जैन मंदिर हमको लागै प्यारा।।टेक ।।
कैंधौ ब्याह मुकति मंगल गृह, तोरनादि जुत लसत अपारा ।।1 ।।
धर्म केतु सुख हेतु देत गुन, अक्षय पुण्य रतन भण्डारा।।2।।
कहूं पूजन कहूं भजन होत हैं, कहूं बरसत पुन श्रुतरस धारा।।3।।
ध्यानारूढ़ विराजत है जहाँ, वीतराग प्रतिबिम्ब उदारा ।।4 ।।
‘भागचन्द’ तहाँ चलिये भाई, तजिकै गृहकारज अघ भारा।।5।।
Artist: पं० भागचन्द जी
स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’