ध्यानकृपान पानि गहि नासी, त्रेसठ प्रकृति अरी
ध्यानकृपान पानि गहि नासी, त्रेसठ प्रकृति अरी ।
शेष पचासी लाग रही है, ज्यौं जेवरी जरी ।।ध्यान.।।
दुठ अनंगमातंगभंगकर, है प्रबलंगहरी ।
जा पदभक्ति भक्तजनदुख-दावानल मेघझरी ।।१।।ध्यान. ।।
नवल धवल पल सोहै कलमें, क्षुधतृषव्याधि टरी ।
हलत न पलक अलक नख बढत न गति नभमाहिं करी ।।२।।ध्यान. ।।
जा विन शरन मरन जर धरधर, महा असात भरी ।
‘दौल’ तास पद दास होत है, वास मुक्तिनगरी ।।३।।ध्यान. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २८
अर्थ
इस पद में अरिहन्त की भक्ति की गई है जिन्होंने ध्यानरूपी तलवार हाथ में लेकर कर्मों की तिरेसल प्रकृतियों का नाश कर दिया है. शेष पिचासी प्रकृतियाँ 'जली हुई जेवड़ी (रस्सी) की भांति रह गई हैं अर्थात् वे अब नवीन कर्म-बंधन नहीं कर सकतीं।
दुठ अनंगमातंगभंगकर, है प्रबलंगहरी ।
जो कामरूपी दृढ़ हाथी को भंग करने के लिए बलवान सिंह हैं; जिनके चरण-कमलों की भक्ति, भक्तजनों की दुःखरूपी अग्नि को शमन करने के लिए - मेघ की झड़ी के समान है।
नवल धवल पल सोहै कलमें, क्षुधतृषव्याधि टरी।
जिनके शरीर में श्वेत रक्त है, जिनके क्षुधा व तृषा की बाधा नहीं है। जिनके पलक टिमटिमाते नहीं हैं, न नख बढ़ते हैं और न केश बढ़ते हैं। वे ऊपर आकाश में ही चलते हैं, गमन करते हैं अर्थात् केवलज्ञान होने के पश्चात् वे पृथ्वी से ऊपर गमन करते हैं।
जा विन शरन मरन जर धरधर, महा असात भरी।
जिनकी शरण के बिना, अनेक बार बुढ़ापा धारण कर-कर के, रोगों से ग्रस्त होकर असाता से, दुःखभरी मृत्यु होती है। दौलतराम कहते हैं कि उनके चरणों में रहने से मुक्तिपुरी में - मोक्ष में रहने का सौभाग्य मिलता है।
हे सर्वगुणसम्पन्न अरिहंत ! आप भव्यजनरूपी कमलों को विकसित करनेवाले सूर्य हैं। पापों का नाशकर मोक्ष की राह बतानेवाले हैं। आपने कर्म-राशि का अन्त कर दिया है। युगपत ज्ञान और दर्शन से आपने अनन्त भावों को देखा व जान लिया है। आप निराकुल सुख के और अनन्त बल के धारी हो।
शब्दार्थ: पल = मांस व रुधिर; कल - शरोर; अलक = केश की लटें।
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
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