मनुष्य जन्म मिलना तो इस काल में दुर्लभ है ही परंतु मनुष्य जन्म पाकर जैन कुल और जैन धर्म का तत्त्वज्ञान मिलना उससे भी महान दुर्लभ है। धन्य हैं वे लोग जो इस दुर्लभ जैन शासन और तत्त्वज्ञान को पाकर अपने जीवन को सार्थक करने का प्रयास करते हैं। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ व्यक्तित्वों का परिचय समाविष्ट करने का प्रयास किया है जिन्होंने अपने जीवन में लौकिक कर्तव्यों के साथ साथ आत्माराधना एवं जिनधर्म की प्रभावना में अपना महनीय योगदान दिया है। जगत में एक कहावत है कि जो अपने लिए जिया, वह क्या जिया ? धन्य है उनका जीवन जो परोपकार के लिए जीवन जीते हैं परंतु जैनशासन यह कहता है जो अपने लिए जिया उसका जीवन ही सार्थक हुआ। जिनका जीवन मात्र दूसरों के लिये समर्पित हो गया उससे पुण्य तो संचित हुआ परंतु आत्म आराधना का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ परंतु उनका जीवन स्वर्णांकित करने योग्य है जो आत्मकल्याण के साथ साथ महान जैन शासन की प्रभावना में अपना तन, मन, धन से योगदान दे रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक हमारी जीवंत विरासत में उन चुने हुए रत्नों में से कुछ रत्नों का परिचय प्रकाशित करने का लघु प्रयास किया है। हमें पूर्ण विश्वास है कि इन व्यक्तित्वों के जीवन को पढ़कर सभी को अपना जीवन सार्थक करने की प्रेरणा मिलेगी। इस पुस्तक में समाविष्ट कुछ महानुभावों का पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया के दौरान देह विलय हो गया। हमने उन्हें हमारी स्मृतियों में जीवंत विरासत के नाम से उल्लेखित किया है।
हमें पूर्ण विश्वास है कि जिनदेशना समिति का यह प्रयास समाज को सार्थक प्रतीत होगा। जिन देशना समिति परिचय प्रदान करने वाले एवं प्रकाशन में आर्थिक सहयोग अर्पित करने वाले सभी दातारों के प्रति साधुवाद प्रेषित करती है। आशा है हमारा यह प्रयास संपूर्ण जैन समाज को प्रेरित करेगा।
संपादक विराग शास्त्री, जबलपुर
प्रकाशन सहयोगी
प्रकाशन मुख्य सहयोगी: श्री आई. एस. जैन, मुंबई
श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट, विले पारला, मुम्बई
श्री कुन्दकुन्द कहान मुमुक्षु मण्डल, विजयनगर जि. अजमेर राज.
श्रीमति सविताबेन भोगीलाल शाह, वस्त्रापुर अहमदाबाद
श्रीमति अल्का राजीव जैन जबलपुर एवं श्रीमति आरती प्रसंग जैन खण्डवा
श्री संदीप भाई के. दोशी, मुंबई
श्री भव्य भाई मेहता, मुंबई
स्व. पंडित श्री मीठालाल दोशी परिवार, हिम्मतनगर
श्री बिमल भाई शाह, सोनगढ़
श्रीमति सपना जैन, इटारसी
श्री आतम शास्त्री, सोनगढ़
परिचय
जिनदेशना के नवीनतम प्रकाशन “हमारी जीवंत विरासत” में 85 वर्ष आयु से अधिक उन साधर्मियों का परिचय प्रकाशित किया गया है जो इस अवस्था में भी आराधना या प्रभावना में संलग्न हैं। आशा है जिन देशना का यह प्रकाशन आपको प्रेरणादायक सिद्ध होगा।
कहते हैं ‘जीवन कितना जिया यह महत्त्वपूर्ण नहीं है परंतु जीवन कैसे जिया, यह महत्त्वपूर्ण है’, इसी नीति वाक्य को अपने जीवन में अवधारण करते हुए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले 89 वर्षीय श्री अनंतराय ए. सेठ, मुंबई।
यदि जीवन में भावना पवित्र हो और संकल्प दृढ़ तो अकेला व्यक्ति भी परिवर्तन लाने में सक्षम है। इसी दृढ़ता के प्रतीक हैं श्री अनंतभाई सेठ। मूलतः स्थानकवासी संप्रदाय में जन्मे मुंबई निवासी श्री अनंतभाई के ही बहनोई श्री शांतिलाल रतिलाल शाह (जो कि पूर्व से ही वीतरागी तत्त्वज्ञान की धारा में जुड़ चुके थे।) की प्रेरणा और पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के समागम से दिगंबर वीतरागी तत्त्वज्ञान को समझा और देव शास्त्र गुरु की यथार्थ पहचान कर परम दिगंबर धर्म को स्वीकार कर लिया। सांसारिक जीवन की नियत व्यवस्था के अनुरूप समस्याओं का और संघर्षों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहे। अनंतभाई की प्रबल भावना थी कि पूज्य गुरुदेवश्री ने अपने प्रवचनों में जिनागम के सिद्धांतों का जो गहन रहस्य उदघाटित किया है, वे 9000 उपलब्ध प्रवचन प्रत्येक आत्मार्थी तक पहुँचे। उनकी प्रबल भावना के अनुरूप उनके एवं श्री नेमिष भाई शाह के परिवार और समर्पित कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम से गुरुदेवश्री के प्रवचन पहले सीडी, फिर डीवीडी, पेन ड्राइव, वीतरागी वाणी एप आदि में जन जन को सुलभ हुये। गुरुदेवश्री का सीडी प्रवचन प्रत्येक मुमुक्षु मंडल की सभा में चलना चाहिए, इस पवित्र भावना को बल प्रदान करने वाले अनंतभाई की भावना के फलस्वरूप उनके ही पारिवारिक ट्रस्ट श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट ने देश की अनेक स्वाध्याय सभाओं को कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, टीवी आदि उपलब्ध करवाये।
आचार्य कुंदकुंद की तपोभूमि पोन्नूरमलै में पूर्व से आचार्य कुंदकुंद जैन संस्कृति केंद्र की गतिविधियाँ नगण्य थीं परंतु आपकी प्रबल भावना और अनेक समस्याओं के बावजूद पोन्नूरमलै में संपूर्ण जैन समाज को उपहार स्वरूप इस केन्द्र का पुनः निर्माण कर व्यवस्थित संचालन श्री अनंतभाई की ही सक्रियता का परिणाम है। साथ ही आचार्य कुंदकुंद की समाधि भूमि कुंद्राद्रि पर्वत पर पहुँचने के लिये दुर्गम मार्ग को सरल करने का श्रेय भी श्री अनंतभाई को है। विश्व विख्यात धार्मिक स्थल गोमटेश्वर बाहुबली में श्री कानजी स्वामी विश्रांति गृह (धर्मशाला) का भव्य निर्माण भी अनंतभाई और उनके ट्रस्ट के मंगल परिणाम की देन है। देश के मुमुक्षु मंडलों में जिनमंदिर निर्माण, स्वाध्याय भवन या अन्य कुछ प्रकल्प की रचना करना हो या शिविर आदि का आयोजन करना हो, उसके लिए सबसे पहला सहयोग अनंत भाई, नेमिष भाई, केतन भाई और उनके परिवार का प्राप्त होता रहा है। शाश्वतसिद्ध भूमि श्री सम्मेद शिखर में श्री कुन्दकुन्द कहान नगर जैसी भव्य रचना के निर्माण के मूलस्रोत में एक नाम अनंतभाई का भी है।
श्री कुंदकुंद कहान दिगंबर जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट मुंबई के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान ट्रस्टी श्री अनंत भाई ने आज भी कई संस्थाओं को संबल प्रदान कर रहे हैं। अनेक तीर्थ क्षेत्र के जीर्णोद्धार में श्री अनंतभाई का उदार सहयोग सदैव स्मरणीय रहेगा। सोनगढ़ में कहान शिशु विहार शैक्षणिक छात्रावास का पुनरुत्थान करने का श्रेय एकमात्र श्री अनंतभाई को ही है और सामाजिक, धार्मिक योगदान के साथ साथ उन्होंने अपने आत्मिक कर्तव्यों को कभी विस्मृत नहीं किया। प्रतिदिन देवदर्शन, व्यवस्थित रूप से स्वाध्याय करना, उसके मुख्य बिंदु लिखना और उनको जीवन में अवधारण करने का निरंतर प्रयास श्री अनंत भाई के जीवन का सौंदर्य है। विपुल धन के स्वामी होने के बावजूद भी सरलता व सहजता श्री अनंतभाई के महान व्यक्तित्व को प्रदर्शित करता है। मुमुक्षु समाज के हित में सदैव समर्पित श्री अनंत भाई जीवन के इस पड़ाव में भी समाज की सुरक्षा, तत्त्वप्रभावना और आत्मकल्याण के प्रति जागरूक रहते हैं। इन संपूर्ण कार्यों में उनकी सहधर्मिणी श्रीमती कनक बेन को विस्मृत नहीं किया जा सकता, प्रत्येक मंगल कार्य में उनकी अनुमोदना महनीय भूमिका का कार्य करती है उनके ही संस्कारों का प्रभाव है कि इनका पूरा परिवार जिनशासन की प्रभावना में निरंतर समर्पित है और साथ ही आत्मकल्याण हेतु जागरूक भी।
जिनदेशना परिवार मुमुक्षु समाज के सुदृढ स्तम्भ श्री अनंतभाई सेठ के स्वस्थ एवं मंगलमय दीर्घायु जीवन की कामना करता है।
92 वर्ष · 92 वर्ष की उम्र में भी युवाओं सा उत्साह, कमाल हैं
जीवन में दृढ़ता, समर्पण और अध्यात्म रुचि की जीती जागती मिसाल हैं श्री हसमुख भाई वोरा।
सोनगढ़ में निवास करने वाले श्री हंसमुख भाई जीवन के 92 बसंत देखने के पश्चात भी युवाओं की तरह सक्रिय रहते हैं। बढ़वाण के मूल निवासी अपने पिता श्री पोपटलाल वोरा से उन्हें विरासत में अध्यात्म रुचि प्राप्त हुई और पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के समागम से अध्यात्म का अभ्यास किया। सन् 1962 से सोनगढ़ से जुड़े श्री हंसमुख भाई की विभिन्न शहरों में टाईल्स की 5 फैक्ट्रियां थीं लेकिन अध्यात्म की रुचि लौकिक क्षेत्र पर भारी पड़ गई और उन्होंने अपनी सारी फैक्ट्रियां बंद कर सोनगढ़ में ही स्थाई निवास कर लिया। सोनगढ़ में निर्मित परमागम मंदिर में गाथाओं को पत्थर पर उत्कीर्ण करने के लिए स्वयं इटली जाकर मशीन लेकर आए और पंच परमागम की सारी गाथायें पत्थर पर उत्कीर्ण करवाईं और उनकी अशुद्धियां भी दूर कीं और यह महान कार्य संपन्न किया। यह कार्य 5 महीने की अल्प अवधि में पूर्ण हो गया। सोनगढ़ के श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख श्री रामजीभाई माणेकचंद दोशी के आग्रह पर ट्रस्ट के प्रमुख पद के दायित्व को स्वीकार किया। आप पिछले 44 वर्षों से श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ के प्रमुख हैं। आपके ही नेतृत्व में गत वर्ष जम्बूद्वीप एवं बाहुबली जिनायतन का ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। गुरुदेवश्री आपके पिताश्री का और आपका भी नाम अनेक बार अपने प्रवचनों में लिया करते थे।
आश्चर्य की बात यह है कि श्री हंसमुख भाई वोरा पिछले 45 वर्षों से एक समय ही भोजन करते हैं, शाम को मात्र जल ग्रहण करते हैं। जब उनसे पूछा कि आप एक समय भोजन करके इतने स्वस्थ कैसे रहते हैं? तो उन्होंने कहा कि दिगंबर मुनिराज भी तो एक समय भोजन करते हैं और अपनी आत्म आराधना करते हैं। भोजन से शरीर चलता है, यह हमारा भ्रम है बल्कि हम जैसी दृढ़ता से नियम पालेंगे शरीर भी उसी अनुरूप कार्य करने लगता है। प्रातः 4 बजे उठकर 1 घंटे स्वाध्याय करना, उसके पश्चात व्यायाम और सैर करना उनकी दिनचर्या का प्रारंभिक चरण है। उसके पश्चात जिनमंदिर जाकर जिनेन्द्र पूजन, स्वाध्याय करना उनकी नियमित दिनचर्या है। 92 वर्ष की उम्र में भी सोनगढ़ के सभी मंदिरों की वंदना पैदल, बिना लकड़ी और बिना लिफ्ट की सहायता के करते हैं। स्वाध्याय के पश्चात ऑफिस जाकर ट्रस्ट नियमित कार्य देखकर और आवश्यक निर्देश देकर घर जाकर भोजन करते हैं। दोपहर में भी थोड़े आराम के पश्चात स्वाध्याय और प्रतिदिन लगभग 2 किलोमीटर की सैर उनके सुखद स्वास्थ्य का राज है। 92 वर्ष की उम्र में भी उन्हें कोई बीमारी नहीं है। प्रतिदिन शाम को 8:00 बजे सो जाने वाले श्री हंसमुख भाई हमेशा प्रसन्न मुद्रा में दिखाई पड़ते हैं। आपके परिवार में एक पुत्र श्री पीयूष वोरा मुम्बई और दो बेटियां हैं। सोनगढ़ में संचालित होने वाली सभी गतिविधियों में प्रमुखता से सहभागिता करने वाले श्री हंसमुख भाई विधानों में पूरे समय उपस्थित रहते हैं और स्वयं विधान करवाते भी हैं।
श्री हंसमुख भाई कहते हैं कि जैन दर्शन का सार है कि बाहर में कुछ करने लायक है ही नहीं। जो कुछ करना है अपने स्वयं में करना है इसलिए जितनी जल्दी हो सके हमें आत्मलक्ष्य की ओर केंद्रित होना चाहिए।
जिन देशना परिवार ऐसे जीवट व्यक्तित्व, अगाध रूचिवान और समर्पित व्यक्तित्व को नमन करते हुए उनकी दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।
कहते हैं जीवन कितना जिया, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि जीवन कैसे जिया, यह महत्त्वपूर्ण है। वे व्यक्तित्व विरले होते हैं जो अपने कार्यों से इतिहास बनाया करते हैं ऐसे ही महामना व्यक्तित्व हैं मुंबई निवासी 85 वर्षीय श्री वसंतभाई मूलचंद भाई दोशी।
जीवन के बस दो ही लक्ष्य, आत्म कल्याण की मंगल भावना और जैन समाज का हित। दिगंबर जैन तीर्थों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले श्री वसंत भाई दोशी मूलतः गुजरात के सुदासणा में 29 जून 1939 को जन्म हुआ। पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के तत्त्व प्रभावना योग में श्री वसंत भाई दोशी को युवा वय में ही अध्यात्म की रुचि लग गई और निर्णय कर लिया कि अपना जीवन जिनशासन की सेवा और आराधना में ही समर्पित करना है। बस फिर क्या था संकल्प को बल मिलता गया और धीरे-धीरे समाज के अनेक पदों पर कार्य करते-करते हुए मुमुक्षु समाज की प्रतिनिधि संस्था श्री कुंदकुंद कहान दिगंबर जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट के महामंत्री के रूप में अनेक वर्षों तक कार्य किया और वर्तमान में इसी संस्था के अध्यक्ष के रूप में सक्रियता से कार्य कर रहे हैं। श्री वसंत भाई जैन समाज की ४२ संस्थाओं के ट्रस्टी हैं। कानून की गहरी समझ और तर्कशील बुद्धि से सम्मेद शिखर के वर्षों पुराने विवाद की पैरवी करने में समर्थ रहे, फलस्वरूप कोर्ट के अनेक निर्णय दिगंबर जैन समाज के पक्ष में हुए। साथ ही गिरनारजी, केसरियाजी, अंतरिक्ष पारसनाथ जैसे अनेक तीर्थों की सुरक्षा के लिए प्रयास करते रहे। कई बार तो निष्णात वकील भी आश्चर्यचकित हो जाते कि आखिर इन्हें कानून की जानकारी हमसे ज्यादा कैसे हैं? सिद्धक्षेत्र मुक्तागिर, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी, तीर्थक्षेत्र सोनागिर जैसी दिगम्बर जैन समाज की अनेक राष्ट्रीय, स्थानीय संस्थाओं के विशेष पदों और ट्रस्टी के रूप में उनका मार्गदर्शन सदैव मिलता रहा।
श्री कुंदकुंद कहान दिगंबर जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट जयपुर में स्थापित संचालित श्री टोडरमल दिगंबर जैन सिद्धांत महाविद्यालय की स्थापना एवं संचालन में श्री वसंत भाई का विशिष्ट योगदान रहा, साथ ही शाश्वत सिद्ध क्षेत्र की सम्मेद शिखरजी में निर्मित श्री कुंदकुंद कहान नगर के निर्माण में श्री वसंत भाई का योगदान सदैव याद किया जाएगा।
समाज में अनेक विवादों, घटनाओं, परिस्थितियों में समन्वय का रास्ता निकालने वाले श्री वसंत भाई एम. दोशी की बुद्धि का लोहा सभी मानते हैं। प्रभावशाली वक्ता श्री बसंत भाई का प्रभाव इतना कि उनकी बात को कोई नकारता नहीं। विवाह न करने का संकल्प लेकर सारा जीवन निस्पृह भाव से जीने वाले और अपने घर में ही दैनिक चर्या के रूप में प्रवचन करते हैं। क्षयोपशम इतना जबरदस्त कि 60 साल पहले की घटनाएं भी उन्हें वर्तमान जैसी ही याद हैं।
तत्त्वज्ञान गहरी समझ रखने वाले मुमुक्षु समाज की धरोहर श्री बसंत भाई आज भी शारीरिक प्रतिकूलताओं के बावजूद पूरे समर्पण के साथ आत्मकल्याण के समाज के उत्थान के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। श्री वसंत भाई दोशी को उनकी विशिष्ट प्रतिभा और समर्पण को देखते हुए श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन कमेटी द् के परम संरक्षक पद मनोनीत किया है।
जिनदेशना परिवार आपके आत्मोन्मुखी पुरुषार्थ हेतु हार्दिक शुभकामनाएं प्रदान करते हुये स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की मंगल कामना करता है।
101 वर्ष की उम्र में भी जिनधर्म आराधना का उत्साह, विश्वास नहीं होता जिस उम्र में इंद्रियां काम करना बंद कर देती हैं और कुछ काम करने का उत्साह नहीं होता उस उम्र में भी जैन धर्म के प्रति उत्साह और आदर अनुकरणीय है।
सोनगढ़ में निवास करने वाली लक्ष्मी बहन 101 वर्ष की हैं, इस उम्र में भी उनके रोम-रोम में जिन धर्म बसा हुआ है।
सन 1922 में वैष्णव सम्प्रदाय में जन्मी लक्ष्मी बहन मुंबई की मूल निवासी हैं। वहां पर एक बार चर्चा के दौरान एक साधर्मी बहन ने जैन धर्म के महान सिद्धांतों का ज्ञान कराया, बस फिर क्या था उनके चित्त को जिन धर्म भा गया और नियमित जिनदर्शन, सदाचार आदि उनके जीवन का नित्यक्रम बन गया। छह भाइयों की अकेली लाडली बहन लक्ष्मी बहन मात्र 30 वर्ष की युवावस्था में सोनगढ़ आ गईं और उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत को स्वीकार कर लिया। आज भी सोनगढ़ के आध्यात्मिक वातावरण में स्वयं के चिंतन मनन से आत्म आराधना में संलग्न लक्ष्मी बहन का जीवन एक अध्याय की तरह है जिसे हमें शिक्षा लेने की आवश्यकता है। वैष्णव धर्म की होकर भी जिनधर्म को अंगीकार करना, वह भी युवावस्था में यह बहुत बड़े साहस का कार्य है।
वर्तमान में लक्ष्मी बहन सोनगढ़ में जिन धर्म की आराधिका के रूप में निवास कर रही हैं। ब्र कुंती बहन इनका पूरा ध्यान रखती हैं। जब उनसे कोई मिलने आता है तो वे उनसे सांसारिक बातें नहीं बल्कि आत्म स्वभाव की बात करती हैं। वे हर मेहमान से आनंद से कहतीं हैं, आनंद में रहना और कल सम्यक्त्व लेकर आना। उनका भाव है कि इस पर्याय में यदि करने योग्य कार्य कोई है तो वह सम्यक् दर्शन है। उनका वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अटूट श्रद्धान है।
ऐसे उत्तम व्यक्तित्व की धनी लक्ष्मी बहन के आदर्शों को जिन देशना परिवार की ओर से सादर नमन।
सोनगढ़ में निवासरत 103 वर्षीय लक्ष्मीबेन से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर मिला. उनसे हुई चर्चा के कुछ बिंदु, 4 अगस्त 2023।
आपका स्वास्थ्य कैसा है? जैसा होना चाहिए वैसा ही है। 2. लोग कहते हैं कि व्रत, उपवास, सामायिक करेंगे तभी तो विशुद्धि होगी और तब सम्यक् दर्शन हो पाएगा. ऐसा नहीं है सबसे पहले आत्मा को जानना ही कर्तव्य है और यह निर्णय करना चाहिए कि मैं स्वयं भगवान हूँ और भगवान बन सकता हूं। यह काम पहले करने योग्य है। 3. आपकी तो स्त्री पर्याय है। मोक्ष कैसे मिल सकता है? एक भव धारण करना पड़ेगा ना…। पहले अभिप्राय में निर्णय तो होना चाहिए, मैं पर्याय से भिन्न हूँ। मैं स्वयं मोक्ष स्वरूप हूँ, बाकी काम तो अपने आप हो ही जाएगा उसे करना नहीं पड़ेगा। अगली पर्याय भी आयेगी, मुनिदशा भी आयेगी और मोक्ष के योग्य पुरुषार्थ भी होगा। एक बार स्वभाव का निर्णय हो जाये, फिर मोक्ष की प्रक्रिया स्वयमेव संपूर्ण हो जाएगी। 4. वर्तमान समय में क्या काम करें ? एक ही काम, मैं स्वयं परमात्मस्वरूप हूँ, परमात्मा बन सकता हूँ। यही धुन रखना चाहिए। 5. मनुष्य पर्याय में करने योग्य कार्य क्या है? स्वभाव के प्रति सावधानी हो जाए, बस यही काम करने योग्य हैं। 6. आप शाम को 6 बजे के बाद कुछ नहीं खाती-पीतीं। क्या आपको कोई विकल्प नहीं आता ? आता है ना, यही कि मैं खाने-पीने के विकल्प से रहित अनाहारी आत्मा हूँ। 7. साधर्मी को क्या चिंतन करना चाहिए ? संयोग मेरा नहीं, उदय मेरा नहीं, विकारी भाव मेरा नहीं, पर से मेरा ना कोई संबंध था और ना कोई संबंध है। सिद्ध समान सदा पद मेरो। 8. यदि इस पर्याय में सम्यग्दर्शन नहीं हुआ तो ? ऐसी बात ही नहीं करना. सम्यग्दर्शन क्यों नहीं होगा? जब पूरा स्वभाव विद्यमान है और मैं अनंत सामर्थ्य वाला हूँ तो जरूर होगा। 9. सोनगढ़ में कैसे आना चाहिए ? परमात्मा की भक्ति लेकर आना चाहिए। तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण, तारणहारा. मेटो मेटो जी संकट हमारा। मेटो जामन मरण, होवे ऐसा यतन, तारणहारा और दोबारा आओ तो समकित (सम्यक् दर्शन) लेकर आना।
जीवटता की मिसाल हैं मातुश्री वरजू बेन हथाया। उम्र लगभग 101 साल, चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट, अपने काम करने में सक्षम और जागरूक श्रावक की तरह सदैव जिन धर्म का आराधन, ये विशेषताएं हैं मुंबई ग्रांट रोड निवासी श्रीमती वरजूबेन दलीचंदजी हथाया की। जीवन का शतक (101 वर्ष) पूरा कर चुकीं श्रीमती वरजूबेन पूरे जैन समाज के लिए आदर्श हैं। 101 वर्ष की उम्र होने पर भी ना तो उनका हौसला कमजोर दिखता है, न अपने कर्तव्य में कमी। प्रतिदिन प्रातः उठकर स्नान करना और स्नान के पश्चात टीवी में आने वाली पूजन में सहभागिता करना और स्वाध्याय के बाद ही भोजन ग्रहण करना। दिन भर पंच परमेष्ठी को याद करते हुए यथासंभव स्वाध्याय करना उनके जीवन का सौंदर्य है। मुंबई के आधुनिक माहौल में भी उनकी दिनचर्या आदर्श है। शारीरिक कमजोरी के कारण प्रतिदिन मंदिर जाने में असमर्थ होने पर भी प्रत्येक अष्टमी एवं चतुर्दशी को जिनमंदिर अवश्य जाती हैं। राजस्थान के उदयपुर के एक छोटे से गांव की मूल निवासी श्रीमती वरजूबेन का छोटी उम्र में ही श्रीमान दलीचंद जी से विवाह हो गया। छह पुत्रों से भरे पूरे परिवार की मुखिया श्रीमती वरजूबेन के संस्कारों का ही प्रभाव है कि उनका पूरा परिवार जिनधर्म की आराधना में संलग्न है। उनके बेटे पंचकल्याणक जैसे बड़े आयोजनों में माता पिता ( श्री जवेरचंदजी-श्रीमती केसर बेन, श्री हीरालालजी, लक्ष्मी देवी), सौधर्म इंद्र (श्री ब्रजलालजी, श्रीमती मधु ) कुबेर (श्री अशोक, गीताजी, श्री अनिल, रेणू), इंद्र आदि के रूप में सहभागिता कर चुके हैं। साथ ही देश के अनेक जिनमंदिरों, स्वाध्याय भवनों एवं सामाजिक गतिविधियों में उनके पूरे परिवार का भरपूर योगदान रहता है। उनका पूरा परिवार बेटे, बहुयें, पोते पोती आदि सभी एक स्वर से जिन धर्म के प्रति समर्पित रहते हैं।
पारिवारिक एकता भी एक मिसाल की तरह है। वरजूबेन स्वेच्छा से अपने सभी पुत्रों के पास रहती हैं और उनके पुत्र, पौत्र, पौत्र वधुयें भी अपने घर की सबसे वरिष्ठ सदस्य का पूरा ख्याल रखते हुए उनकी भरपूर सेवा करते हैं।
वात्सल्य की धनी श्रीमती वरजूबेन से जब भी मिलना होता है यह हमेशा स्नेह के साथ भोजन का आग्रह करती हैं। धन्य है ऐसी माँ और ऐसा परिवार जो संस्कारों की माला में सभी को समाहित कर जिनधर्म का शंखनाद कर रहे हैं। जिन देशना परिवार मातुश्री वरजू बेन के दीर्घायु जीवन की मंगल कामना करता है।
अनेक लोग कहा करते हैं उम्र तो संख्या मात्र है। यदि मन में उत्साह है तो उम्र के हर पड़ाव पर व्यक्ति को जीवंत बनाए रखता है। इसी तरह की हैं श्रीमती मैना देवी सेठी दिल्ली। प्रसिद्ध श्रेष्ठी स्व. श्री पूनमचंदजी सेठी की धर्मपत्नी श्रीमती मैनादेवी 91 वर्ष की उम्र में पूरी सजगता और और उत्साह के साथ आत्मकल्याण के मार्ग पर आरूढ़ हैं। 1947 में मात्र 12 वर्ष की उम्र में लाडनूँ निवासी श्री पूनमचंदजी सेठी के साथ विवाह हो गया। जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करते हुए भी उन्होंने जिनधर्म की आराधना को विस्मृत नहीं किया, साथ ही अपने परिवार को जिनधर्म की संस्कारों से ओतप्रोत किया। उन्होंने अनेक शास्त्रों का व्यवस्थित स्वाध्याय किया, आज भी वे निरंतर स्वाध्याय करती हैं। प्रतिदिन जिनेंद्र पूजन और स्वाध्याय करने वाली श्रीमती मैनादेवी का कहना है कि प्रवचन सुनकर स्वाध्याय करना ज्यादा कार्यकारी नहीं बल्कि शास्त्र स्वयं पढ़ना ही व्यवस्थित स्वाध्याय कहलाता है। उनके पति श्रीमान पूनमचंदजी सेठी श्री कुन्दकुन्द परमागम श्रावक ट्रस्ट, सोनागिर के संस्थापक अध्यक्ष रहे और सोनागिर के विकास के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। देश के लगभग सभी तीर्थक्षेत्रों की वंदना कर चुकीं श्रीमती मैनादेवी सेठी आज भी जिनधर्म के लिए प्रभावना के लिए तन, मन, धन से समर्पित रहती हैं। उनके पुत्र श्री अनिलजी बंगलौर, श्री सुभाषजी कोलकाता, सुशीलजी सेठी दिल्ली और सुपुत्री श्रीमती राजुल अपनी विपुलसंपन्नता को यथासंभव जिनधर्म प्रभावना में समर्पित करते रहते हैं।
मैनादेवीजी का कहना है कि हर चीज का एक व्यवस्थित स्थान होता है उसकी मर्यादा वहीं शोभायमान होती है जैसे सोने के आभूषण पैरों में शोभा नहीं देते, वे सिर और गले में ही शोभा को पाते हैं, वैसे ही परिवार में और समाज में हर व्यक्ति का एक योग्य स्थान होता है। उनकी प्रबल भावना है कि जीवन के अंतिम क्षण तक जिनेंद्र दर्शन मिलते रहें और स्वाध्याय कभी ना छूटे।
श्रीमती मैनादेवी के जीवन के 90 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में उनके परिवार के द्वारा दिनांक 29 से 31 दिसंबर 2023 तक सोनागिर सिद्धक्षेत्र में ‘अध्यात्म के रंग, मैना के संग’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन हुआ। जिसमें शिविर, विधान के माध्यम से जिनधर्म की आराधना की गई और पूरे परिवार ने माँ मैनादेवी के परिवार के प्रति योगदान को स्मरण कर उनके प्रति अहोभाव व्यक्त किया। उनके यशस्वी जीवन को जिनदेशना परिवार सादर नमन करता है और उनकी स्वस्थता एवं दीर्घायु की मंगल कामना करता है।
आत्म कल्याण के लिए कोई उम्र परिस्थिति, संयोग बाधक नहीं होते, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है उदयपुर निवासी श्री लक्ष्मीलालजी बंडी।
सन 1933 में जन्मे श्री लक्ष्मीलालजी के बड़े भाई सोनगढ़ के गुरुकुल में अध्ययन करते थे लेकिन लक्ष्मीलाल जी को अध्यात्म की कोई रुचि नहीं थी। फिर उदयपुर में ही एक प्रसंग पर सोनगढ़ से निकलने वाली पत्रिका आत्मधर्म में पढ़ा कि गाड़ी पेट्रोल से नहीं चलती, बाई रोटी नहीं बनाती, इन बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि इन बातों का क्या मतलब है ? बस फिर क्या था, यह जिज्ञासा समाधान की ओर ले गई और सोनगढ़ पहुंचकर पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन सुने। जब यह सुना कि वस्तु स्वतंत्र है तो इस सिद्धांत ने सोचने पर बाध्य किया कि कार्य अपनी योग्यता से कैसे हो जाता है ? बस फिर क्या था प्रवचन सुनते गए और समाधान मिलते गए। रुचि के फलस्वरूप उदयपुर के कुछ रुचिवान प्रतिष्ठित साधर्मियों ने विचारकर 1959 में स्वाध्याय ग्रुप का निर्माण कर स्वाध्याय करना प्रारंभ किया। स्थान की समस्या होने पर लक्ष्मीलालजी ने अपनी दुकान के ऊपर ही स्वाध्याय प्रारंभ किया परंतु स्वाध्याय के विरोधी स्वाध्याय के समय ही ऊंची आवाज में रेडियो बजाकर विघ्न पैदा करने लगे। इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए जिनमन्दिर और स्वाध्याय भवन का निर्माण का संकल्प लिया। उस समय में मुंबई और गुवाहाटी से सहयोग स्वरूप राशि प्राप्त हुई और 1967 में शिलान्यास हुआ तथा इसी वर्ष पूज्य गुरुदेवश्री के सान्निध्य में वेदी प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। पूज्य गुरुदेवश्री उदयपुर चार बार पधारे, उनका प्रबल विरोध हुआ परंतु उनके पुण्य के आगे विरोध परास्त हो गया। उसके बाद से श्री लक्ष्मीलालजी बंडी का निरंतर स्वाध्याय बढ़ता ही गया।
स्वाध्याय का फल ही था कि सन 1977 में एक बड़ी पारिवारिक घटना के घटित होने पर भी इसके दोषी को लक्ष्मीलालजी ने नियति समझकर क्षमा कर दिया। विद्वानों से इतना प्रेम कि सबको अपने घर में ही रुकवा करके उन्हें वात्सल्य प्रदान करते थे। धर्मपत्नी को भी इतनी रुचि लगी कि जितने ग्रंथों का स्वाध्याय लक्ष्मीलालजी ने किया उतने ही ग्रंथों का स्वाध्याय धर्मपत्नी ने भी किया और वे 2 साल सोनगढ़ रहीं और गुजराती सीख कर गुरुदेवश्री के व्याख्यानों का मर्म भी समझने लगीं। जीवन के इस पड़ाव पर भी लक्ष्मीलालजी की अध्यात्म रुचि यथावत है। वह शारीरिक रूप से कमजोर होने पर भी प्रतिदिन जिनमंदिर में जाकर जिनेंद्र पूजन और प्रवचन में शामिल होते हैं। प्रतिदिन लगभग 7 से 8 घंटे का व्यक्तिगत स्वाध्याय करते हैं। भोजन अत्यंत साधारण और बस एक ही लगन कि कैसे आत्मकल्याण हो। दिन में भी थोड़ा सा आराम करने के बाद फिर ग्रंथों के माध्यम से आचार्यों से बात करने लगते हैं। जब उनसे यह पूछा कि वर्तमान पीढ़ी में अध्यात्म का अभ्यास कैसे हो? तो उन्होंने कहा कि इसके लिये पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन सुनना अत्यंत अनिवार्य है। यदि वर्तमान पीढ़ी में गुरुदेवश्री के प्रति बहुमान और उनके प्रवचन सुनने का रस नहीं है तो इसका एकमात्र कारण उनके माता, पिता हैं क्योंकि उन्होंने स्वयं ही दृढ़तापूर्वक अपनी संतानों को तत्त्वज्ञान की विरासत नहीं दी। इसलिए वर्तमान पीढ़ी को स्वयं भी गुरुदेवश्री के प्रवचनों का स्वाध्याय करना चाहिए और अपने बच्चों को भी इस मार्ग में लगाना चाहिए।
श्री लक्ष्मीलालजी ने उदयपुर मुमुक्षु मंडल के अध्यक्ष के रूप में वर्षों तक अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया एवं अनेक जैन परिवारों को स्वाध्याय की प्रेरणा देकर धर्म से जोड़ा। आपके तीनों दामाद पूर्व में बीसपंथ आम्नाय के पक्षधर थे परंतु सभी को स्वाध्याय व शुद्ध आम्नाय के जोडने में प्रेरक व निमित्त बने। आज ये सभी स्वाध्याय आदि धार्मिक गतिविधियों में संलग्न हैं। आपके पुत्र श्री अभय बंडी, पुत्रवधु श्रीमती अर्चना बंडी एवं दामाद श्री आई. एस. जैन मुंबई तन, मन, धन से जिनशासन की प्रभावना में योगदान दे रहे हैं।
लक्ष्मीलालजी की दृढ़भावना है कि जीवन के अंतिम क्षण तक वीतरागी देव, शास्त्र, गुरु का स्मरण रहे और आत्मभावना पूर्वक देह छूटे और अल्पकाल में ही वे भवचक्र से मुक्त होकर सिद्धचक्र में शामिल होवें।
जिनदेशना परिवार श्री लक्ष्मीलालजी के धर्ममय जीवन और दीर्घायु की मंगल कामना करता है।
प्रेरणा की मिसाल है जिनधर्म आराधिका श्रीमती कपूरी बाई जैन 98 वर्ष की उम्र, हिम्मत बेमिसाल, हर समय आत्म चिंतन और स्वाध्याय में लीनता, प्रतिदिन जिनदर्शन का नियम, चिंतन में जिनवाणी, यह विशेषताएं हैं दमोह (मध्यप्रदेश) निवासी 97 वर्ष की श्रीमती कपूरी बाई जैन की उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका हौसला कहीं कम होता दिखाई नहीं पड़ता।
प्रारंभ से ही जिन धर्म में आस्था रखने वाली कपूरी बाई जैन का विवाह मात्र 16 वर्ष की उम्र में हो गया। दमोह के प्रसिद्ध विद्वान पंडित भगवानदास जी के प्रवचनों का लाभ लेने वाली कपूरी बाई निरंतर षट आवश्यक का पालन करती रही हैं। उनके परिवार के द्वारा विभिन्न जिनमंदिरों में जिन प्रतिमाएं विराजमान की गई हैं। विगत लगभग 20 वर्षों से एक समय ही भोजन करने वाली कपूरी बाई का जिन दर्शन के बिना भोजन ग्रहण न करना उनके जीवन का अनिवार्य अंग है। वे अपने पूरे परिवार को निरंतर जैन धर्म के संस्कारों से सिंचित करती रहती हैं। इनकी प्रेरणा से पूरा परिवार एक स्वर से जिनधर्म के प्रति समर्पित रहता है। अभी वर्तमान में वह मोक्षमार्ग प्रकाशक एवं आत्मानुशासन का स्वाध्याय कर रहीं हैं। दमोह में बनने वाले नवीन जिन मंदिर के प्रति उनका अति उत्साह है और उन्होंने पर्याय की अस्थिरता जानकर पहले से ही जिन मंदिर के शिलान्यास में अपनी ओर से स्वर्ण दान दे दिया और जिन मंदिर का शिलान्यास हुआ तो उन्होंने सोने का छोटा फावड़ा, तसला, ईंट आदि बनवाकर शिलान्यास विधि की। जब उनसे पूछा कि इस पर्याय के बाद नई पर्याय कौन सी लेना चाहेंगी तो बड़े विश्वास के साथ बोलीं, अब मुझे देह की कोई पर्याय नहीं चाहिए। बस अब मोक्ष में ही जाना है तो मैंने कहा पर्याय तो मिलेगी ही। इस पर वे हंसती हुई बोलीं, वर्तमान की पर्याय भी मुझसे भिन्न है और भविष्य की पर्याय भी मुझसे भिन्न ही रहेगी। मैं पर्यायों से भिन्न शुद्ध आत्मा हूं।
ऐसे अमृत वचन का चिंतन करने वाली कपूरी बाई के जीवन की इस जीवटता को नमन। वे शतायु हो और दीर्घ समय तक समाज के और परिवार के बीच अंतर प्रेरणा के दीप जलाती रहें, ऐसी मंगल कामना।
साहस और आत्मविश्वास की मिसाल हैं श्री हिम्मत भाई शाह उम्र 95 वर्ष, चेहरे पर उत्साह और मंद मंद मुस्कराहट, आत्मविश्वास से भरे हुये और अधिकांश समय जिनवाणी के साथ। यह विशेषताएं हैं मुंबई निवासी श्री हिम्मतलाल हरिलाल शाह की।
मूलतः श्वेतांबर संप्रदाय में जन्मे और गुजरात के सांवरकुण्डला गांव के मूल निवासी श्री हिम्मत भाई का जन्म 1929 में हुआ। सोनगढ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका आत्मधर्म को पढ़कर अपने बड़े भाई नेमचंद भाई के साथ सोनगढ पहुंचे और गुरुदेवश्री के व्याख्यान सुनकर उन्हें यह एहसास हुआ कि दिगंबर धर्म ही सच्चा धर्म है और उन्होंने दिगंबर धर्म को स्वीकार करने का निर्णय किया। श्वेतांबर समाज से सामाजिक बहिष्कार की परवाह न करते हुए उन्होंने दिगंबर धर्म को स्वीकार कर लिया। मुंबई में इन्होंने बड़े व्यापार की स्थापना की और पूरी ईमानदारी के साथ व्यापार को आगे बढ़ाया और भरपूर सफल हुए। सन 2002 में व्यापार से निवृत्ति लेकर देवलाली में स्थाई रूप से आवास बना लिया, तबसे वे नियमित जिनेन्द्र पूजन के बाद दिन भर में चार, पांच घंटे स्वाध्याय करते हैं और षट आवश्यक का पालन करते हुए अपनी दुर्लभ मनुष्य पर्याय का सदुपयोग जैन धर्म के पालन के साथ कर रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके चेहरे पर कहीं थकान का एहसास नहीं होता, उनकी धर्मपत्नी कोकिलाबेन भी उनके साथ धार्मिक गतिविधियों में प्रसन्नता के साथ शामिल होती हैं। श्री हिम्मत भाई की प्रेरणा से उनका पूरा परिवार भी जिन धर्म के लिए समर्पित भाव से योगदान करता रहता है।
ऐसे जीवट व्यक्तित्व के धनी श्री हिम्मत भाई शाह के साहस को जिनदेशना परिवार की ओर से नमन।
गजब के व्यक्तित्व हैं सुकनराज जी लोढ़ा उम्र 89 वर्ष। निरन्तर आगम का अभ्यास और अध्यात्म की आराधना, नियमित जिनेन्द्र भक्ति और दो समय प्रवचन। प्रतिदिन 7-8 घंटे का स्वाध्याय। ये हैं आत्मार्थी श्री सुकनराज जी लोढ़ा।
अजमेर के समीप विजयनगर के निवासी सरल स्वभावी श्री सुकनराज जी लोढ़ा का जन्म 1933 में श्वेतांबर मत में हुआ। बचपन से ही धर्म से जुड़े हुए सुकनराजजी को अपने श्वेतांबर गुरु के प्रवचन के आधार से एक प्रश्न हुआ कि जैसा सिद्ध भगवान को आत्मा का अनंत सुख है, क्या वैसा सुख हमें भी मिल सकता है? अनेक श्वेतांबर साधुओं के पास जाने पर भी उसका समाधान नहीं मिला। एक साधु ने तो कह दिया कि तुम्हारे प्रश्न का उत्तर सीमंधर भगवान ही देंगे और उस दिन से आप सीमंधर भगवान का ध्यान करने लगे। एक बार व्यापार के कारण से मुंबई गए और वहां जवेरी बाजार स्थित सीमंधर जिनालय में जाना हुआ और वहाँ पर रखी हुई आत्मधर्म नाम की मासिक पत्रिका को पढ़ा और स्वाध्याय का लाभ लिया। बस यहीं से जीवन की धारा बदल गई और धर्म की जिज्ञासा ने उन्हें सोनगढ़ पहुंचा दिया। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती पारसकुमारी लोढ़ा भी आपके साथ धार्मिक गतिविधियों में अग्रसर रहकर धर्मपत्नी नाम सार्थक कर रहीं हैं।
आप प्रथम बार 1970 में सोनगढ़ पधारे और 18 दिन तक वहीं रहकर शिविर का लाभ लिया और उन्हें प्रश्न का उत्तर मिल गया कि यदि हम भी पुरुषार्थ करें तो सिद्धों के समान सुख प्राप्त कर सकते हैं और उन्होंने दिगंबर धर्म स्वीकार कर लिया। उसके बाद तो समय, समय पर कई दिन के लिए सोनगढ़ जाना होने लगा। प्रवचन में भी सबसे आगे बैठकर स्वाध्याय का लाभ लिया करते थे। यदि किसी श्रोता का कोई प्रश्न होता तो उसे गुजराती में अनुवाद करके गुरुदेवश्री के समक्ष रखते थे और समाधान करवाते थे। विशेष तौर पर बुंदेलखंड के हिंदी भाषियों को गुजराती भाषा का ज्ञान न होने से तकलीफ होती थी तो सुकनराज जी इसके लिए दुभाषिए का कार्य करते थे। गुरुदेवश्री के प्रवचनों में जो ‘बराबर’ की आवाज आती है वह आवाज सुकनराज जी लोढ़ा की है। वे 1972 से सोनगढ़ में ही स्थाई रूप से बस गये और 1981 में वापस विजयनगर आये। 1972 से 1980 तक गुरुदेवश्री के प्रवचन में सभी प्रश्न आपके श्रीमुख से ही पूछे जाते थे।
जीवन के इस पड़ाव पर भी वे नियमित दो समय प्रवचन करते हैं और आत्माराधना पूर्वक जीवन बिता रहे हैं। आप इसी तरह जिनशासन की प्रभावना में संलग्न रहें जिनदेशना परिवार आपके दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना करता है। ऐसे जीवट व्यक्तित्व के धनी श्री सुकनराज जी लोढ़ा को सादर नमन।
94 साल की उम्र में भी भक्ति और अध्यात्म में लीन हैं पंडित मांगीलालजी। वे कहते हैं कि दिल में उमंग हो तो उम्र अपने संकल्प में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकती। यह बात शब्दशः सार्थक होती है पंडित श्री मांगीलाल जी कोलारस के ऊपर।
1930 में मध्य प्रदेश के कोलारस नगर में जन्मे पंडित मांगीलाल जी का बचपन जैन धर्म के संस्कारों में बीता। बचपन से ही धर्म रूचि होने के कारण जिन मंदिर की गतिविधियों में भाग लेना, धार्मिक परीक्षाएं देना आपको प्रिय रहा। बालबोध भाग 1, 2, 3 की परीक्षाओं के साथ छहढाला, द्रव्य संग्रह आदि में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया, तब प्रथम आने पर सूरत के धार्मिक परीक्षा बोर्ड से 1 रूपया पुरस्कार के रूप में प्राप्त हुआ तब समाज ने 1 रूपया मिला कर आपको सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
माता, पिता के गहरे जैन धर्म के संस्कारों के प्रभाव से बचपन से ही रात्रि भोजन आदि जैनत्व के नियमों का पालन होता रहा। आपके जीवन का मुख्य परिवर्तन पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी का समागम से हुआ। 1968 में सोनगढ़ जाना हुआ और वहाँ से आपके जीवन की विचारधारा में आमूलचूल परिवर्तन हो गया फिर तत्त्वज्ञान के रंग में ऐसे रंगे कि प्रतिवर्ष सावन माह में दुकान बंद करके सोनगढ़ पहुंच जाते और दसलक्षण पर्व तक वहीं रहकर आत्माराधना करते।
पंडित श्री मांगीलालजी विद्वान होने के साथ, साथ मधुर कंठ के धनी हैं और पुराने कवियों के भजन अत्यंत भक्ति भाव से तन्मयता के साथ गाते हैं इसलिये आपको कोकिलकंठी भी कहा जाता है। आपने अनेक धार्मिक कवि सम्मेलनों में भी सहभागिता की है। आपने पूज्य गुरुदेवश्री के सम्मुख एक भजन गाया था तब पूज्य गुरुदेवश्री ने पंडित मांगीलालजी की बहुत सराहना की। आपकी प्रेरणा से कोलारस के कई लोग सोनगढ़ जाने लगे। 1995 से आपने समस्त व्यापार आदि से निवृत्ति ले ली और सोनागिर में स्थाई रूप से निवास करने लगे। आपकी स्वयं के प्रति कर्तव्यपरायणता ही है कि आप 94 साल की उम्र में भी प्रतिदिन शुद्ध वस्त्र पहनकर प्रक्षाल, पूजन करते हैं। पूज्य गुरुदेवश्री के चार, पांच प्रवचन नियमित रूप से सुनते हैं, शास्त्र स्वाध्याय तो आपके जीवन का सौंदर्य है। आपने समय, समय पर प्रवचन हेतु अनेक नगरों में बाहर जाकर समाज को भी तत्त्व ज्ञान से लाभान्वित किया है।
पंडित मांगीलाल जी जैसे व्यक्तित्व समाज की जीवंत विरासत हैं जिन देशना परिवार की ओर से ऐसे व्यक्तित्व को सादर नमन।
आदर्श है कमलाबाई जी का जीवन भर जिनधर्म की आराधना करने वाली मध्यप्रदेश के इटारसी नगर की निवासी श्रीमती कमलाबाई जैन अपने जीवन के 91 वें वर्ष में भी सदा की भांति जिनधर्म की आराधना कर रही हैं। प्रातः काल 5:00 बजे उठकर सामायिक, जाप आदि करना, उसके बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर टीवी पर आने वाले डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल के प्रवचनों का लाभ लेना, उसके बाद पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन सुनना। यह क्रम यहीं समाप्त नहीं होता, फिर श्रीमती कमला बाई पहुँच जाती हैं जिनमंदिर और जिन मंदिर में पूजन, जाप, स्वाध्याय आदि के पश्चात 10 बजे घर वापस जाती हैं। तीनों समय सामायिक, शास्त्र स्वाध्याय, प्रवचन सुनना उनके दिनचर्या के अनिवार्य अंग हैं।
वे जिनागम अनुसार दैनिक रस के त्यागपूर्वक भोजन और एक समय ही भोजन करती हैं। तीनों अष्टान्हिका, सोलहकारण और दशलक्षण के व्रत करती हैं और सदा अष्टमी एवं चतुर्दशी का व्रत या उपवास करती हैं।
श्रीमती कमला बाई को पण्डित देवीदयालजी के प्रवचन में आई समयसार ग्रन्थ की छठवीं गाथा के व्याख्यान से तत्त्वरुचि जाग्रत हुई। शासकीय शिक्षिका रहीं श्रीमति कमला बाई ने सेवानिवृत्ति के बाद 25 वर्ष सिद्ध क्षेत्र सोनागिर में आराधनापूर्वक व्यतीत किए हैं।
अपने जीवन के हर समय में आत्मकल्याण की भावना के साथ आनन्दमयी जीवन जीने वाली श्रीमती कमला बाई का उत्साह, समर्पण और लगन सभी के लिए अनुकरणीय है।
जिन देशना परिवार ऐसी आराधिका को नमन करते हुए उनके दीर्घ और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।
जज्बा और जज्बात, जो कभी थकते ही नहीं.. प्रभावना और वात्सल्य का मणिकांचन योग हैं प्रकाश दादा उम्र 95 साल, चेहरे पर प्रसन्नता, सबके प्रति वात्सल्य मानो अपने स्नेहांक में संपूर्ण दुनिया का समावेश करना चाहते हों, जीवन बेदाग और एक ही लक्ष्य आराधना और प्रभावना, इन गुणों से संपन्न हैं, पं. श्री प्रकाशचन्द जी
17 मार्च 1929 को जन्मे उत्तरप्रदेश के मैनपुरी निवासी 95 वर्षीय पंडित श्री प्रकाशचंद जी जैन। इन्हें सब श्रद्धा से ‘दादा’ के नाम से पुकारते हैं। सन् 1956 में जयपुर से प्रख्यात विद्वान पंडित रतनचंदजी भारिल्ल मैनपुरी पधारे। उनके सरलतम प्रवचनों को सुनकर दादा को अध्यात्म की रूचि जागृत हो गई। सन् 1957 में तार्किक विद्वान डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल मैनपुरी पधारे तो उनके तार्किक प्रवचनों से अध्यात्म रूचि और पुष्ट हो गई, फिर अनवरत स्वाध्याय क्रम प्रारंभ हो गया और 1974 तक व्यक्तिगत रूप से ही स्वाध्याय करते रहे। उसके पश्चात 1975 से मैनपुरी में नियमित प्रवचन करने लगे जिसका क्रम अनवरत रूप से 2021 तक जारी रहा। 1972 में अपने गुरु पण्डित श्री राजारामजी से ज्योतिष विद्या सीखी और इस ज्योतिष विद्या में निष्णात होकर अध्यात्म प्रेमी समाज के समस्त पंचकल्याणक, वेदी प्रतिष्ठा आदि महत्त्वपूर्ण आयोजनों के मुहूर्त भी निकालने लगे। आपके द्वारा निकाले गए मुहूर्त में संपन्न सभी कार्यक्रम निर्विघ्न हुए और आश्चर्य यह कि प्रारंभ से ही ये सभी कार्य वे निस्पृहता के साथ कर रहे हैं। लौकिक रूप से शासकीय सेवा करते हुए 1987 में सेवा निवृत्त हुये। संपूर्ण जीवन जिनशासन की प्रभावना और आत्म आराधना में व्यतीत करने वाले दादा प्रकाशचंदजी संपूर्ण समाज के साथ समन्वय और प्रेम व्यवहार रखने में विश्वास रखते हैं। यह उनके व्यक्तित्व की ही कला है कि हर जैन-जैनेतर साधर्मी उनसे स्नेह रखता है। उनसे मिलने वाला चाहे बच्चा हो या बूढ़ा वे सभी को एक समान प्रेम बांटते हैं। निःसंदेह ऐसे योग्य विद्वान हमारे समाज की धरोहर हैं।
उनके किए गए कार्यों को जिनदेशना परिवार सादर नमन करते हुए उनकी स्वस्थता एवं दीर्घायु की मंगल कामना करता है।
87 वर्ष · लंदन में रहकर भी आध्यात्मिक संस्कारों से शोभित हैं
यदि संस्कार सुदृढ़ हों तो कोई क्षेत्र अथवा वातावरण आपके संकल्प में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं लंदन निवासी 87 वर्षीय श्री भीमजी भाई भगवानजी भाई शाह।
सौराष्ट्र के चांपाबेनरजा गांव के मूल निवासी श्रीमान भगवानजी भाई के पाँच पुत्र एवं तीन पुत्री में से तीसरे नंबर के पुत्र श्री भीमजी भाई पूरी लगन और समर्पण के साथ जिनधर्म के संस्कारों का लाभ ले रहे हैं। स्वर्गीय श्री भगवानजी भाई 1924 में अपने गांव से साउथ अफ्रीका के एक नगर किटाले गए और वहाँ अनेक संघर्ष करते हुए मोम्बासा नगर आये, वहां अपना व्यापार जमाने के पश्चात उन्होंने अपने परिवार एवं अनेक परिचितों को नैरोबी बुलाकर उन्हें व्यापार में लगा दिया। वे समय-समय पर भारत आते रहे। वे महात्मा गांधी से विशेष प्रभावित रहे। श्री भगवानजी भाई ने महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं से प्रत्यक्ष मुलाकात की और महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी के आश्रम भी गए। वहाँ प्रसिद्ध समाजसेवी आचार्य विनोबा भावे के साथ रहे। आश्रम में जमीकंद वाला भोजन बनता था परंतु पारिवारिक धार्मिक संस्कारों के कारण श्री भगवानजी भाई का जमीकंद का त्याग होने से उनके लिए अलग से भोजन बनाया जाता था। महात्मा गांधी ने श्रीमद् रायचंदजी को अपना गुरु बताया। यह ज्ञात होने पर श्री भगवानजी भाई ने श्रीमद् रायचंदजी के साहित्य का अध्ययन किया। श्रीमद् जी साक्षात तो विद्यमान नहीं थे अतः योग्य गुरु की कमी उन्हें लग रही थी और उन्हें कहीं भी धर्म का सच्चा स्वरूप ज्ञात नहीं हो रहा था। उसके पश्चात 1949 में किसी साधर्मी की प्रेरणा स्वरूप पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का लाभ लेने के लिए सोनगढ़ पधारे।
पूज्य गुरुदेवश्री के व्याख्यान सुनकर मानो उनका जीवन ही बदल गया और उन्हें अटल विश्वास हो गया कि सच्चा धर्म दिगंबर जैन शासन ही है। उस समय उन्होंने स्वाध्याय के लिये ढाई रुपए में समयसार खरीदा जो कि आज भी विद्यमान है। उसके व्यवस्था आदि का गहन अध्ययन किया और वापस नैरोबी जाकर के सामूहिक स्वाध्याय करना प्रारंभ किया। वे गुरुदेवश्री के प्रवचनों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने स्वयं गुरुदेवश्री के व्याख्यान रिकॉर्ड किये। उन्हें तत्त्वज्ञान का इतना रस लगा कि उन्होंने अपने परिवारजनों से कह दिया कि अब लौकिक कार्य में मेरा मन नहीं लगता इसलिये मुझे मरा ही समझना। उन्होंने भारत के अनेक तीर्थों की वंदना की। वे अच्छे लेखक भी थे, उनके अनेक लेख उपलब्ध हैं।
श्री भगवानजी भाई ने पुण्य उदय से प्राप्त संपदा का भरपूर उपयोग किया और धार्मिक संस्थाओं, दिगंबर जिन मंदिरों के निर्माण, गौशाला, समाज सेवा, विद्यालय निर्माण आदि में भरपूर दान दिया। गुजरात के जामनगर में स्थित दिगंबर जैन मंदिर की जगह लेने के लिए श्री भगवान जी भाई ने 1959 में 51000 रू. की राशि दान दी।
श्री भीमजी भाई को धार्मिक संस्कार विरासत में मिले। श्री भीमजी भाई स्वयं CA हैं और व्यापार के कारण लंदन में बस गए परंतु तत्त्व अभ्यास की उनकी रुचि निरंतर बढ़ती रही फलस्वरूप वे निरंतर जिन शास्त्रों का गहन अभ्यास करते हैं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पुष्पाबेन भी अपने पति के साथ स्वाध्याय से अपना जीवन पवित्र कर रही हैं। उनके पुत्र श्री विजेन और पुत्रवधु शीतल बेन मंगलायतन पंचकल्याणक में सौधर्म इंद्र के रूप में लाभ ले चुके हैं। श्री भीमजी भाई ने अपने पिता की सामाजिक एवं आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अनेक संस्थाओं को एवं जिनधर्म के प्रचार-प्रसार में भरपूर योगदान दिया है। सोनगढ़ में गरीब महिलाओं के लिए सिलाई प्रशिक्षण केंद्र भी खोला। वह आज भी प्रतिवर्ष सोनगढ़ आ करके महीनों रहकर तत्त्व का अभ्यास करते हैं। ऐसे तत्त्व जिज्ञासु, सरल हृदयी और जिनशासन के प्रति समर्पित व्यक्तित्व समाज की धरोहर हैं।
जिन देशना परिवार श्री भीमजी भाई एवं श्रीमती पुष्पा बेन के सुदीर्घ एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।
यदि तत्त्वज्ञान की धारा हृदय में प्रबल हो तो जीवन के कोई भी संकट किसी का उत्साह नहीं गिरा सकते, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ निवासी 87 वर्षीय श्रीमान दुलीचंदजी गिड़िया।
मूलतः श्वेतांबर स्थानक संप्रदाय में जन्मे श्री दुलीचंदजी की माताजी श्रीमती धुड़ीबाई एक बार पालीताणा की यात्रा में अनायास बीमार होने पर गुरुदेवश्री कानजी स्वामी की अध्यात्मधारा में संपर्क में आईं और सोनगढ़ से निकलने वाली आत्मधर्म पत्रिका की अध्यात्मधारा ने उनका जीवन परिवर्तित कर दिया। घर लौटकर उन्होंने घोषणा कर दी, अब मैं दिगंबर धर्म का ही पालन करूंगी और दृढ़ता के साथ अपने चारों पुत्रों श्री दुलीचंदजी, श्री मोतीलालजी, श्री पन्नालालजी और श्री प्रेमचंदजी को अध्यात्म और दिगंबर जैन धर्म के संस्कार दिए। पूज्य गुरुदेवश्री के नागपुर प्रवास के समय गुरुदेवश्री से खैरागढ़ पधारने का निवेदन किया। उनकी स्वीकृति मिलते ही मात्र एक माह में ही दिगंबर जिन मंदिर का निर्माण कर दिया और गुरुदेवश्री के करकमलों से ही जिनबिम्ब की वेदी प्रतिष्ठा हुई।
श्री दुलीचंदजी गिड़िया का पूरा परिवार जिनधर्म की सेवा में समर्पित है। इस परिवार के ट्रस्ट द्वारा जैन धर्म की कहानियों के 29 भागों का प्रकाशन किया गया जो कि लाखों की संख्या में पूरे समाज में पहुंचकर जिनधर्म के महापुरुषों का बोध करा रहे हैं। श्री दुलीचंदजी की दोनों बहनों ताराबेन एवं मैनाबेन ने मात्र 19 वर्ष की उम्र में ही सोनगढ़ जाकर ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार कर लिया। जीवन में अनेक संकट आने पर भी दुलीचंदजी और उनकी धर्मवत्सला पत्नी श्रीमती कंचनदेवी ने जिनधर्म का आश्रय नहीं छोड़ा बल्कि आपदा आने पर और दृढ़ता से जिनधर्म का श्रद्धान बढ़ता ही गया। परिवार में एक बालक, बहू और धर्मपत्नी श्रीमती कंचन देवी के देह विलय के प्रसंग के साथ-साथ अनेक उतार, चढ़ाव आये परंतु सदैव इसे कर्म का उदय जानकर समता धारण की। पूरे परिवार को जिन धर्म से जोड़े रखने में दुलीचंदजी का अद्भुत योगदान रहा। प्रातः जिनमंदिर में श्री जिनेंद्र अभिषेक, पूजन और स्वाध्याय करना उनके जीवन का नित्य क्रम रहा। पूरे परिवार को प्रेरणा देकर जिन धर्म के संस्कारों से आप्लावित करना उनका ध्येय रहा है। किसी भी जिनधर्म प्रभावक को देखकर उनका मन मयूर नाच उठता है। पूज्य गुरुदेवश्री का श्री दुलीचंदजी पर अगाध स्नेह था।
श्री दुलीचंदजी और श्रीमती कंचनदेवी जी सोनागिर में सन् 2002 में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं। इनके संस्कारों का ही प्रभाव है कि आज पूरा परिवार एक सूत्र में बंधकर जिनधर्म की सेवा के लिये प्रतिबद्ध है। साथ ही इस परिवार के युवरत्न पंडित अभय शास्त्री पूरी सक्रियता से जिनधर्म के प्रचार प्रसार में संलग्न हैं। जिनधर्म के शानदार आयोजन को देखकर उनकी प्रसन्नता दर्शनीय होती है।
जिनदेशना परिवार श्री दुलीचंदजी गिड़िया के दीर्घायु एवं स्वस्थ चेतना की मंगल कामना करता है।
87 वर्ष · एक ऐसी माँ, जिसने जिनवाणी माँ से मिला दिया
दुनिया में अपने बच्चों को तो हर माँ स्नेह बांटती है लेकिन जिनधर्म का अध्ययन करने आए हुए हजारों बच्चों को निश्छल स्नेह बांटने वाली कोई माँ है तो वे हैं वात्सल्यमूर्ति श्रीमती कमलाबाईजी भारिल्ल।
जयपुर स्थित पंडित टोडरमल दिगंबर जैन सिद्धांत महाविद्यालय के प्राचार्य रहे विद्वान पंडित स्व. श्री रतनचंदजी भारिल्ल की धर्मपत्नी श्रीमती कमलाबाई भारिल्ल अपने जीवन के 87वें वर्ष में भी सहज स्नेह के साथ बच्चों को आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। जब कोई बच्चा छोटी उम्र में अपना घर, परिवार छोड़कर जैनदर्शन का अध्ययन करने के लिए जयपुर पहुँचता था तो उसे अपनी माँ और परिवार की बहुत याद आती थी और पहले तो घर पर संपर्क करने के संसाधन भी नहीं थे, ऐसे समय में सर पर हाथ रखकर माँ और परिवार की कमी पूरी करने वाली स्नेह से परिपूर्ण महिला का नाम है श्रीमती कमलाबाई भारिल्ल।
पिछले लगभग 70 वर्षों से लगातार श्री देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति में तल्लीन रहकर तत्त्व ज्ञान का प्रचार प्रसार किया और परम आदरणीय बड़े दादा की धर्मसंगिनी का नाम सार्थक किया। बड़े दादा के साथ जीवन के हर उतार, चढ़ाव में साथ खड़ी रहने वाली श्रीमती कमलाबाई भारिल्ल ने अपनी प्रेम और वात्सल्यमयी वाणी से बच्चों को जिनागम का अध्ययन कराया। उनका स्नेह 1000 से अधिक स्नातक विद्वानों पर समान रूप से रहा। कहने को तो वे पण्डित शुद्धात्मप्रकाशजी भारिल्ल की माँ हैं लेकिन यथार्थ में तो सभी स्नातक विद्वानों को झोली भर, भरकर आशीर्वाद देने वाली विशाल हृदय की सबकी माँ हैं। अपने जीवन में न जाने कितने आध्यात्मिक शिविरों, विधानों आदि में स्नेह के सागर से लबालब शिक्षिका की सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने वालीं श्रीमती कमलाबाईजी का जीवन चलते, फिरती पाठशाला है। जिस समय में पंडित टोडरमल सिद्धांत महाविद्यालय जयपुर की स्थापना हुई उस समय में संसाधनों के अभाव में नितांत अकेले रहकर कभी भी पलायन का रुख नहीं अपनाया, ना ही कभी अभावों की शिकायत की। जीवन की स्थिति में संयोग चाहे शून्य रहे हों या चाहे आसमां को स्पर्श करने वाले, कभी उनकी स्नेहिल वाणी में अंतर देखने को नहीं मिला।
प्रतिदिन जिनवचनों की लोरी सुनाने वाली स्नेहादात्री श्रीमती कमलाबाई भारिल्ल हमेशा अपने मधुर व्यवहार, दृढनिश्चय, तत्त्व ज्ञान की प्रबल श्रद्धा से जीवन के हर सोपान को सहजता से ही पार करतीं गईं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे जिनवचनों का श्रवण करना नहीं भूलतीं। भले ही शरीर की स्थिति शिथिलता की ओर बढ़ गई परंतु 50 साल पहले की भी बातें उनकी स्मृति में स्पष्ट हैं। ‘जीने की हो न इच्छा, मरने की हो ना वांछा’ समाधिपाठ की इन पंक्तियों को जीवन में यथार्थ रूप से आचरित करने वाली श्रीमती कमलाबाई जी को शत, शत नमन।
जिनदेशना परिवार आदरणीया बड़ी मम्मी के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगलमय कामना करता है।
98 वर्ष की उम्र और जिनधर्म के प्रति बेमिसाल समर्पण कहते हैं भावना यदि अंतरंग परिणामों से भायी हो तो वह कभी निष्फल नहीं होती। जीवन भर जिनधर्म की आराधना का संकल्प उम्र के इस पड़ाव पर भी साथ निभा रहा है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निवासी डॉ. जे.डी. जैन संपूर्ण दिगंबर जैन समाज के लिए एक मिसाल हैं।
1926 में हरिद्वार में जन्मे डॉ. जे.डी. जैन को 1933 में श्री जयचंद प्रसादजी के द्वारा धार्मिक शिक्षा प्राप्त हुई। तब जिन धर्म की ऐसी रुचि लगी की जीवन की अनेक परिस्थितियों में भी आपने जिनधर्म का आलंबन नहीं छोड़ा। 98 वर्ष की उम्र में भी आज भी डॉ. जे.डी. जैन प्रतिदिन जिनेंद्र अभिषेक, पूजन एवं तीन समय प्रवचन करते हैं। जैन धर्म के चरणानुयोग का दृढ़ता से पालन करने वाले डॉक्टर जैन ने दिगंबर जैन बाल बोधिनी सभा के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक कार्य भी किया और 1974 में लॉर्ड महावीरा एकेडमी की स्थापना की जिसमें लौकिक शिक्षा के साथ, साथ जिन धर्म की शिक्षा का भी प्रबंध किया। डॉ. जैन द्वारा स्थापित जैन विद्यालय में हर अष्टमी और चतुर्दशी को सामूहिक पूजन होती है। इस स्कूल में जैन मंदिर की स्थापना की गई है। इस मंदिर की स्थापना में डॉ. जे.डी. जैन जी का संपूर्ण अर्थ सहयोग प्राप्त हुआ है। आपने समय अनुसार दो बड़ी शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की और 40 वर्ष तक अध्यापन का कार्य किया। डॉ. जे.डी. जैन के निर्देशन में लगभग 50 छात्रों ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। अपनी विशिष्ट बुद्धि से डॉ. जैन ने अनेक पुस्तकों का लेखन भी किया जो कि आज भी अनेक महाविद्यालयों और विद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं। उदारता इतनी है कि पुस्तकों से मिलने वाली रॉयल्टी कभी स्वीकार नहीं की।
जैन धर्म के दया करुणा के सिद्धांत को जीवन में पालन करने वाले डॉ. जैन से प्रभावित होकर उन्हें 1960 में भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के सदस्य के रूप में नामित किया गया। आपकी सामाजिक सेवाओं को रेखांकित करते हुए उस समय के भारत के राष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरि के द्वारा सम्मानित किया गया। आज भी प्रतिवर्ष डॉ. जे.डी. जैन के निर्देशन में प्रतिवर्ष जून माह में धार्मिक शिक्षण शिविर का आयोजन किया जाता है। पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के सहारनपुर पधारने पर डॉ. जे.डी. जैन को विशेष रूप से आध्यात्म की रुचि हुई। सहारनपुर के महावीर जैन कॉलोनी में बन रहे स्वाध्याय भवन में डॉक्टर जैन ने अपनी चंचल लक्ष्मी का भरपूर सदुपयोग किया है।
जिनधर्म के प्रति अगाध समर्पण, धर्मरूचि वाले और जिनशासन प्रभावना को अपना कर्तव्य मानने वाले डॉ. जे.डी. जैन के महान व्यक्तित्व को नमन। जिनदेशना परिवार डॉ. जे.डी. जैन के धर्ममय जीवन और दीर्घायु की मंगल कामना करता है।
जिसे आत्मा की लगन लगी हो उसके लिए परिस्थितियाँ बाधक नहीं बन सकतीं, इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं महाराष्ट्र के प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र शिरडशहापुर के निवासी 95 वर्षीय श्री प्रेमचंद जी पारसोबा महाजन।
बचपन से ही परिवार के धार्मिक माहौल से संस्कार प्राप्त हुए। आपके बड़े भाई विद्वान श्री रमेशचंदजी महाजन सप्तम प्रतिमाधारी बने। उसके पूर्व श्री रमेशचंदजी अनेक बार सोनगढ़ और जयपुर के शिविरों में जाते रहे और पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी एवं अनेक विद्वानों का समागम कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया। श्रीमान प्रेमचंदजी महाजन आज भी पूरी विनय और भक्ति से विद्वानों के प्रवचन सुनते हैं और शास्त्र स्वाध्याय करते हैं। आप स्थानीय जिनमंदिर में लगभग 60 वर्ष तक प्रवचन करते रहे और बाल कक्षा का भी संचालन करते रहे। साथ ही अपने यहां की दिगंबर जैन शिक्षण संस्था श्री शांति विद्या मंदिर का 50 वर्ष तक सचिव पद पर संचालन किया। आपने अपने नगर में प्रतिवर्ष जयपुर से विद्वानों को आमंत्रण दिया और समाज को भी तत्त्वज्ञान का लाभ प्रदान किया। धार्मिक दायित्व के साथ-साथ अपने सामाजिक और शासकीय क्षेत्र में भी न्याय नीति पूर्वक बड़े पदों पर सेवाएं प्रदान की। जीवन के इस पड़ाव पर आप समस्त बाहरी कार्यों से निवृत्त होकर स्वान्तःसुखाय दर्शन-पूजन, प्रवचन स्वाध्याय मनन चिंतन में ही अपना जीवन समतापूर्वक व्यतीत कर रहे हैं। आपकी देव शास्त्र गुरु के प्रति भक्ति और तत्त्वरुचि सभी के लिए अनुकरणीय है।
जिनदेशना परिवार श्री प्रेमचंदजी महाजन के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।
मुख पर मुस्कान, हृदय में पंच परमेष्ठी के प्रति भक्ति और परिस्थितियों से जूझने की क्षमता का नाम है श्रीमती शारदा बेन मीठालाल दोशी। हिम्मतनगर (गुज.) की निवासी श्रीमती शारदा बेन का जीवन कई मायनों में आदर्श है। गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान पंडित श्री मीठालाल एम. दोशी की धर्मपत्नी श्रीमती शारदा बेन दोशी अपने जीवन के 88 वें वर्ष में भी भरपूर उमंग, भक्ति और श्रद्धा के साथ जिनधर्म का सेवन कर रही हैं।
पंडित श्री मीठालाल मगनलाल दोशी से मात्र 16 वर्ष की छोटी उम्र में विवाह के पश्चात जीवन में अनेक संकटों से सामना करना पड़ा। विपरीत परिस्थितियों और आर्थिक विषमता की बावजूद भी शारदाबेन ने अपने जीवन साथी का साथ कभी नहीं छोड़ा। पंडित मीठालाल दोशी की आर्थिक स्थिति भी ऐसी कि भीषण गर्मी की तपन से बचने के लिए पैरों में चप्पल न होने पर पैर में पेड़ के पत्ते बांधकर भूमि के ताप से मुकाबला करते परंतु जिनधर्म भक्ति इतनी कि बिना पंच परमेष्ठी की आराधना के भोजन भी ग्रहण नहीं करते। पूज्य गुरुदेवश्री के प्रति भक्ति ऐसी कि जब गुरुदेवश्री के हिम्मतनगर में आये तो उन्हें कच्चे और धूल भरे रास्ते में पैर न रखना पड़ें तो छोटी सी दुकान कपड़े की दुकान होने के बावजूद भी अपनी दुकान के नए के नए कपड़े के थान गुरुदेवश्री के पैरों के नीचे चलने के लिए रास्ते में बिछा दिए। लोग बोले, मीठालाल तो पागल हो गया है परंतु गुरुदेव के प्रति समर्पण के आगे यह सारी उलाहना भी श्रृंगार लगती।
जब भी गुरुदेवश्री गुजरात में ही कहीं जाते तो पण्डित मीठाभाई ही उनके साथ होते और उनकी गाड़ी मंगल वर्धिनी में आगे बैठकर चलते। गुरुदेवश्री की सेवा करते और गुरुदेवश्री से चैतन्य आत्मा के अमृत वचनों का पान करते। मात्र 33 वर्ष की युवा अवस्था में ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया और उन्होंने स्वयं प्रवचन करना प्रारंभ किया और जिनधर्म प्रभावना में समर्पित हो गये। शनैः शनैः परिस्थितियाँ बदलीं और इस यात्रा में श्रीमती शारदा बेन दोशी ने हर सुख, दुख के प्रसंग में सदैव साथ दिया। दो पुत्रों और एक पुत्री के साथ भरे पूरे परिवार में भी अपने असंग चैतन्य आत्मा का सदैव स्मरण करती रहती हैं। जीवन भर तत्त्व की साधना और जिनधर्म की आराधना करने वाली और पंच परमेष्ठी की प्रति अगाध भक्ति रखने वाली श्रीमती शारदा बेन जीवन के इस पड़ाव पर भी प्रतिदिन प्रातः जिनेंद्र अभिषेक देखतीं हैं और जिनेंद्र पूजन, गुरुदेवश्री का प्रवचन, विद्वान के प्रवचन के पश्चात ही अल्पाहार ग्रहण करती हैं। प्रतिदिन लगभग 6 से 8 घंटे का स्वाध्याय उनके जीवन का अदभुत सौंदर्य है। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना और जीवन की परिस्थितियों से अठखेलियाँ करना उनके जीवन का स्वभाव बन गया है।
2023 में जब शारदा बेन को मालूम चला कि लगभग 300 साधर्मी और परिवार शिखरजी व पंचतीर्थ की यात्रा पर जा रहा है और उनके पुत्रों ने स्वास्थ्य की प्रतिकूलता और पैरों की तकलीफ देखकर कहा कि कि आप यात्रा में परेशान हो जायेंगीं इसलिये आप घर पर ही आराम से रहें तो शारदा बेन बोलीं कि यदि तुम्हारे जाने के बाद मेरी पर्याय छूट गई तो तुम सबको वापस आना ही पड़ेगा इसलिए मुझे साथ ले चलो। जो होना होगा, वहीं हो जाएगा और अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर सम्मेदशिखर में सिद्धों की आराधना करने पहुंच गई और पंच तीर्थ की यात्रा भी की।
वात्सल्य मूर्ति शारदा बेन और मीठाभाई दोशी के संस्कारों का प्रतिफल है कि उनके परिवार की चार पीढ़ी के सदस्य एक साथ एक ही विचारधारा से जिनधर्म के लिये समर्पित हैं और हिम्मतनगर में जिनशासन का झंडा बुलंद किए हुए हैं और समय, समय पर जिनायतनों व जिनधर्म की प्रभावना में अपना तन, मन, धन से आर्थिक योगदान देते रहते हैं। इनके एक पुत्र श्री रजनीभाई दोशी पूरे देश में जिनधर्म की प्रभावना में संलग्न में रहकर अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं।
निःसंदेह ऐसी मातृश्री को पाकर कौन अपने को धन्य महसूस नहीं करेगा? जिनदेशना परिवार मातृश्री शारदा बेन मीठालाल दोशी के स्वस्थ एवं दीर्घायु की मंगल कामना करते हुए उन्हें नमन करता है।