हमारी जीवंत विरासत (जिनदेशना) | Hamari Jivant Virasat (Jindeshna)

20. श्रीमती सविता बेन भोगीलाल शाह

90 वर्ष · आदर्श नारी है

जिन्हें भव का भय लगा हो, उनके जीवन का हर प्रयास भव के अभाव के लिए होता है। इसके लिए कोई बाधायें उनके संकल्प को नहीं रोक सकतीं। इसी मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहीं हैं वस्त्रापुर अहमदाबाद की निवासी श्रीमती सविता बेन भोगीलाल शाह।

जीवन के 90 वर्ष पूर्ण कर चुकीं सविता बहन आज भी पूरी रुचि और समर्पण के साथ जिन शासन की सेवा में और आत्मलाभ में समर्पित हैं। सविता बहन ने स्वयं गहरी स्वाध्यायी हैं और तत्त्व अभ्यासी भी। उन्होंने 30 वर्षों तक अहमदाबाद के ही मणिनगर स्थित जिनमंदिर में महिलाओं की धार्मिक कक्षा का संचालन किया। वे पिछले 7 सालों से दिन में एक बार ही भोजन करतीं हैं। अपने जीवन में अनेक तीर्थयात्रा, विधान, शिविर में सहभागिता कर चुकीं सविता बहन ने पंडित टोडरमल ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले शिक्षण प्रशिक्षण शिविर में पांच बार सहभागिता की है।

सविता बेन जीवन के पड़ाव पर आज भी नियमित जिनेंद्र पूजन, स्वाध्याय और स्वयं का अभ्यास करतीं हैं। उनकी दृढ़ता का प्रमाण इस बात से ही हो जाता है कि लगभग 5 वर्ष पूर्व दशलक्षण पर्व के समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा। डॉक्टर ने कहा कि इन्हें तुरंत अस्पताल में एडमिट करना पड़ेगा नहीं तो यह जीवित नहीं रह पाएंगी परंतु महापर्व का समय होने के कारण सविता बहन ने स्पष्ट कह दिया कि मैं महापर्व पर हॉस्पिटल नहीं जाऊंगी। क्या इस पर्व पर मैं अभक्ष्य दवाइयों का सेवन करूँ और बिना देव दर्शन के रहूँगी? चाहे मेरे प्राण क्यों न चले जायें, मैं हॉस्पिटल नहीं जाऊँगी। भगवान ने जो अपने ज्ञान में देखा होगा वही तो होगा। इस दृढ़ संकल्प से नियम निभाया और सहज ही स्वस्थ हो गईं। उनका पूरा परिवार उनकी ही प्रेरणा से अग्रसर है और सविता बहन की सारी अनुकूलताओं का ध्यान रखते हुए उनसे निरंतर प्रेरणा लेने का प्रयास कर रहा है।

जिनदेशना परिवार आदरणीया सविता बहन के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगलमय कामना करता है।

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21. धीरज बेन दादभावाला

92 वर्ष · उत्साह और हौसले की अद्भुत मिसाल है 92 वर्षीय

जैन धर्म की रुचि, नियमित रूप से प्रवचनों का श्रवण और अगाध समर्पण का नाम है 92 वर्षीय धीरज बेन दादभावाला। मुंबई के उपनगर वार्डन रोड में रहने वाली श्रीमती धीरज बेन की उम्र 92 वर्ष हो चुकी हैं और अभी भी पूरी तरह जाग्रत अवस्था में जिनशासन के अमृत सिद्धांतों का लाभ ले रही हैं। प्रतिदिन प्रातः जिनेंद्र पूजन और ऑनलाइन माध्यम से प्रवचन का सुनना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य अंग है। प्रतिदिन लगभग 6-7 घंटे स्वाध्याय करने वाली धीरज बेन उम्र की इस अवस्था में शारीरिक असमर्थता के कारण जिनमंदिर तो रोज नहीं जा पाती परंतु घर पर ही रहकर अपने नित्य धार्मिक कर्तव्य पूर्ण कर रही हैं। धीरज बेन ब्र. श्री हेमंत भाई गांधी के प्रवचनों से विशेष प्रभावित हुईं और उनकी रुचि जैन धर्म में बढ़ती गई।

60 वर्ष की उम्र में कार चलाना सीखकर उन्होंने अपनी जीवटता और लगन का प्रमाण दिया और 85 वर्ष की उम्र तक वे स्वयं कार चलाकर विलेपार्ला के सीमंधर जिनमंदिर आया करती थीं। उन्होंने पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचनों से जिनशासन सिद्धांतों का जो मर्म जाना, उन पावन सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा मस्कट में रहने वाली अपनी बेटी मीरा बेन को भी देती रही हैं। जिस समय मोबाइल आदि आधुनिक तकनीक नहीं थी उस समय वे प्रवचन को सुनकर उसके स्वयं पूरे नोट्स तैयार करके अपनी बेटी को मस्कट पोस्ट करके भेजतीं थीं और उनकी बेटी जो जैन धर्म में अत्यंत रुचि रखनेवाली है, उन्होंने भी अपनी मां की भावना को स्वीकार करते हुए और उनसे प्रेरणा लेकर अपने आपको इसी तत्त्वज्ञान में ढाल दिया और अपने बच्चों में और परिवार के सदस्यों में भी तत्त्वज्ञान के संस्कार प्रदान कर रही है फलस्वरूप वे मस्कट में भी सिद्धांतों का पालन और प्रचार कर रही हैं।

वे कहती हैं जीवन में संयोग, वियोग वस्तु का स्वयं का परिणाम है, यदि मेरी देह छूट भी जाए इसमें क्या आश्चर्य ? पर्याय बदलना ही तो प्रकृति का नियम है, यही तो वस्तु स्वरूप है।

सहजता, समता और स्नेह रखने वाली धीरज बेन का जीवन का प्रतिक्षण धर्ममय हो, जिनदेशना परिवार ऐसी मंगल कामना करता है और उनके स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की भावना व्यक्त करता है।

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22. श्रीमती अनुसूया बेन मोदी

99 वर्ष · 99 वर्ष की उम्र, परंतु हौसला है कि कम ही नहीं होता

दिल में उमंग हो और निश्चय में दृढ़ता हो तो उम्र एक आंकड़े के अलावा कुछ भी नहीं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है सोनगढ़ निवासी श्रीमती अनुसूया बेन मोदी। स्वर्गीय श्री नागरदास बी. मोदी की धर्मपत्नी श्रीमती अनुसूयाबेन मोदी पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी की साधना भूमि सोनगढ़ में पिछले 75 वर्षों से निवास कर रही हैं। श्रीमती अनुसूया बेन 24 वर्ष की युवावस्था से ही अपने परिवार के साथ सोनगढ़ में स्थाई रूप से निवास कर रही हैं। उन्होंने अपने जीवन में गुरुदेवश्री का प्रत्यक्ष समागम प्राप्त किया एवं उनके प्रवचनों का वर्षों तक लाभ लिया, स्वयं भी शास्त्रों की गहन अभ्यासी हैं। साथ ही पूज्य गुरुदेवश्री के द्वारा देश भर में हुए पंचकल्याणक, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव आदि अन्य प्रसंगों का भरपूर लाभ लिया, साथ ही पूज्य बेनश्री, आत्मार्थी निहालचंदजी सोगानी एवं उत्कृष्ट श्रावक एवं विद्वान श्री दीपचंदजी सेठिया, सरदार शहर के द्वारा अध्यात्म अमृत का भरपूर रसपान किया।

जीवन की इस अवस्था में भी उन्हें नियमित रूप से भाव पूजा, भक्ति, भक्तामर स्तोत्र, समयसारजी की अनेक गाथाएं, श्रीमद् राजचंद्रजी के अनेक पद कंठस्थ हैं, जिनका वे नियमित पाठ करती हैं तथा वे प्रतिदिन प्रात 5:00 बजे से रात्रि को सोने के पूर्व तक गुरूदेवश्री के 7 प्रवचनों का लाभ लेती हैं। रात्रि में सोने के पूर्व मैं ज्ञान स्वभावी आत्मा हूँ, परमानंद परमात्मा हूँ आदि मंत्रों का घोलन करती हैं।

99 वर्ष की उम्र में भी वह जागृत रहकर अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को सार्थक कर रही हैं। आज भी उनके चेहरे की प्रसन्नता और उल्लास प्रेरणादायक है। वह कहती हैं कि मुझे रात्रि में अनेक बार सीमंधर भगवान, दिगम्बर मुनिराजों और गुरुदेवश्री के दर्शन होते हैं।

ऐसी आत्मार्थी श्राविका श्रीमती अनुसूयाबेन का जीवन उत्कृष्ट एवं प्रेरणादायी है। उनके पुत्र श्री जीतू भाई मोदी, पौत्र श्री चिंतन और श्री प्रशम मोदी सहित पूरा परिवार जिन शासन का लाभ ले रहा है और प्रभावना में संलग्न है।

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23. श्री कोमलचंदजी एवं श्रीमती ताराबाईजी

95-92 वर्ष · जीवन के हर क्षण को सार्थक कर रहे हैं

95 वर्षीय श्री कोमलचंदजी एवं 92 वर्षीय श्रीमती ताराबाईजी जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है जिन शासन का मिलना और उस पर भी तत्त्वज्ञान का लाभ मिलना महा सौभाग्य है। इसलिए जीवन के अंतिम सांस तक जिनवाणी का संग रहे, यह मंगल भावना है जबलपुर निवासी श्री कोमलचंदजी एवं श्रीमती ताराबाई जी की।

आदरणीया तारा बाईजी मध्यप्रदेश के बीना नगर की मूल निवासी हैं और उन्हें अपने पिता श्री नंदन प्रसाद जी के कारण से तत्त्वज्ञान की रुचि हुई और जब पहली बार सोनगढ़ जाना हुआ तो उनकी रुचि को और बल मिल गया। वहां से आने के पश्चात स्वाध्याय तो मानो जीवन का अनिवार्य अंग बन गया। सौभाग्य ऐसा कि विवाह भी मुमुक्षु परिवार में जबलपुर निवासी श्री कोमलचंदजी से हो गया। बस फिर क्या था, सोने पर सुहागा और ये दंपति जिनशासन की गंगा में स्नान करने लगे। 25 सदस्यों के भरे पूरे परिवार में रहने का एक अलग अनुभव और उसको भी सफलतापूर्वक निर्वहन करना ताराबाईजी की विशेषता रही। पारिवारिक दायित्व को निर्वाह करने के साथ, साथ श्री कोमलचंदजी देश सेवा में पीछे नहीं रहे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में जेल भी गए। आपने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित श्री जवाहरलाल नेहरू और आचार्य विनोबा भावे ऐसे महान हस्तियों का समागम प्राप्त किया और वे आज जबलपुर के सबसे वरिष्ठ और एकमात्र जीवंत स्वाधीनता संग्राम सेनानी हैं। उन्हें प्रत्येक सरकारी कार्यक्रम में आदरपूर्वक आमंत्रण किया जाता है।

लौकिक सफलताओं के साथ, साथ उन्होंने जबलपुर में मुमुक्षु मंडल को स्थापित करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और आप मुमुक्षु मंडल जबलपुर के अध्यक्ष भी रहे सन् 2000 में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव में माता, पिता के गुरुतर उत्तरदायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। दान देने की ललक ऐसी कि कहीं भी जिन मंदिर निर्माण हो अथवा शिविर आयोजन अथवा किसी साधर्मी को सहयोग करना, सबके लिए खुले हृदय से सहयोग किया और निरंतर जिनवाणी का श्रवण करते रहे। जीवन इस पड़ाव पर आज भी ऑनलाइन माध्यम से नियमित प्रवचन सुनते हैं और व्यक्तिगत रूप से स्वाध्याय करते हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव पर एक ही भावना है कि जीवन के मुख्य लक्ष्य भेद विज्ञान की प्राप्ति हो और इसी भावना को साकार करने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं।

जिनदेशना परिवार ऐसे उदारमना, वात्सल्यधारी और आत्मकर्तव्य के प्रति जागरूक श्री कोमलचंदजी एवं श्रीमती ताराबाईजी के शतायु जीवन की मंगल कामना करता है।

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24. पंडित श्री मांगीलालजी

95 वर्ष · शरीर की क्षीण होती अवस्था पर भारी पड़ता आत्मबल

आत्मा अनंत बलवान है, शरीर की अवस्थाओं से भिन्न चैतन्य की सत्ता की अनुभूति ही भवनाश करने का सर्वोत्तम उपाय है, ऐसे वज्र वचनों का सेवन करने वाले पंडित श्री मांगीलालजी गुना।

मूलतः नीमखेड़ी के निवासी श्री मांगीलालजी को प्रथम बार 1956 में पंडित श्री राजमलजी की प्रेरणा से स्वाध्याय का रंग लगा और प्रथम स्वाध्याय में ही जैन दर्शन का माहात्म्य समझ में आ गया। मात्र तीन दिन में ही लघु जैन सिद्धांत प्रवेशिका के 20 प्रश्न, उत्तर याद कर लिए। जहाँ चाह, वहाँ राह सूक्ति के अनुसार सच्चे मार्ग की तलाश कर रहे पंडित श्री मांगीलालजी की रुचि पल्लवित होती गई और स्वाध्याय में रस बढ़ता गया। पंडित श्री राजमलजी की प्रेरणा से ही गुना में ही प्रवचन करना प्रारंभ कर दिया और प्रथम बार सोनगढ़ में लगने वाले आध्यात्मिक शिक्षण शिविर में जाने का सुयोग बन गया वहाँ पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के प्रवचन सुनकर मानो आनंद का पारावार ही न रहा। 20 दिन के शिविर में पंडित श्री खेमचंदभाई, पंडित श्री रामजीभाई दोशी, पंडित श्री कैलाशचंदजी बुलंदशहर के प्रवचन एवं कक्षाओं का लाभ लिया तो मानो रुचि को और बल मिल गया। उसके बाद कई बार सोनगढ़ जाना हुआ पूज्य गुरुदेवश्री के जीवन को निकट से देखा। मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम डिपो में लगभग 45 वर्षों तक शासकीय सेवा के दौरान भी वे लगातार स्वाध्याय करते रहे।

देव, शास्त्र, गुरु के आराधक पंडित श्री मांगीलालजी 28 वर्ष की उम्र से अभी तक लगभग 67 वर्षों से लगातार स्वाध्याय कर रहे हैं और अपने विशिष्ट क्षयोपशम के बल पर साधर्मियों को भी स्वाध्याय का अमृतपान कराते रहे। आज भी पंडित श्री मांगीलालजी प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक घंटों स्वाध्याय करते हैं। वे मूल शास्त्र लेकर पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन सुनते हैं और आवश्यकता होने पर उसके नोट्स बनाते हैं उनकी रुचि का ही यह प्रमाण है कि उन्होंने अनेक शोधात्मक लेख भी लिखे। अनेकांत, वही वास्तव में अमृत है, द्रव्य की लगभग 65 परिभाषाएं, जिनवचन में रमने वाले मोह का नाश करते हैं, सारगर्भित लेख, भावाय नमः का मूल भाव, दृष्टि का विषय भगवान आत्मा की आगम विवक्षायें, मोह क्षय का उपाय क्या ?, क्या आपने जिनवचनों पर गंभीरता से विचार किया है, दुख दूर करने में आपा, पर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए, बंध के विनाश हेतु शुद्ध आत्मा ही भाने योग्य है, ऐसे अनेक गंभीर विषयों पर उनके लेख पठनीय एवं मननीय हैं। जीवन के उत्तरार्ध में भी उनकी रुचि हर दिन बढ़ती जा रही है। शरीर की अशक्त अवस्था होने पर भी उनका आत्मबल कहीं कमजोर नहीं पड़ता। उनको देखकर आत्मार्थियों को भी प्रेरणा मिलती है कि 95 वर्षीय पंडित मांगीलालजी अनवरत मोहनाश के लिए और भेदज्ञान की प्राप्ति के लिए अगाध लगन और समर्पण से संलग्न हैं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमलाबाई जैन और सुपुत्र सुशीलजी, जयकुमारजी, मनीषजी और समस्त परिवारगण जिनशासन की सेवा में यथासंभव संलग्न हैं।

जिनदेशना परिवार ऐसे वरिष्ठ आत्मार्थी विद्वान पंडित श्री मांगीलालजी के दीर्घ, स्वस्थ एवं मंगलमय जीवन की कामना करता है।

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25. श्रीमति चंपाबाईजी

92 वर्ष · यह हौसले हैं जो कभी पस्त नहीं होते : प्रेरणामूर्ति

जीवन का लक्ष्य निश्चित हो और भावना पवित्र तो हर क्षण स्वर्णिम सा लगता है, इस बात को चरितार्थ कर रही हैं 92 वर्षीय श्रीमती चंपाबाई जी।

छिंदवाड़ा की मूल निवासी चंपाबाईजी अपने जीवन के 92 वर्ष पूर्ण कर चुकी हैं। 92 वर्ष की उम्र होने के बावजूद उनका उत्साह कम नहीं होता, न ही दिनचर्या बदलती है। इतनी वयोवृद्ध अवस्था में भी प्रतिदिन कई घंटे स्वाध्याय करना उनके जीवन की मुख्य गतिविधि है। अपने जीवन में कई ग्रन्थों का स्वाध्याय कर चुकीं चंपाबाईजी का जीवन बहुत सहज है। प्रातःकाल उठकर पंच परमेष्ठियों को स्मरण करना, जाप देना, शारीरिक अशक्त अवस्था के कारण जिनमंदिर न पहुंच पाने के कारण घर पर ही अपने आराध्य भगवंतों का पूजन, भक्ति करना उनकी जीवन की दिनचर्या का प्रथम चरण है। उसके पश्चात दिनभर किसी न किसी ग्रंथ का स्वाध्याय करती ही रहती हैं। प्रति अष्टमी और चतुर्दशी एवं पर्व के दिनों में एकाशन करती हैं, रात्रि में जल का भी ग्रहण नहीं करतीं और आजीवन एलोपैथिक दवाइयों का त्याग है। वे परिवार के सदस्यों की जीवनशैली को सहज स्वीकार करती हैं और परिवार के सदस्यों को जिनधर्म की प्रेरणा देतीं रहतीं है। जिन धर्म की प्रभावना करना उन्हें रुचिकर लगता है। गत जनवरी माह में उनके परिवार ने वृहद् स्तर पर श्री सिद्धचक्र मण्डल विधान का आयोजन किया था।

ज्ञातव्य है कि मातुश्री श्रीमति चंपाबाईजी श्री अनिल जी एवं श्री अरविन्द जी के साथ, साथ छिंदवाड़ा के विद्वान और पंचकल्याणकों के मंचों पर भक्तियों से धूम मचाने वाले पंडित श्री ऋषभजी शास्त्री की माताजी है। मातुश्री चंपा बाईजी का पूरा परिवार का जिनधर्म की प्रभावना में संलग्न है।

जिनदेशना परिवार मातुश्री चंपाबाई के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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26. श्रीमति शारदा बेन

88 वर्ष · भक्ति का उत्साह ऐसा कि युवा भी शरमा जायें, उत्साह का बेमिसाल उदाहरण

यह चर्चा है अहमदाबाद के नवरंगपुरा की निवासी 88 वर्षीया श्रीमती शारदा बेन जसवंत भाई गांधी की।

अपने जीवन के 88 वर्ष पूर्ण कर चुकी शारदा बेन का जिन धर्म के प्रति उत्साह देखते ही बनता है। मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही जमीकंद आदि सेवन का त्याग कर चुकीं शारदा बेन का पिछले 76 वर्षों से जिनदर्शन के बिना कुछ भी भोजन ग्रहण न करने का नियम है और सुखद बात यह रही कि पिछले 76 वर्षों में एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ कि उन्हें जिनेंद्र भगवान के दर्शन के बिना रहना पड़ा हो तो भी उन्होंने नियम लिया है कि जिस दिन किसी कारणवश जिनेंद्र भगवान के दर्शन नहीं मिलेंगे उस दिन भोजन में एक रस का त्याग करूंगी।

88 वर्षीया श्रीमती शारदा बेन को जीवन के लगभग 60 वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात समयसार ग्रंथराज का परिचय हुआ, उसके पूर्व उन्हें गाथा, टीका शब्द का परिचय भी नहीं था और उन्होंने उसके पश्चात स्वाध्याय करना प्रारंभ किया। उन्हें आज भी इस बात का दुःख है कि उन्हें जीवन की अधिकांश आयु बीत जाने के बाद सच्चे जैनधर्म की जानकारी हुई वरना इसके पूर्व मात्र क्रियाकांड में ही जीवन व्यतीत हो रहा था।

प्रतिदिन प्रातः 4:00 बजे उठकर सामायिक स्वाध्याय आदि करके जिनमंदिर जाकर दर्शन, पूजन संपन्न करने के पश्चात प्रतिदिन लगभग 5 से 6 घंटे विद्वानों के प्रवचन सुनना और उसके बाद स्वतः स्वाध्याय करना उनकी दैनिक चर्या का सौंदर्य है। स्वास्थ्य ऐसा कि पिछले लगभग 20 वर्षों में कभी दवा नहीं खानी पड़ी और देह के प्रति उपेक्षा भाव ऐसा है कि उन्हें चोट लगने पर भी उसका इलाज नहीं करती बल्कि यह कहती है यह तो शरीर की व्यवस्था है। चार पुत्रों एवं एक पुत्री की मातुश्री शारदा बेन आज भी पूरे उत्साह के साथ जिनधर्म प्रभावना के कार्यों में सहभागिता करती हैं। शारदा बेन अपने परिवार के बीच में भी धार्मिक वातावरण बनाए रखती हैं और उन्हें अनेक गाथायें, धार्मिक भजन, और गीत कंठस्थ हैं।

4 अगस्त 2025 को अहमदाबाद में हुए श्री कुंदकुंद कहान दिगंबर जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट के अधिवेशन में भक्ति पर उनके उठते हुए कदम और चेहरे की आनंदमयी मुद्रा दर्शनीय थी।

जिनदेशना परिवार मातुश्री शारदाबेन के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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27. श्री रतनचंद जैन

94 वर्ष · जिनशासनसेवी

यदि जीने का जज्बात हो और उस पर भी जिनधर्म की सुगंध हो तो क्या बात है..। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है सागर निवासी श्री रतनचंदजी जैन जो अपने जीवन के 94 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं।

सागर के समीप ही तेंदूडावर ग्राम में जन्मे श्री रतनचंदजी बचपन से ही जिनधर्म की रुचि से संपन्न हैं। वीतरागी देव शास्त्र गुरु के अनन्य भक्त श्री श्री रतनचंदजी जैन ने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव होने के बावजूद जिनदर्शन का नियम कभी नहीं छोड़ा। पिछले 60 वर्षों से प्रतिदिन शुद्ध वस्त्र पहनकर जिनेंद्र भगवान का अभिषेक, पूजन करना और स्वाध्याय करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। लगभग 60 वर्षों से रात्रि में पानी का भी त्याग है। स्वाध्याय की रुचि इतनी है कि अपने जीवन में पंच परमागम के साथ लगभग 200 शास्त्रों का अध्ययन कर चुके हैं। स्वानुभूति दर्शन का लगभग 120 बार स्वाध्याय किया है। पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन संग्रह प्रवचन रत्नाकर के 11 भाग 6 बार पढ़ चुके हैं। वर्तमान में भी प्रतिदिन दोपहर में ढाई घंटे और रात्रि को 3 घंटे तन्मयता के साथ स्वाध्याय करना उनका नित्य क्रम है।

देश के लगभग संपूर्ण तीर्थ क्षेत्रों की वंदना कर चुके श्री रतनचंदजी की सुपुत्री ब्र. सुमनजी 38 वर्षों से सोनगढ़ में धर्म आराधना कर रही हैं। आदरणीय श्री रतनचंदजी सोनगढ़ जाते रहे हैं। शरीर की चाहे कैसी भी परिस्थिति हो वह कहते हैं कि अब शरीर का उपचार करना नहीं करना, यह आत्मा ही पवित्र तत्त्व है, जो रोग से रहित है। आदरणीय रतनचंदजी का पूरा परिवार जिन धर्म की प्रभावना में समर्पित है। उनके ज्येष्ठ सुपुत्र श्री निर्मल कुमारजी अच्छे विद्वान हैं और पूरा परिवार जिन धर्म की सेवा में तन मन धन से संलग्न है।

जिनदेशना परिवार श्री रतनचंदजी के धर्ममय और दीर्घायु की मंगल कामना करता है।

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28. श्री नरेंद्र कुमारजी

82 वर्ष · सादगी और समर्पण की मिसाल हैं

सादगी जिनके जीवन का सौंदर्य है, कर्तव्य जिनके लिये आराधना है और तत्त्वाभ्यास जिनके जीवन का मिशन है, ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं जबलपुर निवासी 82 वर्षीय श्री नरेंद्र कुमारजी जैन।

सन 1943 में जन्मे श्री नरेंद्र कुमारजी आज भी अपनी यथासंभव अनुकूलता और समर्पण के साथ स्व-पर कल्याण में संलग्न हैं। श्रीमान नरेंद्र कुमारजी की मातुश्री श्रीमती रूपवती ‘किरण’ देश की प्रख्यात लेखिका रहीं। उनके द्वारा अनेक पौराणिक नाटक, कविताओं की रचनायें हुईं, जिनका प्रकाशन उस समय की सन्मति संदेश जैसी देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में होता रहा। उनको 1976 में उपराष्ट्रपति महामहिम श्री बी.डी.जत्ती के करकमलों द्वारा इंदौर में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। ऐसी विदुषी महिला श्रीमति रूपवती ‘किरण’ जी को प्रारंभ से ही तत्त्वज्ञान की रुचि थी और उन्होंने जबलपुर में पंडित श्री बाबूभाई मेहता फत्तेपुर, पंडित लाल बहादुर शास्त्री, पंडित ज्ञानचंदजी विदिशा, डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल ने आदि के व्याख्यानों का प्रत्यक्ष लाभ लिया और स्वयं भी गहन स्वाध्यायी थीं। मां की स्वाध्याय की लगन देखकर श्री नरेंद्र कुमारजी को भी तत्त्वरुचि लग गई। पारिवारिक प्रतिकूलताओं और विषम परिस्थितियों के बावजूद भी जिनधर्म की लगन में कोई अंतर नहीं आया। नियमित रूप से बीएससी करने के पश्चात प्राइवेट रूप से एमएससी करके आप गणित और भौतिकी विषय के शासकीय लेक्चरर बन गए। कार्य के प्रति निष्ठा ऐसी कि चयन होने पर आपके ग्रुप को जम्मू 1988 और पटना 1990 में दो बार भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया।

सन् 1974 में जबलपुर प्रवास पर आये पंडित श्री उत्तमचंदजी सिवनी एवं श्री पंडित श्री नेमीचंदजी रखियाल के द्वारा छिंदवाड़ा में पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर द्वारा ग्रीष्मकालीन शिविर के आयोजन की जानकारी मिली। मां से जिद करके शिविर में शामिल होने छिंदवाड़ा चले गए और वहाँ से जीवन का नया सोपान प्रारंभ हो गया। छिंदवाड़ा और कोटा में बालबोध और वीतराग विज्ञान पाठमाला का प्रशिक्षण किया। आपने कोटा के शिविर में प्रथम स्थान प्राप्त कर पूज्य गुरुदेवश्री के द्वारा पुरस्कार प्राप्त किया और डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल की प्रेरणा से इन्हीं शिविरों के कुशल अध्यापक बन गए। आपने लगभग 40 वर्षों तक इस शिविर में विद्वान के रूप में अध्यापन कार्य किया।

पूरा जीवन बेदाग रूप से जीने वाले, ईमानदार, कर्तव्य निष्ठ, सत्य से समझौता न करने वाले, स्पष्ट बोलने वाले श्री नरेंद्र कुमारजी ने सन् 1980 में जबलपुर में श्री फूलचंदजी जज के नेतृत्व में मुमुक्षु मंडल की स्थापना में भी अपना सक्रिय योगदान दिया और मंडल की प्रत्येक गतिविधि में अत्यंत सक्रियतापूर्वक कार्य किया। 39 वर्षों की सेवाओं के पश्चात उप-प्राचार्य पद पर शासकीय सेवानिवृत्ति के पश्चात लगातार 20 वर्षों तक दशलक्षण और अष्टान्हिका पर्वों पर देश के विभिन्न स्थानों पर प्रवचनार्थ आमंत्रण पर बाहर जाते रहे तथा समय-समय पर स्थानीय मुमुक्षु मंडल में भी प्रवचन किये। तत्त्व की लगन ऐसी कि अपनी दोनों पुत्रियों अल्का और आरती को भी तत्त्वज्ञान से सिंचित किया और स्वाध्याय रुचिवंत श्री राजीवजी जबलपुर और श्री प्रसंगजी खण्डवा के साथ बेटियों का विवाह कर उनका तात्विक भविष्य सुरक्षित कर दिया। यह परंपरा आगे बढ़ती गई और आपके दो नातियों एवं दो नातिनों ने भी धार्मिक विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती ज्योति जैन भी आपके साथ हमकदम होते हुए जिनशासन का लाभ ले रहीं हैं।

सेवानिवृत्ति के पश्चात आप अपने जीवन का अधिकांश समय स्वाध्याय में व्यतीत कर रहे हैं। साथ ही आपने अपने जीवन में संचित धन का सदुपयोग करते हुए जबलपुर में निर्मित हुए नवीन जिन मंदिर में मानस्तंभ एवं शिखर निर्माणकर्ता के रूप में विपुल राशि प्रदान की है।

जिन देशना परिवार ऐसे जीवट व्यक्तित्व, अगाध रूचिवान और समर्पित व्यक्तित्व श्री नरेन्द्र कुमारजी को नमन करते हुए उनकी दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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29. श्री अमोलकचंदजी

98 वर्ष · इस उम्र में भी इतनी ऊर्जा : कमाल है

जीवन के हर क्षण का सदुपयोग करना कोई सीखे तो श्री अमोलकचंदजी से। जब उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो विश्वास ही नहीं हुआ की 98 वर्ष में भी व्यक्ति इतना तरोताजा और पूर्ण समर्पण के साथ जिनधर्म की आराधना भी कर सकता है। राजस्थान के झालावाड़ जिले के ग्राम पिड़ावा निवासी श्री अमोलकचंदजी का जन्म 1927 में हुआ इन्होंने गुलामी की त्रासदी भी देखी और आजादी के संघर्ष भी और स्वाधीनता दिवस की स्वर्णिम घड़ी के भी साक्षी बने। दसवीं कक्षा तक अध्ययन किया और 18 वर्ष की उम्र में ही शासकीय स्कूल में गणित के शिक्षक बन गए। बुद्धि तो तीव्र थी ही और बूंदी निवासी पंडित श्री गेंदालालजी के द्वारा तत्त्वरुचि भी प्राप्त हुई और उनके ही मार्गदर्शन में जिनागम का अभ्यास करने लगे। समय-समय पर गुरुदेवश्री के प्रवचनों का प्रत्यक्ष लाभ लेने के लिए सोनगढ़ जाते रहे। गुरुदेवश्री का स्नेह इतना कि गुरुदेवश्री से व्यक्तिगत तत्त्वचर्चा करने का कई बार सौभाग्य प्राप्त हुआ। तत्त्वचर्चा के समय आदरणीय विद्वान बाबू जुगल किशोरजी ‘युगल’ कोटा उपस्थित रहते थे।

55 वर्ष की उम्र में शासकीय सेवा से निवृत्ति लेने के पश्चात सोने चांदी का व्यापार प्रारंभ कर दिया। ईमानदारी इतनी कि व्यापारी उस समय भी उनके नाम पर बिना लिखापढ़ी के हजारों रुपए दे दिया करते थे। जब पिड़ावा में स्वाध्याय भवन की आवश्यकता हुई तो अपनी संचित पूंजी का अधिकांश भाग स्वाध्याय भवन के निर्माण में दान दे दिया। स्वयं लगभग 20 वर्षों तक स्वाध्याय भवन में प्रवचन भी किये। देव शास्त्र गुरु के प्रति भक्ति इतनी कि 98 वर्ष की वयोवृद्ध अवस्था में शुद्ध वस्त्र पहनकर प्रतिदिन का प्रक्षाल, पूजन, स्वाध्याय करते हैं और सामायिक भी उनके जीवन की नियमित चर्या है। अभी भी वे नियमित रूप से 5,6 घंटे स्वाध्याय किया करते हैं। स्वयं की अर्जित पूंजी से समय-समय पर धार्मिक कार्यक्रमों में दान भी देते रहते हैं। पूरा परिवार उनके मंगल भावों की अनुमोदना करता है।

जिनदेशना परिवार ऐसे जीवट व्यक्तित्व के धनी और देव शास्त्र गुरु के अनन्य उपासक श्री अमोलकचंदजी के स्वस्थ और मंगलमय जीवन की भावना व्यक्त करता है।

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30. श्री शांतिलालजी चौधरी

89 वर्ष · अपूर्व वात्सल्य और समर्पण के धनी है

विद्वानों को देखकर मेरा हृदय प्रसन्न हो जाता है। यही विद्वान हैं जो जिनशासन की पावन धारा को आगे बढ़ाएंगे, यह विचार हैं भीलवाड़ा निवासी श्री शांतिलालजी चौधरी के।

89 वर्षीय श्री शांतिलालजी चौधरी का जन्म भीलवाड़ा में ही हुआ। आपके पिता श्री अर्जुनलालजी चौधरी पूज्य गुरुदेवश्री के अनन्य भक्तों में से एक थे और तत्त्वज्ञान का लाभ लेने के लिए आपका कई बार सोनगढ जाना होता रहता था। बस पिताश्री की यही विरासत श्री शांतिलालजी को और पूरे परिवार को प्राप्त हो गई। अपनी शिक्षा और व्यापार उदयपुर में करने के पश्चात आप वापस भीलवाड़ा आ गए और लौकिक दायित्वों के साथ जिनधर्म की पताका भी आगे बढ़ाने लगे। तत्त्वज्ञान का लाभ लेने के निमित्त से आप निरंतर पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर के कार्यक्रमों में जाने लगे और सक्रियतापूर्वक सहभागिता करने से टोडरमल स्मारक से आपका विशेष आत्मीय संबंध हो गया। स्वयं भी ग्रन्थों का गहन अभ्यास किया।

उसके बाद श्री शांतिलाल जी चौधरी देश के विभिन्न नगरों में होने वाले शिविर, पंचकल्याणक आदि कार्यक्रमों में भी यथासंभव पहुंचकर लाभ लेते रहे एवं अपना योगदान समर्पित करते रहे। वात्सल्य ऐसा कि कोई भी विद्वान आ जाए उन्हें अपने घर में ठहराते और उसके प्रति अपना स्नेह समर्पित किये बिना नहीं रहते।

भीलवाड़ा में छोटे से स्थान से स्वाध्याय प्रारंभ करते हुए आगे बढ़े और समाज के सहयोग से सबने मिलकर शास्त्री नगर में एक विशाल श्री सीमंधर जिनालय का निर्माण किया और सन् 2012 में भीलवाड़ा में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव में माता, पिता की गरिमामय भूमिका का सफल निर्वहन किया आप वर्तमान में भी नियमित रूप से ऑनलाइन और मंदिर में जाकर स्वाध्याय का लाभ प्राप्त करते रहते हैं। आपका पूरा परिवार भी तत्त्वरुचिवंत है और जिनशासन की सेवा में समर्पित है आपके छोटे भ्राता श्री महावीरकुमारजी भी अपनी आयु के 84 वे वर्ष में आत्मभावना पूर्वक यथा संभव जिनशासन की प्रभावना में अपना योगदान दे रहे हैं।

जिनदेशना परिवार ऐसे समर्पित साधर्मियों के प्रति अपना अहो भाव व्यक्त करते हुए श्री शांतिलालजी चौधरी के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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31. श्रीमती प्रेमबाईजी

89 वर्ष · प्रेम और वात्सल्य की अद्भुत मिसाल हैं

यूं तो हर मां का अपने बच्चों के प्रति अगाध प्रेम होता है परंतु जब यह प्रेम पारिवारिक मर्यादाओं से बढ़कर विस्तृत रूप धारण कर लेता है और समाज के बच्चों पर एक समान रूप से स्नेह दर्शाता है तो यही प्रेम वात्सल्य का रूप धारण कर लेता है। इसी प्रेम और वात्सल्य की धनी हैं मध्य प्रदेश के दमोह जिले के छोटे से गांव खड़ेरी की मूल निवासी श्रीमती प्रेमबाईजी।

अल्पायु में ही पंडित गोविंदरामजी से विवाह के पश्चात खड़ेरी में ही स्थाई निवास हो गया। पंडित गोविंदरामजी जैन दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान थे और पूज्य गुरुदेवश्री के अनन्य भक्तों में से एक। श्री गोविंदरामजी गुरुदेवश्री से मंगलवाणी से तत्त्वज्ञान का लाभ लेने के लिए प्रतिकूलताओं के बाद भी सोनगढ़ जाते रहे और बाद में सोनगढ ही जाकर स्थाई रूप से ही बस गए। पंडित गोविंदरामजी की प्रेरणा व वात्सल्य से अनेक साधर्मी सोनगढ़ गए और उन्हें सत्य तत्त्व का परिचय कराया। गुरुदेवश्री के अनेक प्रवचनों में पंडित गोविंदरामजी का नाम आता है और गुरुदेवश्री स्वयं पंडितजी को प्रवचन सभा में आगे बैठने के लिए कहा करते थे। उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक देश के अनेक नगरों में जाकर स्वाध्याय के द्वारा जिनधर्म की प्रभावना की। उनकी ही प्रेरणा और प्रयास से खड़ेरी ग्राम के लगभग 20 से अधिक बच्चों ने शास्त्री विद्वान बनने का गौरव प्राप्त किया है।

उन्हीं की अर्धांगिनी श्रीमती प्रेमबाईजी जीवन को सार्थक करने का प्रयास कर रही हैं। प्रतिदिन लगभग 4 घंटे व्यक्तिगत स्वाध्याय करने वाली श्रीमती प्रेमबाईजी पिछले 32 वर्षों से सोनगढ़ में ही स्थाई रूप से निवास कर रही हैं। प्रातः 4:00 बजे से उठकर अनेक स्तुतियां, भजन, पूजन आदि मुखाग्र बोलती रहती हैं। अनपढ़ होने के बावजूद भी उन्होंने अनेक कलश, गाथाएं आदि कंठस्थ किए हैं और उसके बाद जिनमंदिर जाकर पूजन, स्वाध्याय करती हैं। बाई के नाम से संबोधित की जाने वाली श्रीमती प्रेमबाई अन्य किसी के हाथ का बना भोजन ग्रहण नहीं करतीं, इस उम्र में भी वे स्वयं अपने हाथ से भोजन बनाती हैं। उन्होंने अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय किया है। आंचल में स्नेह इतना कि घर पर कोई भी आ जाए उसकी आवभगत में कोई कमी नहीं छोड़तीं। हमेशा जिन भक्ति, जिन सूत्रों का स्मरण आपकी वाणी का सौंदर्य है। आपके दो बेटे हैं और आपके परिवार में चार शास्त्री विद्वान भी हैं। इनमें से एक पंडित आतम शास्त्री सोनगढ़ में ही चल रहे कहान शिशु विहार में विद्यालय प्रभारी के रूप में अपनी समर्पित सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। श्रीमती प्रेमबाईजी की अंतरंग भावना है कि जीवन की अंतिम सांस तक पंच परमेष्ठी भगवंतों का स्मरण रहे और आत्म स्वभाव की दृष्टि रहे।

जिन देशना परिवार ऐसे अपार वात्सल्य की धनी श्रीमति प्रेमबाईजी के आनंदमय भक्तिपूर्ण जीवन को नमन करते हुए उनकी दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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32. श्रीमती पुष्पा बहन लाभू भाई महेता

96 वर्ष

जीवन का एक ध्येय, एक लगन और उसी का हर समय प्रयास। मनुष्य जन्म मिलना साधारण बात नहीं है और मनुष्य भव में भी जैन कुल और तत्त्वज्ञान मिलना तो उससे भी महान दुर्लभ इसलिए इस मनुष्य पर्याय का प्रत्येक क्षण सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए। जिनवाणी के इस संदेश को शब्दशः सार्थक करने का प्रयास कर रही है 96 वर्षीय मुंबई निवासी श्रीमती पुष्पा बहन लाभू भाई महेता।

आज मुमुक्षु समाज में पूज्य गुरुदेवश्री के निमित्त से ज्ञान अर्जन करना तो सरल हो गया है, लेकिन अन्य कोई आरंभ-समारंभ के बिना बस एक अपने आत्मकल्याण में ही अपना पुरुषार्थ लगाना विरले वाले व्यक्ति दुर्लभ होते हैं। 96 वर्ष की उम्र में भी दिन के 6-7 घंटे स्वाध्याय करके श्री पुष्पाबहन हमारे लिए आराधना की उत्कृष्टता का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं।

मोरबी, सौराष्ट्र के एक वैष्णव परिवार में जन्मी और स्थानकवासी परिवार में विवाह करके पाकिस्तान के करांची की मूल निवासी रहीं श्रीमति पुष्पा बहन ने अपने जीवन में कई आर्थिक और समाजिक उतार, चढ़ाव देखे लेकिन पूज्य गुरुदेवश्री का तत्त्व प्राप्त होते ही सभी गृहीत मिथ्यात्व का त्याग करके एक मात्र सच्चे देव, शास्त्र, गुरु की शरण प्राप्त आपने सोनगढ़ और देवलाली में रहकर पूज्य गुरुदेवश्री और पूज्य बहिनश्री बेन का भरपूर समागम प्राप्त किया। ज्ञानी धर्मात्माओं से सच्चे तत्त्व का रसपान करके आपने अपना जीवन धर्ममय बना लिया।

वर्तमान में अनेक शारीरिक बीमारियों के बावजूद सुबह पूजन-पाठ और पूज्य गुरुदेवश्री का प्रवचन, दोपहर में शास्त्रों का स्वतंत्र पठन और सायंकाल में प्रतिक्रमण और विविध पाठ करके आप अपने परिणाम निरंतर स्वाध्यायमय रखती हैं। आपकी सरलता और पुरुषार्थ की अविरलधारा सभी आत्मार्थी के लिए अनुकरणीय है।

आपका पूरा परिवार धर्मरूचिवंत है और जिनशासन प्रभावना में समर्पित है। आपके पौत्र श्री भव्य भाई मेहता तत्त्वप्रभावना में बड़ा योगदान दे रहे हैं। दूसरे पौत्र सोमिल महेता योग्य विद्वान हैं और अनुकूलता होने पर समय-समय पर जिनधर्म प्रभावना के लिये बाहर जाते रहते हैं। भव्य भाई महेता की धर्मपत्नी श्रीमति जयति बहन अत्यंत वात्सल्य हृदयी और विदुषी व्यक्तित्व हैं। वे भी समाज के आमंत्रण पर यथासंभव पधारती हैं और तत्त्वज्ञान की गहरी चर्चा के माध्यम से समाज को अध्यात्म रहस्यों से परिचित कराती हैं।

जिनदेशना परिवार श्रीमती पुष्पाबहन महेता के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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33. श्री प्रेमचंदजी

90 वर्ष · घोर विरोध से सत्य मार्ग की यात्रा से निहाल हुये

जिसकी होनहार पक जाती है उसे सत्य मार्ग अवश्य मिल जाता है। 90 वर्ष की वयोवृद्धावस्था में भी जीवंतता के साथ आत्म आराधना में संलग्न हैं मध्यप्रदेश के शिवपुरी के निवासी श्री प्रेमचंदजी जैन।

13 मई 1935 को जन्मे श्री प्रेमचंद जी बचपन से ही पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के घोर विरोधी थे। उन्हें लगता था कि कानजी स्वामी श्वेतांबर हैं और दिगंबर धर्म को अपनाने का ढोंग कर रहे हैं, दिगंबरों को भड़का रहे हैं। पेट्रोल से मोटर नहीं चलती, आग से पानी गर्म नहीं होता, ऐसी उल्टी बातें समझ में नहीं आ रही थीं। इस तरह की कई भ्रम मन में दीवार बनकर खड़े हुये थे। समय ने पलटा खाया और एक दिन जिनमंदिर में स्वाध्याय करते-करते गुरुदेवश्री के प्रवचन की पुस्तक वस्तु विज्ञान सार हाथ में आ गई। इसके पहले भी यह पुस्तक कई बार हाथ में आई परंतु गुरुदेवश्री का फोटो देखकर उसे पढ़ने का मन ही नहीं होता था लेकिन उस दिन न जाने क्यों वस्तु विज्ञान सार को पढ़ने का मन हो गया और जब उनके प्रवचन पढ़े तो लगा कि इसका तो एक-एक शब्द आगम से मेल खाता है, प्रत्येक शब्द युक्ति, न्याय और आगम सम्मत है तो मन ने भी सच स्वीकार कर लिया। सौभाग्य से इनके एक स्वाध्याय प्रेमी मित्र श्री चंद्रकुमारजी उन्हें जयपुर के पंडित टोडरमल स्मारक भवन ले गए, वहाँ पर शिविर का आयोजन हो रहा था। वहाँ पहली बार पूज्य गुरुदेवश्री के दर्शन किए तो उनको देखकर रोम-रोम नाच उठा। अपूर्व तेज से परिपूर्ण उनका व्यक्तित्व ही प्रभाव उत्पन्न कर रहा था बस तभी निर्णय हो गया कि सत्य मार्ग यही है। फिर वहाँ से कुछ साहित्य लेकर आए और उनका अध्ययन करने सारी भ्रांतियां दूर हो गई, उसके पश्चात लगातार पूज्य गुरुदेवश्री, बहनश्री, निहाल भाई आदि के प्रवचन आदि का स्वाध्याय कर रहे हैं।पिछले 50 वर्षों से स्वाध्याय में संलग्न श्री प्रेमचंद की अनेक बार सोनगढ़ गए और पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचनों का प्रत्यक्ष लाभ लिया। श्री प्रेमचंदजी की प्रेरणा से अनेक साधर्मी अध्यात्म धारा से जुड़ते चले गए। प्रेमचंदजी की रुचि इतनी प्रबल हुई कि स्वयं ही अनेकों अध्यात्म गर्भित भजन, स्तुतियाँ, छंद, पूजायें, बारह भावना आदि की रचनायें कीं साथ ही आत्मा की 47 शक्तियों पर अनेक पद्य लिखने के साथ-साथ 720 तीर्थंकर एवं तीस चौबीसी विधान की रचना की है। इन्हें अध्यात्म प्रेमियों द्वारा बहुत सराहा गया। आप वर्तमान में भी नियमित रूप से स्वाध्याय कर रहे हैं। आपकी प्रेरणा से पूरा परिवार तत्त्व रुचिवंत है और जिनशासन की सेवा में यथा योग्य अपना योगदान दे रहे है।

जिनदेशना परिवार ऐसे दृढ़ श्रद्धानी पण्डित श्री प्रेमचंदजी के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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34. श्रीमती सविता बेन शाह

92 वर्ष · जिनशासन को पाकर अपने को धन्य मानती हैं

पुण्य के उदय से जैन शासन कई जीवों को मिल जाता है परंतु धन्य वे हैं जो जैन शासन को पाकर अपने जीवन को धन्य समझते हैं। ऐसी ही जिनधर्म की दृढ़ श्रद्धानी हैं सोनगढ़ निवासी 92 वर्षीया श्रीमती सविता बेन मनुभाई शाह।

सन् 1932 में गुजरात के राणपुर नगर में जन्मी सविताबेन प्रतिदिन प्रात 5:00 बजे उठकर जिनवाणी भक्ति, जिन स्तवन आदि पाठों के द्वारा पंच परमेष्ठी की भक्ति करने के बाद जिनमंदिर पहुँच जाती हैं और सभी जिनालयों के दर्शन करती हैं। वहां पर पूजन करने के बाद नीचे बैठकर ही पूज्य गुरुदेवश्री के सीडी प्रवचन का लाभ लेती हैं। 92 वर्ष की उम्र में भी पूजन, स्वाध्याय के पहले पानी भी नहीं पीतीं। दोपहर और शाम को नियमित रूप से स्वाध्याय करना उनके दैनिक जीवन का सौंदर्य है। रात को 9:00 बजे विश्राम करने वाली सविता बहन पिछले 40 वर्षों से सोनगढ़ में ही निवास कर रही हैं। उन्होंने घर पर ही जिनवाणी का अत्यंत सुंदर मंदिर बना रखा है और शास्त्रों का अभ्यास करती हैं।

जब उनसे पूछा गया कि आप स्त्री है कि तुरंत उत्साह से बोलीं, स्त्री पर्याय मेरी पर्याय है ही नहीं, मैं तो ज्ञायक मात्र हूँ। जब भी गुरुदेवश्री को याद करती हैं तो भाव विभोर हो जाती हैं और कहती हैं कि पूज्य गुरुदेव ने मुक्ति का मार्ग बताया है। जब उनसे तत्त्वज्ञान की चर्चा करते हैं तो उनका उत्साह देखने योग्य होता है।

उनके पुत्र बिमल भाई उनकी श्रवण कुमार की भांति सेवा कर रहे हैं। उनका हर समय ध्यान रखते हैं। जब सविता बेन से पूछा गया कि आपका बेटा आपकी सेवा करता है या नहीं ? तो तुरंत बोली कौन किसकी सेवा करे? पुण्य सेवा करता है, यह नहीं। पुण्य है तो बेटा अनुकूल है। 92 वर्ष की वयोवृद्धावस्था में भी उन्होंने अक्टूबर माह (2024) में इंदौर के आसपास लगभग 16 दिगम्बर तीर्थों की उत्साह से यात्रा की।

जब सविता बेन से पूछा कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है तो आंख बंद करके बोलीं, मुझे तो जल्दी से जल्दी संसार से छूटना है, बस यही जीवन का उद्देश्य है।

जिनदेशना परिवार जिनशासन की भक्ति से परिपूर्ण और भव भीरु मातुश्री सविता बेन के दीर्घायु, धर्ममय और स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करता है।

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35. श्री वीरसेन सर्राफ

100 वर्ष · 100 वर्ष की उम्र में भी उदार भाव से समर्पित हैं

दिन-रात मेरे स्वामी मैं भावना यह भाऊँ, देहांत के समय में तुमको ना भूल जाऊँ, इन पंक्तियों को जीवन में सार्थक करने का प्रयास कर रहे हैं भिंड निवासी श्री श्री वीरसेनजी सर्राफ। इस काल में स्वस्थ शरीर और लंबी आयु वाले विरले ही मिलते हैं। किन्हीं की आयु लंबी होती है तो भी अस्वस्थ रहते हैं और अरे घटनाओं में स्वस्थ रहने युवा भी दीर्घ जीवन नहीं जी पाते परंतु इस मामले में आदर्श के रूप में उपस्थित हैं श्री वीरसेन सर्राफ।

भिण्ड के श्री महावीर परमागम दिगम्बर जैन मंदिर व मुमुक्षु मण्डल के वरिष्ठतम सदस्य श्री वीरसेनजी सर्राफ इस वर्ष अपनी आयु के 100 वर्ष पूर्ण करने जा रहे हैं। वे इस शतायु वर्ष में भी पूरी तरह स्वस्थ व प्रसन्न रहते हैं। इस वयोवृद्ध अवस्था में भी प्रतिदिन मन्दिर जाकर शुद्ध वस्त्र पहनकर प्रक्षाल व पूजन करते हैं, इसके साथ साथ प्रतिदिन मूल ग्रन्थों के साथ-साथ गुरुदेवश्री के प्रवचन व बहनश्री के वचनामृत का यथा योग्य स्वाध्याय करते हैं। संपूर्ण विश्व को अध्यात्म की धारा से आप्लावित करने वाले पूज्य गुरुदेवश्री का समागम आपको एक बार श्री सम्मेदशिखरजी की यात्रा करते हुए प्राप्त हुआ। आप सोनगढ़ भी गए और प्रत्यक्ष रूप से पूज्य गुरुदेवश्री के समागम का लाभ प्राप्त किया एवं आप गुरुदेवश्री व उनसे प्राप्त तत्त्वज्ञान के प्रति सदैव कृतज्ञ रहते हैं।

समर्पण इतना कि लगभग 32 वर्ष पूर्व जब भिण्ड नगर में जहाँ पर स्वाध्याय चला करता था और वहाँ स्वाध्याय में प्रतिकूल परिस्थिति बनी तो आपने 2500 वर्गफुट का प्लॉट देकर जिनमन्दिर निर्माण हेतु मुमुक्षु समाज को संबल प्रदान किया, साथ ही जिनमन्दिर बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया व मूलनायक भगवानश्री महावीर स्वामी को विराजमान करने का लाभ प्राप्त किया। बाद में आपने मन्दिर से लगी हुई और जगह प्रदान की और वहाँ पर बाहुबली भगवान लगभग 8 फुट खड्गासन की प्रतिमा स्वयं अपनी ओर से विराजमान की। इसके बाद स्वयं प्रेरित होकर आपने मन्दिर से लगी हुई एक और जगह पुनः भेंट की। श्री वीरसेनजी के उदार सहयोग के फलस्वरूप स्वाध्याय भवन और जिनमंदिर की कुल भूमि लगभग 7000 वर्गफुट हो गई है।

आप भिण्ड मुमुक्षु मण्डल के अभी भी अध्यक्ष हैं। आपकी प्रबल भावना रहती है कि समाज में तत्त्वप्रभावना का कार्य होता रहे एवं सामाजिक रूप से उत्तम कार्य संपन्न होते रहें। आपने देश में होने वाले अनेक कार्यक्रमों में सहभागिता की एवं उदार हृदय से सहयोग भी प्रदान किया। आपने तीर्थधाम चिदायतन, हस्तिनापुर एवं संस्कारतीर्थ शाश्वतधाम, उदयपुर के लिए अपना उदार सहयोग प्रदान किया।

जिनदेशना परिवार श्री वीरसेनजी के आत्मोन्मुखी पुरुषार्थ हेतु हार्दिक शुभकामनाएं प्रदान करते हुये स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की मंगल कामना करता है।

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36. श्री अमृतभाई चुन्नीलाल मेहता

92 वर्ष · जिनधर्म की सेवा में पूरा जीवन समर्पित करने वाले 92 वर्षीय

कुछ लोगों का जन्म दूसरों के लिए होता है और कुछ लोगों का स्वयं के लिए, परंतु गुजरात प्रांत के फतेपुर निवासी श्री अमृतभाई चुन्नीलाल मेहता ने अपने जीवन में आत्म कल्याण की भावना के साथ-साथ समाज को पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

गुजरात के प्रसिद्ध विद्वान पंडित श्री बाबूभाई चुन्नीलाल मेहता के छोटे भाई श्री अमृतभाई को बाबू भाई की प्रेरणा से पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का समागम प्राप्त हुआ, उनसे वे इतने प्रभावित हुये कि तब जिन धर्म की लगन लग गई। गुजरात के गौरव पंडित श्री बाबूभाई और अमृतभाई के नेतृत्व में भगवान महावीर स्वामी के 2500 वें निर्वाण महोत्सव के अवसर पर 750 यात्रियों का तीर्थ यात्रा संघ ने सम्मेद शिखर और गोमटेश्वर बाहुबली की यात्रा की। फतेपुर में हाई स्कूल खुलवाया और 43 वर्षों तक उसके अध्यक्ष रहे। मुमुक्षु समाज की मुख्य संस्था श्री कुन्दकुन्द कहान तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट, मुंबई के आप 37 वर्ष तक ट्रस्टी रहे, साथ ही श्री कुन्दकुन्द कहान सर्वोदय ट्रस्ट, दिल्ली के अध्यक्ष रहे।

आपकी ही अध्यक्षता में गुजरात में गौरव प्रदान करने वाले सुंदर संकुल चैतन्य धाम का भव्य निर्माण हुआ। आपके ही धार्मिक संस्कारों के प्रभाव से आपके अनुज श्री जयंति भाई और उनकी धर्मपत्नी को चैतन्यधाम के पंचकल्याणक में माता-पिता बनने का और आपके सुपुत्र श्री सतीश भाई को सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप धर्मरत्न पंडित श्री बाबूभाई चुन्नीलाल मेहता प्रचार प्रसार ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे, फतेपुर मंडल के 50 वर्षों तक अध्यक्ष रहे। आपके नेतृत्व में जिनधर्म प्रभावना हेतु अनेक शिविरों, विधानों का आयोजन हुआ। आपको 42 दशाहुमड़ दिगंबर जैन समाज द्वारा समाज रत्न एवं पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर द्वारा सम्मानित किया गया।

आत्म कल्याण की लगन ऐसी कि 92 वर्ष की उम्र तक आप स्वस्थ रहकर नित्य जिनेंद्र पूजा-स्तुति, स्वाध्याय में समय व्यतीत करते रहे। पूज्य गुरुदेवश्री के एवं अन्य विद्वानों के प्रवचन सुनना आपकी दिनचर्या थी। हर पल शुद्धात्मा का चिंतन और भव के अभाव की भावना ही आपके जीवन की उत्कृष्ट भावना का परिचायक रहा।

विगत 27 फ़रवरी 2024 को आदरणीय अमृतलाल मेहता का देह विलय हो गया।

जिनदेशना परिवार आदरणीय अमृत भाई के भव विराम की मंगल कामना करता है।

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37. पंडित श्री बाबू भाई मेहता

89 वर्ष · बाल शिविर की संजीवनी

तत्त्वज्ञान का अमृत पीने वालों को मानों शरीर की सुध ही नहीं होती उन्हें तो बस आत्मा की ही धुन सवार हो जाती है, इन पंक्तियों को चरितार्थ किया पंडित श्री बाबूभाई मेहता ने।

छोटे बाबू भाई के नाम से विख्यात गुजरात के फतेपुर निवासी पण्डित बाबूभाई मेहता को धार्मिक संस्कार अपने परिवेश से ही मिल गए और पूज्य गुरुदेवश्री के समागम में आने के पश्चात मानो उनकी दृष्टि ही बदल गई। उसके बाद लगातार जिनशासन के प्रचार, प्रसार में संलग्न रहे। विशेष तौर पर उन्हें बच्चों की कक्षा लेने में विशेष आनंद आता था। बालवर्ग को उनकी ही शैली में पढ़ाने की अदभुत कला के धनी बाबूभाई मेहता हमेशा अपनी कक्षाओं में मूल तत्त्वज्ञान की शिक्षा देने का प्रयास करते रहे। बोलो तुम कौन हो, जीव, जीव, जीव। तुम्हारे में क्या है ? ज्ञान ज्ञान ज्ञान। हमें सम्यक् दर्शन पाना है। सम्यक् दर्शन प्राप्त करेंगे, जैसे अनेक मंत्र बच्चों के हृदय में प्रवेश कराते रहे। देवलाली में लगभग 18 वर्षों तक लगातार बाल शिविर में अध्यापन के साथ, साथ देश के अनेक नगरों में बाल कक्षाओं के लिए जाते रहे। वे अपने प्रवचनों में भी सात तत्त्व की मूल चर्चा करते थे। स्वाध्याय के लिए आपका तीन बार नैरोबी जाना हुआ।

शरीर की अत्यंत क्षीण अवस्था होने के बावजूद भी वे नियमित रूप से जिनेंद्र अभिषेक, पूजन, प्रवचन आदि नहीं भूले। इस उम्र में भी वे फतेपुर में प्रतिदिन शुद्ध वस्त्र पहनकर जिनेन्द्र प्रक्षाल, पूजन करते हैं। प्रतिदिन 4 बजे उठकर मूल शास्त्र के स्वाध्याय के साथ, साथ गुरुदेवश्री के प्रवचनों का लाभ लेते हैं, साथ ही कोरोना काल में ऑनलाइन होने वाले देश के कार्यक्रमों का लाभ लेते रहे। जब कभी भक्ति का वातावरण निर्मित होता है तो उनका उत्साह और नृत्य देखने लायक होता था।

वे कहते थे, रोग तो शरीर का परिणमन है इसे कोई नहीं रोक सकता। जिस आत्मा में रोग का प्रवेश ही नहीं, वह मैं हूँ। दो पुत्रों के पिता पंडित श्री बाबूभाई मेहता जीवन के अंतिम क्षण तक अत्यंत ऊर्जा से भरपूर रहे और जीवन के प्रत्येक क्षण का भरपूर सदुपयोग किया।

20 फरवरी 2024 को स्वास्थ्य की प्रतिकूलता के बावजूद वे जिनमंदिर दर्शन के लिए गए और वहां से लौटकर बैठे, बैठे उन्होंने हाथ जोड़े और उनका स्वर्गवास हो गया जिनदेशना परिवार ऐसे पवित्र परिणाम के धनी पंडित श्री बाबूभाई मेहता के अल्प काल मे अभ्युदय की कामना करता है।

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38. श्री शांतिसागरजी जैन

100 वर्ष · आत्म आराधना के लिए 100 वर्ष की आयु तक समर्पित रहे

जगत में अधिकांश जीवों का जीवन परिवार और समाज सेवा अथवा लौकिक यश प्रतिष्ठा में ही व्यतीत हो जाता है परंतु विरले ही हैं जो अपने लौकिक दायित्वों के साथ आत्म आराधना को पहला कर्तव्य समझते हैं। ऐसे ही महामना शख्स थे श्री शांतिसागरजी जैन।

उत्तर प्रदेश के मेरठ में 1925 को जन्मे श्री शांतिसागरजी ने लौकिक शिक्षा में साइकोलॉजी से एम.ए. करने के पश्चात व्यावसायिक प्रतिष्ठान में उच्च पद पर कार्य किया। विवाह भी हुआ और आपके परिवार में एक पुत्र अनिल जैन एवं दो पौत्र अक्षय एवं अभय जैन हैं।

आपको अपनी माताजी से धर्म रूचि विरासत में प्राप्त हुई और इस धर्म रूचि को सम्यक् दिशा मिली पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के समागम से और आपने मात्र 35 वर्ष की अल्प आयु में ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। सन 1962 से आप दिल्ली के अन्य मुमुक्षु भाई श्री पृथ्वीचंदजी, श्री श्रीरामजी जैसे आध्यात्मिक रुचि संपन्न साधर्मियों के साथ सोनगढ़ के शिक्षण, प्रशिक्षण शिविर में नियमित रूप से जाते रहे।

आप दिल्ली मुमुक्षु मंडल के वयोवृद्ध विद्वान थे। आपने दिल्ली के मॉडल बस्ती स्थित दिगंबर जैन मंदिर में अनेक वर्षों तक प्रवचन किये। जीवन के अंतिम चरण में आप दिल्ली के ही उपनगर राजेंद्र नगर में निवास करते थे। आपने गुरुदेवश्री के दिल्ली पदार्पण के दौरान अत्यंत सक्रियता से कार्यक्रम को सफलता के सोपान तक पहुंचाया। आपने आदरणीय लालचंद भाई राजकोट जैसे सुधी विद्वानों का भी बहुत लाभ प्राप्त किया। वर्तमान में लगभग 100 वर्ष की आयु में भी शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद आप प्रतिदिन देवदर्शन एवं नित्य नियम कार्य संपन्न करते रहे। टीवी पर आने वाले पूज्य गुरुदेवश्री एवं बहनश्री के प्रवचन नियमित रूप से सुने। संपूर्ण दिल्ली के साधर्मी समाज को ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व के धनी श्री शांति सागरजी के व्यक्तित्व पर गर्व है। गत जुलाई 2024 को उनका शांत परिणामों से देह विलय हो गया।

जिन देशना परिवार ऐसे समाज गौरव, आत्म कल्याण के सजग प्रहरी, वयोवृद्ध व्यक्तित्व श्री शांति सागरजी को नमन करते हुए उनके भवांत की मंगल कामना करता है।

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39. श्री लोकनाथजी पांडे

सुना तो विश्वास ही नहीं हुआ, नेपाली परिवार : एक अदभुत कहानी

कहते हैं होनहार बलवान हो तो मार्ग मिल ही जाता है, ऐसी ही कहानी है काठमांडू (नेपाल) के निवासी श्री लोकनाथजी पांडे की।

जन्मे वह नेपाल में और आजीविका का विकल्प उन्हें लेकर चला गया दिल्ली। दिल्ली में एक साधर्मी की प्रेरणा से उन्हें स्वाध्याय का रंग लग गया और निरंतर स्वाध्याय करने लगे। रुचि को बल मिला 2018 में डॉ. संजीवजी गोधा के व्याख्यान से, जिसमें उन्होंने सिद्ध भगवान की स्तुति का सुंदर अर्थ किया था। जैसे ही सिद्धों का गुणगान सुना तो अंदर की रुचि ने यह निर्णय कर लिया कि बस महान जिनधर्म ही सच्चा है। चाहे दुनिया पलट जाए लेकिन जिनधर्म का श्रद्धान नहीं छोड़ना और जैनाचार का पालन करने लगे। उनका साथ दिया दिल्ली निवासी श्री राजेश जैन (पुष्पांजलि एनक्लेव) की धर्मपत्नी श्रीमती पारुल जैन ने और पारुलजी ने उन्हें धर्मभाई मानकर जिनधर्म के प्रति रुचि बनाए रखने के लिए संबल प्रदान किया। धन्य हैं श्री शोभितजी दिल्ली जिनके यहाँ कार्य करते हैं तो वे भी रात्रि भोजन न करना पड़े इसलिए शाम को स्वयं ही भोजन के लिए उन्हें अवकाश दे देते हैं। सुखद संयोग मिलते गए और रुचि को पंख मिल गए। आश्चर्य की बात यह है कि श्री लोकनाथजी पांडे ने अपना नाम बदलकर आर्जव जैन कर लिया और अपने परिवार को भी जिनधर्म की महिमा से ओतप्रोत कर दिया। रुचि ऐसी कि घर में ही सुंदर स्वाध्याय भवन बना दिया और उनका परिवार नियमित रूप से यहाँ पर स्वाध्याय करता है। भोजन भी मर्यादित नेपाल में रहकर भी घर के मसाले, गेहूं धोकर घर पर ही पीसना, आदि मर्यादित भोजन का संकल्प।

श्री लोकनाथ जी पांडे समयसारजी, नियमसारजी और छहढाला का आद्योपांत स्वाध्याय कर चुके हैं, साथ ही अभी प्रवचनसार का स्वाध्याय कर रहे हैं। अभी नियमित रूप से स्वाध्याय का ऑनलाइन लाभ लेते हैं।

अप्रैल 2024 में काठमांडू में आयोजित शिविर के निमित्त से नेपाल जाना हुआ तब उनसे हमारी मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, आपको हमारे घर आना ही पड़ेगा। हम परिवार सहित काठमांडू के नजदीक एक गांव में उनके घर पहुंचे। घर के बाहर लिखा था जैन निवास, शुद्ध शाकाहारी घर। उनके परिवार के साथ कुछ क्षण बिता कर जिन धर्म की महिमा तो आई ही साथ ही उनके दृढ़ संकल्प का भी बहुत बहुमान आया। जिनधर्म के संस्कार परिवार में आगे बढ़ते रहें, इस भावना से इस वर्ष उन्होंने अपनी पुत्री लक्षिता का प्रवेश दिल्ली के ब्राह्मी सुन्दरी कन्या विद्या निकेतन में करा दिया और 11 वर्षीय पुत्र सौभाग्य की भावना है शास्त्री करने के लिए वह जयपुर जाए। दोनों बेटे, बेटियों को 47 शक्तियां, छ सामान्य गुण आदि अनेक चीजें कंठस्थ हैं।

लोकनाथ जी कहते हैं कि पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी मतलब दुनिया का अदभुत व्यक्ति जिन्होंने अध्यात्म का जोरदार शंखनाद किया। उनके घर में समयसार सिद्धि के 11 भाग, धवलाजी के छह भाग, पंच परमागम आदि उपलब्ध हैं। काठमांडू में आयोजित जिनदेशना आध्यात्मिक शिविर के अवसर पर पूरे परिवार का सम्मान किया गया। जिनदेशना परिवार ऐसे क्रांतिकारी परिवार के प्रति शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए उनकी मंगल भावना की अनुमोदना करता है।

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