जब निज ज्ञान कला घट आवै - तब भोग जगत ना सुहावै
(राग उझाज जोगीरासा)
जब निज ज्ञान कला घट आवै - तब भोग जगत ना सुहावै ।
मैं तन - मय अरु तन है मेरा, फिर यह बात न भावै ॥ १ ॥
खाज खुजात मधुरसी लागत फिर तन अति दुख पावै ।
त्यों यह विषय जान विषवत तज काल अनंत भ्रमावै ॥ २ ॥
सुपने वत सब जग की माया, तामैं नाहिं लुभावै ।
चैन छांड मन की कुटिलाई ते शीघ्र ही शिव जावै ॥ ३ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १३ (विभिन्न कवियों के भजन)
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