तर्ज-तिहारे ध्यान की मूरत…
ध्यानमय मूर्ति जिनवर की, मुक्ति मारग दिखाती है।
मोहतम दूर करती है, ज्ञान ज्योति जगाती है ।। टेक ।।
बाह्य श्रृंगार क्षण भंगुर, आत्मा सहज ही सुन्दर ।
देखने योग्य चिन्मूरति, स्वयं में ही दिखाती है ।।। ।।
वासना के ही कारण हैं, वस्त्र अरु बाह्य आभूषण।
निराभूषण विगत दूषण, तुम्हारी छवि सुहाती है।।2।।
है आयुध द्वेष के लक्षण, तुम्हें इनकी जरूरत क्या?
सौम्य निर्दोष प्रभू मूरति, भाव मैत्री सिखाती है ।।3।।
ज्ञान का स्रोत अन्तर में, सुःख का सिन्धु अन्तर में।
विभव अक्षय है अन्तर में, प्रगट मूरति दिखाती है।।4।।
प्रणेता तीर्थ के साँचे, तुम्हीं स्वामी हुआ निश्चय।
परम कृतकृत्य जिन मूरति, शीश सबका झुकाती है।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’