वर्ते वर्ते रे ! श्रद्धान ध्रुव धाम का।
होवे होवे रे ! थिर ध्यान ध्रुव धाम का।। टेक ।।
ध्रुव ज्ञायक ही देव मम, ध्रुव ज्ञायक ऋषिराज ।
मैं ध्रुव ज्ञायक अहो, दुर्द प्रतीति आज ।। वर्ते. ।। 1 ।।
ध्रुव ज्ञायक ही रूप मम, ध्रुव ज्ञायक ही साध्य।
कार्य शून्य चैतन्यमय, ध्रुव ज्ञायक आराध्य ।। वर्ते. ।। 2 ।।
महातत्त्व हूँ एक ही, ध्रुव ज्ञायक अविकार ।
परम ब्रह्म शाश्वत प्रभो, ध्रुव ही जग में सार ।। वर्ते. ।। 3 ।।
पर्याय और सुभेद की, बात दूर रह जाय।
ध्रुव संचयी विकल्प भी, लगते हैं दुःखदाय ।। वर्ते. ।।4 ।।
बर्हिमुखी उपयोग अब, लगता है अन्तराम ।
धन्य-धन्य तब जानिये, ध्रुव ही माँहि समाय ।। वर्ते. ।।5 ।।
होने योग्य ही हो सहज, मुझे न कुछ स्वीकार।
नित्य निरंजन देव ध्रुव, सदा काल अविकार ।। वर्ते. ।।6 ।।
ध्रुव ही जीवन मंत्र है, ध्रुव ही है सर्वस्व ।
परम पारिणामिक अहो, ध्रुवमय ही मम शिख ।। वर्ते. ।।7 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’