तर्ज : मन भज ले श्री भगवान् …
ध्यावो समयसार अविकार, अब उत्तम अवसर आयो।
अब उत्तम अवसर आयो, अब स्वर्णिम अवसर आयो ।। टेक ।।
जो समयसार नहिं जाने, दुःख पावे निज गुण हाने।
बहु भ्रमत फिरे संसार, अब उत्तम अवसर आयो।। 1।।
जो समयसार पहिचाने, नव तत्त्वों से भिन्न जाने।
लहे सम्यग्दर्शन सार, अब उत्तम अवसर आयो।। 2।।
निर्ग्रन्थ रूप प्रगटावे, अरु समयसार को ध्यावे ।
निश्चय पावे भव पार, अब उत्तम अवसर आयो।। 3।।
उत्तम श्रावक कुल पाकर, भवि समयसार अपनाकर ।
हाँ करो आत्म उद्वार, अब उत्तम अवसर आयो।। 4।।
कुछ और उपाय नहीं है, रे शाश्वत शरण यही है।
यही द्वादशांग का सार, अब उत्तम अवसर आयो।। 5।।
धन-जन कुछ काम न आवे, क्यों मिथ्या मोह बढ़ावे।
कर सत्य तत्त्व स्वीकार, अब उत्तम अवसर आयो ।। 6।।
कर्तृत्व विकल्प सु छोड़ो, निज को निज में ही जोड़ो।
हो केवल जाननहार, अब उत्तम अवसर आयो।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७६ से १७७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’