दिवस आज का मंगलकारी, धर्म ध्वजा फहराएँ।
धन्य दिवस है, धन्य-घड़ी है, धर्म ध्वजा फहराएँ ॥ टेक ॥
सच्चे देव-शास्त्र-गुरुवर की, सच्ची श्रद्धा लाएँ।
तत्त्व प्रयोजनभूत पिछानें, भेद-विज्ञान जगाएँ ॥ 1 ॥
शुद्धातम का अनुभव करके, सम्यग्दर्शन पाएँ।
भायें नित वैराग्य भावना, निज पुरुषार्थ बढ़ाएँ ॥ 2 ॥
नहीं विसंगति कर्मोदय की, देख कभी घबराएँ।
पुण्योदय के भोगों को भी, नहीं स्वप्न में चाहें ॥ 3 ॥
लौकिक जीवों की बातों में, कभी नहीं हम आएँ।
उपगूहन स्थितिकरण कर, नित वात्सल्य बढ़ाएँ ॥ 4 ॥
कर प्रभावना आत्मधर्म की, मन में भी हर्षाएँ।
तन-धन-वचन समर्पित करके, जीवन सफल बनाएँ ॥5॥
जयवंतो नित धर्म अहिंसा, शिव पथ चढ़ते जाएँ।
निजानंद निज में ही पावें, प्रभु को शीश नवाएँ ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३१४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’