दुरगति गमन निवारिये, घर आव सयाने नाह हो
दुरगति गमन निवारिये, घर आव सयाने नाह हो
पर घर फिरत बहुत दिन बीते, सहित विविध दुखदाह हो॥१॥
निकसि निगोद पहुँचवो शिवपुर, बीच बसैं क्या लाह हो॥२॥
‘द्यानत’ रतनत्रय मारग चल, जिहिं मग चलत हैं साह हो॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ९८
खोज: Durgati Gaman Nivariye, Ghar Av Sayane Nah Ho
अर्थ
हे आत्मन् ! भव-भ्रमण के कारण जो तुम्हारी दुर्गति हो रही है उसका निवारण करो, उसे दूर करो और हे सयाने, अपने घर में, जिसके तुम स्वामी हो उसमें तुम वापस आ जाओ।
भव-भव में, अन्य-अन्य घर में, पर्यायों में भ्रमण करते हुए तुम्हें बहुत काल/ समय बीत गया; जहाँ तुम बहुत प्रकार के दुःखों के ताप के साथ रहे हो। निगोद से निकलकर मोक्ष को जावो। उन दोनों के बीच में इस संसार में बसेरा करने से तुम्हें क्या लाभ होगा?
द्यानतराय कहते हैं कि हे आत्मन् ! रत्नत्रय के सुपथ पर चल। जिस मार्ग पर साधु-सज्जन चलते हैं।
शब्दार्थ: नाह = नाथ, स्वामी, मालिक; लाह = लाभ; साह = साधु, सज्जन।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 245।
मूल पृष्ठ (छवि):
प्रूफरीडिंग बाकी है