जय परमेश्वर अविकारी | Jai parmeshwar avikaari

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(तर्ज : जय पारस-जय पारस…)

जय परमेश्वर जय परमेश्वर, जय परमेश्वर अविकारी।
जय परमेश्वर जय परमेश्वर, जय परमेश्वर सुखकारी । टेक।।

स्वयं स्वयं में सहज सदा ही, पूर्ण अहो ज्ञानादिक से।
आप आप में लीन सहज ही, शून्य सर्व रागादिक से ।।
मंगलमय है द्रव्य आपका, परिणति भी मंगलकारी ।।1।।

अशरण जग में शरण तुम्हीं हो, भव्यजनों को हे निष्पाप ।
अहो प्रणेता धर्म तीर्थ के, मेटो भव-भव के सन्ताप ।।
दिव्य तत्त्व दर्शाती प्रभुवर, दिव्य ध्वनि आनन्दकारी ।।2।।

इन्द्रिय सुख तो मूल दुःखों का, परम्परा अति क्लेशमयी ।
आकुलता बिन परम अतीन्द्रिय, सुख परम आह्वादमयी।।
पाऊँ निज में निज से ही, संतुष्ट रहूँ हे भवतारी ।।3।।

अनुपम अविचल ध्रुव चैतन्यपद, जिनवर ! भासा निजपद है।
सांची प्रभुता आज निहारी, जो स्वाधीन निरापद है ।।
हुआ सहज निष्काम, निराकुल, निर्विकल्प शिवमचारी ।।4।।

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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