सत्य-अहिंसा उर में लाओ, अनेकांत जग में फैलाओ।
महावीर संदेश सुनाओ, मंगल धर्म ध्वजा फहराओ ॥ टेक ॥
जिनमंदिर में मंगल उत्सव, जिनमंदिर में धर्म महोत्सव ।
रोम-रोम प्रभु हरष रहा है, आनंद-आनंद बरस रहा॥ 1 ॥
दुर्विकल्प उपजें नहिं चित्त, जीवन होवे सहज पवित्र।
द्रव्यदृष्टि धर हो निष्काम, आराधें निज आतम राम ॥ 2 ॥
सुखी रहें सब जीव जिनेश, जयवन्तो जिनधर्म हमेश।
सहज नमन हो नित सुखकार, जय-जय समयसार अविकार ॥ 3 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३१३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’