जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई
जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई ।
तबतैं संशय विमोह भरमता विलाई ।।जबतैं।।
मैं हूँ चितचिह्न, भिन्न परतैं, पर जड़स्वरूप,
दोउनकी एकतासु, जानी दुखदाई ।।१।। जबतैं. ।।
रागादिक बंधहेत, बधन बहु विपति देत,
संवर हित जान तासु, हेत ज्ञानताई ।।२।। जबतैं. ।।
सब सुखमय शिव है तसु, कारन विधिझारन इमि,
तत्त्व की विचारन जिन-वानि सुधिकराई ।।३।। जबतैं. ।।
विषयचाहज्वालतैं, दह्यो अनंतकालतैं,
सुधांबुस्यात्पदांकगाह तें प्रशांति आई ।।४।। जबतैं. ।।
या विन जगजालमें, न शरन तीनकालमें,
सम्हाल चित भजो सदीव, ‘दौल’ यह सुहाई ।।५।। जबतैं. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ४६ से ४७