जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई | Jabatain Anandajanani Drishti Pari Mai

जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई

जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई ।
तबतैं संशय विमोह भरमता विलाई ।।जबतैं।।

मैं हूँ चितचिह्न, भिन्न परतैं, पर जड़स्वरूप,
दोउनकी एकतासु, जानी दुखदाई ।।१।। जबतैं. ।।

रागादिक बंधहेत, बधन बहु विपति देत,
संवर हित जान तासु, हेत ज्ञानताई ।।२।। जबतैं. ।।

सब सुखमय शिव है तसु, कारन विधिझारन इमि,
तत्त्व की विचारन जिन-वानि सुधिकराई ।।३।। जबतैं. ।।

विषयचाहज्वालतैं, दह्यो अनंतकालतैं,
सुधांबुस्यात्पदांकगाह तें प्रशांति आई ।।४।। जबतैं. ।।

या विन जगजालमें, न शरन तीनकालमें,
सम्हाल चित भजो सदीव, ‘दौल’ यह सुहाई ।।५।। जबतैं. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ४६ से ४७

अर्थ

जब से ये आनन्ददाता आनन्द को जन्म देनेवाले विचार आए हैं, सोचने की स्पष्ट दिशा बनी है तब से संशय, विमोह और विभ्रम मिटने लगे हैं। मैं चैतन्य हूँ, ‘पर’ से अर्थात् जड़-पुद्गल से भिन्न हूँ। किन्तु अब तक मैं दोनों को एक ही मानता रहा। अब जाना कि दुःख का कारण यही है। राग आदि बंध के कारण हैं, उनके कारण हुए कर्मबंधन अत्यन्त विपत्तियों के देनेवाले हैं। उनको रोकने के लिए संवर का होना ही एकमात्र हित साधन है, इसका भान, इसका बोध ही ज्ञान है। यह आत्मा आनन्द का भंडार है, आनन्दमय है। तत्त्वों के विचार से कर्मों की निर्जरा होती है। ऐसा बोध-स्मरण जिनवाणी के पढ़ने, सुनने, मनन करने से होता है।

विषय-भोगों की कामना लालसा की आग में अनंतकाल से मैं जल रहा हूँ। वस्तु के समस्त पहलुओं को देखने-समझने की स्याद्वाद प्रणाली से वस्तु-स्वरूप समझ में आने लगा और शान्ति का अनुभव हुआ; व्यग्रता-आकुलता मिटने लगी। इस संसार के व्यूहजाल से छूटने के लिए, इसके सिवा तीनकाल में भी कोई शरण नहीं है। प्रमाद छोड़कर इसका यत्नपूर्वक सदैव मनन अध्ययन करो। दौलतराम कहते हैं ऐसा करना ही सुहावना लगता है, भला भाता है।

शब्दार्थ: विधि = कर्म; सुधांबुस्यात्पदांकगाह = स्याद्वादरूपी अमृत के समुद्र में डूबे हुए, अवगाह करनेवाले।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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