दूजा नहीं शुद्धात्म प्रभु सम
दूजा नहीं शुद्धात्म प्रभु सम । दूजा नहीं चैतन्य प्रभु सम ।।टेक।।
अरहंत सिद्ध तो कार्य प्रभु हैं, चैतन्य प्रभु कारण परमातम ।
अरहंत सिद्ध तो राग रहित हुए, सदा अराग स्वभावी आतम ।।1।।
अरहंत सिद्ध तो मुक्त हुए हैं, सहज मुक्त शाश्वत शुद्धातम ।
अरहंत सिद्ध तो पूज्य हुए हैं, सदा सहज ही पूज्य शुद्धातम ।।2।।
अरहंत सिद्ध जो व्यक्त परिणति, नित्य व्यक्त अव्याप्त है आतम ।
सहज चतुष्टयवन्त सुशोभित, नित्य निरंज सहज ही शुद्धातम ।।3।।
अरहंत सिद्ध परम उपकारी, दर्शावें मंगलमय आतम ।
शुद्धातम के आश्रय से ही, होते अरहंत सिद्ध परमातम ।।4।।
‘आत्मन्’ निज महिमा पहिचानो, सहज रूप जग में सर्वोत्तम ।
हो प्रमुदित निज आतम ध्याओ, स्वयं कहाओगे परमातम ।।5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८२