जानो धन्य सो धन्य सो धीर वीरा | Jaano Dhanya So Dhanya So Dheer Veera

जानो धन्य सो धन्य सो धीर वीरा

जानो धन्य सो धन्य सो धीर वीरा …
मदन सौ सुभट जिन, चटक दे पट कियो॥टेक ॥

पाँच-इन्द्रि-कटक झटक सब वश कर्यो,
पटक मन भूप कीनो जँजीरा ॥धन्य सो. ॥१॥

आस रंचन नहीं पास कंचन नहीं,
आप सुख सुखी गुन गन गंभीरा ॥धन्यसो. ॥२॥

कहत ‘द्यानत’ सही, तरन तारन वही,
सुमर लै संत भव उदधि तीरा ॥धन्यसो. ॥३॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन २५

अर्थ

जिसने उस धन्य (वह जो अपना लक्ष्य पा चुका) को जाना वह ही धन्य है अर्थात् पुण्यशाली हुआ। वह ही धीर है, वह ही वीर है। जिसने कामदेव जैसे पराक्रमी को क्षणभर में चित्त कर दिया, धराशायी कर दिया अर्थात् कामनाओं को हरा दिया और उसका नाश कर दिया, वह ही धन्य है।

मदन सौ सुभट जिन, चटक दे पट कियो ॥ टेक ॥

जिसने पाँचों इन्द्रियों की सेना को पलभर में, एक झटके में, त्वरित वश में कर लिया और मनरूपी राजा को जंजीरों से अर्थात् संयम से वश में कर लिया अर्थात् स्थिर व नियंत्रितकर वश में कर लिया, वह ही धन्य है।

आस रंचन नहीं पास कंचन नहीं,

जिसके कोई आशा नहीं है, पास में धन नहीं है और फिर भी गंभीर होकर, सबसे सुखी हो रहा है।

कहत ‘द्यानत’ सही, तरन तारन वही,

ह्यानतराय कहते हैं कि यह सही है कि ऐसा जो है वह स्वयं भी तिर जाता हैं और वह ही दूसरों को तिरानेवाला है। वह संत (साधु) ही इस भव-समुद्र के तीर पर लगानेवाला है। उसका ही स्मरण कर।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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