हिंसा के भेद-प्रभेद
-डॉ. वीरसागर जैन
‘अहिंसा’ शब्द निषेधपरक है- ‘न हिंसा इति अहिंसा’, अतः अहिंसा के स्वरूप को भलीभाँति समझने के लिए ‘हिंसा’ के स्वरूप को समझना अनिवार्य है। ‘हिंसा’ के स्वरूप को भलीभांति समझे बिना अहिंसा के स्वरूप का समुचित ज्ञान नहीं हो सकता।
हिंसा का स्वरूप भी अत्यन्त सूक्ष्म है, उसे समझने में प्रायः लोगों को बड़ी भ्रान्ति होती है। ऐसी स्थिति में हम समझते हैं कि यदि हम हिंसा के भेद-प्रभेदों को ही भलीभाँति समझ लें तो हमारे चित्त में हिंसा का स्वरूप काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा। हिंसा के स्वरूपबोध में उसके भेद-प्रभेद के बोध की महती भूमिका है। खेद है कि आजकल हिंसा के भेद-प्रभेदों की चर्चा प्रायः उपेक्षित रहती है। लोग अहिंसा के गीत तो बहुत गाते हैं, पर उसका स्वरूप समझने का प्रयत्न कम ही करते हैं। अतः यहाँ हिंसा के भेद-प्रभेदों के माध्यम से हिंसा के स्वरूप को समझने का प्रयत्न किया जाता है। हिंसा के भेद-प्रभेदों का ऐसा सूक्ष्म विवेचन जैन वाङ्ङ्ग्य में ही उपलब्ध होता है।
जैनाचार्यों ने हिंसा के भेद-प्रभेद विभिन्न दृष्टियों से किये हैं। यथा -
1.निश्चय और व्यवहार हिंसा
(i) निश्चयहिंसा- आत्मा में रागादि की उत्पत्ति होना निश्चय हिंसा है।¹
(ii) व्यवहारहिंसा- किसी प्राणी को पीड़ा देना, सताना या मारना व्यवहार हिंसा है।²
ध्यान देने योग्य है कि व्यवहार हिंसा को तो सारा जगत् हिंसा मानता है, पर आत्मा में रागादि भावों का उत्पन्न होना भी हिंसा है, न केवल हिंसा है अपितु निश्चय हिंसा है -ऐसा जैनदर्शन में ही माना गया है।
2.द्रव्य और भाव हिंसा
(i) द्रव्यहिंसा - किसी प्राणी को मारना , सताना या किसी भी प्रकार से दुःख देना द्रव्यहिंसा है।
(ii) भावहिंसा - किसी को कष्ट देने का मन में भाव उत्पन्न होना भाव हिंसा है।
द्रव्यहिंसा शरीर या वाणी से होती है, पर भावहिंसा अपने भावों में होती है। प्रधानतः भावहिंसा ही हिंसा है, द्रव्यहिंसा तो भावहिंसापूर्वक ही होती है, भावहिंसा के बिना नहीं।
3.स्व और पर हिंसा
(i) स्वहिंसा - कषायभाव से अस्त्र-शस्त्रादि द्वारा अपना घात करना स्वहिंसा है।
(ii) परहिंसा - अन्य प्राणी को मारना या सताना परहिंसा है।
प्रधानतः स्वहिंसा ही हिंसा है, परहिंसा तो बाद में होती है।³
4.मानसिक, वाचिक और कायिक हिंसा
(i) मानसिक हिंसा - मन के द्वारा किसी का अहित-चिन्तन करना आदि मानसिक हिंसा है।
क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायें भी मानसिक हिंसा में आती हैं।
(ii) वाचिक हिंसा - दुःखदायक वचन बोलना आदि वाचिक हिंसा है।
(iii) कायिक हिंसा - अस्त्र-शस्त्र या हाथ-पैर आदि के द्वारा किसी को मारना या दुःख देना कायिक हिंसा है।
इसके अतिरिक्त कृत (करना), कारित (करवाना), अनुमोदन (प्रशंसा) रूप भी तीन प्रकार की हिंसा होती है।
5.कृत, कारित, अनुमोदनरूप हिंसा
(i) स्वयं हिंसा करना कृतरूप हिंसा है।
(ii) अन्य से हिंसा कराना कारितरूप हिंसा है।
(iii) होती हुई हिंसा को उचित कहना/मानना अनुमोदनरूप हिंसा है।
6.स्थूल एवं सूक्ष्म हिंसा
(i) स्थूल हिंसा - व्यवहारहिंसा या द्रव्यहिंसा को स्थूल हिंसा कहते हैं।
(ii) सूक्ष्म हिंसा - निश्चय हिंसा या भावहिंसा को सूक्ष्म हिंसा कहते हैं। अथवा- हिंसा को ही हिंसा मानना स्थूल हिंसा है और असत्य, चौर्य, अब्रह्मचर्य एवं परिग्रह को भी हिंसा में गर्भित करना सूक्ष्महिंसा है।
7.त्रस और स्थावर हिंसा
(i) त्रसहिंसा - द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय या पञ्चेन्द्रिय जीव की हिंसा को त्रस हिंसा कहते हैं।
(ii) स्थावरहिंसा - पृथिवीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक एवं वनस्पतिकायिक जीव की हिंसा को स्थावर हिंसा कहते हैं।
8.संकल्पी, विरोधी, आरंभी और उद्योगी हिंसा 4
(i) संकल्पी हिंसा - बिना प्रयोजन किसी निर्दोष प्राणी को जानबूझकर मारना या सताना संकल्पी हिंसा है।
(ii) विरोधी हिंसा - शत्रु के द्वारा आक्रमण कर देने पर, देश, परिवार या स्वयं की रक्षा के लिए जो हिंसा होती है, उसे विरोधी हिंसा कहते हैं।
(iii) आरम्भी हिंसा - भोजनादि बनाने में, स्नानादि करने में, साफ-सफाई आदि घरेलू कार्यों में होने वाली हिंसा आरम्भी हिंसा है।
(iv) उद्योगी हिंसा - आजीविका हेतु किये जाने वाले व्यापार-उद्योगादि में जो हिंसा होती है, उसे उद्योगी हिंसा कहते हैं।
ज्ञानी गृहस्थ मात्र केवल संकल्पी हिंसा का त्यागी होता है, शेष तीन प्रकार की हिंसायें उसके जीवन में पाई जा सकती हैं।
9.परिणमन एवं अविरमणरूप हिंसा
(i) परिणमनरूप हिंसा - जो हिंसा हम करते हैं, वह परिणमनरूप हिंसा है।
(ii) अविरमणरूप हिंसा - जो हिंसा हम करते तो नहीं, परन्तु उसके त्याग का संकल्प भी नहीं लेते, वह अविरमणरूप हिंसा है।
उक्त भेद-प्रभेदों के अतिरिक्त भी हिंसा के अन्य अनेक भेद-प्रभेदों की चर्चा आगम में मिलती है। हमें उसे भी समझने का प्रयत्न करना चाहिए। ‘भगवती आराधना’ में आचार्य शिवार्य ने हिंसा की क्रियाओं के पाँच भेद बतलाए हैं। यथा -
पादोसिय अधिकरणीय कायिय परिदावणादिवादाए।
एदे पंच पओगा किरियाओ होंति हिंसाओ।।80।।
अर्थात् द्वैषिकी, कायिकी, प्राणघातिकी, पारितापकी, क्रियाधिकारिणी- ऐसी पाँच प्रकार की क्रियाओं को हिंसा क्रिया कहते हैं।
इसी प्रकार के अन्य भी वर्णन उपलब्ध होते हैं। हमें उन सबके माध्यम से हिंसा का और फिर उसके माध्यम से अहिंसा का समीचीन स्वरूप समझना चाहिए, तभी भगवती अहिंसा की उपासना भलीभाँति हो सकेगी।
सन्दर्भ-
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(क) कसायपाहुड, गाथा 42/102 (ख) पुरुषार्थसिद्धयुपाय, श्लोक 44
(ग) परमात्मप्रकाशटीका 2/125 (घ) अनगारधर्मामृत 4/26 -
(क) तत्त्वार्थसूत्र 7/13 (ख) पुरुषार्थसिद्धयुपाय 43
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(क) भगवती आराधना, 803,1363
(ख) सर्वार्थसिद्धि, 7/13/ 352 -
जैनेन्द्रसिद्धान्तकोश 4/532
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