जगत गुरु कब निज आतम ध्याऊँ | Jagat Guru Kab Nij Aatam Dhyaun

जगत गुरु कब निज आतम ध्याऊँ

(दुर्गा)

जगत गुरु कब निज आतम ध्याऊँ ॥टेर ॥

नग्न दिगम्बर मुद्रा धरके कब निज आतम ध्याऊँ ।
ऐसी लब्धि होय कब मोकूँ, जो वाँछित पाऊँ ॥१॥

कब गृह त्याग होऊँ बनवासी, परम पुरुष लौ लाऊँ ।
रहूँ अडोल जोड पद्मासन, करम कलंक खिपाऊँ ॥२॥

केवल ज्ञान प्रकट कर अपनो, लोकालोक लखाऊँ ।
जन्म जरा दुख देत जलांजलि हो कब सिद्ध कहाऊँ ॥३॥

सुख अनन्त विलसूं तिंह थानक, काल अनन्त गमाऊँ।
‘मानसिंह’ महिमा निज प्रकटे, बहुरि न भव में आऊँ ॥४ ॥


स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६ (विभिन्न कवियों के भजन)