द्रव्य प्राणों का, होवे वियोग जहाँ।
पर ‘मरा मैं तो’ ऐसी न अनुभूति हो ।। टेक ।।
परिणति हो जुड़ी, ज्ञानमय भाव में।
मात्र आनन्द की, ही तो प्रसूति हो ।। 1 ।।
हो उपाधि नहीं, आधि-व्याधि नहीं।
राग-द्वेषमयी भी, न भव-भूति हो।। 2 ।।
होवे परमात्मा, आत्मा यह स्वयं ।
मात्र शेष जहाँ, पर वो शिवभूति हो ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’