तर्ज : कैसे करूँ गुणगान…
जागा है पुण्य महान्, प्रभुवर भक्ति करूँ।
गाऊँ गुण भगवान्, प्रभुवर भक्ति करूँ । ।टेक ।।
गुण अनन्त मैं कैसे भाऊँ, अनुभव में भी अनन्त लखाऊँ
आनन्द होय महान् । ।।1।।
आत्मलीन धनि धनि भगवन्त, प्रगटायो दर्शन ज्ञान अनन्त ।
झलके सकल जहान । ।2 ।।
पूर्ण निराकुल सुख है अनन्त, अद्भुत वीरज है भगवन्त।
प्रभुता अनन्त महान्।।3।।
पूर्ण वीतरागी अविकारी, दिव्यध्वनि जग मंगलकारी।
करे विश्व कल्याण।।4।।
तुम निरखत सब दुःख नशावे, आनन्दमय चिद्रूप दिखावे ।
होय मोह की हान ।।5।।
यही भावना निजपद ध्याऊँ, प्रभु सम गुण निज में प्रगटाऊँ।
पाऊँ शिवपुर थान।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’