हमारी जीवंत विरासत (जिनदेशना) | Hamari Jivant Virasat (Jindeshna)

40. श्री शंभूलाल धाकड़

यह है जिन शासन की असली प्रभावना

सत्य के अन्वेषी को मार्ग मिल ही जाता है। श्री शंभूलाल धाकड़ मध्यप्रदेश के सिंगोली के पास धनपुर गांव के रहने वाले हैं और 1973 में अपने पिताजी के साथ पहली बार सोनगढ़ गए और पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के प्रवचनों को सुना, बस फिर क्या था.. सत्य की लगन लग गई और उन्होंने दिगम्बर जिनधर्म स्वीकार कर लिया। उसके बाद 1975 में सोनगढ़ जाना हुआ फिर नियमित स्वाध्याय का क्रम प्रारंभ हो गया। वे उस समय साइकिल लेकर गांव-गांव जाकर गुरुदेवश्री के प्रवचनों का असली रहस्य बताकर भ्रांतियां दूर करने का प्रयास करते।

उनके परिवार में जमीकंद सेवन, रात्रि भोजन और अभक्ष्य भक्षण नहीं होता। श्री शंभूलालजी धाकड़ कहते हैं कि मैंने अनेक जैन, अजैन सभाओं में अनेक प्रवचनों को सुना है परंतु अध्यात्म की जो बात गुरुदेवश्री और अध्यात्म के विद्वानों में सुनने को मिलती है वह कहीं नहीं मिलती। वे प्रसन्नता से कहते हैं जैन दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता स्वाधीनता और भेद विज्ञान है। उनके ऐसे मंगल विचारों को सुनकर हृदय गदगद हो गया। जब उनसे पूछा कि आपके यहां शादी संबंध में दिक्कत तो नहीं आती तो उन्होंने कहा सबको सब पता है और यह जानकर खुश होते हैं कि मेरा परिवार अध्यात्म धारा से प्रभावित है। वे मुमुक्षु समाज द्वारा होने वाले कार्यक्रमों में सहभागिता करते रहते हैं और सराहनीय बात यह रही कि उन्होंने अपनी पत्नी सहित जनवरी 2023 में सोनगढ़ में आयोजित पंचकल्याणक में तप कल्याणक के अवसर पर दीक्षा वन की सभा में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया।

जिनदेशना परिवार श्री शंभूलालजी के अध्यात्ममय जीवन की मंगल कामना करता है।

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