दीनपनो तज प्रभु भजो, पाओ सुख अपार | dinapano taja prabhu bhajo pao sukha apara

तर्ज : ते गुरु मेरे …

दीनपनो तज प्रभु भजो, पाओ सुख अपार ।

धन्य-धन्य पायो अहो, समयसार अविकार ।। टेक ।।

देखो अन्तर्दृष्टि से, शाश्वत मंगलरूप।
स्वाभाविक प्रभुतामयी, चिदानन्द चिद्रूप।। 1।।

सदा सहज परिपूर्ण है, स्वयं-स्वयं में देव ।
निज से निज में मग्न हो, शिवपद हो स्वयमेव ।। 2 ।।

निज प्रभुता देखे नहीं, पर की आस लगाय।
दुःख सहे चहुँगति विषै, व्यर्थ रहो भरमाय।। 3।।

ज्ञानमात्र निज भाव में, उछले शक्ति अनन्त ।
सहज स्वयं की शरण से, होवे भव का अन्त।। 4।।

पूर्ण सु ज्ञानानन्दमय, अनुभव माँहि लखाय।
निर्वांछक कृतकृत्य हो, पूर्ण दशा विलसाय।। 5।।

ज्ञेयों से निरपेक्ष हो, जानो ज्ञायक भाव।
सहज रूप ज्ञायक रहो, नाशें सर्व विभाव।। 6।।

निज में ही संतुष्ट हो, निज में हो रतिवन्त।
सहज स्वयं भगवन्त हो, कहें अनुभवी संत।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’