तर्ज : होली खेले मुनिराज …
ध्याऊं ध्येय स्वरूप एकाकी वन में, निर्भय वन में, उपवन में।
भाऊं शुद्धचिद्रूप स्वरूप एकाकी वन में, निर्भय वन में, उपवन में। ।टेक ।।
शुद्ध चिद्रूप सु अनुपम जाना, रागादिक से भिन्न पिछाना।
मुक्त स्वरूप सु-अन्तर में, अन्तर में…।।भाऊँ।।१।।
इन्द्रिय सुख तो दुखमय जाना, सुख अतीन्द्रिय अहो पिछाना।
सुख स्वरूप सु-अन्तर में…।।भाऊँ।।2।।
ज्ञान अतीन्द्रिय ज्ञान सु जाना, ज्ञान ज्ञानमय अहो पिछाना।
ज्ञायक रूप सु-अन्तर में…।। भाऊँ ।। 3 ।।
हेय रूप सब परभाव है जाना, उपादेय शुद्धात्म पिछाना।
शुद्ध स्वरूप सु-अन्तर में … । । भाऊँ ।।4।।
परम भाव का आश्रय पाया, निजानंद सागर उछलाया।
मग्न रहूँ ध्रुव अन्तर में … । । भाऊँ ।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’