गुरु वन्दनाष्टक | guru vandanashtaka

पूर्ण तत्त्व ही ध्याते गुरुवर, पूर्ण तत्त्व दर्शाते हैं।
पूर्णानंदमय ज्ञानानंदमय, शुद्ध तत्त्व दर्शाते हैं ॥ टेक ॥
जिसको जाने पहिचाने बिन, जीव महा दुःख पाता है।
इच्छाओं की पूर्ति न होती, तृष्णा व्यर्थ बढ़ाता है ॥
महानंदमय वह शुद्धातम, गुरुवर सहज दिखाते हैं ॥ 1 ॥

मंगलमय हो लोकोत्तम हो, अशरण जग में शरण वही।
दुख सागर से सहज उबारो, साँचे तारण-तरण वही ॥
दिव्य-देशना द्वारा मुनिवर, मुक्तिमार्ग दर्शाते हैं ॥ 2 ॥

ज्ञान-ध्यानमय पावन मुद्रा, अपने पास बुलाती है।
विषय-कषाय क्लेशमय लगते, सहज वृत्ति हट जाती है ॥
सिद्ध समान परम प्रभुतामय, निज स्वरूप दर्शाते हैं ॥ ३ ॥

अब तो विरह सहा नहीं जाता, क्षण-क्षण याद सु आती है।
अहो ! अहो ! निर्ग्रन्थ दशा को, परिणति अति अकुलाती है ॥
निद्रा में भी वे योगीश्वर, स्वप्न माँहि आ जाते हैं ॥ 4 ॥

सम्यग्ज्ञान दूज का चन्दा, केवलज्ञान पूर्णिमा है।
प्रगट होय परिणति में तब ही, सच्ची गुरु पूर्णिमा है ॥
चरणों में नत भव्यों को भी, आप समान बनाते हो ॥ 5 ॥

साक्षात् दर्शन दे गुरुवर ! अब तो मुझे निहाल करो।
वरद हस्त मस्तक पर वर्ते, जीवन सहज खुशाल करो ॥
अप्रमत्त शासन द्वारा, निर्दोष मार्ग दर्शाते हैं ॥ 6 ॥

जिनशासन की परम्परा, निर्दोष मुनीश्वर बनी रहे।
आराधन में अरु प्रभावना में, ही परिणति सनी रहे ॥
भय प्रलोभनों के प्रसंग में, गुरुवर सहज बचाते हैं ॥ 7 ॥

पूर्ण दशा ही परम साध्य है, पूर्ण तत्त्व ही ध्येय है।
इसकी प्राप्ति में बाधक, जो गुरुवर सब ही हेय हैं ॥
भाव नमन हो द्रव्य नमन हो, पल-पल आप जगाते हैं ॥ 8 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९८ से १९९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’