पत्रांक १९ — प्रयोजनभूत तत्त्व | Patrānk 19 — Prayojanbhūt Tattva
११ मई १९९५
प्रिय रीना एवं मोना,
अनेक उत्तम शुभाशीर्वाद ।
रीना, तुम पूना आयी थी, तुम्हें पता है कि तुमने प्रतिदिन ७ घण्टे ऐसे
१० दिवसीय शिबीर का लाभ लिया तो तुम्हें ७० घण्टे का प्राथमिक ज्ञान
प्राप्त हुआ । अगर तुम मायके में पूरा एक महिना भी रहती तो भी तुम्हें
यह ज्ञान प्राप्त न होता ! क्योंकि वहाँ तुम बेटी के नाते नहीं अपितु शिष्या
बनकर आयी थी ।
मोना, तुम तो दवाखाने के उद्घाटन की तैयारी में व्यस्त होने से आ
नहीं सकी इसका मुझे दुःख हुआ । अरी, रीना भी रोज आधा घण्टा बालकों
का क्लास चलाती थी । तुम्हारे पिताजी चार घण्टे, मैं तीन घण्टे, ढोकर
गुरुजी एक घण्टा और रीना आधा घण्टा पढ़ाते थे इसप्रकार कुल साढ़ेआठ
घण्टों का प्रतिदिन प्रोग्रॅम रहता था । अस्तु, दवाखाने में शुरू-शुरू में काफ़ी
समय खाली रहता है । वहाँ बैठे-बैठे तत्त्वज्ञान के अभ्यास का अवसर प्राप्त
होगा, उस बचे हुये वक्त का अधिक से अधिक लाभ उठा लो ।
रीना-मोना, गत पत्र में हमने चारित्र गुण की चर्चा की थी । द्रव्य, गुण,
पर्याय के अभ्यास द्वारा हमने पहले भी देखा था कि गुण उसके द्रव्य के
संपूर्ण भागों में रहते हैं । तात्पर्य यह हुआ कि जीवद्रव्य का ज्ञान गुण उसके
संपूर्ण भागों में रहता है, श्रद्धा गुण जीव के संपूर्ण भागों में रहता है तद्वत्
चारित्र गुण भी जीव के संपूर्ण भागों में रहता है ।
अर्थात् जितना (जो) क्षेत्र द्रव्य का होता है, उतना ही (वही) क्षेत्र उसके
प्रत्येक गुण का होता है और जितना (जो) क्षेत्र गुण का होता है उतना ही
(वही) क्षेत्र उस गुण की पर्यायों का होता है । इसका अर्थ यह हुआ कि
जो जीवद्रव्य का क्षेत्र है, वही उसके चारित्र गुण का क्षेत्र और वही चारित्र गुण
की पर्याय का क्षेत्र है । इससे इस बात का पता चलता है कि किसी भी द्रव्य
के गुणों की पर्यायें याने द्रव्य की पर्यायें उस विशिष्ट द्रव्य के क्षेत्र तक ही
मर्यादित रहती हैं, द्रव्य को छोड़कर द्रव्य के बाहर वे पर्यायें जा नहीं सकती,
फैल नहीं सकती ।
जीव के चारित्र गुण की विभावपर्याय याने कषाय (क्रोध, मान, माया,
लोभ) हो या स्वभावपर्याय-वीतरागता हो, उस पर्याय का क्षेत्र जीवद्रव्य के बाहर
नहीं होता । जीवद्रव्य के संपूर्ण भागों में यह पर्याय व्याप्त होती है, जीवद्रव्य
के बाहर अन्य द्रव्य में व्यापती नहीं । इसीलिए चारित्र की पर्याय शरीर में
नहीं, जीवद्रव्य में होती है ।
वर्तमान में हमारी जो मनुष्यपर्याय है - अवस्था है वह असमानजातीय
द्रव्यपर्याय है अर्थात् एक जीवद्रव्य और अनंत पुद्गल परमाणु (आहारवर्गणा,
तेजसवर्गणा, मनोवर्गणा, कार्माणवर्गणा आदि) ऐसे अन्य-अन्य जाति के द्रव्यों
की एकबंधानरूप - संयोगरूप स्थिति है । ऐसे संयोग में रहनेवाला जीव
उसके संयोग में रहनेवाले पुद्गल को याने देह को ‘स्व’ मानता है और
देहाश्रित क्रिया - आचरण (Behaviour) को अपना आचरण याने चारित्र मानता
है तब गडबड घोटाला शुरु होता है ।
जब चारित्र गुण की सकल चारित्र यह अवस्था होगी (तीन कषाय
चौकड़ी का अभाव और संज्वलन कषाय का सद्भाव इनके सहित वीतरागता)
तब उस मनुष्य का (मुनि का) बाह्य आचरण भी तदनुकूल रहता है । उसका
वर्णन चरणानुयोग के विभिन्न ग्रंथों में लिखा हुआ है । शरीर की इन क्रियाओं
को उपचार से चारित्र कहा जाता है । ऐसा कहना १००% सही होनेपर
भी वैसा ही मानना और मात्र बाह्य क्रियाओं को ही चारित्र मानना १००%
गलत है । जैसे कथन में ‘घी का घड़ा’ ऐसा हम कहते हैं परंतु उस समय
मान्यता में ‘जिस घड़े में घी रखा है वह घड़ा’ ऐसा यथार्थ मानते हैं ।
उसीतरह देह के आचरण को चारित्र कहने में दोष नहीं परंतु उस समय
मान्यता में ‘जिस देहधारी जीव के चारित्र गुण की सकल चारित्र यह वीतराग
पर्याय है उस देह की क्रिया’ ऐसा यथार्थ मानना चाहिए, तो ही वह कथन
भी यथार्थ होगा ।
वस्तुव्यवस्था अर्थात् तत्त्वों का सत्य स्वरूप न जानने से जीव परपदार्थों
को अथवा संयोगों को इष्ट अथवा अनिष्ट मानता है । जो पदार्थ इष्ट भासित
होते हैं उनके प्रति अनुराग उत्पन्न होने से उन पदार्थों को प्राप्त करने की
चेष्टा करता है और जो पदार्थ अनिष्ट भासित होते हैं उनके प्रति द्वेष उत्पन्न
होने से उन पदार्थों को दूर करने की इच्छा होती है तब वैसी चेष्टा करता
है । इससे ज्ञात होता है कि परपदार्थ या संयोग रागद्वेष के कारण नहीं होते
परंतु मिथ्यात्व (अतत्त्वश्रद्धान) यही कषायों का कारण है । तत्त्वों के संबंध में
विपरीत श्रद्धा, विपरीत ज्ञान एवं तदनुसार होनेवाला विपरीत आचरण इसी को
मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र कहते हैं । अनादि से चला आ रहा
यह मिथ्यात्व सहज ही याने उपजते ही याने निसर्गज है, इसे अगृहित
मिथ्यात्व कहते हैं । तथा कुदेव, कुगुरु, कुशास्त्र के उपदेश से नया ग्रहण
किया हुआ मिथ्यात्व ‘गृहित मिथ्यात्व’ है ।
अन्य पशु-पंछियों को तो केवल अगृहित मिथ्यात्व है । परंतु मानवजाति
ने यहाँ भी अपना वर्चस्व (?) दिखा दिया । अगृहित मिथ्यात्व तो था ही,
ऊपर से गृहित मिथ्यात्व को अंगीकार करके वह तीव्र मिथ्यात्वी हुआ ।
सत्य बात यह है कि इस मानव जीवन में करने लायक एक ही
बात है ‘सम्यग्दर्शन की प्राप्ति एवं वीतरागता की वृद्धि’ । प्रत्येक जैन शास्त्र
में इसी का उपदेश दिया है । श्रावकाचार ग्रंथों में भी सर्वप्रथम सम्यग्दर्शन
अधिकार है क्योंकि श्रावक का सर्वप्रथम कर्तव्य सम्यग्दर्शन प्राप्त करना
यही होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को ही धर्म
अर्थात् मोक्षमार्ग कहते हैं । आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में सर्वप्रथम
बताया है -
‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ।’
तत्त्वों के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं । तथा आचार्य समंतभद्र
रत्नकरंड श्रावकाचार में कहते हैं -
‘सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वराः विदुः’ तथा ‘श्रद्धानं परमार्थानाम्
आप्त आगम तपोभृताम्’ सच्चे देव, गुरु, शास्त्र के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन
कहते हैं ।
तुम्हें कदाचित् संभ्रम होगा कि तत्त्वों के श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन करना
चाहिए कि सच्चे देव, गुरु, शास्त्रों के श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन ? अरी, दोनों एक
ही है । तत्त्वों का स्वरूप जाननेपर यह बात तुम्हारें ध्यान में आ जायेगी ।
इसमें सबसे पहले आवश्यक नियम तो यह है कि ये तत्त्व - अरिहंतों
ने - जिनेंद्रों ने बताये हुये तत्त्व ही होना जरूरी है । क्योंकि अन्यमतियों में
भी उनके अपने तत्त्व हैं और वे भी ‘हम आपको मुक्ति दिलाते हैं’ ऐसा दावा
करते हैं । मोक्षमार्गप्रकाशक ग्रंथ में ‘विविध मत समीक्षा’ नामक पांचवां
अध्याय पढ़नेपर विस्तृत जानकारी मिलेगी । छहढ़ाला में कहा है, ‘तातें जिनवर
कथित तत्त्व अभ्यास करिजे’ ।
ये प्रयोजनभूत सात तत्त्व हैं । हाँ, हाँ, मुझे पता है कि अब तुम
प्रश्नों की बरसात करोगी कि तत्त्व का मतलब क्या है ? प्रयोजन याने
क्या ? प्रयोजन तत्त्व का अर्थ क्या होता है ? वे सात ही क्यों हैं और उनके
नाम क्या है ?
तत्त्व याने तत् + त्व = ‘वह पना’, उस वस्तु का वह भाव, वस्तुपना ।
जैसे वृद्धत्व का अर्थ वृद्धपना, मातृत्व का अर्थ मातृपना होता है ।
प्रयोजन याने हेतु अर्थात् कारण । किसी विद्यार्थी से पूछा आपकी पढ़ाई
का प्रयोजन क्या है ? तब वह कहता है मुझे डॉक्टर बनना है यह मेरा
प्रयोजन है । व्यापार करनेवाले का प्रयोजन है धन प्राप्त करके धनवान बनना,
भोजन करनेवाले का प्रयोजन है भूख मिटाना । प्रत्येक जीव का प्रयोजन दुःख
दूर करने अर्थात् सुखी होने का है । ऐसी जो बातें हैं जिनका ज्ञान प्राप्त
करके और जिनकी दृढ़ श्रद्धा - प्रतीति - ये बातें ऐसी ही हैं अन्यथा नहीं ऐसा
पक्का विश्वास - निर्णय हुये बिना हमारा दुःख दूर नहीं होगा और सुख प्राप्त
नहीं होगा उन बातों को प्रयोजनभूत तत्त्व कहते हैं ।
अप्रयोजनभूत बातें जैसी हैं वैसी जानना, मानना अथवा विपरीत मानना
इस कारण से मिथ्यादर्शन नहीं होता परंतु प्रयोजनभूत बातें - तत्त्व अन्यथा
मानने से मिथ्यादर्शन होता है । छहढ़ाला में पं. दौलतरामजी कहते हैं,
‘जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधैं तिनमाहि विपर्ययत्व’ ।
अपना प्रयोजन क्या है ? दुःख दूर करना । किसका ? ‘स्व’ का ।
उसके लिए -
(१) सर्वप्रथम ‘स्व’ कौन है - मैं कौन हूँ इसे जाने बिना ‘स्व’ का
दुःख दूर कैसे होगा ? ‘स्व’ को जानने के लिए ‘स्व’ और पर (आपा पर)
का ज्ञान आवश्यक है ।
(२) ‘स्व’ और पर को एक जानकर पर का उपचार करने से ‘स्व’
का दुःख कैसे दूर होगा ?
(३) ‘स्व’ से पर भिन्न है इसलिए पर में अहंकार ममकार करने
से दुःख ही होता है ।
(४) ‘स्व’ और पर का ज्ञान होने से ही दुःख दूर होगा ।
इसमें स्वतत्त्व है जीवतत्त्व और परतत्त्व हैं अजीवादि तत्त्व । इन अजीवादि
तत्त्वों में हम अब तक एकत्व - अहंकार, ममत्व - ममकार प्रेम करते आये हैं
और दुःखी हो रहे हैं । तुम कहोगी अजीवादि तत्त्व मेरे अपने नहीं हैं तो उन्हें
जाने ही क्यों ? उसका उत्तर है कि पर को जानने में बाधा नहीं है, पर को
अपना मानने में बाधा-नुकसान है । जानने के कारण नुकसान होता तो
केवलज्ञानी संपूर्ण लोकालोक को जानते हैं फिर भी वे अनंत सुखी हैं । स्वतत्त्व
को-जीवतत्त्व को यह मैं हूँ ऐसा जानना है और पर - अजीवादि तत्त्वों को ये
मैं नहीं हूँ ऐसा जानना हैं ।
हमारा प्रयोजन है सुख प्राप्त करना । अनंत सुख मोक्ष में है इसलिए
मोक्षतत्त्व का स्वरूप जानना भी आवश्यक है । कहो तो, मोक्ष कहाँ है ?
स्वर्ग के ऊपर या नीचे ? चक्कर में पड़ गयी ना ? अरी, जहाँ बंध है वहीं
मोक्ष होता है । बंध जीव में होता है और मोक्ष भी जीव में ही होनेवाला
है । बंध और मोक्ष तो जीव की ही अवस्थायें हैं । जीवतत्त्व और अजीवतत्त्व
द्रव्यतत्त्व हैं, अन्य सब तत्त्व उन्हीं की अवस्थायें - पर्यायतत्त्व हैं । बंध का
अभाव होकर मोक्ष होनेवाला है इसलिए मोक्षतत्त्व और बंधतत्त्व का ज्ञान
जरूरी है । इसमें बंध का कारण है आस्रव तत्त्व इसलिए उसे जानना भी
आवश्यक है और मोक्ष का कारण याने मोक्ष का उपाय है संवर और निर्जरा
तत्त्व इसलिए उन्हें यथार्थ जानना भी जरूरी है ।
इसप्रकार ये सात तत्त्व हुये कि जिन्हें जानकर यथार्थ प्रतीति करना
यह सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है । अब इन्हीं तत्त्वों के नाम फिर से क्रम
से लिख रही हूँ- जीव, अजीव, आसव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष । कितना
आसान है ना ? ये नाम तुरन्त याद हो जाते हैं ।
रीना, तुमने पूना शिबिर में देखा है ना, कि ३ साल की सानिका,
५ साल की नताशा, ७ साल का रौनक तथा पीयुष, सुनय, आकाश ये छोटे-
छोटे बच्चे भी छह द्रव्य, सात तत्त्वों के नाम फटाफट बोल देते थे !
गत पत्र में चारित्र गुण की चर्चा में कौनसे कषायों के अभावपूर्वक
कौनसा चारित्र होता है यह हमने देखा था । इन सब के नाम भी बड़े बच्चों
को याद हो गये थे । ४ थी, ५ वी क्लास से लेकर डेंटल - इंजिनियरिंग
कॉलेज तक के ये बच्चे - आशित, दर्शन, प्राचि, नेहा, पूर्वा, सायली, पल्लवी,
मोनिका, अभिजीत, अमित, सुदीप और अन्य भी अनेक, एक दो शिबिरों में
ही इतने परफेक्ट तैयार हो गये हैं कि वे बधाई के पात्र हैं । अंग्रेजी मिडियम
में पढ़नेवाले ये बच्चे रोज साड़ेआठ घण्टे सभी प्रवचनों में उपस्थित रहते थे,
शिबिर की व्यवस्था में जुड़ जाते थे, शाम ६ बजने से पूर्व भोजन करके रीना
तुम्हारे क्लास में आकर बैठते थे । आजकल के बच्चों की आकलन शक्ति
(Grasping Power) बहुत है । पढ़ानेवाले का उत्साह द्विगुणित होता है ।
आज प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी मामुली सी पहचान हुयी । आगामी
कुछ पत्रों द्वारा हम विस्तृत चर्चा करेंगे । निम्नलिखित बातों पर हम विचार
करेंगे ।
तत्त्व किसे कहते हैं ? प्रयोजनभूत तत्त्व कौनसे हैं और कितने हैं ?
तत्त्वों के नाम तथा लक्षण के बारे में विस्तृत चर्चा, प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी
जीव की अनादि से होनेवाली विपरीत मान्यतायें, सात तत्त्वों में हेय, ज्ञेय,
उपादेय तत्त्व कौनसे हैं ? सात तत्त्वों को जानकर उनमें छिपी हुयी आत्मज्योति
कैसे पहचाने ? अर्थात् स्व-पर भेदविज्ञान कैसा करें ? क्योंकि हम शास्त्र-
स्वाध्याय करते हैं, श्रवण वाचन करते हैं वह शब्दज्ञान करने के लिए नहीं
अपितु आत्मज्ञान करने के लिए करते हैं ।
अधिक चर्चा फिर करेंगे । उसके पूर्व १४ मई से ३१ मई तक हम
देवलाली शिक्षण प्रशिक्षण शिबिर में जा रहे हैं ।
तुम्हारी माँ
रीना, तुमने पूना शिबिर में देखा है ना, कि ३ साल की सानिका,
५ साल की नताशा, ७ साल का रौनक तथा पीयुष, सुनय, आकाश ये छोटे-
छोटे बच्चे भी छह द्रव्य, सात तत्त्वों के नाम फटाफट बोल देते थे !
गत पत्र में चारित्र गुण की चर्चा में कौनसे कषायों के अभावपूर्वक
कौनसा चारित्र होता है यह हमने देखा था । इन सब के नाम भी बड़े बच्चों
को याद हो गये थे । ४ थी, ५ वी क्लास से लेकर डेंटल - इंजिनियरिंग
कॉलेज तक के ये बच्चे - आशित, दर्शन, प्राचि, नेहा, पूर्वा, सायली, पल्लवी,
मोनिका, अभिजीत, अमित, सुदीप और अन्य भी अनेक, एक दो शिबिरों में
ही इतने परफेक्ट तैयार हो गये हैं कि वे बधाई के पात्र हैं । अंग्रेजी मिडियम
में पढ़नेवाले ये बच्चे रोज साड़ेआठ घण्टे सभी प्रवचनों में उपस्थित रहते थे,
शिबिर की व्यवस्था में जुड़ जाते थे, शाम ६ बजने से पूर्व भोजन करके रीना
तुम्हारे क्लास में आकर बैठते थे । आजकल के बच्चों की आकलन शक्ति
(Grasping Power) बहुत है । पढ़ानेवाले का उत्साह द्विगुणित होता है ।
आज प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी मामुली सी पहचान हुयी । आगामी
कुछ पत्रों द्वारा हम विस्तृत चर्चा करेंगे । निम्नलिखित बातों पर हम विचार
करेंगे ।
तत्त्व किसे कहते हैं ? प्रयोजनभूत तत्त्व कौनसे हैं और कितने हैं ?
तत्त्वों के नाम तथा लक्षण के बारे में विस्तृत चर्चा, प्रयोजनभूत तत्त्वों संबंधी
जीव की अनादि से होनेवाली विपरीत मान्यतायें, सात तत्त्वों में हेय, ज्ञेय,
उपादेय तत्त्व कौनसे हैं ? सात तत्त्वों को जानकर उनमें छिपी हुयी आत्मज्योति
कैसे पहचाने ? अर्थात् स्व-पर भेदविज्ञान कैसा करें ? क्योंकि हम शास्त्र-
स्वाध्याय करते हैं, श्रवण वाचन करते हैं वह शब्दज्ञान करने के लिए नहीं
अपितु आत्मज्ञान करने के लिए करते हैं ।
अधिक चर्चा फिर करेंगे । उसके पूर्व १४ मई से ३१ मई तक हम
देवलाली शिक्षण प्रशिक्षण शिबिर में जा रहे हैं ।
तुम्हारी माँ