जब बानी खिरी महावीर की
जब बानी खिरी महावीर की तब, आनंद भयो अपार ।
सब प्रानी मन ऊपजी हो, धिक धिक यह संसार ॥टेक॥
बहुतनि समकित आदरी हो, श्रावक भये अनेक ।
घर तजकैं बहु बन गये हो, हिरदै धर्यो विवेक ॥
जब बानी खिरी महावीर की तब, आनंद भयो अपार ॥१॥
केई भाव भावना हो, केई गहँ तप घोर ।
केई जपैं प्रभु नामको ज्यों, भाजें कर्म कठोर ॥
जब बानी खिरी महावीर की तब, आनंद भयो अपार ॥२॥
बहुतक तप करि शिव गये हो, बहुत गये सुरलोक ।
‘द्यानत’ सो वानी सदा ही, जयवन्ती जग होय ॥
जब बानी खिरी महावीर की तब, आनंद भयो अपार ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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