ध्रुव ज्ञानानन्द स्वभावी मैं, मैं हूँ अनन्त शक्तिधारी | dhruva jjanananda svabhavi maim maim hu ananta shaktidhari

ध्रुव ज्ञानानन्द स्वभावी मैं, मैं हूँ अनन्त शक्तिधारी

(तर्ज : वह शक्ति हमें दो दयानिधे)
ध्रुव ज्ञानानन्द स्वभावी मैं, मैं हूँ अनन्त शक्तिधारी ।
ध्रुव चिदानन्द चैतन्य न जिसमें, कर्मों की है फलवारी ।।1।।

ध्रुव-अचल निरालम्ब अविनाशी, जिसको अनादि से भूला हूँ ।
ध्रुव समयसार निरपेक्ष अनुपम, आतम रस में झूला हूँ ।।2।।

ध्रुवधाम अतीन्द्रिय शाश्वत हूँ, जिस आश्रय क्लेश निवारा ।
ध्रुवधाम की शरण शरण निश्चय, जग द्वन्द-फन्द निखारी है ।।3।।

ध्रुव त्रैकालिक है तत्त्व जिसे, कंचन कामिनि नहिं जीत सके ।
ध्रुव परम पारिणामिक स्वभाव को, रूप दिखा नहिं डिगा सकी ।।4।।

ध्रुव की शरणा अब तो ले लो, निज पद पाओ शिव सुखकारी ।
ध्रुव की ही धुन में रमें रहो, परिणति हो जावे अविकारी ।।5।।


स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ १०१