तर्ज : मैं परम दिगम्बर …
ध्रुव ध्येय रूप निज समयसार ही ध्याऊँ रे।
हो निर्वाछक परिपूर्ण स्वयं को भाऊँ रे ।।
मैं स्वयं सदा ही स्वयं में तृप्त रहाऊँ रे ।। टेक ।।
सत् शिव सुन्दर शुद्धातम, चिन्मात्र सहज परमातम।
अतीन्द्रिय ज्ञानानन्दमयी, नित ध्याऊँ रे।। 1।।
परिग्रह किंचित् न सुहावे, अब यही भाव उमड़ावे।
निर्मोही हो निर्ग्रन्थ आत्मा ध्याऊँ रे।। 2।।
कर्त्तापन झूठा लगता है, हाँ होने योग्य ही होता है।
बस निर्विकल्प हो, जाननहार रहाऊँ रे ।। 3।।
पर लक्षी वृत्ति मिटाऊँ, थिर रूप हूँ थिर हो जाऊँ।
अविनाशी आनन्दरूप, सिद्ध पद पाऊँ रे ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’