तर्ज : तुमसे लागी लगन…
जब से प्रीति लगी, ज्ञान ज्योति जगी, जिनवर प्यारा।
छूटा-छूटा जी संशय हमारा ।। टेक ।।
पल नहिं छोडूं शरण, सुखकर तेरे चरण, संकटहारा।
हमने आतम स्वरूप निहारा ।। 1।।
अब तक पर को थे अपना बताकर, जड़-चेतन का भेद न पाकर ।
जीवन खोया वृथा, पाली मिथ्या प्रथा, धर्म विसारा।। 2।।
पाई दर्शन से सच्ची निधि है, सुखकर ग्रन्थों से वरणी विधि है।
सम्यक् ज्ञानी बनें, आत्म ध्यानी बनें, दृढ़ चित धारा।। 3।।
मोह ममता को दूर भगावें, होके मुनिवर निजातम को ध्यावें।
आवे कब वह घड़ी, टूटे कर्मन लड़ी, मंगलकारा।। 4।।
निज को निज में ही निशदिन ध्यावें, मुक्ति का राज्य निज में ही पावें।
विकृति सब तजें, सिद्धालय में बसें, निर्विकारा।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४३ से ४४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’