में इसतरह किया है, “रागादि प्रगट ये दुःखदेन तिनही को सेवत
गिनत चैन ।”

बंधतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -
“शुभ-अशुभ बंध के फल मँझार, रति-अरति करे निजपद विसार”
(छहढ़ाला) । जीव को जो अनुकूल संयोग मिलते हैं वे पुण्यकर्म के उदय से
और प्रतिकूल संयोग मिलते हैं वे पापकर्म के उदय से मिलते हैं । जो जीव
कर्म के उदय में सुख मानता है वह पुण्यबंध को अच्छा मानता है । जिसे
पुण्य के फल की रुचि है उसे पुण्य का बंध भी अच्छा लगता है और जिसे
बंधन में सुख लगता है उसकी मान्यता विपरीत है यह बताने की आवश्यकता
ही नहीं है ।

संयोग तो परपदार्थ हैं, उनमें इष्ट-अनिष्टपना की कल्पना करना यही
मिथ्यात्व है ।

आस्रवों से कर्म का बंध होता है । यह कर्म उदय में आनेपर उसके
फलस्वरूप आत्मा में ज्ञान, दर्शन, वीर्य की हीनाधिकता होती है, मोह, राग,
द्वेष रूप परिणमन होता है, बाह्य में सुख-दुःख के संयोग तथा विशिष्ट
प्रकार के शरीर का संयोग मिलता है । इन सब का मूल कारण कर्म है ।
परंतु वह तो सूक्ष्म है, दिखता नहीं है । यह जीव इन संयोगों का कर्ता आप
है अथवा ईश्वर है अथवा भवितव्य ऐसा ही है ऐसा मानकर बंधतत्त्वसंबंधी
भूल करता है, विपरीत मान्यता करता है ।

देखो ना, जिसकी एक तत्त्वसंबंधी मान्यता विपरीत होती है उसकी सातों
तत्त्वसंबंधी मान्यता विपरीत हो जाती है ।

संवर, निर्जरा और मोक्षतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता के बारे में हम
आगामी पत्र में चर्चा करेंगे ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक २३ — सात तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता (भाग २) | Patrānk 23 — Sāt Tattva-sambandhī Viparīt Mānyatā (Bhāg 2)

२३ अक्तूबर १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
‘अपने को पहचानकर अपने को सुखी बनना है’ यही हमारा ध्येय
है । सच देखा जाये तो ‘मैं ज्ञान और आनंद स्वभाव से परिपूर्ण हूँ’ ऐसा
जानना है । क्योंकि सुख बाहर से प्राप्त नहीं करना, अपितु सुखमय ‘स्व’
को जानते ही सुख की अनुभूति होनेवाली है । आज तक झूठी कल्पना
करके कल्पना में ही हम सुख-दुःख मानते आ रहे हैं । वह झूठी कल्पना
अर्थात् विपरीत मान्यता किसप्रकार है इस बात को हमने गत पत्र में देखना
प्रारंभ किया है ।
जीव, अजीव, आसव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये प्रयोजनभूत सात
तत्त्व हैं । इन तत्त्वों का यथार्थ याने सत्य श्रद्धान करने से अपना दुःख दूर
होकर सच्चे शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है । परंतु अनादि से इस जीव ने
इन सात तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता की है ।
संवरतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -
आसवों का अभाव ही संवर है । अर्थात् मोह, राग, द्वेष का उत्पन्न
न होना संवर है अथवा कर्मों का आना रुकना संवर है । यह तो नास्ति का
कथन हुआ । अस्ति का कथन करना हो तो शुद्धता अर्थात् वीतरागता का
उत्पन्न होना संवर है । उस समय अतींद्रिय ज्ञान और अतींद्रिय आनंद
की प्राप्ति होती है । इसका अर्थ यह हुआ कि संवर में आत्मिक सुख का
संवेदन होता है क्योंकि अतींद्रिय ज्ञान और अतींद्रिय आनंद इनका अविनाभावी
संबंध है ।
अंतर्मग्न-आत्मा में लीन रहनेवाले भावलिंगी संत आत्मा के प्रचुर आनंद
में मग्न रहते हैं । परंतु अगर कोई ऐसा मानता होगा कि ‘अरेरे ! बिना
कपड़े के सर्दी में, धूप में, बरसात में कितना कष्ट सह रहे हैं बेचारे !’ तो

वह उसकी संवरतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता है ।

जो संवर को कष्टदायक, क्लेशकारक मानता होगा वह संवर प्रगट
करेगा ही कैसे ? आस्रव को जिसने हितरूप माना वह आस्रव के अभाव
को अर्थात् संवरतत्त्व को हितरूप नहीं मानेगा और आसव का अभाव भी
नहीं करेगा । संवरसंबंधी और एक बड़ी भारी भूल देखने में आती है कि
आस्रव करने से संवर होता है ऐसा मानना । शुभराग आस्रव है । व्रत,
तप शुभराग है । महाव्रत (मुनि के व्रत) भी शुभराग है । परंतु उसे ही
यदि संवर अथवा संवर का कारण माना जाये तो योग्य नहीं होगा । जिस
कारण से आस्रव और बंध होता है उसी कारण से संवर होना मानना सर्वथा
गलत है ।

शुद्धोपयोग याने आत्मलीनता यही संवर प्रगट करने का अर्थात् आस्रवों
को रोकने का एकमात्र उपाय है । परंतु आज तक इस जीव को संवर का
स्वरूप पता नहीं होने से और संवर आनंदमय होता है इसका अनुभव न होने
से यह मिथ्यादृष्टि जीव संवर को कष्टदायक मानता है अथवा आस्रव (शुभराग)
करने से संवर होता है, ऐसा मानता है ।

निर्जरातत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -

इच्छा निरोधः तपः और “तपसा निर्जरा च” ऐसा तत्त्वार्थसूत्र में बताया
है । तात्पर्य यह हुआ कि इच्छाओं का निरोध याने इच्छाओं का अभाव याने
इच्छा का उपन्न ही न होना निर्जरा है और वह सुखमय है ।

इच्छा का उत्पन्न होना यही दुःख है, आकुलता है । जब जीव परपदार्थों
को इष्ट-अनिष्ट मानता है तब उनके ग्रहण-त्याग की इच्छा करता है । परंतु
परपदार्थ तो इष्ट या अनिष्ट होते ही नहीं, परंतु मिथ्यात्व के कारण यह जीव
उन्हें इष्ट-अनिष्ट मानता है । परपदार्थ इसके आधीन परिणमित नहीं होते
क्योंकि वे स्वतंत्र वस्तु हैं । कदाचित् इसकी कोई इच्छा पूर्ण हो भी गयी तो
भी निरंतर नवीन इच्छायें होती ही रहती हैं और यह जीव निरंतर आकुलता
का वेदन करता रहता है ।

पांच प्रकार के इंद्रियों के विषयों की इच्छा - मूल कारण मिथ्यात्व ।

चार प्रकार की कषायें – क्रोध, मान, माया, लोभ-मूल कारण
मिथ्यात्व ।

बाह्य सामग्री में इष्ट-अनिष्टपने की कल्पना-मूल कारण मिथ्यात्व ।

मूल कारण मिथ्यात्व कायम होगा तो उसका कार्यरूप फल-इच्छा,
कषाय और इष्ट-अनिष्टपना होगा ही । मन की इच्छा और कषाय बाह्य में
प्रगट न हो, उसे दबाकर रखे यह उनके नाश का उपाय नहीं है । अपितु
इच्छा और कषायें उत्पन्न ही न हो ऐसा उपाय करना ही सच्चा उपाय है ।
मूल कारण मिथ्यात्व को नष्ट करना यही वह सच्चा उपाय है ।

कर्म की अपेक्षा कथन करना होगा तो बंध का एकदेश (कुछ अंशों
में) अभाव होना इसे निर्जरा कहते हैं । जो बंध का स्वरूप जानने में भूल
करता होगा वह निर्जरातत्त्व का सही स्वरूप कैसे जान सकता है ? पुण्य
कर्म के बंधन में जिसे सुखबुद्धि होती है वह निर्जरा का उपाय दुःखरूप
मानता है ।

जीव दुःखी होता है स्वयं ने ही बांधे हुये पूर्व कर्म के फल से परंतु
वह अन्य पदार्थों को अपने दुःख का कारण मानकर उन पदार्थों के नाश का
उपाय करता है, परंतु कर्म के नाश का उपाय नहीं करता । इसतरह
निर्जरातत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता के कारण यह जीव दुःखी ही रहता है ।

मोक्षतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता -

मोक्ष अर्थात् पूर्ण निराकुल सुख, अनंत सुख की प्राप्ति, कर्मों का पूर्ण
अभाव, आत्मा की परिपूर्ण शुद्ध दशा । आत्मा अनंत गुणमय है, उन सब
अनंत गुणों का सामर्थ्य पूर्णरूप से पर्याय में प्रगट होना इसी को मोक्ष
कहते हैं ।

मिथ्यादृष्टि जीव को सच्चे सुख की पहिचान न होने के कारण पांच
इंद्रिय और मन के द्वारा विषयभोग करने में ही वह सुख मानता है । सच
देखा जाये तो अनेक पदार्थों को भोगने की इच्छा वह करता है । आत्मा तो
मात्र उन पदार्थों को जान ही सकता है, उनका ग्रहण वा त्याग कर ही नहीं
सकता । अज्ञानी निरंतर ग्रहण-त्याग की इच्छा करके निरंतर आकुलता करता
है । क्वचित् इच्छा पूर्ण हुयी तो उसमें सुख मानता है परंतु उसी समय में
नवीन इच्छाजन्य आकुलता तो रहती ही है । वीतरागता याने इच्छाओं का पूर्ण
अभाव ही निराकुलतामय है ।
अज्ञानी भोगोंसंबंधी सुख को सच्चा सुख मानता है और उसीप्रकार का
सुख मोक्ष में होगा ऐसी कल्पना करता है यही उसकी मोक्षतत्त्वसंबंधी विपरीत
मान्यता है ।
अनेक लोग हम से प्रश्न पूछते हैं, ‘अहो ! मोक्ष में जाने के बाद वहाँ
क्या करना ? अगर कुछ नहीं करना तो वहाँ जाने में क्या मजा ?’
इस जीव ने बंधतत्त्व का स्वरूप जाना नहीं । दुःख कर्म बंधन से है
और कर्मों का पूर्ण अभाव होकर ही पूर्ण सुखी बन सकते हैं ऐसा न जानने
के कारण अर्थात् मोक्षतत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता के कारण परपदार्थ और
अनिष्ट संयोगों को दुःख का कारण मानकर यह जीव परपदार्थ और संयोगों
का नाश-अभाव करने की इच्छा करता है और निरंतर नवीन कर्म का बंध
करता रहता है ।
इतना सब विस्तार से देखनेपर पता चलता है कि जिसने एक अपने
आत्मा को जानने में भूल की है वह सातों तत्त्वसंबंधी भूल करता है । सात
तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान सात तत्त्वों को जानने के लिए नहीं परंतु एक अपने
शुद्धात्मा को अर्थात् स्वयं को जानने के लिए है ।
इन सात तत्त्वों में पुण्य और पाप ये दोनों आस्रव और बंध इन दोनों
तत्त्वों में समाविष्ट होते हैं । फिर भी कहीं-कहीं आचार्यों ने दोनों का भिन्न
कथन करके नौ पदार्थ बताये हैं । सात तत्त्व कहो या नौ पदार्थ कहो दोनों
का एक ही अर्थ है ।
सच देखा जाये तो पुण्य और पाप तो कर्म के नाम हैं । दोनों कर्म होने
से दोनों की जाति एक ही है । दोनों आकुलता उत्पन्न करनेवाले होने से बुरे
ही हैं । परंतु मिथ्यादृष्टि जीव पुण्य को अच्छा और पाप को बुरा मानता
है क्योंकि पुण्य के कारण अपनी इच्छानुसार कार्य बनता है इसलिए पुण्य
अच्छा है और पाप के कारण इच्छानुसार कार्य नहीं होता इसलिए पाप बुरा
है ऐसा मानता है ।
वास्तव में तो सुख-दुःख जीव की मिथ्या मान्यता के कारण होते हैं ।
शरीर ही मैं हूँ ऐसा मानकर शरीर निरोगी होगा तो मैं सुखी ऐसी मान्यता
के कारण जिस पुण्य कर्म के उदय में अनुकूल सामग्री मिलती है उस पुण्य
के उदय को अच्छा मानता है और पाप के उदय को बुरा मानता है । यह
भी उसकी विपरीत मान्यता ही है-बंधतत्त्वसंबंधी भूल है । जो पुण्य के उदय
को अच्छा मानता है अर्थात् जो बंध को अच्छा मानता है वह बंध के अभाव
स्वरूप मोक्ष को अच्छा कैसे मानेगा ?

जो पुण्यबंध को भला मानता है वह बंध का कारण जो शुभास्रव याने
शुभराग उसे भला मानता है और अशुभराग को बुरा मानता है । जिसने
आस्रव को भला माना अर्थात् करने योग्य माना उसने आस्रव के अभावरूप
संवर को नहीं जाना और भला भी नहीं माना । जिसने आसव, बंध को ही
अच्छा (भला) माना वह संवर, निर्जरा मोक्ष को अच्छा नहीं मानेगा ।

देखो ना, एक भूल भरी मान्यता के कारण अनेक भूलभरी मान्यताओं
की शृंखला ही शुरू हो जाती है । कुम्हार के यहाँ एकपर एक घड़े रचते
हैं । नीचे का पहला घड़ा उलटा रखा होगा तो उसपर रचे (रखे) जानेवाले
सभी घड़े उलटे ही रखने पड़ते हैं । उसीप्रकार एक तत्त्व में भूल करने
से सातों तत्त्वसंबंधी भूलभरी मान्यताओं की परंपरा शुरु हो जाती है (शृंखला
शुरू होती है) ।

शास्त्र सुननेवालों का हमेशा यही सवाल होता है कि फिर हम क्या
करे ? कैसे आचरण करे ? देखो तो, प्रश्न में भी कर्ताबुद्धि ही दिखायी देती
है । गत दोनों पत्रों में हमने मान्यता की भूल देखी, परंतु फिर भी मान्यता
को सुधारना है ऐसा सीधा सरल जवाब ध्यान में नहीं आता और मनुष्यपर्याय
ही मैं हूँ-मैं मनुष्य ऐसा मानकर मनुष्योचित व्यवहार सुधारने का विचार ही
इस जीव को आता है । इससे उसकी जीव, अजीव, आस्रव आदि तत्त्वसंबंधी
मान्यता की भूल-विपरीतता ही दिखायी देती है ।

एक आदमी जमीनपर झुककर कुछ कर रहा था । उससे उसके मित्र
ने पूछा, “अरे भाई ! तुम क्या कर रहे हो ?” उसपर उसने जवाब दिया,
“मैं कबसे मेरी परछाई जो टेढ़ीमेढ़ी दिख रही है, उसे सीधी करने की
चेष्टा कर रहा हूँ ।” तुम क्यों हँस रहे हो ? दूसरों की मूर्खता देखनेपर
कैसी तुरंत हँसी आती है, है ना ? मित्र ने सलाह दी, “परछाई को सुधारने
की कोशिश मत करो । तुम सीधे हो जाओ तो परछाई अपने आप सीधी
हो जायेगी ।”

हम भी पर्याय से, शरीर से एकत्व करके मनुष्यव्यवहार, आचरण
सुधारने की चेष्टा-प्रयत्न करते हैं । उससमय हमारे परम सुहृद याने
परममित्र अर्थात् देव, गुरु, शास्त्र हमसे कहते हैं, “हे भव्य ! तुम अपने
को पहचानो । पर्यायों की तरफ देख देखकर उनमें से विभाव और राग-द्वेष
दूर करने का प्रयत्न छोड़ दो । तुम स्वयं अपने आप को स्वभाव रूप मानो,
स्वयं को स्वयं में स्थापन करो तब तुम्हारी पर्यायें अपने आप स्वसन्मुख
होकर स्वभावरूप परिणमन करने लगेगी ।”

अनादि संस्कारवश ये विपरीत मान्यतायें होती हैं तो भी घबराने की कोई
आवश्यकता नहीं है । सात तत्त्व का स्वरूप यथार्थ रीति से जानकर स्व में
लीन होना यही भूल मिटाने का उपाय है ।

इन सात तत्त्वों का ‘ज्यों का त्यों श्रद्धान’ अर्थात् उनके हेय, ज्ञेय,
उपादेय स्वरूप के बारे में अगले पत्र में लिखूँगी ।

शेष शुभ । घर में सब को यथायोग्य नमस्कार ।

तुम्हारी माँ

जिनको सच्चा जैन बनना हो उनको शास्त्र के आश्रय से
तत्त्वनिर्णय करना योग्य है; परंतु जो तत्त्वनिर्णय नहीं करते और
पूजा, स्तोत्र, दर्शन, त्याग, तप, वैराग्य, संयम, संतोष आदि सर्व
कार्य करते हैं, सो उनके सर्व कार्य असत्य हैं । इसलिए आगम
का सेवन, युक्ति का अवलंबन, परम्परा गुरुओं का उपदेश और
स्वानुभव द्वारा तत्त्वनिर्णय करना योग्य है ।

  • ‘सत्तास्वरूप’ ३, ४

पत्रांक २४ — सात तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान | Patrānk 24 — Sāt Tattvõ kā Yathārth Śraddhān

२२ नवम्बर १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
सात तत्त्वसंबंधी यह विषय बड़ा रोचक है । उसपर जितना विवेचन करे
उतना कम ही है । सात तत्त्वों का स्वरूप समझने के पश्चात् ही हमें
समयसारादि ग्रंथों में आचार्यों ने आत्मा के स्वरूप का जो वर्णन किया हुआ
है वह ख्याल में आता है । सात तत्त्वसंबंधी यह पांचवां पत्र है । जिस विषय
की हमें रुचि है उस विषय की कितनी भी चर्चा करे तो भी हमें आलस नहीं
आता, हम बोअर नहीं होते । उलटा उस विषय की गहराई में जाकर उसका
स्वरूप जानने से उसकी रुचि अधिक बढ़ती है ।
प्रयोजनभूत सात तत्त्वों की परिभाषायें हमने देखी, उनका संक्षिप्त स्वरूप
भी देखा । अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव तत्त्वसंबंधी किसतरह से विपरीत मान्यता
करता है उसे भी दो पत्रों द्वारा जाना । परंतु मात्र इतना ही जानना कार्यकारी
नहीं है ।
अब दृष्टांत देखते हैं -
किसी एक गाँव में अनेक घर हैं, कई रास्ते हैं । ये रास्ते काटों भरे
हैं, कहीं उभड़े हुये हैं, इनमें कहीं गड्ढे हैं, अनेक विपत्तियों से भरे पड़े
हैं । परंतु सभी घर अनेक सुख सुविधाओं से भरे हुये हैं ।
इन घरों में मेरा प्रवेश नहीं हो सकता । परंतु एक घर मेरा अपना
है जिसमें प्रवेश करने से मुझे कोई रोक नहीं सकता, जिसमें मेरे अलावा
अन्य कोई प्रवेश कर नहीं सकता, मेरा घर सुख सुविधाओं से परिपूर्ण है ।
इन रास्तों से हटकर साफ-सुथरा एक मार्ग मेरी घर की ओर जाता है
जिसपर चलकर मैं अपने घर में प्रवेश कर सकता हूँ । इसतरह केवल बहुत
सारी जानकारी हासिल करने से हमें सुख की प्राप्ति नहीं होगी, वह ज्ञान
यथार्थ ज्ञान नहीं होगा । दूसरों के घर एवं वहाँ के सुख देखकर भी हमें
सुख प्राप्त नहीं होगा, विपत्तियों से भरे इन रास्तोंपर चलते रहने से सुख की
२२ नवम्बर १९९५
सात तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान
प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
सात तत्त्वसंबंधी यह विषय बड़ा रोचक है । उसपर जितना विवेचन करे
उतना कम ही है । सात तत्त्वों का स्वरूप समझने के पश्चात् ही हमें
समयसारादि ग्रंथों में आचार्यों ने आत्मा के स्वरूप का जो वर्णन किया हुआ
है वह ख्याल में आता है । सात तत्त्वसंबंधी यह पांचवां पत्र है । जिस विषय
की हमें रुचि है उस विषय की कितनी भी चर्चा करे तो भी हमें आलस नहीं
आता, हम बोअर नहीं होते । उलटा उस विषय की गहराई में जाकर उसका
स्वरूप जानने से उसकी रुचि अधिक बढ़ती है ।
प्रयोजनभूत सात तत्त्वों की परिभाषायें हमने देखी, उनका संक्षिप्त स्वरूप
भी देखा । अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव तत्त्वसंबंधी किसतरह से विपरीत मान्यता
करता है उसे भी दो पत्रों द्वारा जाना । परंतु मात्र इतना ही जानना कार्यकारी
नहीं है ।
अब दृष्टांत देखते हैं -
किसी एक गाँव में अनेक घर हैं, कई रास्ते हैं । ये रास्ते काटों भरे
हैं, कहीं उभड़े हुये हैं, इनमें कहीं गड्ढे हैं, अनेक विपत्तियों से भरे पड़े
हैं । परंतु सभी घर अनेक सुख सुविधाओं से भरे हुये हैं ।
इन घरों में मेरा प्रवेश नहीं हो सकता । परंतु एक घर मेरा अपना
है जिसमें प्रवेश करने से मुझे कोई रोक नहीं सकता, जिसमें मेरे अलावा
अन्य कोई प्रवेश कर नहीं सकता, मेरा घर सुख सुविधाओं से परिपूर्ण है ।
इन रास्तों से हटकर साफ-सुथरा एक मार्ग मेरी घर की ओर जाता है
जिसपर चलकर मैं अपने घर में प्रवेश कर सकता हूँ । इसतरह केवल बहुत
सारी जानकारी हासिल करने से हमें सुख की प्राप्ति नहीं होगी, वह ज्ञान
यथार्थ ज्ञान नहीं होगा । दूसरों के घर एवं वहाँ के सुख देखकर भी हमें
सुख प्राप्त नहीं होगा, विपत्तियों से भरे इन रास्तोंपर चलते रहने से सुख की
तो बात छोड़ो दुःख ही दुःख नसीब होगा । उस गाँव को जानना ‘यथार्थ
जानना’ तभी कहलायेगा जब मैं जानूंगा कि मेरा सुख मात्र मेरे घर में है,
अन्य घरों के सुख देखने से मुझे कोई लाभ नहीं है, यह विपत्तियों से भरा
रास्ता छोड़कर अपने घर की ओर जानेवाला यह मार्ग ही मुझे पकड़ना होगा,
इस मार्गपर चलकर घर तक पहुँचना होगा और घर में प्रवेश करते समय
उस मार्ग को छोड़कर घर में प्रवेश करना होगा । इस ज्ञान के अनुसार पूर्ण
श्रद्धा (विश्वास) होनेपर जब अपने घर की ओर पहला कदम उठायेंगे तो ही
वह श्रद्धा और ज्ञान सच्चे होंगे और जब घर में प्रवेश करके पूर्ण सुख का
उपभोग करेंगे तभी उस श्रद्धा, ज्ञान, आचरण की पूर्णता होगी ।
अब इस दृष्टांत को सात तत्त्वसंबंधी सिद्धांतपर घटाते हैं । इस
विश्व में अनंत द्रव्य हैं- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । ये
सभी द्रव्य अपने आप में परिपूर्ण हैं-अनंत गुणों से युक्त हैं । परंतु प्रत्येक
द्रव्य अपने-अपने स्व-चतुष्टय-द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से युक्त होने से मेरा
इन द्रव्यों में प्रवेश नहीं हो सकता । मैं भी एक द्रव्य हूँ, अनंत गुणों से
परिपूर्ण हूँ, मैं अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में रहता हूँ, मेरे स्व-चतुष्टय
में अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता । चारों गतियों में भ्रमण करानेवाला
संसारमार्ग है जो जन्ममरणादि अनेक विपत्तियों से भरा पड़ा है । इससे
हटकर एक मोक्षमार्ग है जिसपर चलकर मैं मोक्षमहल में प्रवेश कर सकता
हूँ-मार्ग छोड़कर अपने घर में निवास कर सकता हूँ । शास्त्रों से ऐसी
जानकारी प्राप्त करके जब मैं अपने घर-स्वद्रव्य की तरफ पहला कदम
उठाकर मोक्षमार्ग में आऊँगा अर्थात् सम्यक्त्व प्राप्त करूँगा तब से श्रद्धा,
ज्ञान और आचरण सच्चे होंगे । इस मोक्षमार्गपर चलकर जब मोक्षमहल में
प्रवेश करके वहीं रहने लगूँगा - परिपूर्ण सुख का उपभोग करूँगा तभी श्रद्धा,
ज्ञान, आचरण की पूर्णता होगी ।
मैं एक स्वतंत्र अस्तित्ववान सत् पदार्थ हूँ । मुझे छोड़कर अन्य अनंत
जीव तथा अन्य सभी पांच द्रव्य अजीवतत्त्व है जो ‘ज्ञेय तत्त्व’ है । ज्ञेय अर्थात्
जाननेयोग्य-उनका ज्ञान मुझे होता है, बस ! इतना ही उनसे मेरा संबंध
है । ज्ञेय तत्त्व है इसलिए उसे ही जानते रहना इष्ट है ऐसी किसी की
कल्पना होगी तो वह भूलभरी है । अजीवतत्त्व को केवल जानना यह सही
जानना नहीं है तो अजीवतत्त्व में मेरा प्रवेश नहीं हो सकता, मुझमें अजीवतत्त्व
प्रवेश कर नहीं सकता, मेरा और अजीवतत्त्व का आपस में कोई भी संबंध,
लेन-देन, सुखदुःख का कार्य कारणपना आदि नहीं हैं ऐसा जानना यथार्थ
जानना है । अजीवतत्त्व ‘पर’ है, ‘स्व’ नहीं ऐसा जानना कार्यकारी है ।
दूसरों के घर देखते-निहारते हुये गड्ढे में गिर जाना मूर्खता है उसीतरह
अजीवतत्त्व ‘ज्ञेय तत्त्व’ है ऐसा सोचकर उसे ही जानते रहने में हमें रस
होगा, रुचि होगी तो वह यथार्थ जानना नहीं कहलायेगा । पूजा में भी हम
कहते हैं, ‘हो शांत ज्ञेयनिष्ठा मेरी’ ।
आज तक इस जीव को अजीवतत्त्व की ही महिमा भासित हो रही
है । ज्ञेयलुब्ध होकर परद्रव्यों को जानने में ही इस जीव ने अनंत भव धारण
किये । परंतु इन सबको जाननेवाला ‘मैं’-ज्ञानवान (ज्ञायक), उसकी महिमा
इस जीव को नहीं आयी । प्रत्येक द्रव्य की पर्याय उसमें स्वयं में ही होती
है । दर्पण में दिखनेवाला अग्नि का प्रतिबिंब यह दर्पण की पर्याय-अवस्था
है । वह दर्पण की स्वच्छता को जाहिर करती है । तद्वत् सर्व पदार्थों को
जाननेवाली ज्ञान की पर्याय आत्मा की अपनी है, वह ज्ञानगुण को जाहिर
करती है । प्रतिबिंब देखने में जो मग्न हुआ उसे दर्पण की स्वच्छता का भान
नहीं है, स्वच्छता नष्ट नहीं हुयी है ! वैसा होता तो प्रतिबिंब दिखायी ही नहीं
देता । तद्वत् ज्ञान में पदार्थ झलक रहे हैं, प्रतिबिंबित होते हैं तब उन प्रतिबिंबों
को जानने में ही जो अटक जाता है, मग्न होता है, उसे ज्ञान का याने आत्मा
अर्थात् ज्ञायकपने का भान नहीं होता ।
रीना, मोना, आज तक तुम दर्पण में अपना मुँह निहारती थी, अब
दर्पण की स्वच्छता देखने की कोशिश करना । थोड़ा प्रैक्टिकल भी तो जरूरी
है ना ?
यह जीव ज्ञेय तत्त्व को ज्ञेय न मानकर उसके ग्रहण-त्याग का भाव
करता है । कई लोग सोचते हैं, ‘फिर हमें धनसंपत्ति, घरबार का त्याग
करना होगा’ ऐसा सोचनेवाले अजीवतत्त्व को यथार्थ रीति से नहीं जानते ।
जिसका कभी जीवतत्त्व में प्रवेश ही नहीं हुआ है उसका त्याग करने की
बुद्धि हास्यास्पद है । रीना-मोना, मैं अगर तुम्हें कहूँ कि मैं अमेरिका के
व्हाईट हाऊस का और आग्रा के ताजमहल का त्याग करनेवाली हूँ तो तुम
मुझे मानसिक रुग्ण समझकर उपचार करने की व्यवस्था करोगी । अजीवतत्त्व
प्रवेश कर नहीं सकता, मेरा और अजीवतत्त्व का आपस में कोई भी संबंध,
लेन-देन, सुखदुःख का कार्य कारणपना आदि नहीं हैं ऐसा जानना यथार्थ
जानना है । अजीवतत्त्व ‘पर’ है, ‘स्व’ नहीं ऐसा जानना कार्यकारी है ।

दूसरों के घर देखते-निहारते हुये गड्ढे में गिर जाना मूर्खता है उसीतरह
अजीवतत्त्व ‘ज्ञेय तत्त्व’ है ऐसा सोचकर उसे ही जानते रहने में हमें रस
होगा, रुचि होगी तो वह यथार्थ जानना नहीं कहलायेगा । पूजा में भी हम
कहते हैं, ‘हो शांत ज्ञेयनिष्ठा मेरी’ ।

आज तक इस जीव को अजीवतत्त्व की ही महिमा भासित हो रही
है । ज्ञेयलुब्ध होकर परद्रव्यों को जानने में ही इस जीव ने अनंत भव धारण
किये । परंतु इन सबको जाननेवाला 'मैं’-ज्ञानवान (ज्ञायक), उसकी महिमा
इस जीव को नहीं आयी । प्रत्येक द्रव्य की पर्याय उसमें स्वयं में ही होती
है । दर्पण में दिखनेवाला अग्नि का प्रतिबिंब यह दर्पण की पर्याय-अवस्था
है । वह दर्पण की स्वच्छता को जाहिर करती है । तद्वत् सर्व पदार्थों को
जाननेवाली ज्ञान की पर्याय आत्मा की अपनी है, वह ज्ञानगुण को जाहिर
करती है । प्रतिबिंब देखने में जो मग्न हुआ उसे दर्पण की स्वच्छता का भान
नहीं है, स्वच्छता नष्ट नहीं हुयी है ! वैसा होता तो प्रतिबिंब दिखायी ही नहीं
देता । तद्वत् ज्ञान में पदार्थ झलक रहे हैं, प्रतिबिंबित होते हैं तब उन प्रतिबिंबों
को जानने में ही जो अटक जाता है, मग्न होता है, उसे ज्ञान का याने आत्मा
अर्थात् ज्ञायकपने का भान नहीं होता ।

रीना, मोना, आज तक तुम दर्पण में अपना मुँह निहारती थी, अब
दर्पण की स्वच्छता देखने की कोशिश करना । थोड़ा प्रैक्टिकल भी तो जरूरी
है ना ?

यह जीव ज्ञेय तत्त्व को ज्ञेय न मानकर उसके ग्रहण-त्याग का भाव
करता है । कई लोग सोचते हैं, ‘फिर हमें धनसंपत्ति, घरबार का त्याग
करना होगा’ ऐसा सोचनेवाले अजीवतत्त्व को यथार्थ रीति से नहीं जानते ।
जिसका कभी जीवतत्त्व में प्रवेश ही नहीं हुआ है उसका त्याग करने की
बुद्धि हास्यास्पद है । रीना-मोना, मैं अगर तुम्हें कहूँ कि मैं अमेरिका के
व्हाईट हाऊस का और आग्रा के ताजमहल का त्याग करनेवाली हूँ तो तुम
मुझे मानसिक रुग्ण समझकर उपचार करने की व्यवस्था करोगी । अजीवतत्त्व

को ज्ञेय न मानकर, हेय (छोड़नेयोग्य) या उपादेय (ग्रहण करनेयोग्य) मानना
यही बड़ी भारी भूल है । तत्त्वज्ञानरूपी उपचार की उसे आवश्यकता है ।

(१) ज्ञेय अर्थात् जाननेयोग्य

  • अजीवतत्त्व
    (२) हेय अर्थात् छोड़नेयोग्य
  • आस्रव-बंधतत्त्व
    (३) उपादेय शब्द के तीन भेद हैं
    (अ) आश्रय करनेयोग्य उपादेय
  • जीवतत्त्व
    (ब) एकदेश प्रगट करनेयोग्य उपादेय - संवर-निर्जरातत्त्व
    (क) पूर्ण प्रगट करनेयोग्य उपादेय
  • मोक्षतत्त्व

पत्र के प्रारंभ में हमने जो दृष्टांत देखा था उसमें जैसे दूसरों के घरों
को जानते रहने से सुख नहीं मिलता परंतु वे घर मेरे नहीं हैं मात्र इतना
जानना ही कार्यकारी है । वे मेरे मात्र ज्ञेय हैं । उन घरों का मुझे त्याग
करना चाहिए ऐसा मानना गलत होगा क्योंकि वे घर मेरे हैं ही नहीं
तो उनको हेय मानना भ्रांति है । उसीतरह दूसरे घरों से मैं सुख प्राप्त
करूँगा मानना अर्थात् उन्हें उपादेय मानना भी भ्रांति है क्योंकि उन घरों
में मेरा प्रवेश ही नहीं हो सकता । वे घर दूसरों के हैं, मेरे नहीं, मेरा सुख
मेरे घर में है ऐसा जानना यथार्थ जानना है और इसतरह से जाननेपर
ही अन्य घरों का यथार्थ ज्ञान हुआ ऐसा कह सकते हैं । यह तो दृष्टांत
हुआ, अब सिद्धांत देखते हैं । दृष्टांत में देखा उसीतरह अजीवतत्त्व मात्र
ज्ञेयतत्त्व है, वह स्वतत्त्व नहीं है, परतत्त्व है । मेरा सुख स्वतत्त्व में है,
परतत्त्व में नहीं । तथा अजीवतत्त्व हेय नहीं है क्योंकि उसका मेरे में अभाव
ही है तो मैं उसे किसतरह त्याग सकता हूँ ? अजीवतत्त्व उपादेय भी नहीं
है क्योंकि उसमें मेरा प्रवेश ही नहीं है । इसप्रकार से अजीवतत्त्व को जानना
यथार्थ जानना है ।

मेरा भी वैभव, मेरा भी स्वभाव अरिहंत सिद्धों के जैसा ही है यह
जानने के लिए हम उनके प्रति देखते हैं । स्वभाव में लीन होकर अनंत सुखी
बन सकते हैं इसका साक्षात् उदाहरण अरिहंत सिद्धों के रूप में विद्यमान
है । उन्होंने यह सुख किस रीतिसे-किस विधिसे प्राप्त किया यह जानने के
लिए अरिहंत की वाणी-जिनवाणी हम सुनते हैं, मुनि तो साक्षात् उस मोक्षमार्गपर
आरूढ़ हैं इसलिए देव-गुरु-शास्त्र वंदनीय हैं, पूजनीय हैं । परंतु इस जीव
ने देव-गुरु-शास्त्र को ही उपादेय माना । सही देखा जाये तो ये सब अजीवतत्त्व
है, ज्ञेयतत्त्व है परंतु उन्हें आश्रय करनेयोग्य उपादेय तत्त्व माना । उन्हें
जानकर, उपदेश सुनकर आश्रय तो स्वतत्त्व का-जीवतत्त्व का लेना था परंतु
वैसा न करते हुये मात्र देवपूजा, गुरु की उपासना, शास्त्र-श्रवण में ही यह
जीव संतुष्ट होकर वहीं रुक गया । ये शुभभाव और उनसे होनेवाला बंध ये
तो आस्रव-बंध तत्त्व हैं । तात्पर्य यह हुआ कि केवल अजीवतत्त्व (देव-गुरु-
शास्त्र) को ही उपादेय मानकर यह जीव नहीं रुका परंतु आस्रव-बंधतत्त्व
(देव-गुरु-शास्त्र की भक्ति) को भी उसने उपादेय माना, आश्रयभूत माना ।

सम्यग्दृष्टि जीव को भी देव-गुरु-शास्त्र का बहुमान, वंदन, पूजा का
भाव आता है, उसे शुभ-अशुभ भाव याने आसव और उससे होनेवाला बंध भी
होता है । परंतु मान्यता में वह आस्रव, बंध को हेय ही मानता है, त्यागनेयोग्य
मानता है, उपादेय नहीं मानता । देव, गुरु, शास्त्र को वह ज्ञेय तत्त्व मानता
है । बारम्बार स्वसन्मुख याने जीवतत्त्व के सन्मुख उपयोग केंद्रित करके वह
आत्मलीनता साधने में प्रयत्नशील रहता है । ऐसी यथार्थ मान्यता होगी तो ही
उसकी देव-गुरु-शास्त्रों की श्रद्धा सच्ची है ऐसा कह सकते हैं ।

कुछ लोग कहते हैं, “हम केवल सच्चे देव-गुरु-शास्त्र को ही नमस्कार
करते हैं, सात तत्त्वों के नाम और लक्षण हमें मालूम है अर्थात् हमें सात तत्त्वों
की श्रद्धा है ।” परंतु उनकी श्रद्धा में हेय, ज्ञेय, उपादेय तत्त्वों का जैसा योग्य
श्रद्धान होना जरूरी था वैसा न होने से, ‘ज्यों का त्यों श्रद्धान’ न होने से
उनकी यह श्रद्धा विपरीत ही है ऐसा शास्त्र में कहा है ।

आज कल तो देह को ही ‘मैं’ मानकर लोग उसे ही परमउपादेय मान
रहे हैं, स्वयं का अस्तित्व ही जीव भूल गया है । इतना ही काफी नहीं था
कि देह से भिन्न आत्मा है ऐसा बतानेवाले को ही मूरख कहता है । अपने
किसी प्रिय व्यक्ति की स्मृति भ्रष्ट होने से वह अपना नाम, गाँव, बुद्धि सब
भूल जाता है, विस्मरण होता है तो हम भी दुःखी होते हैं, आँखों में आसू आते
हैं । परंतु हम भी अनादिकाल से मतिभ्रष्ट होकर, अपने आप को भूलकर,
प्रत्येक गति में जो-जो शरीर प्राप्त हुआ उसे ही ‘यह मैं’ मानकर पागल की
भाँति घूम रहे हैं, दुःख भोग रहे हैं परंतु उस बात का पता ही नहीं है ।

कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहो ! मैं जीव हूँ यह तो सच है, परंतु जीव
को रहने के लिए शरीर तो आवश्यक ही है ना ? शरीर के बिना जीव
अंतराल में ही लटकते रहेगा क्या ?’ उन लोगों ने प्रत्येक द्रव्य की स्वतंत्रता
को ही नहीं जाना । जीवतत्त्व का और अजीवतत्त्व का स्वरूप वे जानते नहीं
हैं । इतना ही नहीं, अनेक वर्षों से सिद्धों को नमस्कार करके भी सिद्ध
भगवान जीव हैं और वे अशरीरी हैं वैसे मैं भी जीव हूँ और शरीर पुद्गल है
और मेरे से अत्यंत भिन्न है इस बात को भी वे लोग नहीं जानते ।

उपवास करने से मुझे कैसे हलका-हलका भासित होता है, णमोकार
मंत्र पढ़ने से फेफड़ों में फलाना लाभ होता है, हाँ कहने से फलाना लाभ,
हीं कहने से विशिष्ट लाभ इसतरह शरीर के अवयवों में लाभ ढूँढ़ना और
उसमें माहात्म्य भासित होना यह सब अभिप्राय का याने मान्यता का विपरीतपना
ही है । उस जीव को अभी भी शरीर में ही एकत्व है, ममत्व है । इस
शरीर से हम देवपूजा और व्रतों का काम करवा लेते हैं ऐसा मानना भी महान
भूल है क्योंकि शरीर का याने परद्रव्य का कर्ता बनकर कर्तृत्वबुद्धिरूप मिथ्यात्व
का ही पोषण वह करता है ।

भूतप्रेत की बातें करने जायेंगे तो एक कहानी से दूसरी कहानी याद
आती है, उसीतरह मूर्खता की इन बातों का भी कोई अंत नहीं है । ये भ्रांत
कल्पनायें औरों की है ऐसा समझकर अन्य लोगों की तरफ देखने की वृत्ति
(आदत) छोड़कर ये मूर्खता की बातें क्या मुझमें हैं ? ऐसा विचार करना ।
मैंने अगर आज तक ऐसी मूर्खता नहीं की होती तो कबका सम्यग्दर्शन
प्राप्त करके मैं सिद्धालय में विराजमान हो गया होता, अपना स्वाधीन सुख
भोगता । चिंता की कोई बात नहीं, अपने ही मूर्खता का पता चलना यह भी
सयानेपन की ओर मुड़नेवाला पहला कदम है ।

आज सिर्फ अजीवतत्त्वसंबंधी चर्चा हुयी, मात्र ज्ञेय तत्त्व के बारे में ज्ञान
किया । अन्य तत्त्वसंबंधी विवेचन अगले पत्र में करूँगी ।

शेष शुभ, घर में सभी को यथायोग्य नमस्कार कहना ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक २५ — सात तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान (भाग २) | Patrānk 25 — Sāt Tattvõ kā Yathārth Śraddhān (Bhāg 2)

२० दिसम्बर १९९५

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
सात तत्त्वों का अभ्यास करते समय सर्वप्रथम मैं स्वयं जीवतत्त्व हूँ
यह बात ध्यान में रखकर ही सभी तत्त्वों का स्वरूप समझना चाहिए ।
रामायण सुनने के बाद भी अगर कोई पूछे, “अहो, आप जरा बताइए तो
सहि, कि सीता राम की कौन थी ?” तो हम सिर पर हाथ मारकर कहेंगे
‘नसीब मेरा’ । तद्वत् जीव-अजीवतत्त्व का स्वरूप, उनके लक्षण, उनके
संबंध में होनेवाली विपरीत मान्यता और यथार्थ श्रद्धान इतनी सारी बातों
का अभ्यास करने के बाद भी अगर कोई पूछे, “हम इतना सारा अब
पढ़ चुके हैं परंतु आप हमें यह तो बताइए कि समाज में रहते हुये हमें
किसतरह आचरण रखना ? बाल बच्चों का पोषण करें या न करें ? दूसरों
की मदद करें या न करें ?”
ऐसे सवाल उठने का एकमात्र यही कारण है कि उसने अपने आप
को जीवतत्त्व न मानकर, मनुष्यपर्याय ही मैं हूँ ऐसा माना है । आत्मा +
शरीर मिलकर मैं हूँ ऐसा जीव और अजीवतत्त्व को एक मानने के कारण
उस व्यक्ति को ऐसा प्रश्न उठा । पर्यायगत योग्यता के अनुसार वैसे भाव
आते हैं परंतु उसीसमय ‘उन भावों को-उन विचारों को जो जान रहा है
वह ‘मैं’ हूँ, मैं मात्र ज्ञान ही कर सकता हूँ, अन्य कुछ भी नहीं’ ऐसा ज्ञान
और श्रद्धान होनेपर ही उसने जीव-अजीवतत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान किया
ऐसा कह सकते हैं ।
‘इस विश्व में अनंत जीव, अनंतानंत पुद्गल, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य,
आकाशद्रव्य और असंख्यात कालद्रव्य इतने सारे द्रव्य हैं । मैं एक भिन्न
स्वतंत्र द्रव्य हूँ, मैं स्वयं आपरूप से हूँ, पररूप से नहीं । परद्रव्यों की मेरे
में और मेरी परद्रव्यों में नास्ति है’ ऐसा समझते ही उसी क्षण हमारी दृष्टि
सभी परद्रव्यों से हटकर स्वद्रव्य की तरफ मुड़ती है । द्रव्य तो उत्पाद-व्यय-
ध्रुवता से युक्त है । द्रव्यांश अर्थात् कायम रहनेवाला एकरूप त्रिकाली ध्रुव अंश
और पर्यायांश अर्थात् प्रत्येक समय में बदलनेवाला अनित्य अंश ऐसे द्रव्य के
दो विभाग ज्ञान में आनेपर जो ध्रुव अंश, कभी भी न बदलनेवाला, सदा
एकसा, वैसे का वैसा, वही रहनेवाला ऐसा जो स्वभाव, न पलटनेवाला अपरिणामी
भाव वह मैं हूँ यह बात समझ में आती है । इस ‘मैं’ याने जीवतत्त्व का हमें
आश्रय लेना है अर्थात् पर्याय अंश मैं नहीं हूँ इसप्रकार पर्याय को गौण करके,
पर्याय को दुर्लक्षित करके जीवतत्त्व का आश्रय लेना है । इसका ही तात्पर्य यह
हुआ कि जीवतत्त्व उपादेय है, आश्रय करनेयोग्य उपादेय अथवा परमउपादेय
है । इसीलिए जिनेंद्र भगवंतों ने पर्याय तत्त्व का स्वतंत्र स्वरूप बताकर आस्रव,
बंध, संवर, निर्जरा एवं मोक्ष पर्यायों के भेद बताये हैं । पर्याय मात्र का लक्ष
(दृष्टि-ध्यान) छोड़े बिना जीवतत्त्व का आश्रय नहीं ले सकते । सर्वप्रथम 'मेरे
से ये अन्य सभी तत्त्व भिन्न हैं और मैं भिन्न हूँ क्योंकि मेरे लक्षण भिन्न
हैं और इन अन्य तत्त्वों के लक्षण भिन्न-भिन्न हैं ऐसा जानना पड़ेगा । सब
तत्त्वों में महान ऐसा मैं जीवतत्त्व हूँ इसतरह स्व की महानता भासित हुये
बिना हमारी दृष्टि, उपयोग, ध्यान स्व की ओर नहीं मुड़ सकता ।

जब तक सम्यग्दर्शन (संवर-निर्जरा) अथवा मोक्ष की ‘स्व’ से अधिकता-
महानता भासित होगी तब तक उपयोग स्व की ओर झुकेगा नहीं । उपयोग
स्व में लीन हुये बिना सम्यग्दर्शन होगा नहीं अर्थात् सम्यग्दर्शन की तरफ
दृष्टि रखने से सम्यग्दर्शन नहीं होगा परंतु उन पर्यायों की तरफ से दृष्टि
को हटाकर स्व की ओर दृष्टि केंद्रित करे तो सम्यग्दर्शन होगा क्योंकि
जिस बात की हमें महानता भासित होती है उसकी ओर ही उपयोग बारम्बार
जाता है ।

परंतु पर्यायों की और से उपयोग हटाने की यह प्रक्रिया थोड़ी बाद में
होगी, उसके पहले ये जो पांच पर्यायतत्त्व हैं उनका यथार्थ ज्ञान और श्रद्धान
कर लेना है । अनादि से मिथ्यादृष्टि जीव आसव और बंध करता आया है,
उसे सम्यक्त्व याने मोक्षमार्ग अर्थात् संवर-निर्जरा प्रगट करनी है और इस
मोक्षमार्गपर आगे बढ़कर मोक्ष प्रगट करना है । इसी का ताप्तर्य यह हुआ
की संवर-निर्जरा ये दो तत्त्व ‘एकदेश प्रगट करनेयोग्य उपादेय हैं’ और
मोक्षतत्त्व ‘पूर्ण प्रगट करनेयोग्य उपादेय है’ ।

अंतर ख्याल में आया कि नहीं ? जीवतत्त्व को आश्रय करनेयोग्य
उपादेय बताया है और मोक्षतत्त्व को प्रगट करनेयोग्य उपादेय बताया है ।
यहाँ मोक्षतत्त्व का आश्रय लेने का उपदेश नहीं दिया जा रहा अपितु मोक्ष प्रगट
करने में ही अपना कल्याण है ऐसा बताया जा रहा है । मोक्ष पर्याय की
तरफ देखते-देखते मोक्ष प्रगट नहीं होता परंतु स्व की तरफ देखते रहने से
अर्थात् आत्मानुभवन में लीन रहते-रहते मोक्ष पर्याय प्रगट होती है ।

संवर और निर्जरातत्त्वों को एकदेश याने आंशिक प्रगट करनेयोग्य
उपादेय क्यों कहते हैं ? इसपर हम विचार करेंगे । संवर-निर्जरा अर्थात्
मोक्षमार्ग । घर की ओर जानेवाले मार्गपर चलकर हम घर तक पहुँच गये,
तो भी घर में प्रवेश करने के लिए हमें उस मार्ग का त्याग करना पड़ता है,
उस मार्गपर रखा हुआ कदम मार्गपर से हटाकर घर में रखना होगा ।
उसीतरह संवर-निर्जरारूप मोक्षमार्गपर चलकर ही हम मोक्ष की ओर आगे
बढ़ सकते हैं परंतु जब मोक्ष पर्याय उत्पन्न होगी तब संवर-निर्जरारूप मोक्षमार्ग
की पर्याय का अभाव-व्यय करके ही उत्पन्न होगी । इसके अलावा और भी
एक बात है कि अंतिम ध्येय (लक्ष्य) निश्चित किये बिना जीव मार्ग में ही
संतुष्ट होकर बैठ जायेगा । केवल संवर-निर्जरा प्रगट हुयी अर्थात् सम्यग्दर्शन
प्रगट हो गया तो हो गयी मेरी इतिकर्तव्यता ऐसा मानकर जो संतुष्ट होगा
उसका श्रद्धान विपरीत होने से एक तो सम्यग्दर्शन होगा नहीं और कदाचित्
पूर्व में प्रगट हो गया हो तो वह पुनश्च मिथ्यादृष्टि होगा ।

संवर-निर्जरा यह मोक्ष का उपाय है-मोक्ष का मार्ग है । आसव-बंध का
अभाव करने से संवर-निर्जरा प्रगट होती है । संवर और निर्जरा को प्रगट
करनेयोग्य मानते ही आस्रव-बंध अभाव करनेयोग्य-नष्ट करनेयोग्य-छोड़नेयोग्य
हैं अर्थात् आस्रव और बंध ये दोनों हेय तत्त्व हैं यह बात ध्यान में आती
है । शुभ-अशुभ राग और उनके कारण होनेवाला बंध त्यागनेयोग्य है ।
संवर-निर्जरा शुद्धभाव है-वीतरागभाव है और आसव-बंध अशुद्धभाव है, रागभाव
है । अशुद्धभाव कायम रखकर कोई शुद्धभाव प्रगट करने की इच्छा करता
होगा अर्थात् राग करते-करते वीतरागता प्रगट हो जायेगी ऐसा कोई मानता
होगा तो वह उसका दोष है, विपरीत मान्यता है अर्थात् मिथ्यात्व है ।

जैनदर्शन छोड़कर अन्य सभी दर्शनों में (धर्मों में) पुण्य भला है,
शुभभाव करो, अशुभभाव छोड़ो ऐसा उपदेश है । शुभभाव और अशुभभाव इन
दोनों को छोड़कर एकमात्र शुद्धभाव ही प्रगट करनेयोग्य है, वही हमारा प्रथम
कर्तव्य है ऐसा प्रतिपादन केवल जैनदर्शन में जिनेंद्र भगवंतों ने किया है ।
तत्त्वों का अभ्यास और यथार्थ श्रद्धान करते समय शुभभाव छोड़नेलायक है,
हेय है, ऐसा योग्य श्रद्धान करना जरूरी है । शुभ भला है ऐसी विपरीत
मान्यता की जड़ इतनी गहराई तक पहुँची हुयी है कि किसी ना किसी बहाने
से ‘शुभ भला’ इस मान्यता को जीव कायम रखना चाहता है । ‘अहो, शुद्ध
में जाने के लिए प्रथम शुभ में आना ही चाहिए ना ?’ ऐसा कहकर
‘चाहिए’ इस शब्द का वजन शुभपर ड़ालकर वह जीव शुभ को महत्व देकर
आस्रव-बंध को हेय न मानकर उपादेय मानता है और तत्त्वसंबंधी विपरीत
मान्यता दृढ़ करके मिथ्यात्व का ही पोषण करता है ।

जब तक शुद्धभाव प्रगट नहीं होता अर्थात् सम्यग्दर्शन नहीं होता,
शुद्धोपयोग नहीं होता तब तक जीव को शुभ में से अशुभभाव और अशुभ में
से शुभभाव ऐसा सदा ही चलता रहता है । शुभभाव हो या अशुभभाव हो,
उसमें रहने का अधिक से अधिक काल अंतर्मुहूर्त है अर्थात् शुभभाव हो या
अशुभभाव हो वह अधिक से अधिक अंतर्मुहूर्त काल तक ही टिक सकता
है । हाँ, हाँ ! अंतर्मुहूर्त का अर्थ बता रही हूँ । मुहूर्त के अंदर का काल,
इसे कहते हैं अंतर्मुहूर्त । मुहूर्त होता है दो घड़ी का, १ घड़ी होती है
२४ मिनट की । समय कितना सूक्ष्म होता है यह हमने बहुत पहले ही जाना
है । असंख्यात समयों की १ आवलि होती है । अंतर्मुहूर्त का अर्थ है एक
आवलि से एक समय अधिक से लेकर दो घड़ी से एक समय कम काल तक
के सभी भेद । १ सैकंड में भी असंख्यात समय बीत जाते हैं । इसलिए
स्थूलरूप से तुम ऐसा कह सकती हो कि एक आवलि से अधिक और
४८ मिनट से कम काल अंतर्मुहूर्त काल है । इनके बीच के सभी विकल्प
(Possibilities) को अंतर्मुहूर्त ही कहते हैं ।

इसतरह जब अशुभभाव पलटकर शुभभाव अपने आप आते ही हैं तब
‘शुभ में आना ही चाहिए’ कहकर वह जीव शुभभाव में ही संतुष्ट होने की
मान्यता कायम रखता है । उसकी आसव (शुभराग) करनेलायक है, करना
ही चाहिए ऐसी मान्यता है, राग करते-करते वीतराग बनूँगा ऐसी मान्यता है,
शुभभाव करते-करते शुद्धभाव प्रगट होगा ऐसी मान्यता है । ये सभी मान्यतायें
विपरीत हैं और विपरीत मान्यता को ही मिथ्यात्व कहते हैं ।

यह विपरीतता श्रद्धा में है इसकारण उसके अनुसार होनेवाला ज्ञान और
आचरण भी विपरीत हो रहे हैं । प्रत्येक व्यक्ति आचरण सुधारने की चेष्टा याने
प्रयत्न करता है परंतु मान्यता विपरीत रखकर ज्ञान और आचरण तीनों काल
में कभी भी सम्यक् नहीं हो सकते । सच देखा जाये तो, सम्यग्दर्शन का
मार्ग बहुत सरल है, सहज है । बस्स ! ‘सच्चे देवगुरुशास्त्र का यथार्थ
श्रद्धान’ तथा ‘सात तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धान’ को ही सम्यग्दर्शन कहते हैं ।
असल में ये दोनों एक ही है । यह किसतरह कह सकते हैं देखो - मोक्षतत्त्व
के श्रद्धान में सच्चे देव का श्रद्धान अंतर्भूत है, संवर-निर्जरातत्त्व के श्रद्धान में
सच्चे गुरु का श्रद्धान अंतर्भूत होता है और सातों तत्त्वों के यथार्थ श्रद्धान में
सच्चे शास्त्र का श्रद्धान अंतर्भूत होता है क्योंकि शास्त्रों का प्रयोजन ही यह है
कि सात तत्त्वों का स्वरूप बताकर, भेदविज्ञान की कला बताकर, वीतरागता का
उपदेश देना ।

आज तक आस्रव-बंध को हेय न मानकर, उपादेय माना यही हमारी
बड़ी भारी भूल हो गयी । हमने आस्रवादि पर्याय तत्त्वों के प्रत्येक के दो-दो
भेद देखे थे । द्रव्य और भाव । द्रव्यआसव, द्रव्यबंध, द्रव्यसंवर, द्रव्यनिर्जरा
और द्रव्यमोक्ष ये तो कर्म की अवस्थायें हैं । कर्म कार्माणवर्गणा से बनता है,
कार्माणवर्गणा पुद्गल है और पुद्गल परद्रव्य है । अजीवतत्त्व का अभ्यास
करते हुये हमने सभी परद्रव्यों को ज्ञेय तत्त्व में ड़ाल दिया था । परंतु वैसा
न मानकर, मुझे फलाना कर्म का नाश करना है, दर्शनमोहनीय कर्म मुझे
सम्यक्त्व होने नहीं देता, नहीं तो मैं कब का सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेता, मैं
कर्म का कर्ता हूँ अथवा कर्म मेरे भावों का कर्ता हर्ता है ऐसा मानना यह सब
मान्यता की विपरीतता ही है ।

अनेक लोग ऐसा आरोप लगाते हैं कि ‘आप आस्रव-बंध को हेय बताते
हैं, शुभभाव हेय है ऐसा कथन करते हैं उसे सुनकर जीव की दशा ‘करेला
ऊपर नीम चढ़ा’ - जैसी होगी (मराठी में कहावत है पहले से ही मर्कट है
और ऊपर से मद्य पिया है) और जीव शुभ छोड़कर अशुभ में ही मग्न
होगा ।’ परंतु उनका यह भय निराधार है । क्योंकि शुभ भला है, करते रहने
जैसा है यह मान्यता छुड़ानी है, शुभ छोड़ने का कहाँ उपदेश है ? यह जो
स्वाध्याय चल रहा है, मान्यता के विपरीतता का विवेचन चल रहा है वह
शुभभाव है या अशुभभाव ? यह भी शुभभाव ही है और शुभभाव करने के
लिए किसी के उपदेश की जरूरत भी कहाँ है ? सूक्ष्म एकेंद्रिय से लेकर
संज्ञी पंचेंद्रिय तक के चारों गति के जीवों का भी शुभ-अशुभ भावों का रहट
तो सदा घूम ही रहा है ।
तुम दोनों लड़कियाँ हो इसलिए लड़की का उदाहरण देकर समझाती
हूँ । लड़की का जन्म होता है तभी से माँ-बाप मानते हैं कि यह तो पराया
धन है, हेय है । फिर भी उसकी शादी होकर वह पराये घर नहीं जाती तब
तक उसका लाड़-प्यार, पोषण, शिक्षण, संस्कार, अपने पैरोंपर खड़ा होकर
धनोपार्जन करने का शिक्षण आदि सभी बातों में क्या थोड़ीसी भी ढ़ील होती
है ? उलटा बहुत ध्यानपूर्वक उसे सम्हाला जाता है । शादी होनेपर भी तुम
लड़कियाँ शुरू-शुरू में बार-बार मायके आती हो और कुछ काल के बाद
ससुराल में इतनी घुलमिल जाती हो, आनंद में रहती हो कि कभी कभार
मायके आ भी जाओगी तो कब मैं ‘मेरे अपने’ घर चली जाऊँ ऐसा सोचती
हो । आसव के बारे में भी वैसा ही हाल है । उसे हेय माना, श्रद्धा में
त्यागनेयोग्य माना तो भी जब तक आस्रव छूटकर शुद्धभाव प्रगट नहीं होता
तब तक अधिक-अधिक उच्च प्रकार के शुभभाव आते ही रहते हैं । शुद्धभाव
प्रगट होनेपर भी पुनः-पुनः आसव होते ही हैं । शुद्धि बढ़ती जाती है तब
आसव पूर्णतः छूटते तो नहीं है परंतु कब मैं मेरे शुद्ध स्वभाव में जाऊँ ऐसी
खटक निरंतर रहती है और एक समय ऐसा आता है कि आसवों का पूर्ण
अभाव होकर मोक्ष दशा, पूर्ण शुद्धि प्रगट होती है ।

जिस माँ के दिल में अपनी बेटी के कल्याण की भावना रहती है वह
लड़की से कहती है, ‘तुझे मायका हेय है, ससुराल उपादेय है, वह तेरा
स्वघर है ।’ जिनवाणी माँ को भी हमारे कल्याण की भावना है, वह बता
रही है, “अनादिकाल से तुम आसव-बंध करते आये हो परंतु वह हेय
तत्त्व है, उन्हें छोड़कर निजतत्त्व का याने स्वजीवतत्त्व का आश्रय लो, तो
संवर-निर्जरा, मोक्ष रूप सुख प्राप्त होगा ।” संवर-निर्जरा प्रगट होनेपर
भी शुरुवात में साथ-साथ में अल्प आसव-बंध कुछ काल तक होते रहेंगे
परंतु कालांतर से उनका अभाव होकर पूर्ण सुखरूप, अनंत सुखरूप मोक्ष
अवस्था प्रगट होगी ।

अधिक चर्चा अगली बार करेंगे ।

शेष शुभ, घर में सब को यथायोग्य नमस्कारादि कहना ।

तुम्हारी माँ

पत्रांक २६ — सात तत्त्व - भेदविज्ञान | Patrānk 26 — Sāt Tattva - Bhedvigyān

१५ जनवरी १९९६

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
सभी पत्रों की एकत्रित झेरॉक्स कॉपी तुम दोनों ने दुबारा पढ़ी ऐसा
तुमने बताया, अच्छी बात है । मोना, महेशजी ने पढ़ा और उन्हें स्टार ट्रैक
जैसा अद्भुत् लगा ऐसा तुमने बताया । कदाचित् अविश्वसनीय भी लगा
होगा । अद्भुत साहित्य भी हम बड़ी उत्कंठता से पढ़ते हैं, वैसे भी अगर तुम
जैसी युवा पिढ़ी ने इसे पढ़ा तो मेरे लिखने का उद्देश्य सफल हुआ ऐसा मैं
समझूँगी । इन लेखों की पुस्तक बनाने की माँग बढ़ रही है । उस दृष्टि
से प्रयत्न शुरू करूँगी । इसलिए अब तक के लेखों में कोई विषय समझ
में न आया हो, समझने में कठिनाई लगती हो, या अन्य कुछ प्रश्न अनुत्तरीत
रहे हो तो अवश्य लिखना ।
अस्तु ! हमारा विषय सात तत्त्वों का चल रहा है । सात तत्त्वों की
विस्तृत चर्चा हम आज तक करते आये हैं । उनके नाम, स्वरूप, वे सात ही
क्यों हैं, उनके संबंध में जीव की विपरीत मान्यतायें, तत्त्वों में हेय-ज्ञेय-उपादेयपना
कैसे घटित करना आदि बातें हमने विस्तार से देखी । हमने यह भी सीखा
था कि ‘तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’ । इसलिए अब तुम कहोगी, ‘वा ! हमें
अब सम्यग्दर्शन हुआ होगा’ ! हां, हां ! ऐसी जल्दी मत करना, ध्यान से
सुनना । यह जो सात तत्त्वों का ज्ञान हुआ है वह तो शब्द्ज्ञान-शास्त्रज्ञान-
बहिरंगज्ञान ही हुआ है । अभी आत्मज्ञान कहाँ हुआ है ? इन सात तत्त्वों
में छिपी हुयी आत्मज्योति अब तक अनुभव में कहाँ आयी है ?
तुम भी अब थोड़ी शास्त्र की भाषा सीख गयी हो इसलिए कहोगी,
‘कम से कम व्यवहार सम्यग्दर्शन तो है ना ?’ ऐसा अगर तुम्हें लगता
होगा तो तुम भ्रम में हो ऐसा मुझे कहना पड़ेगा । कहते हैं, ‘आधा अधूरा
ज्ञान खतरे से खाली नहीं होता’ वैसे ही यह बात हुयी । अहो, जिस जीव ने
इन सात तत्त्वों का अभ्यास करके उनमें से एक स्व चैतन्यतत्त्व ग्रहण किया,
आत्मानुभव किया उसे निश्चय सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है और ऐसा निश्चय
सम्यग्दर्शन होनेपर ही उस जीव का सात तत्त्वसंबंधी जो यथार्थ श्रद्धान होता
है उसे व्यवहार सम्यग्दर्शन कहने में आता है । व्यवहार का अर्थ होता है
उपचार से कहना । इसलिए निश्चय सम्यग्दर्शन से युक्त जीव को ही व्यवहार
सम्यग्दर्शन होता है ।

तुम फिर कहोगी, ‘केवल आत्मा का ही अनुभव करना था तो फिर ये
सात तत्त्व बताये ही क्यों ?’ क्योंकि केवल मैं शुद्ध हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ ऐसे
रटनेमात्र से आत्मानुभूति नहीं होगी । सर्वज्ञ की वाणी में जैसा शुद्ध आत्मा
का स्वरूप बताया गया है वैसा ही अगर श्रद्धान हुआ तो ही आत्मानुभूति हो
सकती है । उसके लिए आगम का अभ्यास और गुरु के उपदेश से ही
यथार्थ तत्त्वनिर्णय करना चाहिए, अंतर्मुख होकर विचार करना चाहिए ।

समयसार ग्रंथ की गाथा क्रमांक १२ में ऐसा बताया है कि ‘नव
तत्त्वों में (पुण्य और पाप को भिन्न बताकर सात तत्त्व को ही नौ तत्त्व कहते
हैं) एक आत्मा ही प्रकाशमान है और नव तत्त्वरूप होकर भी वह अपना
शुद्ध स्वभाव नहीं छोड़ता ।’ इन सात तत्त्वों में कई शुद्धभाव, कई अशुद्धभाव
और कई मिश्रभाव हैं परंतु चेतनास्वभाव तो उन सबसे भिन्न अनुभव में
आता है ।

शास्त्र में अग्नि का दृष्टांत दिया है । जैसे जलती हुयी लकड़ी,
घास या गोबरी को देखनेपर अग्नि भी लकड़ी, घास या गोबरी के आकार
की दिखायी देती है, परंतु अग्नि के मूल ज्वलन स्वभाव को देखनेपर एक
ज्वलन स्वभावरूप ही अग्नि है, भिन्न-भिन्न प्रकार की नहीं यह बात ज्ञान
में आती है ।

हमें आत्मानुभव करना है तो उसके लिए चार बातें आवश्यक हैं -

(१) सच्चे देव, गुरु और शास्त्र का यथार्थ स्वरूप पहचानकर
उनकी दृढ़ श्रद्धा - उक्त विवेचन में हमने देखा था कि जिनेंद्र भगवान
ने बताये हुये उपदेश से ही जीव को सम्यग्दर्शन होगा । उसके लिए जिनेंद्र
का स्वरूप, उन्होंने बताया हुआ उपदेश (सत्शास्त्र) और उस उपदेश को
अंगीकार करके आत्मानुभव करनेवाले भावलिंगी संत इन सबके निर्णय से
ही हमें सच्चा उपदेश प्राप्त होगा । केवल देवपूजा, गुरुपास्ति, स्वाध्याय
याने देव की मात्र पूजा करना, गुरु की सेवा करना और शास्त्र पढ़ लेना
ऐसा अर्थ यहाँ अभिप्रेत नहीं है । उनके बताये हुये मार्गपर चलना ही
सच्ची भक्ति, उपासना है ।
(२) सात तत्त्वों की यथार्थ प्रतीति - सात तत्त्वसंबंधी विपरीत मान्यता
छोड़कर, तत्त्वों का सही स्वरूप जानकर, उनमें हेय ज्ञेय उपादेय तत्त्व की
पहचान और श्रद्धा करके उसपर बारम्बार विचार करके ये तत्त्व सचमुच में
ऐसे ही हैं ऐसा परीक्षापूर्वक निर्णय करना ही प्रतीति करना है ।
(३) स्व-पर भेदविज्ञान - मैं कौन हूँ, पर कौन है इसे जानकर स्व
को स्व जानना और मानना तथा पर को पर जानना एवं मानना । सात तत्त्वों
में स्व-पर भेदविज्ञान करना ।
(४) आत्मानुभूति - स्व कौन है इस बात को जाननेपर, समझनेपर
बारम्बार अंतर्मुख होकर ‘स्व’ की अनुभूति करने का अभ्यास करना । यह
आत्मानुभूति हमें करनी है । आत्मा कैसा है (आत्मा का स्वरूप) और उसका
अनुभव किस विधि से किया जाता है इसका उपदेश अरिहंत भगवंतों ने दिया,
उसके अनुसार अनेक जीवों ने आत्मानुभव किया, अनेक आचार्यों ने ग्रंथरचना
करके यह मार्ग लिखकर रखा, ‘हम स्व को पहचानकर निजवैभव का आनंद
लूट रहे हैं, तुम भी अपने निजवैभव को जानो और उसका उपभोग करो’ -
ऐसा उपदेश उन्होंने दिया है ।
उक्त चार बातों में से पहली दो बातोंपर हमने आज तक विस्तृत चर्चा
की है । आज का हमारा विषय है भेदविज्ञान । यहाँ किसी भी दो चीज़ों में
भेद पाड़ना ऐसा अर्थ नहीं है परंतु एक ओर मैं स्वयं और दूसरी ओर अन्य
चीजें इनमें लक्षण जानकर उसके द्वारा भेद करना ऐसा अर्थ है । भेदविज्ञान
तो सहज ही होता है । नन्हा बालक भी यह मेरी माँ है इस बात को
समझता है । इसकारण अपनी माँ ने दूसरे बालक को हाथ में उठा लेने से
उसे गुस्सा आता है, रोना आता है ।
अभी-अभी ऊपर बताया था उसके अनुसार भेदविज्ञान में जिन दो चीज़ों
में-पार्टियों में भेद करना है उसमें से एक पार्टी ‘मैं स्वयं’ होना जरूरी है
और दूसरी पार्टी में अन्य बातें । मात्र दो भिन्न पार्टियों में भिन्नता करना
भेदविज्ञान नहीं कहलाता ।
अभी क्रिकेट मॅचेस चल रही हैं । उसमें इंग्लंड, न्यूझीलंड, श्रीलंका
आदि आपस में खेलते हैं उस समय उसमें कौन जीत रहा है, कौन हार
रहा है उसके बारे में हमें बहुत ज्यादा चिंता नहीं होती । परंतु कल की
ही बात देखो, भारत और पाकिस्तान के बीच में मॅच था तब करोडों लोगों
की नजरें T. V. स्क्रीनपर लगी हुयी थी, और हर क्षण श्वास को थामकर
कौन जीत रहा है इसपर सारा ध्यान लगा हुआ था, क्योंकि उनमें से एक
पार्टी हम थे ।
वहाँ मैदान में ११-११ खिलाड़ी खेल रहे थे परंतु पूरे भारत का प्रतिनिधित्व
करने के कारण यह टीम ही भारत अर्थात् हम हैं ऐसा सभी भारतवासियों
ने बिना सिखाये, बिना बताये मन में पक्का किया था, इस बात को सहज ही
ग्रहण किया था, जान लिया था और हमारी जीत होते ही याने इस खेलनेवाली
टीम की जीत होते ही पूरे भारतभर में आनंद का उफान आया था ।
उसीतरह आत्मा ही मैं हूँ ऐसा अहंभाव ‘मैं’ ऐसा पक्का निर्णय होगा
तब दूसरी पार्टी में शरीर, कर्म, राग-द्वेष और अन्य सभी पदार्थ होंगे । हम
सब जीवों का प्रतिनिधित्व (Represent) करनेवाला कोई आत्मा (जीव) इस
दूसरी पार्टी को पराभूत करके पूर्ण शुद्धरूप को प्राप्त होगा अर्थात् सिद्ध
परमेष्ठी बनेगा, कायम के लिए मुक्त होगा तब ऐसे वक्तपर हम सब को
आनंद का उफान न आये तो ही आश्चर्य की बात होगी । तद्वत् ही जिसने
अरिहंत अवस्था प्राप्त की उसके प्रति हमारा मन अत्यंत भक्ति से, आदर से,
आनंद से भर जाये यह तो सहज बात है । उसीप्रकार जो मुनि हैं-आचार्य,
उपाध्याय, साधु हैं, जिन्होंने यह मोक्षमार्ग अपने में प्रगट किया हुआ है उन्हें
देखकर या उनके गुणों का स्मरण होते ही हमारे में भक्तिभाव जागृत होना
भी सहज बात है । इसतरह भक्ति और आनंद न होता हो तो ही अचरज
की बात है ।
जिस मोक्षमार्ग का अवलंबन करके वे अरिहंत और गुरु बन गये उस
मार्ग का उपदेश उन्होंने अखिल विश्व को दिया, कोई भी Trade secret रखा
नहीं, किसी भी मत-पंथ का दुराग्रह रखा नहीं, प्राणिमात्र को यह उपदेश
दिया । यह उपदेश अर्थात् केवलीप्रणीत धर्म अर्थात् सत्शास्त्र उसके प्रति भक्तिभाव
उमड़ना सहज में होता है उसके लिए किसी के बताने की, जोर जबरदस्ती
करने की आवश्यकता ही नहीं रहती ।
‘मैं’ कौन हूँ समझते ही अपनी पार्टी ख्याल में आती है, बाकी की
बातें सहज होती हैं । सारा गडबड घोटाला यहींपर है, मूल में ही भूल
है । ‘मैं’ समझने में ही भूल हो गयी है इसलिए विरोधी पार्टी को ही अपनी
पार्टी समझकर उन्हें ‘चिअर अप’ करने में हमने आज तक का काल गँवाया
और मूर्खता की है ।
इस ‘मैं’ का याने ‘स्व’ का अर्थात् आत्मा का स्वरूप क्या है यह तो
सुनो । सुनने के बाद वह सही है या गलत इसका निर्णय करना तो तुम्हारे
हाथ में है । परंतु बिना सुने समझे निषेध मत करना ।
विश्व की समस्त बातें, सभी पदार्थ इन सात तत्त्वों में गर्भित हैं । इनमें
मैं और अन्य सब कुछ ऐसी दो पार्टियाँ हैं । मैं अर्थात् केवल मैं याने
जीवतत्त्व-जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन है वह मैं हूँ और पर में अजीवतत्त्व, आस्रवतत्त्व,
बंधतत्त्व, संवरतत्त्व, निर्जरातत्त्व और मोक्षतत्त्व सब आते हैं ।
देखो, हम ऐसा समझेंगे कि तराजू के दो पलड़ों में से एक पलड़े
में मैं-ज्ञान दर्शनमय जीवतत्त्व और दूसरे पलड़े में विश्व के समस्त चराचर
पदार्थ-अन्य अनंत जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, धनसंपत्ति, दुनिया
का समस्त वैभव, पृथ्वी, ग्रह, तारे, नक्षत्र, स्वर्ग, नरक सब कुछ इतना ही
नहीं परंतु राग-द्वेषरूपी विकारी पर्यायें तथा संवर निर्जरा मोक्षरूपी शुद्ध
पर्यायें; फिर भी ‘मैं’ वाला पलड़ा ही भारी होगा । विश्व के इन समस्त तत्त्वों
से ‘मैं’ भिन्न तो हूँ ही, सभी से श्रेष्ठ भी हूँ। इन सब चीज़ों को एक समय
में जानने की मेरी शक्ति है । समयसार गाथा ३१ में लिखा ही है कि यह
आत्मा अन्य द्रव्यों से ज्ञान स्वभाव के कारण ‘अधिक’ है, श्रेष्ठ है । गाथा
का अर्थ इसप्रकार है, “जो इंद्रियों को जीतकर ज्ञानस्वभाव के द्वारा
अन्य द्रव्य से अधिक आत्मा को जानते हैं उन्हें, जो निश्चय नय में स्थित
साधु हैं वे, वास्तव में जितेंद्रिय कहते हैं ।” यहाँपर मनुष्यपर्याय के बारे
में या वर्तमान प्रगट ज्ञान के बारे में चर्चा नहीं हो रही है परंतु ‘मैं’ कहते
ही त्रिकाल शुद्ध केवलज्ञान शक्तिरूप अनंत गुणसंपन्न मैं एक-उस मैं अर्थात्
‘स्व’ के बारे में हम चर्चा कर रहे हैं और ऐसे ‘मैं’ याने ‘स्व’ का अनुभव
हमें करना है ।
हमारी रोज की जिंदगी में बोलते समय हम ‘मैं’ शब्द का उपयोग
शरीरसहित इस मनुष्यपर्याय को सूचित करने के लिए करते हैं । वैसा बोलना
योग्य होनेपर भी वह उपचार कथन है । उपचार तो कथनमात्र के लिए होता
है परंतु वैसा ही मान लेना भूल है ।
जैसे माँ कहते ही जन्म देनेवाली मेरी माँ यह बात हमारे ज्ञान में आती
है । हर व्यक्ति की अपनी स्वयं की माँ होती है और वह एक ही होती
है । अब उपचार से सास को भी माँ कहते हैं, सौतेली माँ को भी माँ कहते
हैं और सभा में ‘मेरी माता बहने’ कहकर लाखों महिलाओं को माता कहने
में आता है । परंतु वह उपचार है, कथनमात्र के लिए है । तुम दोनों को
पूछा जाये, ‘तुम्हारी माता कौन है ?’ तो तुम केवल मेरे तरफ ही इशारा
करोगी । उस समय दुनिया की अन्य सब महिलायें क्या माता नहीं हैं ? हैं,
परंतु वे तुम्हारी माता नहीं है ।
उसीप्रकार मेरा ज्ञानदर्शन जिसमें है वह जीवतत्त्व कहनेपर सहज ही
सवाल उठता है कि विश्व के अन्य जीव क्या जीव नहीं हैं ? उसका उत्तर
ऐसा है कि वे सब जीव तो हैं हि, परंतु ‘स्व’ जीव अथवा मेरा जीवतत्त्व नहीं
हैं । मेरा जीवपना उनमें नहीं है इसलिए मेरी अपेक्षा से उन्हें अजीवतत्त्व
कहने में आता है ।
स्व जीवतत्त्व की अपेक्षा से अन्य सब जीव-माँ, बाप, पुत्र, देव, गुरु,
तथा अन्य समस्त जीव अजीवतत्त्व हैं । अरिहंत-सिद्धों को अजीवतत्त्व कहते
ही लोगों को ठेस पहुँचती है, उनमें खलबली मचती है, यह बात रुचती नहीं
है और गले उतरती नहीं है, पचती नहीं है ।
सोलापूर में इंद्रध्वजविधान के साथ शिबिर आयोजित किया था, तब की
बात है । मैं छहढ़ाला की दूसरी ढ़ाल पढ़ा रही थी । उस समय अजीवतत्त्व
का स्वरूप सुनकर अनेक महिलाओं ने अरिहंत सिद्धों को अजीवतत्त्व कहनेपर
विरोध दर्शाया, क्लास में खलबली मच गयी । विस्तार से बार-बार समझाया,
अपेक्षा समझाकर बताया फिर भी, ‘अहो ! ऐसा कहने में अरिहंत सिद्धों को
अजीवतत्त्व कहने में बहुत ऑकवर्ड लगता है ।’ ऐसा एक महिला ने बताया
और दूसरी महिलाओं ने उसकी हाँ में हाँ भर दी । अभी तो ऐसे जीवों को
इनको अजीवतत्त्व कहने में भी भारी कठिनाई महसूस होती है तो वे मानने
को कब तैयार होंगे ?

अजीवतत्त्व तथा अन्य सब तत्त्वों का स्वरूप हम पहले ही देख चुके
हैं । इसलिए दुबारा लिखने की जरूरत नहीं है ।

सवाल तो यह है कि आप ‘मैं’ याने ‘स्व’ को पहचानो ऐसा कहते हैं
तो किसतरह पहचाने ? कुंदकुंद आचार्य ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है ।
वे कहते हैं, ‘अरे ! यह आत्मा तो आबाल गोपाल सबके निरंतर अनुभव में
आ ही रहा है ।’ ‘क्या कहती हो ?’ कहकर तुम अचरज में पड़ गयी हो,
है ना ? अपनी इस ‘अद्भुत कथा’ का रहस्योद्घाटन अब अगले पत्र में
करना पड़ेगा ।

तुम्हारी माँ

अयि कथमपि मृत्वा तत्त्व कौतूहली सन्
अनुभव भवमूर्तेः पार्श्ववर्ती मुहूर्त्तम् ।
पृथगथ विलसंतं स्वं समालोक्य येन
त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहं ।।
अरे भाई ! किसी भी प्रकारसे - मरकर भी महाकष्ट से भी
आत्मतत्त्व का जिज्ञासु कौतूहली होकर इस शरीरादि मूर्त द्रव्य
का दो घड़ी के लिए पड़ौसी होकर आत्मानुभव कर कि जिससे
अपने आत्मा के विलासरूप, सर्व परद्रव्यों से भिन्न देखकर इस
शरीरादि मूर्तिक पुद्गलद्रव्य के साथ एकत्व के मोह को शीघ्र
ही छोड़ देना ।

  • श्री. अमृतचंद्राचार्य ‘समयसार कलश’ २३ - १

पत्रांक २७ — सात तत्त्व - आत्मानुभूति | Patrānk 27 — Sāt Tattva - Ātmānubhūti

२६ फरवरी १९९६

प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
तुम दोनों इस पत्र का बहुत ही आतुरता और उत्कंठता के साथ इन्तजार
कर रही हो ऐसा तुमने बताया । शास्त्र स्वाध्याय का प्रयोजन ही यह है कि
वीतरागता की प्राप्ति करना अर्थात् आत्मानुभूति करना । जाहिर है कि हर
मुमुक्षु जीव को आत्मानुभूति की तीव्र लगन लगती है । उसकी यह तीव्र रुचि
ही उसके उपयोग को आत्मसन्मुख होने में मददगार होती है।
‘सात तत्त्वों में एक चैतन्यज्योतिस्वरूप आत्मा ही प्रकाशमान है और
वह नित्य उद्योतरूप है, निरंतर सबके अनुभव में आ रहा है’ ऐसा आचार्य
कहते हैं तब सवाल उठता है कि, ‘फिर वह आत्मा हमारे अनुभव में क्यों
नहीं आता ?’
देखो तो, ‘वह आत्मा’ कहकर हमने अपने को भिन्न माना और आत्मा
को ‘अन्य कोई’ माना । इसके लिए नियमित स्वाध्याय करना, शास्त्र वांचना
जरूरी है । द्रव्य गुण पर्याय, सामान्य विशेष गुण, छह द्रव्यों का स्वरूप, सात
तत्त्वों का स्वरूप आदि बातों का अब तुम्हें ज्ञान हो गया है । अब तुम्हें शास्त्र
तथा धार्मिक साहित्य का स्वयं वाचन करना चाहिए, हो सके तो चर्चा, शिबिर,
प्रवचन सुनने चाहिए । हमें कुछ समझ में नहीं आयेगा यह आशंका करने
की जरूरत नहीं है । अभी भी तुम्हें चार अभाव, छह कारक, निमित्त-
उपादान, निश्चय व्यवहार, लक्षण-लक्षणाभास, कर्म, गुणस्थान आदि अनेक
विषयों का ज्ञान प्राप्त करना बाकी है । उन्हें समझनेपर वस्तुस्वरूप का
यथार्थ निर्णय करने में आसानी होती है ।
सात तत्त्वों से मैं भिन्न हूँ इतना जानकर ‘स्व’ का बोध नहीं होता ।
इसलिए अब इस ‘स्व’ के बारे में अधिक जानकारी ले लेते हैं ।
मैं ज्ञानदर्शनमय हूँ और मेरा कार्य जानना, जानना, जानना हर समय
चालू है । दिनरात यह जानना चल रहा है । यह जानने का कार्य मैं, मेरे
ज्ञान द्वारा कर रहा हूँ । परंतु हमारा संपूर्ण उपयोग (ध्यान, लक्ष्य) जानने
में आनेवाली चीज़ोंपर अर्थात् ‘ज्ञेय’ पदार्थोंपर अर्थात् जिसे जाना जा रहा है
ऐसे पदार्थोंपर केंद्रित हुआ है । जो जानता है वह ‘ज्ञायक’ (ज्ञाता) और जो
जाना जाता है वह ‘ज्ञेय’ ।

अब लिखते समय मुझे कागज दिखायी दे रहा है, उस कागज के
अस्तित्व का मुझे पूरा भरोसा है, पंखे की ठंडी हवा आ रही है उसका
विश्वास है, ट्रॅफिक की आवाज का ज्ञान हो रहा है, बाजूवाले मकान में पेंटिंग
हो रही है उसकी गंध आ रही है । ये सब बातें याने ‘ज्ञेय’ मेरे ज्ञान में
आ रहे हैं । इन सभी बातों का मुझे ज्ञान हो रहा है । परंतु इन सब को
जाननेवाला मैं हूँ, मैं मेरे ज्ञान द्वारा इन सब बातों को जान रहा हूँ ऐसी
अनुभूति-ऐसा ज्ञान हर एक को हर समय होता है फिर भी आज तक हमने
उसकी तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया ।

पुस्तक में अक्षर छपे हुये हैं परंतु पुस्तक में ज्ञानगुण नहीं होने से
अक्षर का ज्ञान पुस्तक को नहीं होता तथा उन अक्षरों द्वारा जो अर्थ अभिप्रेत
हो रहा है उसका ज्ञान भी पुस्तक को नहीं होता । मैं ज्ञानमय हूँ तथा
ज्ञान द्वारा अन्य बातों को जान सकता हूँ । पुस्तक के अक्षरों का तथा उनके
अर्थ का भी ज्ञान करनेवाला मैं ज्ञायक हूँ और मैं उन्हें जान रहा हूँ इसलिए
वे मेरे ज्ञेय हैं ।

‘पर’ ज्ञेय को जानने में तो हम सब बहुत होशियार हैं । सवाल है
‘स्व’ को अर्थात स्व ज्ञेय को जानने का । हर समय हमारी जानने की
क्रिया चल रही है वह केवल ज्ञेय को ही प्रसिद्ध नहीं करती, ज्ञायक की
भी प्रसिद्धी करती है ।

मोना, तुम हमें एलोरा की गुफायें दिखाने ले गयी थी । गुफाओं में
अंधःकार के कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था । इतने में गाईड ने
लाईट चालू करके वहाँ के शिल्प, मूर्ती आदि दिखाना प्रारंभ किया । तब सभी
लोग मूर्ती एवं शिल्पकला को सराहने लगे, ‘वाह वा !’ करने लगे । वे
मूर्तियाँ एवं शिल्प तो प्रथम से ही वहाँ मौजूद थे परंतु प्रकाश होते ही उनका
सौंदर्य दिखायी देने लगा । क्या वह शिल्प केवल स्वयं को ही प्रसिद्ध न करते
हुये, स्वयं के साथ उस प्रकाश को भी प्रसिद्ध नहीं करता था ? अर्थात् वह
शिल्प प्रकाश का भी अस्तित्व बता रहा था । परंतु इस बात की ओर हमारा
ध्यान ही नहीं जाता ।

स्वच्छ और स्थिर पानी में जो प्रतिबिंब दिखायी देता है वह पानी की
स्वच्छता जाहिर करता है । दर्पण में जो प्रतिबिंब है वह दर्पण की स्वच्छता
प्रसिद्ध करता है । हम दीवार के सामने खड़े न होकर, दर्पण के सामने
खड़े होकर अपना प्रतिबिंब निहारते हैं क्योंकि पदार्थों को प्रतिबिंबित करने
का गुण दर्पण में है । दर्पण में तो केवल रंग-रूप ही प्रतिबिंबित होते हैं परंतु
ज्ञानदर्पण की ऐसी विशेषता है कि उसमें रूपी पदार्थों के स्पर्श, रस, गंध,
वर्ण, आवाज तो झलकते ही हैं परंतु अरूपी पदार्थ (पुद्गल को छोड़कर अन्य
पांच द्रव्य), सूक्ष्म पदार्थ (कर्म आदि), दूरवर्ती पदार्थ (असंख्यात द्वीप, समुद्र,
स्वर्ग, नरक आदि), सभी द्रव्यों की भूत, वर्तमान, भविष्य की पर्यायें तथा
स्वयं के भी अनंत गुण पर्याय इन सभी को एकसाथ एक समय में जानने
का सामर्थ्य उस ज्ञान में है ।

स्व और पर का भेदज्ञान करना यह इसका तात्पर्य है । भिन्न-भिन्न
बातों को लक्षणों द्वारा भिन्न पहचानना । ज्ञान यह ‘स्व’ का प्रगट लक्षण
है और जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन नहीं वह सब ‘पर’ है । हमने आज तक ऐसा
माना था कि आँख, नाक, कान आदि इंद्रियाँ जानने का काम करती हैं,
शरीर को ज्ञान होता है । परंतु अब इतने दिन के अभ्यास से इस बात
का पता चला है कि शरीर तो पुद्गल है क्योंकि उसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण
आदि गुण हैं परंतु ज्ञान नाम का गुण नहीं हैं । मेरा ज्ञान यह लक्षण जिसमें
है वह मैं हूँ ।

प्रत्येक समय में जिसे जान रहे हैं वह ज्ञेय, जो जानता है वह ज्ञाता,
ज्ञान द्वारा जानता है इसलिए ज्ञान यह साधन और जानने की क्रिया ये
चारों बातें विद्यमान हैं अर्थात् मैं ज्ञान द्वारा ज्ञेय को जानता हूँ ये चारों ही बातें
हमारे ज्ञान में आती हैं, अनुभव में आती हैं । जहाँ-जहाँ जानने की क्रिया
होती है वहाँ-वहाँ ज्ञेय, ज्ञाता, ज्ञान और जानने की क्रिया ये सभी बातें हमारे
ख्याल में आती हैं । जानने की पर्याय निरंतर हो रही है इसलिए ये चार बातें
भी निरंतर हमारे ख्याल में आती हैं ।

ये चारों बातें विद्यमान होनेपर और हमारे ज्ञान में आनेपर भी हमारा
संपूर्ण ध्यान केवल ज्ञेयपर ही है । इसलिए ज्ञेय का हमें १००% भरोसा
है । T. V. देखते समय T. V. ज्ञेय है, जिसने जाना वह ज्ञाता, जिसके द्वारा
जाना वह ज्ञान और जाना गया वह क्रिया ऐसी चार बातें हमारे अनुभव में
आती हैं । ऐसा होनेपर भी अगर किसी को बताया कि यह जाननेवाला जो
आत्मा है वही तुम हो तो उत्तर मिलेगा, ‘यह आत्मा फातमा हम कुछ नहीं
जानते’, ‘होता तो दिखता क्यों नहीं ?’ अथवा ‘आप कहते हो तो होगा बाबा
कोई आत्मा !’ आदि ।

स्व-पर भेदविज्ञान और आत्मानुभूति ये प्रत्यक्ष करने से होनेवाली बातें
हैं, प्रात्यक्षिक याने Practical या Experiment की बातें हैं । हम आप सब
जानने का काम तो दिनरात करते ही हैं । वह जानने का काम होते हुये
उसका इन चार प्रकार से विश्लेषण हमें मन में करते रहना चाहिए । खाते
समय, रसोई करते समय, T. V. देखते समय हर समय जो जानने की
क्रिया होती है इसमें मैं जानता हूँ, ज्ञान द्वारा जानता हूँ, जो जानने में आ
रहा है वह ज्ञेय है । ऐसा अभ्यास-प्रैक्टिस करना चाहिए । बारम्बार ऐसा
अभ्यास करने से ‘स्व’ के सन्मुख होने की, स्व की तरफ उपयोग ले जाने
की प्रैक्टिस-आदत-कला आत्मसात होती है ।

तुम कहोगी, “बस इतना ही करना है ना ? फिर तो होगा हमें स्व
पर भेदविज्ञान और आत्मानुभूति ? उसमें क्या बड़ी बात है ? जाननेवाला
वह मैं और ज्ञेय सब ‘पर’, बस हो गया काम !” हां, हां, अरी पहले जरा
सुन लो । सर्वज्ञ भगवान भी स्व को और संपूर्ण पर को जानते हैं, परंतु
हमारे में और उनमें बहुत बड़ा अंतर है । सब जानते हुये भी सर्वज्ञ में मोह,
राग, द्वेष का लेश मात्र भी सद्भाव नहीं है, वे पूर्ण वीतरागी हैं । परंतु हम
जब ज्ञेय वस्तु को जानते हैं तब हमारा ज्ञान मोह, राग, द्वेषों से मिश्रित-
कलुषित होता है ।

ज्ञेय वस्तु को जानते समय मैं केवल जाननेवाला हूँ ऐसा न समझकर
वह ज्ञेय वस्तु ही मैं हूँ अथवा वह ज्ञेय वस्तु मेरी है, मैं उस ज्ञेय वस्तु का
कर्ता हूँ या उसमें बदल करनेवाला हूँ अथवा ज्ञेय वस्तु को भोगनेवाला मैं हूँ
ऐसी विपरीत मान्यता के कारण ज्ञेयसंबंधी ज्ञान भी दूषित हो रहा है । जैसे,
शरीर ज्ञेय है परंतु शरीर ही मैं हूँ ऐसा आज तक इस जीव ने माना है
(एकत्वबुद्धि); बालबच्चे, धनसंपत्ति आदि ज्ञेय हैं परंतु ये सब मेरे हैं ऐसा
इसने माना है (ममत्वबुद्धि); बच्चे बड़े हुये अथवा धन का संयोग हुआ उस
वक्त ये बातें तो मात्र ज्ञेय थी परंतु इस जीव ने माना कि मैंने बच्चों को बड़ा
किया, मैंने धन कमाया आदि (कर्तृत्वबुद्धि); उसीप्रकार पर पदार्थों के संयोग
में सुख माना, वियोग में दुःख माना (भोक्तृत्वबुद्धि) । इसतरह एकत्व, ममत्व,
कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि मान्यताओं से युक्त होने के कारण इस जीव का ज्ञेयसंबंधी
ज्ञान भी विपरीत हो रहा है ।

परपदार्थ मेरे हैं इतना ही मानकर यह जीव रुका नहीं, तो उन पर
पदार्थों के प्रति होनेवाले मोह, राग, द्वेष के परिणाम भी उसके ज्ञान में
झलकने के कारण मोह, राग, द्वेष मेरा स्वरूप है, मेरा स्वभाव है ऐसा भी
इस जीव ने माना । मोह, राग, द्वेष अर्थात् आसव और बंध-विकारी भाव ।

तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञान में आत्मा (ज्ञाता) भी जानने में आ रहा है,
परपदार्थ भी जानने में आ रहे हैं, आत्मा में होनेवाली विकारी-अविकारी भाव
भी जानने में आ रहे हैं और पाप-पुण्य भी जानने में आ रहे हैं । ये सभी
पदार्थ जानने में आनेपर भी ‘मैं’ पना स्व आत्मा में दिखेगा, अन्य सब बातों
में अहंपना, ममपना आदि भासित नहीं होगा तभी स्व अनुभूति होगी । परपदार्थ
अथवा अपने में ही उत्पन्न होनेवाले राग-द्वेष इन्हें जानने या न जानने से
कोई अंतर पड़नेवाला नहीं है; परंतु उन्हें ‘अपना’ जानने में, निजरूप जानने
मानने में मिथ्यात्व होता है । उन्हें पररूप जानने से और स्वयं को ही
निजरूप जानने से तो लाभ ही होगा ।

इस जीव को पर को याने परज्ञेय को जानते समय ये राग-द्वेष उत्पन्न
हो रहे हैं इसलिए स्व-पर भेदविज्ञान करते समय राग-द्वेष को भी पर के
खाते में ड़ालने में आता है । उन्हें पुद्गल कहा है, परद्रव्य कहा है, परभाव
कहा है, चैतन्य का विकार होनेपर भी उन्हें जड़ कहा है । हमें अपने शुद्ध
स्वरूप का अनुभव करना है इसलिए राग-द्वेष को पुद्गल का बताकर उसपर
से हमारा स्वामित्व छुड़ाया है । अपेक्षा ठीक से ध्यान में लेनी चाहिए । अपने
लड़के की शादी होनेपर लड़का अगर जोरु का गुलाम बन जाता है तब माँ
कहती है बेटा अब बहु का हो गया । बेटा तो माँ का है या बहु का ?
उसीतरह राग-द्वेष को पुद्गल समझना यह सब दृष्टि में श्रद्धा में लेने की
बात है । ज्ञान में तो ऐसा ही आयेगा कि राग-द्वेष जीव ही करता है, जीव
की ही वह विकारी अवस्था है ।

डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल ने ‘समयसार अनुशीलन’ भाग १ - पृ. २०८,
२०९ पर इस संदर्भ में विस्तृत विवेचन किया है, उसे पढ़ना । भारिल्लजी ने
लिखा है कि “तेरी आत्मा की सिद्धि इसलिए रुकी हुयी है कि अनुभूतिस्वरूप
भगवान आत्मा निरंतर जानने में आते हुये भी तू उसे निज नहीं जानता,
उसमें अपनापन स्थापित नहीं करता और उसीकाल में जानने में आते हुये
रागादि में अपनापन करता है, परपदार्थों में अपनापन करता है । तेरी इतनी-
सी भूल के कारण तू संसार में भटक रहा है । तू अपनी इस भूल सुधार
ले तो कल्याण होने में देर नहीं ।”

उसी पृष्ठपर स्वामिजी का कथन लिखा है, “अनुभूतिस्वरूप भगवान
आत्मा सदा अंतर में ही विराजमान है, निरन्तर अनुभव में भी आ रहा है;
बस कमी तो इतनी ही है कि ऐसा आत्मज्ञान उदित नहीं हो रहा है कि यह
जो ज्ञायकरूप से ज्ञात हो रहा है, वही मैं हूँ ।”

देखो तो ! है ना ज्ञानियों के हमपर अनंत उपकार ! अनेक वर्षों के
अभ्यास से अध्यात्म का यह विषय उन्होंने अत्यंत सरल भाषा में हमारे
सामने प्रस्तुत किया है ।

तुम कहोगी, “स्व को जाने या पर को जाने, हम ज्ञान ही तो कर
रहे हैं, इसमें आपत्ति-नुकसान क्या है ? और ‘स्व’ को जानने में लाभ
भी क्या होगा ?”

बहुत मार्मिक प्रश्न है और उसका उत्तर भी मार्मिक है । आत्मा ज्ञान,
दर्शन, सुख, वीर्य आदि अनंत गुणों का पिंड है । जहाँ ज्ञान है वहींपर उससे
अविनाभावी संबंध होने से अन्य सभी अनंत गुण हैं । ज्ञान जब स्व को याने
स्वयं के आत्मा को जानता है उससमय आत्मा के सभी अनंत गुणों का वेदन-
अनुभूति होती है और यह अनुभूति ही ‘अतींद्रिय आनंद’ है । अतींद्रिय ज्ञान
अतींद्रिय आनंद से युक्त है । ज्ञान से आनंद भिन्न कर ही नहीं सकते ।
शास्त्रों में विभिन्न गुणों को मुख्य करके उन विशिष्ट गुणों की अपेक्षा से
आत्मा को चिद्यन (चैतन्य का घनपिंड), विज्ञानघन, आनंदघन, वीर्यघन कहा
है । यह अतींद्रिय सुख स्वाधीन है, निरपेक्ष है, बाधारहित है, निराकुल है ।
तुम फिर से कहोगी, “हमें तो पर को जानते हुये भी सुख प्राप्त हो
रहा है । धन कमाते समय, T. V. देखते समय, लड्डू खाते समय हमें तो
सुख ही होता है ।” बेटा, यह इंद्रियसुख पराधीन है, दूसरे की अपेक्षा तो
वहाँ रहती ही है । इंद्रियाँ स्वस्थ होनी चाहिए, धन-संपत्ति, T. V. होना
जरूरी है, बिजली का होना भी जरूरी है । ठीक, इतना सब होनेपर भी
शरीर में रोग या पीड़ा होगी तो इन सब बातों में सुख नहीं भासित होता, यह
सुख कब नष्ट होगा इसका कोई भरोसा नहीं, यह सुख आकुलता से युक्त
है । इस सुख की प्राप्ति के लिए तथा उसे टिकाये रखने के लिए चिंता, भय
और अन्य Tensions - आकुलता तो है ही । तो फिर इसे सुख कैसे कह
सकते हैं ? यह तो सुखाभास है ।
परंतु आत्मा को जानना होगा, उसके आनंद का उपभोग करना होगा
तो आत्मा को कहीं ढूँढ़ने की जरूरत नहीं । मंदिर में, तीर्थक्षेत्र में वह
मिलनेवाला नहीं । मैं स्वयं ही आत्मा हूँ, जिस साधन द्वारा उसे जानना है
वह साधन-ज्ञान तो मेरा स्वभाव है, मैं स्वयं ही ज्ञानमय हूँ और जिस क्रिया
के द्वारा जानना है वह जाननक्रिया तो निरन्तर चल ही रही है ।
इतनी सहज सुलभ प्रक्रिया है । बस, जो ज्ञान परसन्मुख है उसे
स्वसन्मुख करना है । सत्य बात तो यह है कि ‘करना’ यह शब्द भी
अनावश्यक है । ‘स्व’ की रुचि एवं महिमा जागृत होते ही ज्ञान (उपयोग)
बार-बार स्व की तरफ मुड़ जाता है । इस आत्मानुभूति के लिए कोई
भी कर्म आड़ा नहीं आ सकता या कोई भी संयोग इसमें बाधा नहीं ड़ाल
सकता, पंचमकाल भी उसमें बाधक नहीं होता । जिसे आत्मानुभव की इच्छा
एवं लगन नहीं है ऐसे लोग कर्म, संयोग या पंचमकाल को ‘हौआ’ बनाकर
बहाना ढूँढ़ते हैं । क्योंकि अनादि से हमें काम-भोग-बंधन की कथा-
वार्ता ही सुनने में आयी है, वही सुलभ लगती है और परस्पर उपदेश भी
हम उसी का देते हैं । परंतु आत्मा की कथा अत्यंत सहज और सुलभ
होनेपर भी हमने कभी सुनी नहीं और अगर सुनी भी हो तो उसपर विश्वास
नहीं किया । आत्मा के फंदे में फँसकर इन ऐहिक सुखों (?) पर पानी

फेरने को कोई तैयार नहीं ।

परंतु यह सुख अगले भव में साथ आनेवाला नहीं । देखो ना कुछ दिन
पहले अपने सायन की तुम्हारे विद्यालय से थोड़ी दूरीपर स्थित पांच मंजिलवाली
बिल्डिंग क्षणभर में जमीनदोस्त हो गयी । जिंदगीभर की कमायी हुयी
संपत्ति क्या काम आयी ? ढ़ाई साल पहले लातूर में हुये भयंकर भूकंप
में हजारो लोग कुछ क्षणों में मरण को प्राप्त हुये, घरबार-संपत्ति विनाश को
प्राप्त हुयी, सबकुछ मिट्टी में मिल गया । ना जिंदगी का भरोसा ना संपत्ति
का भरोसा ।

अतींद्रिय ज्ञान और आनन्द तो अगले भव में भी साथ जाता है । एक
बार उसका अनुभव करने से उत्तरोत्तर उसमें वृद्धि ही होती जाती है और
पूर्णता होकर केवलज्ञान एवं अनंत सुख की प्राप्ति होती है ।

आत्मानुभव ही जिनशासन है, यही सभी प्रवचनों का सार है । आत्मानुभव
का स्वरूप जानते ही उसको प्रगट करके स्वयं का कल्याण कर लो ऐसा
किसी बुद्धिमान जीव को कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती । तुम
भी यह कल्याण का मार्ग अंगीकार करोगी ही इस बात का मुझे पक्का
विश्वास है ।

अच्छा, विराम लेती हूँ ।

कल्याणमस्तु,

                                                                 तुम्हारी माँ