जै जगपूज परमगुरु नामी, पतित उधारन अंतरजामी ।
दास दुखी, तुम अति उपगारी, सुनिये प्रभु! अरदास हमारी ।।१।।
यह भव घोर समुद्र महा है, भूधर भ्रम-जल-पूर रहा है ।
अंतर दुख दु:सह बहुतेरे, ते बड़वानल साहिब मेरे ।।२।।
जनम जरा गद मरन जहां है, ये ही प्रबल तरंग तहां है ।
आवत विपति नदीगन जामें, मोह महान् मगर इक तामें ।।३।।
तिस मुख जीव पर्यो दुख पावैं, हे जिन! तुम बिन कौन छुड़ावै ।
अशरन-शरन अनुग्रह कीजे, यह दुख मेटि मुकति मुझ दीजे ।।४।।
दीरघ काल गयो बिललावैं, अब ये सूल सहे नहिं जावैं ।
सुनियत यों जिनशासनमाहीं, पंचम काल परमपद नाहीं ।।५।।
कारन पांच मिलैं जब सारे, तब शिव सेवक जाहिं तुम्हारे ।
तातैं यह विनती अब मेरी, स्वामी! शरण लई हम तेरी ।।६।।
प्रभु आगैं चितचाह प्रकासौं, भव भव श्रावक-कुल अभिलासौं ।
भव भव जिन आगम अवगाहौं, भव भव शक्ति शरण की चाहौं ।।७।।
भव भवमें सत संगति पाऊं, भव भव साधनके गुन गाऊं ।
परनिंदा मुख भूलि न भाखूं, मैत्रीभाव सबनसों राखूं ।।८।।
भव भव अनुभव आतमकेरा, होहु समाधिमरण नित मेरा ।
जबलौं जनम जगतमें लाधौं, काललबधि बल लहि शिव साधौं ।।९।।
तबलौं ये प्रापति मुझ हूजौ, भक्ति प्रताप मनोरथ पूजौ ।
प्रभु सब समरथ हम यह लोरैं, ‘भूधर’ अरज करत कर जोरैं ।।१०।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ५५ से ५६
