जगत् में होनहार सो होवै, सुर नृप नाहिं मिटावै।। टेक ।।
आदिनाथ से कौं भोजन में, अन्तराय उपजावै ।
पारसप्रभु कौं ध्यान लीन लखि कमठ मेघ बरसावै ।।1।।
लक्ष्मन से संग भ्राता जाकै, सीता राम गमावै ।
प्रतिनारायण रावण से की, हनुमत लंक जरावै।।2।।
जैसो कमावै तैसो ही पावै, यों ‘बुधजन’ समझावै ।
आप आपकौ आप कमावो, क्यों परद्रव्य कमावै।।3।।
Artist: बुधजन
स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’