दीठा भागनतैं जिनपाला, मोहनाशनेवाला | Ditha Bhaganatain Jinapala Mohanashanevala

दीठा भागनतैं जिनपाला, मोहनाशनेवाला

दीठा भागनतैं जिनपाला, मोहनाशनेवाला ।।टेक।।

सुभग निशंक रागविन यातैं, बसन न आयुधवाला ।।१।।

जास ज्ञानमें युगपत भासत, सकल पदारथमाला ।।२।।

निजमें लीन हीन इच्छा पर, हितमितवचन रसाला ।।३।।

लखि जाकी छवि आतमनिधि निज, पावत होत निहाला ।।४।।

‘दौल’ जासगुन चिंतत रत है, निकट विकट भवनाला ।।५।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २३

अर्थ

अहो ! आज मुझे बडे भाग्य से मोह को नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र भगवान के दर्शन हुए हैं। ये जिनेन्द्र भगवान सुन्दर हैं, निःशंक हैं और वीतरागी हैं, अतः इनके पास न वस्त्र हैं, न अस्त्र हैं और न स्त्री। इनके ज्ञान में सम्पूर्ण पदार्थ युगपत प्रतिभासित होते हैं। ये स्वयं मे लीन हैं और सर्व इच्छा से रहित है, फिर भी इनका हित-मित-प्रिय उपदेश होता है। भव्यजीव इनकी छवि को देखकर अपने आत्मवैभव को प्राप्त कर लेते हैं और पाकर निहाल हो जाते हैं। कविवर दौलतराम कहते हैं कि इनके गुणों के चिन्तन मे लीन होकर संसाररूपी भयकर नाले को सहज ही पार किया जा सकता है। विशेष-इस पद मे जिनेन्द्र भगवान के लिए ‘जिनपाला’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है ‘जिन के पालक’। सो यहाँ ‘जिन’ का अभिप्राय ‘एकदेशजिन’ समझना चाहिए, ‘सकलजिन’ नहीं। शास्त्रों में सासादन गुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय तक के जीवो को ‘एकदेशजिन’ कहा गया है। यथा-“सासादनादिक्षीणकषायान्ता एकदेशजिना उच्यन्ते।” (-प्रवचनसार, तात्पर्यवृत्ति, 201)

स्रोत: दौलत विलास, पद 42।

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