तर्जः प्रभु तुम मूरति हम सों…
जब हि सुनी हम श्री जिनवाणी, आनंद उर न समाया है ॥ टेक ॥
भूल रहा था जिस स्वरूप को, वह चिद्रूप दिखाया है।
भ्रमवश रहा भटकता भव में, सुख अंतर में पाया है ॥ 1 ॥
तृप्त हुआ निज वैभव लखकर, बाहर कुछ न सुहाया है।
निज में ही रम जाऊँ माता, निर्ग्रन्थ पद ही भाया है ॥ 2 ॥
धर्मी, धर्म, धर्म-फल अद्भुत, आज सहज दर्शाया है।
हुई परम संवेग भावना, मन थिरता में आया है॥ ३॥
पाऊँ दशा परम अविकारी, सम्यक् गुण प्रगटाया है।
हर्ष विभोर हुआ भक्तिवश, सविनय शीश नवाया है ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’