जब से मैंने आतम आत्म वैभव से जाना रे
तब से वैरागी हुआ, जग से वैरागी हुआ
तन भी पराया लागे रे… ॥ टेक ॥
जब से हुई है, आतम रमणता। तब से हुई है, भावों में समता ॥
आतम में, हैं गहराईयाँ। मुझको मिली ये निधियाँ ॥
सुख का खजाना मेरे अन्तर में साजे रे ॥1 ॥
जब से मिला है, मुक्ति का मारग।
तब से मिला है सुख का ये सागर ॥
जब से तेरा, शरण मिला।
तब से परम, आनन्द हुआ।
जब से मैंने आतम आत्म वैभव से जाना रे ॥2॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन