दुविधा कब जेहे या मन की, कब निजि नाथ निरंजन सुमिरो | Duvidh Kab Jehe Ya Man Ki Kab Niji Nath Niramjan Sumiro

दुविधा कब जेहे या मन की, कब निजि नाथ निरंजन सुमिरो।

तज सेवा जन जन की।।1।।

कब रूचि सो पीवो दृग चातक, बूंद अखय पद धन की।
कब शुभ ध्यान धरों समता गहि, करु न ममता तन की।।2।।

कब घट अन्तर रहे निरन्तर, दृढ़ता सुगुरु वचन की।
कब सुख लहो भेद परमारथ, मिटे धारना धन की।।3।।

कब घर छाड़ि होऊ एकाकी, लिए लाल सा वन की।
ऐसी दशा होय कब मेरी, हो वलि वलि वा छिनकी।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’