जागो-जागो, आलस त्यागो, करो आत्म कल्याण रे।
अवसर मिला महान् रे ।। टेक ।।
मोह नींद में सोते सोते, काल अनंत गँवाया।
पर्यायों से तन्मय माना, भव-भव में भरमाया।।
अति पुण्य खिला, जिनदर्श मिला, पहिचानो निज भगवान् रे ।। 1 ।।
जिनवाणी सी मात मिली है, सुनो सीख सुखकारी।
तत्त्वों का निर्णय उर लाओ, भेदज्ञान ही दुखहारी।।
शुद्धातम भाओ, अनुभव लाओ, होवो सम्यक्वान रे।। 2 ।।
जल बुद-बुद सम जग की माया, चंचल अस्थिर जानो ।
मानुष भव की थिति अति थोड़ी, हित का उद्यम ठानो ।।
गृहवास तजो, वनवास भजो, धर मुनिपद आनंदखान रे ।। 3 ।।
तत्त्व भावना भाते-भाते, लीन स्वयं में होओ।
ज्ञान सिन्धु में हो निमग्न, तुम सकल कर्म मल धोओ।।
निज ध्यान बढ़े, गुणस्थान चढ़े, फिर पाओ पद निर्वाण रे ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’