जग में सन्त चरण सुखकार | jaga mem santa charana sukhakara

तर्ज : मन लागे…

जग में सन्त चरण सुखकार,
कब पाऊँ, कब पाऊँ, कब पाऊँ रे।
जग में निर्ग्रन्थ पद ही सार,

प्रगटाऊँ, प्रगटाऊँ, प्रगटाऊँ रे।। टेक ।।

परिग्रह भोग दिखें दुःखकार,
वन जाऊँ, वन जाऊँ, वन जाऊँ रे।
सहज ज्ञायक प्रभु अविकार,
नित ध्याऊँ, नित ध्याऊँ, नित ध्याऊँ रे ।। 1 ।।

क्लेशमय सब विभाव असार,
नहीं चाहूँ, नहीं चाहूँ, नहीं चाहूँ रे।
वर्ते शुद्धोपयोग सुखमय,
निज भाऊँ, निज भाऊँ, निज भाऊँ रे ।। 2 ।।

सहज परिपूर्ण शुद्धातम सार,
रम जाऊँ, रम जाऊँ, रम जाऊँ रे।
शुद्ध रत्नत्रय भाव सुधार,
तिर जाऊँ, तिर जाऊँ, तिर जाऊँ रे ।। 3 ।।

छूटें कर्म-कलंक असार,
शिव पाऊँ, शिव पाऊँ, शिव पाऊँ रे।
हो न आवागमन संसार,
सिद्धालय तिष्ठाऊँ, तिष्ठाऊँ, तिष्ठाऊँ रे ।।4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’